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“इस मीटिंग में नरेन्द्र जी को बुलाने के पीछे एक खास मकसद था।” सरस्वती ने बातचीत का सूत्र अपने हाथ में लेते हुए कहा, “ये बहुत सारे जासूसी संस्थाओं के साथ फ्रीलांस काम कर चुके हैं। इस तरह ये हमारे बहुत काम आ सकते हैं। इसलिए हमने इनसे खास अनुरोध किया है कि आश्रम के सुरक्षा पर विशेष ध्यान रखें।”
“मैं खुद भी ऐसा हीं चाहता था।” अल्फान्से ने संक्षिप्त उत्तर दिया। ताशी अन्दर ही अन्दर हंस रहा था। एक ठग के हाथ में ये लोग आश्रम की सुरक्षा सौंप रहे थे।
“पर ऐसा क्यों लग रहा है आप लोगों को कि आश्रम पर खतरा मंडरा रहा है? दयाल यदि यहाँ आकर छुपा था तो इसलिए कि उसे यह जगह बाकी जगहों से ज्यादा महफूज़ लगी होगी। न कि इसलिए कि उसे हम लोगों या आश्रम से कोई दुश्मनी थी। मोहिनी की हत्या उस तांत्रिक ने इसलिए की क्योंकि उसे मोहिनी से व्यक्तिगत दुश्मनी थी। फिर इसमें आश्रम के ऊपर बात कहाँ से आ जाती है?” बर्मन ने प्रश्न दागा।
उत्तर आचार्य जी के तरफ से आया, “इसके लिए हम जिम्मेदार हैं।” उनके होंठो पर क्षीण मुस्कराहट थी।
“विनय चतुर्वेदी का क्रोध इस बात से नहीं भड़का कि उसकी भैरवी भुवन मोहिनी उससे दूर चली गयी थी बल्कि वह इसलिए क्रोधित था कि उसने तांत्रिक मार्ग छोड़कर हमारे मार्ग को स्वीकार कर लिया और हमसे दीक्षा ले ली। एक तांत्रिक के लिए इससे बढ़कर दुखदायी बात और क्या हो सकती है कि किसी ने उसके मार्ग को कमतर आँका। क्रोध में भले ही उसने मोहिनी की हत्या कर दी हो पर इसके लिए वह मुझे ही जिम्मेदार मान रहा होगा।”
“माफ़ करें गुरुदेव।” ताशी ने सर झुकाकर हाथ जोड़ते हुए पुरे विनम्र भाव से पूछा, “तो क्या तंत्र मार्ग क्या हमें केवल पथ विभ्रष्ट ही करता है?”
“ऐसा हीं समझो। तंत्र एक बहिर्मुखी साधना है जिसमें मनुष्य बाहरी चीज़ों का उपयोग करता है अपने विकास के लिए और फिर उन्ही चीज़ों में उलझकर रह जाता है। ऐसा समझो कि तंत्र मार्ग में भटकने की सम्भावना ९९ प्रतिशत है। जबकि भक्ति या ज्ञान के मार्ग में हम अपने मन को साधते हैं और मन को शुन्य कर अपनी आत्मा का परमात्मा से मिलन करते हैं। इसके लिए हम ध्यान का मार्ग अपनाते हैं। ध्यान के लिए हमें किसी स्थान विशेष की आवश्यकता नहीं। कहीं भी बैठकर कर सकते हो। उसके लिए किसी भैरवी या श्मशान की आवश्यकता नहीं।” कहते हुए आचार्य जी मुस्कुराये।
ताशी के शिक्षित मस्तिष्क को आज अच्छी खुराक मिल गई थी। जब वह विनय चतुर्वेदी के साथ था तो उसकी बातें उसे तर्कसंगत लगी थी और अभी उसे ये आचार्य ज्यादा सही लगा था।
‘अगर कभी इस ब्रह्मदेव आचार्य और विनय चतुर्वेदी के बीच शास्त्रास्त्र हो जाए तो मजा आ जाए।” वह सोंच रहा था।
“इसका मतलब है कि वो तांत्रिक हमारे आचार्य जी पर हमला करने का प्लान बना रहा होगा।” महंत ने चिंतित स्वर में कहा।
“हमारे आचार्य जी तक पहुँचने का रास्ता बहुत लम्बा है। वहां तक पहुँचने में उसे सदियाँ बीत जायेगी।” सरस्वती ने मुस्कुराते हुए कहा।
इसके साथ हीं मीटिंग समाप्त हो गयी थी।
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वो एक छोटी सी खोली थी जिसमें अन्दर वाले कमरे में सेवाराम सोता था और बाहर एक बिलकुल छोटी सी जगह थी जिसे ड्राइंग रूम कहलाये जाने का फख्र हासिल था। दो और छोटे से कमरे थे जिसमें से एक का दर्ज़ा किचन और दूसरा बाथरूम था। इसी ‘फ्लैट’ का मालिक सेवाराम था। शरवन ने माफी मांग ली थी और आजकल वह उसके साथ ही था।
शरवन रात में ही लौट आया था। ए एस आई से दोस्ती का उसे फायदा मिला था। वैसे भी उसके खिलाफ ऐसा कोई मामला नहीं बनता था सिवाय इसके कि उसने सेवाराम को रात देर से लौटने पर मजबूर किया था। रात करीब दो बजे तक उसे खोली के दरवाजे पर ही इंतज़ार करना पड़ा क्योंकि चाभी सेवाराम के पास थी और सेवाराम रात दो बजे के आसपास लौटा था। रात में शरवन ने सेवाराम से बात करने कि कोशिश की पर वो सीधे बिस्तर कि तरफ बढ़ गया।
रात भर शरवन को सेवाराम के बडबडाने कि आवाज आती रही।
वो मंदा ही थी!
साजन साजन ............
सेवाराम की नींद खुल गयी। उसे ऐसा लगा कि किसी ने उसे पुकारा हो।
पर उसका नाम तो सेवाराम था। घडी कि तरफ देखा तो अभी दो ही बजे थे। वो पुनः नींद में चला गया।
साजन ए साजन......
उसने साफ़ साफ़ सुना था। किसी लड़की के पुकारने की आवाज।
वो उठ बैठा। बल्ब जलाकर सोने कि आदत थी उसे। कमरे में पीला प्रकाश था जिसमें वो साफ़ साफ़ दिख रही थी जो पलंग के पैताने खुद को सिकोड़ कर बैठी थी। झटके से वो उठ बैठा।
अगर ३-४ दिन पहले की बात होती तो डर से हार्ट फ़ैल होने के आसपास कि नौबत आ जाती। कल रात की घटना बाद घर लौटने के समय से ही वो खुद को अलग इंसान महसूस कर रहा था।
वो मंदा ही थी और एक छोटी सी बच्ची प्रतीत हो रही थी। रात के उलट उसने बहुत साधारण से मटमैले कपडे पहन रखे थे। कल रात जब उसने उसे देखा था तो थोड़ी बड़ी मालूम हो रही थी। शायद कपडे का असर था। ऐसा लग रहा था कि कोई सुहागिन एक रात में विधवा हो गयी हो।
सेवाराम आश्चर्य में था कि उसे डर क्यों नहीं लग रहा था?
“तुम मंदा हो न?” उसे अपनी आवाज अजनबी सी लगी।
“शुक्र है आपने मुझे पहचान लिया।”
“मैंने तुम्हें कल रात देखा था श्मशान में। पर तुम्हें तो उन लोगों ने ज़मीन में दफना दिया था।” सेवाराम को जैसे याद आया।
“हाँ जी। मंदा ऐसे बोली मानों अपने पति या किसी करीबी से बात कर रही हो, उन दुष्टों ने मेरा सर्वनाश कर दिया।”
“तो ये क्या तुम्हारी आत्मा है?”
“अरे नहीं साजन, यूँ समझो कि ये मेरा शरीर है। मेरी आत्मा को उन लोगों ने दफ़न कर दिया।”
“तो क्या मैं तुम्हें छू सकता हूँ?” सेवाराम आश्चर्य से बोला।
“बिलकुल साजन।” कहते हुए मंदा ने अपना हाथ सेवाराम कि तरफ बढ़ा दिया।
मंदा का हाथ बिलकुल ठंड़ा था और बुरी तरह काँप रहा था।
“अरे तुम तो बर्फ कि तरह ठंड़ी हो।” सेवाराम बोला। उसे ध्यान नहीं था कि मुर्दों का शरीर भी ऐसा ही ठंड़ा होता है।
“क्या करूं। उन दुष्टों ने मुझे ऐसी हालत में पहुंचा दिया है। अगर कुछ देर ऐसा ही रहा तो लम्बे समय के लिए मैं सो जाउंगी। अगर तुम मुझे अपने शरीर के साथ चिपका लो तो थोड़ी गर्मी मिलेगी।”
कुछ देर में मंदा का नग्न शरीर सेवाराम के नग्न शरीर से चिपका हुआ था।
“अच्छा तो मैं तुम्हारे घर में रहूँ तो तुम्हें कोई परेशानी नहीं होगी नहीं न?”
सेवाराम हंसा।
“अरे नहीं। इतनी छोटी सी हो, कही भी रह लोगी। पर किसी ने देख लिया तो परेशानी हो जाएगी।”
“कोई परेशानी नहीं होगी मेरे साजन। तुम मेरी इतनी सहायता कर रहे हो और मैं तुम्हें परेशान होने दूँगी? हमेशा छोटी सी गुड़िया के रूप में रहूंगी। बस तुम्हारे सामने ही असली रूप में आउंगी।”
“अच्छा ये बताओ कि तुम मुझे साजन क्यों कहती हो?”
मंदा शरमाई, “क्या कहूं। तुम्हें देखकर यही नाम ख्याल में आता है।”
“अच्छा तो तुम फिर से असली मंदा कैसे बनोगी?”
“वो तो कोई तांत्रिक ही कर सकता है।”
“वही राक्षस?”
“वो भी कर सकता है। पर वो बहुत खतरनाक है। उससे मुझे डर लगता है।”
“कोई बात नहीं। मुझे उससे डर नहीं लगता। मुझे किसी से डर नहीं लगता जब तक तुम मेरे साथ हो।”
पता नहीं क्यों सेवाराम के मन में उसके नग्न शरीर के साथ रहते हुए भी कोई गन्दी भावना नहीं आ रही थी। उसे बस ऐसा लग रहा था कि वो मंदा कि सहायता कर रहा था। दोनों एक दूसरे से बातें किये जा रहे थे। सेवाराम को कब नींद आ गयी उसे पता नहीं चला।
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“मैं खुद भी ऐसा हीं चाहता था।” अल्फान्से ने संक्षिप्त उत्तर दिया। ताशी अन्दर ही अन्दर हंस रहा था। एक ठग के हाथ में ये लोग आश्रम की सुरक्षा सौंप रहे थे।
“पर ऐसा क्यों लग रहा है आप लोगों को कि आश्रम पर खतरा मंडरा रहा है? दयाल यदि यहाँ आकर छुपा था तो इसलिए कि उसे यह जगह बाकी जगहों से ज्यादा महफूज़ लगी होगी। न कि इसलिए कि उसे हम लोगों या आश्रम से कोई दुश्मनी थी। मोहिनी की हत्या उस तांत्रिक ने इसलिए की क्योंकि उसे मोहिनी से व्यक्तिगत दुश्मनी थी। फिर इसमें आश्रम के ऊपर बात कहाँ से आ जाती है?” बर्मन ने प्रश्न दागा।
उत्तर आचार्य जी के तरफ से आया, “इसके लिए हम जिम्मेदार हैं।” उनके होंठो पर क्षीण मुस्कराहट थी।
“विनय चतुर्वेदी का क्रोध इस बात से नहीं भड़का कि उसकी भैरवी भुवन मोहिनी उससे दूर चली गयी थी बल्कि वह इसलिए क्रोधित था कि उसने तांत्रिक मार्ग छोड़कर हमारे मार्ग को स्वीकार कर लिया और हमसे दीक्षा ले ली। एक तांत्रिक के लिए इससे बढ़कर दुखदायी बात और क्या हो सकती है कि किसी ने उसके मार्ग को कमतर आँका। क्रोध में भले ही उसने मोहिनी की हत्या कर दी हो पर इसके लिए वह मुझे ही जिम्मेदार मान रहा होगा।”
“माफ़ करें गुरुदेव।” ताशी ने सर झुकाकर हाथ जोड़ते हुए पुरे विनम्र भाव से पूछा, “तो क्या तंत्र मार्ग क्या हमें केवल पथ विभ्रष्ट ही करता है?”
“ऐसा हीं समझो। तंत्र एक बहिर्मुखी साधना है जिसमें मनुष्य बाहरी चीज़ों का उपयोग करता है अपने विकास के लिए और फिर उन्ही चीज़ों में उलझकर रह जाता है। ऐसा समझो कि तंत्र मार्ग में भटकने की सम्भावना ९९ प्रतिशत है। जबकि भक्ति या ज्ञान के मार्ग में हम अपने मन को साधते हैं और मन को शुन्य कर अपनी आत्मा का परमात्मा से मिलन करते हैं। इसके लिए हम ध्यान का मार्ग अपनाते हैं। ध्यान के लिए हमें किसी स्थान विशेष की आवश्यकता नहीं। कहीं भी बैठकर कर सकते हो। उसके लिए किसी भैरवी या श्मशान की आवश्यकता नहीं।” कहते हुए आचार्य जी मुस्कुराये।
ताशी के शिक्षित मस्तिष्क को आज अच्छी खुराक मिल गई थी। जब वह विनय चतुर्वेदी के साथ था तो उसकी बातें उसे तर्कसंगत लगी थी और अभी उसे ये आचार्य ज्यादा सही लगा था।
‘अगर कभी इस ब्रह्मदेव आचार्य और विनय चतुर्वेदी के बीच शास्त्रास्त्र हो जाए तो मजा आ जाए।” वह सोंच रहा था।
“इसका मतलब है कि वो तांत्रिक हमारे आचार्य जी पर हमला करने का प्लान बना रहा होगा।” महंत ने चिंतित स्वर में कहा।
“हमारे आचार्य जी तक पहुँचने का रास्ता बहुत लम्बा है। वहां तक पहुँचने में उसे सदियाँ बीत जायेगी।” सरस्वती ने मुस्कुराते हुए कहा।
इसके साथ हीं मीटिंग समाप्त हो गयी थी।
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वो एक छोटी सी खोली थी जिसमें अन्दर वाले कमरे में सेवाराम सोता था और बाहर एक बिलकुल छोटी सी जगह थी जिसे ड्राइंग रूम कहलाये जाने का फख्र हासिल था। दो और छोटे से कमरे थे जिसमें से एक का दर्ज़ा किचन और दूसरा बाथरूम था। इसी ‘फ्लैट’ का मालिक सेवाराम था। शरवन ने माफी मांग ली थी और आजकल वह उसके साथ ही था।
शरवन रात में ही लौट आया था। ए एस आई से दोस्ती का उसे फायदा मिला था। वैसे भी उसके खिलाफ ऐसा कोई मामला नहीं बनता था सिवाय इसके कि उसने सेवाराम को रात देर से लौटने पर मजबूर किया था। रात करीब दो बजे तक उसे खोली के दरवाजे पर ही इंतज़ार करना पड़ा क्योंकि चाभी सेवाराम के पास थी और सेवाराम रात दो बजे के आसपास लौटा था। रात में शरवन ने सेवाराम से बात करने कि कोशिश की पर वो सीधे बिस्तर कि तरफ बढ़ गया।
रात भर शरवन को सेवाराम के बडबडाने कि आवाज आती रही।
वो मंदा ही थी!
साजन साजन ............
सेवाराम की नींद खुल गयी। उसे ऐसा लगा कि किसी ने उसे पुकारा हो।
पर उसका नाम तो सेवाराम था। घडी कि तरफ देखा तो अभी दो ही बजे थे। वो पुनः नींद में चला गया।
साजन ए साजन......
उसने साफ़ साफ़ सुना था। किसी लड़की के पुकारने की आवाज।
वो उठ बैठा। बल्ब जलाकर सोने कि आदत थी उसे। कमरे में पीला प्रकाश था जिसमें वो साफ़ साफ़ दिख रही थी जो पलंग के पैताने खुद को सिकोड़ कर बैठी थी। झटके से वो उठ बैठा।
अगर ३-४ दिन पहले की बात होती तो डर से हार्ट फ़ैल होने के आसपास कि नौबत आ जाती। कल रात की घटना बाद घर लौटने के समय से ही वो खुद को अलग इंसान महसूस कर रहा था।
वो मंदा ही थी और एक छोटी सी बच्ची प्रतीत हो रही थी। रात के उलट उसने बहुत साधारण से मटमैले कपडे पहन रखे थे। कल रात जब उसने उसे देखा था तो थोड़ी बड़ी मालूम हो रही थी। शायद कपडे का असर था। ऐसा लग रहा था कि कोई सुहागिन एक रात में विधवा हो गयी हो।
सेवाराम आश्चर्य में था कि उसे डर क्यों नहीं लग रहा था?
“तुम मंदा हो न?” उसे अपनी आवाज अजनबी सी लगी।
“शुक्र है आपने मुझे पहचान लिया।”
“मैंने तुम्हें कल रात देखा था श्मशान में। पर तुम्हें तो उन लोगों ने ज़मीन में दफना दिया था।” सेवाराम को जैसे याद आया।
“हाँ जी। मंदा ऐसे बोली मानों अपने पति या किसी करीबी से बात कर रही हो, उन दुष्टों ने मेरा सर्वनाश कर दिया।”
“तो ये क्या तुम्हारी आत्मा है?”
“अरे नहीं साजन, यूँ समझो कि ये मेरा शरीर है। मेरी आत्मा को उन लोगों ने दफ़न कर दिया।”
“तो क्या मैं तुम्हें छू सकता हूँ?” सेवाराम आश्चर्य से बोला।
“बिलकुल साजन।” कहते हुए मंदा ने अपना हाथ सेवाराम कि तरफ बढ़ा दिया।
मंदा का हाथ बिलकुल ठंड़ा था और बुरी तरह काँप रहा था।
“अरे तुम तो बर्फ कि तरह ठंड़ी हो।” सेवाराम बोला। उसे ध्यान नहीं था कि मुर्दों का शरीर भी ऐसा ही ठंड़ा होता है।
“क्या करूं। उन दुष्टों ने मुझे ऐसी हालत में पहुंचा दिया है। अगर कुछ देर ऐसा ही रहा तो लम्बे समय के लिए मैं सो जाउंगी। अगर तुम मुझे अपने शरीर के साथ चिपका लो तो थोड़ी गर्मी मिलेगी।”
कुछ देर में मंदा का नग्न शरीर सेवाराम के नग्न शरीर से चिपका हुआ था।
“अच्छा तो मैं तुम्हारे घर में रहूँ तो तुम्हें कोई परेशानी नहीं होगी नहीं न?”
सेवाराम हंसा।
“अरे नहीं। इतनी छोटी सी हो, कही भी रह लोगी। पर किसी ने देख लिया तो परेशानी हो जाएगी।”
“कोई परेशानी नहीं होगी मेरे साजन। तुम मेरी इतनी सहायता कर रहे हो और मैं तुम्हें परेशान होने दूँगी? हमेशा छोटी सी गुड़िया के रूप में रहूंगी। बस तुम्हारे सामने ही असली रूप में आउंगी।”
“अच्छा ये बताओ कि तुम मुझे साजन क्यों कहती हो?”
मंदा शरमाई, “क्या कहूं। तुम्हें देखकर यही नाम ख्याल में आता है।”
“अच्छा तो तुम फिर से असली मंदा कैसे बनोगी?”
“वो तो कोई तांत्रिक ही कर सकता है।”
“वही राक्षस?”
“वो भी कर सकता है। पर वो बहुत खतरनाक है। उससे मुझे डर लगता है।”
“कोई बात नहीं। मुझे उससे डर नहीं लगता। मुझे किसी से डर नहीं लगता जब तक तुम मेरे साथ हो।”
पता नहीं क्यों सेवाराम के मन में उसके नग्न शरीर के साथ रहते हुए भी कोई गन्दी भावना नहीं आ रही थी। उसे बस ऐसा लग रहा था कि वो मंदा कि सहायता कर रहा था। दोनों एक दूसरे से बातें किये जा रहे थे। सेवाराम को कब नींद आ गयी उसे पता नहीं चला।
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