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एक दूसरे की बीबीयों के रसभरे होंठ

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मेरी बीबी मेरे दोस्त से चुदने की बात कह कर शायद उतनी ही उन्मादित हो रही थी, जितना मैं उसकी बात सुनकर हो रहा था। उसने कहा, “बस फिर तो राज मुझमें ऐसे जोर जोर से अपना लन्ड पेलने लगा की जैसे वह मुझे आखरी बार चोद रहा हो। मुझे भी आज इतना नशा चढ़ा हुआ था की मैं भी उसके साथ पूरी तरह अपनी चुदाई करवाने के लिए उछल उछल कर उसका लन्ड मेरी फुद्दी में उससे डलवा रही थी। हम दोनों चुदाई में इतने बदहोश हो कर कराह रहे थे की मुझे डर था की कहीं कोई सुन न ले। आज तो तुम्हारे दोस्त ने हद ही कर दी। वह मुझे ऐसे चोदता रहा ऐसे चोदता रहा की आज तो उसने मुझे भी थका दिया। बीच में मैंने उसे एकाध बार रोका भी, क्योंकि मैं बाथरूम जाना चाह रही थी।“

“मैं उठ खड़ी हुई और जब मैंने अपने ऊपर एक चद्दर डाली तो वह भी उसने निकाल दी। जैसे तैसे मैं नंगी ही बाथरूम की और भागी तो वह मेरे पीछे पीछे बाथरूम तक भी पहुँच गया। वह मेरे साथ बाथरूम के अंदर आना चाहता था। शायद वह मुझे पेशाब करते हुए देखना चाहता था। जब मैं उसे पीछे की और हटा ने लगी तब उसने मुझे बाथरूम के बाहर ही जकड लिया।

वहाँ भी मुझे आगे से नीचे की और झुका कर जैसे वह मुझे पीछे से चोदना चाहता था। हाय माँ! उसका लन्ड कड़क खड़ा लहराता देख कर में शर्म से मर रही थी की क्या करूँ। बड़ी मुश्किल से मैंने अपने आपको उससे छुड़ाया और उसे बाथरूम के दरवाजे पर ही रोका और तब मैं बाथरूम गयी।“

मेरी प्यारी बीबी मेरे दोस्त के साथ अपनी काम क्रीड़ा की कहानी सुनाते सुनाते शर्म से लाल हो रही थी। पर मैं भी तो पूरी कहानी सुनने पर अड़ा हुआ था। एक गहरी सांस ले कर रुखसार फिर से बोलने लगी, “पर पेशाब कर लेने के बाद मैंने जब दरवाजा खोला तो वह वहीँ खड़ा था। उसने मुझे उसी हालात में अपनी बाहों में उठा लिया और फिर मुझे बिस्तर पर लिटा कर मेरे पर चढ़ गया और मेरे पाँव अपने कन्धों पर रखवा कर तुम्हारे दोस्त ने मुझे दुबारा चोदना शुरू किया।” पता नहीं पर शायद आधे घंटे तक हम चुदाई करते रहे। बीच में मैं तो दो बार झड़ चुकी थी। आखिर में एक जोर सी कराह देते हुए उसने अपना पूरा वीर्य मेरी फुद्दी में उंडेल दिया। उसने इतना अपना माल छोड़ा की एक बार तो मैं डर ही गयी की मैं कहीं उस से गर्भवती न बन जाऊं।”

फिर थोड़ा रुक कर वह बोली, “खैर, ऐसा कुछ भी नहीं होगा क्योंकि मैं गोलियां ले रही हूँ। जानूँ, तुमने मुझे एक तरह से पागल बना दिया है। आज तक मैं चुदाई में इतना उन्मादित नहीं हुई जितना तुम दोनों ने मिलकर मुझे बना दिया है। अब जब तुम या राज मुझे चोदते हो तो मुझे क्या होता है पता नहीं, पर मेरे पुरे बदन में ऐसा नशा फ़ैल जता है की मेरे हर अंग में बिजली की तरह झटके लगने लगते है। मैं उसका वर्णन करने में असमर्थ हूँ।”

राज द्वारा मेरी बीबी की चुदाई की कहानी मुझे पागल कर रही थी। मैंने भी रुखसार की फुद्दी पर मेरा कड़ा लन्ड रगड़ा। रुखसार उसकी फुद्दी पर मेरे लन्ड की रगड़ से उन्मादित हो रही थी। एक तो राज से चुदाई की यादेँ और बातें, ऊपर से मेरे से चुदाई की तैयारी दोनों और की मार से जैसे वह इतनी उत्तेजित हो रही थी की जैसे मैंने उसे पहले नहीं देखा।

मैंने एक ही धक्के में मेरा पूरा लन्ड मेरी बीबी की फुद्दी में घुसेड़ दिया। एकदम लन्ड घुसने से रुखसार को थोड़ा कष्ट हुआ और वह धीमे आवाज में “हाय रे” बोल पड़ी। जब मैंने धीरे से अपनी रफ़्तार बढ़ाई तो रुखसार कामुक आवाज में कराहने लगी। उसकी कामुक कराहट मेरी उत्तेजना को और भड़का रही थी। रुखसार भी धीरे धीरे मेरा साथ देने लगी। मैं उसे चोदता रहा और उतनी ही फुर्ती से रुखसार भी मेरे धक्के के मुकाबले मुझे ऊपर धक्के मारती रही।

उस रात मेरी बीबी मेरे साथ तीन बार झड़ गयी। दिन में राज के साथ वह कितनी बार झड़ गयी थी वह पता नहीं।

 
आगे की कहानी डॉली की जुबानी………………..

मैं बचपन से ही पढाई में गंभीर थी और खेलों में भी सक्रीय थी। मेरी मम्मी पहले से ही मुझे और मेरी छोटी बहन को यह सीख देती आ रही थी की यदि हमने पढाई में ध्यान नहीं दिया तो हमें आगे चलकर बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। मेरी मम्मी भी अपने स्कूली जीवन में एक खेलाड़ी थी। वह लड़कियों के शारीरिक खेल जैसे कबड्डी, फुटबॉल इत्यादि में जिला चैंपियन रह चुकी थी।

मरे स्कूल और कॉलेज में भी मैं पढ़ाई एवं खेल में सब लड़कियों में आगे रहती थी। यही कारण था की कॉलेज में मैं एक अल्हड लड़की मानी जाती थी। दिखने में मैं सुन्दर तो थी ही। मेरी मम्मी कश्मीर से थी और पप्पा पंजाबी थे। तो मुझे माँ की सुंदरता और नजाकत और पप्पा की शारीरिक विशेषताएं और लंबाई वंशानुगत रूप में मिली थी। हमारी यूनिवर्सिटी में मैं मिस यूनवर्सिटी भी चुनी गयी थी।

मेरे कॉलेज में बहुत सारे लड़के मेरे दीवाने थे। पर मैं उनकी और देखती भी नहीं थी। माँ कहती थी की लड़कियों को अपना चरित्र सम्हालना पड़ता है। पर जब मैंने पहली बार राज को देखा तो जैसे मेरे पॉँव ढीले पड़ गए। राज न सिर्फ लंबा, गठीले शरीर वाला, फुर्तीला और आकर्षक था, पर उसमें कुछ ऐसी बात थी जो और लड़कों में नहीं थी। कॉलेज में वह मुझसे तीन साल आगे था।

हमारी मुलाकात पहली बार कॉलेज में चर्चा स्पर्धा में हुई। चर्चा स्पर्धा का विषय था “जब पडोशी देशों के बीच यदि कड़ी मत भिन्नता हो और उन दोनों में से एक देश बार बार यदि संघर्ष पर उतारू होता है, तो दूसरे देश के लिए क्या युद्ध ही एक मात्र समाधान रहता है?”

विषय गंभीर था। हम दोनों प्रतिद्वंद्वी थे। चर्चा स्पर्धा में लड़कों में वह प्रथम आया और लड़कियों में मैं। तब फिर हमारे बीच स्पर्धा हुई। उसमें मैंने उसे जब पराजित कर दिया तो नासमीर होने के बजाय सबसे ज्यादा तालियां उसने बजायी और सब उपस्थित लोगों के सामने यह माना की मेरे तर्क वितर्क उससे कहीं ज्यादा सटीक और सही थे। मुझे पदक जितने से उतनी ख़ुशी नहीं हुई जीतनी के राज की सराहना से। उसने मुझे पहली मुलाकात में ही अपनी सरलता और विनम्रता से जित लिया।

फिर तो हमारी मुलाक़ात नियमित रूप से होने लगी। पढाई में भी वह आगे रहता था। धीरे धीरे हमारी करीबियां बढती गई। एक बार जब मुझे वह अपनी बाइक पर छोड़ने आया तब मैंने उसे अपने घर के अंदर बुलाया और मम्मी पप्पा से भी मिलाया। उस समय तक मेरे मनमें राज के प्रति एक दोस्त के अनुरूप ही भाव था।

राज ने ग्रेजुएशन के बाद मास्टर्स भी उसी कॉलेज में किया और हमारी मुलाकातों का दौर जारी रहा. पढाई में भी मैं उससे कभी कभी सहायता लेने लगी। मैंने अनुभव किया की धीरे धीरे राज को मेरी और शारीरिक आकर्षण हो रहा था। खैर मैं भी उसकी और आकर्षित हो रही थी, पर वह मुझसे शारीरिक स्पर्श करने के लिये बड़ा उत्सुक रहता था। हम जब साथ साथ बैठते थे तो वह मुझसे सटकर बैठता था। कई बार वह मेरे शरीर को जैसे अनजाने में ही छू लिया हो ऐसे छूता था। मुझे वह अच्छा लगने लगा पर साथ साथ में यह भी डर लग रहा था की कहीं वह और आगे न बढे।

मैं यह मानूँगी की मेरे बदन में भी कुछ ज्यादा ही रोमांच और उत्तेजना के भाव पनप रहे थे। पर माँ की सीख थी की लड़कों के साथ हमें बड़ा सतर्क रहना पड़ेगा की कहीं वह हमारे गुप्त अंगों को छूने या उनसे खेलने की कोशिश न करे। मैं ऐसी परिस्थिति में या तो उठ खड़ी हो जाती या फिर बात को पलट कर वहां से खिसक जाती। पर जब मैं उसके चेहरे पर निराशा के भाव देखती तो मुझे भी बुरा लगता था। जब मैं लड़की हो कर उत्तेजना अनुभव कर रहीथी तो वह तो लड़का था। उसे ज्यादा उत्तेजना होना स्वाभाविक था यह मैं भलीभांति समझती थी।

और इसी कारण कई बार मैं अपने दिमाग और मन के संघर्ष में फंस जाती थी और राज के कामुकता पूर्ण स्पर्श का विरोध नहीं कर पाती थी। राज ने कई बार मेरी छाती पर हाथ रखा और मेरे स्तनों को मेरे कुर्ते के ऊपर से मसला भी। पर मैंने उसे इससे आगे नहीं बढ़ने दिया। वह मेरे स्तनों को देखना चाहता था। मैं उसे छूने देती थी पर कुर्ती के ऊपर से ही। हम लोग कई बार पार्क मैं बैठ बातें करते और एक दूसरे के हाथोँ में हाथ डाले घूमते थे। राज ने कई बार मेरा हाथ अपने पाँवोँ के बीच में रखने की कोशिश की और मैं उसे झटका कर हटा देती थी। पर उसके चेहरे की निराशा देख मुझे बुरा भी लगता था।

एक बार जब एक दिन हमारे ग्रुप ने (जिसमे राज भी था) पिकनिक का प्रोग्राम बनाया। हम सब शहर से करीब बिस किलोमीटर दूर एक बड़ा पार्क था वहां पिकनिक मनाने गए। वह बहुत बड़ा था और उसमें झरने, घना वन और छोटी पहाड़ियां होने के कारण बड़ा मनोरम्य था। सारे कॉलेज, स्कूल और ऑफिस चालू होने के कारण पार्क खाली था और हमें ऐसे लग रहा था जैसे सारा पार्क ही हमारा था। राज ने तब सुझाव दिया की हम सब वह छोटे पहाड़ पर चढ़ कर वापस आएं। ज्यादातर लड़के लड़कियां तो डांस और संगीत में मस्त थे और नहीं आये। पर मैं, राज और एक और लड़का और दो लड़कियां साथ में चल पड़ी। थोड़ा चलने के बाद एक तीखी चढ़ाई जब आयी तो लड़कियां थक गयीं और वापस चली गयीं ।

राज काफी फुर्ती दिखाते हुए आगे निकल गए। वह मुझे आगे बढ़ने का बारबार प्रोत्साहन दे रहे थे। अपने आपको कैसे सम्हाला जाये और कैसे संतुलन बनाया जाये उसके बारें में भी राज दूरसे ही चिल्ला कर कहते जा रहे थे। रास्ता कठिन था। बीच बीच में पत्थर पर पाँव रखने पर पाँव फिसल भी जाते थे। पर राज हमेशां मुझे देखते रहे थे की कहीं मैं गिर न जाऊं या मुझे कोई चोट न पहुंचे। हमारे साथ में एक और लड़का था वह थक गया था और एक झरने के पास बैठ अपने पाँव धोने लगा। उसने हमें कहा की वह थोड़ा आराम कर वापस चला जायगा। राज पर शिखर तक जाने की धुन सवार थी और मैं भी बीच रास्ते से वापस जाने के मूड में नहीं थी।

राज मुझसे काफी आगे पहाड़ी के ऊपर चढ़ चूका था। और ऊपर खड़ा होकर मुझे चढ़ते हुए देख रहा था। वह बार बार मुझे, “बहोत अच्छे, शाबाश। अब तो हम बस पहुँच ने वाले ही हैं।” इत्यादि बोल कर मेरा हौसला बढ़ा रहे थे और मुझे आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित कर रहे थे। मुझे राज की यह बात बहुत भायी। राज की बातों में अपना पन था। वह मुझे अकेला छोड़ना नहीं चाहते थे। उस समय उनकी नजर में कोई लोलुपता नहीं बल्कि उनका व्यवहार एक लीडर अपने सहयोगी को कैसे मार्गदर्शन करता है उसका उत्साह बढ़ाता है वैसा ही था।

तब अचानक मेरा पाँव एक पत्थर पर पड़ा और मैं फिसल गयी और पहाड़ी से नीचे गिरने लगी। जब राज ने मुझे गिरते हुए देखा तो वह कूद पड़े और मुझे पकड़ने के लिए पथरीले ढलाव पर उन्होंने फिसलना शुरू किया और देखते ही देखते वह मेरे पास आ गए और उसने मुझे बांहों से पकड़ कर थाम लिया और नीचे खाई में गिरने से बचा लिया। मैंने देखा की ढलाव पर फिसलने से उनके कपडे फट गए थे और उनके पॉँव और हाथ छिल गए थे। उनके हाथ और पाँव से खून बह रहा था। थोड़ी मामूली सी चोट मुझे भी आयी थी, पर मैं ठीक थी। मैंने अपने सलवार को फाड़ कर राज के घाव पर पट्टी बाँध दी और राज को अपनी बाहों में लेकर मैं एक पेड़ के नीचे बैठ गयी। हम दोनों श्रम से हांफ रहे थे और पसीने से तर थे।

 
मैं काफी डरी हुई थी। मैं राज से लिपट गयी और उनकी छाती पर अपना सर रख कर रोने लगी। राज मुझे सहलाने लगे और मेरे आंसू पोंछने लगे। उनका मेरे बदन पर हाथ फिराना मुझे अच्छा लग रहा था। राज के करीबी बदन से बदन लिपट ने से मेरे बदन में एक अजीब सा रोमांच होने लगा। इसके पहले भी कई बार मुझे राज को देख मनमें एक अजीब सी टीस का अनुभव होता था। पर उस समय जबकि मैं राज की बाहों में थी और राजने मुझे बचाने के लिए अपनी जान का जोखिम उठाया था तब मुझे राज का बड़े प्यार से मेरे बदन पर हाथ फिराना अत्यंत उत्तेजित कर रहा था।

मैं एक छोटी बच्ची की तरह थोड़ा पलट कर राज की गोद में लेट गयी और उनके एक हाथ की उँगलियों के साथ प्यार से खेलने लगी। राज दूसरे हाथ से मेरे बालोंमें, मेरे सिर पर, गाल पर और नाक पर अपना दुसरा हाथ फेर रहे थे की अचानक उनके हाथ मेरे स्तन पर जा टिके।

वह थोड़ा हिचकिचाने लगा। उसे लगा की शायद मुझे अच्छा नहीं लगेगा, तो फिर उसने धीरे से मेरे स्तनों के पास हाथ रखकर मेरे कान में फुसफुसाते हुआ पूछा, “क्या मैं इनको छू सकता हूँ?” मैंने बिना बोले ही फुर्ती से अपना सर हिला कर उसे इजाजत दे दी।

फिर क्या था? राज के हाथ मेरे स्तनों को दबाने, महसूस करने और अंदर उंगली डाल कर मेरे स्तनों की नरमाई को अनुभव करने में लग गए।

मैंने अपना सर ऊपर उठाया एक हाथ से उनके सर को पकड़ कर नीचे की और झुकाया। और अनायास ही मेरे होंठ उनके होंठ से जा मिले। उसने मुझे अपनी बाँहों में कस के पकड़ लिया और हम दोनों एक दूसरे से गहरे चुम्बन में बंध गए। राज ने मेरे मुंह में अपनी जीभ डाली और मेरा रस राज चूसने लगा। मैं अपने आप पर नियंत्रण नहीं रख पा रहीथी। मेर लाख रोकने पर भी मेरा मन मेरे काबू से बाहर हो गया। जब राज ने अपना हाथ मेरे कुर्ते में डाला तो मैं उसे रोकने के बजाय उसकी सहायता करने लगी।

राज ने मेरे कुर्ते के बटन खोल डाले और अंदर की ब्रा को ऊपर उठाकर मेरे स्तनों को चूमने लगा। मुझे इतनी उत्तेजना और रोमांच का अनुभव हो रहा था, की माँ की इतनी सारी हिदायतों के बावजूद भी मै राज से अपनी चूचियों को चुस्वाने के लिए बड़ी उत्सुक हो रही थी। पता नहीं मुझ पर क्या भूत सवार हो गया था।

राज ने तब मुझे रोका और कहने लगे, “डॉली, मैं एक जरुरी बात आप से कहना चाहता हूँ। मैं सच्चे दिलसे आपको चाहने लगा हूँ। मैं आपको अपनी बनाना चाहता हूँ। पर यहां मुझे एक बात आपको जरूर कहनी होगी। देखो डॉली, मैं स्वभाव से ही ज्यादा सेक्सी हूँ। मुझे सेक्स की बड़ी भूख है। मैं तुम्हारे सामने यह कबुल करता हूँ की मैंने कुछ लड़कियों से सेक्स भी किया है। यह मेरी कमजोरी है और मैं उसे आपसे छुपाना नहीं चाहता। और हाँ, हो सकता है की आगे चलकर कभी मैं तुम्हारे अलावा कोई और लड़की से सेक्स कर बैठूं तो क्या तुम मुझे धोखेबाज समझकर छोड़ तो नहीं दोगी?”

अरे! आग तो दोनों और बराबर लगी हुई थी। मैं भी राज को सच्चे मन से चाहने लगी थी। मैं जानती थी की राज एक कासानोवा की तरह था। वह रंगीला और सेक्स का भूखा था। कॉलेज की सारी लडकियां उसपर मरती थीं। मैं यह भी जानती थी की कइ लड़कियों से राज ने सेक्स भी किया होगा क्योंकि लडकियां राज को बड़ी आसानी से अपना बदन समर्पित करने के लिए लालायित रहती थीं। पर सब लड़कियों की यही शिकायत थी की राज ने उनमें से किसीसे भी प्यार का इजहार तो क्या, उन्हें अपनी गर्ल फ्रेंड कहलाने को भी मना कर दिया था। पर लडकियां थीं की फिर भी राज को अपना बदन समर्पित करने तैयार रहती थी।

राज ने पहली बार किसी लड़की से चाहने की बात कही थी। मैं मना कैसे करती? मैं खुद उस समय राज के लिए उत्कट, उन्माद पूर्ण प्यार और अनियंत्रित सेक्स की कामना से मरी जा रही थी। फिर भी मैंने अपने आप पर नियत्रण रखते हुए कहा की, “राज अगर तुम मुझे सच्चे दिल से प्रेम करते रहोगे और मुझसे कोई भी बात नहीं छुपाओगे तो मैं तुम्हें कभी नहीं छोडूंगी।”

बस मैं इतना ही कह पायी क्योंकि राज ने मुझे तुरंत एक ही झटके में कस के जकड लिया और बार मेरे होठों को चूमने लगा। उसने मेरा कुरता निकाल दिया और मेरे बड़े बड़े स्तनों को चूमने और चूसने लगा। मुझ वह ऐसा आनंद दे रहा था जिसका वर्णन मैं कर नहीं सकती।

मैंने अपने आप को उसके हवाले कर दिया। मैं न सिर्फ उसका अवरोध नहीं कर पा रही थी, बल्कि उसके जातीयता भरे कामुक क्रीड़ालाप में मैं उसका साथ दे रही थी। मैं उसके मुंह की लार के लिए तरस रही थी। राज ने प्यार से मेरी डेनिम की शॉर्ट्स की ज़िप खोल दी और अपना हाथ अंदर डाल कर उसने मेरी पैंटी को नीचे सरका दिया और मेरी योनि में उंगली डाल कर मुझे उकसाने लगा। मैंने अपनी जिंदगी में पहली बार किसी मर्द का हाथ मेरे गुप्तांगो पर महसूस किया और उसकी उत्तेजना और उन्माद मुझे पागल कर रहा था।

उस दिन तक कभी भी मैंने यह सोचा नहीं था की मैं शादी से पहले किसी मर्द को अपने गुप्तांगो छूने भी दूंगी। एक मर्द का हाथ योनि के ऊपर और अंदर जानेसे क्या होता है वोह मैं उस दिन तक नहीं जानतो थी। जातीयता का उन्माद और उत्तेजना मेरे लिए तब तक या तो किताबों में लिखी हुई रोमांचक गाथाएँ थीं या फिर एक युवा लड़की को स्त्री पुरुष के मिलन की मधुर कल्पनाएँ। राज के उंगली डाल मेरी योनि के अंदर बाहर करनेसे मुझे क्या अनुभूति हो रही थी, उसका वर्णन करना मेरे लिए मुश्किल है।

 
मैं कामान्ध हो चुकी थी और मेरे मनमें राज का पुरुष लिंग देखने की इच्छा हुई और अनायास ही मेरा हाथ उसकी टांगों के बीच चला गया।

तब तक मैंने कोई भी वयस्क पुरुष का लिंग नहीं देखा था। हाँ मैंने सहेलियों को यह कहते हुए सुना था की पुरुष का लिंग बड़ा हो तो उसे स्त्री को अपनी योनि में डालने में बड़ा मझा आता है। जैसे ही मैंने राज की टांगो के बीच में हाथ डाला तो राज ने उसे वहीँ पकड़ लिया। मेरी और देखकर उसने प्यार से पूछा, “क्या तुम मेरे लन्ड को देखना चाहोगी?”

मुझे तब पता चला की पुरुष के लिंग को लन्ड कहते हैं। हालांकि मैंने कई बार कई आदमियों को “लौड़ा, लन्ड” इत्यादि बोलते हुए सुनाथा, पर मैं उसका अर्थ ठीक ठीक समझ नहीं पायी थी। मैंने राज के सवाल का जवाब नहीं दिया।

राज ने मरे मौन को मेरी स्वीकृति मान कर फट से अपने पतलून की बेल्ट और ज़िप खोल दी और अपने पतलून और जांघिये को नीचे की और सरका कर अपने लन्ड को मेरी आँखों के सामने प्रस्तुत किया। राज ने मेरा हाथ पकड़ कर उसके लन्ड के ऊपर रख दिया। मैंने अनजाने में ही उसके लन्ड को सहलाना शुरू कर दिया। मैंने कोई भी पुरुष का लन्ड तब तक नहीं देखा था। हाँ छोटे छोटे नंगे बच्चों का छोटा सा लिंग जरूर देखा था। पुरुष का लन्ड इतना बड़ा हो सकता है, यह देख कर मैं घबड़ा सी गयी। मेरी अनुभवी सहेलियां कहती थीं की जब पुरुष अपना लन्ड स्त्री की योनि में घुसाता है तो स्त्री को एक अद्भुत अनुभव होता है। पर राज का इतना बड़ा लन्ड मेरी योनि मैं में कैसे घुसेगा यह सोचकर मैं काँपने लगी।

अचानक मेरे मनमें ख़याल आया की मैंने उस समय मेरी माँ की सारी सीख को टाक पर रख दिया था और उस समय मैं एक दोस्त के लन्ड को मेरी योनि मैं डलवाने के बारे में सोच रही थी। उस समय मेरा हाल बड़ा ही अजीब था। सब कुछ जानते और समझते हुए की मैं उस समय ऐसा कुछ कर रही थी, जिसकी इजाजत मेरे माता पिता कभी नहीं देते। मैं राज को उकसा रही थी। सब कुछ समझते हुए भी मैं अपने आप को मेरी अंदरूनी उत्तेजना के सामने लाचार पा रही थी।

राज ने मुझे थोड़ा खिसकाया और मेरे सर पर हाथ रखकर मेरे सर को अपनी गोद में दबाते हुए मेरा मुंह उसके लन्ड के ऊपर रख दिया। मेरी समझ मैं नहीं आया की वोह क्या चाहता था। पर जैसे ही मेरे मुंह के सामने जब राज का बड़ा और मोटा लन्ड मेरे होठों को रगड़ने लगा तो अनायास ही मेरा मुंह खुल गया और राज ने मेरे सर को नीचे की और अपने लन्ड की सीध में रख कर एक धकका मार कर मेरे मुंह में उसके लन्ड को धकेल दिया।

मेरी समझ मैं नहीं आ रहा था की मैं क्या करूँ। पर उस समय मेरी चिंता यह थी की कहीं मेरे दाँत से राज के लन्ड को कोई हानि न पहुंचे। जैसे राज का लन्ड मेरे मुंह में गया की मैंने अपना मुंह चौड़ा किया और उसके लन्ड के अग्र भाग को मुंह में लिया और मेरे दाँतों को दूर रख कर उसके लन्ड के इर्दगिर्द मैंने अपनी जिह्वा और होँठ लपेट दिए। उसके लन्ड को मुंह में लेकर मैंने पहले उसे चूमना और बादमें चाटना शुरू कर दिया।

उस समय राज के हाल देखने जैसे थे। वह अपनी आँखे भींच कर ऐसा दीख रहा था की जैसे उसके पुरे बदन में कोई अद्भुत रोमांच पैदा हो रहा हो। मुझे यह महसूस हो रहा था की मेरे उसके लिंग को चूसना उसे बहुत उन्मादित कर रहा था। मैंने उसे और आनंद देने के लिए उसके लन्ड को और जोर से मुंह के अंदर बाहर करना शुरू किया तो उसका हाल और उन्मादित हो गया। उसने मेंरे सर को पकड़ा और अपना लन्ड मेरे मुंह के अंदर बाहर करने लगा। उसका उन्माद मुझे भी उन्मादित कर रहा था।

अचानक उसके लन्ड में से मेरे मुंह में एक फव्वारा जैसे छूटा। उसके लन्ड में से गरम गरम अजीब सा दूध की मलाई जैसा चिकना पदार्थ निकलने लगा और मेरा मुंह उससे पूरा भर गया। इतने जोरसे उसकी मलाई निकलने लगी की उसकी कुछ मलाई तो मैं अनजानेमें निगल ही गयी। मेरा गला रुंध गया और मेरे मुंह से भी आवाज न निकल पायी।

मैंने राज की और देखा तो वह आँखें बंद करके कुछ अजीब सी तन्द्रा में उसकी मलाई निकलने की पक्रिया के आनंद का अनुभव कर रहा था। मैंने पहली बार उस दिन कोई मर्द का वीर्य निकलते देखा। मुझे खांसी आ रही थी, पर मेरे प्रेमी का उन्माद देख कर मैंने उसके वीर्य को चाट कर निगल जाना ही बेहतर समझा। बड़ा ही अजीब सा होता है वीर्य का स्वाद। उस समय मुझे वह अच्छा तो नहीं लगा, पर अपने प्रेमी के आनंद को देख मैं उसे निगल ही गयी।

राज ने उसके बाद अपना लन्ड मेरे मुंह से बाहर निकाला। वीर्य निकलने से वह थोड़ा सा ढीला पड गया था। फिर भी वह लंबा और अकड़ा हुआ था।

राज मेरे साथ बैठ गया उर फिरसे उसने अपने होंठ दुबारा मेरे होंठों से भींच दिए और वह मेरा मुंह चूसने लगा। साथ साथ उसने मरे स्तनों को दबाना और मसलना शुरू कर दिया। जब मैं राज का लन्ड मेरे मुंह में लिए हुए थी तब मैं अपने स्तनों को स्वयं ही दबा रही थी और कामुक सिसकियाँ भर रही थी और अजीब से कामुकता के भाव में कराह रही थी। मुझे मेरी छाती और मेरी फुद्दी में अजीब सी खुजली हो रही थी। उसे खुजली कहना ठीक न होगा। बल्कि वह ललक जो मेरी योनि में हो रही थी वह खुजली से कहीं ज्यादा रोमांचक थी। मुझे मेरी फुद्दी में तब राज का लन्ड डलवाना ही था ऐसी जबरदस्त मानसिकता के कारण मैं पागल सी हो रही थी।

मुझसे रहा नहीं जा रहा था। मेरी डेनिम की शॉर्ट्स को मैंने नीचेकी और हटाया और मैं हरी हरी घांस पर लेट गयी। पता नहीं मुझे कैसे यह स्त्रीगत भाव हुआ की राज अब मुझ पर चढ़े और उसका लन्ड मेरी फुद्दी में डाले। मेरी फुद्दी उस समय इतनी गीली हो चुकी थी की मेरी पैंटी और मेरी डेनिम की शॉर्ट्स भीग गयी थी। मेरे घांस पर लेटते ही राज मुझ पर चढ़ने के लिए तैयार हुआ।

जब उसने एक झटके में अपनी पैंट निकाली तब उसका मोटा लंबा लन्ड हवा में लहराने लगा। कुछ ही मिन्टों में राज का लन्ड फिरसे एकदम फौलाद की तरह अकड़ गया था। राज के इतने मोटे और लंबे लन्ड को देख कर मेरा मन किया की मैं वहां से भाग जाऊं। मेरा जोर से चिल्लाने का भी मन किया।

 
राज के इतने बड़े लन्ड को मैं अपनी फुद्दी में कैसे ले पाऊँगी यह सोचकर मेरे पुरे बदन में एक तरह की जबरदस्त सिहरन हो रही थी। उस समय मैं बुरी तरह से काँप रही थी। पर मैं समझ गयी थी की तब और कोई चारा नहीं था। बहुत देर हो चुकी थी। मैं अपना निर्णय ले चुकी थी। अब वापस हटना मुमकिन नहीं था। मैं एकदम चुप हो कर राज का उसके लन्ड को मेरी फुद्दी में डालने का इन्तेजार करने लगी।

राज शायद मेरी परेशानी समझ गया होगा। वह अपना लन्ड मेरी योनि की भग्न रेखा पर धीरे धीरे रगड़ने लगा। मेरी योनि के होठों के फुलाव पर उसका लन्ड रगड़ने से मुझे मेरी कामाग्नि पर जैसे तेल छिड़कने जैसा महसूस हो रहा था। मैं कामुकता की आग में जल रही थी। कब राज उसका मोटा लन्ड डालकर मुझे चोदना शुरू करे इस का मैं बेसब्री से इन्तेजार करने लगी। मरी फुद्दी में से तो जैसे मेरा रस झर झर बह रहा था। राज का पूर्व रस भी निकल रहा था। उसका लन्ड हम दोनों के स्निग्ध रस के मिलन से एकदम चिकना हो चुका था।

मैं अपने आप को सम्हाल नहीं पायी और मैंने अपने हाथ में उसका लन्ड लेकर मेरी योनि के छिद्र में घुसेड़ना चाहा। राज ने एक थोड़ा धक्का देकर उसका लन्ड मेरे योनि छिद्र में थोडासा घुसेड़ा। मैं पहली बार कोई भी मर्द के लन्ड को मेरे गुप्ताङ्ग से स्पर्श करा रही थी। उसके लन्ड को थोड़े अंदर घुसनेसे मैं अपने शरीर की कम्पन रोक नहीं पायी। जब राज ने उसके लन्ड मेरे प्रेम छिद्र में और घुसेड़ा तब मुझे तकलीफ महसूस हुई।

पर मैंने अपनी पीड़ा को उजागर नहीं होने दिया। मैंने सोचा की शायद उससे राज के आनंद में बाधा पहुंचेगी। और मुझे उस पीड़ा में भी आनंद का अनुभव हो रहा था। मुझे चुप देख कर राज ने उसका लन्ड मेरी फुद्दी में थोड़ा और घुसेड़ा। अब मेरा दर्द मेरी सहनशीलता की सीमा पर पहुँच गया था। मैं फिर भी अपने होठों को भींच कर चुप रही। जब राज ने एक और धक्का दे कर उसके लन्ड को करीब आधे से ज्यादा मेरी योनि में घुसेड़ दिया तब मैं दर्द से कराह उठी। राज के लन्ड ने मेरी योनि की गहराई में पहुंचकर मेरे यौन पटल को फाड़ डाला था। अचानक मेरी योनि में से खून बहने लगा।

मेरी योनि में से खून बहता देख मैं एकदम घबरा गयी। मैं राज से कहने लगी, “राज यह क्या हो गया? यह खून कैसे निकल रहा है?”

राज ने झुक कर मेरे होठों पर अपने होंठ रख दिए और मुझे ढाढस देते हुए बोला, “डार्लिंग चिंता की कोई बात नहीं है। हर कुँवारी कन्या, जिसने पहले अपनी योनि में किसी पुरुष का लन्ड नहीं लिया हो उसका कौमार्य पटल पहली बार चुदाई मैं फट सकता है। यह खून थड़ी देर में रुक जायगा। आज मैंने तुम्हारा कौमार्य भंग किया है। यह उसका सबूत है।”

राज ने शायद कई कुँवारी कन्याओं का कौमार्य भंग किया होगा। पर मैं उस समय यह सब सोचने की हालात में नहीं थी। मेरी फुद्दी में राज का इतना मोटा लन्ड घुसा हुआ था और राज उसे और अंदर घुसेड़ने ने की पैरवी में था।

मेरा सारा ध्यान उस समय मेरे योनि मार्ग में घुसे हुए राज के लन्ड पर केंद्रित था। मेरे कौमार्य पटल फट जानेसे और राज का इतना मोटा लन्ड घुसेड़ने से मुझे काफी दर्द अनुभव हो रहा था। पर पता नहीं क्यों, वह दर्द भी मुझे अद्भुत रोमांच पैदा करने वाला और सुमधुर लग रहा था। जब राज ने अपना लन्ड और अंदर घुसेड़ा तब मेरी सहनशीलता जवाब दे गयी और मैं जोर से चिल्ला उठी , “राज, बस करो, बहुत दर्द हो रहा है। मैं मर जाउंगी।” राज ने तब रुक कर अपना लन्ड थोड़ा वापस खींचा और मुझे थोड़ी राहत महसूस हुई। पर मुझे वह दर्द अच्छा लगने लगा था। मैं उस दर्द को बार बार अनुभव करना चाहती थी। मैंने इशारे से राज को उसका लन्ड अंदर डालने के लिए प्रेरित किया।

तब क्या था। राज ने धीरे से पर पूरी ताकत के साथ एक धक्का देकर मेरे योनि मार्ग में उसका लन्ड पूरा घुसेड़ ही दिया। मैं दर्द से कराहने लगी। पर मैंने राज को उसका लन्ड वापस खींचने के लिए नहीं कहा। अब मुझे उसका लन्ड मेरी फुद्दी में चाहिए था। दर्द के बावजूद, मैं उसके लन्ड को बार बार मेरी फुद्दी में डलवाना चाहती थी। मैंने अपनी कमर ऊपर की और धकेल कर बिना बोले राज को इशारा दिया की वह मुझे चोदना शुरू करे। राज ने धीरे धीरे अपना लन्ड मेरी फुद्दी में घुसेड़ना और वापस खींचना फिर और घुसेड़ना और फिर वापस खीचना शुरू कर दिया। वह धीरे धीरे मुझे चोदने लगा।

 
तब पहली बार मुझे समझ में आया की चोदना किसे कहते हैं। मैं तबराज से वैसे चुदवाने लगी जैसे पहले कई बार चुदवाने की अनुभवी थी। मैं अपनी कमर ऊपर उठाकर राज के हर एक धक्के को मेरे नितम्ब के उछाल से जवाब देने लगी। जमीन पर हरी घांस पर लेटनेके कारण मेरे नंगे फुद्दीड़ पर हरी घांस के निशान हो गए थे और कभी एकाध कंकड़ भी चुभ रहा था और थोड़ा दर्द दे रहा था। पर मैं उन सब से जैसे ऊपर उठ चुकी थी।

जैसे मुझे कोई दर्द था ही नहीं ऐसे मैं राज की चुदाई के आनंद में पूरी तरह से डूब चुकी थी। उसके कड़े मोटे लन्ड का हर धक्का मुझे अद्भुत आनंद और रोमांच का अनुभव करा रहा था। मर्द से चुदवाने में इतना आनंद आ सकता था यह मैं कतई नहीं जानती थी। उस समय जो अवर्णनीय आनंद का में अनुभव कर रही थी वह मैं ही जानती थी।

मैंने मेरे प्रियतम राज की और देखा। मुझे चोदते हुए उसके कपोल में उसकी भौएं सिकुड़ जाती थी। मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मुझे चोदते हुए उसे जो आनंद आ रहा था वह मेरे आनंद से कहीं ज्यादा ही होगा। उसके चेहरे पर एक अजीब सा उन्माद नजर आ रहा था। उस समय जैसे मुझे चोदने के अलावा वह और कुछ नहीं सोच रहा था। उसने मेरी और देखा। हमारी नजरें मिली। वह मुस्कुराया। मैंने शर्म से मेरी आँखें मूंद ली। उस समय राज ने मेरे चूचियों को सहलाते हुए, मुझे चोदने की प्रक्रिया चालु रखते हुए मुझसे पूछा, “क्या तुम मुझसे हर रोज चुदना चाहोगी? क्या तुम मेरी बीबी बनना पसंद करोगी? क्या तुम मुझसे शादी करोगी?”

मैंने कभी यह नहीं सोचा था की मेरा होने वाला पति इस परिस्थिति में मुझसे शादी करने के लिए प्रोपोज़ करेगा।

मुझे तो हाँ कहनी ही थी। मैंने उसी समय बिना कुछ सोचे समझे तय कर लिया की मैं राज से शादी जरूर करुँगी। मैंने राज की और देखा और बिना झिझक बोल उठी, “हाँ मैं तुमसे हर रोज चुदना चाहती हूँ। मैं तुम्हारे साथ रहना चाहती हूँ। मैं तुम्हारे बच्चों की माँ बनना चाहती हूँ। मैं तुमसे शादी करना चाहती हूँ। ”

मैंने पता नहीं ऐसा क्या कह दिया की राज के लन्डमें से मुझे मेरी फुद्दी में जैसे एक फव्वारा छूटा हो ऐसा महसूस हुआ। मेरी फुद्दी में राज अपने लन्ड से गरमा गर्म सफ़ेद मलाई सा पदार्थ उंडेलने लगा। मुझे भी पता नहीं क्या हुआ। मैं भी अपने आपे से बाहर हो गयी।

मैंने राज की बाँहें कस के पकड़ी और मैं ऐसे उछलने लगी जैसे मेरे पुरे बदन में अद्भुत उन्माद उठा हुआ हो।मैं अपने उन्माद की चरम सीमा पर पहुँच गयी थी। मुझे महसूस हुआ की मेरी फुद्दी में से भी अजीब सा प्रवाही निकलने लगा। मेरी और राज की मिली हुई रस धाराएं मेरी फुद्दी से उभरकर मेरी कमर से होकर जमीन पर गिरने लगी।

आखिर में हमारी शादी हमारे माता पिता की सम्मति से धूमधाम से हो गयी। शादी के पहले तीन चार सालों में हमने खूब सेक्स किया। खूब मजे किये। राज का ज्यादा सेक्सी होना मुझे बहोत अच्छा लग रहा था। उस के साथ साथ मैं भी सेक्स का पूरा आनंद ले रही थी।

मुझे उन दिनों समझ में आया की सेक्स कितना आनंद दायक हो सकता है। आज भी उन दिनों की यादें मेंरे पुरे बदन में जैसे एक अजीब सी सिहरन पैदा कर देती है। जब हमारी बेटी गुन्नू हुई तब से हमारे सेक्स जीवन में थोड़ा परिवर्तन आना शुरू हो गया। मेरी बेटी जैसे मेरी पूरी जिम्मेदारी बन गयी।

मेरी बेटी पैदा होने के बाद जैसे हमारे जीवन का केंद्र बिंदु बन गयी थी। जो ध्यान और प्यार मैं दिन रात मेरे पति राज पर न्योछावर करती थी वह अब अनायास ही मैं मेरी बेटी पर करना पड़ रहा था। पुरे दिन उसकी पेशाब, टट्टी, खाना खिलाना, स्तन पान, उसकी शर्दी, खांसी, उसको सुलाना, उठाना, उसको साफ़ करना उसके साथ खेलना इत्यादि में मुझे मेरे पति के लिए समय निकालना बड़ा मुश्किल सा लग रहा था..

राज भी हमारी बेटी के पीछे पागल था। उसको थोड़ी सी भी असुविधा होने पर वह बड़ा विचलित हो जाता था। मैं बेटी के लालन पालन के बाद शाम को थक कर ढेर हो जाती थी। मुझे पति को प्यार करना, मैथुन इत्यादि के बारेमें सोचनेका भी समय कहाँ था? चूँकि राज अपने काम में और जॉब में व्यस्त रहते थे, मेरी बेटी मेरी पूरी जिम्मेदारी बन चुकी थी।

मुझे मेरा जॉब छोडना पड़ा था। बेटी की परवरिश में मेरा सब कुछ छूट गया। मैं राज को उतना समय नहीं दे पाती थी जितना उसको देना चाहिए था। पर में क्या करती? बच्चे बड़े अतृप्त होते हैं। वह हमेशा कुछ न कुछ मांगते रहते हैं। और माँ को उसकी मांग को पूरा करना पड़ता है। पर इस चक्कर में हम पति बीबी एक दूसरे से दूर होने लगे।

 
राज मुझ से बहोत सहयोग करने की कोशिश कर रहा था। पर उसकी जॉब, टूर और व्यस्तता के कारण वह ज्यादा कुछ कर नहीं पाता था। उसे जब चोदने का मन करता था तब मैं काम से थकी हारी होती थी और उसका साथ न दे पाती थी। फिर भी मैं उसकी मज़बूरी समझ कर कई बार मन न करते हुए भी अपनी टाँगे फैला कर उसे चोदने की जरुरत को पूरी करने की कोशिश करती थी। राज इस पर बड़ा दुखी हो जाता था। पर मैं भी मजबूर थी। यहां एक तथ्य को समझना पड़ेगा।

स्त्रियों का शरीर आदमियों से अलग होने के कारण उनकी मानसिकता भी आदमियों से अलग होना स्वाभाविक है। स्त्रियां साधारणतः अन्तर्मुख होती हैं। अर्थात वह अपनों के विषय में ज्यादा सोचती हैं। भगवान ने स्त्रियों को एक विशेष जिम्मेदारी देने के लिए प्रोग्राम किया है। वह है सविशेष ममत्व और संवेदनशीलता। ममत्व का अर्थ है जो अपने हैं उनकी इतनी लगन से परवरिश करनी की वह व्यक्ति पनप सके। संवेदनशीलता का दुसरा नाम है सहन शीलता। संवेदन शीलता का अर्थ है अपनों के प्रति नरमी और धैर्य रखना। अपने चारों और के वातावरण में नमी अथवा प्रेम उत्पन्न करना। कई बार इतनी कुर्बानी देने के बाद स्त्री फिर उस पात्र पर अपना अधिकार भी जताने लगाती है। जहां तक ममत्व का सवाल है स्त्रियां आदमियों से कहीं आगे हैं।

मैं इतना दावे के साथ कह सकती हूँ की स्त्रियां आदमियों से स्वभावगत ज्यादा जिम्मेदार होती हैं। परंतु शायद पुरुष स्त्रियोंकी विशेषता इस लिए समझ नहीं पाते क्योंकि भगवान ने आदमियों की प्रोग्रामिंग अलग तरीके से की है। आदमियों का व्यक्तित्व साधारणतः बहिर्मुख होता है। वह बाहरी विश्व के साथ सविशेष रूप से जुड़ना चाहते हैं। वह अपनों की सविशेष रक्षा कैसे हो उसमें ज्यादा रूचि रखते हैं।

मैं यह मानती हूँ की यह एक सामान्य विश्लेषण है। हर अवस्था में यह लागू नहीं होता।

यह उस समय की बात है जब हमारी बेटी गुन्नू करीब चार सालकी हो चुकी थी। अब वह अपने आप काफी कुछ कर लगी थी और मुझे उसके पीछे पहले की तरह भागना नहीं पड़ता था। पर मैं अनुभव कर रही थी, की बीते तीन सालों के कड़वे अनुभव और अलगता के कारण राज का मन मुझसे कुछ ऊब सा गया था। हम साथ में सोते तो थे, पर तब पहले की तरह राज का मुझे अपनी बाहों में लेकर सोने का जो पहले वाला जोश था वह जैसे ख़त्म हो गया था। राज की मानसिक अवस्था को समझते हुए भी मुझे राज का यह व्यवहार आहत करता था।

रात को वह मुझ से दुरी रखने लगा और मुड़कर सो जाता था। वह मुझसे सेक्स के लिए उतना उत्साहित नहीं हो रहा था। हमारी सेक्स की मात्रा एकदम घट गयी थी। वैसे मुझे भी तब राज के साथ सेक्स करने में वह आनंद नहीं आ रहा था। क्योंकि हम पति बीबी थे, एक साथ सोते थे और क्योंकि हमारे पास कोई विकल्प नहीं था इस लिए कभी कभी चोदना हमारे लिए जैसे एक आवश्यक मज़बूरी बन गयी थी।

हम उसी मानसिक हालात में थे जब राज की पोस्टिंग राजपुर में हुयी और हमारी मुलाकात समीर और रुखसार से हुई। जैसे ही मेरे पति राज ने उसके ही साथीदार समीर की सुन्दर कमसिन बीबी रुखसार को देखा तो मैंने महसूस किया की राज उसपर जैसे लट्टू हो गया था। मैं देख रही थी की उसकी आँखें रुखसार की छाती और उसके कूल्हे के उतार चढ़ाव पर से हटने का नाम नहीं ले रही थी।

उनकी रुखसार के बदन पर गड़ी हुई आँखें और उस समय के उनके चेहरे के लोलुप भाव देखकर मुझे यकीन था की हो न हो मेरा पति राज, समीर की बीबी रुखसार को अपनी आंखोसे नंगी करके के उसके पुरे बदन को मसलने के, उसके साथ सोने के और उसे बड़े चाव से चोदने के सपने निहार रहा था। मुझे कुछ पल के लिए मेरे पति के प्रति घृणा का भाव होने लगा। पर फिर मुझे उस पर दया आ गयी। जब हमने पहली बार शादी का करार किया था तब उसने मुझे स्पष्ट शब्दों में कहा था की वह एक असुधार्य (जो कभी सुधर नहीं सकता ऐसा) कामुक पुरुष था। सेक्स उसकी रग रग में था। ऐसे व्यक्ति से मैं कैसे उम्मीद रखूं की जब मैं उससे सेक्स करने में ज्यादा रूचि न रखूं तो वह इधर उधर तांकझांक नहीं करेगा?

 
पिछले कुछ महींनों से (या यूँ कहिये की करीब तीन साल से) ऐसा लग रहा था की जैसे मेरे पति राज के जीवन में कोई रस रहा ही नहीं था। वह कुछ उखड़ा उखड़ा सा लग रहा था। पर जैसे ही पहली बार उसने रुखसार को देखा और उस पार्टी में जब उसने रुखसार के साथ कमर से कमर और जांघ से जांघ रगड़ कर डांस किया तबसे जैसे उसको नया जीवन मिल गया। मैं हैरानगी से मेरे पति के उस परिवर्तन को देखती ही रह गयी।

मुझे इस बात से डर भी लग रहा था की कहीं राज उस पागल पन में रुखसार के साथ कोई ऐसी वैसी हरकत न कर बैठे। उस दावत के बाद घरमें रात को पागलपन में एकाध बार जैसे उसको मुझ पर अचानक ही एकदम ज्यादा प्यार आ गया और वह मुझे नंगी करके मेरे ऊपर चढ़कर मुझे बड़े प्यारसे जोरोंसे चोदने लगा। उसका मुझे चोदने में अचानक इतना रस बढ़गया यह देख कर मैं हैरान हो गयी। पर फिर मैंने अपने आप को एक नसीहत दी की शायद वह मुझे रुखसार समझ कर ही चोदता होगा, क्योंकि मुझे ऐसा वहम हुआ की एकाध बार मुझे चोदते हुए उन्मादमें उसके मुंहसे “ओह… रुखसार…” निकल गया था। पर में उस समय आधी नींद में थी और मुझे इस बातका पक्का यकीन नहीं था। मैं यह अनुभव कर रही थी की शायद मेरे पति का ध्यान मुझ पर कम और उस औरत पर ज्यादा होने लगा था।

मेरे लिए यह कोई आश्चर्य की या ज्यादा चिंता की बात नहीं थी। इससे पहले कई बार, मेरा ठर्कु पति कई सुन्दर लड़कियों पर डोरे डाल चूका था और ज्यादातर उसे मुंह की खानी पड़ी थी। एकाध बार जरूर कोई औरत उसे थोड़ी लिफ्ट दे देती थी, पर मेरा बेचारा पति आखिर में उस औरत से भी निराश होकर मेरे ही पास आकर मेरी सेवा में लग जाता था।

शादी के समय मेरी माँ ने मुझे एक सीख दी थी, वह मुझे बराबर याद थी। माँ ने कहा था, “बेटी, यह मर्द जात बन्दर की तरह होती है। कोई सुन्दर बंदरिया देख कर उसको पटाने के लिए वह नाचने गाने लगता है। पर ध्यान रहे, इससे तू घबड़ाना या परेशान मत होना। वह बंदरिया जब तुम्हारे बन्दर (मतलब तुम्हारा पति) को लात मारेगी तो आखिर में वह भागता हुआ, रोता हुआ तुम्हारे पास ही आएगा। बस तू उसका इतना ध्यान रखते रहना की कोई ऐसी बंदरिया उसे न मिल जाय जो उसको उल्लू बनाकर सब लूट ले। शायद मेरी माँ ने मुझे वह सीख अपने अनुभव के आधार पर कही थी।

माँ ने एक बात और भी कही थी की, “हो सकता है की कोई बार तुझे गुस्सा या दुःख भी आए और तेरा अपने पति को कुछ कहने अथवा उसको सबक सिखाने का मन करे। उस समय लड़ाई झगड़ा करने के बजाय, तू बिना कुछ बोले, अपने पति को उसीकी जबान में जवाब देना।” उस समय मैं इसका अर्थ ठीक से नहीं समझ पायी थी की कैसे बिना कुछ बोले मैं अपने पति को उसीकी जबान में जवाब दे सकुंगी?

जब मैंने मेरे पति राज को समीर की सुन्दर बीबी रुखसार के साथ कमर रगड़ते हुए डांस करते देखा तो मेरे बदन में एक आग सी लग गयी। रुखसार सुन्दर जरूर थी। पर मैं भी तो कोई कम सुन्दर नहीं थी। मुझे तब मेरी माँ की सीख समझ में आयी। उसी पार्टी में जब डांस करने के लिए समीर ने मेरा हाथ माँगा तो मैं समझ गयी की माँ ने भी तो यही कहा था। मैं भी समीर की कमर से कमर रगड़कर डांस करने लगी। मैं मेरे पति को दिखाना चाहती थी की अगर वह किसी पर डोरे डाल सकता है तो मुझ पर भी फ़िदा होने वाले कई हैं।

बेचारा समीर! उसका क्या दोष? उसका लन्ड तो उसकी पतलून मैं से बाहर निकल ने को जैसे कूद रहा था। कई बार उसका कड़ा लन्ड मेरी जाँघों से और योनि से टकराया। जब मेरे पति राज ने यह देखा तो वह थोड़ा खिसिया सा गया। उसको भी समझ में आ गया की मैं भी कोई कम नहीं हूँ।

पर शायद मेरी रणनीति थोड़ी फीकी रही। उस रुखसार को देख कर मेरा बन्दर (सॉरी, मेरा पति) राज तो जैसे उस पर लटटू होता दिखाई दे रहा था। मैंने पार्टी में देखा तो उसकी नजर बारबार रुखसार के बड़े मम्मों पर ही केंद्रित लग रही थी। अरे भई! मेरे मम्मे बेर जैसे छोटे थोड़े ही थे? उस समय पार्टी में सारे मर्द मेरे मम्मों को ही तो ताक रहे थे। बल्कि एक औरत ने तो मजाक से कोहनी मार कर मुझे कह भी दिया की आखिरसारे मर्द मेरे मम्मों को ही क्यों ताक रहे थे? अरे जिस औरत पर मेरा पति डोरेड़ाल रहा था , उसी औरत का पति मेरे मम्मों को ऐसे ताक रहा था जैसे वह उन्हें खा ही जाएगा।

खैर जब मैं उस पार्टी में रुखसार से मिली तो मुझे बहुत अच्छा भी लगा और मैं थोड़ी निश्चिन्त भी हुई। मुझे रुखसार एक अच्छी और समझदार औरत लगी।

 
सामान्यतः रात को जब मैं थकने का बहाना कर के सोने लगती और जब राज कुछ दिनों से सेक्स न पाने के कारण मुझे सेक्स करने केलिए तैयार करने लगता था, तो वह अपने तरीके से सेक्सी बातें करते हुए मुझे ललचाता, उकसाता या फिर मेरी फुद्दी में उंगली डाल कर मुझे गरम करने की कोशिश करता रहता था।

पर उस औरत रुखसार से मिलने के बाद से मैंने देखा की वह बिस्तरे में जैसे मैं हूँ ही नहीं ऐसे पड़ा रहता था और कुछ सोचता रहता था। एक बार तो रात को मैंने उसे अपने ही लन्ड को मूठ मारते हुए (masturbate करते हुए) भी देखा। मुझे बड़ा दुःख हुआ। मैं साथ में ही सो रही थी और मेरा पति मूठ मार रहा था यह बात मुझे ठीक नहीं लग रही थी। पर मैं क्या करती? मुझे भी राज से सेक्स करने में वह आनंद नहीं आ रहा था और उनसे सेक्स करने का मन नहीं हो रहा था। ।

खैर मैं मेरे पति को अच्छी तरह से जानती थी । वह कब क्या सोचते हैं वह मैं उनके चेहरे के भाव से ही पहचान लेती थी। मैं समझ गयी थी की राज रुखसार पर डोरे डालने की कोशिश कर रहे थे। पर मुझे पता था की रुखसार ऐसे आसानी से फंसने वाली नहीं थी। और फिर रुखसार का पति भी रुखसार पर डोरे डालने नहीं देगा। अगर कभी कुछ ऐसा वैसा हुआ तो मेरे पास भी ब्रह्मास्त्र था। रुखसार का पति समीर तो मेरा दीवाना था ही। उसको तो मैं अपनीउँगलियों पर नचा सकती थी। उसको फाँसने में मुझे ज्यादा कुछ करना नहीं पड़ेगा। मेरे पति की रुखसार को फांसने की नादान हरकतों पर मुझे मन ही मन हँसी आ रही थी। मैंने मेरे पति की हरकतों पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया।

उस कार्यक्रम के बाद हम दोनॉ जोड़ोँ का एक दूसरे के घर आने जाने का एक हफ्ते में एक बार तो होता ही था। कभी कभी हम दो बार या कभी कभी तो तीन बार भी मिल लिया करते थे। मैंने महसूस किया की मेरा पति राज रुखसार की और आकर्षित तो था, पर रुखसार से डरता था। राज ने एक बार मुझे जाने अनजाने में कह दिया था की उस दिन वह रुखसार के घर गया था। समीर घर में नहीं था। राज जोधपुर से कोई हेंडीक्राफ्ट की दो लकड़ी की मूर्ति लाया था। उसमें से एक उसने हमारे घर में शो केस में रखी था और दूसरी वह रुखसार को भेंट करना चाहता था।

जब वह मूर्ति उसने रुखसार को देना चाहा तो रुखसार ने मेंरे पति को ऐसी फटकार लगाई की उसकी सूरत रोनी सी हो गयी। रुखसार के घर से जब वह वापस आया तो मैं मेरे पति को देखते ही भांप गयी की मेरे ठर्कु पति को अच्छी लताड़ पड़ी थी। मैंने उसे समझाया की अगर उसे गिफ्ट देनी ही थी तो समीर के घर में होते हुए देनी चाहिए थी। एक औरत घरमें अकेली हो और उसे कोई गिफ्ट देना चाहे तो वह तो उसका गलत मतलब निकालेगी ही।

राज झुंझलाया हुआ था। वह बोल पड़ा की रुखसार ने ठीक नहीं किया। राज ने मुझसे पूछा की अगर समीर मुझे ऐसे गिफ्ट देता तो क्या मैं मना करती? मैं सोच में पड़ गयी। तब राज ने मुझे कहा की अगर समीर मुझे कोई गिफ्ट देता है तो मैं उसे मना न करूँ। मैं इसे सुनकर हंसने लगी। क्योंकि मुझे तो गिफ्ट लेना बहुत ही पसंद था। दिवाली में जो थोड़ी बहुत गिफ्ट आती थी तो मैं उनको बड़ी सम्हाल कर रखती थी। मैंने राज से कह दिया की मैं तो भई कभी कोई गिफ्ट के लिए मना नहीं करूँगी। मैंने मेरे पति से कहा की मैं रुखसार से भी बात करुँगी की उस ने राज का गिफ्ट क्यों नहीं लिया।

मैं यह भली भांति जानती थी की यदि राज ने रुखसार को पाने की ठान ली, तो येन केन प्रकारेण वह रुखसार को अपने जाल में फांस ने की क्षमता रखता था। पर रुखसार ने भी शायद मेरे पति की नियत पहले से ही भांप ली थी। मैं उतना तो जान गयी थी की रुखसार एक मजबूत चरित्र वाली स्त्री थी। वह राज को ऐसी वैसी हरकत नहीं करने देगी और आसानी से मेरे पति की चाल में फंसने वाली नहीं थी। इस वजह से मैं पूरी तरह से आश्वस्त थी।

वैसे रुखसार का पति भी काफी स्मार्ट था। मुझे वह एक अच्छा सीधा सादा और भला इंसान लगा। राज की तरह वह ज्यादा चालु नहीं लग रहा था। उस दिन भी डांस में हालांकि उसने मुझसे शारीरिक स्पर्श करने की चेष्टा तो की पर और ज्यादा कुछ करने की या कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। बेचारे का लन्ड उसकी पतलून में फूला जा रहा था। खैर कुछ दिन ऐसे ही बीत गए।

मुझे मेरा घर ज़रा भी अव्यवस्थित हो यह बिलकुल पसंद नहीं था। राज इस मामले में एकदम निखट्टू था। मुझे यह पसंद नहीं था की घरमें कोई भी उपकरण खराब हो। मेरी शादी के पहले मैं यह उम्मीद रखती थी की अगर मेरा पति इंजिनीअर होगा तो घर की सारी चीजों को रिपेयर तो कर सकेगा। पर मेरी वह आस सफल नहीं हुई। राज उस मामले में भी निकम्मा था।

परंतु समीर के संपर्क में आनेसे पता चला की वह न सिर्फ इंजीनियर था बल्कि वास्तव में उसे घरके यांत्रिक उपकरणों के बारेमें अच्छा खासा ज्ञान था और वह टीवी, फ्रिज, धुलाई की मशीन इत्याद्दी की छोटी मोटी क्षतियों को रिपेयर भी कर लेता था। मुझे वास्तव में तब रुखसार की ईर्ष्या हुई। काश मेरा पति राज भी ऐसा होता।

पर जब समीर ने यह सामने चल कर कहा की, “मुझे यदि कोई उपकरणों के विषय में परेशानी है तो आप मुझे कभी भी बुला सकती हैं; यहाँ तक की आप मुझे आधी रात को भी बुला सकती हैं।” तब मेरी ख़ुशी का ठिकाना न रहा। घरमें इतने सारे उपकरण हैं। कभी न कभी कोई न कोई तो बिगड़ता ही है ना?

फिर तो समीर का अकेले मेरे घर आना जाना बढ़ गया। राज समीर को कई बार कुछ न कुछ ठीक करने के लिए बुला लेते। एक बार शाम को मैं जब टीवी की मेरी मन पसंद सीरियल देखने बैठी और मैंने टीवी चालु किया तो वह चालू हुआ ही नहीं। मैंने और राज ने बड़ी कोशिश की पर टीवी ऑन ही नहीं हुआ। उस रात को कोई ख़ास प्रसंग था और मैं राज के साथ बैठ कर वह प्रोग्राम देखना चाहती थी। मैंने राज को भी उसके लिए तैयार किया था। मैं बड़ी निराश हो गयी। तब राज ने समीर को बुलाने के लिए कहा।

 
मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ की समीर ने आते ही चन्द मिनटों में टीवी को ठीक कर दिया। जब मैंने पूछा की क्या हुआ था, तब उसने कहा टीवी की मुख्य तार प्लग के अंदर से टूटी हुई थी। यह बात मेरे पति की समझ मैं क्यों नहीं आयी यह मेरी समझ से बाहर था। खैर मैं उस रात समीर की बड़ी ऋणी हो गयी। इतनी देर को आना और हमारा टीवी ठीक कर देना मेरे लिए एक अत्यंत सौहार्द पूर्ण चेष्टा थी। उस रात हम सब ने (राज ने और मैंने समीर को आग्रह कर रोका और) साथ में बैठ कर वह प्रोग्राम देखा।

उस रात मेरे पति राज कुछ ज्यादा ही रोमांटिक मूड में लग रहे थे और उस रोमांचक टीवी प्रोग्राम देखते हुए समीर के सामने ही मुझे अपने करीब बिठाकर कभी मेरा हाथ तो कभी मेरी गर्दन चूमने लगे। एक बार तो मेरे पीछे घूम कर मेरी पीठ को चूमने लगे। मुझे बहोत अच्छा तो लगा पर समीर के सामने ऐसा करना थोड़ा सा अजीब सा लगा।

समीर के चले जाने के बाद जब मैंने मेरे पति से पूछा की उन्होंने समीर के सामने ऐसा क्यों किया तो वह बोले इसमें कौनसी बड़ी बात थी। अरे भाई वह अपनी बीबी से ही तो प्यार कर रहे थे। राज ने यह भी कहा की समीर और रुखसार हमारे अंतरंग दोस्त हो गए थे। उनसे पर्दा क्या करना। राज ने मुझे हिदायत दी की ऐसा करने पर मुझे ज़रा भी बुरा मानने का कोई कारण नहीं था। बल्कि मेरे पति चाहते थे की हम समीर और उसकी बीबी को भी यह हमेशा दिखाएं की हम पति बीबी एक दूसरे से कितना प्यार करते थे। इससे समीर को भी अपनी बीबी से और प्यार करने की प्रेरणा मिलेगी। मुझे मेरे पति का तर्क सही लगा, क्योंकि कुछ सालों के बाद पति बीबी के प्यार में कुछ कमी जरूर आ जाती है।

ऐसा सिलसिला चालु हो गया। मेरे घर में कभी टीवी तो कभी फ्रिज तो कभी वाशिंग मशीन जब भी बिगड़ते तो राज समीर को बुला लेते और ज्यादातर यह रात को ही होता। मैं कई बार सोचती थी की पहले तो यह सब इतनी जल्दी खराब नहीं हुआ करते थे। अक्सर मेरे पति समीर को बिठा लेते और हम इधर उधर की गप मारते या टीवी देखते। हर बार मेरे पति जरूर समीर के सामने ही मुझसे प्यार करने लगते और समीर को यह दिखाने की कोशिश करते की वह मुझे कितना प्यार करते थे। मैं भी उनका साथ देने लग गयी क्योंकि राज मुझे कहते थे की समीर और उसकी बीबी रुखसार के बीच कई बार घर्षण होता था और राज चाहते थे की समीर हम से प्रेरणा ले और उसकी बीबी से ज्यादा प्यार करे।

एक दो बार समीर रुखसार को लेकर आये। तब तो मेरे पति का मूड और भी उत्तेजना पूर्ण हो जाता। वह मुझे अपनी गोद में बिठा देते और कुछ ज्यादा ही बेतकल्लुफ हो जाते थे। वह समीर को भी रुखसार से हमारे सामने ही प्यार करने के लिए प्रोत्साहित करने लगे और समीर भी रुखसार के संग थोड़ी बहुत छूट लेने लग गए। शुरू शुरू में रुखसार अड़ जाती थी पर बादमें वह समझ गयी की पतियों को एक दूसरे के सामने प्यार करने में ज्यादा ही आनंद आता था तो वह भी साथ देने लगी।

एक रात तो मेरे पति राज ने हद ही कर दी। मैं रोज शाम को वाशिंग मशीन चलाती थी। रात को करीब दस बजे जब मैं मशीन चालु करने लगी तो पाया की हमारी वाशिंग मशीन चल नहीं रही थी। तुरंत राज ने समीर को फ़ोन किया। रुखसार ने फ़ोन उठाया और समीर को भेजा। हर बार की तरह समीर ने कुछ ही समय में मशीन ठीक कर ली तब तक राज ने समीर को थोड़ी व्हिस्की के लिए आग्रह किया। दोनों पीने बैठ गए। मैं उन्हें कुछ नाश्ता देकर राज के साथ जा बैठी। राज ने मुझे आग्रह किया की मैं भी उसकी गिलास मैं से कुछ घूंट पी लूँ। दोनों के आग्रह करने पर मैंने भी कुछ चुस्कीयाँ ली। उस रात राज ने समीर के सामने ही मेरे बदन को सहलाना और एक बार तो मेरे स्तनों पर हाथ फिराना शुरू कर दिया।

मुझ पर भी हल्का सा नशा छाया हुआ था। मैंने कुछ विरोध जरूर किया, पर राज ने मेरी एक न सुनी और मुझे होठों पर चुम्बन देने लगे और समीर से मेरे रसीले होंठ, कमसिन बदन, कसे तने स्तनों और मेरे सुआकृतिमय कूल्हों की खुली प्रशंषा करने लग गए। काफी जद्दोजहद के बाद भी जब राज मुझे छेड़ने से बाज़ न आये और मुझे विरोध न करने की हिदायत देने लगे। तब मैंने भी चुप रहकर राज का विरोध करना बंद किया और जो वह करते रहे उसे स्वीकार करती रही। तब राज ने समीर को मेरे स्तनों आकर छूने का आवाहन दिया। मैं एकदम सकपका गयी। मेरे पति की यह बात मुझे कतई अच्छी नहीं लगी। पर समीर ने राज की बात नहीं मानी। समीर वहीँ बैठे रहे और मुझे छुआ भी नहीं। अगर उस समय समीर मुझे छू लेते तो मैं कुछ भी नहीं कर पाती। मैं समीर की इस अभिव्यक्ति पर मन ही मन वारी वारी सी गयी।

 
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