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उधर अल्फांसे की आँखों में भी नींद नहीं थी। दयाल से उसके अच्छे सम्बन्ध बन गए थे। दयाल ने ही उससे अनुरोध किया था कि रोज़ उसके साथ चाय पिए। अल्फांसे को भी सुबह सुबह चाय की ज़रूरत महसूस होती थी। पिछले दो महीने से ये सिलसिला चल रहा था। और फिर कल!
खुद अल्फांसे को यकीन था कि दोनों क़त्ल अलग अलग लोगों द्वारा किये गए हैं। युवती जहाँ क्रोध में हुई हिंसा का परिणाम लगती थी वहीँ दयाल को देखकर ऐसा लगता था कि उसे टॉर्चर किया गया है।
क्या पुलिस को ये अंतर पता नहीं चला रहा था?
दरअसल उस सेवाराम के विडियो ने ऐसा माहौल पैदा कर दिया था की सारा ध्यान ‘राक्षस’ ने अपनी और खिंच लिया था। और फिर वो सेवाराम राक्षस के चंगुल से बच कैसे गया? क्या राक्षस ने जानबूझकर उसे छोड़ दिया था, एक गवाह के रूप में? अपना खौफ लोगों में कायम रखने के लिए?
आज उसने सेवाराम को भी देखा था जब उसे हत्प्रण को पहचान करवाने के लिए लाया गया था?
इतना कमजोर आदमी उस राक्षस के चंगुल से भागने की कुवत रखता था?
इस सेवाराम से उसे मिलना होगा, अल्फांसे ने निश्चय किया।
सच्चाई की तह तक ज़ल्द से ज़ल्द पहुंचना ज़रूरी था वरना वो एस पी उसे फंसाने के लिए चाल चल सकता था जिससे उसने बेमतलब का पंगा ले लिया था।
सुबह का इंतज़ार बेमानी था। अभी ग्यारह भी नहीं बजे थे।
प्रभुद्वार यानि सामने वाले फाटक के गार्ड से भी उसकी थोड़ी पहचान थी वरना रात में गेट खुलवाना थोडा मुश्किल होता।
-------------------------
शरवन ने बेबस नज़रों से ए एस आई जिसका नाम दिवाकर था, की और देखा। दिवाकर ने सर हिलाया।
“अरे भाई, हां क्या नाम बताया तुमने अपना...?”
“अभी बताये कहाँ हैं? मोहन नाम है हमारा।”
“और हमारा नाम मुरली है।” औरत ने बात पूरी की।
“मोहन की मुरली”, कहकर पुरुष खी खी कर हंसा।
“अरे मोहन बाबू इ कहाँ का किस्सा लेकर बैठ गए। दिन भर आश्रम के चक्कर में परेशान हुए हैं। दोनों लाश के चक्कर में आज का सारा दिन ख़राब रहा और फिर आप लोग उसी का किस्सा लेकर बैठ गए।”
“सॉरी इंस्पेक्टर साहब। का करे जब से टीवी पर उसका रिपोर्ट देखे हैं दिमाग घाईघाई कर रहा है।”
“अच्छा भाई लोग, चलिए उठते हैं। बहुत लेट हो गया।” शरवन ने उठने का उपक्रम किया।
“अरे शरवन भैय्या अभी तो खाना पीना भी नहीं हुआ है। “
“हम तो आपके लिए कह रहे थे मोहन बाबू। हम तो आज सेवा के साथ ठहरेंगे। लेट हो जाइएगा तो मुश्किल होगा।”
“लेट तो सच में हो गया। अब यहीं ढाबा में सो जायेंगे और सुबह सुबह निकलेंगे। काहे भैय्या”, चिल्लाते हुए काउंटर पर बैठे शख्स से बोला, “यहाँ रेस्ट कर सकते हैं न?”
काउंटर पर बैठे शख्स ने मुंडी हिलाई।
“बढियाँ। चलिए एक ब्लेंडर्स प्राइड का आधा वाला बोतल भेजिए ज़ल्दी और साथ में फ्रीज़ वाला पानी और साथ में प्याज और पापड को सेंक के।”
फिर ठहरकर बोला।
“पर सेवाराम जी आप वहां से बच कर कैसे निकल आये उस राक्षस से।”
इस बार दिवाकर ने बिगड़कर गिलास नीचे फ़ेंक दिया, “चुप रह साले, सारा मूड ख़राब किये दे रहा है।”
एकाएक उसके मूड को बदलता देख मोहन मुंह खोलकर ताकने लगा और हतप्रभ होकर बोला, “आपने तो हमको गाली दे दिया।”
मोहन की मुरली ने भी मुंह खोला, “गाली क्यों दे दिए इंस्पेक्टर साहब, हमारे मरद को गाली से बहुत गुस्सा आता है। कहीं गुस्सा में आपको पीट दिए तो?”
अब ए एस आई का गुस्सा नियंत्रण से बाहर था। उसके पुलिसिया गुरुर ने जोर मारा।
“ठहर बे साले, मसखरी करता है हमसे।” कहते हुए झपटा।
पर बेचारे को क्या पता था कि उसका पाला किसी मसखरे से नहीं बल्कि भारत के सर्वश्रेष्ट जासूस जोड़ियों में से एक से पाला पड़ा है। जानने वाले इसे तोता मैना की जोड़ी भी कहते थे। ऑफिसियल रिकॉर्ड में ये इनका नाम कन्हैय्या और राधा था। तीन साल पहले इन्होंने उस सीक्रेट सर्विस को ज्वाइन किया था जो ‘एच आई जी’ के नाम से जाना जाता था जिसका काम भारत के पडोसी देशो में होने वाले भारत विरोधी गतिविधियों पर नज़र रखना था।
एच आई जी यानी हिमालयन इंटेलिजेंस ग्रुप कहा जाता था।
एक जोरदार थप्पड उसके गाल पर पड़ा और पूरी तरह से खड़ा होने से पहले ही कुर्सी को लिए उलट गया।
शरवन अपने पुलिस यार को थप्पड़ खाते हुए देख कन्हैय्या पर झपटा पर राधा ने उसके कपड़े को पकड़कर झटका दिया। वो भी गिर पड़ा।
प्यार से बोली राधा, “बैठिये न देवर जी। क्यों दोनों के बीच में पड़ते हैं।”
जितनी बार दिवाकर ने उठने की कोशिश की उतनी बार वो थप्पड़ खा चूका था।
इतना तो तीनों समझ गए थे की उनका पाला घुटे हुए लोगों से पड़ा है।
शरवन भी कई बार उठने की नाकाम कोशिश कर चुका था।
सेवाराम एक कोने में दुबका पड़ा था। ढाबे में मौजूद तीनों स्टाफ निर्लिप्त दूर खड़े सबकुछ देख रहे थे। ढाबे में शराब के जोर में मारपीट होना आम बात थी। पर लोकल थाने के ए एस आई को पीटाई खाते हुए उन्होंने शायद ही कभी देखा था। दिवाकर के मुंह से गालियाँ छूट रही थी।
पांच मिनट तक दिवाकर की कुटाई होती रही।
“हाँ अब दोनों आराम से कुर्सी पर बैठ जाइए।”
दोनों ने कोई विरोध नहीं किया।
“ए मरद।”
“कहो औरत।”
“आपने तो कुछ ज्यादा ही कूट दिया दिवाकर बाबू को। ऐसा कोई किसी को कूटता है क्या। पता नहीं कहाँ कहाँ से खून निकल रहा है जेठ जी को।”
“क्या करें औरत। हम शरवन से कुछ पूछ रहे थे और बीच में जेठ जी बक बक कर रहे थे। आंख से कुछ इशारा भी किये थे, हम देखे नहीं थे क्या।”
“अब पूछ लीजिये न, अब एकदम शांति से बैठेंगे इंस्पेक्टर साहब।”
“तू मरेगा छोरे, तुझे मालूम नहीं की किससे पंगा लिया है।”
इस बार राधा अपनी जगह से उठी और एक जोरदार मुक्का दिवाकर के गाल पर लगाया। दिवाकर को ऐसा लगा मानों बीस किलो का लोहा उसके चेहरे पर पटक दिया गया हो। वो चकराकर गिर पड़ा।
“अब साढ़े तीन मिनट बाद इसके नाक से खून निकलना शुरू होगा।” राधा ने इतमीनान से कहा।
“अब क्या करना है औरत?”
“पहले शरवन जी के दायें हाथ की एक अंगुली तोड़ दीजिये। उसके बाद ही बातचीत करेंगे। वरना ये झूठ झाठ बोलना शुरू कर देगा।”
“पर बायें हाथ की अंगुली क्यों नहीं?”
“सुबह धोने में दिक्कत होगी।”
“अच्छा, ठीक।”
पांच मिनट के अन्दर अपनी टूटी अंगुली के साथ शरवन सब कुछ बताने को तैयार था।
अल्फांसे दूर एक पेड़ के नीचे खड़ा दोनों की सारी कारिस्तानी देख रहा था जो सेवाराम को खोजता यहाँ तक आ गया था। दोनों को उसने आराम से पहचान लिया था। कन्हैय्या को उसने एस पी के साथ देखा था और राधा का परिचय आज सुबह योग टीचर के रूप में करवाया गया था।
इतना तो वो समझ गया था की दोनों पुलिस या जासूस हैं। दोनों सही लाइन पर जा रहे थे और दोनों के सवाल जवाब उसी के काम आने वाले थे।
“पहला सवाल, शरवान भैय्या, आपको किसने कहा था कि सेवाराम जी को शराब पार्टी के बहाने देर तक बिजी रखा जाये?”
“चुप बे साली, ‘मरद’ ने ‘औरत’ से कहा, तुझे कैसे मालूम कि शरवन बाबू ने ऐसा किया?”
“एकदम भुलक्कड़ हो का, अभी दो घंटे पहले तो इनके यार दोस्त से मिलके लौटे है। का कहे रहे उ लोग?”
“अरे हाँ हम तो भूल गए थे। पार्टी के लिए ५००० भी तो भेजा था इस शरवन बाबु ने। अब ऐसा फटीचर आदमी ५००० रूपया कहाँ से लायेगा?”
“इंस्पेक्टर साहब ने दिए होंगे। शकल से ही दिलदार लगते हैं।”
“नहीं रे, इंस्पेक्टर लोगों का काम देना नहीं लेना होता है। सच तो शरवन जी बताएँगे।”
सेवाराम को कुछ कुछ समझ में आ रहा था। तो क्या शरवन ने सचमुच उसके साथ गेम खेला था?
दर्द से कराहता शरवन मानों फट पड़ा, “मुझे राक्षस ने कहा था।”
“ये लों पूरा शहर राक्षस को खोजने में लगा है। तुझे कहाँ से मिल गए?”
‘सच कह रहा हूँ। पूरे पचास हज़ार भी दिए थे मुझे। उसी पैसे से मैंने मोबाइल भी खरीद कर सेवाराम को दी थी।”
“अब चल ये बता कि तुझे किसने कहा था कि अगर कोई पूछताछ करे तो कह देना कि राक्षस ने कहा था?”
शरवन हकबकाया। क्या इन दोनों से कुछ भी छुपाना संभव था!
“मुझे एक अनजान आदमी ने इस काम के लिए पैसे दिए थे।” शरवन इस बार सच बोलता प्रतीत हो रहा था। अब वो उसका हुलिया बताने लगा।
अल्फांसे आराम से सब कुछ सुनता रहा। पता नहीं और क्या क्या चल रहा था इस शहर में। तो भैया, कन्हैय्या ने कहा, “दयाल आपके घर कब आया था?”
“दयाल कौन दयाल? मेरे घर तो वो अजनबी ही आया था पैसे लेकर।”
राधा ने टोका, “पता नहीं देवर जी क्या क्या बोले जा रहे हैं। हम इनसे पूछना चाह रहे हैं की आश्रम का केयरटेकर दयाल कल इनके घर क्यों गया था और ये अजनबी अजनबी भज रहे हैं। अब कोई इनके घर गया या इंस्पेक्टर साहब के घर गया इससे हमे क्या? आप तो हमे दुखी कर दिए शरवन भैय्या।”
“अच्छा वो भी छोड़िये शरवन जी, बस इतना बता दीजिये कि जो पुलिंदा दयाल ने आपको सौंपा था वो आपके पास ही है या उसे आगे बढ़ा दिया?”
शरवन को काटो तो खून नहीं नहीं।
जाने वो किसका मुंह देखकर उठा था।
“घर में है...” इतना ही कह सका था वो।
सेवाराम सोच रहा था कि जाने किस नक्षत्र में शरवन उससे मिला था।
दोनों अपनी कुर्सी से खड़े हो गए।
“अच्छा देवर जी और जेठ जी। अगर राक्षस जी का अभी का पता मालूम हो तो बता दीजिये। जाकर दुआ सलाम कर लेंगे।”
शरवन ने इनकार में सर हिलाया। वैसे भी वो बोलने की स्थिति में नहीं था। दर्द से उसका बुरा हाल था।
यही वो वक़्त था जब पुलिस की गाड़ी वहां आकर रुकी और उसमें से एस आई गुप्ता और चार पुलिसिये नीचे उतरे। शायद ढाबे वाले ने पुलिस स्टेशन को फ़ोन कर दिया था। अपने पुलिस स्टेशन की गाड़ी देख दिवाकर के सांस में सांस आयी।
पर उसका दिन भी कोई खास अच्छा नहीं था। जब गुप्ता ने कन्हैय्या को देखते ही सैलूट मारा तो उसके रही सही हिम्मत ने जवाब दे दिया।
एस आई के पास कन्हैय्या के बारे में एस पी का शाम में ही निर्देश पहुँच था।
सेवाराम और शरवन पुलिस की गाड़ी में उनके घर की तरफ जा रहे थे। पर उनका सेवाराम के घर जाना बेकार ही साबित होने वाला था।
वो पुलिंदा अल्फांसे के पास पहुँच चुका था।
“एक बात बता कन्हैय्या, तुझे पता कैसे चला कि दयाल ने शरवन को कुछ सौंपा है?”
“सिंपल मेरी राधा, इतना तो पता चल ही गया था कि शरवन का दयाल से मिलना जुलना है। कल भी आनन फानन में दोनों की मुलाक़ात हुई। एक दो लोगों ने पूछताछ में तस्कीद की थी कि दयाल एक पैकेट लेकर बाहर निकला था।
“झूठ सब झूठ। राधा से बात छुपाते तुझे शर्म नहीं आती।”
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खुद अल्फांसे को यकीन था कि दोनों क़त्ल अलग अलग लोगों द्वारा किये गए हैं। युवती जहाँ क्रोध में हुई हिंसा का परिणाम लगती थी वहीँ दयाल को देखकर ऐसा लगता था कि उसे टॉर्चर किया गया है।
क्या पुलिस को ये अंतर पता नहीं चला रहा था?
दरअसल उस सेवाराम के विडियो ने ऐसा माहौल पैदा कर दिया था की सारा ध्यान ‘राक्षस’ ने अपनी और खिंच लिया था। और फिर वो सेवाराम राक्षस के चंगुल से बच कैसे गया? क्या राक्षस ने जानबूझकर उसे छोड़ दिया था, एक गवाह के रूप में? अपना खौफ लोगों में कायम रखने के लिए?
आज उसने सेवाराम को भी देखा था जब उसे हत्प्रण को पहचान करवाने के लिए लाया गया था?
इतना कमजोर आदमी उस राक्षस के चंगुल से भागने की कुवत रखता था?
इस सेवाराम से उसे मिलना होगा, अल्फांसे ने निश्चय किया।
सच्चाई की तह तक ज़ल्द से ज़ल्द पहुंचना ज़रूरी था वरना वो एस पी उसे फंसाने के लिए चाल चल सकता था जिससे उसने बेमतलब का पंगा ले लिया था।
सुबह का इंतज़ार बेमानी था। अभी ग्यारह भी नहीं बजे थे।
प्रभुद्वार यानि सामने वाले फाटक के गार्ड से भी उसकी थोड़ी पहचान थी वरना रात में गेट खुलवाना थोडा मुश्किल होता।
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शरवन ने बेबस नज़रों से ए एस आई जिसका नाम दिवाकर था, की और देखा। दिवाकर ने सर हिलाया।
“अरे भाई, हां क्या नाम बताया तुमने अपना...?”
“अभी बताये कहाँ हैं? मोहन नाम है हमारा।”
“और हमारा नाम मुरली है।” औरत ने बात पूरी की।
“मोहन की मुरली”, कहकर पुरुष खी खी कर हंसा।
“अरे मोहन बाबू इ कहाँ का किस्सा लेकर बैठ गए। दिन भर आश्रम के चक्कर में परेशान हुए हैं। दोनों लाश के चक्कर में आज का सारा दिन ख़राब रहा और फिर आप लोग उसी का किस्सा लेकर बैठ गए।”
“सॉरी इंस्पेक्टर साहब। का करे जब से टीवी पर उसका रिपोर्ट देखे हैं दिमाग घाईघाई कर रहा है।”
“अच्छा भाई लोग, चलिए उठते हैं। बहुत लेट हो गया।” शरवन ने उठने का उपक्रम किया।
“अरे शरवन भैय्या अभी तो खाना पीना भी नहीं हुआ है। “
“हम तो आपके लिए कह रहे थे मोहन बाबू। हम तो आज सेवा के साथ ठहरेंगे। लेट हो जाइएगा तो मुश्किल होगा।”
“लेट तो सच में हो गया। अब यहीं ढाबा में सो जायेंगे और सुबह सुबह निकलेंगे। काहे भैय्या”, चिल्लाते हुए काउंटर पर बैठे शख्स से बोला, “यहाँ रेस्ट कर सकते हैं न?”
काउंटर पर बैठे शख्स ने मुंडी हिलाई।
“बढियाँ। चलिए एक ब्लेंडर्स प्राइड का आधा वाला बोतल भेजिए ज़ल्दी और साथ में फ्रीज़ वाला पानी और साथ में प्याज और पापड को सेंक के।”
फिर ठहरकर बोला।
“पर सेवाराम जी आप वहां से बच कर कैसे निकल आये उस राक्षस से।”
इस बार दिवाकर ने बिगड़कर गिलास नीचे फ़ेंक दिया, “चुप रह साले, सारा मूड ख़राब किये दे रहा है।”
एकाएक उसके मूड को बदलता देख मोहन मुंह खोलकर ताकने लगा और हतप्रभ होकर बोला, “आपने तो हमको गाली दे दिया।”
मोहन की मुरली ने भी मुंह खोला, “गाली क्यों दे दिए इंस्पेक्टर साहब, हमारे मरद को गाली से बहुत गुस्सा आता है। कहीं गुस्सा में आपको पीट दिए तो?”
अब ए एस आई का गुस्सा नियंत्रण से बाहर था। उसके पुलिसिया गुरुर ने जोर मारा।
“ठहर बे साले, मसखरी करता है हमसे।” कहते हुए झपटा।
पर बेचारे को क्या पता था कि उसका पाला किसी मसखरे से नहीं बल्कि भारत के सर्वश्रेष्ट जासूस जोड़ियों में से एक से पाला पड़ा है। जानने वाले इसे तोता मैना की जोड़ी भी कहते थे। ऑफिसियल रिकॉर्ड में ये इनका नाम कन्हैय्या और राधा था। तीन साल पहले इन्होंने उस सीक्रेट सर्विस को ज्वाइन किया था जो ‘एच आई जी’ के नाम से जाना जाता था जिसका काम भारत के पडोसी देशो में होने वाले भारत विरोधी गतिविधियों पर नज़र रखना था।
एच आई जी यानी हिमालयन इंटेलिजेंस ग्रुप कहा जाता था।
एक जोरदार थप्पड उसके गाल पर पड़ा और पूरी तरह से खड़ा होने से पहले ही कुर्सी को लिए उलट गया।
शरवन अपने पुलिस यार को थप्पड़ खाते हुए देख कन्हैय्या पर झपटा पर राधा ने उसके कपड़े को पकड़कर झटका दिया। वो भी गिर पड़ा।
प्यार से बोली राधा, “बैठिये न देवर जी। क्यों दोनों के बीच में पड़ते हैं।”
जितनी बार दिवाकर ने उठने की कोशिश की उतनी बार वो थप्पड़ खा चूका था।
इतना तो तीनों समझ गए थे की उनका पाला घुटे हुए लोगों से पड़ा है।
शरवन भी कई बार उठने की नाकाम कोशिश कर चुका था।
सेवाराम एक कोने में दुबका पड़ा था। ढाबे में मौजूद तीनों स्टाफ निर्लिप्त दूर खड़े सबकुछ देख रहे थे। ढाबे में शराब के जोर में मारपीट होना आम बात थी। पर लोकल थाने के ए एस आई को पीटाई खाते हुए उन्होंने शायद ही कभी देखा था। दिवाकर के मुंह से गालियाँ छूट रही थी।
पांच मिनट तक दिवाकर की कुटाई होती रही।
“हाँ अब दोनों आराम से कुर्सी पर बैठ जाइए।”
दोनों ने कोई विरोध नहीं किया।
“ए मरद।”
“कहो औरत।”
“आपने तो कुछ ज्यादा ही कूट दिया दिवाकर बाबू को। ऐसा कोई किसी को कूटता है क्या। पता नहीं कहाँ कहाँ से खून निकल रहा है जेठ जी को।”
“क्या करें औरत। हम शरवन से कुछ पूछ रहे थे और बीच में जेठ जी बक बक कर रहे थे। आंख से कुछ इशारा भी किये थे, हम देखे नहीं थे क्या।”
“अब पूछ लीजिये न, अब एकदम शांति से बैठेंगे इंस्पेक्टर साहब।”
“तू मरेगा छोरे, तुझे मालूम नहीं की किससे पंगा लिया है।”
इस बार राधा अपनी जगह से उठी और एक जोरदार मुक्का दिवाकर के गाल पर लगाया। दिवाकर को ऐसा लगा मानों बीस किलो का लोहा उसके चेहरे पर पटक दिया गया हो। वो चकराकर गिर पड़ा।
“अब साढ़े तीन मिनट बाद इसके नाक से खून निकलना शुरू होगा।” राधा ने इतमीनान से कहा।
“अब क्या करना है औरत?”
“पहले शरवन जी के दायें हाथ की एक अंगुली तोड़ दीजिये। उसके बाद ही बातचीत करेंगे। वरना ये झूठ झाठ बोलना शुरू कर देगा।”
“पर बायें हाथ की अंगुली क्यों नहीं?”
“सुबह धोने में दिक्कत होगी।”
“अच्छा, ठीक।”
पांच मिनट के अन्दर अपनी टूटी अंगुली के साथ शरवन सब कुछ बताने को तैयार था।
अल्फांसे दूर एक पेड़ के नीचे खड़ा दोनों की सारी कारिस्तानी देख रहा था जो सेवाराम को खोजता यहाँ तक आ गया था। दोनों को उसने आराम से पहचान लिया था। कन्हैय्या को उसने एस पी के साथ देखा था और राधा का परिचय आज सुबह योग टीचर के रूप में करवाया गया था।
इतना तो वो समझ गया था की दोनों पुलिस या जासूस हैं। दोनों सही लाइन पर जा रहे थे और दोनों के सवाल जवाब उसी के काम आने वाले थे।
“पहला सवाल, शरवान भैय्या, आपको किसने कहा था कि सेवाराम जी को शराब पार्टी के बहाने देर तक बिजी रखा जाये?”
“चुप बे साली, ‘मरद’ ने ‘औरत’ से कहा, तुझे कैसे मालूम कि शरवन बाबू ने ऐसा किया?”
“एकदम भुलक्कड़ हो का, अभी दो घंटे पहले तो इनके यार दोस्त से मिलके लौटे है। का कहे रहे उ लोग?”
“अरे हाँ हम तो भूल गए थे। पार्टी के लिए ५००० भी तो भेजा था इस शरवन बाबु ने। अब ऐसा फटीचर आदमी ५००० रूपया कहाँ से लायेगा?”
“इंस्पेक्टर साहब ने दिए होंगे। शकल से ही दिलदार लगते हैं।”
“नहीं रे, इंस्पेक्टर लोगों का काम देना नहीं लेना होता है। सच तो शरवन जी बताएँगे।”
सेवाराम को कुछ कुछ समझ में आ रहा था। तो क्या शरवन ने सचमुच उसके साथ गेम खेला था?
दर्द से कराहता शरवन मानों फट पड़ा, “मुझे राक्षस ने कहा था।”
“ये लों पूरा शहर राक्षस को खोजने में लगा है। तुझे कहाँ से मिल गए?”
‘सच कह रहा हूँ। पूरे पचास हज़ार भी दिए थे मुझे। उसी पैसे से मैंने मोबाइल भी खरीद कर सेवाराम को दी थी।”
“अब चल ये बता कि तुझे किसने कहा था कि अगर कोई पूछताछ करे तो कह देना कि राक्षस ने कहा था?”
शरवन हकबकाया। क्या इन दोनों से कुछ भी छुपाना संभव था!
“मुझे एक अनजान आदमी ने इस काम के लिए पैसे दिए थे।” शरवन इस बार सच बोलता प्रतीत हो रहा था। अब वो उसका हुलिया बताने लगा।
अल्फांसे आराम से सब कुछ सुनता रहा। पता नहीं और क्या क्या चल रहा था इस शहर में। तो भैया, कन्हैय्या ने कहा, “दयाल आपके घर कब आया था?”
“दयाल कौन दयाल? मेरे घर तो वो अजनबी ही आया था पैसे लेकर।”
राधा ने टोका, “पता नहीं देवर जी क्या क्या बोले जा रहे हैं। हम इनसे पूछना चाह रहे हैं की आश्रम का केयरटेकर दयाल कल इनके घर क्यों गया था और ये अजनबी अजनबी भज रहे हैं। अब कोई इनके घर गया या इंस्पेक्टर साहब के घर गया इससे हमे क्या? आप तो हमे दुखी कर दिए शरवन भैय्या।”
“अच्छा वो भी छोड़िये शरवन जी, बस इतना बता दीजिये कि जो पुलिंदा दयाल ने आपको सौंपा था वो आपके पास ही है या उसे आगे बढ़ा दिया?”
शरवन को काटो तो खून नहीं नहीं।
जाने वो किसका मुंह देखकर उठा था।
“घर में है...” इतना ही कह सका था वो।
सेवाराम सोच रहा था कि जाने किस नक्षत्र में शरवन उससे मिला था।
दोनों अपनी कुर्सी से खड़े हो गए।
“अच्छा देवर जी और जेठ जी। अगर राक्षस जी का अभी का पता मालूम हो तो बता दीजिये। जाकर दुआ सलाम कर लेंगे।”
शरवन ने इनकार में सर हिलाया। वैसे भी वो बोलने की स्थिति में नहीं था। दर्द से उसका बुरा हाल था।
यही वो वक़्त था जब पुलिस की गाड़ी वहां आकर रुकी और उसमें से एस आई गुप्ता और चार पुलिसिये नीचे उतरे। शायद ढाबे वाले ने पुलिस स्टेशन को फ़ोन कर दिया था। अपने पुलिस स्टेशन की गाड़ी देख दिवाकर के सांस में सांस आयी।
पर उसका दिन भी कोई खास अच्छा नहीं था। जब गुप्ता ने कन्हैय्या को देखते ही सैलूट मारा तो उसके रही सही हिम्मत ने जवाब दे दिया।
एस आई के पास कन्हैय्या के बारे में एस पी का शाम में ही निर्देश पहुँच था।
सेवाराम और शरवन पुलिस की गाड़ी में उनके घर की तरफ जा रहे थे। पर उनका सेवाराम के घर जाना बेकार ही साबित होने वाला था।
वो पुलिंदा अल्फांसे के पास पहुँच चुका था।
“एक बात बता कन्हैय्या, तुझे पता कैसे चला कि दयाल ने शरवन को कुछ सौंपा है?”
“सिंपल मेरी राधा, इतना तो पता चल ही गया था कि शरवन का दयाल से मिलना जुलना है। कल भी आनन फानन में दोनों की मुलाक़ात हुई। एक दो लोगों ने पूछताछ में तस्कीद की थी कि दयाल एक पैकेट लेकर बाहर निकला था।
“झूठ सब झूठ। राधा से बात छुपाते तुझे शर्म नहीं आती।”
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