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Thriller राक्षस अलफाँसें सीरीज़

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चेंग का कहना जारी था।

“उसी ने मेरे लिए मुश्किल पैदा की। उस कमबख्त ने आश्रम के कैम्पस में एक हत्या कर दी जिस कारण पुलिस कि चहल पहल वहां बढ़ गयी। फिर उस पाकिस्तानी जासूस की हत्या हो गयी और दिल्ली से दो घाघ जासूस पहुँच गए और वहां अनावश्यक दौड़ भाग और जांच शुरू हो गयी।”

“दिल्ली से दो ही जासूस पहुंचे हैं या फिर और भी हैं?”

“हो सकता है कि और हों। पर नज़र के सामने तो दो ही है। डर ये है की कहीं उन पाकिस्तानियों के चक्कर में मैं भी न लपेटा जाऊं। सिकंदर के फेर में मै बाल बाल बचा था।”

“वैसे सिकंदर अभी कहाँ है?”

“उसे कन्हैय्या ने सब कुछ उगलवाने के बाद छोड़ दिया था।”

“छोड़ दिया? अगर वो सच में भारतीय जासूस था तो फिर एक पाकिस्तानी जासूस को पकड़ने के बाद छोड़ देने कि बात गले से नहीं उतरी।”

“हो सकता है कि उसके पीछे अपने आदमी लगा दिए हों। या फिर कोई चिप वगैरह उसके शरीर में फिट कर दिया गया हो।”

“ये खबर पक्की है न कि उस इंडियन जासूस का सम्बन्ध इस आश्रम से ही था जो चीन में रहा था?”

“सौ फीसदी। दो दिन पहले भी उसी आई पी एड्रेस से मेल भेजा गया है और उसका लोकेशन निश्चित तौर पर इसी आश्रम से भेजा गया है और इंडियन करेंसी के हिसाब से पचास करोड़ रूपये किसी क्रिप्टोकर्रेंसी खाते से उसके स्विस खाते में ट्रान्सफर किये गए हैं। अब कोई बेमतलब का तो इतने पैसे बर्बाद नहीं करेगा। उस पर से उन दोनों मेहमानों के यहाँ आने कि खबर से ये बात और पक्की हो चुकी है कि यहाँ के लोगों का तिब्बत के मामले में खास दखल है।”

“पर सवाल ये है कि कुछ लोग इस आश्रम का तिब्बत में देशविरोधी गतिविधि के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं या फिर पूरा आश्रम ही इस गतिविधि में संलग्न है?”

“मेरे हिसाब से ऐसा हो ही नहीं सकता कि आश्रम प्रमुख की जानकारी के बिना ऐसा हो रहा हो।” मीमी ने टोका, “खासकर करमापा वाले मामले में मीटिंग फिक्स होने के बाद मुझे तो पूरा विश्वास है कि ये सारा कराया धराया उसी का है। जहाँ एक ओर धरमशाला में ये लोग सी टी ए की सरकार चला रहे हैं वहीं जो काम वे लोग खुलकर नहीं कर सकते उसके लिए सारा कार्यक्रम यहाँ से चलाया जा रहा है।”

“पर कमाल तो ये है कि मैंने आश्रम के सारे कंप्यूटर को खंघाल डाला पर किसी कंप्यूटर में ऐसा कोई इनफार्मेशन नहीं मिला जो हमारे ज़रुरत से मतलब रखता हो या जिसका आई पी एड्रेस हमारे काम का हो।”

“हो सकता है कि कोई सिस्टम आपसे छुपा रह गया हो।”

“हो सकता है। इसलिए तो तुम लोगों को बुलाया गया है। ये बात हम लोगों के हक में है कि मीटिंग का स्थल आश्रम न होकर बारासाहब कि हवेली में रखा गया है जिसे हाल ही में आश्रम ट्रस्ट ने खरीद लिया है। ऐसे मौके पर हम आश्रम की तलाशी का काम आराम से कर सकते हैं। लोकल पुलिस के साथ साथ एस पी भी अपने टीम के साथ हवेली में ही होगा। एस पी वैसे तो अश्रम्वालों से चिढ़ता है पर ऊपर से प्रेशर के कारण अपनी ड्यूटी में कोताही नहीं बरतेगा। हमें विशेष खतरा जासूसों कि टीम के साथ साथ सुधीर से भी हो सकता है।”

“ये सुधीर कौन हुआ?”

“सुधीर गुप्ता यहाँ का एस आई है पर जिस तरह से वो इस केस के पिछे पड़ा है वो भी हमारे लिए खतरनाक हो सकता है। रही बात ए एस आई की तो वो अपना आदमी है। पहले वो सिकंदर के लिए काम कर रहा था, अब हमारे टुकड़ों पर पल रहा है। इतना पैसा उसे दे चुका हूँ कि वो हमारे लिए कुछ भी कर सकता है।”

“बढियां। सुधीर को ट्राई नहीं किया?”

“नहीं। वो अलग किस्म का जीव है। वैसे तो वो भी आश्रम का भक्त है पर अपने ईमान की कीमत पर नहीं। उसका प्रोफाइल पता कर चुका हूँ।”

“इस काम का शोर्ट कट तरीका और भी है।” मीमी बोली।

“क्या?”

“आश्रम के खास लोगों को पकड़ मंगाते हैं और गर्दन पकड़कर सब कुछ उगलवा लेते हैं।”

“क्या बात है। तुम पर बलिहारी। इतने इंटेलिजेंट जवाब कि तुमसे उम्मीद नहीं थी।”

मीमी हंसी।

“तो हमारी कार्यसूची में सबसे प्रमुख है आश्रम को खंघालना। सारे ख़ास लोगों का प्रोफाइल पता करना।”

“और ये सब काम हमें चुपचाप करना है। हाँ अगर सारे इन्फोरमेशन मिल जाते हैं तो सारे आश्रम में ४-५ बमब्लास्ट को पूरी तरह मटियामेट कर चल देंगे।” चेंग ने आराम से कहा।

“वैसे सबसे बड़े खतरे के बारे में तो तुमने हम लोगों को बताया हीं नहीं।” मीमी ने कहा।

“वो क्या?”

“आश्रम में अल्फांसे भी मौजूद है।”

चेंग लेई हकबकाया।

“इस बारे में तुम्हें कैसे मालूम?”

“भूल गए कि मैं कल इस शहर में पहुंची हूँ। इतना समय काफी था आश्रम की रेकी के लिए। ये तो आश्चर्य कि बात ही होगी कि तुम दोनों एक दूसरे से टकराए नहीं होंगे।”

“ऐसा ही हुआ है। ये तो बेहतर है कि वो मुझे पहचानता नहीं है। पर तुम्हें तो वो पहचानता है। हमें कोशिश करनी है की हम दोनों उसकी लाइन को क्रॉस नहीं करें। केस ख़त्म होने के बाद उसके साथ जो करना है कर दिया जायेगा, उसका स्वर खूंखार हो उठा।”

“खैर वो बाद की बात है। पहले ये बताओ अभी क्या करना है?”

“सबसे पहले दोनों जासूसों को यहाँ से बाहर करना होगा।”

“उसकी चिंता मत करो। हम लोग ऐसी स्थिति पैदा कर देंगे की उन्हें खुद ही ये शहर छोड़कर जाना होगा।” शेरिंग ने विश्वास से कहा।

“और सुधीर की मैं ऐसी हालत कर दूँगी की वो सारा इन्वेस्टीगेशन भूल जायेगा।”

“ये तुम लोग सोचो। मैं चलता हूँ। बहुत सारे काम बाकी हैं अभी। अगर चाहो तो पाकिस्तानी जासूसों से मदद ले सकते हो। कम से कम तीन तो मेरे संपर्क में हैं।”

थोड़ी देर मीटिंग और चलने के बात बर्खास्त हो गयी थी।

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जून ३०, सुबह १२ बजे

डीजीपी का चांदीपुर में देखा जाना एक बड़ी खबर हो सकती थी पर अगले सप्ताह चीन के विदेश मंत्री की होने वाली यात्रा के मद्देनज़र ये एक ज़रूरी घटना थी। एक बड़ी मीटिंग बुलाई गयी थी जिसमें जिले के सभी महत्वपूर्ण अधिकारी शामिल थे। मीटिंग के बाद जब एस पी गौतम को कहा गया कि डी जी पी अकेले में उनसे मुलाक़ात करना चाहते हैं तो उसे अंदाज़ा नहीं था कि उसे विदेश मंत्री की यात्रा से इतर किसी और बात के लिए बुलाया गया है।

“तुम्हारे एस आई सुधीर के खिलाफ बहुत सारी शिकायतें हैं। “

“मैं समझा नहीं सर। सुधीर तो हमारे विभाग का सबसे जहीन ऑफिसर में से एक है। पिछले केस में तो खुद आपने भी उसकी तारीफ़ की थी।”

“मुझे याद है। पर लगता है कि ज्यादा तारीफ़ से उसका दीमाग ख़राब हो गया है। मैंने तुमसे पहले भी कहा था कि आश्रम वाले मामले में एहतियात से काम लिया जाये। पर आजकल तुम्हारा एस आई हर जगह जेम्स बांड बना फिर रहा है। बेहतर होगा कि उसे इस केस से हटाने का आर्डर जारी कर दो।”

“सॉरी सर, पर वो डिपार्टमेंट के लिए काम कर रहा है मेरे लिए नहीं। वो मेरा एस आई नहीं है। और फिर उसनें ऐसा क्या कर दिया?”

“अपने पोस्ट से ज्यादा आगे बढ़कर काम कर रहा है। आश्रम से जुड़े हर किसी का पीछा करता फिर रहा है। दो दिन पहले आश्रम वाले महंत जी का पीछा करते करते काठमांडू पहुँच गया। सुनने में आया है उसने महंत जी को धमकी भी दी है।”

“कहाँ से आपने ऐसा सुना सर?”

“डोंट ट्राई तो ओवरस्मार्ट सचदेवा।”

“आई ऍम नॉट ओवरस्मार्ट बट स्मार्ट एनफ टू नो फ्रॉम वेयर यू आर टॉकिंग। यहाँ पहुँचने पर सबसे पहले उस महंत और को मिलने का टाइम दिया था। क्या ये दो कौड़ी के आश्रमवाले हम पुलिस ऑफिसर से ज्यादा इम्पोर्टेन्ट हो गए? एक लड़का इमानदारी से केस को सोल्व करने के लिए जान प्राण लगा दे रहा है और हमारे डिपार्टमेंट के लोग ही उसकी टांग खींचने में लगे हैं। आखिर क्या खास बात है इस आश्रमवालों में कि एक छोटे से मर्डर केस को हमें इन्वेस्टिगेट नहीं करने दिया जा रहा है? इतनी ऊपर तक पहुँच है इन आश्रमवालों की? क्या हम जानते नहीं कैसे कैसे जरायमपेशा लोग यहाँ आकर छुप कर रहते हैं? वो पाकिस्तानी जासूस एक साल से यहाँ छुपकर रह रहा था और हम लोगों को पता भी नहीं चला। केवल यहीं नहीं किसी भी आश्रम को छान लो २-४ घुसपैठिये ज़रूर मिल जायेंगे। पर हमारे नेता लोग शह देते रहते हैं ऐसे लोगों को और हम लोग ऐसे लोगों के तलवे चाटते रहते हैं।” अपनी बात पूरी करते करते एस पी हांफने लगा था।

“तुम इमोशनल हो रहे हो सचदेवा।”

“सही कहा आपने सर। पर एमोशन के बिना आदमी की हैसियत क्या है सर।”

“मैं तुम्हरी मनः स्थिति समझ रहा हूँ। मैं भी सुधीर के कैलिबर का कायल हूँ। वो तीन चार इने गिने एस आई में से है जिसकी मैं सच में सहायता करना चाहता हूँ, उसे आगे बढ़ते देखना चाहता हूँ। पर इस मामले में ऊपर से मंत्रियों का प्रेशर कुछ ऐसा है कि मैं फिलहाल कुछ नहीं कर सकता। अगर सुधीर को रोका नहीं गया तो हो सकता है कि उसका ट्रान्सफर चौबीस घंटे के अन्दर ऐसे डिपार्टमेंट में कर दिया जाये जहाँ वो बस लोगों को परेड करता फिरे। और ऐसा तुम भी नहीं चाहोगे।”

“ठीक है, मैं देखता हूँ।” एस पी ने भी मानों हथियार डाल दिए थे।

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“तो इसमें टेंशन कि क्या बात है सरस्वती जी। किसी न किसी को तो आना ही था अब चीनी विदेश मंत्री ही सही।”

“तुम मामले कीई गंभीरता नहीं समझ रहे हो अल्फांसे। जिस काम के लिए तुम्हें २ महीने से यहाँ रखा गया था वो दिन बस आने ही वाला है। जहाँ तक हमारी सेटिंग थी उस हिसाब से दोनों मेहमानों के दिल्ली से चीनी राजदूत का आना तय था जैसा कि तुम्हें मैंने बताया भी था। यहाँ तक कि अगर चीन से कोई बड़ा ऑफिसर भी आता तो उसे किडनैप करना तुम्हारे लिए आसान होता। उसकी अनुपस्थिति में ये मीटिंग आचार्य जी के अध्यक्षता में आराम से हो सकती थी।”

“तुम्हारा मामला तुम ही समझो। अगर दोनों तिब्बतियों को मीटिंग ही करनी थी तो दुनिया के किसी भी हिस्से में कर सकते थे। दुनिया में ऐसी कई जगहें हैं जहाँ इन्हें चीन के विरोध का सामना भी नहीं करना पड़ता। या फिर कहीं ऐसा तो नहीं ........।”

अल्फांसे बोलते बोलते चौंका।

सरस्वती मुस्कुराई।

“अब तुम ठीक समझे। दरअसल ये मीटिंग एक तरह से चीन खुद करवा रहा है। शोर्ट कट में कहें तो चीन चाहता है कि सी टी ए करमापा ओग्येन को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दें। जबकि दलाई लामा ऐसा नहीं चाहते। चीन ये मीटिंग धरमशाला में करवाना चाहता था। पर सी टी ए ने इससे इनकार कर दिया क्योंकि ऐसा होने से उस पर मीटिंग को प्रभावित करने का आरोप लगता। उसका कहना था कि अगर ये मीटिंग न्यूट्रल जगह पर हो तो बेहतर होगा। ये संजोग ही था कि मीटिंग का स्थल चांदीपुर में फिक्स हो गया।”

“और फिर संजोग से तुम्हारी मुझसे मुलाक़ात हो गयी और संजोग से मैं यहाँ आने को तैयार हो गया। बेवकूफ मत बनाओ।”

सरस्वती हंसी। “तुम्हें कौन बेवकूफ बना सकता है अल्फांसे। बस यूँ ही कोशिश कर रही थी। सच बात ये है कि बड़ी मेहनत से मैंने ये मीटिंग का लोकेशन धरमशाला से यहाँ फिक्स किया है। और कुछ?”

“बस कुछ बातें अभी भी समझ में नहीं आया। जैसे की ये सारा चक्कर तुम्हारा चलाया हुआ है या आचार्य जी का या फिर किसी और का? और दूसरी बात, तुम्हारे तिब्बत से इतनी मोहब्बत का कारण क्या है?”

“वक़्त आने पर सब कुछ समझ में आ जायेगा। फिलहाल तुम्हें ये सोचना है कि ऐसा क्या किया जाये कि ये चीनी मंत्री यहाँ नहीं पहुंचे। या पहुंचे भी तो मीटिंग का हिस्सा नहीं बने। और बने भी तो जैसा हम चाहते हैं वैसे स्टेटमेंट जारी करे।”

“सोचना हमारा काम है देवी जी। आखिर इस काम की मैं एडवांस फीस ले चुका हूँ। और अल्फांसे जिस काम के पैसे लेता है उसे पूरा करके ही छोड़ता है।”

“तो मैं निश्चिंत रहूँ?”

“बिलकुल। अब अगर चीनी राष्ट्रपति भी पूरी सेना लेकर पहुँच जाये तो भी अल्फांसे उसे अपने क़दमों पर झुककर रहेगा।”

सरस्वती अब कुछ आश्वस्त नज़र आ रही थी। अल्फांसे को इस समय अपने दोस्त विजय कि याद आ रही थी। अगर वो साथ होता तो उसका काम आसन हो जाता। चीनी मंत्री के साथ साथ उसे चेंग पर भी ध्यान देना था। चेंग अकेला ही दस के बराबर था और उम्मीद थी कि वो इस बड़े मिशन पर अकेला नहीं होगा।

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सुधीर हर पल सावधान था। इस वक़्त वो रजनी से मिलकर आ रहा था। रजनी के मामले में उसे पूरा विश्वास था कि सारा कराया धराया महंत का ही था और उस आनंद ने ही उस पर हमला किया था। इस मामले में वो आचार्य जी से भी कई बार मिलने कि कोशिश कर चुका था पर ऐसा नहीं हो पाया था। जैसी खबर उसे मिल रही थी उसके अनुसार आचार्य जी इन दिनों किसी से भी नहीं मिल रहे थे। आज तो सुबह से दो बार उसने आश्रम में प्रवेश कि कोशिश की थी पर उसे सख्ती से यह कहकर मना कर दिया गया था कि आश्रम में कुछ अंदरूनी काम चल रहा है और उसे अन्दर जाने कि इजाज़त नहीं है।

यानी महंत जी की उसने जिस तरह छीछालेदर की थी उसने असर दिखा दिया था। एस पी गौतम ने भी उसे डी जी पी से हुई बातचीत का ब्यौरा दे दिया था। मतलब उसे अब मामले से दूर रहना था। अपने मोटरसाइकल को उसने अपने घर कि तरफ मोड़ दिया।

थोड़ी देर के लिए वो अपने सोचों में यूँ डूब गया था की सामने से आते ट्रक के बारे में उसे देर से मालूम हुआ जो अपना ट्रैक छोड़कर उसके तरफ तेजी से बढ़ी चली आ रही थी।

अब उसके पास सोचने को बहुत कम वक़्त था। बायीं तरफ खेत था पर रोड का लेवल उससे ५-६ फीट ऊँचा था। पर ट्रक से बचने के लिए कोई और रास्ता नहीं था।

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डी जी पी के मोबाइल पर एस पी का नंबर उभरा। उसकी आवाज सुनकर डी जी पी महोदय समझ गए कि वो कितने खतरनाक मूड में है।

“सर जी। सुधीर के एक्सीडेंट को खबर आपको मिल ही गयी होगी। वो जिन्दगी और मौत के बीच झूल रहा है। अगर वो मर गया तो मैं सारे आश्रम को आग लगा दूंगा।”

डी जी पी के कुछ कहने से पहले हीं एस पी ने फोन काट दिया।

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हमेशा की त्तरह शरवन पुरे मार्किट का चक्कर लगाकर घर लौटा। आज किसी ने उसे उधार में दारू नहीं दिया था। इस वक़्त शरवन घर में अकेला था। पिछले बार उस लम्बे बाल वाले आदमी ने छोटे काम के लिए पूरे दस हज़ार सौंपे थे। अब सारे पैसे ख़त्म हो चुके थे। हमेशा की तरह पैसे नहीं होने पर वो सेवाराम के कमरे से पैसे निकल लेता था।

आज पहली बार उसका कमरा लॉक था।

“आज ऐसी क्या बात हो गयी ये कंगाल भी कमरे बंद रखने लगा।” शरवन बुदबुदाया।

‘पर ताले तो शरीफ लोगों से बचने के लिए होते हैं हमारे जैसे लोगों से बचने के लिए नहीं।’ कुछ ही देर में उसने ताला खोल लिया था। कमरे में प्रवेश कर सीधे वो दरवाजे के साइड में पड़े टेबल के तरफ लपका। टेबल के दराज में हमेशा कुछ न कुछ पैसे पड़े रहते थे।

दराज़ में पड़े १०० रुपये के नोट कि तरफ ख़ुशी ख़ुशी उसने हाथ बढाया। तभी उसे ऐसा लगा कि कोई उसे देख रहा है। या ये उसका भरम था? उसने कमरे में चारो तरफ नज़र घुमाई। उसकी नज़र आख़िरकार टेबल पर रखी हुई गुडिया पर पड़ी। दृष्टि उसी पर टिकी रह गयी। ऐसा लगा कि वो उसे आँखें तरेर रही हो। आम गुड़ियों की तरह इसने फ्रॉक नहीं बल्कि साड़ी पहन रखी थी।

गुडिया रखी थी या खड़ी थी वो तय न कर पाया। उसे ऐसा लगा कि ये कोई हाड़ मॉस की जीव हो। ये सेवाराम को गुड़ियों का शौक़ कबसे हो गया?

अनायास ही उसने गुडिया कि तरफ हाथ बढाया।

गुडिया सज्जन मालूम होती थी। उसका छोटा सा हाथ भी शरवन की तरफ बढ़ने लगा।

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“एक छोटा सा काम है दिवाकर। पर पैसे बड़े मिलेंगे।”

दिवाकर ने सर उठाकर देखा। पुलिस स्टेशन में वो अकेला ही था। इस आदमी को वो पहचानता था। सिकंदर ने परिचय करवाया था। नाम बिल्लू बताया था। सिकन्दर के लिए उसने कई काम किये थे। रकम भी अच्छी मिली थी। पैसे पहुँचाने का काम बिल्लू ही करता था इसलिए इस पर वो विश्वास कर सकता था।

“ये काम अकेले होने वाला नहीं है। दो चार आदमी रख सकते हो।”

“पैसे कितने मिलेंगे?”

“दो लाख।”

ये उसकी उम्मीद से बहुत ज्यादा थे।

बिल्लू ने काम बताया। काम उसकी उम्मीद से कम खतरनाक था। कम से कम अभी तो उसे ऐसा ही लग रहा था।

“कब करना है काम?”

“अभी।”

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अपने छोटे हाथ से गुड़िया ने शरवन के तर्ज़नी अंगुली को थाम लिया था। उसे ऐसा लगा कि बच्चे के हाथ में उसकी अंगुली आ गयी हो। हाथ में उस्नता थी। शरवन कि आंखें मानों गुडिया की आँखों में क़ैद होकर रह गयी थी।

क्या ये सम्मोहन था?

पकड़ सख्त होती जा रही थी।

अपने दूसरे हाथ से उसने अपनी अंगुली छुड़ाना चाहा। पर कोशिश व्यर्थ रही। उलटे दूसरे हाथ से उसने शरवन के बाएँ हाथ की तर्जनी को थाम लिया। अब उसके समझ में आया कि उसके साथ कुछ अनहोनी होने जा रही थी। वो कोई बच्चों वाली गुडिया नहीं थी बल्कि कोई और ही बला थी। भय से उसके होश फाख्ता हो गये। जुबान मानों तालू से जा चिपकी थी।

अब गुडिया मुस्कुराई। उसके होंठ हिले, “मेरा नाम मंदा है। मेरे साथ खेलोगे?”

मंदा ने दोनों हाथों को झटका दिया। शरवन के क़दमों ने ज़मीन का साथ छोड़ दिया।

अब मंदा क्रॉस हाथों को ही धीरे धीरे हिलाए जा रही थी और शरवन उछल रहा था।

“बड़ा मज़ा आ रहा है न?” मंदा बोली।

इसी वक़्त दिवाकर ने बाहर से आवाज दी।

“शरवन ओ शरवन...दिवाकर मानों इस वक़्त उसके लिए फ़रिश्ता बनकर आया था। मंदा ने मानों घबराकर उसका हाथ छोड़ दिया। वो जान प्राण लेकर बाहर की ओर दौड़ा। बाहर निकलकर दिवाकर का हाथ पकड़कर दौड़ता चला गया।

इधर मंदा फिर टेबल के एक कोने में खड़ी हो गयी थी।

“हूंह। ठीक से खेलने भी नहीं देते लोग।” मंदा बोली। “चलो फिर से बुत बन जाती हूँ।”

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ये संजोग ही था की जब आचार्य जी सुधीर को देखने हॉस्पिटल पहुंचे तो उस वक़्त एस पी वहां मौजूद था। ये अलग बात थी कि उसने वहां पर मौजूद सिपाहियों को ये आदेश दे रखा था कि आश्रम से आने वाले किसी भी व्यक्ति को उससे मिलने न दिया जाये चाहे वो आचार्य जी ही क्यों न हो। आचार्य जी के साथ आनंद भी मौजूद था।

“मैंने सुना था की आपने इन दिनों किसी से भी मिलना बंद कर दिया है। बहुत व्यस्त हैं आप? फिर इधर का रास्ता कैसे भूल गए?”

एस पी के व्यंग का आचार्य जी पर कोई असर नहीं हुआ।

“कैसी तबियत है सुधीर की?”

“बच गया। आश्चर्य की बात है न? इतने भयानक दुर्घटना के बाद भी बच गया।”

“मारने वाले से बचाने वाला सदा बड़ा होता है।”

“मारने वाला कौन है इस विषय में तो मुझे थोडा बहुत ज्ञान है।”

“तो फिर उसे पकड़ने में देरी क्यों? आखिर हमला एक पुलिस वाले पे हुआ है। सुधीर जैसे कर्मनिष्ठ पुलिस ऑफिसर बहुत कम होते हैं।”

“क्योंकि उसे बड़ों बड़ों कि सरपरस्ती हासिल है। इसी शहर का रहने वाला है वो। आप भी जानते हैं उसे।”

“किसकी बात कर रहे हैं आप?”

“महंत की बात कर रहा हूँ। आपके आश्रम के महंत की।” कहते वक़्त एस पी गौतम सचदेवा की दिलेरी में कोई कमी नहीं आयी थी।

उसे उम्मीद थी कि आचार्य ब्रह्मदेव को भड़काने में कामयाब हो जायेगा, पर आचार्य जी निष्प्रभावित रहे। टहलते हुए वो एस पी के पास पहुंचे।

बिलकुल पास। दोनों के लम्बाई में कोई अंतर नहीं था। बिलकुल बराबर। हाथ बढाकर एस पी के कंधे पर रखा, “एस पी साहब। आप शायद इसलिए ऐसा कह रहा हैं क्योंकि महंत जी आज सुबह डी जी पी साहब से मिलने गए थे। खुद मैंने महंत जी को भेजा था सुधीर जी की शिकायत के लिए। अगर सुधीर जी हमारे आश्रम में इन्वेस्टीगेशन के लिए आते तो हमें कोई शिकायत नहीं होती। पर वो अपनी स्मार्टनेस दिखने के लिए आ रहे थे। अगर उनके पास आश्रम के खिलाफ कोई प्रूफ है तो उसे लेकर सीधे हमारे पास भी आ सकते हैं। कानूनी तरीके से वो हमारे पास आता तो कोई बात नहीं। पर आपके एस आई साहब फ़िल्मी अंदाज़ से आयेंगे तो हम भी उनकी शिकायत करने के लिए स्वतंत्र हैं। हाँ अगर आप ये जानना चाहते हैं कि एक्सीडेंट में किसका हाथ है तो इसके लिए आप ट्रक ड्राईवर से पूछताछ कीजिये। वो तो आपके कब्जे में आ ही चुका है। आश्रम का काम लोगों को जिंदगी देना है लेना नहीं। सुधीर बाबू को कुछ होने वाला नहीं। मेरी शुभकामना उनके साथ है।”

आचार्य जी ने हाथ जोड़ा और चल दिए। उनके पीछे पीछे आनंद भी था।

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शाम के साढ़े छ: बज चुके थे। बड़ी मुश्किल से शरवन और दिवाकर अपने दो साथियों के साथ गुफा के ऊपर का पत्थर हटाने में कामयाब हुए। नीचे जाने के लिए कोई सीढ़ी का इंतेजाम नहीं था, दोनों फर्श पर कूद गए।

गुफा में साजों सामान के नाम पर कुछ विशेष नहीं था। ऊपर का पत्थर हटने के बाद शाम के धुंधलके की अन्दर हलकी रौशनी आ रही थी। चबूतरे पर किसी योगी का हस्त निर्मित पेंटिंग थी। एक कोने में बड़ा सा रिचार्जेबल लैंप रखा था। दिवाकर ने आगे बढ़कर रिचार्जेबल लैंप ऑन कर दिया।

बगल वाली गुफा से ताशी उर्फ़ चेंग लेई शेरिंग के साथ सारे दृश्य का आनंद ले रहा था। बस अब ग्यारह बजने का इंतज़ार था। उसने ग्यारह बजे से पहले राक्षस को कभी भी गुफा में आते नहीं देखा था। वो ये भी पता लगाने में असमर्थ रहा था कि ये राक्षस आता कहाँ से है? राक्षस कि पहली दृष्टि आश्रम वाले कांड के दो दिन पहले पड़ी थी। आज उसका यहाँ देर तक रुकने का इरादा नहीं था इसलिए शेरिंग को निर्देश देकर वो बाहर निकल आया।

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अल्फांसे ने दो बार ताशी का पीछा करने की कोशिश की थी पर कामयाब नहीं हो पाया था। हर बार वो मेढक की तरह उछलते उछलते गायब हो जाता था।

आज भी वो चांदीपुर से बाहर जाने वाले रास्ते के पास खड़ा था जो आश्रम के पीछे वाले फाटक से होकर गुज़रता था। एक रास्ता सीधे दूसरे शहर की ओर चला जाता था जिसका दर्ज़ा स्टेट हाईवे का था। यही रास्ता आगे जाकर बाईं ओर मुड़ जाता था और नदी के किनारे किनारे घने जंगले से होते हुए श्मशान की ओर चला जाता था। दाईं ओर एक पगडण्डी थी जो ऊपर पहाड़ी की और बढ़ जाती थी जहाँ छोटे बड़े बहुत सारे पहाड़ों का जाल था।

अल्फांसे निश्चित नहीं था कि यहाँ तक आने के बाद ताशी उर्फ़ चेंग किधर गया था। जाने किस फेर में था वो। चीनी मंत्री के यहाँ आने से उसका कोई न कोई सम्बन्ध अवश्य था।

आज भी वो जाने किन झाड़ियों में गायब हो गया था।

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“तो ये बात कन्फर्म है कि सिकंदर हथियारों के स्मगलर न होकर पाकिस्तानी सीक्रेट सर्विस का एजेंट था।”

“जी कैप्टेन। मैंने तो यूँ ही ये खबर फैलाई थी कि दयाल पाकिस्तानी जासूस है ताकि जिस काम के लिए मैं यहाँ आया हूँ उस पर पर्दा पड़ा रहे। सिकन्दर खुद को छोटा मोटा स्मगलर प्रकट करता रहा इसलिए उसे सीरियसली नहीं लिया गया। अगर दयाल का भेद नहीं खुलता तो ये ग़लतफ़हमी बनी रहती।

“और तुम दोनों की बेवकूफी से सिकंदर हाथ से निकल गया। हम लोग उसके बहाने पाकिस्तान को एक्सपोज कर सकते थे।”

इतने सारे आतंकवादी को पकड़कर भी हम लोग पाकिस्तान का ठेंगा नहीं उखाड़ सके और एक सिकंदर को पकड़कर क्या उखाड़ लेते, कन्हैय्या बुदबुदाया।

दूसरी तरफ वाले शख्स ने आँखें तरेर कर कन्हैय्या को देखा।

शाम के सात बजे थे। इस वक़्त दोनों एक ढाबे के पीछे एक पेड़ के नीचे लगे साधारण से टेबल चेयर पर मौजूद थे। जिसे वे सर कहकर संबोधित कर रहे थे उसका दर्जा एच आई जी के डिप्टी डायरेक्टर का था और वे किसी ऑफिस के नुमाईंदे मालूम हो रहे थे। पास में दो तीन फाइल्स रखे थे जिसमें एक उसी नाम के एक कंपनी के पेपर्स थे।

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बैठे बैठे राक्षस को ऐसा लगा मानों किसी ने उसके समूचे हृदय को मरोड़ कर रख दिया हो। अपनी दोहरी जिंदगी से वो परेशान था पर अभी कुछ दिन वो और इसी तरह अपने दिन बिताना चाहता था। सामान्यतः वो रात साढ़े दस के बाद ही गुफा का रुख करता था और अभी तो सात ही बजे थे। आराम से वो अपनी ज़िन्दगी बिता रहा था और लगभग तीन महीने पहले उसकी याददाश्त वापस आ गयी थी। अगर भुवन मोहिनी सामने नहीं आती तो वो जान भी नहीं पता कि उसका अतीत क्या है।

दिन भर वो अपनी सामान्य जिंदगी जीता और फिर रात होते ही दिन भर का चोला उतारकर अपने पुराने लिबास में आ जाता।

पर आज एकाएक उसे न जाने क्यों ऐसा लगने लगा कि उसे अभी गुफा में पहुँच जाना चाहिए था। गुफा का लोकेशन ऐसा नहीं था कि लम्बे समय तक उसे बाकी की नज़रों से बचाया जा सकता था।

गुफा तक का एक रास्ता पीछे कि तरफ गहन जंगल से होता था जिसका इस्तेमाल यदा कदा ही लोग करते थे क्योंकि इधर जंगली जानवरों की भरमार थी। राक्षस की आवाजाही इसी रास्ते से होती थी। निर्दिष्ट जगह पर पहुंचकर एक वृक्ष के खोह में उसने अपने कपड़ों कि तिलांजलि दी और अपने गुफा की तरफ बढ़ गया।

अभी वह गुफा से कुछ दूर ही था जब उसकी दृष्टि दूर जाते एक आदमी पर पड़ी जो दायें बायें देखता हुआ तेजी से बढ़ता चला जा रहा था। एक पल के लिए उसने पलटकर देखा था।

गुफा के अन्दर की हालत अपनी राम कहानी स्वयं कह रही थी। उसके गुरुदेव कि तस्वीर के अधजले टुकड़े चबूतरे पर पड़े थे। बाकी की कहानी सर्च लाइट में छुपे कैमरे ने बयान कर दी थी।

बहुत देर तक राक्षस यूँ ही ठगा सा गुफा में खड़ा रहा।

कुछ देर बाद वो बाहर की तरफ दौड़ पड़ा। वो भूल चुका था की उसके नाम का वारंट है। वो ये भी भूल चुका था कि पब्लिक में इस तरह उसका आना उसके जान के लिए खतरा बन सकता है। उसके दिमाग में बस यही बात थी कि चंद कमीनों ने उसके गुरु के तस्वीर को जला डाली है!

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“आपनी गलती स्वीकार करना सीखो।”

कन्हैय्या ने सर झुका लिया।

“और फिर दयाल को जान से मारने कि ज़रुरत क्या थी?”

राधा ने आश्चर्य से कहा, “आपने ही तो कहा था कैप्टेन।”

“तो क्या हुआ। कभी कभी अपने दिमाग का भी इस्तेमाल करना चाहिए। हो सकता है कि उसके बहाने हमें कुछ और इन्फोरमेशन मिलती। आखिर वो एक पाकिस्तानी एजेंट का भाई था।”

“आपको पहले बताना था न सर की उसका भाई एजेंट था।” कन्हैय्या सादगी से बोला।

“तो हमें भी कहाँ मालूम था!”

“हाँ ये बात सही है।”

“पर टोर्चेर भी ऐसे करते हैं भला। मैंने सारे फोटो देखे थे जो तुमनें भेजे थे। पूरे शरीर का भुरता बना दिया था। आखिर एक लड़की हो।”

“अच्छा हुआ आपने याद दिला दिया। मैं कब की भूल गयी थी।”

“तो सिकंदर के बारे में तुम्हें इन्फोरमेशन कहाँ से मिली?”

“बताया था न। भूल जाते हैं आप। यहाँ के ए एस आई पर हमें शक था। ३-४ दिन पहले उससे मुठभेड़ हुई थी। मौका पाकर उसके मोबाइल में आपका वाला सॉफ्टवेर डाल दिया था ताकि उसके सारे कॉल को सुन सकूं।”

“पर उस पर शक क्यूँ हुआ? बाकी लोग पर क्यों नहीं हुआ?”

राधा मुस्कुराई। वो इंसान जिसका दर्जा एच आई जी में नंबर दो का था किसी खूसट की तरह उससे सवाल कर रहा था। यही उसका अंदाज़ था। देखने में किसी सरकारी दफ्तर का रिटायर्ड किरानी लगता था।

“क्योंकि थाने के ड्राईवर ने बताया की उसके सिकंदर से खास सम्बन्ध हैं। और थाने के ड्राईवर से इसलिए पूछा क्योंकि किसी के बारे में जानने के लिए उसके ड्राईवर पर हाथ धरना चाहिए। और फिर ड्राईवर ने इसलिए बताया क्योंकि मैंने उसे पचास हज़ार रुँपये घूंस दिए थे।”

“तौबा। ये काम तो बीस हज़ार में ही हो जाता।”

“ओके बाकी पैसे मेरी तनखाह में से काट लेना।”

“और अगर ये सब हमें फ़साने की साजिश हुई तो?”

“क्यों खामखाह। और फिर दूसरी तरफ वाली आवाज सिकंदर की थी। मैंने उसकी लोकेशन ट्रेस करवाई है। वो कॉल काठमांडू से ही किया जा रहा था।”

“सही पकडे हो। वो काठमांडू में एक प्राइवेट हाउस में है। मैंने दो जासूस वहां रख छोड़े हैं।”

“तो फिर इतनी देर से हमारे साथ कबड्डी खेल रहे थे?”

“परीक्षा ले रहा था।”

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वो सड़क पर दौड़ा जा रहा था। इस वक़्त दस बजने को थे और सड़क पर ज्यादा लोग मौजूद नहीं थे। ये चांदीपुर की मुख्य सड़क थी। कुछ साईकिल सवारों से उसकी टक्कर भी हुई पर उसे मानों कुछ होश नहीं था।

उसे दौड़ते हुए लगभग १५ मिनट हो चुके थे। जहाँ जहाँ से वो गुज़र रहा था पब्लिक में दहशत का माहौल पैदा करता जा रहा था। ऐसा लग रहा था कि आदिम युग का कोई व्यक्ति शहर में घुस आया हो। एक चौक पर पहुँच कर वो ठिठका फिर एक तरफ दौड़ता चला गया।

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“पर वो लोग वहां कर क्या रहे हैं?”

“हम लोगों को रोकने कि कोशिश। तुम्हें मालूम ही है कि हमारे देश में घुसपैठ के लिए पाकिस्तान कश्मीर का इस्तेमाल करता रहा है। पर हमारी सेना के सख्त होने से अब वो नेपाल का ज्यादा इस्तेमाल कर रहा है और इसके लिए उसे चीन कि शह प्राप्त है। नेपाल में चीन की बढती पैठ जग जाहिर है। उससे निपटने के लिए हमारे एच आई जी ने नेपाल में एक हेडक्वार्टर बना रखा है जो एक छोटे से फ़ूड कोर्ट के रूप में काम कर रही है जो वहां के एअरपोर्ट से कोई दो किलोमीटर की दूरी पर है। वहां के सारे स्टाफ हमारे मुलाजिम हैं। इसकी एक ब्रांच एअरपोर्ट लाउन्ज के अन्दर भी है। इनका काम विदेशी पर्यटकों पर नज़र रखना है और अब तक कई पाकिस्तानी जासूसों को पकडवाने या देश में प्रवेश करने में हमारी मदद कर चुके हैं। इस फ़ूड कोर्ट का नाम ‘ट्राफीक जाम’ है और टाउन में इसका एक बाकायदा ऑफिस भी है जहाँ से इसे कण्ट्रोल किया जाता है। दुर्भाग्यवश इस ऑफिस पर पाकिस्तानी जासूसों की नज़र पड़ चुकी है। उसके पास ही इन लोगों ने एक छ: सात कमरे का घर किराये पर ले लिया है, उसी घर का मालिक सिकंदर है।”

“और उस घर को हमारे जासूस तबाह कर देंगे जो उसकी निगरानी कर रहे हैं। वाह वाह ये तो बहुत अच्छा आईडिया है।”

“उन जासूसों का काम इनफार्मेशन देना है मारपीट करना नहीं। ये काम तुम दोनों में से एक को करना होगा।”

“क्यों?” बहुत देर बाद राधा बोली, “दोनों के एक साथ जाने से क्या परेशानी है?”

“आप तो जानते हैं की हम दोनों को अकेले रहने से परेशानी होती है। डर लगता है।” कन्हैय्या ने कहा।

“मैं भी नहीं चाहता कि तुम लोग अलग अलग काम करो। पर अभी स्थिति ये है कि उन लोगों ने अपना जाल यहाँ तक बिछा रखा है इसलिए तुम दोनों की ज़रुरत दोनों जगह है। यानी तुम्हें टीम बनाकर ही काम करना होगा। बस एक को यहाँ और एक को काठमांडू में रहना होगा। हर हालत में तुम्हें चीनी मंत्री की यात्रा के पहले ही ये मिशन ख़त्म कर देना है ।”

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दिवाकर को पहली बार पैसे खटक रहे थे। जो काम चार मजदूरों से पांच हज़ार में करवाया जा सकता था उसके लिए उसे दो लाख दिए गए थे।

इस वक़्त रात के नौ बजे थे और वो अपने बाकी साथियों के साथ रोहिणी बार में मौजूद था। हर बार उलटे सीधे काम करने के बाद वे अलग अलग दिशाओं में निकल जाते थे पर आज उन्होंने इसकी ज़रुरत नहीं समझी थी। बस बिना किसी की नज़र में आये एक तस्वीर में आग लगाने का काम किया था। एक ही बात उसके दिमाग में घूम रही थी कि कहीं गुफा में किसी कैमरे का तो अस्तित्व नहीं था जो उसकी पहचान उजागर कर दे।

आज हर काम में सबसे आगे रहने वाले शरवन को न जाने क्या हो गया था! पहले तो अपने घर से उसका हाथ पकड़कर यूँ दौड़कर भागा था मानों पीछे कोई भूत पड़ गया हो। बार बार पूछने पर भी कुछ नहीं कहा था बड़ी मुश्किल से काम के लिए तैयार हुआ था। यहाँ बार में भी उसका मन नहीं लगा था और ज़ल्द ही यहाँ से मानों भाग निकला था।

बार में आने वाले सभी रेगुलर कस्टमर हीं थे। कुल मिलाकर ९-१० ग्राहक मौजूद थे इस बार का दर्ज़ा बाकी बारों से थोड़ा ऊपर था इसलिए यहाँ शांति का माहौल रहता था। काउंटर पर मौजूद शख्स बिल्लू ही था जो यहाँ का मेनेजर, कैशिअर अकाउंटेंट सब कुछ था।

जब कापालिक यहाँ प्रविष्ट हुआ तो उसके अजीब सी वेशभूषा ने सभी का ध्यान स्वाभाविक रूप से आकर्षित किया था।

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चेंग शैतान चौकड़ी यानी ठक्कर, शेन, मीमी और शेरिंग के साथ मौजूद था।

“तो दोनों जासूस आज रात या कल सुबह काठमांडू के लिए निकल जायेंगे। बस हमें यह कन्फर्म करना है कि जब तक यहाँ की मीटिंग ख़त्म नहीं हो जाये तब तक वो दोनों लौट नहीं पाएं।” शेरिंग बोला।

“इतना तो वे पाकिस्तानी कर ही सकते हैं। सुना है पूरे दस बारह लोगों की टीम इकठ्ठा कर रखी है उन लोगों ने।”

“पर एक बात समझ में नहीं आई। इतना इंटरेस्ट क्यों है इन लोगों का सिकंदर में?” शेरिंग बोला।

“इंटरेस्ट खुद सिकंदर ने पैदा करवाया है। इन जासूसों के नज़र में वे लोग नेपाल के रास्ते भारत में बहुत बड़ी गड़बड़ी पैदा करवाना चाहते हैं। पहले मुझे ये सिकंदर कोई परले दर्जे का बेवकूफ लगा था। पर अब मालूम हुआ की वो भी हम लोगों की तरह अच्छा खासा कमीना है। वो जानता है कि इन लोगों से नेपाल में अच्छी तरह निपट सकता है।”

सभी लोगों ने ठहाका लगाया।

“एक और खतरनाक जीव सुधीर था। वो भी १०-१२ दिन तक तो अपनी टट्टी भी साफ़ नहीं कर सकता। हॉस्पिटल के डॉक्टर से बात की थी मैंने। वहां उसका बेचारा बाप दहाड़ मार रहा था।” ठक्कर ने कहा।

“मुझे पता नहीं था कि तू ट्रक ड्राईवर भी है।” चेंग ने मीमी से कहा।

“अगर उसके मोटरसाइकिल का बैलेंस नहीं बिगड़ता तो उसे कुचलकर ही दम लेती। सही समय पर चेंग ने उसके हॉस्पिटल से निकलने का समय बताया और मेरा काम आसन हो गया। अब किसी ढाबे पर खड़े ट्रक को उड़ाना कौन सा मुश्किल काम था।

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सुधीर ने मुस्कुराते हुए खुद को आईने में देखा। सर पर अधपके हुए से खिचड़ी बाल, उसी तरह कि सफेदी झलकाती हुई हलकी दाढ़ी, पीले दांत और शरीर पर कुर्ता पजामा।

यानी कि त्रिलोचन गुप्ता। सुधीर गुप्ता का पिता। ये उसका पसंदीदा मेकअप था। यहाँ तक कि एस पी भी उसके इस रूप से अनजान था।

जबसे उसने महंत को भड़काया था तबसे ही उसे अंदेशा था कि उस पर वार हो सकता है। सबसे पहले उसने अपने परिवार को अपने साले के पास दिल्ली भेजा और फिर अपने पर होने वाल हमले के इंतज़ार में लग गया था। अपने बाइक को जिस तरह नीचे सड़क से गिराया था उसके लिए वो अपनी पीठ ठोक सकता था।

पर अगर इन सब के लिए एस पी साहब का साथ नहीं होता तो वो कुछ नहीं कर सकता था।

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“अब बची बात राक्षस की। अब तक तो उसने दो चार लोगों का सफाया कर दिया होगा।” शेरिंग ने कहा।

“इसके लिए भी हमें शेरिंग का आभार मानना होगा। इसी ने ये आईडिया दिया कि अगर राक्षस दो चार लोगों को टपका दे तो शहर का माहौल मदमस्त हो जाएगाI”

ठहाके का फिर एक और दौर चला।

“पर अभी हमारा इरादा शहर का माहौल बिगाड़ने का नहीं है। अगर माहौल बिगड़ा तो मीटिंग की डेट आगे बढ़ जायेगी। बस हमारे आका का आदेश था कि इस राक्षस कि कहानी ज़ल्द ख़तम हो जाए वरना कहीं मीटिंग के समय ये पहुँच गया तो गड़बड़ी फैला देगा।”

“अब बस इस शहर में हमारे लिए एक ही खतरा बचा है, यानी की अल्फांसे।” मीमी बोली, “अगर उसे भी नेपाल भेज दें तो हमारे लिए मैदान साफ़ हो जायेगा।”

“फिर हम लोग खुले मैदान में कबड्डी खेल सकेंगे।”

“अगर मैं उसे लेकर हनीमून के लिए काठमांडू निकल जाऊं तो कैसा रहेगा।”

चेंग उर्फ़ ताशी हंसा। “अल्फांसे केवल लाशों के साथ हनीमून मनाता है।”

“क्या बात है चेंग? ऐसा लगता है कि अल्फांसे नाम का खौफ तुम पर बढ़ चढ़ कर सवार हो गया है।” ठक्कर ने कहा।

“तुम ऐसा इसलिए कह रहे हो क्योंकि इस अल्फांसे से तुम्हारा पाला नहीं पड़ा है।”

“बहुत नाम सुना है मैंने पर किसी को ख़त्म करने के लिए बस एक मौके की ज़रुरत होती है।”

“बस वही एक मौका तो नहीं देता कमबख्त।” मीमी बोली।

“अगर ऐसा है तो हम दोनों को मौका दो। ठक्कर और मैं एक दिन में उसे उसकी औकात बता देंगे।” शेंग बोला।

“अभी का समय अपना जौहर दिखने का नहीं है शेंग। आगे पांच दिन में ऐसे बहुत से मौके मिलेंगे। पहले मैं उस कापालिक को बचा कर आता हूँ।”

“तो तुम निश्चित हो कि राक्षस को ब्रह्मदेव से भिड़ाने में सफल हो जाओगे?”

“सौ प्रतिशत।”

“और अगर राक्षस तुम्हारे हाथ से निकल गया तो?”

“अव्वल तो ऐसा होगा नहीं। और अगर हो भी गया तो उसके असली रूप को सबके सामने ला दूंगा।” चेंग धूर्त भाव से मुस्कुराया।

तीनों एक साथ चौंके।

“तो क्या राक्षस के भेस में कोई और है?” शेरिंग ने कहा।

“नहीं। राक्षस तो उसका असली चेहरा है। या यूँ कहें कि उसके दोनों चेहरे असली हैं। पर इस बारे में अभी कुछ भी कहना नहीं चाहता।” चेंग के होंठो पर मुस्कराहट थी।

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अन्दर आकर सबसे पहले राक्षस ने बार का दरवाजा अन्दर से बंद कर दिया। उसका शिकार उसके सामने था।

दिवाकर इतना बेवकूफ नहीं था कि उसके समझ में नहीं आता कि उसने किस्से पंगा ले लिया है। तुरंत उसने अपने पॉकेट से रेवोल्वर निकालकर निशाना लगाया। इतने पास से उसका निशाना चूक गया था! इससे पहले की वो अगला निशाना लगा पाता राक्षस के हाथ का एक तमाचा उसके गाल पर पड चुका था। कुर्सी लिए हुए वो उलट गया।

वहां भगदड़ मच चुकी थी। कुछ लोग दरवाजे कि तरफ लप्के पर राक्षस की वहां आवाज गूंजी, “कोई भी बाहर नहीं जायेगा।”

“और कौन था तेरे साथ?”

दिवाकर ने अपने दोनों साथी की और इशारा कर दिया। शरवन और उसका पता बताने में भी दिवाकर ने देर नहीं की।

“पर मेरी कोई गलती नहीं। उस कमबख्त ने मुझे ऐसा करने को कहा था। बिल्लू के तरफ उसने इशारा किया जो काउंटर के पीछे छुपा पड़ा था।

राक्षस तीनों पर बुरी तरह टूट पड़ा। जो भी उसके हाथ आ रहा था उसी से वो तीनों को मारे जा रहा था। बाद में बिल्लू की भी बारी आयी।

भुवन मोहिनी की हत्या का तो कोई प्रमाण नहीं था पर यहाँ उसने चार चार हत्या की थी जो वहां मौजूद सी सी टी वी में ही नहीं बल्कि कुछ लोगों के मोबाइल में भी क़ैद हो चुका था।

बात फैलने में देर नहीं लगती। बाहर अच्छे खासे लोग जमा हो चुके थे। अगर वो लम्बे बालों वाला मोटरसाइकिल सवार उसे वहां से ले नहीं जाता तो शायद भीड़ उसे पकड़ सकती थी। बाद में कुछ लोगों ने पुलिस को बताया की उस मोटरसाइकिल वाले ने राक्षस को धीरे से कुछ कहा था जिसके बाद वो तुरंत उसके साथ बैठकर जाने कहाँ चला गया।

त्रिलोचन बना हुआ सुधीर भी वहां मौजूद था पर वह भी कुछ नहीं कर सका। पर उसने मोटरसाइकिल स्वर को पहचानने में कोई गलती नहीं की थी। वह तो उसी समय उसे पहचान गया था जब वह अपने बाइक पर बैठकर यूँ दर्शा रहा था मानों बाकी लोगों की तरह वो भी राहगीर हो। उसे इस बात का अफ़सोस था कि उसने उस दिन राक्षस को क्यों जाने दिया था। पर वह राक्षस का एक अच्छा सा विडियो बनाने में सफल हो चुका था।

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जुलाई १, आश्रम सुबह सात बजे।

आज आश्रम के सभी निवासी आचार्य ब्रह्मदेव के आग्रह पर साधना कक्ष में मौजूद थे। साधना कक्ष एक कांफ्रेंस हॉल में परिणत हो चुका था और बैठने के लिए करीने से कुर्सियां लगा दी गयी थी। सभी कुर्सियों का मुख मंच की ओर था और आचार्य ब्रह्मदेव मंच पर न होकर नीचे लगे सोफे पर बैठकर सभी से मुखातिब थे। उनके दायीं ओर महंत जी और बाईं और सरस्वती अलग अलग सोफे पर मौजूद थी। सबसे आश्चर्य की बात यह थी कि आचार्य ब्रह्मदेव अकेले न होकर अर्जुन देव के साथ मौजूद थे जिसका दर्ज़ा उनके गुरुभाई का था। बड़े दिनों के बाद दोनों को एक साथ देखा गया था वरना इन्हें हमेश एकांत में ही रहने कि आदत थी। एक तरफ ऐसे मौकों पर अनुपस्थित रहने वाला आनंद कुमार एक लैपटॉप के साथ मौजूद था।

रजनी अभी तक लौटा नहीं था इसलिए उसकी जिम्मेदारी आश्रम के ही पुराने अस्थायी मुलाजिम खुदीराम ने ले ली थी और वह श्याम के साथ मौजूद था। इन सबके अलावा कुल छ: स्थाई रूप से रहने वाले केयरटेकर भी मौजूद थे जिनमें एक नया गेटकीपर अनिरुद्ध भी मौजूद था जिसकी नियुक्ति दयाल की हत्या के बाद की गयी थी। सरस्वती की रिसेप्शनिस्ट तान्या की गिनती भी इन केयरटेकर में ही होती थी। इन सत्रह लोगों के अतिरिक्त आश्रम के आठ सन्यासी भी मौजूद थे जिन्हें यहाँ आये साल भर से भी ऊपर हो चुके थे। इनमे तीन स्त्रियाँ भी थी। भुवन मोहिनी की हत्या की रात कुल २७ मेहमान मौजूद थे पर इनकी गिनती अब सात में सिमट गयी थी। इन सात में ताशी, अल्फांसे, राधा और कन्हैय्या के अलावा तीन और लोग मौजूद थे। उस रात नए लोगों को आने देना मुनासिब नहीं समझा गया था, बीस लोग लौट चुके थे। राधा ने नेपाल का कार्यक्रम कुछ घंटों के लिए मुल्तवी कर दिया था।

कुछ सिक्यूरिटी गार्ड्स और भी थे जिनकी ड्यूटी दिन के वक़्त होती थी उनमें से तीन आश्रम के विभिन्न हिस्सों में अपनी ड्यूटी बजा रहे थे। बाहर के लोगों के लिए आश्रम अभी भी बंद ही था।

सबसे पहले सरस्वती उठी।

अभिवादन के बाद उसने बोलना शुरू किया,

“बहुत दिनों बाद आश्रम के सभी सदस्यों को एक साथ देखकर अच्छा लग रहा है। जैसा कि आप लोगों को बताया गया था ये मीटिंग डिस्कशन के लिए है किसी डिस्कोर्स के लिए नहीं। आप लोगों को मालूम ही है कि हम लोगों को बहुत बड़ी जिम्मेदारी दी गयी है। बौद्ध धर्म के दो बड़े विद्वान जिनका दर्जा तुल्कू का है...।”

“बीच में रोकने के लिए मैं क्षमा चाहता हूँ मैडम पर तुल्कू से आपका क्या अभिप्राय है।” अल्फांसे ने पूछा।

सरस्वती के कुछ कहने से पहले ही ताशी बोल पड़ा, “मैं बताता हूँ। हमारे तिब्बत के बौद्ध धर्म में अपने अगले जन्म को अपनी इच्छानुसार चुनने की परंपरा है। इन्हें ही तुल्कू कहते हैं। जैसे की हमारे दलाई लामा की एक ही आत्मा परंपरा से हर बार नया शरीर धारण करती है। ठीक है न गुरुदेव?” ताशी ने आचार्य ब्रह्मदेव की ओर देखा।

आचार्य ब्रह्मदेव हंस पड़े, “लगता है आपने गूगल गुरु के सानिध्य में ज्ञान अर्जन किया है। यह कोई परंपरा नहीं है मोहदय। बौद्ध धर्म हमें इन जन्म मरण से बाहर निकलने की कला सिखाता है, तुल्कू बनकर भटकना नहीं। फिर भी शाब्दिक तौर पर हम अभी के लिए ताशी महोदय की परिभाषा स्वीकार कर लेते हैं।”

अल्फांसे ने ताशी को आँख मारी। ताशी खिसियाकर दूसरी तरफ देखने लगा।

सरस्वती ने पुनः आपनी बात जारी रखी, “तो हमारे तो सम्मानित मेहमान अपने दो सहयोगियों के साथ हमारे आश्रम में अगली पांच तारीख को पधार रहे हैं। दिन में यहाँ हम लोगों को संबोधित कर संध्या पांच बजे हवेली के लिए प्रस्थान करेंगे। वहां हमारे एक और खास मेहमान यानी चीन के विदेश मत्री पधारेंगे और आचार्य जी के साथ एक मीटिंग में शिरकत करेंगे। हम चाहते थे कि हम सभी लोग उस मीटिंग का हिस्सा बने पर सुरक्षा कारणों से इसकी इजाज़त नहीं मिली। आचार्य जी के साथ केवल दो लोगों को रहने कि अनुमति मिली है। आदेशानुसार मैं तो वहाँ रहूंगी ही साथ ही चूँकि एक दुर्भाषिये कि ज़रुरत है इसलिए आनंद जी भी हमारे साथ सम्मलित होंगे। कार्यक्रम के विषय में अगर कोई सुझाव देना चाहते हैं तो वे सहर्ष ऐसा कर सकते हैं।”

मेरा एक छोटा सा सवाल है देवी, “क्यों?”

सबकी दृष्टि प्रश्नकर्ता कि तरफ घूमी। प्रश्न जोगीराम अग्रवाल ने किया था जो उन सात लोगों में सम्मलित थे जिन्होंने अभी तक आश्रम नहीं छोड़ा था। जोगीराम ऐसे इने गिने लोगों में थे जिनका सम्बन्ध आश्रम से बहुत पुराना था। इनकी उम्र पचास से ऊपर हो चली थी पर आश्रम की हर गतिविधि में हाथ बटाते थे।

सरस्वती ने विस्मय से जोगीराम की और देखा मानों उनका प्रश्न समझ में नहीं आया था।

“इस प्रश्न को उठाने के लिए क्षमा चाहता हूँ पर मुझे लगता है कि यह प्रश्न यहाँ उपस्थित कई लोगों के दिमाग में छुपा होगा। आश्रम से मेरा संपर्क उन दिनों से है जब हम सभी लोग गुरुवर जयंत देव के सानिध्य में थे। गुरुवर के अवसान के बाद मेरे साथ कई लोगों को इसमें संदेह था कि जिस लौ को गुरुवर जयंत देव ने जलाया था उसे आचार्य जी जारी रख सकेंगे या नहीं। पर हमारी शंका निराधार निकली। आचार्य जी ने उस परंपरा को न केवल जारी रखा बल्कि उसे बहुत आगे तक ले आये। व्यक्तिगत रूप से भी मैं इनका बहुत आभारी हूँ कि जब जब मेरी साधना और ध्यान में बाधाएं आयी आचार्य जी ने उसे दूर किया।”

आचार्य जी ने हाथ जोड़ कर जोगीराम का शुक्रिया अदा किया।

“आचार्य जी ने ही हमें सिखाया है कि अगर हम स्वयं के प्रति ईमानदार रहें तो हमे साधना पथ में आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता। इसलिए मैं कुछ कहने कि हिम्मत जूटा रहा हूँ।”

जोगीराम का कहना जारी था,

“क्या ऐसा नहीं लगता कि इन लामाओं के मामले में हाथ डालकर हम लोग व्यर्थ के पचड़े में पड रहे हैं? इन मामलों को सुलझाने के लिए हिमाचल राज्य के धरमशाला में पहले ही इन लोगों ने अपना छोटा सा देश बना रखा है। स्वयं आचार्य जी ने कई बार कहा है कि अपने आत्मिक उत्थान को प्राथमिकता देनी चाहिए। हमारे देश में अनगिनत लोग दबे कुचले पड़े हैं। तो फिर इनके मामले में हम लोग क्यों पड़ रहे हैं?” कहते हुए जोगीराम ने हाथ जोड़ लिए।

सरस्वती जवाब देने के लिए झटके से खड़ी हुई पर आचार्य जी ने उसे बैठने का इशारा किया।

मुस्कुराते हुए उन्होंने कहा,

“यह मामला देशप्रेम और अध्यात्म दोनों से जुड़ा है। तिब्बत से हम भौगोलिक और अध्यात्मिक दोनों रूप से जुड़े हैं। हमारे देश की आध्यात्मिक परंपरा ही तिब्बत में एक अन्य शाखा के रूप में विकसित हुई है इसलिए आज भी तिब्बत हमें अध्यात्मिक गुरु के रूप में देखता है। ऐसे में अगर कोई हमारी तरफ सहायता की दृष्टि से देखता हैं तो हम इनकार कैसे कर सकते हैं?”

“पर गुरुदेव चीन के लिए यह एक राजनितिक मामला है।”

“उसकी वो जाने जोगीराम। पर अगर तुम्हें अपने गुरु पर विश्वास है तो इतना जान लो कि ब्रह्मदेव चीन को इसे राजनीतिक रंग में रंगने नहीं देगा। तुम्हारा गुरु इतनी कुवत तो रखता है!”

आचार्य का स्वर इतना आत्मविश्वास भरा था कि इस विषय पर किसी को कुछ और कहने कि हिम्मत नहीं हुई।

कुछ पल बाद अल्फांसे ने प्रश्न किया,

“अच्छा आचार्य जी। हमारे मेहमानों का सम्बन्ध बौद्ध धर्म से है जबकि आप शिव को महागुरु मानते हैं। दो अलग परंपरा के लोगों में आप सामंजस्य कैसे बिठा पाएंगे।”

आचार्य ब्रह्मदेव ने सहज स्वर में कहा,

“वैचारिक तल पर भले ही हम लोग अलग हों पर अध्यात्मिक स्तर पर सारे धर्म एक ही हैं।”

“पर सुना है गुरुदेव की चीन के लोग अधार्मिक होते है। उनसे कैसे निपटेंगे?” सरस्वती ने मज़ाक में कहा।

आचार्य ने खुलकर ठहाका लगाया, “चीनी मंत्री का पाला पहली बार किसी तरीके के धार्मिक मनुष्य से पड़ेगा। हमसें बातचीत के बाद वो भी हमारे रंग में न रंग जाएँ तो कहना।”

सभी खुलकर हंस पड़े।

“अंत में मैं सभी आश्रम वासियों से अनुरोध करना चाहता हूँ कि कहीं भी अगर उस तांत्रिक की खबर मिले तो अविलम्ब पुलिस थाने में या यहाँ आश्रम में खबर करें। कल रात की खबर तो आपने सुनी ही होगी। उस कापालिक ने चार लोगों कि हत्या कर दी है। हमें भी एक जिम्मेदार शहरी कि भूमिका निभानी होगी।

....................................................

कन्हैय्या राधा के लिए चिंतित था। वो खुद नेपाल जाना चाहता था पर राधा के पास नेपाल का ज्यादा अनुभव था और वो काम के मामले में भी कन्हैय्या से ज्यादा सीनियर थी। पूरे दस साल का ज्यादा अनुभव था उसे जबकि कन्हैय्या को इस फील्ड में केवल पांच साल हुए थे। पिछले तीन साल से दोनों साथ काम कर रहे थे और ये पहला मौका था जब राधा किसी मिशन पर अकेले जा रही थी।

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अब वो सच में हत्यारा बन गया था।

पूरे चार लोगों की हत्या की थी उसने!

एक तरफ वो एक हत्या के झूठे इलज़ाम से बचने की कोशिश कर रहा था और दूसरी तरफ उसने सबके सामने चार चार हत्या कर डाली थी। वह तो यह भी नहीं जान पाया था कि लोगों ने उसके गुरु की तस्वीर को जलने के लिए उसे उकसाया था। अब एक ही आदमी बचा था जो इस राज को खोलने में समर्थ था। जिसका नाम और पता कल दिवाकर मरने से पहले बता चुका था।

कल जिस तरह जान पर खेलकर ताशी ने उसे बचाया था उसके लिए वो उसका ऋणी हो गया था। उसने शिष्य होने का धर्म निभाया था और अब उसे गुरु होने का फ़र्ज़ निभाना था।

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सुधीर हतप्रभ था।

पिछले आठ घंटे से वो अपने कंप्यूटर के सामने बैठा था। आश्रम से जुड़े हर शख्स की कुंडली खंघाल चुका था और हैरतंगेज परिणाम सामने आ रहे थे।

शुरुआत उसने पिछले दस वर्षों के समाचार पत्र से किया था। जहाँ बाकी समाचार पत्रों के ३-४ वर्षों के ही इ-पेपर एडिशन उपलब्ध थे, एक पेपर का पिछले १५ वर्षों के एडिशन ऑनलाइन उपलब्ध थे। सभी के उसके ज़रुरत से हिस्सों को उसने खंघाल डाला था। राक्षस उर्फ़ विनय चतुर्वेदी के केस फाइल को उसने पहले ही मंगा लिया था। उस फाइल में विनय के गुरु का नाम विक्रांत चतुर्वेदी दर्ज था साथ ही एक लोकल पत्रिका के हवाले से उसका चित्र भी उपलब्ध था। विक्रांत चतुर्वेदी को एक प्रसिद्द तांत्रिक बताया गया था और उसका चित्र इतना साफ़ था कि उसे इसमें कोई शुबहा नहीं था की यह शख्स आश्रम में अर्जुन देव के नाम से पाया जाता था। विक्रांत चतुर्वेदी का एक पारिवारिक फोटो भी उस रिपोर्ट में था जिसमें वो अपने माता पिता और भाई बहन के साथ था।

काफी देर तक फोटो को देखने के बाद वो कह सकता था कि ये लड़की भुवन मोहिनी का युवा संस्करण है। विनय के आग में जल जाने और भुवन मोहिनी के फरार हो जाने के बाद विक्रांत चतुर्वेदी को तलाश करने की कोशिश की गयी थी पर उसका कहीं भी पता नहीं चला था। वो भी दूध का धुला नहीं था और उस पर अपने भाई की हत्या का इलज़ाम था वो घर छोड़कर कहीं चला गया था। अर्थात वो इस आश्रम में शरण ले चुका था!

भुवन मोहिनी की हत्या वाले समय के रिकॉर्डिंग में उसने राक्षस के गुरु का ज़िक्र किया था। तो क्या, “वृष्टि खाने वाला गुरु” यही विक्रांत चतुर्वेदी था? और अगर यही फरार विक्रांत आश्रम का अर्जुन देव था तो क्या आचार्य जी ने जानबूझकर एक फरार मुजरिम को आश्रय दिया था?

विनय चतुर्वेदी पर भी कई हत्याओं का मुक़दमा चलने वाला था पर वो भी जेल से फरार हो गया था। उसके परिवार का कोई भी सुराग पाने में पुलिस असफल रही थी।

आचार्य जी ने एस पी को बताया था कि भुवन मोहिनी और उसका भाई उनके साथ हो लिया था। पर पुलिस के रिपोर्ट के अनुसार उसे उसका भाई छुड़ाकर ले गया था। उसमें किसी अन्य स्वामी का ज़िक्र नहीं था। तो क्या पुलिस की रिपोर्ट अधूरी थी?

आज से दस दिन पहले जिस आचार्य ब्रह्मदेव को वो गुरु मानता था आज वो भी उसके शक के दायरे में आ चुके थे।

और फिर विनय चतुर्वेदी!

उसका कोई भी चित्र ऑनलाइन रिकार्ड्स में खोजने में वह विफल रहा था।

बस पुलिस का बनाया हुआ एक स्केच का ही जुगाड़ हो पाया था। पर साथ में उसके पास राक्षस का एक विडियो भी था।

विनय चतुर्वेदी का स्केच और अभी के उसके विडियो से वह मिलान करने लगा।

एकाएक उसके दिमाग में बिजली सी कौंधी। वह सर पकड़कर बैठ गया।

उसकी इच्छा हो रही थी की वह अपना बाल नोच ले। इतना बेवकूफ वह कैसे हो सकता था! सच उसके सामने था और वह यहाँ वहां सर मार रहा था।

पर इस विषय में वह अपना मुंह बंद ही रखन चाहता था। और भी न जाने क्या क्या रहस्य खुलने वाले थे उसके सामने।

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ऐसा पहली बार था जब तांत्रिक राक्षस वाले भेष में दिन में बाहर निकला था। लोगों की दृष्टि से बचने के लिए उसने एक बड़ा चादर अवश्य ओढ़ लिया था। उसने सोच लिया था कि शरवन को ख़त्म करने के बाद कुछ दिन के लिए राक्षस वाले भेष को तिलांजलि दे देगा और फिर अगली अमावस्या से पूरी तरह अपने तांत्रिक धर्म का पालन शुरू कर देगा।

शरवन का घर खोजने में उसे मुश्किल नहीं हुई। दिवाकर ने उसे इतना ही बताया था कि वो सेवाराम के घर में रहता है और वह तो अपने मोहल्ले की पहचान बन चुका था। शरवन के बहाने वो सेवाराम का घर भी देख लेना चाहता था।

शरवन के मामले में वो धीरज से काम लेना चाहता था। कल तो गुरुदेव की तस्वीर की हालत देखकर अपने पर निमंत्रण नहीं रख सका था पर आज वो शक करने पर मजबूर हो रहा था कि कोई उसे इस्तेमाल कर रहा है।

सेवाराम के घर में ताला बंद था, इसका मतलब दोनों घर में नहीं थे। ताले को तोड़ वो उसके घर में प्रविष्ट हुआ। पहले कमरे में हमेशा की तरह सामान बिखरे पड़े थे। यहाँ बैठकर वो शरवन का इंतज़ार कर सकता था। अन्दर का कमरा खुला था। जैसे ही वो कमरे में प्रविष्ट हुआ उसे किसी के कूदने कि आवाज आयी। टेबल के नीचे कोने में दुबकी पड़ी उस चीज को देखने में उसने कोई गलती नहीं की।

उस पारखी कापालिक को समझने में देर नहीं लगी कि वो मंदा ही है, अस्तित्व में आने के लिए छटपटाती मंदा!

उसे तो पहले हीं समझ जाना चाहिए था कि मंदा का तेजहीन शरीर सेवाराम के आसपास ही कहीं होगा!

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ताशी...

जो इन दिनों के घटनाक्रम का सबसे रहस्मय किरदार साबित हो रहा था। वो जहर जगह था। जिसने दिल्ली वालों के नको चने चबा दिए थे। सिकंदर के साथ रहस्मय सम्बन्ध थे। और सबसे बढ़कर राक्षस को भागने में मदद की थी।

उस ताशी ने स्वयं को तिब्बत का निवासी बताया था। पासपोर्ट में उसने स्वयं को चीन के किसी तिआनजिन क्षेत्र का निवासी बताया था यानी उसका तिब्बत से कुछ लेना देना नहीं था।

तो क्या वह कोई चीनी क्रिमिनल था? या कोई जासूस? अगर वह इन दोनों में से कोई था तो फिर उसका यहाँ क्या काम?

और फिर ताशी उसका क्षद्म नाम भी हो सकता था।

नरेन्द्र, वो निडर और निर्भीक युवक जिसनें एस पी साहब को भी दिन में तारे दिखा दिए थे। उसके लिए उसे ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी थी। चंद फोटो आइडेंटिफिकेशन एप्लीकेशन में उसके फोटो को उसने स्कैन कर कंप्यूटर में डाला। नतीजा ज़ल्द ही सामने था। अल्फांसे का कोई असली चित्र इन्टरनेट पर उपलब्ध नहीं था पर उसके बहुत सारे स्केच ज़रूर उपलब्ध थे जो उन लोगों ने बनाये थे जिनकी मुठभेड़ अल्फांसे से हो चुकी थी। जैसे जैसे विवरण उसके बारे में इन्टरनेट पर थे उसे पढ़कर उसे कोई शक नहीं रह गया था कि वो अल्फांसे ही था।

कैसे कैसे लोग इकट्ठे रह रहे थे इस आश्रम में!

राधा और कन्हैय्या के बारे में तो जानकारी उसके पास थी ही।

अब वह सोच रहा था कि शुरुआत कहाँ से करे।

अगर वो सच में अल्फांसे था तो क्या वह चीनी मंत्री की यात्रा के लिए खतरा साबित हो सकता था?

पर अल्फांसे पर हाथ डालने से पहले वो ताशी के बारे में जानना चाहता था।

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तांत्रिक ने उसे गर्दन पकड़कर उठाया और वापस टेबल पर खड़ा कर दिया।

“यहाँ छुपी बैठी है तू ?

“महान तांत्रिक विनय चतुर्वेदी से कौन छुप सकता है भला! मंदा का प्रणाम स्वीकार करें।” मंदा ने हाथ जोड़कर डरे हुए स्वर में कहा। “ये देख मैं तो तेरे सामने खड़े होने से भी काँप रही हूँ।” मंदा ने कांपने की एक्टिंग की।

तांत्रिक मुस्कुराया।

“बड़ी मस्तीखोर है तू। ये डरने की एक्टिंग किसी और के सामने दिखाना।”

“तू बड़ा प्यारा है तांत्रिक। एक बार तू मुझे मेरा श्रृंगार वापस कर दे तेरी गुलाम बन रहूंगी।” मंदा उछलकर उसके गले में लटक गयी थी।

“तेरा जादू मुझ पर चलने वाला नहीं।” कापालिक ने मंदा को दूर झटक दिया। वो टेबल पर गिरी।

“पर तू सेवाराम से उसके अहसान के बदले में वादा कर चुका है अमावस की रात को मुझे आजाद करने की। तुझे तो वादा निभाना पड़ेगा। टेबल पर खड़ी मंदा ने दोनों हाथों की अँगुलियों को फंसाकर इठलाते हुए कहा।”

“अमावस अभी दूर है मंदा! और वादा मैंने सेवाराम से किया है। अगर अमावस के पहले उसके दिमाग पर से तेरा साया ख़त्म हो गया तो?”

“नहीं होगा नहीं होगा नहीं होगा। अगर तूने ऐसी कोशिश भी की तो समझ ले।” एकाएक मंदा का स्वर हिंसक हो गया, “दुनिया में तांत्रिकों की कमी नहीं। अगर उसमें से एक को भी मैंने भरमा दिया, सारे शहर में मन्दाओं का राज होगा।”

राक्षस को मंदा की धमकी रास नहीं आयी। पूरी तेजी से उसने मंदा पर हाथ घुमाया।

पर वो कमबख्त इतनी आसानी से कहाँ हाथ आने वाली थी। हवा में लगभग तैरते हुए वो कबकी उसके पीठ पर पहुँच चुकी थी। पीठ पर लटकते हुए उसने अपने नाखूनों का वार उसके चेहरे पर किया। वह चीख उठा। तीक्ष्ण नाखून दोनों गालों में गहरे तक धंस गए थे।

“ये मत समझ कि अगर तूने मेरी शक्ति को दफन कर दिया है तो तू मुझ पर आसानी से काबू कर लेगा। जब हम लोग एक बार जीवित हो जाती है तो इतनी आसानी से कोई काबू में नहीं कर सकता। बिना शक्ति-शरीर के भी मंदा अपनी रक्षा कर सकती है।” फिर अचानक रूककर यूँ बोली मानों कुछ याद आया हो, “अरे हाँ कुछ याद आया। एक बात बताउंगी तो तू ख़ुशी से पागल हो जायेगा। कल तेरे गुरु विक्रांत चतुर्वेदी से मिली थी। बेचारा कैसा पिलपिला गया है। गिड़गिड़ा रहा था कि उसके बारे में तुझे न बताये।”

राक्षस ने विस्मय से उसे देखा। ये उसके गुरु को कैसे जानती थी? क्या सच बोल रही थी ये?

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