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अलिफ लैला की रहस्यमई कहानियाँ

कमरुज्जमाँ ने कौतूहलवश मृत पक्षी के पास जा कर देखा तो उसे उसकी आँतों में कुछ चमकदार-सी चीज दिखाई दी। उसने वह चीज निकाल कर पानी से धो कर देखी तो वह वही यंत्रवाली मणि निकली जो उसके हाथ से निकल गई थी। उसे विश्वास हो गया कि अब उसका पत्नी से मिलन अवश्य हो जाएगा। दूसरे दिन माली ने उससे कहा कि फलाँ पेड़ सूख गया हे, उसे जड़ से खोद डालो। शहजादा कुल्हाड़ी ले कर उसे खोदने लगा। इसी काम में उसकी कुल्हाड़ी एक शिला से टकराई। उसने शिला हटा कर देखा तो एक सुंदर आवास पाया। उसमें ताँबे के पचास पात्र रखे थे जो स्वर्ण के चूरे से भरे थे। कमरुज्जमाँ ने माली से जा कर कहा तो वह बोला, वह धन तुम्हारे भाग्य का है, तुम्हीं ले लो। तीन दिन बाद तुम्हारा अवौनीवाला जहाज छूटेगा। तुम इस स्वर्ण चूर्ण को भी ले जाओ किंतु पात्रों को थोड़ा-थोड़ा खाली कर के जैतून का तेल भर देना जिससे यह सुरक्षित रहे। जैतून का तेल मेरे पास बहुत है। अब कमरुज्जमाँ ने उससे कहा, वैसे तो यह धन तुम्हारा ही है किंतु तुम अगर पूरा नहीं लेते तो आधा ही ले लो। माली ने यह बात स्वीकार कर ली।

कमरुज्जमाँ ने प्रत्येक पात्र का आधा स्वर्ण चूर्ण निकाल लिया और उसे माली के घर के एक कोने में ढेर बना कर रख दिया। उसने सोचा ऐसा न हो कि यह यंत्र फिर हाथ से जाता रहे अतएव एक पात्र को पूरा खाली कर के उसकी तह में यंत्र रख दिया और ऊपर से स्वर्ण चूर्ण बिछा दिया और उस बरतन पर निशान लगा दिया कि मणि निकालने में सुविधा रहे। यह प्रबंध कर के वह निश्चिंत हुआ ही था कि माली की दशा खराब हो गई। सवेरे उस जहाज का कप्तान आया और पूछने लगा कि हमारे जहाज पर यहाँ से कौन जानेवाला है। कमरुज्जमाँ ने कहा कि मैं ही जानेवाला हूँ, आप मेरी पचास हाँडियाँ जैतून के तेल की (जिसके नीचे स्वर्ण चूर्ण भरा था) जहाज पर पहुँचवा दीजिए। जहाज के मल्लाह वे हाँडियाँ ले गए। कमरुज्जमाँ ने कहा कि मैं भी दो दिन बाद आऊँगा। कप्तान ने जाने से पहले कहा कि जल्दी आना क्योंकि वायु अनुकूल होते ही हम चल देंगे।

कमरुज्जमाँ उतनी जल्दी न जा सका क्योंकि माली का रोग बढ़ता गया और दूसरे दिन वह मर गया। कमरुज्जमाँ उसकी लाश को वैसे छोड़ कर नहीं जा सकता था। उसने वहाँ के नागरिकों को इकट्ठा किया और उसे नहला-धुला कर उसका अंतिम संस्कार करवाने में कमरुज्जमाँ को कुछ अधिक समय लग गया। इससे निश्चिंत हो कर उसने बाग को ताला लगा कर उसकी चाबी अपनी जेब में रखी और फिर समुद्र तट पर देखने गया कि जहाज है या चला गया। जहाज वास्तव में उसके स्वर्ण चूर्ण से भरे पात्र ले कर जा चुका था। कमरुज्जमाँ को बहुत खेद हुआ किंतु हो ही क्या सकता था। उसने कुछ और हाँडियाँ खरीदीं और माली के हिस्से का स्वर्ण चूर्ण उनमें भर कर उनमें ऊपर से जैतून का तेल रख दिया। इन्हें सुरक्षित स्थान में रख कर उसने बाग के मालिक को चाबी देने के बजाय खुद बाग में रहने लगा और माली की जगह स्वयं उसकी देखभाल करने लगा क्योंकि अब तो उसे एक साल और काटना ही था।

उधर वह जहाज अनुकूल वायु पा कर शीघ्र ही अवौनी देश में पहुँचा। बदौरा हर नए जहाज को देखती थी कि शायद उसका पति उसमें आया हो। इस जहाज को भी देखने पहुँची। उसने बहाना बनाया कि मुझे जहाज से कुछ व्यापार की वस्तुएँ खरीदनी हैं। उसने जा कर जहाज के कप्तान से पूछा कि तुम कहाँ से आ रहे हो और जहाज में क्या- क्या माल है। कप्तान ने कहा कि जहाज पर हमेशा यात्रा करनेवाले व्यापारी ही हैं और माल भी वही है जिसे यह जहाज साधारण तौर पर लाता है। अर्थात सादा और छपाईदार कपड़ा, जवाहिरात, सुगंधियाँ, कपूर, केसर, जैतून आदि। बदौरा को जैतून बहुत पसंद था। उसने कहा कि मुझे तुम्हारा सारा जैतून और उसका तेल चाहिए और उसका मुँह माँगा दाम दे दिया जाएगा, सारा जैतून अभी उतरवाओ।

कप्तान ने सारा जैतून उतरवाया। और माल के दाम तो व्यापारियों को वहीं दे दिए किंतु कप्तान ने कहा कि एक व्यापारी पीछे छूट गया है, उसकी जैतून के तेल से भरी पचास हाँडियाँ भी मेरे पास हैं। बदौरा ने कहा, मुझे वह भी खरीदना है, तुम इसका दाम अगली बार जाने पर उस व्यापारी को दे देना। उसने उस माल का दाम भी पूछा। कप्तान ने कहा कि वह बहुत छोटा व्यापारी था, आप इस माल के साढ़े चार हजार रुपए दे दें। बदौरा ने कहा, नहीं, जैतून के तेल के भाव ऊँचे हैं। तुम्हें इसके लिए नौ हजार रुपए मिलेंगे जो तुम इसके मालिक को अपना किराया काट कर दे देना। किसी निर्धन व्यापारी की अनुपस्थिति का अनुचित लाभ उठाना ठीक नहीं है।

बदौरा के सुपुर्द वे हाँडियाँ कर के जहाज के कप्तान ने अन्य व्यापारियों का माल उतरवाया। बदौरा हाँडियों को महल में ले गई और उन्हें खोल कर देखने लगी। उसे यह देख कर बड़ा आश्चर्य हुआ कि आधी-आधी हाँडियाँ स्वर्ण-चूर्ण से भरी थीं। एक हाँडी की तह में उसे वही यंत्र मिला जिसके साथ उसका पति गायब हो गया था। वह उसे देख कर अचेत हो गई। दासियों ने बेदमुश्क का अरक और अन्य दवाएँ छिड़क कर उसे प्रकृतस्थ किया। होश में आने पर वह बहुत देर तक उस यंत्र को चूमती और आँखों से लगाती रही। उसने दासियों के सामने तो कुछ न कहा किंतु अपनी सहेली यानी अवौनी की शहजादी को एकांत में जैतून के तेल की हाँडियों, स्वर्ण चूर्ण और मणि पर अंकित यंत्र का हाल बताया और कहा कि अब मुझे आशा हो गई है कि जिस प्रकार मेरे हाथ यह यंत्र वापस आया है उसी प्रकार मेरा पति भी वापस आएगा।

दूसरे दिन बदौरा फिर समुद्र तट पर गई और उसने उस जहाज के कप्तान को बुला भेजा और उसे उस व्यापारी का विस्तृत हाल पूछा जिसकी जैतून के तेल की हाँडियाँ थीं। कप्तान ने उसे बताया वह है तो मुसलमान किंतु प्रस्तर पूजकों के देश में रहता है। वह एक बूढ़े माली के साथ रहता है और उसी के साथ बाग में काम करता है। मैंने स्वयं बाग में उससे भेंट की थी। उसने कहा था कि मेरा माल जहाज पर ले चलो और कुछ समय के पीछे मैं भी आता हूँ। मैंने दो-तीन दिन तक उसकी प्रतीक्षा की किंतु न मालूम क्या कारण हो गया कि वह नहीं आया। मैंने मजबूरी में जहाज का लंगर उठा दिया क्योंकि बाद में अनुकूल वायु न रहती।

अब बदौरा ने अपने युवराज और मंत्री होने के अधिकार का प्रयोग किया। उसने सारे व्यापारियों और कप्तान का माल जहाज से उतरवा कर जब्त कर लिया और कप्तान से बोली, तुम्हें नहीं मालूम कि उस आदमी को न ला कर तुमने कितना बड़ा अपराध किया है। मुझे खजांची से मालूम हुआ कि वह आदमी हमारा लाखों का देनदार है और भगा हुआ है। तुम तुरंत ही जहाज को वापस ले जाओ और उस व्यक्ति को ले कर मेरे सुपुर्द करो। जब तक तुम यह न करोगे तुम्हारा और अन्य व्यापारियों का माल नहीं छोड़ा जाएगा। यह भी समझ लो कि अगर तुम उसे यहाँ न लाए तो तुम्हें कठोर दंड दिया जाएगा। अब देर न करो, तुरंत प्रस्तर पूजकों के देश की ओर रवाना हो जाओ क्योंकि उधर जाने के लिए वायु अनुकूल है।

कप्तान बेचारा जहाज ले कर तुरंत ही प्रस्तर पूजकों के देश की ओर चल दिया। कुछ ही दिनों में वह वहाँ पहुँच गया। उसने जहाज का लंगर डाला और एक नाव पर कुछ खलासियों को ले कर बैठा तो तट पर उतरा। बाग बस्ती के किनारे था। वहाँ जा कर उसने आवाज दी कि दरवाजा खोलो। कमरुज्जमाँ कई रातों से बदौरा की याद और माली की मृत्यु से दुखी हो कर ठीक से सोया नहीं था। वह इस समय सो रहा था। लगातार आवाजों और दरवाजा भड़भड़ाए जाने से वह उठा और द्वार खोल कर उसने पूछा कि क्या बात है, तुम लोग क्यों शोर कर रहे हो। कप्तान और उसके साथ के खलासियों ने इसकी बात का कोई उत्तर न दिया। वे एक साथ उस पर टूट पड़े और उसके लाख चीख-पुकार करने पर भी वे लोग उसे अपने जहाज पर ले गए और यह काम पूरा होते ही उन्होंने जहाज का लंगर उठा दिया।

जब जहाज चल पड़ा तो कमरुज्जमाँ से पूछा कि अब तो मुझे बताओ कि मेरा कसूर क्या है, तुमने मुझे पकड़ कर क्यों जहाज पर चढ़ाया है और अब मुझे कहाँ लिए जा रहे हो। कप्तान ने कहा कि तुम पर अवौनी के बादशाह का लाखों का कर्ज है और हमें आदेश है कि तुम्हें पकड़ कर शीघ्रातिशीघ्र अवौनी के बादशाह के सामने पेश करें। कमरुज्जमाँ ने कहा, भाई, जरूर उसे कोई भ्रम हुआ है। मैंने कभी उस बादशाह की सूरत भी नहीं देखी है। यह कैसे संभव है कि मैंने उसका लाखों का ॠण लिया हो? कप्तान ने कहा, हम तो उस बादशाह के आदेश का पालन मात्र कर रहे हैं। हम तुम्हारे साथ होनेवाले न्याय-अन्याय का फैसला नहीं कर सकते। किंतु मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूँ कि वह बादशाह बहुत ही न्यायप्रिय है और यदि उसने वास्तव में भ्रमवश ही तुम्हें गिरफ्तार करने का आदेश दिया है और तुम वास्तव में निरपराध हो तो विश्वास रखो कि तुम्हारे साथ पूरा न्याय किया जाएगा और तुम्हें कोई दुख नहीं पहुँचेगा। कम से कम यात्रा के दौरान तुम्हारी सुख-सुविधा का पूरा ध्यान रखा जाएगा क्योंकि इसके लिए मुझे आदेश मिला है।

जहाज कुछ ही दिनों में अवौनी द्वीप में पहुँच गया। कप्तान ने तट पर पहुँचते ही युवराज बनी हुई बदौरा को समाचार भिजवाया कि आपका देनदार कैदी आ गया है। कुछ देर में वह खलासियों के बीच घिरे हुए कमरुज्जमाँ को ले कर युवराज के पास पहुँचा। बदौरा उसे मैले-कुचैले और फटे-पुराने कपड़ों में देख कर दुखी हुई। उसका जी चाहा कि दौड़ कर पति से लिपट जाए किंतु यह सोच कर रुक गई कि सब लोगों के सामने रहस्योद्घाटन ठीक न होगा।

उसने कमरुज्जमाँ को एक सरदार को सौंपा और कहा कि इसे नहला-धुला कर ठीक तरह के कपड़े पहनाओ और कल सुबह मेरे पास लाओ। दूसरे दिन जब कमरुज्जमाँ को उसके पास भेजा गया तो बदौरा ने कप्तान और व्यापारियों का सारा माल वापस कर दिया और साथ ही कप्तान को खिलअत (सम्मान वस्त्र) और ढाई हजार रुपए का पारितोषिक भी दिया। उसने कमरुज्जमाँ को भी एक उच्च राजपद दिया और हमेशा उसे अपने साथ रखने लगी। कमरुज्जमाँ बिल्कुल न पहचान सका कि यही उसकी पत्नी हैं और उसे अपने कृपालु स्वामी की तरह मानता रहा।

एक रात को बदौरा ने उसे यंत्रयुक्त मणि दिखा कर कहा, तुम तो बहुत-सी विद्याएँ जानते हो, इसे देख कर बताओ कि यह क्या चीज है और इसे अपने पास रखने का फल श्रेष्ठ होगा या नेष्ट। कमरुज्जमाँ को वह यंत्र देख कर बड़ा आश्चर्य हुआ कि वह इस जगह कैसे आ गया। उसने कहा, मेरे मालिक, यह चीज बहुत ही अशुभ है। यह पहले मेरे हाथ आई और इसके कारण मुझ पर बड़ी-बड़ी मुसीबतें आईं और इसने लगभग अधमुआ कर दिया। इसी के कारण मेरी पत्नी मुझसे छूट गई जिसके वियोग में मैं रात-दिन तड़पता रहता हूँ। अगर मैं आप को पूरी कहानी सुनाऊँ तो आप को भी मुझ पर दया आएगी।

बदौरा ने कहा, तुम्हारी कहानी को विस्तारपूर्वक बाद में सुना जाएगा। अभी तुम कुछ देर यहीं पर मेरी प्रतीक्षा करो। मुझे कुछ देर के लिए विशेष काम है। यह कह कर वह अंदरवाले कमरे में चली गई। वहाँ जा कर उसने रानियों जैसे वस्त्र पहने और कमर में वही पटका बाँधा जिस में से खोल कर कमरुज्जमाँ उसका बटुआ ले गया था और फिर से बटुए में से यंत्रखचित मणि को निकाल कर देखने लगा था जिसके बाद पक्षी उसे ले भाग था।

कमरुज्जमाँ ने इस वेश में अपनी पत्नी को पहचान लिया और दौड़ कर उसे अपनी बाँहों में भर लिया। वह कहने लगा, यहाँ के युवराज की सेवा मुझे कितनी फली कि इतने समय बाद मैं अपनी प्राणप्रिया से मिल सका हूँ। बदौरा हँस कर कहने लगी, युवराज को भूल जाओ। वह तुम्हें अब दिखाई न देगा क्योंकि मैं ही युवराज बनी हुई थी। यह कहने के बाद उसने कमरुज्जमाँ से बिछुड़ने के दिन से लेर उस दिन तक का पूरा हाल कहा। कमरुज्जमाँ ने भी विस्तार से बताया कि उस दिन से ले कर यहाँ आने तक मुझ पर क्या बीती। इसके बाद वे दोनों पलंग पर जा कर आराम से एक-दूसरे की बाँहों में निद्रामग्न हो गए। सुबह बदौरा ने नहा-धो कर जनानी पोशाक पहनी और अवौनी के बादशाह को अपने महल में बुला भेजा।

बादशाह को अपने दामाद के बजाय एक सुंदरी को देख कर बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने कहा, बेटी, तुम कौन हो? और मेरा दामाद कहाँ गया है? बदौरा मुस्करा कर बोली, पृथ्वीनाथ, मैं कल तक आपका दामाद और इस राज्य का युवराज थी। आज मैं चीन के बादशाह की बेटी और खलदान देश के राजकुमार की पत्नी हूँ। आप कृपया धैर्यपूर्वक मेरा वृत्तांत सुनें जो बड़ा ही विचित्र है। फिर उसने अपनी कहानी आद्योपांत कही और अंत में कहा, हम सब मुसलमान हैं। हमारे धर्म में कोई भी पुरुष दूसरा विवाह करता है तो उसकी पहली पत्नी के मन में ईर्ष्या जागती है। मैं शहजादे की पहली पत्नी हूँ। मैं स्वयं आप से प्रार्थना कर रही हूँ कि अपनी बेटी को मेरे पति से ब्याह दें। उसका मेरे साथ जो विवाह हुआ था वह झूठा था।

बादशाह को यह सुन कर आश्चर्य हुआ। उसने कमरुज्जमाँ को देखने की इच्छा की। बदौरा ने उसे ला कर उपस्थित किया। बादशाह उसे देख कर खुश हुआ और बोला, बेटे, अभी तक हम इसे अपना दामाद मानते थे। हमें नहीं मालूम था कि यह तुम्हारी पत्नी और चीन देश की राजकुमारी है। अब मैं तुम्हें दामाद बनाना चाहता हूँ। तुम्हारी पत्नी की भी यही इच्छा है। तुम्हें आपत्ति न हो तो मैं अपनी बेटी ह्यातुन्नफ्स का विवाह तुम्हारे साथ कर दूँ। तुम उससे शादी कर के इस राज्य का शासन सँभालो।

कमरुज्जमाँ ने कहा, चाहता तो मैं यह था कि अपने देश को जाऊँ किंतु आपकी और बदौरा की जो इच्छा होगी उसे मैं अवश्य पूरा करूँगा। अतएव उसका विवाह धूमधाम के साथ अबौनी की शहजादी के साथ हो गया और दोनों स्त्रियाँ आपस में मिलजुल कर प्रेमपूर्वक रहने लगीं। कमरुज्जमाँ बारी-बारी से दोनों के पास जाता और विहार करता और किसी पत्नी को दूसरी पत्नी के विरुद्ध शिकायत का मौका नहीं देता था।

भगवान की दया से एक ही वर्ष में उन दोनों को एक-एक पुत्र की प्राप्ति हुई। कमरुज्जमाँ ने उनके जन्मोत्सव पर लाखों रुपया खर्च किया। बदौरा के पुत्र का नाम रखा गया अमजद और अबौनी की शहजादी के बेटे का नाम असद हुआ। दोनों भाई बड़े हुए तो उन्हें कई योग्य शिक्षकों से प्रत्येक विषय की शिक्षा दिलवाई गई। बचपन में तो वे एक साथ खेले-कूदे ही थे, बड़े होने पर भी उनकी परस्पर प्रीति और बढ़ी। उन्होंने इच्छा प्रकट की कि हमें अपनी माताओं के पृथक-पृथक महलों में न रखा जाए बल्कि एक अलग महल में दोनों को एक साथ रखा जाए। कमरुज्जमाँ ने यह बात मान ली।

जब वे उन्नीस वर्ष के हुए और राज्य प्रबंध सँभालने योग्य हुए तो कमरुज्जमाँ ने तय किया कि जब वह खुद शिकार के लिए जाया करें तो बारी-बारी से दोनों शहजादों के सुपुर्द राज्य प्रबंध कर जाया करे। एक खास बात यह थी कि दोनों रानियाँ अपने सगे बेटों से सौतेले बेटों को अधिक चाहती थीं यानी बदौरा को असद अधिक प्रिय था और ह्यातुन्नफ्स को अमजद। वे दोनों भी अपनी माताओं से अधिक विमाताओं को मानते थे। किंतु यही बात आगे जा कर स्त्रियों के वैमनस्य का कारण बन गई। दोनों यह चाहने लगीं कि अपने पुत्रों का मन उनकी विमाताओं यानी अपनी सौतों की ओर से फेर दें। एक दिन बदौरा का पुत्र अमदज राजसभा से उठ कर अपने महल को जा रहा था कि एक गुलाम ने उसे एक पत्र दिया जो उसकी विमाता ने लिखा था। यह पत्र पढ़ कर उसे ऐसा क्रोध चढ़ा कि उसने तलवार निकाल कर गुलाम के दो टुकड़े कर दिए। उसने पत्र अपनी माँ बदौरा को दिखाया। वह भी उसे पढ़ कर बहुत बिगड़ी और कहने लगी कि ह्यातुन्नफ्स ने मेरे बारे में जो लिखा है बिल्कुल बकवास है, और तुम भी अब मेरे सामने न आओ।

अमजद ने अपने महल में जा कर सारा हाल अपने भाई असद से कहा। उसे भी यह सुन कर बड़ा गुस्सा आया। दूसरे दिन असद राजसभा से महल को जा रहा था कि एक बुढ़िया को मार डाला और अपनी माँ के महल में जा कर उसे बदौरा के पत्र की बात बताई। वह यह सुन कर बहुत बिगड़ी और बोली, बदौरा ने तो बकवास की ही है, तेरा भी दिमाग फिर गया है। बेचारी बुढ़िया को बेकसूर ही मार डाला। अब तू मेरे सामने मत आना।

वास्तव में इन स्त्रियों ही ने एक-दूसरे के नाम से पत्र लिख कर अपने बारे में निराधार आरोप लगाए थे ताकि विमाताओं की ओर से पुत्रों का मन फिर जाए किंतु जब ऐसा न हुआ तो दोनों को भय हुआ कि बेटों ने अगर बादशाह कमरुज्जमाँ के शिकार से लौटने पर यह बात कह दी तो स्वयं उन दोनों यानी बदौरा और ह्यातुन्नफ्स की जान खतरे में पड़ जाएगी। अब दोनों ने मिल कर सलाह की कि इन नालायक बेटों को किस तरह ठिकाने लगाया जाए कि स्वयं उनके प्राण बचें।

कमरुज्जमाँ के शिकार से लौटने पर दोनों ने एक साथ ही बड़ी रोनी सूरत बना कर भेंट की। उसके पूछने पर दोनों ने बताया कि तुम्हारे दोनों बेटों ने हम दोनों पर निराधार आरोप लगाए हैं जिससे लज्जावश हमारा डूब मरने को जी करता है। कमरुज्जमाँ भी क्रोध में अंधा हो गया और उसने कहा कि ऐसे नालायकों को जो अपनी माँओं ही को लांछित करें जीने का कोई अधिकार नहीं है। उसने अपने एक विश्वस्त सरदार जिंदर से कहा कि तुम इन दोनों को रात ही रात किसी जंगल में जा कर मार डालो, और कल सुबह मुझे कोई चिह्न दिखाओ जिससे यह सिद्ध हो जाय कि यह दोनों मार डाले गए हैं।

जिंदर शाम को कोई बहाना बना कर दोनों को जंगल में ले गया और वहाँ उन्हें बताया कि बादशाह का आदेश है कि आप दोनों का मैं वध करूँ। दोनों ने कहा कि अगर उनकी यह इच्छा है तो तुम जरूर हमें मारो। लेकिन दोनों ही कहने लगे कि मुझे पहले मारो। जिंदर ने यह समस्या इस तरह हल की कि दोनों को एक चादर में बाँध दिया ताकि एक ही वार से दोनों खत्म हो जाएँ। फिर उसने तलवार निकाली।

तलवार की चमक देख कर जिंदर का घोड़ा बिदक कर भागा। जिंदर ने सोचा कि यह तो बँधे ही हैं, कहा जाएँगे, पहले अपना घोड़ा पकड़ लाऊँ। वह घोड़े के पीछे दौड़ा। इसी भाग-दौड़ और चीख-पुकार में एक झाड़ी में सोता हुआ एक शेर जाग कर बाहर निकल आया और जिंदर के पीछे पड़ गया। उधर जब जिंदर को लौटने में देर हुई तो उन दोनों ने कहा कि न जाने उस पर क्या मुसीबत पड़ी है, हमें जा कर उसकी मदद करनी चाहिए। ऐसे कब तक बँधे रहेंगे। यह सोच कर दोनों ने जोर लगा कर चादर खोली और अमजद ने जिंदर की तलवार उठाई और दोनों उधर दौड़े जिधर जिंदर और उसका घोड़ा गया था। कुछ दूर जा कर देखा कि एक शेर जिंदर पर सवार है और मारना ही चाहता है। अमजद ने शेर को ललकारा और वह अमजद पर झपटा। अमजद ने एक ही वार में शेर के दो टुकड़े कर दिए। उधर असद दौड़ कर गया और जिंदर का घोड़ा ले आया।
 
जिंदर को उठा कर और उसके कपड़ों की धूल झाड़ कर दोनों शहजादों ने उससे कहा कि अब तुम पिताजी के आदेश का पालन करो। जिंदर ने दोनों की ओर देखा, शेर की लाश को देखा और दोनों के पैरों पर गिर पड़ा और बोला, मेरे मालिको, आपने मेरे प्राण बचाए और मैं आपके प्राण लूँ? यह तो हरगिज नहीं हो सकता। किंतु आप लोग एक दया करें कि अपना एक ऊपरी वस्त्र दें जिसे इस शेर के लहू में डुबो कर मैं बादशाह को आपके मरने का प्रमाण दूँ। अगर ऐसा नहीं हुआ तो बादशाह मुझे और सारे कुटुंबियों को मार डालेगा। आप लोग यहाँ से किसी अन्य देश को चले जाएँ। उन दोनों ने ऐसा ही किया जैसा जिंदर ने कहा था।

जिंदर उनके खून से सने कपड़े ले कर कमरुज्जमाँ के पास गया। इन वस्त्रों को देख कर बादशाह को कोप की जगह पश्चात्ताप का बोध होने लगा कि इतने सुंदर और बुद्धिमान शहजादों को मैंने खुद ही मरवा दिया। उनके वस्त्रों की जेबों में वे पत्र भी मिले जो उन्हें भिजवाए गए थे। कमरुज्जमाँ अपनी दोनों पत्नियों की हस्तलिपि पहचानता था और समझ गया कि दोनों स्त्रियों ने शहजादों को छला है। उसे अब और भी दुख हुआ कि निर्दोष राजकुमारों को मरवा डाला। वह रंज के मारे पछाड़ें खाने लगा और कहने लगा कि मुझ जैसा अत्याचारी पिता भी इस संसार में कहाँ होगा क्योंकि मैंने अपनी दुष्ट पत्नियों के बहकावे में आ कर अपने बेटों को मरवा दिया। उसने प्रतिज्ञा की कि इन स्त्रियों का मुँह कभी न देखूँगा। उसने अपनी दोनों रानियों को गिरफ्तार कर के बंदी गृह में डलवा दिया। इस पर भी उसके चित्त को शांति न थी और वह रात-दिन अपने बेटों के वियोग में रोया करता।

इधर वे दोनों भाई जंगल में भटकते रहे और फल-फूल खा कर जीवन यापन करते रहे। रात को आधे समय एक भाई सोता और दूसरा पहरा देता ताकि कोई वन्य प्राणी हमला न कर दे। शेष रात को दूसरा भाई पहरा देता और पहला सोता। एक मास तक इसी तरह चलते-चलते वे एक पहाड़ की तलहटी में पहुँचे। फिर वे उस पहाड़ पर चढ़ने लगे। पहाड़ की खड़ी चढ़ाई थी। असद अत्यधिक थक गया और वहीं गिर गया। अमजद साहस कर के पहाड़ की चोटी पर चढ़ गया। वहाँ पर फलों से लदा हुआ एक अनार का पेड़ था और एक मीठे पानी का स्रोत था। वह असद को सहारा दे कर पहाड़ की चोटी पर ले गया। वहाँ दोनों ने पानी पिया, अनार खाए और तीन-दिन वहाँ आराम किया। फिर वे पहाड़ की चोटी पर बने समतल मार्ग पर चलने लगे और इसी प्रकार चलते रहे। फिर रास्ता नीचे जाता दिखाई दिया। वे उस पर से उतरने लगे। कुछ दिनों बाद उन्हें दूर पर एक नगर बसा हुआ दिखाई दिया। अमजद ने कहा कि हम दोनों ही चलें। असद बोला, यह ठीक नहीं है। संभव है वहाँ कोई खतरा हो, जाना पहले एक ही को जाना चाहिए। कम से कम एक तो सुरक्षित रहेगा। तुम यहीं ठहरो, मैं जाता हूँ और हम दोनों के लिए भोजन ले कर आता हूँ। यह कह कर वह नगरी की ओर चल पड़ा।

नगर में पहुँचा तो सब से पहले उसे एक बूढ़ा मिला। उसने पूछा, बाबा, यहाँ का बाजार कहाँ है। मुझे अपने और अपने भाई के लिए भोजन खरीदना है। बूढ़े ने पूछा कि क्या तुम परदेसी हो। उसने कहा कि हाँ। बूढ़े ने उसे ऊपर से नीचे तक देख कर कहा, बेटा, तुम बाजार की चिंता छोड़ दो, मेरे घर चलो। वहाँ प्रचुर खाद्य सामग्री है, तुम खुद भी पेट भर खाना और अपने भाई के लिए भी जितनी चाहना ले जाना। यह कह कर वह छली बूढ़ा उसे अपने विशाल मकान में ले गया। असद ने देखा कि चालीस बूढ़े अग्नि के चारों ओर बैठे उपासना कर रहे हैं। असद घबराया कि यह अग्निपूजक धोखे से मुझे यहाँ ले आया है और मेरा न जाने क्या करेगा।

उस बूढ़े ने अपने साथियों से कहा कि अग्निदेव हम पर प्रसन्न हैं, उन्होंने अपनी भेंट के लिए हमारे हाथ में इस मुसलमान को पहुँचाया है। फिर उसने गजवान, गजवान पुकार कर कई आवाजें दीं। इस पर एक लंबा-चौड़ा हब्शी आया। बूढ़े के इशारे पर उसने असद को जमीन पर पटक दिया और बाँध दिया। बूढ़े ने कहा, इसे ले जा कर तहखाने में रखो और मेरी बेटियों बोस्तान और कैवाना के सुपुर्द कर दो। उन्हें मेरा यह आदेश भी देना कि वे दिन में कई बार इसकी पिटाई किया करें और चौबीस घंटे में एक बार दो छोटी रोटियाँ और एक लोटा पानी दे दिया करें ताकि यह मरे नहीं। साल भर बाद अग्निदेवता के बलिदान का दिन आएगा। तब हम इसे जहाज पर चढ़ा कर ज्वालामुखी पर्वत को ले जाएँगे और अग्निदेवता के सामने इसकी बलि देंगे।

गजवान के आदेशानुसार असद को तहखाने में डाल दिया। वहाँ बोस्तान और कैवान अक्सर आतीं और असद को खूब पीटतीं जिससे वह बेहोश हो कर गिर जाता। वे दोनों उसे रोटी के कुछ टुकड़े और एक लोटा पानी भी रोज दे देतीं जिससे उसके प्राण बच रहते। असद को अपनी इस दुर्दशा पर बहुत दुख था किंतु साथ ही उसे यह संतोष भी था कि अकेले मुझी पर मुसीबत है, मेरा भाई अमजद तो इस से बचा हुआ है।

उधर अमजद ने शाम तक असद के आने की राह देखी। रात को उसे बड़ा दुख हुआ और उसने समझ लिया कि असद किसी मुसीबत में फँस गया है। किसी तरह उसने रात काटी और सुबह उठ कर शहर को चला कि भाई का पता लगाए। उसे देख कर ताज्जुब हुआ कि शहर में मुसलमान इक्का-दुक्का ही दिखाई देते हैं। एक मुसलमान को रोक कर उसने पूछा कि यह कौन-सा नगर है। उसने कहा, तुम परदेसी हो यहाँ कहा आ फँसे। यह अग्निपूजा नगर है क्योंकि यहाँ सब अग्निपूजक रहते है। अमजद ने पूछा कि अवौनी नगर यहाँ से कितनी दूर है। उसने कहा, जलमार्ग सरल है, इससे वहाँ चार महीने में पहुँच जाते हैं। थल मार्ग में कठिनाइयाँ हैं लेकिन उसमें दो महीने ही में पहुँच जाते हैं। अमजद आश्चर्य से सोचने लगा कि मैं तो सवा महीने ही में यहाँ पहुँच गया। फिर उसने सोचा कि मेरी तरह इस बीहड़ रास्ते से कौन जाता होगा। सूचना देनेवाले को जल्दी थी, वह अपने काम में चला गया।

अमजद घूमता-फिरता एक दरजी की दुकान पर पहुँचा। वह भी मुसलमान था। अमजद ने उसे अपनी कठिन यात्रा और अपने भाई के गुम होने की बात कही। दरजी ने कहा, अगर तुम्हारा भाई किसी अग्निपूजक के हाथ में पड़ गया तो उसकी जान बचना मुश्किल है। तुम खुद अपनी जान की फिक्र करो। वह उसके साथ रहने लगा। एक महीना इसी प्रकार बीता। अमजद दरजी का थोड़ा-बहुत काम कर दिया करता था।

एक दिन वह बाजार में घूम रहा था कि उसे एक अत्यंत रूपवती स्त्री मिली। उस स्त्री ने उसे एक ओर ले जा कर और अपने मुँह से नकाब उठा कर कहा, मेरे प्यारे, तुम किस देश के वासी हो? कब से यहाँ पर हो? इस समय कहाँ जा रहे हो? अमजद उसके सौंदर्य पर मुग्ध हो गया और बोला, जा तो मैं अपने महल को रहा था। किंतु अब तुम जहाँ ले जाओगी वहीं चला चलूँगा। स्त्री ने कहा, मैं प्रतिष्ठित परिवार की स्त्री हूँ। हम लोग अपने प्रेमियों को अपने घर नहीं ले जाते। प्रेमी ही हम लोगों को अपने घर ले जाते हैं।

अमजद सोचने लगा कि मैं इसे कहाँ ले जा सकता हूँ, मेरा तो कोई घर ही नहीं है। अगर मैं दरजी के यहाँ इसे ले जाता हूँ तो वह क्या करेगा। इसलिए उसने स्त्री को कोई उत्तर न दिया और दरजी के घर की ओर चल पड़ा। किंतु वह निर्लज्ज स्त्री भी उसके पीछे हो ली। अमजद ने सोचा कि इसे भटकाना चाहिए इसलिए वह गलियों में चक्कर लगाने लगा। किंतु उस स्त्री ने पीछा न छोड़ा। अंततः वह थक कर एक गली में ऐसे मकान पर पहुँचा जहाँ सामने चबूतरे पर चौकियाँ बिछी थीं। वह थक कर एक चौकी पर बैठ गया। स्त्री भी वहीं बैठ गई।

स्त्री ने पूछा कि क्या तुम्हारा महल यही है। अमजद फिर चुप रहा। स्त्री बोली, प्रियतम, बाहर क्यों बैठे हो? ताला खोल कर अंदर क्यों नहीं चलते? अमजद ने बहाना बनाया कि महल की ताली मेरे दास के पास है जो बाजार चला गया है ताकि मेरे लिए भोजन लाए। वह सोचता था कि स्त्री उससे ऊब कर चली जाएगी किंतु वह वहीं डटी रही। कुछ देर बार वह कहने लगी, तुम्हारा गुलाम बड़ा लापरवाह आदमी है, इतनी देर तक बाजार से नहीं आया। जब आए तो उसे खूब सजा देना। अमजद ने उससे पीछा छुड़ाने के उद्देश्य से हाँ कर दी। कुछ देर बार स्त्री दरवाजे पर लगा हुआ ताला तोड़ने लगी। अमजद ने कहा, ताला क्यों तोड़ रही हो। उसने कहा कि आखिर घर तो तुम्हारा ही है, एक ताला खराब हो जाएगा तो कौन बड़ा नुकसान हो जाएगा।

अमजद सोचने लगा कि कुछ गड़बड़ी हुई तो यह तो औरत है, इससे कोई कुछ नहीं कहेगा, मुझी को सब लोग पकड़ेंगे। उसने सोचा कि चुपके से चल दे। किंतु वह स्त्री अंदर जा कर फिर बाहर आई और कहने लगी कि तुम अंदर क्यों नहीं चलते। अमजद ने कहा कि मैं अपने गुलाम की प्रतीक्षा कर रहा हूँ। उस औरत ने कहा, प्रतीक्षा तो अंदर बैठ कर भी हो सकती है, बाहर बैठ कर प्रतीक्षा करना क्या जरूरी है? विवश हो कर अमजद को अंदर जाना पड़ा। उसने देखा कि मकान बहुत ही साफ-सुथरा और लंबा-चौड़ा है। दोनों कुछ सीढ़ियाँ चढ़ कर बैठकवाली दालान में गए। वह दालान बहुत साफ-सुथरी और सुरम्य वस्तुओं से सजी हुई थी। एक ओर कई सुंदर पात्रों में नाना प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन रखे थे और दूसरी तरफ फलों और मेवों के पात्र थे। एक ओर शीशे की सुराहियों में सुवासित मदिरा भरी थी और मदिरा पान के लिए कई सुंदर प्याले थे। अमजद सोचने लगा कि यह किसी रईस का मकान है और किसी समय भी उसके नौकर-चाकर आ कर मेरी पिटाई करेंगे।

वह तो इस चिंता में था और स्त्री उससे कहने लगी, प्यारे, तुम तो कहते थे कि तुमने गुलाम को खाद्य वस्तुएँ खरीदने के लिए बाजार भेजा है, यहाँ तो इतना उत्तमोत्तम सामान रखा हुआ है। मालूम होता है तुम्हारा गुलाम यह भोजन, फल आदि रख कर कहीं ओर चला गया है। और तुम कहीं इसलिए तो उदास नहीं बैठे हो कि यह सब किसी और सुंदरी के लिए था और मैं बीच में आ गई। तुम चिंता न करो। मैं उसके आने पर आपत्ति भी न करूँगी और उसे मना भी लूँगी जिससे तुम्हें कोई परेशानी नहीं होगी। हम तीनों मिल कर आनंद मनाएँगे। अमजद ने हँस कर कहा, कोई और स्त्री नहीं आएगी। लेकिन यह भोजन मेरे खाने योग्य नहीं है, मेरे विश्वासों के अनुसार यह अपवित्र है। मेरा गुलाम मेरे लिए पवित्र भोजन लाता होगा। मैं इसीलिए कुछ खा नहीं रहा हूँ।

किंतु वह स्त्री लंबी प्रतीक्षा के लिए तैयार न थी। उसने भोजन करना आरंभ कर दिया। दो-चार ग्रास खा कर उसने शराब का प्याला भर कर पिया और एक प्याला अमजद को दिया। उसने विवश हो कर उसे पी लिया। वह यह भी सोचने लगा कि अच्छा हो कि गृह स्वामी के सेवकों के आने के पहले हम लोग खा-पी कर चल दें वरना बड़ी बदनामी होगी। इसलिए वह थोड़ा-बहुत जल्दी-जल्दी खाने लगा किंतु वह स्त्री आराम से खा-पी रही थी।

इतने में घर का मालिक आता दिखाई दिया। स्त्री उसे न देख सकी क्योंकि उसकी पीठ दरवाजे की तरफ थी। अमजद ने उसे देख लिया और उसे चिंता बढ़ी कि अब क्या होगा। किंतु गृहस्वामी ने उसको संकेत दिया कि चिंता न करो और आराम से खाओ- पियो। वास्तव में घर का स्वामी शाही घुड़साल का प्रधान अधिकारी था। उसका नाम बहादुर था। उसके निवास का मकान दूसरा था। इस घर में वह आमोद-प्रमोद के लिए आया करता था। उस दिन उसके अपने कुछ मित्रों को भोज पर बुलाया था और इसीलिए सारा सामान ला रखा था। किंतु बाहर से आने पर ताला टूटा देखा और अंदर एक आदमी और एक औरत को मौज-मस्ती करते देखा तो छुप कर देखने लगा कि आगे क्या होता है।

अमजद लघुशंका के बहाने उठा और बहादुर से आ कर धीमे-धीमे बात करने लगा। उसने सारा हाल उसे बताया। बहादुर ने कहा, शहजादे, आप चिंता न करें। मुझे विश्वास हो गया कि आप निर्दोष हैं। मेरा तो इसके अलावा दूसरा घर है जहाँ मैं निवास करता हूँ और इस घर में कभी-कभी आमोद प्रमोद के लिए आता हूँ। मैं तो वैसे भी आप का सेवक हूँ। मैं कुछ देर में गुलामों के-से कपड़े पहन कर आता हूँ। आप मुझ पर नाराज हों बल्कि मुझे मारें भी कि मैंने इतनी देर क्यों लगाई। आप रात भर उस स्त्री के साथ सहवास करें और सबेरे इसे कुछ दे-दिला कर विदा करें। मैं अपने को बड़ा भाग्यशाली मानता हूँ कि किसी शहजादे ने मेरे घर पर पधार कर उसे पवित्र किया। आप जा कर रुचिपूर्वक भोजन करें। शहजादा यह सुन कर अंदर आ गया और खाने-पीने लगा।
 
बहादुर घर के बाहर गया क्योंकि आमंत्रित मित्र आ पहुँचे थे। उसने उनसे बहाना बनाया कि एक अपरिहार्य कारण से दावत स्थगित करनी पड़ी है। मैं आप लोगों को फिर बुलाऊँगा। आज के लिए आप लोग मुझे क्षमा करें। मित्रगण बाहर ही से वापस लौट गए। इधर बहादुर गुलामों जैसे कपड़े पहन कर आया और शहजादे के पैरों पर गिर कर क्षमा प्रार्थना करने लगा। अमजद ने बनावटी क्रोध में कहा कि तुम सुबह के गए थे, अभी तक कहाँ मर रहे थे। बहादुर फिर क्षमा याचना करने लगा। अमजद ने कहा कि मैं आज तेरी पिटाई किए बगैर नहीं मानूँगा। यह कह कर वह उठा और एक छड़ी उठा कर दो-चार बार बहादुर को हल्की चोटें दीं। स्त्री ने कहा, इस तरह मारने से इसकी समझ में कुछ आएगा? देखो, सजा ऐसी दी जाती है। यह कह कर उसने चार-छह छड़ियाँ पूरे जोर से मारीं और बहादुर बिलबिला उठा और चिल्ला कर रोने लगा। अमजद ने उस स्त्री के हाथ से छड़ी छीन ली और बोला, रहने दो, आखिर वह भी आदमी है, जानवर तो नहीं जो इतनी बेदर्दी से मार रही हो।

बहादुर आँसू पोंछता हुआ उठ खड़ा हुआ और गुलामों की तरह दोनों को मदिरा पात्र भर-भर कर देने लगा। जब वह दोनों अच्छी प्रकार खा-पी चुके तो उसने एक कमरे में दोनों की शय्या तैयार की ताकि रात को उस पर सोएँ। शाम होने पर उसने सारे घर में दिए जलाए। काफी रात होने पर जब शहजादा और स्त्री अपने कमरे में गए तो वह खुद बाहर दालान में अपने बिस्तर पर लेट गया ताकि जरूरत होने पर शहजादा उसे बुला सके। दुर्भाग्यवश बहादुर सोते समय बड़े जोर से खर्राटे भरता था। स्त्री को असुविधा हुई तो उसने कहा कि तुम अभी जा कर उस बदतमीज गुलाम का सिर काटो, वह तो रात भर सोने नहीं देगा।

अमजद ने समझा कि वह नशे में बहक कर ऐसा कह रही है। वह बोला, खर्राटे भरना तो ऐसा अपराध नहीं है जिस पर किसी की गर्दन मारी जाए। मुझे तो पहले ही उस पर तरस आ रहा है कि तुमने उसे ऐसी क्रूरता से मारा। वह बोली, तुम्हें मेरा ज्यादा ख्याल है या एक तुच्छ गुलाम का? मैं दिल से चाहती हूँ कि उसे मार डाला जाए। आखिर एक गुलाम ही तो है। अगर तुम नहीं मारते तो मैं खुद जा कर उसकी गर्दन अलग करती हूँ।

अमजद ने सोचा कि किसी तरह बहादुर की जान तो बचानी ही चाहिए। उसने कहा कि तुम्हारी यही जिद है तो यही सही लेकिन वह मेरा गुलाम है, उसे मैं ही मारूँगा, तुम नहीं। यह कह कर उसने स्त्री के हाथ से तलवार ले ली। स्त्री उसके आगे-आगे यह देखने को चली कि अमजद वास्तव में उसे मारता है या यूँ ही छोड़ देता है। सोते हुए बहादुर के पास पहुँच कर अमजद ने तलवार निकाली और दो कदम पीछे हट कर बहादुर के बजाय उस स्त्री की गर्दन पर ऐसा शक्तिशाली प्रहार किया कि उसकी लाश दो टुकड़े हो कर जमीन पर गिर पड़ी।

बहादुर इस शब्द से चौंक कर जागा तो देखा कि शहजादे के हाथ में खून से सनी तलवार है और स्त्री के शरीर के दोनों टुकड़े तड़प रहे हैं। उसने आश्चर्य से पूछा कि आपने इसे क्यों ऐसी सजा दी। अमजद ने कहा, अगर मैं इसे ना मारता तो तुम्हारी जान किसी तरह नहीं बच सकती थी। इसके बाद उसने बताया कि वह क्या जिद कर रही थी। बहादुर ने शहजादे के पाँव पर सिर रख दिया और कहा, आप बड़े कृपालु हैं, आप ही के कारण मैं इस निर्लज्ज कुलटा के हाथ से मरते-मरते बचा। अब मैं इसकी लाश ले जा कर अँधेरे में कहीं फेंक आता हूँ। दिन निकलने पर यह लाश यहाँ पाई गई तो बड़ा झंझट होगा।

उसने यह भी कहा, खतरा अब भी है। इसलिए मैं अपनी सारी संपत्ति का उत्तराधिकार आपको लिखे देता हूँ। इस स्त्री के गहने आदि तो आप ले ही लीजिए। अगर मैं सूर्योदय तक इस लाश को ठिकाने लगा कर आ गया तो ठीक है वरना समझ लेना कि मैं पकड़ा गया। यह कह कर वह एक चादर में लाश बाँध कर ले चला। रास्ते में उसे दुर्भाग्यवश पुलिस की गश्त मिल गई। सिपाहियों ने गठरी खुलवा कर देखा तो लाश पाई। वह बहादुर को लाश की गठरी समेत थाने में ले गए और प्रमुख अधिकारी से बोले कि यह गुलाम इस स्त्री को मार कर फेंकने के लिए ले जा रहा था।

प्रमुख अधिकारी गुलामों के वेश में भी अश्वशाला के प्रमुख को पहचान गया। उसने तय किया कि मुझे खुद इसे सजा देने के बजाय बादशाह के सामने पेश करना ठीक रहेगा। उसने रात भर बहादुर को मय लाश के अपने घर में बंद रखा और सुबह दोनों को बादशाह के सामने पेश कर दिया। बादशाह को यह देख कर बड़ा क्रोध आया। उसने बहादुर से कहा, तू कितना बेशर्म है। इतना बड़ा अधिकारी हो कर भी इस प्रकार निरपराधों की हत्या करता है। तुझे तो जीने का बिल्कुल अधिकार नहीं है। यह कह कर उसने पुलिस अधिकारी से कहा कि इसे चौराहे पर फाँसी की टिकटी लगा कर आज ही फाँसी दी जाए।

प्रमुख पुलिस अधिकारी ने सारे शहर में मुनादी करवा दी कि एक अपरिचित स्त्री को मारने के अपराध में शाही घुड़साल के मुख्याधिकारी को फलाँ चौराहे पर फाँसी दी जाएगी। अमजद ने यह मुनादी सुनी तो समझ गया कि बहादुर पकड़ा गया है और फाँसी चढ़ाया जानेवाला है। वह फौरन फाँसीवाले चौराहे पर चला गया। उसने पुलिस अधिकारी से कहा, अपराधी यह आदमी नहीं है, मैं हूँ। मैंने उस स्त्री को मारा है क्योंकि वह इसे मारना चाहती थी। यह कह कर उसने पिछले दिन का सारा किस्सा पुलिस अधिकारी को सुनाया। उसने दुबारा बहादुर और अमजद को मय लाश के बादशाह के सामने पेश कर दिया।

बादशाह ने अमजद से सारा किस्सा सुन कर पूछा कि तुम कौन हो और कहाँ से आए हो। उसने अपनी सारी कहानी - पिता द्वारा मृत्यु-दंड मिलने, भटकते हुए यहाँ आने और दो दिन पहले छोटे भाई के लापता होने की बात सुनाई। बादशाह ने कहा, इस स्त्री को मार कर तुमने अच्छा किया, मैं तुम्हें इसके लिए दंड नहीं दूँगा। बहादुर का तो कोई कसूर ही नहीं है इसलिए इसे इनाम दे कर इसके पद पर प्रतिष्ठापूर्वक भेजूँगा। तुम्हें मैं अपना मंत्री बनाऊँगा ताकि तुम्हारे पिता ने जो ज्यादती तुम्हारे साथ की है उसका कुछ तो प्रतिकार हो जाए।

मंत्री बनने के बाद अमजद ने सार्वजनिक घोषणा करवाई कि जो भी असद का समाचार ला कर देगा उसे बहुत इनाम दिया जाएगा। उसने सैकड़ों जासूस भी इस काम के लिए नियुक्त किए किंतु असद का कहीं पता नहीं चला। वह बेचारा उसी तहखाने में बंद रहता और रोजाना बूढ़े की बेटियों बोस्तान और कैवाना के हाथ से खूब मार खाने के बाद रोटी का टुकड़ा पाता। धीरे-धीरे उसके भेंट चढ़ जाने का दिन आया। बूढ़े ने उसे एक जहाज के कप्तान बहराम को सौंपा जो उसे एक संदूक में बंद कर के अपने जहाज में ले चला।

जहाज छूटने के पहले अमजद को मालूम हो गया था कि अग्निदेवता की बलि के लिए साल में एक जहाज इस नगर में आया करता है और किसी न किसी मुसलमान को बलि चढ़ाने के लिए ले जाता है। उसने सोचा कि इस बार कहीं असद ही को तो इस हेतु नहीं भेजा जा रहा है। उसे इस जहाज पर शक था इसलिए वह स्वयं भी जहाज पर चढ़ गया और सारे खलासियों और व्यापारियों को अलग खड़ा कर के अपने सेवकों को जहाज की तलाशी लेने की आज्ञा दी। सेवकों ने अच्छी तरह हर जगह देखा किंतु असद को संदूक में बंद किया गया था इसलिए वह न मिला। इसके बाद जहाज को यात्रा करने की अनुमति दे दी गई।

रास्ते में बहराम कप्तान ने असद को संदूक से निकाला लेकिन उसके पाँवों में बेड़ियाँ डाल दीं ताकि वह अपनी बलि की बात सुन कर समुद्र में न कूद पड़े। किंतु जहाज इच्छित ज्वालामुखी के द्वीप में न पहुँचा। प्रतिकूल वायु और समुद्री धाराओं ने उसे दूसरी ओर मोड़ दिया। कुछ दिनों बाद भूमि दिखाई दी किंतु जब कप्तान बहराम ने पहचाना कि यह कौन-सा देश है तो वह बहुत घबराया। यह भूमि एक मुसलमान रानी मरजीना का राज्य था। वह अग्निपूजकों की घोर शत्रु थी।

वह अपने देश में किसी अग्निपूजक को नहीं रहने देती थी बल्कि उनका कोई जहाज भी अपने बंदरगाहों में नहीं आने देती थी। जहाज वहाँ के तट पर पहुँचा तो बहराम ने अपने साथियों से कहा, यदि मरजीना के सिपाही जहाज पर इस कैदी को बेड़ियों में देखेंगे तो मरजीना जहाज को लुटवा देगी और हम सब लोगों को मरवा डालेगी। इसलिए इस आदमी की बेड़ियाँ काट दो और इसे नौकरों जैसे कपड़े पहना दो। मैं इसी के हाथ से रानी को रत्नादि की भेंट दिलाऊँगा ताकि रानी भी प्रसन्न हो और यह भी समझे कि मुझे बलि नहीं चढ़ाया जाएगा।

जहाज के लोगों को कप्तान का यह उपाय पसंद आया क्योंकि इसके अलावा और किसी प्रकार रानी के कोप से बचा ही नहीं जा सकता था। असद की बेड़ियाँ काट दी गईं और उसे दासों जैसे सफेद कपड़े पहनाए गए। उन लोगों ने उसे बढ़िया खाना खिलाया और झूठा आश्वासन दिया कि यहाँ से निकल कर हम तुम्हें तुम्हारे देश में पहुँचा देंगे। लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि उस बुड्ढे के घर पर तुम से जो दुर्व्यवहार हुआ है वह किसी को न बताना वरना हम लोग तुम्हें जीता न छोड़ेंगे।

उन्होंने हर तरह की खुशामद और धमकी से काम लिया।

असद ने भी देखा कि उनकी बात को अस्वीकार करने में कोई लाभ नहीं है, उसने मान लिया कि मैं किसी से कुछ नहीं कहूँगा। अब जहाज ने मरजीना के बंदरगाह में लंगर डाला। मरजीना का बाग समुद्र तट पर था और वह उस समय अपने बाग की सैर कर रही थी। उसने अग्निपूजकों का जहाज देखा तो अपने सिपाही भेजे और कुछ देर में स्वयं समुद्र तट पर आ गई। कप्तान बहराम असद के हाथ भेंट वस्तुएँ ले कर उसके पास गया और झुक कर सलाम करने के बाद कहा कि हम प्रतिकूल वायु और समुद्र धाराओं से विवश हो कर आपके बंदरगाह पर टिके हैं। हम लोग व्यापारी हैं और दासों का व्यापार करते हैं। हमारे और दास तो बिक गए और सिर्फ यह बचा है। यह पढ़ा-लिखा है इसलिए हमने इसे हिसाब-किताब लिखने के लिए रख लिया है।

मरजीना असद के रूप पर मुग्ध हो गई। उसने कहा, तुम अपनी सभी भेंट वस्तुएँ अपने पास रखो, केवल इस दास को मुझे दे दो। तुम इसका जो भी मूल्य माँगोगे वह मैं दे दूँगी। यह कह कर वह बहराम के उत्तर की प्रतीक्षा किए बगैर ही असद के हाथ में हाथ डाल कर बाग में घूमने लगी। कुछ देर बाद उसने असद से पूछा कि तुम्हारा नाम क्या है? असद ने आँसू भर कर कहा, मलिका, मैं अपना कौन-सा नाम बताऊँ। कुछ महीने पहले तक मेरा नाम असद था और मैं अवौनी का शहजादा था। अब मेरा नाम कुरबानिए-आतिश रखा गया है क्योंकि यह अग्निपूजक मुझे अपने देवता के सामने बलि देने के लिए लिए जा रहे हैं।
 
मरजीना यह वृत्तांत सुन कर आग बबूला हो गई। उसने बहराम को बुला कर बहुत गालियाँ सुनाईं और कहा, नीच कमीने, तूने मुझसे इतना बड़ा झूठ बोला? तू इस व्यक्ति को आग की कुरबानी के लिए ले जा रहा है और मुझे बता रहा है कि यह दास है? अब खैरियत चाहता है तो फौरन जहाज को खोल दे नहीं तो मैं सारा माल लुटवा दूँगी, जहाज जला दूँगी। बहराम घबराया हुआ जहाज पर आया। तेज उलटी हवा होने पर भी जहाज का लंगर उठवाने लगा। उधर मरजीना असद को बाग में बने हुए राजकीय आवास में ले गई। उसने स्वादिष्ट भोजन मँगवाया। असद ने पेट भर भोजन किया और जी भर शराब पी। शराब वह जरूरत से ज्यादा पी गया था। उसने मलिका से बाग में घूम-फिर कर नशा उतारने की अनुमति ली और बाग में घूमने लगा। कुछ देर बाद उसने एक कुंड के निकट बैठ कर अपना मुँह धोया और कुछ चैतन्य हो कर वहीं घास पर लेट गया। दो क्षणों ही में उसे गहरी नींद आ गई।

उधर बहराम ने अपने खलासियों से कहा, अब शाम हो गई है, रात भर तो बेखटके यहाँ भी रह सकते हैं। आशा है कि सुबह तक अनुकूल वायु भी मिल जाएगी। जहाज पर मीठा पानी भी कम है। हम लोग जमीन पर उतर कर देखें तो कोई न कोई कुआँ या कुंड मिल ही जाएगा। पानी ला कर हम सुबह होने के पहले ही जहाज खोल देंगे।

खलासी लोग जल की खोज में निकले तो उन्हें याद आया कि रानी मरजीना के बाग में मीठे पानी का एक बड़ा कुंड देखा था। वे वहाँ आए। सोते हुए असद को उन्होंने पहचान लिया और उसे अकेला पा कर बहुत खुश हुए। उन्होंने अपने सारे बरतनों में पानी भरा और धीरे से असद को उठा कर जहाज पर पहुँचा दिया। बहराम पानी के साथ असद को पा कर बहुत प्रसन्न हुआ। हवा भी अनुकूल चलने लगी थी इसलिए उसने दो घड़ी रात रहे ही लंगर उठा दिया। जहाज तेजी से ज्वालामुखी पर्वत की ओर जिसे वे आतशी कोह कहते थे चल पड़ा।

सुबह मलिका ने असद को अपने पास न पाया तो पहले सोचा कि वह शौचादि के लिए गया होगा किंतु जब वह देर तक न आया तो अपनी दासियों और सेविकाओं को आदेश दिया कि उसे ढूँढ़ें। उन्होंने बहुत ढूँढ़ा किंतु उसका पता नहीं पाया। काफी देर के बाद दासियों ने बताया कि बाग का फाटक खुला मिला है और कुंड के पास एक आदमी के जूते रखे हें। मलिका उठ कर स्वयं कुंड के पास आई और जूतों को देख कर पहचान गई कि यह असद ही के हैं। कुछ दासियों ने यह भी कहा कि कल शाम को कुंड में जितना पानी था इस समय उससे काफी कम दिखाई दे रहा है।

रानी मरजीना समझ गई कि रात को बहराम के खलासी बाग में पानी लेने आए होंगे और पानी के साथ निद्रामग्न असद को भी उठा ले गए होंगे। उसने एक आदमी समुद्र तट पर यह पता करने के लिए भेजा कि बहराम का जहाज है या नहीं। वहाँ उसे मालूम हुआ कि जहाज सुबह से पहले ही रवाना हो गया है। अन्य जहाजों के लोगों ने यह भी बताया कि पहर रात गए उस जहाज से एक नाव आई थी जिसके लोग शाही बाग की ओर गए थे।

अब तो कोई संदेह ही न रहा कि बहराम ने असद को उठवा लिया है। तब तक शाम होने लगी थी। उसने अपनी नौसेना के सारे जहाजों को तैयार रहने की आज्ञा दी और कहा दस जहाज बंदरगाह पहुँच जाएँ, मैं स्वयं इस जंगी बेड़े के साथ चलूँगी। दूसरी सुबह दस युद्धपोत रानी को ले कर बहराम के जहाज के पीछे चले। दो दिन बाद उन्होंने बहराम का जहाज आगे जाता हुआ देखा ओर कुछ ही देर में उसे चारों ओर से घेर लिया।

बहराम समझ गया कि असद के लिए ही मलिका ने पीछा किया है। उसने सोचा कि असद के साथ पकड़ा गया तो रानी मुझे मरवा ही देगी इसलिए उसे जहाज से हटा देना चाहिए। प्रकटतः वह बलि को इस प्रकार हाथ से भी जाने नहीं दे सकता था। इसलिए उसने क्रोध में चिल्ला कर कहा, इस मनहूस की वजह से हम पर मुसीबत आ रही है और हम सभी की जान खतरे में है। उसे खूब मारो और फिर समुद्र में फेंक दो ताकि यह यहीं खत्म हो जाए। उसके आधीनस्थ लोगों ने ऐसा ही किया। उसे खूब मारा और फिर उठा कर समुद्र में फेंक दिया। उन्हें विश्वास था कि इस गहरे पानी में से वह किसी तरह बच कर नहीं निकल सकता।

किंतु असद बहुत अच्छा तैराक था। वह तैरते-तैरते कुछ घंटों में एक भूमि पर जा लगा। उसने तट पर पहुँच कर भगवान को धन्यवाद दिया कि उसने दूसरी बार प्राण बचाए। उसने अपने कपड़े सुखाए और सोचा कि तट से कुछ दूर दिखाई देनेवाले नगर में चलूँ। पास पहुँच कर देखा तो वह वही अग्निपूजकों की बस्ती थी जहाँ से वह जहाज पर लादा गया था। उसने सोचा कि दिन में वहाँ जाना ठीक नहीं है, रात में चलूँगा। यह सोच कर वह मुसलमानों के कब्रिस्तान में जा कर सो गया।

उधर मरजीना के जहाजों ने बहराम के जहाज को दबा लिया। मरजीना ने स्वयं उस जहाज पर चढ़ कर पूछा कि असद कहाँ है जिसे तुम मेरे बाग से उड़ा लाए थे। बहराम ने असद को लाने की बात से इनकार किया। मरजीना ने असद को ढुँढ़वाया। उसे न पा कर वह और भी क्रुद्ध हुई। उसने जहाज को लूटने और सब लोगों को निकटस्थ भूमि पर ले चलने की आज्ञा दी और कहा कि मैं इन सब को मौत के घाट उतरवाऊँगी। उसके सिपाहियों ने बहराम और उसके साथियों को तट पर पहुँचाया।

तट पर जा कर बहराम भी पहचान गया कि यह उसी का नगर है। वह पहरेदारों की आँख बचा कर भाग निकला। नगर तक उसे पहुँचते-पहुँचते काफी रात हो गई। उसने भी सोचा कि रात यहीं कब्रिस्तान में बिता कर सुबह शहर में जाऊँगा। वहाँ असद को सोता देख कर उसे आश्चर्य हुआ कि इस जगह सोनेवाला कौन है। उसने उसे अच्छी तरह देखना शुरू किया। असद की भी आँख खुल गई और वह उठ बैठा। बहराम ने कहा, अच्छा तुम यहाँ सोए हो? तुम्हारी वजह से मुझ पर ऐसी विपदा पड़ी। इस वर्ष तो बलि से बच गए, अब देखता हूँ कि अगले वर्ष कैसे बचते हो।

बहराम असद से कहीं तगड़ा था। उसने असद को एक चादर में बाँधा और रात ही रात उसे उस बूढ़े अग्निपूजक के घर पहुँचा दिया जहाँ से असद को लाया था। बूढ़े ने फिर असद के पाँव में बेड़ियाँ डाल कर उसे तहखाने में पहुँचाया और बोस्तान और कैवाना को पहले की तरह उसे रोज खूब मारने और रोटी-पानी देने की आज्ञा दी। बोस्तान उसे तहखाने में ले गई। असद ने विलाप आरंभ किया कि इस सारे साल की मार से तो अच्छा था कि मुझे बलि ही दे दिया जाता। बोस्तान को पहले ही अपनी क्रूरता पर खेद था। इस समय उसे असद पर बड़ी दया आई। उसने कहा, तुम चिंता न करो। मैं तुम्हें न मारूँगी। मैं तुम्हें यह भी बता दूँ कि मैं मुसलमान हो गई हूँ।

बोस्तान की बातों से असद को बहुत तसल्ली हुई किंतु उसे अब भी कैवाना की ओर से डर लग रहा था। उसने कहा, भगवान ने तुम्हारे हृदय में मेरी ओर से दया उपजा दी है किंतु कैवाना तो मुझे पूर्ववत ही मारेगी। बोस्तान ने कहा, तुम डरो नहीं। अब तुम्हारे पास कैवाना नहीं, मैं ही आऊँगी। उस दिन से बोस्तान ही उसके पास आने लगी। वह उसे भरपेट स्वादिष्ट भोजन खिलाती और उससे मित्रतापूर्वक बातें करती।

एक दिन बोस्तान अपने दरवाजे पर खड़ी थी कि उसने मुनादी होते सुनी। मुनादी करनेवाला उच्च स्वर में कह रहा था, इस देश का मंत्री अमजद अपने छोटे भाई असद को ढूँढ़ने स्वयं ही नगर में निकला है। जो भी उसके भाई को उसके पास लाएगा उसे इतना धन दिया जाएगा कि कई पीढ़ियों के लिए काफी होगा। और अगर कोई असद को जान-बूझ कर छुपा कर रखेगा तो वह अपने परिवारवालों के सहित मार डाला जाएगा और उसका घर खुदवा कर उस जमीन पर हल चलवा दिया जाएगा। यह मुनादी सुन कर बोस्तान दौड़ी हुई असद के पास गई। उसने उसकी बेड़ियाँ काट दीं और उसे ले कर गली में निकल आई। यहाँ आ कर उसने पुकार कर कहा, यह है मंत्री अमजद का भाई असद, इसे मंत्री के पास पहुँचा दो।

मंत्री के सेवकों ने मंत्री को तुरंत इस बात की सूचना दी। वह असद को बुलाने के बजाय स्वयं ही वहाँ पर आ गया। असद को पहचान कर उसने उसे आलिंगनबद्ध किया। फिर वह असद और बोस्तान को ले कर बादशाह के पास पहुँचा। वहाँ पहुँच कर असद ने अपने ऊपर पड़नेवाली सारी विपत्तियों का वर्णन किया। बादशाह के क्रोध का ठिकाना न रहा। उसने आज्ञा दी कि बुड्ढे अग्निपूजक का घर खुदवा डाला जाए तथा उसे और बहराम आदि रिश्तेदारों को मृत्युदंड की आज्ञा दी। उन सबने उसके पैरों पर गिर कर प्राणों की भिक्षा माँगी। बादशाह ने कहा कि तुम्हारा अपराध बहुत बड़ा है, तुम्हें इसी शर्त पर प्राण-दान मिल सकता है कि तुम अपना यह झूठा धर्म छोड़ कर मुसलमान हो जाओ। उन्होंने यह स्वीकार कर के जान बचाई।

मंत्री अमजद ने इसके बाद उन लोगों को गुजारे के लिए यथेष्ट धन दिया। बहराम इससे प्रभावित हुआ। उसने कहा कि सरकार, पिछले साल मैं अवौनी देश गया था। वहाँ बादशाह कमरुज्जमाँ आप लोगों के वियोग में बड़े व्याकुल हैं। आश्चर्य न होगा यदि इस दुख में उनके प्राण निकल जाएँ। आप दोनों यदि वहाँ चलने को तैयार हों तो मैं आपको सुविधापूर्वक पहुँचा दूँ।

अमजद और असद ने यह स्वीकार किया और बादशाह से जाने की अनुमति माँगी जो उसने दे दी। उसने उन्हें गले लगा कर विदा किया और बहुत साधन यात्रा के लिए दिया।

इतने में एक हरकारे ने आ कर कहा कि एक ओर से एक बड़ी सेना आ रही है। बादशाह सोचने लगा कि मेरा ऐसा कौन दुश्मन है जो चढ़ाई करे। उसने अमजद से जा कर सेनाध्यक्ष से मिलने को कहा। अमजद गया तो उसे मालूम हुआ कि सेना की नायक एक स्त्री है। उसने उससे भेंट कर उससे पूछा कि आप युद्ध का इरादा ले कर आई हैं या मैत्री का? उसने कहा, मैं युद्ध करने नहीं आई हूँ। यहाँ का बहराम नामी कप्तान मेरे दास असद को चुरा लाया है। मैं उसी को लेने आई हूँ। मेरा नाम मरजीना है। यदि आप असद को मुझे वापस दिलाने में सहायक हों तो आपकी आभारी हूँगी।

अमजद ने कहा, आपका दास असद मेरा छोटा भाई है। मैं यहाँ का मंत्री हूँ। आप कृपया चल कर हमारे बादशाह से भेंट करें। वे असद को आपकी सेवा में दे देंगे। मरजीना यह सुन कर बहुत प्रसन्न हुई और सारी सेना वहीं छोड़ कर कुछ अंगरक्षकों को साथ ले कर अमजद के साथ बादशाह के पास आने लगी।

इसी बीच एक और हरकारे ने आ कर कहा कि दूसरी दिशा से एक और सेना आ रही है। बादशाह फिर चिंतित हुआ। उसने अमजद को इस सेना का हाल जानने के लिए भेजा। अमजद कुछ सिपाहियों के साथ गया और फौज के एक सरदार से कहा कि मैं यहाँ का मंत्री हूँ, मुझे अपने बादशाह के पास ले चलो। बादशाह के पास जा कर उसने पूछा कि आप अगर युद्ध के लिए आए हैं तो यह भी बताए कि हमसे क्यों युद्ध करना चाहते हैं। बादशाह ने कहा, मैं युद्ध करने नहीं आया। मैं चीन का बादशाह गौर हूँ। मेरी बेटी बदौरा और दामाद कमरुज्जमाँ बहुत दिनों से लापता हैं। मैं उन्हें ढूँढ़ने निकला हूँ।

अमजद ने उसके पाँव चूम कर कहा, आप मेरे नाना हैं। मेरे पिता कमरुज्जमाँ अवौनी के बादशाह हैं। वे और मेरी माता बदौरा आनंदूपर्वक हैं। बादशाह गौर ने उसे सीने से लगाया और उसे देर तक प्यार करता रहा। वह अमजद की सारी पिछली आपदाओं को सुन कर बहुत दुखी हुआ।

उसने अमजद को तसल्ली दी और कहा कि मैं स्वयं वहाँ तुम्हें ले जा कर तुम दोनों का मेल करवा दूँगा। अमजद ने विदा हो कर अपने स्वामी को उसका हाल बताया। उसे आश्चर्य हुआ कि चीन के सम्राट जैसा प्रतापी आदमी बेटी-दामाद की तलाश में भटक रहा है। उसने अपने कर्मचारियों को आज्ञा दी कि चीन के सम्राट की पूरी तरह अभ्यर्थना की जाए। वह स्वयं भी इस बात की तैयारी करने लगा कि चीन के सम्राट के शिविर में जा कर उससे भेंट करे।

इसी बीच एक और हरकारे ने सूचना दी कि एक फौज तीसरी तरफ से भी आई है। बादशाह ने सोचा यह अच्छी मुसीबत है, चारों ओर से सेनाएँ चली आ रही हैं। उसने इस बार भी अमजद को इस सेना के आगमन का उद्देश्य जानने को भेजा। अमजद ने जा कर पता किया तो मालूम हुआ कि यह उसका पिता कमरुज्जमाँ है जो अपने दोनों पुत्रों की तलाश में देश-विदेश भटकता हुआ यहाँ आ पहुँचा है। उसे मालूम हुआ कि पहले तो अपनी रानियों के षड्यंत्र में फँस कर उसने बेटों के वध की आज्ञा दे दी थी किंतु बाद में उसे इतना पछतावा हुआ कि वह प्राण त्याग करने के लिए तैयार हो गया। जब जिंदर ने उसे बताया कि शहजादों को मारा नहीं गया है तो उसकी हालत सँभली किंतु इसके बाद वह चैन से न बैठ सका और बड़ी फौज ले कर बेटों को ढूँढ़ने निकल पड़ा। अमजद वापस आ कर असद को साथ ले गया और दोनों बेटों ने बाप से भेंट की। वह इन दोनों को गले लगा कर बहुत देर तक हर्ष के आँसू बहाता रहा।

इतने ही में वहाँ के बादशाह को एक और हरकारे ने बताया कि राज्य की चौथी ओर से भी एक बड़ी सेना चली आ रही है। बादशाह ने फिर अमजद के पास खबर भिजवाई। कमरुज्जमाँ ने कहा, और बातें बाद में होंगी, पहले यह देखना चाहिए कि यह नई फौज किसलिए आई है। मैं खुद तुम्हारे साथ चल कर उस फौज लानेवाले बादशाह से मिलूँगा। अमजद ने पिता को यह भी बताया कि एक ओर से चीन का सम्राट भी ससैन्य आया हुआ है। कमरुज्जमाँ यह सुन कर खुश हुआ और बोला कि चलो रास्ते में हम लोग तुम्हारे नाना से भी मिलते चलेंगे।

चीन के सम्राट से संक्षिप्त रूप से भेंट करने के बाद कमरुज्जमाँ और उसके दोनों बेटे उस तरफ गए जहाँ चौथी फौज ने पड़ाव डाला था। पास पहुँचने पर अमजद आगे बढ़ कर गया। संयोग से उसकी पहली ही भेंट इस फौज के बादशाह के मंत्री के साथ हुई। उसने पूछा, आप लोग तो मुसलमान हैं, इस देश में जहाँ मुख्यतः अग्निपूजक रहते हैं क्या करने आए हैं? उस मंत्री ने कहा, हम लोग खलदान देश से आए हैं। हमारे बादशाह का बेटा कमरुज्जमाँ बीस वर्ष से अधिक समय से लापता है। हमारे बादशाह उसी की खोज में भटक रहे हैं। अगर आप लोगों ने कमरुज्जमाँ का कुछ हाल सुना हो तो बताइए, आपकी बड़ी कृपा होगी।

अमजद ने हँस कर कहा, आप कमरुज्जमाँ का समाचार पूछ रहे हैं। मैं स्वयं कमरुज्जमाँ को यहाँ लिए आता हूँ। आप बादशाह से हम लोगों की भेंट का प्रबंध कराइए। इधर मंत्री अपने बादशाह को यह समाचार देने गया उधर अमजद ने जा कर अपने बाप से कहा कि आपके पिता आप की खोज में यहाँ तक आए हैं और यह फौज उन्हीं की है। कमरुज्जमाँ ने स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि पिता से भेंट होगी और वह भी इतने आकस्मिक ढंग से। वह भावातिरेक से मूर्छित हो गया। जब वह सचेत हुआ तो बेटे को साथ ले कर पिता से मिलने चल पड़ा और उसके पास जा कर उसके पैरों पर गिर पड़ा। वह उसे छाती से लगा कर बहुत देर तक रोता रहा।

उसने कमरुज्जमाँ से पूछा, बेटे, मुझ से ऐसी क्या भूल हो गई थी कि तुम बगैर कुछ कहे-सुने चले आए। तुम इस अरसे में कहाँ-कहाँ और किस तरह रहे? कमरुज्जमाँ ने लज्जित हो कर चुपचाप देश छोड़ने पर पिता से क्षमा याचना की और फिर उसे अपना, बदौरा का और बेटों का पूरा हाल बताया। उसने अपने दोनों बेटों को पिता से मिलवाया। वह दोनों पौत्रों को गले लगा कर बहुत देर तक प्यार करता रहा।

फिर सारे बादशाहों और रानी मरजीना ने अग्निपूजक देश के मुसलमान बादशाह के महल में एक-दूसरे से भेंट की और तीन दिन तक राग-रंग होता रहा। सभी की सलाह से मंत्री अमजद के साथ भूतपूर्व अग्निपूजक की बेटी बोस्तान का विवाह कर दिया गया क्योंकि वह सब से पहले स्वयं ही मुसलमान हुई थी और उसी ने असद को पिता की कैद से निकाला था। इसी तरह सब की सलाह से असद का विवाह रानी मरजीना से कर दिया गया क्योंकि वह इतनी शक्तिशालिनी हो कर भी असद पर इतनी मुग्ध थी कि उसकी तलाश में भटक रही थी। असद अपनी पत्नी के साथ चला गया। अमजद को वहाँ के बादशाह ने अपना राजपाट सौंप दिया। इस सारे वृत्तांत का यह प्रभाव पड़ा कि उस देश के अधिकतर अग्निपूजक अपना पुराना धर्म छोड़ कर मुसलमान हो गए। चीन का सम्राट, खलदान का बादशाह और कमरुज्जमाँ उस देश के बादशाह की दी हुई बहुमूल्य भेंटें स्वीकार करने के बाद अपने-अपने देशों की ओर रवाना हो गए।

शहरजाद ने यह कहानी खत्म की तो दुनियाजाद ने कहा, दीदी, तुमने बहुत ही अच्छी कहानी सुनाई। मैं चाहती हूँ कि और भी ऐसी कहानियाँ सुनूँ। शहरजाद बोली, यदि मुझे आज प्राणदंड न दिया गया तो कल नूरुद्दीन और फारस देश की दासी की सुंदर कथा सुनाऊँगी। बादशाह शहरयार ने इस कहानी के लालच में उस दिन भी शहरजाद का प्राणदंड स्थगित कर दिया।
 
नूरुद्दीन और पारस देश की दासी की कहानी

अगली सुबह से पहले शहरजाद ने नई कहानी शुरू करते हुए कहा कि पहले जमाने में बसरा बगदाद के अधीन था। बगदाद में खलीफा हारूँ रशीद का राज था और उसने अपने चचेरे भाई जुबैनी को बसरा का हाकिम बनाया था। जुबैनी के दो मंत्री थे। एक का नाम था खाकान और दूसरे का सूएखाकान। खाकान उदार और क्षमाशील था और इसलिए बड़ा लोकप्रिय था। सूएखाकान उतना ही क्रूर और अन्यायी था और प्रजा उससे रुष्ट थी। सूएखाकान अपने सहयोगी मंत्री खाकान के प्रति भी विद्वेष रखता था।

एक दिन जुबैनी ने खाकान से कहा कि मुझे एक दासी चाहिए जो अति सुंदर हो तथा गायन-वादन तथा अन्य विद्याओं में निपुण भी हो। खाकान के बोलने के पहले ही सूएखाकान बोल उठा, ऐसी लौंडी तो दस हजार अशर्फी से कम में नहीं आएगी। जुबैनी ने आँखें तरेर कर कहा, तुम समझते हो दस हजार अशर्फियाँ मेरे लिए बड़ी चीज हैं? यह कह कर उसने खाकान को दस हजार अशर्फियाँ दिलवा दीं। खाकान ने घर आ कर दलालों को बुलाया और उनसे कहा कि तुम जुबैनी के लिए अति सुंदर और सारी विद्याओं, कलाओं में निपुण एक दासी तलाश करो चाहे जितने मोल की हो। सारे दलाल इच्छित प्रकार की दासी ढूँढ़ने में लग गए।

कुछ दिनों बाद एक दलाल खाकान के पास आ कर बोला कि एक व्यापारी ऐसी ही दासी लाया है जैसी आपने कहा था। खाकान के कहने पर दलाल उस व्यापारी को दासी समेत ले आया। खाकान ने आ कर जाँच-परख की तो दासी को हर प्रकार से गुणसंपन्न पाया और जुबैनी की आशा से अधिक सुंदर भी पाया। उसने व्यापारी से उसका दाम पूछा तो उसने कहा, स्वामी, यह रत्न तो अनमोल है। किंतु मैं आप के हाथ मात्र दस हजार अशर्फियों पर बेच दूँगा। इसके लालन-पालन और शिक्षा-दीक्षा पर मैंने बहुत श्रम किया है। यह गायन, वादन, साहित्य, इतिहास और सारी विद्याओं में पारंगत है और अभी तक अक्षत है। मंत्री ने बगैर कुछ कहे दस हजार अशर्फियाँ गिनवा दीं।

व्यापारी ने कहा, सरकार, एक निवेदन और है। इसे एक सप्ताह बाद ही हाकिम के पास ले जाएँ। कारण यह है कि यह बहुत दूर की यात्रा से बड़ी क्लांत है और एक हफ्ते के अंदर इसे अच्छा खिलाएँगे-पिलाएँगे और दो बार गरम पानी से नहलाएँगे तो इसका रूप ऐसा निखरेगा कि आप भी इसे पहचान नहीं सकेंगे। खाकान ने यह बात मान ली। उक्त दासी को उसने अपनी पत्नी के सुपुर्द किया और कहा कि इसे एक सप्ताह तक खिलाओ-पिलाओ और दो बार गरम हम्माम में भेजो, फिर मैं उसे जुबैनी के सामने पेश करूँगा। उसने दासी से भी, जिसका नाम हुस्न अफरोज था, कहा, देख, तुझे मैंने अपने स्वामी के लिए मोल लिया है। तू यहाँ आराम से किंतु बड़ी होशियारी से रह। खबरदार, किसी पुरुष से तेरा संसर्ग न हो। खास तौर से तू मेरे जवान बेटे नूरुद्दीन से सावधान रहना। वह दिन में कई बार अपनी माँ के पास आया करता है। हुस्न अफरोज ने खाकान से कहा, सरकार, आपने बहुत अच्छा किया जो मुझे यह चेतावनी दे दी। अब आप इत्मीनान रखिए। आपकी आज्ञा के विरुद्ध कोई बात नहीं होगी।

खाकान इसके बाद दरबार को चला गया। दोपहर के भोजन के समय नूरुद्दीन अपनी माँ के पास आया तो उसने देखा कि उसकी माँ के पास एक कंचनवर्णी, मृगनयनी, गजगामिनी षोडशी बैठी है। सौंदर्य की इस प्रतिमूर्ति को देखते ही उसका हृदय उस दासी के लिए बेचैन हो गया। उसके पूछने पर उसकी माँ ने बताया कि इस दासी को जो पारस देश से आई है, तुम्हारे पिता ने बसरा के हाकिम जुबैनी की सेवा के लिए खरीदा है। इसके बावजूद नूरुद्दीन उससे अपना मन न हटा सका और ऐसी तरकीब सोचने लगा जिससे वह दासी उसके हत्थे चढ़ जाए। नूरुद्दीन अत्यंत सुंदर था। इसलिए हुस्न अफरोज भी भगवान से प्रार्थना करने लगी कि कोई ऐसी बात हो जाए जिससे मैं हाकिम के बजाय इसी सजीले नौजवान के पास रह सकूँ।

उस दिन से नूरुद्दीन ने यह नियम बना लिया कि अक्सर अपनी माँ के पास आता और हुस्न आफरोज से आँखों-आँखों में बातें करता। हुस्न अफरोज भी खाकान की पत्नी की आँख बचा कर नूरुद्दीन से प्रेमपूर्वक आँखें मिलाती और संकेत ही में अपने हृदय की अभिलाषा कहती। यह मौन दृष्टि-विनिमय कब तक छुपाता। नूरुद्दीन की माँ उसका इरादा समझ गई और उससे बोली, प्यारे बेटे, अब भगवान की दया से तुम जवान हो गए हो। अब तुम्हारे लिए उचित नहीं है कि स्त्रियों में अधिक बैठो। तुम दोपहर का भोजन कर के तुरंत बाहर मरदाने में चले जाया करो। नूरुद्दीन ने विवशता में यह मान लिया।

दो दिन बाद खाकान की पत्नी ने कुछ दासियों के साथ हुस्न अफरोज को हम्माम में भेजा। उन्होंने उसे गरम पानी से मल-मल कर नहलाया और फिर नए सुनहरे कपड़े पहनाए। जब वह खाकान की पत्नी के पास आई तो बुढ़िया उसे न पहचान सकी और बोली, बेटी, तुम कौन हो? कहाँ से आई हो? उसने हँस कर कहा, मैं आपकी दासी हुस्न अफरोज हूँ, केवल स्नान कर के आई हूँ। आपने जो दासियाँ मेरे साथ भेजी थीं वे भी कह रही थीं कि तुम स्नान के बाद इतनी अच्छी हो गई हो कि पहचानी नहीं जातीं। खाकान की पत्नी ने कहा, सचमुच तुम पहचानी नहीं जातीं। दासियों ने यह बात तुम्हारी खुशामद में नहीं कही थी। मैं भी तो तुम्हें नहीं पहचान सकी। अच्छा, यह बताओ कि हम्माम में अभी कुछ गरम पानी बचा है या तुमने सब खर्च कर डाला। मैंने भी बहुत दिन से नहीं नहाया है और नहा कर तरोताजा होना चाहती हूँ। हुस्न अफरोज ने कहा, जरूर नहाइए। अभी काफी गरम पानी हम्माम में मौजूद है।

खाकान की पत्नी ने हम्माम में जाने से पहले दो दासियों को हुस्न अफरोज की रक्षा के लिए नियुक्त किया और कहा कि इस बीच अगर नूरुद्दीन आए और हुस्न अफरोज के पास जाने का प्रयत्न करें तो तुम उसे ऐसा न करने देना। यह कह कर वह हम्माम में चली गई और मल-मल कर नहाने लगी। संयोग से उसी समय नूरुद्दीन आ गया। उसने देखा कि माँ अभी हम्माम से देर तक नहीं निकलेगी, यह अच्छा मौका है। वह हुस्न अफरोज का हाथ पकड़ कर उसे एक कमरे में ले जाने लगा। दासियों ने उसे बहुत रोका लेकिन वह कहाँ माननेवाला था। उसने दोनों दासियों को धक्के देते हुए महल के बाहर निकाल दिया और खुद हुस्न अफरोज को ले कर कमरे में चला गया और द्वार अंदर से बंद कर लिया। हुस्न अफरोज तो स्वयं उस पर मुग्ध थी, दोनों ने प्रेम मिलन का खूब आनंद लूटा।

जिन दासियों को उसने धकिया कर निकाला था वे रोती-पीटती हम्माम के दरवाजे पर पहुँचीं और मालकिन का नाम ले कर गुहार करने लगीं। खाकान की पत्नी ने पूछा तो दोनों ने सारा हाल बताया। वह घबराहट के मारे काँपने लगी और बगैर नहाए ही अपने महल में आ गई। इतनी देर में नूरुद्दीन भोग-विलास कर के महल से बाहर जा चुका था।

खाकान की पत्नी को सिर पीटते देख कर हुस्न अफरोज को आश्चर्य हुआ। उसने पूछा, मालकिन, ऐसी क्या बात हो गई? आप इतनी व्याकुल क्यों हैं। ऐसा क्या हुआ कि आप बगैर स्नान किए ही आ गईं। उसने दाँत पीस कर कहा, कमबख्त, तू मुझ से पूछती है कि क्या हुआ? तुझे नहीं मालूम है कि क्या हुआ? मैंने तुझे बताया नहीं था कि तू जुबैनी की सेवा के लिए खरीदी गई है? फिर तूने नूरुद्दीन को अपने पास क्यों आने दिया? हुस्न अफरोज ने कहा, मालकिन माँ, इसमें क्या गलती की है मैंने? यह ठीक है कि सरकार ने मुझे बताया था कि मैं हाकिम के लिए खरीदी गई हूँ किंतु इस समय आपके पुत्र ने मुझसे कहा था कि मेरे पिता ने तुम्हें मेरी सेवा में दे दिया है और तुम्हें बसरा के हाकिम के पास नहीं भजेंगे। अब जब मैं उनकी हो ही गई तो उन्हें क्यों रोकती? फिर सच्ची बात है कि उन्हें जब से देखा था मेरा मन उनसे मिलने को लालायित था। मैं खुद ही चाहती हूँ कि जीवन भर उनकी चरण सेवा करूँ और बसरा के हाकिम जुबैनी का कभी मुँह न देखूँ।

खाकान की पत्नी बोली, हृदय तो मेरा भी इसी में प्रसन्न होगा कि तू नूरुद्दीन के पास रहे। किंतु उस लड़के ने झूठ बोला है। मुझे तो डर यह है कि मंत्री जब यह सुनेंगे तो उसे मरवा डालेंगे। अब मैं रोऊँ नहीं तो क्या करूँ? इतने में मंत्री भी आ गया। उसने पत्नी से रोने का कारण पूछा।

मंत्री की पत्नी ने कहा, सच्ची बात छुपाने से कोई लाभ नहीं। मैं हम्माम में नहाने गई थी इसी बीच तुम्हारे इकलौते पुत्र ने यह कह कर इस लौंडी को खराब कर डाला कि तुमने वह लौंडी उसे दे दी थी। तुमने उसे लौंडी दी है या नहीं?

खाकान यह सुन कर सिर पीटने लगा और चिल्ला-चिल्ला कर कहने लगा इस बदमाश लड़के ने हम सब का नाश कर दिया। हाकिम जुबैनी के लिए ली हुई अक्षत दासी को खराब कर दिया। मेरी सारी प्रतिष्ठा मिट्टी में मिला दी। और सिर्फ अपमान की ही बात नहीं है। हाकिम को यह मालूम होगा तो वह मुझे भी मरवा डालेगा और उस अभागे को भी। उसकी पत्नी ने कहा, स्वामी, जो हो गया उस पर अफसोस करने से क्या लाभ? मैं अपने सारे जेवर उतारे देती हूँ। इन्हें बेचने पर दस हजार अशर्फियाँ तो मिल ही जाएँगी। तुम उनसे दूसरी दासी खरीद लेना और हाकिम को दे देना।

मंत्री ने कहा, क्या तुम समझती हो कि मैं दस हजार अशर्फियों के लिए रो रहा हूँ या इतनी रकम खुद खर्च नहीं कर सकता? मुझे दुख इस बात का है कि मेरी प्रतिष्ठा खतरे में है। सूएखाकान जरूर हाकिम से कह देगा कि मैंने जो दासी हाकिम के लिए खरीदी थी वह अपने बेटे को दे डाली। उसकी पत्नी ने कहा, सूएखाकान निस्संदेह तुम्हारा शत्रु है किंतु हमारे घर के अंदर का हाल उसे क्या मालूम? फिर अगर कोई चुगली भी करे तो तुम हाकिम से कह देना कि मैंने आपके लिए एक दासी खरीदी जरूर थी किंतु उसकी शरीर-परीक्षा से ज्ञात हुआ कि वह आपके योग्य नहीं थी। इस तरह सूएखाकान की शिकायत का कोई प्रभाव नहीं रहेगा। इधर तुम फिर दलालों को बुलवाओ और नई सर्वगुण संपन्न दासी लाने के लिए कहो।
 
पत्नी के समझाने से मंत्री को ढाँढ़स बँधा। उसका नूरुद्दीन पर उतना क्रोध न रहा किंतु वह उसे क्षमा भी नहीं कर सका। नूरुद्दीन अपने पिता से छुप कर रात के समय महल में आता और सुबह पिता के जागने के पहले बाहर चला जाता। फिर भी उसकी माँ को यह भय और चिंता लगी रहती थी कि कभी मंत्री ने नूरुद्दीन को देखा तो उसका क्रोध फिर भड़क उठेगा और वह उसे जरूर मार डालेगा। उसने एक दिन अपने पति से यह बात पूछी तो उसने कहा कि मैं पाऊँगा तो जरूर उसे मार डालूँगा। पत्नी ने कहा, देखो, वह तुम्हारा इकलौता बेटा है। जवानी में आदमी से भूल हो ही जाती है। उससे भी हो गई। रही यह बात कि उसे अपने अपराध की गंभीरता का पता चल जाए तो उसकी तरकीब मैं बताती हूँ। तुम उसे पकड़ लेना और मारने के लिए तलवार निकाल लेना। फिर मैं तुम्हारी खुशामद कर के उसे छुड़ा लूँगी। मंत्री को यह सुझाव पसंद आया।

दूसरे दिन सवेरे पत्नी के इशारे पर मंत्री ने दरवाजे पर जा कर नूरुद्दीन को धर दबोचा और तलवार निकाल कर उसे मारने के लिए उठाई। तभी उसकी पत्नी ने आ कर उसका हाथ पकड़ लिया और बोली, तुम इसे मारना ही चाहते हो तो पहले मुझे मार डालो। नूरुद्दीन ने भी गिड़गिड़ा कर प्राण-भिक्षा माँगी और कहा कि इतने-से कसूर पर आप मेरी जान लेंगे तो कयामत में खुदा को क्या जवाब देंगे? मंत्री ने तलवार फेंक कर कहा, तुम मेरे नहीं, अपनी माँ के पाँवों पर गिरो, उसी के कहने पर मैंने तुम्हें छोड़ा है। मैं तुम्हें हुस्न अफरोज भी देता हूँ लेकिन खबरदार उसके साथ ब्याहता का व्यवहार करना, दासी का नहीं। और उसे किसी दशा में न बेचना।

इसके बाद नूरुद्दीन आनंदपूर्वक हुस्न अफरोज के साथ रहने लगा और मंत्री भी उन दोनों की परस्पर प्रीति देख कर प्रसन्न हुआ और संतोष से रहने लगा। जुबैनी के सामने उसने दासी के बारे में वही कह दिया जो उसकी पत्नी ने कहा था।

इसके एक वर्ष बाद की बात है। मंत्री ने गरम पानी से देर तक स्नान किया किंतु अचानक कुछ ऐसा काम आ पड़ा कि वह बाहर निकल आया। गर्मी से अचानक सर्दी में आ जाने के कारण वह बीमार हो गया और उसका रोग बढ़ता गया। अपना अंत समय निकट देख कर नूरुद्दीन से, जो उसकी परिचर्या के लिए बराबर उसके पास रहता था, कहा, मैंने पहले भी कहा था और अब फिर कहता हूँ कि हुस्न अफरोज को प्यार से रखना और उसे कभी बेचना नहीं। इसके बाद उसने शरीर छोड़ दिया।

नूरुद्दीन ने उसकी बड़ी धूमधाम से अंत्येष्टि की और चालीस दिन तक बाप का मातम किया। इसी बीच उसने किसी मित्र आदि को अपने पास आने की अनुमति नहीं दी। फिर धीरे-धीरे उसके मित्र उसे तसल्ली देने के लिए आने लगे और कुछ दिनों में मित्रों के आने का ताँता लग गया। नूरुद्दीन अल्पवयस्क और अनुभवहीन था। उसके मित्रों ने इस बात का अनुचित लाभ उठाया। उन्होंने रासरंग के सुझाव दिए और नूरुद्दीन ने दोनों हाथों से धन लुटाना आरंभ किया और उसके मित्र धन से अपना घर भरने लगे। एक दिन हुस्न अफरोज ने उसे समझाया, तुमने अपने कमीने मित्रों पर बहुत कुछ लुटा दिया, अब चेत जाओ और यह फिजूलखर्चियाँ बंद कर दो। नूरुद्दीन हँस कर बोला, क्या बात करती हो? क्या मेरे पिता मरने पर अपने साथ ले गए और क्या मैं ले जाऊँगा? फिर जीवन में आनंद लेने के लिए अपने धन का प्रयोग क्यों न करूँ?

दो-चार दिन बाद उसका गृह-प्रबंधक उसके पास आया और बही-खाता खोल कर उसे सारी स्थिति बताने के बाद उससे बोला, आप ने इस थोड़े ही समय में बहुत अधिक खर्च कर दिया है। आपके स्वामिभक्त सेवकों से आपकी यह बरबादी नहीं देखी जाती। इसलिए उनमें से बहुत-से लोग काम छोड़ कर चले गए हैं। यही हाल रहा तो मैं भी अधिक दिनों तक आपकी सेवा नहीं कर सकूँगा। या तो आप अपने अपव्यय को रोकिए या मेरा हिसाब साफ कर मुझे विदा कीजिए।

प्रबंधक के लाख समझने पर भी नूरुद्दीन ने अलल्ले-तलल्ले नहीं छोड़े। उसके मित्र उसे पहले से अधिक लूटने लगे। कभी कोई आता और कहता, आपका अमुक बाग और उसमें बना मकान मुझे बहुत भा गया है। आपको तो कोई कमी नहीं, आप उसे मुझे दे दीजिए। और मूर्ख नूरुद्दीन उसके नाम वह बाग और उसके अंदर का मकान लिख देता। इसी प्रकार कोई उसके अरबी घोड़े या विशालकाय हाथी की प्रशंसा करता और नूरुद्दीन उसे भी दे डालता। कुछ ही दिनों में यह हाल हो गया कि उसके पास अपने रहने के महल के अलावा और कुछ नहीं रहा।

अब उसके मित्र उससे कन्नी काटने लगे। वे उसके पास नहीं आते थे। अकेलेपन से घबरा कर वह किसी को बुलाता तो वह न आता और अगर आता भी तो दो-चार मिनट बैठ कर चला जाता। कभी-कभी कोई मित्र घर ही से पत्नी की बीमारी का या इसी प्रकार का कोई और कुछ बहाना बना लेता। इसी प्रकार मित्रों की उदासीनता से आश्चर्यान्वित हो कर उसने एक दिन हुस्न अफरोज से इस बात का उल्लेख किया। उसने कहा, प्रियवर, मैंने तो पहले ही कहा था कि यह सारे आदमी स्वार्थी हैं।

बात मित्रों की उदासीनता तक ही नहीं रही। आमदनी तो कुछ भी नहीं थी। धीरे-धीरे घर का सामान और दास-दासियाँ बिक गए। वेतनभोगी सेवक पहले ही चले गए थे। अब घर में खाने को भी कुछ नहीं रहा। दो दिन तक उपवास हुआ तो तीसरे दिन हुस्न अफरोज आँखों में आँसू भर कर बोली, प्रियतम, अब इसके अलावा कोई रास्ता नहीं है कि तुम मुझे बाजार में बेच दो। और जो मिले उससे भाग्य आजमाओ। नूरुद्दीन ने कहा, तुम्हें बेचना तो असंभव है। किंतु मुझे कुछ मित्रों से आशा है, वह इस आड़े समय में मेरी सहायता अवश्य करेंगे। हुस्न अफरोज बोली, यह तुम्हारा ख्याल ही ख्याल है। तुम्हारे मित्रों में कोई भी तुम्हारा हितचिंतक नहीं था। नूरुद्दीन ने कहा, ऐसी बात नहीं है। तुम क्या जानो कि वह लोग कैसे हैं? वह चुप हो रही। नूरुद्दीन सवेरे उठ कर एक मित्र के घर कुछ कर्ज माँगने के लिए गया। दरवाजे पर आवाज देने पर एक दासी बाहर निकली। नूरुद्दीन ने उसे अपना नाम बताया। उसने कहा, आप अंदर जा कर बैठें, मैं अभी खबर करती हूँ। उसे बिठा कर दासी ने अपने मालिक से कहा कि नूरुद्दीन आपसे मिलने आए हैं। मालिक ने क्रुद्ध हो कर कहा, तुमने उसे अंदर क्यों बिठाया। अब जा कर उससे कह दे मालिक घर पर नहीं हैं।

नूरुद्दीन ने यह वार्तालाप सुन लिया। दासी ने बाहर आ कर लज्जित स्वर में मालिक की अनुपस्थिति की बात कहीं। नूरुद्दीन चुपचाप उठ आया। वह मन में सोचने लगा कि यह आदमी तो बड़ा ही दुष्ट निकला। कल तक मेरी प्रशंसा के पुल बाँधा करता था, मेरे ही मकान में रहता है और अब मुझसे हीं नही मिल रहा है। वह एक और मित्र के यहाँ गया जो पहले मित्र से कुछ कम धनवान था। वहाँ भी उसके साथ वही व्यवहार हुआ। इस तरह एक-एक कर के अपने दस मित्रों के घरों पर नूरुद्दीन गया किंतु किसी मित्र ने उससे बात भी न की, सहायता देना तो दूर की बात थी।

वह बेचारा अत्यंत आहत हो कर घर आया और अपनी प्रेयसी के सामने फूट पड़ा। आँसू बहाते हुए बोला, कैसी नीच है ये दुनिया। यही लोग कल तक मेरी जूतियाँ सीधी करने में गर्व का अनुभव करते थे और आज यह हाल है कि मुझ से कोई बात भी नहीं करना चाहता। मेरा हाल तो फलदार वृक्ष जैसा हो गया। जब तक फलों से लदा था सभी आदमी मेरे आसपास घूमा करते थे, अब कोई पास भी नहीं फटकता।

हुस्न अफरोज ने कहा, तुम्हें अब यह मालूम हुआ हैं। मैं तो शुरू ही से उनके रंग-ढंग से जानती थी कि वे सब महास्वार्थी हैं। मैं इसीलिए तुम्हें समझाया करती थी कि उनका साथ न करो।

खैर अब पिछली बातों का क्या रोना, अब यह सोचना है कि आगे क्या होगा। अब तो घर में भी कोई ऐसा सामान नहीं है जो बेच सको और दास-दासी तो तुम पहले ही बेच चुके हो। मकान बेच दोगे तो हम लोग रहेंगे कहाँ। इसलिए ऐसा करो कि मुझे दासों की मंडी में ले चलो। तुम्हें याद होगा कि तुम्हारे पिता ने मुझे दस हजार अशर्फियों में खरीदा था। अब मेरा इतना तो मोल नहीं होगा किंतु इससे आधे को जरूर बिक जाऊँगी। तुम उससे व्यापार करो और जब तुम्हारे पास व्यापार से पैसा आ जाए तो मुझे फिर खरीद लेना।

नूरुद्दीन ने रोते हुए कहा, एक तो मैं तुम्हें अपनी जान से ज्यादा चाहता हूँ फिर मैंने पिता को उनके अंत समय में वचन दिया है कि किसी भी दशा में तुम्हें नहीं बेचूँगा। हुस्न अफरोज ने कहा, प्रियतम, तुम ठीक कहते हो। मैं भी तुम्हें अपनी जान से ज्यादा चाहती हूँ। किंतु हमारे धर्म के अनुसार विपत्ति पड़ने पर प्रतिज्ञा तोड़ी भी जा सकती है। जैसी विपत्ति तुम पर है उसमें तुम और क्या कर सकते हो।

अब नूरुद्दीन मजबूर हो कर हुस्न अफरोज को ले कर बाजार में गया। पुराने दलाल को बुला कर उसने कहा, कई वर्ष हुए मेरे पिता के हाथ तुमने एक फारस देश की दासी दस हजार अशर्फियों में बेची थी। अब मैं उसे बेचना चाहता हूँ। तुम उसके लिए खरीदार देखो। दलाल ने उसकी बात मान कर हुस्न अफरोज को एक मकान में बंद कर के बाहर ताला डाल दिया जैसे बिकनेवाले दास-दासियों के साथ करते हैं। फिर वह दासों को खरीदनेवाले व्यापारियों के पास गया। उन व्यापारियों ने कई देशों तथा यूनान, फ्रांस, अफ्रीका आदि की दासियाँ मोल ले रखी थीं।

दलाल ने उन से कहा, तुम लोगों ने देश-देश की दासियाँ ले रखी हैं किंतु मैं फारस देश की ऐसी दासी तुम्हें दिखाऊँगा जिसके सामने कोई नहीं ठहरेगी। तुम लोगों ने विद्वानों का यह कथन तो सुना ही होगा कि हर गोल चीज सुपारी नहीं होती, हर चपटी चीज अंजीर नहीं होती, हर लाल चीज मांस नहीं होती और हर सफेद चीज अंडा नहीं होती। इसी तरह यह दासी जो चीज है वह कोई और दासी नहीं हो सकती।

दलाल के साथ जा कर व्यापारियों ने हुस्न अफरोज को देखा। वे कहने लगे कि इसमें संदेह नहीं कि ऐसी सुंदर और बुद्धिमती दासी हमने और कहीं नहीं देखी लेकिन हम सब मिल कर इसे खरीदेंगे और इसका मोल चार हजार अशर्फी लगाएँगे, इससे अधिक देना हमारे वश की बात नहीं है। यह कह कर वे मकान के बाहर आ कर खड़े हो गए। दलाल भी मकान बंद करने के बाद सौदेबाजी करने के लिए उनके पास आया। इसी बीच दुष्ट मंत्री सूएखाकान की सवारी उधर से निकली। उसने पूछा कि यह भीड़ कैसी है। दलाल ने कहा कि यह सब एक दासी लेने के लिए आए हैं और उसका मोल चार हजार अशर्फी लगा रहे हैं। सूएखाकान ने कहा, मुझे भी एक अच्छी लौंडी चाहिए। तुम मुझे वह दासी दिखाओ।

दलाल ने वजीर को मकान में ले जा कर हुस्न अफरोज को दिखाया। वजीर ने कहा कि मैं चार हजार अशर्फी इसके लिए दूँगा, अगर कोई और इससे अधिक लगाए तो ले जाए। लेकिन इसके साथ ही उसने संकेत ही से सारे व्यापारियों से कह दिया कि खबरदार इसका अधिक मूल्य न लगाना इसलिए वे चुपचाप खड़े रहे। दलाल ने कहा, मैं इसके मालिक को जा कर बताता हूँ कि आपने इसके लिए चार हजार अशर्फियों का दाम लगाया है। अगर वह इस मूल्य पर बेचने को तैयार हो तो आप निस्संदेह दाम दे कर इसे अपने घर ले जाएँ।

इसके बाद दलाल नूरुद्दीन के पास आ कर बोला, मुझे खेद है कि आपकी दासी उचित से कम मूल्य पर बिक रही है। मैंने व्यापारियों को उसे दिखाया तो वे उसका चार हजार अशर्फी मूल्य देने को तैयार हो गए। मैं इस फिक्र में था कि कुछ देर और प्रतीक्षा करूँ, संभव है कोई आदमी उसका पाँच छह हजार देने के लिए तैयार हो जाए। उसी समय वजीर सूएखाकान की सवारी निकल रही थी। भीड़ देख कर उसने पूछा कि क्या बात है। यह मालूम होने पर कि एक अच्छी दासी बिक रही है उसने उसे देखना चाहा और देखने पर उसके लिए चार हजार अशर्फियाँ लगा दीं।

साथ ही अन्य व्यापारियों को भी इशारा कर दिया कि इससे अधिक दाम न लगाना। अब बोलो, तुम क्या कहते हो?

नूरुद्दीन ने कहा, सूएखाकान हमारे कुटुंब का पुराना दुश्मन है। मुझे यह बिल्कुल मंजूर नहीं कि किसी भी कीमत पर उसके हाथों अपनी प्रिय दासी बेचूँ। दलाल ने कहा, वैसे तो वही उसके कुछ अधिक दाम लगा सकता है और मैं उसके हाथ दासी बेचने को विवश हो जाऊँगा। लेकिन अगर तुम वास्तव में उसे किसी दाम पर न बेचना चाहो तो सिर्फ एक तरकीब है। मैं उसे वजीर के हाथ में देने लगूँ तो तुम उसी समय आ जाना और दासी के मुँह पर झूठ-मूठ का थप्पड़ मार कर उसे अपनी ओर घसीट लेना और कहना कि मुझे एक बात पर इस दासी पर क्रोध आ गया था और मैंने प्रतिज्ञा की थी कि बाजार में खड़े-खड़े तेरा सौदा कर दूँगा। वह सौदा हो गया और मेरी प्रतिज्ञा पूरी हो गई। अब मैं इसे बेचना नहीं चाहता और किसी दाम पर भी इसे नहीं बेचूँगा। नूरुद्दीन ने दलाल की बात बड़ी खुशी से मंजूर कर ली और चुपके-चुपके उसके पीछे दास-दासियों के बाजार में पहुँच गया।

जिस समय दलाल दासी का हाथ सूएखाकान के हाथ में देने लगा तभी नूरुद्दीन बीच में आ गया। हुस्न अफरोज का दूसरा हाथ पकड़ कर उसने अपनी ओर उसे खींचा और उसके मुँह पर दो तमाचे हलके से मार कर कहा, तू जाती कहाँ है? वह तो तेरी बदतमीजी और आज्ञा न मानने पर मैंने तूझे बेच देने को कहा था। अब तेरी बिक्री हो चुकी। तू सीधी तरह से घर चल। यह कह कर नूरुद्दीन उसे घसीटता हुआ अपने घर की ओर ले चला। सूएखाकान कुछ देर तक इस आकस्मिक घटना के कारण स्तंभित-सा रहा क्योंकि उसे यह भी नहीं मालूम था कि लौंड़ी नूरुद्दीन की संपत्ति है। फिर वह अपमान के कारण क्रोध में जल उठा और घोड़ा दौड़ा कर उसने रास्ते में नूरुद्दीन को जा पकड़ा।

उसने नूरुद्दीन के एक कोड़ा मारना चाहा लेकिन नूरुद्दीन पहले से होशियार था। उसने कोड़े का वार बचा कर सूएखाकान का हाथ पकड़ कर उसे घोड़े से नीचे खींच लिया। अब दोनों में मल्लयुद्ध होने लगा। वजीर बूढ़ा था और नूरुद्दीन जवान। उसने वजीर को उठा-उठा कर कई बार जमीन पर पटका और खूब रगड़े दिए। बाजार के सारे लोग तमाशा देखने खड़े हो गए। चूँकि सभी सूएखाकान से नाराज थे इसलिए सभी चुपचाप उसकी दुर्दशा देखते रहे और किसी ने सूएखाकान की सहायता नहीं की। यहाँ तक कि जब वजीर के नौकर बचाने के लिए बढ़े तो वहाँ उपस्थित लोगों ने उन्हें यह कह कर रोक दिया, तुम लोग इन दोनों के बीच में न पड़ो। तुम्हें मालूम नहीं कि यह नौजवान भी मंत्री-पुत्र है, दिवंगत मंत्री खाकान का पुत्र है। इसलिए वे भी डर कर रुक गए।

नूरुद्दीन ने बूढ़े वजीर की दुर्गति कर दी। उसके शरीर से कई जगह खून निकल आया और उसके सारे वस्त्र और शरीर के सारे अंग खून और मिट्टी से सन गए और वह बेदम-सा हो कर एक ओर गिर रहा। नूरुद्दीन हुस्न अफरोज को ले कर अपने घर को चला गया। सूएखाकान वैसे ही लहू और मिट्टी से सने कपड़े और बदन ले कर हाकिम जुबैनी के पास पहुँचा। उसे वजीर को ऐसी दशा में देख कर आश्चर्य हुआ और वह बोला, तुम्हें किसने मारा? सूएखाकान ने हाथ जोड़ कर कहा, सरकार, पुराने मंत्री खाकान के बेटे नूरुद्दीन ने मेरी यह दुर्दशा की है। जुबैनी ने विस्तृत विवरण चाहा तो सूएखाकान ने कहा -

'मैं आज बाजार की तरफ से निकला तो एक जगह भीड़ देखी। पूछने पर मालूम हुआ कि एक दासी बिक रही है। मुझे भी गृह-कार्य के लिए एक दासी की जरूरत थी इसलिए मैं भी रुक गया। दासी के देखने पर मुझे वह आपकी सेवा के उपयुक्त मालूम हुई इसलिए मैंने चार हजार अशर्फी पर उसका सौदा कर लिया। इतने में नूरुद्दीन आ गया और बोला कि मैं अपनी दासी तुम्हारे हाथ नहीं बेचूँगा। मैंने उसे बहुत समझाया कि मैं यह दासी अपने लिए नहीं बल्कि हाकिम के लिए खरीद रहा हूँ लेकिन उसने मेरी एक न सुनी। आपको भी भला-बुरा कहा और मुझे मार-पीट कर दासी को ले गया।

'सरकार, आप को याद होगा कि तीन-चार बरस पहले आपने खाकान को दस हजार अशर्फियाँ एक सर्वगुण-संपन्न दासी खरीदने के लिए दी थीं। उसने इसी धन से यह दासी खरीद कर अपने बेटे को दे दी। तब से वह दासी उसी के पास है। पिता के मरने के बाद नूरुद्दीन ने अपनी सारी संपत्ति भोग-विलास में उड़ा दी। अब उसके पास अपने एक मकान और इस लौंडी के अलावा कुछ नहीं है। भूख से तंग आ कर वह अपनी उस दासी को बेच रहा था किंतु मुझ से दुश्मनी होने के कारण उसने मेरे साथ यह किया।'
 
हाकिम जुबैनी को पुरानी बात याद आ गई और वह गुस्से में भर गया। उसने वजीर सुएखाकान को विदा किया और अपने एक सरदार को आज्ञा दी कि चालीस सिपाहियों को ले कर जाओ, नूरुद्दीन और उसकी दासी को बाँध कर यहाँ लाओ और उसके मकान को खुदवा कर भूमि को समतल कर दो। यह सरदार नूरुद्दीन के पिता से बड़ा उपकृत था। वह छुप कर अकेला उसके घर पर पहुँचा और उसे हाकिम की आज्ञा को बता कर कहा, यह चालीस अशर्फियाँ लो। इस समय मेरे पास इतना ही है। तुम तुरंत दासी को ले कर कहीं भाग जाओ वरना जान से हाथ धोओगे। मैं भी भागता हूँ, कोई मुझे यहाँ देख कर हाकिम से कह देगा तो मैं भी मारा जाऊँगा।

यह कह कर सरदार उसी तरह छुप कर चला गया। इधर नूरुद्दीन ने जा कर हुस्न अफरोज को यह सब बताया और उसे ले कर मकान के पिछवाड़े की दीवार फलाँग कर नदी के तट पर भागता हुआ पहुँचा। संयोग से उसी समय एक छोटा जहाज बगदाद जाने के लिए लंगर उठा रहा था। नूरुद्दीन और दासी के सवार होते ही जहाज ने लंगर उठा दिया और बगदाद को चल पड़ा।

उधर कुछ देर बाद वही सरदार अपने साथ सशस्त्र सैनिकों को ला कर नूरुद्दीन का दरवाजा ऐसे क्रोध से खटखटाने लगा जैसे वास्तव में उसे गिरफ्तार करने आया हो। दरवाजा न खुलने पर उसने उसे तुड़वा दिया और अंदर जा कर सिपाहियों को मकान की तलाशी लेने और नूरुद्दीन और उसकी दासी को पकड़ने की आज्ञा दी। सिपाहियों ने मकान में न कोई सामान पाया न कोई आदमी।

उसने पड़ोसियों से पूछा कि नूरुद्दीन कहाँ है। उनमें दो-एक को मालूम था कि वह पिछवाड़े से भाग गया है किंतु सभी लोग उसे चाहते थे इसलिए बोले कि हम लोगों को बिल्कुल नहीं मालूम कि वह कहाँ गया। सरदार ने हाकिम से जा कर सारा हाल कहा तो उसने कहा कि उसका घर गिरवा कर समतल कर दो। और शहर में मुनादी करवा दो कि जो नूरुद्दीन को पकड़ कर लाएगा उसे एक हजार अशर्फियों का इनाम मिलेगा और अगर कोई उसे या उसकी दासी को शरण देगा तो उसे तथा उसके कुटुंबियों को मृत्यु-दंड दिया जाएगा। अतएव ऐसा ही किया गया।

उधर नूरुद्दीन का जहाज बगदाद पहुँचा तो कप्तान ने यात्रियों को समझाया कि यह नगर अद्भुत है, यहाँ क्षण मात्र में गरीब अमीर बन जाता है और अमीर गरीब इसलिए यहाँ परदेशियों को सावधान रहना जरूरी है। खैर, बगदाद पहुँच कर अन्य व्यापारी तो अपने-अपने ठिकानों पर गए, नूरुद्दीन ने कप्तान को पाँच अशर्फियाँ किराए में दीं और हुस्न अफरोज को ले कर उतरा। उसके लिए यह नगर नितांत अपरिचित था और उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि किस जगह ठहरे। दोनों बहुत देर तक भटकने के बाद एक बाग में पहुँचे जो नदी के तट पर था और जिसका द्वार खुला था। यहाँ बहुत देर तक बाग के कुंड में हाथ-पाँव धोने और जल पीने के बाद वे एक दालान में जा बैठे। वे दोनों बहुत थक गए थे इसलिए लेट गए और लेटते ही सो गए।

यह बाग खलीफा हारूँ रशीद का था। वह इसमें रात को सैर के लिए आया करता था। उस बाग में रात दिन मोमबत्तियाँ जला करती थीं। उसमें एक विशाल बारहदरी थी जो इतनी ऊँची थी कि उसकी छत पर होनेवाली रोशनी सारे नगर में दिखाई देती थी। उस बारहदरी में अस्सी द्वार थे जिनके किवाड़ बिल्लौर के बने हुए थे। बाग के रक्षक का नाम शेख इब्राहिम था। उसकी अनुमति के बगैर कोई आदमी बाग में प्रवेश नहीं कर पाता था। उस दिन वह थोड़ी देर के लिए बाग का दरवाजा खुला छोड़ कर बाहर चला गया था। फिर उसे कुछ देर लग गई।

संध्याकाल निकल आने पर शेख इब्राहीम आया तो देखा कि कुंड के समीप की दालान में दो व्यक्ति मुँह पर महीन चादरें डाले सो रहे हैं। उसे बड़ा क्रोध आया और उसने इरादा किया कि डंडा उठा कर दोनों को पीटे। फिर यह सोच कर रुक गया कि शायद ये परदेशी हों, बगैर सोचे-विचारे इन्हें दंड देना ठीक नहीं है। पहले इनसे पूछूँ कि ये यहाँ क्यों और कैसे आए। उसने दोनों के मुँह की चादरें हटाईं तो देखा कि एक से बढ़ कर एक सुंदर स्त्री पुरुष हैं। उसने नूरुद्दीन का पाँव हिला कर उसे जगाया। उसने जाग कर देखा कि एक सफेद दाढ़ीवाला बूढ़ा मौजूद है तो उसने फौरन उठ कर उसके हाथ चूमे और अदब से सलाम किया और बोला, पिताजी, मेरे लिए क्या आज्ञा है? रक्षक उसके विनय से प्रभावित हो कर बोला, बेटे, तुम कौन हो? कहाँ से आए हो? नूरुद्दीन ने कहा, हम लोग परदेशी हैं। हम यहाँ किसी को नहीं जानते। आप कृपया हमें रात भर यहाँ रहने की अनुमति दें, सवेरा होते ही हम चले जाएँगे।

बूढ़ा और प्रभावित हुआ। कहने लगा, यहाँ सोने में तुम्हें कष्ट होगा। तुम मेरे साथ चलो। मैं तुम्हें ऐसी जगह ठहराऊँगा जहाँ तुम आराम से सो सको। वहाँ से इस सारे बाग की सैर भी कर सकते हो। नूरुद्दीन ने पूछा, क्या यह बाग आप का है? उसने मुस्कुरा कर कहा, हाँ, यह मेरे बाप की जायदाद है। फिर उसने बाग की एक और आरामदह इमारत में उन्हें ठहराया जहाँ से सारा बाग दिखाई देता था। उसने उन्हें वहाँ की और भी इमारतें दिखाईं। फिर नूरुद्दीन ने रक्षक के हाथ में दो अशर्फियाँ रखीं और कहा कि इससे हम लोगों के लिए सुस्वाद भोजन मँगा दीजिए। बूढ़े ने सोचा कि बहुत अच्छा हुआ कि मैंने ऐसे धनी और सुसंस्कृत आदमी को नहीं मारा। इन अशर्फियों से तो बढ़िया से बढ़िया खाना लाने पर भी मेरे पास बहुत-कुछ बचा रहेगा। अतएव वह उन्हें बाग की बारहदरी में बिठा कर भोजन लाने चला गया। इधर नूरुद्दीन ने चाहा कि ऊपर जा कर सैर करे किंतु जा कर देखा कि जीने में ताला जड़ा था।

बाग का रक्षक भोजन लाया तो नूरुद्दीन ने कहा कि हम ऊपर जा कर भी देखना चाहते हैं, क्या आप हमें दिखा सकेंगे? दरोगा ने ताली निकाल कर ताला खोल दिया। वे दोनों ऊपर जा कर बहुत खुश हुए। नूरुद्दीन ने कहा कि आप कृपा कर के हम लोगों को यहीं सोने की अनुमति दे दीजिए।

उसने यह भी कहा कि आप भी हमारे साथ भोजन करें और यहीं आराम करें। बूढ़े ने सोचा कि आज खलीफा तो आनेवाले हैं नहीं, आनेवाले होते तो अब तक संदेश भिजवा देते। उसने यह भी सोचा कि ऐसे उदार आदमी की बात नहीं टालनी चाहिए। इसलिए वह न केवल उन्हें स्थान देने पर राजी हो गया अपितु उसने खलीफा के लिए रखे हुए जड़ाऊ बरतनों में उन्हें भोजन परोसा। सब लोग खाना खा कर हाथ धो चुके तो नूरुद्दीन ने कहा, कुछ पीने को भी मिल सकता है?

रक्षक ने कहा, मैं शरबत ला सकता हूँ लेकिन शरबत खाने के पहले पिया जाता है, बाद में नहीं। नूरुद्दीन बोला, आप ठीक कहते हैं लेकिन मेरा मतलब शरबत से नहीं था, अंगूरी शराब से था। उद्यान-रक्षक ने कहा, देखो इस्लाम में शराब हराम है। फिर मैं तो चार बार हज कर आया हूँ, मैं तो शराब पीना क्या उसे हाथ से भी नहीं छू सकता। बल्कि मैंने कभी शराब देखी भी नहीं है। नूरुद्दीन ने कहा, मैं एक तरकीब बताता हूँ। बाग की खाई के पास एक गधा बँधा है। उसे ले आइए। मैं रूमाल में एक अशर्फी बाँध कर उसकी पीठ पर रख दूँगा। आप उसे हाँकते हुए शराबखाने तक ले जाएँ और शराबखाने के मालिक को इशारे से अशर्फी दिखा दें। वह समझ जाएगा और अशर्फी ले कर शराब की मटकियाँ गधे पर लाद देगा। फिर आप गधे को यहाँ ले आएँ। यहाँ हम वे पात्र उतार लेंगे। आपको शराब छूने या मुँह से माँगने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।

बूढ़े को इसमें कोई बुरी बात नहीं दिखाई दी। उसने वही किया जो नूरुद्दीन ने कहा था। गधे के वापस आने पर नूरुद्दीन ने मटकियाँ गधे से उतार कर रखीं और बूढ़े से कहा, आपने हम लोगों पर बड़ी कृपा की है, अब थोड़ी और दया कीजिए। दो-तीन गिलास और शराब के साथ खाने के लिए कुछ फल ले आइए। बाग के रक्षक दारोगा ने यह चीजें भी ला कर दीं और साफ कपड़ा जमीन पर बिछा कर उस पर फल काट कर तश्तरियों में रख दिए और गिलास भी। यह कर के वह कुछ दूर जा बैठा ताकि कहीं यह लोग मुझ से भी मदिरा पान के लिए न कहें।

जब दोनों को शराब पी कर नशा आ गया तो नूरुद्दीन ने हुस्न अफरोज से कहा कि हम लोग कितने भाग्यवान हैं कि इस निपट अनजाने शहर में भी हमें ऐसी सुंदर जगह ठहरने को मिली है। फिर वे दोनों गाने लगे। उनका गाना सुन कर दारोगा खुश हुआ और कुछ पास आ कर गाना सुनने लगा। नूरुद्दीन ने उससे कहा, दारोगा साहब, आप बहुत अच्छे आदमी हैं। आप भी हमारे इस आनंद में शामिल हो जाएँ। मैं आपकी प्रशंसा में कसीदा सुनाऊँगा। दारोगा ने हँस कर कहा, आप दोनों के आनंद से मुझे काफी आनंद आ रहा है, अब और आनंद क्या चाहिए। यह कह कर वह फिर दूर जा बैठा।

हुस्न अफरोज ने नूरुद्दीन से कहा, आप कहें तो में इस बूढ़े कर्मकांडी को भी शराब पिला दूँ।

उसने कहा, ऐसा हो जाए तो बड़ा मजा आएगा। हुस्न अफरोज बोली, आप उसे बुला कर अपने हाथ से शराब का गिलास दें। वह पी ले तो ठीक है वरना आप खुद उस गिलास को पी कर चारपाई पर लेट कर सोने का बहाना करना। फिर देखो मैं इसे किस तरह राह पर लाती हूँ। नूरुद्दीन ने यह मान लिया।

नूरुद्दीन ने दारोगा को आवाज दे कर कहा, बुजुर्गवार, यह अच्छा नहीं लगता कि आप जीने में बैठे रहें और हम यहाँ चाँदनी का आनंद लें। हम कोई जबरदस्ती तो आपको पिला नहीं देंगे। आप कृपया यहाँ आ कर इस सुंदरी के बगल में बैठें। बूढ़ा यह सुन कर खुश तो हुआ कि ऐसी सुंदरी के पास बैठने को मिलेगा किंतु प्रकटतः नाक-भौं चढ़ाता हुआ आया और हुस्न अफरोज के बगल में बैठ गया। नूरुद्दीन ने इशारा किया तो हुस्न अफरोज ने सुंदर गाना आरंभ किया। गाना खत्म होने पर नूरुद्दीन ने एक गिलास भर कर दारोगा को दिया और कहा कि अगर आप गाने से खुश हैं और इसका इनाम देना चाहते हैं तो यह गिलास तो पी ही लें।

बूढ़े ने कहा, मैं पहले ही आपको अपनी मजबूरी बता चुका हूँ। वरना आपकी बात क्यों टालता? नूरुद्दीन ने कहा, जैसी आपकी इच्छा। यह कह कर वह गिलास को खुद पी गया। अब हुस्न अफरोज ने एक सेब के दो टुकड़े किए और एक टुकड़ा वृद्ध की ओर बढ़ा कर बोली, शराब नहीं पीते तो फल तो लीजिए, इसे खाने से तो धर्म नहीं रोकता। बूढ़े ने धन्यवाद सहित सेब ले लिया और उसे खाने लगा। हुस्न अफरोज ने फिर गाना शुरू किया। अब बूढ़े पर हुस्न अफरोज का जादू चढ़ने लगा था। नूरुद्दीन पलंग पर जा कर सोने का बहाना करने लगा।

गाना खत्म होने पर हुस्न अफरोज ने शिकायत के स्वर में बूढ़े से कहा, देखिए, इनकी कैसी बुरी आदत है। दो गिलास पी कर ही नींद की गोद में चले जाते हैं। मैं अकेली रह जाती हूँ। अब कृपया आप मुझे अकेला न छोड़ें, मेरे और पास आ कर बैठ जाएँ। बूढ़ा तो उसके नयन-शर से पहले ही बिंध चुका था, वह उसके पास जा बैठा। हुस्न अफरोज समझ गई कि अब इसे पिलाई जा सकती है। उसने शराब का एक गिलास भर कर उसकी ओर बढ़ा कर कहा, देखिए, आपको मेरे सिर की कसम है, इससे इनकार न कीजिए। इसके पीने से जो पाप आप पर पड़ेगा वह मैं अपने सिर लेती हूँ। यह कह कर उसने हाव-भाव के साथ गिलास उसके मुँह से लगा दिया। बूढ़ा उसे पी गया और बचा हुआ आधा सेब भी खा गया। हुस्न अफरोज ने दूसरा गिलास बढ़ाया तो उसने बगैर हिचके पी लिया। इसके बाद उसे नशा चढ़ा तो वह खुद अपने हाथ से भर-भर कर कई गिलास पी गया। इतने में नूरुद्दीन भी पलँग से उठ कर आया और मुस्कुरा कर बोला, बड़े मियाँ, तुम तो बड़े परहेजगार थे, अब क्या हो गया। बूढ़ा ठठा कर हँसा और कहने लगा, मैंने पी कहाँ है, यह तो तुम्हारी साथिन ने जबर्दस्ती मुझे पिलाई है। इसी तरह वे लोग हँसी-खुशी के साथ आधी रात तक बैठे-बैठे मदिरापान करते रहे।

जब दारोगा को काफी नशा चढ़ गया तो हुस्न अफरोज ने कहा कि अब अँधेरा डरावना लगता है, कहो तो शमादान (मोमबत्तियों के पात्र) जला दूँ। बूढ़े ने कहा, अच्छा, यही चाहती हो तो जला लो लेकिन दो-चार ही जलाना। किंतु हुस्न अफरोज ने वहाँ के सारे ही शमादान जला दिए।

बूढ़ा नशे में था और हुस्न अफरोज के सौंदर्य से मस्त भी। उससे हुस्न अफरोज ने पूछा, कहिए तो जीने के शमादान भी जला दूँ ताकि किसी आने-जानेवाले को कष्ट न हो। बूढ़े ने बगैर समझे-बूझे इस की भी अनुमति दे दी। वह इस समय हुस्न अफरोज की हर बात मानने को तैयार था।

खलीफा हारूँ रशीद उस दिन देर तक राज-काज में लगा रहा था। आधी रात को उसकी इच्छा हुई कि बाग में जा कर थकन मिटाए। महल से उसने देखा तो बाग की बारहदरी के ऊपर प्रकाश-पुंज दिखाई दिया क्योंकि हुस्न अफरोज ने सारे शमादान जला दिए थे। उसने अपने मंत्री जाफर से कहा, समझ में नहीं आता। मैं तो यहाँ हूँ, इस बाग की बारहदरी में रोशनी किसने करवाई है। जाफर की समझ में भी कुछ न आया लेकिन वह दिल का अच्छा आदमी था। बाग के दारोगा को बचाने के लिए झूठ बोल गया, बाग के दारोगा ने एक मानता मानी थी और कहा था कि यह पूरी होगी तो अपने मित्रों को दावत दूँगा। उसने आज दावत दी होगी।
 
खलीफा को इस बात पर विश्वास न हुआ, उसने खुद भी साधारण नागरिक के वस्त्र पहने और जाफर तथा अपने प्रधान अंगरक्षक मसरूर को भी पहनवाए और उन दोनों को ले कर चुपके से बाग की ओर चला। वहाँ जा कर देखा कि बाग का बाहरी द्वार खुला है। उसे दारोगा की असावधानी पर रोष हुआ और वह कहने लगा कि यह दरवाजा क्यों खुला है? जाफर इसका क्या जवाब देता। फिर खलीफा इन लोगों को बाग में बिठा कर खुद चुपचाप जीने पर चढ़ कर छत का तमाशा देखने लगा। उसने देखा कि एक अति सुंदर युवक के साथ एक अनिंद्य सुंदरी बैठी है और दारोगा शराब का गिलास उस स्त्री को देते हुए कह रहा है, हे परमसुंदरी, मैंने अभी जी भर कर तुम्हारा गाना नहीं सुना। एक गाना सुनाओ। इसके बाद मैं भी तुम्हें गाना सुनाऊँगा। किंतु वह स्त्री का गाना सुनने के बजाय खुद गाने लगा। स्पष्ट था कि उसे गाना नहीं आता था, यूँ ही रेंक रहा था।

खलीफा को यह देख कर आश्चर्य हुआ। उसने सोचा कि इस दारोगा को क्या हो गया, यह तो बड़ा सदाचारी था। वह चुपके से उतरा और मंत्री जाफर को साथ ला कर उसे इशारे से दिखाया कि यहाँ क्या हो रहा है। उसने कहा, सरकार, मैं तो कुछ समझ नहीं पाया। खलीफा ने कहा, मैं इन सब को कड़ा दंड दूँगा किंतु यदि इस सुंदरी ने अच्छा गाया तो क्षमा कर दूँगा। वे दोनों छुप कर सुनने लगे। बूढ़े ने कहा, कुछ ऐसा गाओ कि जी खुश हो जाए। हुस्न अफरोज बोली, यहाँ बाँसुरी होती तो मैं वह गाना सुनाती कि तुम भी याद करते। अगर मिल सके तो बाँसुरी लाओ।

बूढ़ा झूमता हुआ उठा और एक कोठरी खोल कर उसमें से बाँसुरी निकाल लाया। हुस्न अफरोज बाँसुरी बजाने लगी। खलीफा ने मंत्री से कहा, यह स्त्री तो बड़ी अच्छी बाँसुरी बजाती है। इस कारण मैंने इसका अपराध क्षमा किया और उसके कारण उसके साथी को भी। किंतु बूढ़े की हरकत प्रशासन की बात है और तुम्हारी जिम्मेदारी है, इसलिए तुम जरूर फाँसी पाओगे। मंत्री ने कहा, भगवान करता कि वह बुरा बजाती। खलीफा ने कहा, तुम यह बात क्यों कर रहे हो।

मंत्री बोला, अगर ऐसा होता तो यह दोनों मारे जाते और इन दोनों के साथ मरने में सुख मिलता। खलीफा इस चतुराई के उत्तर से हँस पड़ा।

हुस्न अफरोज ने बार-बारी से बाँसुरी और गले से वही राग निकाला तो खलीफा लोट-पोट हो गया। वह संगीत का अच्छा मर्मज्ञ था। उसने इस डर से कि जीने ही में कहीं उससे वाह-वाह न निकल जाए, मंत्री के साथ चुपचाप नीचे उतर आया और बोला, भाई, यह स्त्री तो गाने और बजाने दोनों में अद्वितीय है। हमारा दरबारी गवैया गाने- बजाने में विश्वविख्यात है किंतु इसके सामने वह अनाड़ी बच्चा मालूम होता है। मैं चाहता हूँ कि पास से जा कर इसका गायन-वादन सुनूँ किंतु मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि यह बात कैसे हो।

मंत्री ने कहा, आपकी बात बिल्कुल ठीक है। अगर आप उन लोगों के सामने गए तो दारोगा आपको इन साधारण वस्त्रों में भी पहचान लेगा और डर के मारे ही मर जाएगा। और यह दोनों भी आप के डर से गाना-बजाना भूल जाएँगे। खलीफा ने कुछ सोच कर कहा, तुम मसरूर के साथ बाग में बैठो। मैं बाहर जा रहा हूँ। मेरे लौटने तक प्रतीक्षा करो।

खलीफा ने बाग से निकलते ही देखा कि एक मछवाहा चार-पाँच बड़ी-बड़ी मछलियाँ ले कर नदी की ओर से आ रहा है। खलीफा ने उसे रोक कर कहा कि मुझे दो अच्छी मछलियाँ बेच दो। मछवाहे ने खलीफा को साधारण वस्त्रों में भी पहचान लिया और डर के मारे काँपने लगा। खलीफा ने कहा, तुम डरो नहीं। मैं तुम्हें अच्छा इनाम दूँगा। लेकिन तुम मेरे यह कपड़े पहन लो और अपने कपड़े मुझे दे दो और चुपचाप घर चले जाओ। उसने ऐसा ही किया। खलीफा उसके कपड़े पहन कर दो बड़ी मछलियाँ ले कर बाग में आ गया।

जाफर और मसरूर उसे इस वेश में देख कर पहचान न सके। मंत्री ने समझा कि यह मछवाहा बेवक्त कुछ इनाम माँगने आया है। उसने झिड़क कर उससे भाग जाने के लिए कहा। इस पर खलीफा खिलखिला कर हँस पड़ा। अब मंत्री ने गौर से देखा तो उसे पहचान गया और क्षमा माँगने लगा कि आपको पहचान न पाने पर ऐसी भूल हुई। उसने कहा, जब मैं ही इस वेश में आपको पहचान नहीं सका तो और कोई क्या पहचानेगा। अब आप बेधड़क बारहदरी की छत पर जाएँ और जी भर कर उस सुंदरी का गाना सुनें।

खलीफा मछवाहे के वेश में और दो मछलियाँ लिए हुए ऊपर गया और दरवाजा खटखटाया। दारोगा ने पूछा, कौन है? खलीफा ने दरवाजा खोल कर बहुत झुक कर सलाम किया ताकि पहचाना न जाए। फिर वह बोला, मैं करीम मछवाहा हूँ। मैंने सुना है कि आपने अपने मित्रों की दावत की है। इसलिए मैं आपकी सेवा में दो बहुत ही उत्तम मछलियाँ लाया हूँ ताकि आप मेहमानों को भली भाँति संतुष्ट कर सकें। दारोगा ने नशे में खलीफा को बिल्कुल न पहचाना और बोला, तुम मछवाहे हो या चोर? रात में इस तरह घूमते हो? खैर, यहाँ आओ और दिखाओ कि क्या लाए हो।

खलीफा मछलियाँ ले गया तो हुस्न अफरोज को वे पसंद आईं। उसने दारोगा से कहा कि इन्हें भुनवा दीजिए तो मजा आ जाए। दारोगा ने हुक्म दिया, करीम, फौरन बावरचीखाने में जाओ और यह मछलियाँ भून लाओ। खलीफा बोला, बहुत अच्छा सरकार। यह कह कर नीचे आया और जाफर और मसरूर से कहा कि इन मछलियों को साफ कर के भूनना है। जाफर पाक-शास्त्र में निपुण था। चुनांचे तीनों बावरचीखाने में गए और तेल, मसाला आदि ढूँढ़ कर मछलियों को साफ कर के उन्हें अच्छी तरह प्रकार से भूना। उन्होंने कुछ नींबू भी काट कर मछली के टुकड़ों के साथ थालियों में सजा दिए और उन्हें ऊपर ले गए। उन तीनों ने स्वाद ले ले कर मछलियाँ खाईं क्योंकि जाफर ने बहुत स्वादिष्ट मछलियाँ बनाई थीं। हुस्न अफरोज ने कहा, वास्तव में मैंने जीवन में ऐसी स्वादिष्ट मछलियाँ नहीं खाई थीं। नूरुद्दीन को भी मछलियाँ पसंद आईं। फिर हुस्न अफरोज की प्रशंसा से उस पर और असर पड़ा। उसने अशर्फियों की थैली निकाली और मछवाहा बने हुए खलीफा को दे कर कहा, देखो भाई, मेरे पास जो कुछ था वह सब मैंने तुम्हें दे डाला। काश, तुम मेरे पास पहले आए होते जब मैं वास्तव में इनाम देने की हालत में था। तब तुम देखते कि में किस तरह खुश होने पर इनाम दिया करता हूँ। अभी जो मिला है उसी से संतोष करो।

खलीफा ने थैली खोली तो देखा कि उसमें चौबीस अशर्फियाँ हैं। उसे आश्चर्य हुआ कि यह कौन ऐसा मनचला है कि पकी हुई मछलियों के लिए चौबीस अशर्फियाँ दिए डाल रहा है। उसने कहा, मालिक, भगवान आप को युगों-युगों तक कुशलतापूर्वक और प्रसन्नतापूर्वक रखे। मैंने अपने सारे जीवन में आप जैसा दानवीर नहीं देखा। अब आप नाराज न हों तो एक निवेदन करूँ। मैंने आपकी सुंदरी साथिन के पास बाँसुरी रखी देखी है। मालूम होता है कि इसे बाँसुरी बजाने का शौक है। मुझे भी संगीत सुनना बहुत अच्छा लगता है। आप आज्ञा दें तो मैं भी दो मिनट बैठ कर इनकी वादन कला देख लूँ और फिर आप लोगों को आशीर्वाद देता हुआ अपने घर चला जाऊँ।

नूरुद्दीन उदारता की धुन में तो था ही। उसने हुस्न अफरोज से कहा, चलो इस बेचारे को भी कुछ सुना दो। इसे कहाँ गाना-बजाना सुनने को मिलता होगा। हुस्न अफरोज पर भी शराब का नशा खूब चढ़ा था, साथ ही सुस्वादु मछलियाँ खा कर वह भी बहुत प्रसन्न थी। उसने सोचा कि मैं अपना पूरा कमाल दिखाऊँ। उसने बाँसुरी उठाई और एक साथ ही बाँसुरी और मुँह से एक ही राग इस कौशल के साथ निकाला कि दोनों में एक स्वर का भी अंतर नहीं था। खलीफा ने बहुत प्रशंसा की। फिर उसने खाली बाँसुरी पर एक बड़ा कठिन राग निकाला।

खलीफा ने जी खोल कर प्रशंसा की। उसने कहा, मालिक, मैंने ऐसी गुणवंती नारी कभी नहीं देखी। इनमें संगीत निपुणता भी है और अमृत जैसा कंठ भी। ऐसा गुणज्ञ संसार भर में कोई न होगा। आप धन्य हैं कि आपको ऐसी अनिंद्य सुंदरी और ऐसी गुणवंती साथिन मिली है।

नूरुद्दीन की आदत थी कि अगर कोई उसकी चीज की बहुत प्रशंसा करता था तो वह चीज उसी को दे देता था। हुस्न अफरोज उसकी दासी थी। उसने कहा, अगर यह नारी तुम्हें ऐसी ही पसंद है तो इसे ले जा सकते हो। मैंने इसे तुम्हें दे डाला। तुम संगीत मर्मज्ञ जान पड़ते हो, इसकी अच्छी कद्र करोगे।

हुस्न अफरोज को बड़ी परेशानी हुई कि ऐसे सुंदर मालिक के बजाय मछवाहे के साथ रहना पड़ेगा। नूरुद्दीन उठ कर चलने लगा था। हुस्न अफरोज ने आँसू भर कर कहा, मालिक, चलते-चलते मेरा एक और गीत तो सुनते जाओ। नूरुद्दीन रुक गया। हुस्न अफरोज ने छुप कर आँसू पोंछे और एक सद्यःरचित वियोग गीत गाने लगी जिसका अर्थ यह था कि मुझे अपने पास ही रखो, मछवाहे के हाथ में न दो। नूरुद्दीन ने उसका भाव तो समझ लिया किंतु वह विवश हो कर चुप बैठा रहा, दी हुई चीज के लिए कैसे कहता कि मैं इसे नहीं दूँगा।

खलीफा ने आश्चर्य से पूछा, यह स्त्री आपकी दासी है? उसके स्वर में सहानुभूति पाई तो नूरुद्दीन ठंडी साँस भर कर कहने लगा, करीम, तुम इतने पर क्या आश्चर्य करते हो। मेरी पूरी कहानी सुनो तो वास्तव में आश्चर्य में पड़ जाओगे। यह कह कर उसने सारा किस्सा उसे बताया।

मछवाहे बने हुए खलीफा ने कहा, अब आप कहाँ जाएँगे, क्या करेंगे? नूरुद्दीन ने कहा, जो भी भगवान चाहेगा वही होगा। खलीफा ने कहा, आप कहीं न जाएँ, वापस बसरा चले जाएँ। मैं वहाँ के हाकिम को एक छोटा-सा पत्र लिखे देता हूँ। वह जुबेनी को दे देना। इसके बाद तुम्हारे सारे दुख दूर हो जाएँगे।

नूरुद्दीन ठठा कर हँस पड़ा। बोला, भाई, तेरा दिमाग तो ठीक है? कहाँकहाँ राजा और कहाँ रंक।। जुबैनी तेरे पत्र पर क्या ध्यान देगा? खलीफा ने कहा, आप जानते नहीं। जुबैनी मेरा बचपन का साथी है। वह कई बार मुझे मंत्री बनाने के लिए बुला चुका है किंतु मैं उसका अहसान लेने के बजाय पैत्रिक धंधा करना पसंद करता हूँ। नूरुद्दीन इस पर पत्र लेने को तैयार हो गया। खलीफा ने कलम और कागज ले कर इस प्रकार का पत्र लिखा :

मैं मेहँदी का पुत्र खलीफा हारूँ रशीद अपने चचेरे भाई जुबैनी को, जो बसरा का हाकिम है, यह आदेश देता हूँ कि इस पत्र को देखते ही मंत्री खाकान के पुत्र नूरुद्दीन को, जिसके हाथों यह पत्र जा रहा है, अपनी जगह बसरा का हाकिम बनाओ और शासन की कुरसी पर बिठाओ। इस आज्ञा का रंचमात्र भी उल्लंघन नहीं होना चाहिए। यह लिख कर खलीफा ने पत्र बंद किया और जाफर को दिया। उसने चुपचाप खलीफा की मुहर उस पर लगा दी। फिर वह पत्र नूरुद्दीन को दे दिया।

यह ज्ञात रहे कि खलीफा जिस समय मछली भूनने गया था उसी समय उसने मसरूर से कहा था कि मेरे लिए राजमहल से राजसी पोशाक ले आना। वह पोशाक आ गई थी। खलीफा ने यह भी कहा था कि तुम जीने पर प्रतीक्षा करना और जब मैं जीने के दरवाजे पर हाथ मारूँ तो तुम सिपाहियों के साथ पोशाक ले कर छत पर आ जाना।

इधर बूढ़ा दारोगा नशे की हालत में यह सब देख रहा था। नूरुद्दीन जब पत्र ले कर गया तो हुस्न अफरोज भी उसके पीछे रोती हुई जीने के दरवाजे तक गई और फिर लौट आई। दारोगा ने खलीफा से कहा, करीम, तू एक-दो कौड़ी का मछवाहा है। तेरी दो मछलियों का मूल्य दो-चार आने से अधिक नहीं। इनके बदले में तूने इतनी अशर्फियाँ और ऐसी सुंदर और गुणवंती दासी पाई। तू यह सब अकेले हजम नहीं कर सकेगा। इनमें से आधा मुझे दे दे वरना मैं तुझे बड़ी मुसीबत में फँसा दूँगा। खलीफा ने कहा, मुझे थैली में नहीं मालूम अशर्फियाँ हैं या कुछ और। चलो जो भी होगा आधा-आधा बाँट लेंगे। लेकिन तुम इस लौंडी में हिस्सा पाने की आशा छोड़ दो। यह मुझे मिली है और मैं इसे अपने पास रखूँगा। अब इसमें चाहे आप खुश हों या नाखुश।

दारोगा नशे में तो था ही, तथाकथित मछवाहे की इस बात पर उसे इतना क्रोध आया कि उसने एक चीनी की तश्तरी फेंक कर खलीफा के सर पर मारी। खलीफा सिर टेढ़ा कर के चोट से बच गया और तश्तरी दीवार से टकरा कर टूट गई। दारोगा इस बात से और आगबबूला हुआ और रोशनी ले कर एक कोठरी में गया ताकि वहाँ से लकड़ी ला कर मछवाहे को मारे। इसी बीच खलीफा ने जीने के किवाड़ पर हाथ मारा। इस पर मसरूर और चार गुलाम छत पर आ गए। वहाँ एक छोटा सिंहासन भी पड़ा था। खलीफा राजसी वस्त्र पहन कर उस पर जा बैठा और उसके पीछे चारों गुलाम और बगल में एक ओर जाफर और दूसरी ओर मसरूर खड़े हो गए। बारहदरी की छत पर छोटा-मोटा दरबार लग गया।

उधर बूढ़ा एक मोटी लाठी ले कर आया और मछवाहे को ढूँढ़ने लगा। उसे मछवाहा न दिखाई दिया बल्कि खलीफा तख्त पर बैठा दिखाई दिया। वह आँखें मल-मल कर देखने लगा कि यह स्वप्न है या सत्य। कुछ क्षणों के बाद खलीफा बोला, बड़े मियाँ, क्या बात है? क्यों घबराहट में इधर-उधर देख रहे हो? अब बूढ़े ने पहचाना कि खलीफा ही मछवाहा बना हुआ था। वह उसके पाँवों पर गिर पड़ा और अपनी दाढ़ी खलीफा की जूतियों पर मल-मल कर अपने अपराध के लिए क्षमा माँगने लगा। खलीफा ने कहा, तुम्हारे एक नहीं, कई अपराध हैं। बाग को खुला छोड़ दिया, अजनबियों के साथ शराब पी, दूसरे को मिली चीज में हिस्सा बँटाने लगे और न मिलने पर मार-पीट पर उतारू हो गए। लेकिन मुझे तुम्हारे बुढ़ापे और तुम्हारे सारे जीवन के सदाचार का ख्याल है इसलिए मैं तुम्हारे सारे अपराध क्षमा करता हूँ। लेकिन आगे से होशियार रहना।

अब हुस्न अफरोज समझ गई कि यह बाग का मालिक स्वयं खलीफा है। उसे इस बात से बड़ा संतोष मिला कि किसी मछवाहे के हाथ नहीं दी गई। खलीफा ने उससे कहा, अब तो तुम्हें मालूम ही हो गया होगा कि मैं कौन हूँ। मैंने संसार भर में नूरुद्दीन से बढ़ कर बड़े दिलवाला कोई आदमी नहीं देखा जो केवल प्रशंसा करने पर अपनी सब से प्यारी चीज दे डाले। मैंने पत्र द्वारा उसे बसरा का हाकिम नियुक्त किया है। जब वह अपना काम सँभाल लेगा तो मैं तुम्हें भी उसके पास भेज दूँगा। तब तक तुम मेरे महल में रहोगी। यह सुन कर हुस्न अफरोज की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। खलीफा उसे ले कर महल में आया। दूसरे दिन उसने हुस्न अफरोज को अपनी रानी जुबैदा के हाथ में सौंपा और कहा कि इसका ख्याल रखना, यह बसरा के नए हाकिम नूरुद्दीन की स्त्री है और कुछ दिनों बाद इसे उसी के पास भेजना है।
 
इधर नूरुद्दीन एक जहाज में बैठ कर, जो उसी समय छूट रहा था, बसरा पहुँचा और अपने किसी मित्र या परिचित से मिले बगैर सीधे हाकिम जुबैनी के पास पहुँचा। वह उस समय मुकदमों के फैसले कर रहा था। नूरुद्दीन बेधड़क उसके पास पहुँचा और कहा, आपके पुराने मित्र ने यह पत्र आप के लिए दिया है। जुबैनी ने खलीफा की हस्तलिपि देख कर पत्र को चूमा और मंत्री सूएखाकान से उसे पढ़ने के लिए कहा। मंत्री ने पत्र देखा तो उसकी जान निकल गई। उसने प्रकाश में अच्छी तरह पत्र पढ़ने के बहाने बाहर आ कर खलीफा की मुहरवाला लिफाफे का भाग दाँतों से कुतर कर खा लिया। वापस दरबार में आ कर कहा कि इस पत्र में नूरुद्दीन को बसरा का हाकिम बनाने को लिखा है किंतु यह पत्र जाली मालूम होता है। उसने कहा, सरकार, मुझे ऐसा मालूम होता है कि नूरुद्दीन ने मुझसे और आपसे अपने अपमान का बदला लेने के लिए यह ढोंग रचा है। इसने खलीफा से हम लोगों की शिकायत जरूर की होगी किंतु खलीफा बच्चा तो है नहीं जो बहकावे में आ जाए। वह ज्यादा से ज्यादा यह लिखता कि इसे दंड न दो या कोई नौकरी दे दो। ऐसे निठल्ले आदमी को वह बसरे का हाकिम किस तरह बना देगा?

उसने यह भी कहा कि आप नूरुद्दीन को मेरे सुपुर्द कर दीजिए, मैं खोज कर के असल तथ्य का पता लगाऊँगा। जुबैनी भी क्यों आसानी से अपना पद देता। उसने सूएखाकान की बात मंजूर कर ली। सूएखाकान नूरुद्दीन को अपने भवन में लाया। वह उसकी जान का प्यासा हो ही रहा था। चुनांचे उसने नूरुद्दीन को इतना पिटवाया कि वह बेहोश हो कर गिर गया और मरने के समीप हो गया। फिर उसने उसे एक तंग कोठरी में बंद कर दिया और उस पर कड़ा पहरा बिठा दिया और आदेश दिया कि इसे दिन में सिर्फ एक बार कुछ रोटी के टुकड़े और पानी दिया जाए, इससे अधिक कुछ न दिया जाए।

नूरुद्दीन को होश आया तो देखा कि उसे एक सीली, दुर्गंधपूर्ण और ऐसी तंग कोठरी में बंद किया गया है जिसमें वह हिल-डुल भी नहीं सकता। उसे यह तो मालूम ही नहीं था कि जुबैनी के नाम पत्र में क्या लिखा था। वह रो-रो कर कहने लगा, वाह रे मछवाहे! मैंने तो तुझे अपना सब कुछ दे डाला। अशर्फियों के साथ अपनी प्राणों से भी प्यारी दासी भी दे डाली। और तूने मेरे इस उपकार का बदला इस प्रकार दिया। भगवान तुझे तेरी इस दुष्टता के लिए कभी क्षमा नहीं करेगा। मैं भी कैसा नादान हूँ कि उस मछवाहे के कहने में आ गया।

सूएखाकान ने नूरुद्दीन को छह दिन तक ऐसे ही कष्ट में रखा। वह चाहता तो था कि नूरुद्दीन का प्राणांत हो जाए किंतु उसकी हिम्मत उसे अपने घर में मारने की नहीं हो रही थी, वह उसे हाकिम ही से मृत्युदंड दिलाना चाहता था। सातवें दिन उसने अच्छी-अच्छी चीजों की टोकरियाँ नौकरों के सिर पर लदवाईं और जुबैनी के सामने पेश कीं। उसने पूछा यह क्या है, तो सूएखाकान ने कुटिलतापूर्वक कहा, यह बसरे के नए हाकिम ने आप के पास भेजा है ताकि इनके बदले आप उसे बसरे का हाकिम बनाएँ। इससे जुबैनी को बड़ा गुस्सा आया। उसने कहा, वह अभी जिंदा है? मैंने समझा था कि तुमने उसे मार डाला होगा। मंत्री ने कहा, मुझे किसी को प्राणदंड देने का अधिकार नहीं है। जुबैनी ने कहा, मैं आज्ञा देता हूँ कि तुम उसकी गर्दन उतारो। कमबख्त मुझसे मजाक करता है? सूएखाकान ने कहा, आपकी आज्ञा सिर-आँखों पर किंतु मैं चाहता हूँ कि वह सर्वसाधारण के सामने मारा जाए, तभी मैं उससे उस सार्वजनिक अपमान का बदला लूँगा जो उसने किया है।

जुबैनी ने मान लिया। शहर में मुनादी की गई कि कल नूरुद्दीन की, जिसने मंत्री का खुलेआम अपमान किया था, अमुक स्थान पर गरदन काटी जाएगी। सुएखाकान उसे अत्यंत अपमानपूर्वक अंधे, बेजीन के घोड़े पर बिठा कर वधस्थल पर लाया। नूरुद्दीन ने कहा, बुड्ढे खबीस, तू मुझ निर्दोष को झूठ और छल से अपमानपूर्वक मरवा रहा है। मगर याद रखना कि भगवान निर्दोष व्यक्ति का खून बहानेवाले आदमी को कभी क्षमा नहीं करता। सूएखाकान दाँत पीस कर बोला, दुष्ट, तू इस तरह से मेरा सब लोगों के सामने अपमान कर रहा है? खैर, इसकी सजा क्या दी जाए। तुझे तो सबसे बड़ी सजा मिलनेवाली है।

नूरुद्दीन को महल से लगे एक बड़े मैदान में पहुँचा दिया गया जहाँ लोगों को आम जनता के सामने मारा जाता था। जल्लाद ने कहा, मुझे आपके पिता का जमाना याद है। मैं आपका सेवक हूँ किंतु इस समय मेरा कर्तव्य आपको मारना है। आपकी कुछ अंतिम इच्छा हो तो कहें। नूरुद्दीन ने कहा कि मुझे पानी पीना है। जल्लाद ने एक आदमी से पानी मँगाया और नूरुद्दीन पीने लगा।

सूएखाकान जल्लाद पर बिगड़ने लगा कि देर क्यों कर रहा है, तुरंत ही इसकी गरदन क्यों नहीं काट देता। जो लोग वहाँ मौजूद थे वे मंत्री की कठोरता पर उसे बुरा-भला कहने लगे किंतु उस पर कुछ प्रभाव न हुआ। जल्लाद ने देखा कि मंत्री नाराज हो रहा है तो उसने तलवार निकाली। वह वार करना ही चाहता था कि जुबैनी ने महल की खिड़की से सिर निकाल कर कहा, अभी इसे न मारो। मुझे दिखाई देता है एक बड़ी फौज चली आ रही है, पहले मालूम तो हो कि यह क्या मामला है। सूएखाकान चाहता था कि नूरुद्दीन जल्दी से जल्दी मारा जाए। उसने कहा, यह धूल तो उन लोगों के आने से उठी है जो इस पापी के मारने का तमाशा देखने आ रहे हैं। आप जल्लाद को आज्ञा दें कि वह तुरंत अपना काम करें। जुबैनी बोला, नहीं, यह सेना ही है। अभी जल्लाद हाथ रोके रहे। मैं पहले पता तो लगाऊँ कि कौन आ रहा है।

हुआ यह था कि हुस्न अफरोज को अपनी मलिका के पास भेज कर खलीफा उसके और नूरुद्दीन के बारे में भूल गया था। दो-चार दिन बाद उसने अपने महल में एक दुखभरे गाने की आवाज सुनी।

उसे आश्चर्य हुआ कि इतना दुखी हो कर कौन गा रहा है। पुछवाया तो सेवकों ने बताया कि यह नूरुद्दीन की दासी है जिसे आपने आश्रय दिया था, वही नूरुद्दीन के वियोग में विरह-गीत गा रही है। मंत्री जाफर को बुला कर कहा, नूरुद्दीन के मामले में देर नहीं होनी चाहिए। तुम मेरी सनद और हुक्मनामा ले कर फौज के साथ खुद जाओ। अगर सूएखाकान ने दुरभिसंधि कर के नूरुद्दीन को मरवा डाला हो तो तुम फौरन उसे मरवा डालना। अगर नूरुद्दीन जिंदा हो तो तुरंत उसे और जुबैनी को मेरे पास ले आओ। मैं इस संबंध में सारे फरमान लिखवा कर देता हूँ।

नूरुद्दीन के सौभाग्य से जाफर ठीक उसी समय पहुँचा जब जल्लाद नूरुद्दीन को मारने ही वाला था। उसकी सेना नगर में आई तो लोगों ने सत्कारपूर्वक उसे रास्ता दिया। जाफर जुबैनी के दरबार में पहुँचा। जुबैनी उसके सम्मानार्थ अपने तख्त से उतर कर स्वागत के लिए दरवाजे तक आया। जाफर ने पूछा, नूरुद्दीन का क्या हाल है? उसे मरवा तो नहीं डाला? अगर वह जिंदा है तो उसे तुरंत मेरे सामने लाओ। नूरुद्दीन उसी तरह बँधा-बँधाया लाया गया। जाफर ने उसकी रस्सी खुलवाई और खलीफा का फरमान दिखा कर सूएखाकान को उसी रस्सी में बँधवाया।

जाफर उस दिन तो वहीं ठहरा। दूसरे दिन नूरुद्दीन, जुबैनी और बंदी अवस्था में सूएखाकान को ले कर बगदाद की ओर चल पड़ा। वहाँ पहुँचने पर उसने और जुबैनी ने खलीफा से सारी कहानी कही। खलीफा ने कहा, नूरुद्दीन, तुम पर भगवान की असीम कृपा है। जाफर को पहुँचने में थोड़ी भी देर हो जाती तो तुम मारे जाते। अब तुम अपने इस पुराने दुश्मन को अपने हाथ से मारो।

नूरुद्दीन ने खलीफा के सामने की भूमि को चूम कर कहा, सरकार, इसमें संदेह नहीं कि यह मेरा पुराना शत्रु है किंतु यह इतना बड़ा पापी है कि मैं इसके खून से अपने हाथ रँगना नहीं चाहता। आप मुझे इस बारे में माफी दें। खलीफा ने मुस्कुरा कर कहा, तुम सचमुच बड़े सुसंस्कृत आदमी हो। नहीं चाहते तो इसे न मारो। यह कह कर उसने जल्लाद को इशारा किया और जल्लाद ने तुरंत ही सूएखाकान का सिर उसके धड़ से अलग कर दिया। नूरुद्दीन को बसरा का हाकिम बनाने की बात पर वह बोला, सरकार, आप की बड़ी कृपा है किंतु मैं उस मनहूस शहर में नहीं जाना चाहता। मुझे अपने चरणों ही में रहने की अनुमति दीजिए।

खलीफा ने उसकी बात मान ली। उसे एक बड़ी जागीर और विशाल भवन दे कर अपना दरबारी बना लिया और हुस्न अफरोज को उसे दे दिया। खलीफा जुबैनी से भी नाराज था कि उसने पहली आज्ञा क्यों नहीं मानी। किंतु जाफर ने उसकी सिफारिश की कि इसी ने अंत समय में नूरुद्दीन की हत्या रुकवाई। अतएव खलीफा ने उसका पद उसे वापस दे दिया।

दुनियाजाद ने कहा, बहन, बहुत ही बढ़िया कहानी कही। तुम्हें तो बहुत अच्छी कहानियाँ आती हैं। कोई और कहानी कहो ना। बादशाह शहरयार ने भी अपने मौन द्वारा दुनियाजाद की बात का समर्थन किया और शहजाद ने अगली कहानी आरंभ कर दी।
 
बादशाह बद्र और शमंदाल की शहजादी की कहानी

शहरजाद ने कहा कि बादशाह सलामत, ईरान बहुत बड़ा देश है। पुराने जमाने में वहाँ बड़े शक्तिशाली और प्रतापी नरेश हुआ करते थे और उन्हें शहंशाह यानी बादशाहों का बादशाह कहा जाता था। उसी काल का वहाँ का एक बादशाह बद्र था। उसके पास अपार धन- दौलत और सैनिक शक्ति थी। उसके सौ पत्नियाँ और हजारों दासियाँ थीं किंतु उसे बड़ा दुख था कि उसके कोई पुत्र नहीं था। दूर-दूर के व्यापारी उसके लिए सुंदर दासियाँ लाते। वह उनसे पुत्र प्राप्ति की इच्छा से भोग करता। अपने देश के सिद्धों और तांत्रिकों से भी इस बारे में सहायता करने को कहा, हजारों कँगलों को धन का दान करता कि किसी के आशीर्वाद से पुत्र प्राप्ति हो। किंतु कोई उपाय सफल नहीं हो सका था और बादशाह की चिंता का अंत नहीं था।

एक दिन उसके एक सेवक ने आ कर बताया कि एक दूर देश का व्यापारी एक अति सुंदरी दासी ले कर बेचने के लिए आया है। बादशाह ने आज्ञा दी कि व्यापारी दासी को लाए। दूसरे दिन व्यापारी उस दासी को ले कर उपस्थित हुआ। बादशाह ने उससे पूछा कि तुम किस देश से दासी लाए हो। उसने कहा, मैं बहुत दूर देश की बाँदी लाया हूँ। आप उसकी सूरत देखेंगे तो यह पूछना भूल जाएँगे कि वह कहाँ की है। बादशाह ने कहा कि उसे दिखाते क्यों नहीं। व्यापारी ने कहा, मैं पहले आपकी अनुमति चाहता था। अभी मैंने उसे एक विश्वस्त दास को सौंप रखा है, आप कहें तो अभी ले आऊँ। बादशाह ने कहा कि फौरन लाओ।

व्यापारी ने ला कर दिखाया तो बादशाह ने देखा कि दासी वास्तव में अजीब-सी छटा बिखेर रही है। गौरवर्ण, कुंचित केशी, सुडौल शरीरवाली दासी थी जिसका चेहरा नकाब के अंदर से भी सौंदर्य की किरणें-सी बिखेर रहा था। बादशाह व्यापारी और दासी दोनों को अपने रंगमहल में ले गया। वहाँ पर दासी का नकाब उठा कर देखा तो उसके रूप की छवि से लगभग अचेत हो गया। जब थोड़ी देर में उसे पूर्ण चेत हुआ तो उसने व्यापारी से पूछा कि इस दासी का कितना मूल्य है। व्यापारी ने कहा, महाराज, इसे मैंने एक हजार अशर्फियों में मोल लिया था। इसे तीन वर्ष पहले लिया था। इस काल में इतना ही धन इसके भोजन, वस्त्र आदि पर व्यय हुआ। लेकिन मैं इसे यूँ ही आपको भेंट करने के लिए लाया हूँ अगर यह आपको पसंद हो।

बादशाह व्यापारी की विनयपूर्ण बातों से प्रसन्न हुआ। वह बोला, हम किसी से यूँ ही कोई वस्तु नहीं लेते। और जो चीज हमें पसंद आती है उसके दूने-चौगुने दाम भी दे देते हैं। यह दासी हमें बहुत पसंद है। हम इसके मूल्य के तौर पर तुम्हें दस हजार अशर्फियाँ देंगे। व्यापारी ने सिर झुका कर कई बार बादशाह को नमन किया और हजार अशर्फियों के दस तोड़े ले कर शाही महल से विदा हुआ। इधर बादशाह ने कई दासियों को बुला कर आज्ञा दी कि इसे हम्माम में ले जाओ और नहला-धुला कर अच्छे कपड़े पहनाओ।

सुघड़ परिचारिकाओं ने नई दासी को हम्माम में ले जा कर गरम पानी से भली भाँति नहलाया और जरी के काम के रत्नजटित वस्त्र पहनाए। परिचारिकाओं ने, जिन्हें बादशाह ने नई दासी के निमित्त नियुक्त किया था, उसके निखरे हुए रूप को देख कर आश्चर्य किया। उसे बादशाह के सामने ला कर उन्होंने कहा, इसे दो-चार दिन पूरा आराम दिया जाए और पौष्टिक भोजन दिया जाए तो इसका रूप और निखरेगा क्योंकि अभी इस पर लंबी यात्राओं की थकन बढ़ी होगी। तीन दिन बाद अगर आप इसे देखेंगे तो शायद पहचान भी न सकेंगे। बादशाह ने यह बात मान ली और कहा कि इसे तीन दिन के बाद ही रंगमहल में भेजा जाए।

बादशाह की राजधानी समुद्र तट पर थी और शाही महल का पिछवाड़ा बिल्कुल समुद्रतट के सामने पड़ता था। वह नई दासी अक्सर अपने कमरे के छज्जे पर बैठ जाती और एकटक समुद्र की लहरों के तट पर टकराने का तमाशा देखती थी। तीन दिन के बाद चौथे दिन भी उसी प्रकार वह समुद्र की ओर देख कर अपना मन बहला रही थी कि उसी समय परिचारिकाओं ने बादशाह से कहा कि अब नई दासी अपनी पूरी छवि में आ चुकी है। बादशाह उससे मिलने को इतना बेचैन हुआ कि उसे बुला भेजने के बजाय खुद उसके पास जा पहुँचा। पहले तो उसके आने की आहट से नई दासी ने यह समझा कि कोई परिचारिका आई होगी। किंतु जब कुछ क्षणों के बाद उसने बादशाह को देखा तो भी कुरसी से न उठी, न किसी और तरह सम्मान प्रदर्शित किया। बादशाह को इस पर बड़ा आश्चर्य हुआ। किंतु उसे क्रोध नहीं आया, उसने यह समझा कि यह इतनी उद्दंडता इसलिए दिखा रही है कि उसकी शिक्षा-दीक्षा नहीं हुई।

बादशाह के इशारे से परिचारिकाएँ हट गईं। बादशाह ने समीप जा कर उसके गले में हाथ डाला। दासी ने कोई आपत्ति नहीं की किंतु वह बोली-चाली भी नहीं। बादशाह उसे कमरे में ले गया। रतिक्रिया के बाद उसने दासी से कहा, मेरी प्राणप्यारी, तुम किस देश की निवासिनी हो और तुम्हारे माता-पिता का क्या नाम है। मेरे महल में सौ रानियाँ और कई हजार दासियाँ हैं किंतु उनमें से कोई एक भी सौंदर्य में तुम्हारे पास भी नहीं फटक पाती। मुझे तुमसे जितना प्रेम है उतना किसी रानी से भी नहीं है।

नई दासी इस पर भी चुप रही। बादशाह ने कहा, प्रिये, तुमने मेरी किसी बात का उत्तर नहीं दिया। कुछ तो बोलो ताकि मैं जैसे तुम्हारे सुंदर मुखमंडल से आनंदित होता हूँ वैसे ही तुम्हारे मीठे वचनों को सुन कर भी तृप्ति प्राप्त करूँ। तुमने तो मेरी ओर आँख उठा कर भी नहीं देखा जिससे मेरे नयन तृप्त होते। आखिर तुम्हें कौन-सी चिंता सता रही है जिसने तुम्हारी वाणी को अवरुद्ध कर दिया है। तुम मुझे अपनी व्यथा बताओ। अगर तुम अपने माँ-बाप को याद कर रही हो तो उनका मिलना तो असंभव है, हाँ इसके अतिरिक्त तुम जो कुछ भी चाहो उसे तुम्हारी सेवा में उपस्थित कर दिया जाएगा।

बादशाह ने उससे इस प्रकार की बहुत-सी बातें कहीं किंतु दासी मुँह नीचा किए भूमि की ओर ही देखती रही। बादशाह फिर भी उससे क्रुद्ध न हुआ। उसने परिचारिकाओं को आवाज दी और उनसे भोजन मँगवाया, वह स्वयं भी खाने लगा और अपने हाथ से स्वादिष्ट व्यंजनों के ग्रास नई दासी के मुख में देने लगा। वह खाती रही किंतु चुप ही रही। फिर बादशाह ने आज्ञा दी कि गायन-वादन और नृत्य का आयोजन किया जाए। इस पर भी वह चुप रही। बादशाह ने दासी की परिचारिकाओं से पूछा कि यह कभी बोलती भी है या नहीं, उन्होंने कहा कि किसी ने इसे बोलते क्या मुस्कुराते भी नहीं देखा। खैर, बादशाह ने रात भर उससे विहार किया और तय किया कि उसके अतिरिक्त किसी से संभोग न करेगा।

इस निर्णय के बाद बादशाह ने कुछ दासियों को सेवा कार्य के लिए रख कर बाकी दासियों और सभी रानियों को बुला कर उन्हें काफी धन दे कर स्वतंत्र कर दिया कि वे जहाँ चाहें जाएँ और जिस से चाहें विवाह करें। एक वर्ष तक वह प्रतीक्षा करता रहा कि नई दासी उससे कुछ बात करेगी। किंतु जब ऐसा न हुआ तो उसने विकल हो कर कहा, मेरी प्राणप्रिया, मुझे बड़ा दुख है कि तुम्हारे बारे में अभी तक कुछ पता नहीं चल सका है। मैं यह तक नहीं जान पाया कि तुम मेरे साथ रहने में प्रसन्न हो या अप्रसन्न। मैं तो तुम्हारे लिए कुछ उठा नहीं रखता हूँ। तुम्हारे पीछे मैंने अपनी सारी रानियों और दासियों को छोड़ दिया। कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम गूँगी हो। ऐसा हुआ तो यह ईश्वर का बड़ा अन्याय होगा कि ऐसा भुवन मोहन रूप दे कर अंदर ऐसा दोष पैदा कर दिया। अगर तुम गूँगी नहीं हो तो भगवान के लिए कुछ बोलो क्योंकि तुम्हारे चुप रहने से मैं बड़े कष्ट में रहता हूँ। मैं इस सारे वर्ष में भगवान से प्रार्थना करता रहा कि तुम्हारे पेट से मेरा कोई लड़का पैदा हो जो मेरे बाद राज-काज सँभाले क्योंकि मेरा बुढ़ापा आ रहा है और शारीरिक निर्बलता मेरे अंदर घर करती जा रही है। अगर तुम गूँगी नहीं हो तो मुझसे बातें करो। मैं और अधिक तुम्हारी चुप्पी नहीं सह सकता। तुम न बोलीं तो मैं जान दे दूँगा और मेरी हत्या का पाप तुम पर पड़ेगा।

वह सुंदरी यह सुन कर मुस्कुराई और बादशाह की ओर देखने लगी। वह भी समझ गया कि यह कुछ बोलेगी और उसकी बात की प्रतीक्षा करने लगा। कुछ देर बाद वह परम सुंदरी बोली, मुझे आप से बहुत-सी बातें कहनी हैं। मेरी समझ में नहीं आ रहा कि किस बात से आरंभ करूँ। आप ने इस सारे समय में मुझ पर इतनी दया की है और ऐसा मान दिया है जो वर्णन के बाहर है। मैं आपकी बड़ी आभारी हूँ और भगवान से प्रार्थना करती हूँ कि वह आप को सवा सौ बरस की आयु दे और आपके शत्रु आपके प्रताप से ऐसे नष्ट हो जाएँ जैसे दीपक से पतिंगे। आप को कभी कोई कष्ट न हो। एक शुभ समाचार मैं आप को यह देती हूँ कि आप से गर्भ रह गया है। मुझे पूरी आशा है कि मेरे बेटा ही पैदा होगा। इस बीच मुझ से जो कुछ अविनय हुआ इसके लिए मैं क्षमा माँगती हूँ। अभी तक मैं इसलिए नहीं बोली थी कि जबर्दस्ती यहाँ लाए जाने से मुझे बड़ा क्रोध चढ़ा था किंतु अब मैं आपसे जान से प्यार करने लगी हूँ।

बादशाह इतनी बात सुन कर खुशी से पागल हो गया। उसने उसे खींच कर सीने से लगा लिया और कहा कि गर्भ रहने का समाचार दे कर तुमने मेरे सारे दुख दूर कर दिए। यह कह कर बाहर आया और मंत्री को यह शुभ सूचना दे कर कहा कि फौरन एक लाख अशर्फियाँ गरीबों और भिखारियों में बँटवा दो, मेरे राज्य में कोई दीन-दुखी न रहे। इसके बाद वह फिर उस सुंदरी के पास आ कर बोला, माफ करना, मैं तुम्हारे गर्भ धारण के समाचार से इतना प्रसन्न हुआ कि सार्वजनिक दान की घोषणा में विलंब न कर सका। अब तुम यह बताओ कि तुम्हें ऐसी क्या नाराजगी थी कि तुम साल भर तक मुझ से या किसी से भी नहीं बोलीं। वह बोली, कारण यह था कि भगवान ने मुझे आपके पास दासी रूप में भेजा और अपने देश से इतनी दूर कर दिया कि कभी वहाँ जा ही न सकूँ। विशेषतः अपने माँ-बाप, भाई-बंधु आदि का बिछोह मुझे सता रहा था। आप जानते हैं कि परतंत्र हो कर जीने में कोई आनंद नहीं, इससे तो मौत ही अच्छी। बादशाह ने कहा, तुम्हारी बात ठीक है लेकिन जब कोई स्त्री तुम्हारी जैसी सुंदर हो और मेरे जैसे व्यक्ति के हृदय में घर कर ले तो फिर उसे परेशान होने की क्या जरूरत है। सुंदरी ने कहा, आप ठीक कहते हैं। आपकी बड़ी कृपा है, किंतु दासी फिर भी दासी है।

बादशाह ने कहा, तुम्हारी बातों से मालूम होता है कि तुम किसी बड़े घराने की संतान हो। मुझे विस्तार से बताओ कि तुम कहाँ की हो और तुम्हारे माँ-बाप कौन हैं।

वह बोली, मेरा नाम गुल अनार आसीन है। मेरा पिता आसनी नामी समुद्र का राजा था। मरते समय उसने अपना राज्य मेरी माता और मेरे भाई सालेह को सौंप दिया। मेरी माँ भी किसी समुद्री राजा की बेटी थीं। हम तीनों आनंद से समय बिता रहे थे कि हमारे राज्य पर एक अन्य राजा ने चढ़ाई कर दी और हमारा राज्य छीन लिया। मेरा भाई उसका मुकाबला न कर सका और मुझे और माँ को ले कर चुपके से राज्य से निकल गया। सुरक्षित स्थान पर पहुँच कर वह बोला कि हम पर विपत्ति पड़ी है और हमारी दुर्दशा हो गई है, भगवान चाहेगा तो मैं दुबारा अपने राज्य पर कब्जा करूँगा किंतु मैं चाहता हूँ कि इससे पहले तुम्हारे विवाह से छुट्टी पा जाऊँ और चूँकि किसी जल राज्य का कोई शहजादा तुम्हारे लायक नहीं है इसलिए मैं चाहता हूँ कि तुम्हारा विवाह किसी थल के राजा से कर दूँ और अपनी हैसियत के अनुसर काफी दहेज आदि दूँ।

मैं यह सुन कर बहुत बिगड़ी। मैंने उससे कहा कि देखो हम दोनों एक ही माँ-बाप की संतान हैं। मैं तुम्हारा हमेशा साथ देना चाहती हूँ बल्कि जरूरत हो तो तुम्हारे लिए जान भी दे सकती हूँ किंतु जब आज तक किसी जल देश की राजकुमारी का विवाह किसी स्थलवासी राजा के साथ नहीं हुआ तो मैं ही ऐसी कहाँ गिरी-पड़ी हूँ कि किसी थलवासी के गले मढ़ी जाऊँ। मेरे भाई ने कहा कि आखिर ऐसी क्या बात है कि तुम किसी थलवासी राजा से विवाह नहीं करना चाहतीं। क्या तुम समझती हो कि सारे थलवासी कमीने और दुष्ट होते हैं। ऐसी बात बिल्कुल नहीं है, उनमें भी बहुत-से भलेमानस होते हैं। इस प्रकार उसने मुझे बहुत समझाया। मैंने उससे बहस तो नहीं की किंतु मुझे क्रोध बहुत आया। मैंने मन में कहा कि यह लोग मुझे भारस्वरूप समझ रहे हैं इसलिए मुझे हटाना चाहते हैं, मैं खुद चली जाऊँगी।

अतएव एक दिन जब सब लोग अपने काम में व्यस्त थे मैं अवसर पा कर जल से निकल आई और एक टापू पर एक सुरक्षित स्थान तलाश कर के लेट गई और लेटते ही गहरी नींद में सो गई। किंतु मेरा अनुमान गलत था। एक धनी आदमी वहाँ आया और मुझे सोते देख कर अपने नौकरों से उठवा कर अपने विशाल मकान में ले गया। मुझे शयनकक्ष में ले जा कर उसने मुझसे बड़ा प्रेम दिखाया किंतु मैंने उसकी ओर से पूरी उदासीनता बरती। फिर उसने चाहा कि बलपूर्वक मेरा कौमार्य भंग करे। इस पर मैंने उसे उठा कर फेंक दिया। उसका क्रोध और ग्लानि से बुरा हाल हो गया। दूसरे ही दिन उसने एक व्यापारी को बुला कर मुझे उसके हाथ बेच डाला। वह व्यापारी बड़ा भला आदमी था। उसने मुझसे कभी कोई ऐसी-वैसी बात नहीं की। उससे मुझे आपने खरीद लिया।

यह कह कर गुल अनार बोली, मैं सारे थलवासियों से घृणा करती थी इसलिए आप से भी नहीं बोली। किंतु आपका सौहार्द देख कर मुझे आपसे घृणा भी न हुई। अगर आप मेरे साथ किसी प्रकार की जोर-जबर्दस्ती करते तो मैं समुद्र में कूद जाती और अपने कुटुंबी जनों से जा मिलती। मुझे एक ही भय था कि अगर मेरी माता और भाई को यह मालूम होगा कि मैं थल देश के किसी बादशाह के पास दासी के तौर पर रही हूँ तो वे लज्जावश मुझे जीता न छोड़ते। अब तो मैं आप के पुत्र की माँ बननेवाली हूँ। अब अगर कभी चाहूँ भी तो आप का आश्रय छोड़ कर कहीं नहीं जा सकती। मैं अपनी ओर से स्वयं को आपकी दासी समझती हूँ और आगे भी समझूँगी किंतु मेरी प्रार्थना है कि मेरे साथ जैसे अब तक रानियों जैसा व्यवहार किया गया है आयंदा भी वैसा ही किया जाता रहे।

बादशाह ने कहा, तुम्हारा सुंदर मुख देख कर ही मैं तुम्हारा दीवाना हो गया था, अब तुम्हारी सुमधुर बातें सुन कर और भी हो गया हूँ। यह सुन कर मेरी प्रसन्नता का ठिकाना न रहा कि तुम भी एक शहजादी हो। इससे पहले तुम समुद्र के एक देश की राजकुमारी थी और आज से तुम ईरान की मलिका हो। मैं आज ही दरबार में इस बात की घोषणा करूँगा और सारे देश में मुनादी करवा दूँगा। मैं अभी तक तुम से जितना प्यार करता था आगे उससे भी अधिक करूँगा। तुम भी मेरे अलावा किसी और आदमी का ध्यान भी न करना। लेकिन एक बात बताओ। तुमने कहा कि तुम जल की निवासिनी हो। मेरी समझ में यह नहीं आया कि तुम लोग पानी में डूबते क्यों नहीं हो। सुना तो पहले भी था कि जल के अंदर भी मनुष्य रहते हैं किंतु इस बात पर विश्वास नहीं कर सकता था। अब तुमने खुद कहा कि मैं जल की निवासिनी हूँ तो विश्वास करना पड़ा लेकिन समझ में अब तक नहीं आया कि यह बात संभव किस तरह है। आदमी किस तरह पानी के अंदर रह सकता है और किस तरह वहाँ काम-काज कर सकता है?

गुल अनार ने कहा, 'देखिए, पानी कितना ही गहरा हो किंतु आप उसकी तह तक देख सकते हैं। जैसे निगाह पर पानी रोक नहीं लगाता उसी प्रकार कुछ लोग पानी के अंदर रहते भी हैं। वैसे तो समुद्र के नीचे जहाँ हम लोग रहते हैं रात-दिन के बीच कोई अंतर नहीं दिखाई देता किंतु हम लोग पानी के अंदर से भी आसमान में चलनेवाले सूर्य तथा चंद्रमा और तारों को देख सकते हैं। जैसे धरती पर कई देश हैं और कई नगर बसे हुए हैं वैसे ही समुद्र की तलहटी में कई देश बसे हुए हैं जो अलग-अलग बादशाह के अंतर्गत हैं। बल्कि सच तो यह है कि पृथ्वी के ऊपर जितने देश हैं उसके तिगुने देश जल के नीचे आबाद हैं। यहाँ की तरह ही वहाँ भी मनुष्यों की कई जातियाँ हैं। हम लोगों के अच्छे-अच्छे भवन और राजमहल बड़े भव्य होते हैं। वे संगमरमर के बने होते हैं और उनकी दीवारों और छतों में सीप, मोती और मूँगे ही नहीं, तरह-तरह के बिल्लौर और रत्नादि जड़े होते हैं। पानी में पृथ्वी से अधिक रत्न पाए जाते हैं और मोती तो इतने बड़े होते हैं जिनकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते और न मैं आप को ठीक तरह बता ही सकती हूँ।

'जल निवासियों में हर व्यक्ति अपने लिए सुंदर भव्य महल बना लेता है। वहाँ आने-जाने के लिए गाड़ियों की जरूरत नहीं पड़ती, हर आदमी जितनी दूर चाहे बगैर थके जा सकता है। आम आदमी घोड़ा भी नहीं रखते, सिर्फ बादशाह लोग शोभायात्रा के लिए अपनी घुड़सालों में दरियाई घोड़े रखते हैं। जब वे जुलूस में निकलते हैं या कहीं तमाशा देखने जाते हैं तो इन दरियाई घोड़ों को विशेष रूप से बनाई हुई गाड़ियों में जोत देते हैं। गाड़ियाँ इतनी आरामदेह होती हैं और घोड़े इतने होशियार होते हैं कि सवार का शरीर भी नहीं हिलता और घोड़े इशारे भर से चलते हैं। हमारे देश की स्त्रियाँ बड़ी सुंदर, चतुर और पतिपरायण होती है।'

यह कह कर गुल अनार बोली, स्वामी, यदि आज्ञा हो तो मैं अपने भाई और माता को यहाँ बुला लूँ ताकि वे खुद अपनी आँखों से देखें कि उनकी बेटी अब ईरान की मलिका बन गई है। बादशाह ने कहा, मुझे उनका स्वागत करने में अति प्रसन्नता होगी किंतु मेरी यह समझ में नहीं आता कि तुम उन्हें कैसे बुलाओगी। तुम्हें तो यह भी नहीं मालूम कि तुम्हारे देश को कौन सा रास्ता जाता है। गुल अनार बोली, वह सब मुझ पर छोड़िए। आप सिर्फ कुछ देर के लिए बगलवाले भवन में बैठें और तमाशा देखें।
 
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