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एक दूसरे की बीबीयों के रसभरे होंठ

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मैंने धीरे से कहा, “कैसे बताऊँ रुखसार, बड़ा अजीब लगा रहा है। पिछले कुछ दिनों से राज अजीब सा वर्ताव कर रहें हैं।” रुखसार ने बिना कुछ बोले मेरी और प्रश्नार्थ दृष्टि से देखा। वह मेरे आगे बोलने का इन्तेजार कर रही थी।

मैं, “मुए शक है की वह कोई दूसरी औरत के चक्कर में हैं। ”

रुखसार, “तुम्हें कैसे पता? राज के व्यवहार में क्या परिवर्तन आया है?”

मैं, “वह मुझसे अब अचानक ज्यादा प्यार करने लगे हैं।” मेरा वाक्य मुझे ही बड़ा अजीब सा लग रहा था। रुखसार का स्तंभित होना स्वाभाविक था।

रुखसार बड़े ही आश्चर्य से बोली, “क्या? राज तुम्हें ज्यादा प्यार करने लगे हैं, और तुम्हें लगता है की वह किसी और स्त्री के चक्कर में है? यह कैसी गुत्थी है? वह औरत कौन है?”

मैं कुर्सी पर सकपका रही थी। मैं रुखसार की कैसे समझाऊँ की परेशानी की जड़ तो वह खुद ही थी? बड़े असमंजस मैं कहा, “रुखसार, मैं कैसे बताऊं? मुझे अजीब सा लग रहा है। ”

तब रुखसार ने मुझे बड़ी ही असमंजस में डाल दिया। वह बोली, “और वह औरत मैं हूँ। सही है या गलत?” मैंने कुछ भी न बोलते हुए अपनी मुंडी हिला कर “हाँ” का इशारा किया।

मेरी बात का बुरा मानने, आश्चर्य प्रकट करने या मेरे साथ तक वितर्क करने के बजाय रुखसार मेरे और करीब आयी और मुझसे लिपट गयी और बोली, “हाँ, तुम सही हो। तुम्हारा पति मेरे पीछे पड़ा है। पर क्या तुम्हें पता है की मेरा पति तुम्हारे लिए कितना पागल है?”

मैं क्या बोलती? अब कठघरे में खड़े रहने की बारी मेरी थी। मैं बिना बोले असमंजस में रुखसार की और एकटक देख रही थी की वह क्या बोलेगी। तब रुखसार ने मेरी नाक अपने हाथ में पकड़ कर बड़े प्यार से धीरे से उसे दबाते और मेरा सर इधर उधर हिलाते हुए बोली, “अरे इस में मेरे पति समीर का क्या दोष निकालूं? तुम हो ही इतनी खूबसूरत।” फिर एकदम खुल कर हँस पड़ी और बोली, “अगर में मर्द होती और समीर की जगह होती तो मैं तो शायद तुम्हे अबतक मेरे बच्चोँ की माँ ही बना चुकी होती।”

मैं क्या बोलती? स्वयं इतनी अति सुन्दर स्त्री जब मेरी इतनी प्रशंशा करे तो भला मैं क्या बोल सकती थी? मैंने दबे हुए स्वर में कहा, “रुखसार बस भी करो। मेरी टांग मत खींचो। तुम तो मुझसे कहीं ज्यादा खूबसूरत हो। तुम्हारे सामने तो मैं कुछ भी नहीं। ”

रुखसार फिर थोड़ा रुक कर बोली, “मेरी प्यारी डॉली भाभी जान। अब मैं आपको बताती हूँ की बात क्या है।”

धीरे से एक गहरी साँस लेकर रुखसार ने कहा, “सीधी स्पष्ट बात और आजकी समस्या यह है की हम दोनों के पति एक दूसरे की बीबी से बहोत आकर्षित हैं, और वह हम दोनों से शारीरिक सम्भोग करना चाहते हैं। अब सवाल यह ही की हम पत्नियां क्या करें?”

रुखसार की इतनी सीधी और स्पष्ट बात सुनकर मेरे चेहरे से तो जैसे हवाइयां उड़ने लगी। मैं क्या बोलती? रुखसार की बात तो एकदम सही और सटीक थी। मैं चुप रही तो रुखसार ने अपनी बात को जारी रखते हुए कहा, “देखो, मैं जानती हूँ की तुम और राज ने मिलकर एक ब्लू फिल्म देखि थी, जिसमें दो पति अपनी पत्नोयों की अदलाबदली करतें हैं। जब राज ने तुमसे ऐसे ही करने के बारेमें आग्रह किया तो तुमने राज को शायद फटकार दिया था। यह बात मैंने दरवाजे के पीछे छिपकर मेरे पति समीर और राज के आपसी संवाद में सुनी थी। राज तुम्हारी फटकार से बड़ा दुखी था और समीर को कह रहा था की उसका मन करता हैकि वह कोई वेश्या के पास जाए।” रुखसार इतना बोलकर चुप हो गयी।

 


मेरे आश्चर्य का कोई ठिकाना न रहा? क्या, मेरा पति राज वेश्या के पास जाएगा? क्या मैं उसे शारीरिक सुख दे कर संतुष्ट नहीं कर पा रही थी? मेरा सर भिन्ना रहा थ। मैंने दबे हुए स्वर में पूछा, “बापरे! यह आप क्या कह रही हो? क्या राज ऐसा सोच रहा है? राज वेश्या के पास जाएगा? मेरा तो घर ही बर्बाद हो जायेगा। रुखसार दीदी, तुम्ही बताओं हम अब क्या करें?”

रुखसार ने बड़े गम्भी स्वर में कहा, “देखो तुम मेरी छोटी बहन जैसी हो। जैसे तुम किसी भी हालात मैं यह नहीं चाहोगी की मेरा घर बर्बाद हो। वैसे ही मैं भला तुंम्हारा घर बर्बाद कैसे होते देख सकती हूँ? कुछ भी हो जाय हमें हमारे पतियों को हमारे पल्लू में ही बाँध कर रखना है ना? हमें उन्हें हमारे दोनों के घर के दायरे से बाहर जाने नहीं देना चाहिए। इसी में हम सब की भलाई है। इसके लिए चाहे हमें कोई भी समझौता क्यों न करना पड़े। तुम क्या कहती हो? मैं ठीक कह रही हूँ या गलत? बोलो।”

मैंने कहा, “बात तो सही है। पर तुम कहना क्या चाहती हो?”

रुखसार बड़े आत्मविश्वास के साथ बोली, “मैं यह कहना चाहती हूँ की हमें हमारे पतियोँ की बात मान लेनी चाहिए। मैं नहीं चाहती की हमारे पति कोई वेश्या के चक्कर में पड़ें। इसी लिए मैं तुम्हें कहती हूँ की राज की बात मान लो और समीर के साथ सम्बंध बनाने में झिझक न रखो। मैं समीर की बीबी होकर भी तुमसे यही कह रही हूँ, क्योंकि इसी में हम सब की भलाई है की बात हमारे दोनों के बीच में ही रहे। बल्कि यह तो अच्छा है की बात अभी हमारे दोनों के बीच में है और हम दोनों बहनें मिलकर उसे सुलझा सकते हैं। वरना हमारे घर बिखर भी सकते हैं।“

रुखसार की बात मैं एकदम बड़े ध्यान से सुन रही थी। अब तो बात इस हद तक पहुँच चुकी थी की मुझे कुछ न कुछ निर्णय तो लेना ही था। और निर्णय क्या लेना था? पतियों की बात तो माननी ही पड़ेगी। वरना तो कहते हैं की “रायता फ़ैल जाएगा। ” अगर हमारे पति वेश्याओं के पास जाने लगे तो पैसे और इज्जत दोनों की बर्बादी तय थी। और फिर मेरे पति राज का क्या भरोसा? किसी वेश्या के साथ उसका मन लग गया तो कहीं वह उस वेश्या को मेरे घर में लाकर खड़ा न कर दे? यह सोच कर मैं काँपने लगी। पर सवाल यह था की फिर मै ही क्यों पहल करूँ। क्या रुखसार पहल नहीं कर सकती? वह मुझसे बड़ी भी तो थी?

तब रुखसार ने मेरी बात का बिना पूछे ही उत्तर दे दिया। वह बोली, “अब तो इस बारे में तुम्हें सोचना है। मैंने तो अपना निर्णय ले लिया है। मैं तुम्हें यह कहना चाहती हूँ की मैंने तो अपने आपको उनके हवाले कर ही दिया है। मैं अब तुम्हारे और मेर पति को पूर्ण तयः समर्पित हूँ। तुम्हारे पति मेरे साथ कहीं आगे निकल चुके हैं।

ऐसा हुआ क्योंकि मेरे पति समीर ने ही तुम्हारे पति राज को उकसाकर मुझसे सम्बन्ध बनाने को प्रोत्साहन दिया। उस होली के दिन राज ने मुझे एक कोने में जकड कर मेरे पुरे बदन पर, यहां तक की मेरी चूँचियों पर भी ब्लाउज में हाथ डालकर रंग रगड़ा। मैंने राज को हटाने की बड़ी कोशिश की पर मेरी एक न चली। जब मैंने मेरे पति समीर से शिकायत की तो समीर ने मेरी बात यह कह कर अनसुनी कर दी की ‘होली में तो यह सब आम बात है। इसमें कोई बुरा मानने की जरुरत नहीं है।‘ अब तुम्ही बताओ मैं और क्या कर सकती थी? जब हमारे पति ही हमें आगे धकेल रहे हों तो हम क्या करें?”

 
जब मैंने मेरे पति समीर से शिकायत की तो समीर ने मेरी बात यह कह कर अनसुनी कर दी की ‘होली में तो यह सब आम बात है। इसमें कोई बुरा मानने की जरुरत नहीं है।‘ अब तुम्ही बताओ मैं और क्या कर सकती थी? जब हमारे पति ही हमें आगे धकेल रहे हों तो हम क्या करें?”

रुखसार की बात शत प्रतिशत सच थी। उसमें सच्चाई और उसकी मज़बूरी की स्पष्ट झलक मुझे दिख रही थी। मैंने उसे आगे सुनाने को कहा तो वो बोली, “फिर उस दिन शाम को समीर और राज मुझे एक प्रोग्राम में ले गए। वहाँ समीर और राज ने मुझे मिलकर शराब पिलाई। मैंने थोड़ी सी जिन पिने को हाँ क्या कह दी, उन्होंने मुझसे छुपा कर इतनी ज्यादा डाल दी की मुझे पता ही नहीं चला की क्या हुआ। समीर ने मुझसे इतनी मिन्नतें की की मेरे पास कोई जवाब ही न था। आखिर में मेरे पति और तुम्हारे पति ने मिलकर मुझसे अपनी बात मनवा ही ली। अगर उस समय मेरी जगह तुम होती तो शायद तुम भी वही करती।”

मैं आश्चर्य से स्तंभित सी हो गयी। क्या रुखसार का मतलब वही था जो मैंने सूना और समझा था? रुखसार जैसे मेरे भावों और मेरी आतंरिक मनोदशा को पढ़ रही थी। उसने कहा, “तुमने सही सूना और सही समझा। मैं यह कह रही हूँ की हमें हमारे पतियों की अदलाबदली करने के विचार को अस्वीकार नहीं करना चाहिए।“

मैंने हिचकिचाते हुए पूछा, :”रुखसार मैं तुम्हें दीदी कहूँ तो गलत न होगा. आप ही बताओ हम क्या करें?”

तब रुखसार ने मेरे और करीब आकर मेरे कानों में कुछ ऐसी बातें कहीं जिसे सुनकर मैं आश्चर्यचकित तो हुई, पर बात रुखसार की सटीक थी। मेरे पास उससे सहमत होने के अलावा और कोई चारा ही न था।

रुखसार के जाने के बाद मैं कुछ तनाव में थी तो कुछ हद तक तनाव मुक्त भी थी। अब मुझे रुखसार और मेरे पति के बीच क्या हुआ था और क्या होगा उसकी चिंता नहीं रही थी। पर मैं मेरे और समीर के बीच क्या होगा उसके तनाव में उलझी हुई थी।

मेरे लिए रुखसार वास्तव में एक सच्ची दोस्त और शुभचिंतक साबित हुई थी। दूसरी और मुझे उसकी वास्तविक दुनियादारी सूझ बुझ के प्रति सन्मान हुआ।

शामको राज जब आये तब तक मैं बिलकुल तनाव मुक्त थी। मैंने हंसकर राज से काफी बातचीत की और उसे यह अहसास दिलाने की कोशिश की की मैं उससे नासमीर नहीं थी। राज भी खुश नजर आ रहे थे। रात को सोने से पहले मैंने अच्छी तैयारी की। मैंने मेरे पॉंवो के बीचमें से मेरी फुद्दी पर से सारे बालोंकी सफाई की जैसा की राज को पसंद था। और राज की मन पसंद नाइटी पहन कर राज का इंतजार करने लगी।

उस रात मैंने कोशिश की की राज मेरे साथ सहजता अनुभव करे। जैसा की रुखसार दीदी ने बताया था, मैंने सबसे पहले राज को अपनी बाहों में लिया और धीरेसे उसके कानों में बोली, “डार्लिंग मुझे माफ़ कर दो? मैं उस दिन थोड़ी ज्यादा ही अकड़ गयी थी।”

मेरी बात सुनकर राज थोड़े मुस्कुराये और सकुचाते हुए बोले, “नहीं डार्लिंग मैं समझ सकता हूँ। मैं ऐसे ही मजाक कर रहा था।”

मैंने रुखसार की मार्गदर्शित बात को चालु रखते हुए राज की और घूम कर पति के सीने पर अपनी ठुड्डी (चिबुक) को रख कर पूछा, “डार्लिंग तुम उस दिन समीर के बारे में क्या कह रहे थे? सच बताऊँ? जब तुम समीर के बारें में बात कर रहे थे तब मैं अपने आपको गुनहगार अनुभव कर रही थी और इसी लिए मैं अपना आपा खो बैठी।”

समीर ने मेरी और आश्चर्य से देखा और बोले, “गुनहगार, पर क्यों?”

 
तब मैंने कहा, “वह इसलिए की उस रात जब समीर बाथरूम का नलका ठीक करने आये थे तब नलका टूटने से पानी के फव्वारे में हम दोनों ही भीग गए थे। मैंने अपने बदन पर वही पतली नाइटी पहनी थी और पुरे भीग जाने के कारण समीर के सामने मैं जैसे पूरी नंगी दिख रही थी। वह मेरे नंगे बदन को घूर घूर कर ताक रहा था। मेरे स्तन और निप्पले खड़ी हुई थी। मेरी नाइटी मेरे पुरे बदन से चिपक कर पूरी तरह से पारदर्शी हो गयी थी। मैंने जब समीर को देखा तो वह भी पूरा भीगा हुआ था और उसके पांवों के बीच उसका लन्ड खड़ा हो गया था। मैं बहुत उत्तेजित हो गयी थी। समीर भी एकदम उन्माद में था। उस शाम को अगर समीर ने थोड़ा सा भी आग्रह किया होता तो पता नहीं क्या हो जाता और आज मैं तुम्हें अपनी शक्ल दिखने के लायक न होती। मैं तुरंत वहां से भाग निकली। इसी कारण मैं अपने आप को गुनहगार अनुभव कर रही थी।”

तब राज ने मेरे स्तनों को प्यार से सहलाते हुए कहा, “डार्लिंग तुम्हें गुनहगार अनुभव करने की कोई जरुरत नहीं है। यह कोई भी स्त्री पुरुष के लिए स्वाभाविक है।”

फिर राज एकदम गंभीर से हो गए। उन्होंने मुझे अपने पास बिठाया और बोले, “देखो डार्लिंग, शादी के कुछ सालों बाद पति बीबी में नवीनता ख़त्म हो जाती है। मैथुन में उत्सुकता, उत्कंठा और रहस्य नहीं रहता। तब फिर एक अलगता या नवीनता लाने की आवश्यकता होती है। अगर पति बीबी में सम्पूर्ण विश्वास हो तो कुछ नवीनीकरण अथवा कुछ नया प्रयोग करने में कोई बुराई नहीं है। क्या मैंने गलत कहा?”

मैंने सहजता से ही जवाब दिया, “नहीं, बात तो आपकी सही है। पर नवीनीकरण से आपका मतलब क्या है?”

तब राज ने कहा, “मेरा मतलब है मैथुन कार्य में विविधता। अथवा यूँ कहो की जिस व्यक्ति के साथ आपको वही पुरानी उत्तेजना का अनुभव हो जो पहली बार सेक्स करने से हुआ था अगर उसके साथ सहजता से सेक्स का अनुभव किया जाय तो उसे नवीनीकरण कह सकते है।”

मैंने फिर वही सवाल दुहराया, “क्या मतलब?”

राज ने जवाब दिया, “तुमने अभी अभी कहा की उस शाम को बाथरूम में समीर के साथ खड़े हुए जब तुम दोनों भीग गए तो तुम और समीर दोनों बड़े उत्तेजित अनुभव कर रहे थे। तुमने यह भी कहा की अगर समीर उस समय कुछ कर बैठता, यानी अगर समीर उस समय तुम्हारे कपडे निकाल कर अगर तुम्हें चोदने के लिए आग्रह करता तो तुम मना नहीं कर पाती क्योंकि तुम भी तो उत्तेजित थी। सही या गलत?”

इस बार मैं चुप रही। राज की बात तो सही थी। राज बोला, “तुम्हारा मौन ही तुम्हारी सहमति दर्शाता है। नवीनता से मेरा मतलब यह है की ऐसे समय में अगर तुमने समीर के साथ सेक्स करने में सहमति दिखाई होती और समीर से तुमने चुदवायी करवा ली होती वह तुम्हारे लिए नविन एवं अति उत्तेजक अनुभव होता और उसीको नवीनी करण कह सकते हैं।”

मैंने थोड़ा झिझकते हुए कहा, “पर यह गलत बात है। यह तो अपने पति के साथ धोका हुआ न?”

राज, “हाँ यदि पति या बीबी से छुप कर करते हों तो। पर अगर पति बीबी दोनों की मर्जी से यह होता है तो फिर धोखा कैसे? बोलो? क्या तुम मानती हो?”

मैं अपने पति की और देखने लगी। मैंने पूछा, “तो बताओ, तुम क्या चाहते हो?”

राज ने तुरंत लपक कर कहा, “क्या तुम हमारे जीवन में नवीनीकरण की इच्छा पूरी करोगी? मेरी इच्छा है की हम दोनों कुछ प्रयोग करते हैं, अगर तुम्हें मुझ पर पूरा विश्वास हो तो।”

मैंने राज की विशाल छाती में अपना मुंह रगड़ते हुए कहा, “मुझे तुम पर पूरा विश्वास है। अब मैं तुमसे कोई दलील अथवा विरोध नहीं करुँगी। तुम मेरे लिए पति से भी अधिक एक दोस्त और शुभ चिंतक हो। तुम जैसा ठीक समझो ऐसा करो।”

राज ने कहा, “ऐसे नहीं, तुम यह कहो की तुम जो करोगी अपनी मर्जी से करोगी। दूसरी बात अपने आप को रोकोगी नहीं।”

मैंने अपनी मुंडी हिलाते हुए राज को “हाँ” कहा।

 
मुझे शत प्रतिशत पता नहीं था की मेरा पति रुखसार के साथ सो चुका था या नहीं। हालांकि रुखसार ने अश्पष्ट रूप से मुझे कह ही दिया था की उसने अपने आप को समीर और राज दोनों को समर्पित कर दिया था। रुखसार के साथ बात में मैंने यह स्पष्टता से पूछना ठीक नहीं समझा की क्या वह मेरे पति के साथ सो चुकी थी या नहीं। । पर राज की बात तो सही थी। अगर राज ने रुखसार को चोदा भी था तो मुझे उसे धोकेबाज कहना को कोई हक़ नहीं था क्योंकि उसने मुझसे पहले से ही इजाजत ले रक्खी थी।

राज ने तुरन्त मेरे होंठ पर अपने होंठ रखे और मुझे एक घनिष्ठ चुम्बन किया और बोला, “अब मैं चाहता हूँ की अगर समीर के साथ तुम्हें ऐसा दुबारा मौक़ा मिले तो तुम समीर को और अपने आपको रोकोगी नहीं।”

मैं सोच में पड़ गई। अब मुझे समझ में आया की रुखसार मुझे सही कह रही थी। उसने मुझे कहा था की राज चाहता था मैं समीर से करीबी बढाऊँ। रुखसार ने यह कहा था की मैं उसका विरोध न करूँ और उसको कहूँ की मुझे थोड़ा समय चाहिए।

तब मैंने हिचकिचाते हुए राज से कहा, “डार्लिंग, मैं थोड़ी नर्वस हो रही हूँ। मैं इतनी जल्दी बदल नहीं सकती। मुझे थोड़ा वक्त दो और थोड़ी धीरज रखो।”

मैंने यह क्या कह दिया, मेरे पति की जान में जैसे जान आगयी।

पहली बार मैंने राज के ऐसे विचारों का विरोध नहीं किया। सच पुछो तो समीर के बारेमें मैं भी थोड़ा चिंतन कर रही थी और मैंने अनुभव किया की मैं भी तो समीर से सेक्सुअली आकर्षित थी। पर मैं अपने आपको दोषी अनुभव कर रही थी। उस दिन मेरे पति ने मुझे उस दोष भाव से मुक्त कर दिया।

उस दिन उन्होंने मुझे यह एहसास दिलाया की मेरी भावनाओं का भी कोई वजूद है। मेरे मन में वास्तव में मेरे पति के प्रति और सम्मान और प्रेम और भी बढ़ गया। तब मैं यह सोचने लगी की वास्तव में ही मेरे पति यदि रुखसार को चोदना चाहते हैं तो मुझे उनको हतोत्साहित नहीं करना चाहिए बल्कि उन्हें इसमें सहायता करनी चाहिए। मुझे पता था की वह तो मेरे ही रहेंगे वह मुझे और मेरी बेटी को कभी नहीं छोड़ेंगे और समीर रुखसार को नहीं छोड़ेंगे इसका मुझे पूरा यकीन था। दूसरे समीर और राज हम बीबियों की बड़ी इज्जत करते थे। वह हमारी बदनामी कैसे बर्दाश्त कभी नहीं होने देते। जब मैंने यह सब गहराई से सोचा तो फिर मैं एक आझाद पंछी की तरह महसूस करने लगी

मेरे पति राज ने मुझे अपनी बाहों में लेकर मेरे बदन के हर अंग अंग में चुम्बन करने लगे और ऐसे प्यार करने लगे जैसे वह मुझसे पहली बार प्यार कर रहें हो। इनका यह भाव देख कर मैं हैरान रह गयी। मेरा थोड़ी नरमी दिखने पर ही वह इतने कृतज्ञ अनुभव कर रहे थे। मैंने सोचा मैं अपने पति को ऐसे मौज करराउंगी की वह भी याद करेंगे।

मैंने उनसे कानोंमें फुसफुसाते हुए कहा, “एक बात कहूँ?” राज ने मेरी और देखा और बिना बोले अपना सर हिलाया।

मैंने कहा, “डार्लिंग सच बोलो, क्या तुम रुखसार से सेक्स करना नहीं चाहते? क्या तुम रुखसार की और कामुक भाव से आकर्षित नहीं हो ?”

 
मैंने देखा की मेरे पति के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी। उनके चेहरे के भाव देखकर मैं हंसकर उनका हाथ थाम कर बोली, “अरे यार, इतना परेशान क्यों हो रहे हो? मैं जानती हूँ की तुम रुखसार पर फ़िदा हो। वह वास्तव में बहुत सुन्दर और सेक्सी है तो अच्छी तो लगेगी ही। और वह भी तो तुमसे आकर्षित है। यह मुझे रुखसार ने खुद बताया है। मैं तो तुम्हें कहती हूँ की जाओ और उसे पटाओ और अपना झंडा गाड़ दो और किला फ़तेह करो। मैं एक बार रुखसार को तुमसे चुदती देखना चाहती हूँ। अगर तुमने यह कर लिया तो मैं तुम्हारी कोई भी बात मानने के लिए तैयार हूँ।”

मेरी यह बात रुखसार के प्लान के मुताबिक़ नहीं थी। पर उस समय मैंने भी जोश में मेरे पति की सबसे प्रबल ललक की पूर्ती करने की आझादी दे दी। और फिर अगर मेरा पति मुझे समीर से चुदवाना चाहता था तो फिर रुखसार को क्यों छोड़ दिया जाये?

मेरी बात सुनकर राज का चेहरा खिल उठा। उसने मेरी नाइटी के बटन खोलना शुरू किया। वह धीरेसे बोला, “पर मैं चाहता हूँ की पहले मैं समीर और तुम्हे करीब लाना चाहता हूँ। तुम विरोध तो नहीं करोगी न?”

मैं झिझकते हुए बोली, “मैंने तुम्हें कहा है न, मुझे तुम पर पूरा विश्वास है। पर जो भी करो मुझे थोड़ा समय जरूर देना, प्लीज? एक बात और, जैसा की मैंने अभी आपसे कहा, अगर आप रुखसार को पटा लेते हो तो समझो मैं इसमें आपके साथ ही हूँ।”

उस रात राज इतना खुला हुआ था और मुझे उसने इतना प्यार दिया और उतने प्रेम से और मुझे सेक्स का भरपूर आनंद देते हुए चोदा की जैसे उसने पहले कभी नहीं चोदा था। उस रात मैं भी इतनी खुली हुई और आनंदित थी और मैं उसके लिए रुखसार की शुक्रगुजार थी।

दूसरे दिन सुबह से ही बिजली गायब थी। राज ने बिजली ठीक करने के लिए बिजली के मीटर के पास जाकर बड़ी कोशिश की के उसे ठीक करे पर कुछ न हुआ। आखिर में उसने मुझे कहा की वह बिजली मिस्त्री को फ़ोन करेगा। जब राज ने फ़ोन किया तो पता चला की हमारे मोहल्ले का ट्रांसफार्मर जल गया था और दुरस्त होते होते शाम हो जाएगी।

ऑफिस पहुँच कर राज का फ़ोन आया की वह उस दिन शाम तीन दिन की टूर पर जा रहा था। मुझे कुछ खरीदारी करनी थी। हमारे घर से थोड़ी सी दूर हमारे एक पड़ोसि युगल को कोई बच्चा नहीं था। वह दोनों मेरी बेटी गुन्नू से बहुत प्यार करते थे। जब मौका मिलता वह गुन्नू को ले जाते और उसके साथ खेल करके उसे कुछ खाना खिलाके वापस दे जाते थे। गुन्नू भी उन्हें बहुत पसंद करती थी और अक्सर उनके वहां जानेके लिए तैयार रहती थी।

मैंने शामको गुन्नू को उन्हीं के वहाँ छोड़ा। और राज जब तैयार हो कर स्टेशन जाने के लिए निकले तो मैं भी राज के साथ टैक्सी में ही निकल पड़ी क्योंकि मुझे कुछ खरीदारी करनी थी। राज मुझे मार्किट में छोड़ कर स्टेशन के लिए निकल गए। शॉपिंग कर के मैं देर शाम को जब गुन्नू को पडोसी के वहाँ लेने के लिए गयी तो पता लगा की बिजली नहीं आयी थी।

घर पहुंचते ही थोड़ी देर में अँधेरा हो गया। मोमबत्ती के प्रकाश में ही मैंने खाना बनाया। रसोई से जब बाहर निकल कर बारामदे में आयी तो मैंने देखा की हमारे पड़ोसियों के वहां तो बिजली आ चुकी थी पर हमारे घर में अँधेरा था। तब तक शामके आठ बज चुके थे। मैंने जब बिजली मिस्त्री को फ़ोन किया तो पहले तो उसने फ़ोन उठाया ही नहीं फिर काफी देर फ़ोन कर ने के बाद जब एक बार उसने फ़ोन उठाया तो झल्लाकर कह दिया की वह व्यस्त था और उसने आने से मना कर दिया।

 
मैं बड़ी परेशान हो गयी। अब पूरी रात अकेले अँधेरे में गुजारना मेरे लिए असंभव सा था। रात को मुझे बहुत डर लगता था और हमेंशां मेरे पति के होते हुए भी मैं रसोई अथवा बाथरूम की लाइट चालु रख कर सोती थी। मुझे समझ में नहीं आया की मैं क्या करूँ। मैंने जब मेरे पति राज को मोबाइल पर फ़ोन किया तो वह पहुँच के बाहर था।

अब तो पूरी रात अँधेरे में ही गुजारनी थी। डर बहुत लग रहा था, पर क्या करती? मन तो किया की समीर को बुलाऊँ। फिर सोचा हर वक्त समीर को परेशान करना भी ठीक नहीं। दूसरे रुखसार भी सोचने लगेगी की कुछ भी हुआ तो हर बार मैं समीर को ही क्यों बुला लेती हूँ? मनमें यह भी डर था की अगर इस बार ऐसा वैसा कुछ हुआ तो मैं समीर को और अपने आप को भी रोक नहीं पाऊँगी।

मैंने मन मसोस कर अपना नाइट गाउन निकाला औरअंदर के सारे कपडे (ब्रा, पैंटी आदि) निकाल कर और बिस्तर लगाने लगी। अचानक फ़ोन की तेज घंटी बजी तो कुछ क्षणों के लिए मैं काँप उठी। मैंने सोचा,”इस वक्त कौन फ़ोन कर सकता है?”

मैंने फ़ोन उठाया तो समीर फ़ोन पर थे। समीर ने पूछा, “मुझे राज ने बताया था की तुम्हारे घरमें दिनभर बिजली नहीं आयी थी। तो अब क्या बिजली ठीक हो गयी?” मैंने कहा मैं अँधेरे बैठी थी।

समीर ने पूछा, “फिर तुमने मुझे फ़ोन क्यों नहीं किया?” तो मैंने कहा की मैं उन को इतनी रात गए कष्ट देना नहीं चाहती थी।

तब समीर ने मुझे एक तगड़ी लताड़ लगाते हुए कहा, “डॉली, मैं तुमसे बहुत नासमीर हूँ। तुमने मुझे अपना नहीं समझा। तुम मुझे कष्ट न हो इस कारण अँधेरे में बैठी हो? मैं अब तुमसे और राज से बात नहीं करूँगा। अगर सम्बन्ध का मतलब यही होता है तो मेरे लिए इस सम्बन्ध की कोई आवश्यकता नहीं है।”

मैं समझ नहीं पा रही थी की उसे क्या जवाब दूँ। फिर समीर ने मुझे अत्यंत धीरज से जब पूछा तो मैंने समीर को सारा हाल बताया। एक और मैं समीर को कष्ट देना नहीं चाहती थी तो दूसरी और मेरा मन समीर को बुलाने पर अत्यंत व्याकुल था। मेरे मन में एक भयंकर द्वन्द चल रहा था। मैं एकदम दुखी और असहायता का अनुभव कर रही थी। समीर की सहानुभूति के कारण मैं अपने आपको रोक नहीं पायी और शाम तक हुई मेरी कहानी समीर को बताते बताते रोने लगी।

मेरी बात सुनकर समीर बड़े दुखी हो गए। समीर ने कहा, “तुम ज़रा भी परेशान मत हो। मैं अभी पहुंचता हूँ। रुखसार तीन दिन के लिए अपने मायके गयी है और मैं अभी कहीं खाना खाने के लिए बाहर जा रहा था।”

मैंने बड़ी राहत की सांस ली। मैंने समीर को कहा की वह डिनर हमारे यहां कर सकता है, क्योंकि मेरे वहाँ खाना तैयार था। समीर थोड़ी देर चुप रहा फिर उसने कहा की वह थोड़ी ही देर में आ जायेगा। समीर मेरे घर करीब दस बजे ही पहुंचा। उसने जब छान बिन की तो सब कुछ ठीक लग रहा था। मैं रसोई में खाना गरम करने में लग गयी। उसको समझ में नहीं रहा था की क्या दिक्कत थी। जब उसे थोड़ी देर लगी तो मैंने कहा पहले खाना खालें फिर बिजली को देखते है।

गुन्नू उस समय सो चुकी थी। समीर और मैंने खाना खाया। समीर ने खड़े होते हुए कहा की शायद बिजली का फ्यूज ही शार्ट हो गया था, उसे चेक करनेकी जरुरत थी। समीर मेन स्विच चालु करने गए और मैं बर्तन साफ़ कर सब ठीक करने लगी थी की मेरा पूरा घर जगमगाहट से चमकने लगा। बिजली आ चुकी थी। अँधेरे में से प्रकाश में आते समय जैसे आँखें चौन्धिया जाती हैं वैसे ही हुआ। अचानक एक धड़ाम सी आवाज आयी। मैं घबराकर दौड़ी। मैंने समीर की चीख सुनी।

मैं दौड़ कर जब समीर के पास पहुंची तो देखा की समीर एक टेबल से टकरा कर फर्श पर नीचे बेहोश होकर गिरे हुए थे। शायद उन्हें बिजली का झटका लगा हुआ था। मैंने उन्हें उठाने की कोशिश की पर वह बेहोशी में थे। मुझे समझ नहीं आया की मैं क्या करूँ। मैंने एक गिलास में पानी ले कर समीर के मुंह पर छिड़का तो धीरे धीरे उनकी आँखें खुली। लगता था उन्हें काफी दर्द हो रहा था।

 
समीर की आँखें ठीक से देख नहीं पा रही थी। मेरी और एक पलक देखा और शायद वह मुझे पहचान नहीं पाए और टूटे फूटे शब्दों में बड़बड़ाये, “रुखसार मुझे बिजली का झटका लगा है। मुझे बिस्तर पर लिटा दो।“ समीर मुझे रुखसार समझ रहे थे। समीर को ऐसा लग रहा था की वह अपने घर में ही थे।

मैं चुप रही। उस वक्त मैंने समीर को यह कहकर परेशान करना ठीक नहीं समझा की मैं रुखसार नहीं डॉली थी। मैंने समीर के कान में फुसफुसाते हुए पूछा, ” क्या मैं डॉक्टर को बुलाऊँ?” समीर ने आँखें मूंद ली और अपना सर हिला कर मना कर दिया।

समीर एकदम धीमे स्वर में बोले की वोह ठीक हो जाएंगे बस उन्हें थोड़ा सर दर्द हो रहा था। समीर के मुंह से थोड़े थोड़े समय के बाद एक छोटी सी आह निकल जाती थी। मुझसे समीर का दर्द देखा नहीं जारहा था। मेरे लिए समीर ने कितना जोखिम उठाया था। मुझे बड़ा दुःख हुआ। मैं समीर को हलके से घसीट कर, खींचकर बैडरूम में पलंग के पास ले आयी। पर उन्हें उठाना मेरे बस में नहीं था। समीर तभी भी आधी तन्द्रा में ही थे। बैडरूम में अँधेरा था। मेरे पास मौका नहीं था की मैं लाइट जलाऊं।

मैंने समीर को कहा, “समीर थोड़ा सा उठो और पलंग पर लेट जाओ।” समीर ने फिर धुंधलाती नजर में आँखें खोली। समीर को उठाते हुए उनका मुंह मेरी छाती में दबा हुआ था। शायद समीर कुछ देख नहीं पा रहे थे। मेरे स्तन समीर के मुंह पर दबे रहने के कारण मेरे बदन में मैं एक अजीब सी सिहरन का अनुभव कर रही थी। मेरे रोँगटे खड़े हो गए थे। जैसे ही मैंने समीर को थोड़ा उठाया तो वह भी थोड़ा जोर लगा करउठे और पलंग पर लेट गए। मैंने समीर को रजाई में ढक दिया तब अचानक समीर ने रजाई के अंदर से मेरा हाथ पकड़ा और बोले, “रुखसार डार्लिंग मेरे पास आ जाओ और मेरा सर दबा दो?”

मैं क्या करती? चुपचाप मैं रजाई के अंदर समीर के साथ घुसी और समीर का सर दबाने लगी। जैसे ही मैंने रजाई में अपने पाँव घुसाए की मेरी नाइटी मेरी जांघों के ऊपर तक चढ़ गयी। क्योंकि मैं दोनों हाथों से समीर का सर दबा रही थी, मैं अपनी नाइटी को ठीक भी नहीं कर पायी। ऐसा करते हुए मुझे समीर के साथ सिमट कर लेटना पड़ा। मेरा सारा बदन समीर से चिपका हुआ था। उस समय भी मेरे स्तन समीर के मुंह से चिपके हुए थे। जैसे ही मैं समीर का सर दबाने लगी तब समीर के मुंह से “आह” सी आवाज निकलने लगी। समीर को अच्छा लग रहा था। अचानक मैंने अनुभव किया की समीर ने अपना मुंह खोला और मेरी नाइटी के साथ ही मेरे एक स्तन को अपने मुंह में ले लिया और उसे पहले हलके से चबाया और फिर उसे चूमने लगा।

मेरे लिए अपने आप को नियत्रण में रखना नामुमकिन हो गया। मैं समीर के मुंह में अपने स्तनों का अनुभव कर जैसे पगला सी गयी । मेरा रोम रोम रोमांचित हो उठा था। समीर के इतने करीब होने से मैंने समीर के लन्ड को मेरी फुद्दी पर ठोकर मारते हुए महसूस किया। शायद समीर मुझे रुखसार समझ कर उत्तेजित हो रहे थे। उनका लन्ड उनके पाजामें में एकदम खड़ा हो गया था। एक पल के लिए मैंने सोचा की मैं समीर को जगाऊँ और कहूँ की मैं उनकी बीबी रुखसार नहीं राज की बीबी डॉली थी। पर पता नहीं क्यों मैं कुछ भी बोल नहीं पायी।

 
मैंने देखा की मेरे पति के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी। उनके चेहरे के भाव देखकर मैं हंसकर उनका हाथ थाम कर बोली, “अरे यार, इतना परेशान क्यों हो रहे हो? मैं जानती हूँ की तुम रुखसार पर फ़िदा हो। वह वास्तव में बहुत सुन्दर और सेक्सी है तो अच्छी तो लगेगी ही। और वह भी तो तुमसे आकर्षित है। यह मुझे रुखसार ने खुद बताया है। मैं तो तुम्हें कहती हूँ की जाओ और उसे पटाओ और अपना झंडा गाड़ दो और किला फ़तेह करो। मैं एक बार रुखसार को तुमसे चुदती देखना चाहती हूँ। अगर तुमने यह कर लिया तो मैं तुम्हारी कोई भी बात मानने के लिए तैयार हूँ।”

मेरी यह बात रुखसार के प्लान के मुताबिक़ नहीं थी। पर उस समय मैंने भी जोश में मेरे पति की सबसे प्रबल ललक की पूर्ती करने की आझादी दे दी। और फिर अगर मेरा पति मुझे समीर से चुदवाना चाहता था तो फिर रुखसार को क्यों छोड़ दिया जाये?

मेरी बात सुनकर राज का चेहरा खिल उठा। उसने मेरी नाइटी के बटन खोलना शुरू किया। वह धीरेसे बोला, “पर मैं चाहता हूँ की पहले मैं समीर और तुम्हे करीब लाना चाहता हूँ। तुम विरोध तो नहीं करोगी न?”

मैं झिझकते हुए बोली, “मैंने तुम्हें कहा है न, मुझे तुम पर पूरा विश्वास है। पर जो भी करो मुझे थोड़ा समय जरूर देना, प्लीज? एक बात और, जैसा की मैंने अभी आपसे कहा, अगर आप रुखसार को पटा लेते हो तो समझो मैं इसमें आपके साथ ही हूँ।”

उस रात राज इतना खुला हुआ था और मुझे उसने इतना प्यार दिया और उतने प्रेम से और मुझे सेक्स का भरपूर आनंद देते हुए चोदा की जैसे उसने पहले कभी नहीं चोदा था। उस रात मैं भी इतनी खुली हुई और आनंदित थी और मैं उसके लिए रुखसार की शुक्रगुजार थी।

दूसरे दिन सुबह से ही बिजली गायब थी। राज ने बिजली ठीक करने के लिए बिजली के मीटर के पास जाकर बड़ी कोशिश की के उसे ठीक करे पर कुछ न हुआ। आखिर में उसने मुझे कहा की वह बिजली मिस्त्री को फ़ोन करेगा। जब राज ने फ़ोन किया तो पता चला की हमारे मोहल्ले का ट्रांसफार्मर जल गया था और दुरस्त होते होते शाम हो जाएगी।

ऑफिस पहुँच कर राज का फ़ोन आया की वह उस दिन शाम तीन दिन की टूर पर जा रहा था। मुझे कुछ खरीदारी करनी थी। हमारे घर से थोड़ी सी दूर हमारे एक पड़ोसि युगल को कोई बच्चा नहीं था। वह दोनों मेरी बेटी गुन्नू से बहुत प्यार करते थे। जब मौका मिलता वह गुन्नू को ले जाते और उसके साथ खेल करके उसे कुछ खाना खिलाके वापस दे जाते थे। गुन्नू भी उन्हें बहुत पसंद करती थी और अक्सर उनके वहां जानेके लिए तैयार रहती थी।

मैंने शामको गुन्नू को उन्हीं के वहाँ छोड़ा। और राज जब तैयार हो कर स्टेशन जाने के लिए निकले तो मैं भी राज के साथ टैक्सी में ही निकल पड़ी क्योंकि मुझे कुछ खरीदारी करनी थी। राज मुझे मार्किट में छोड़ कर स्टेशन के लिए निकल गए। शॉपिंग कर के मैं देर शाम को जब गुन्नू को पडोसी के वहाँ लेने के लिए गयी तो पता लगा की बिजली नहीं आयी थी।

घर पहुंचते ही थोड़ी देर में अँधेरा हो गया। मोमबत्ती के प्रकाश में ही मैंने खाना बनाया। रसोई से जब बाहर निकल कर बारामदे में आयी तो मैंने देखा की हमारे पड़ोसियों के वहां तो बिजली आ चुकी थी पर हमारे घर में अँधेरा था। तब तक शामके आठ बज चुके थे। मैंने जब बिजली मिस्त्री को फ़ोन किया तो पहले तो उसने फ़ोन उठाया ही नहीं फिर काफी देर फ़ोन कर ने के बाद जब एक बार उसने फ़ोन उठाया तो झल्लाकर कह दिया की वह व्यस्त था और उसने आने से मना कर दिया।

 
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