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ऐसी मोहब्बत को सलाम

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ऐसी मोहब्बत को सलाम


आरव और पल्लवी का इश्क सारे गांव में मशहूर था , शायद ही कोई ऐसा हो जो इस मोहब्बत से अनजान हो , बेहद अजीब था उनका प्यार , सोते- जागते खाते-पीते सिर्फ और सिर्फ एक दूसरे का ही ख्याल रहता था उनके जहन में । एक को चोट लगती है दर्द दूसरे को होता था । हर त्यौहार साथ मनाते थे दोनों। एक पल के लिए भी अलग होते तो एक दूसरे को खोजना शुरू कर देते थे ।

जितनी मोहब्बत थी उतनी ही लड़ाई भी थी। दिन में कम से कम 10 बार पल्लवी रूठती थी और उसे मनाने के लिए आरव हर हद से गुजरने को तैयार होता था , एक बार पल्लवी आरव से रूठ कर छिप गयी, पहले तो आरव ने उसे सब जगह खोजा पर जब ना मिले तो सबसे ऊंची इमारत पर चढ़ गया था जिद्द यह कि पल्लवी को लाओ नहीं तो कूद जाऊंगा । बड़ी जद्दोजहद के बाद पल्लवी उसी इमारत से निकली I बहुत-बहुत कहानियां प्रसिद्ध थी इन दोनों की ।

आज का मंजर बहुत ही ह्रदय विदारक था , देश ने अपने जांबाज सैनिक खोया था , गांव ने अपना सपूत खोया था लेकिन पल्लवी ने तो अपना सब कुछ खो दिया था , उसने अपना बचपन खो दिया था, अपनी जिंदगी के सपने खो दिये थे , अपनी मोहब्बत खो दी थी । उसमे तो जैसे जीने की चाह ही नही बची थी, वह बार-बार बेहोश हो जाती थी और होश में आती तो आरव के शरीर को निहारती थी ।

वक्त किसी के लिए नहीं ठहरता है, देखते ही देखते वह घड़ी भी आ गई जब आरव का पार्थिव शरीर चार कन्धों पर सवार होकर अन्तिम यात्रा के लिए निकल पड़ा ।आस पास के गाँव के लोग भी उमड़ पड़े थे देश के सपूत के अन्तिम दर्शन के लिये ।माँ चेहरे पर पीड़ा लिये मुर्छित पड़ी थी जबकि पल्लवी की पथरायी आंखे अपनी हसरतों के जनाजे को जाता देख रही थी ,अचानक जैसे पल्लवी को कुछ याद आया हो इस तरह उठ कर वो भाग कर सभी के सामने जाकर खड़ी हो गई और हाथ जोड़कर बोली ,

" मुझे दो मिनट के लिए आरव से अकेले मे बात करनी है ,अगर आप लोगों को एतराज ना हो तो, यह हम दोनों के लिए बहुत ज्यादा जरूरी है। "

पल्लवी के इस अनुरोध ने सीधे पंडित जी पर प्रहार किया ,वो लगभग उछलते हुये बोले ,

पंडित जी-- यह क्या कह रही हो बिटिया तुम ? ऐसा भी कभी होता है क्या एक बार अर्थी निकलने के बाद उसे ऐसे कैसे रोक दें, आत्मा को शन्ति नही मिलेगी ।

पंडित जी ने अपना ज्ञानसाझा किया पर पल्लवी वही धूल मेहाट जोड़ कर बैठ गयी ।

पल्लवी-- पर मेरी बात बहुत जरूरी है, आप जिस व्यक्ति की बात कर रहे हैं उसकी आत्मा की शांति के लिए है मेरी बात । यकीन मानिए सिर्फ 2 मिनट लूंगी आपका ।

पंडित जी पल्लवी के आंसू देख कर पिघल गए और पल्लवी और आरव के पिता की ओर देखने लगे पल्लवी के पिता ने लगभग रोते हुए पल्लवी से पूछा

पल्लवी के पापा-- यह तू क्या कह रही है पल्लवी , क्या बात करनी है तुझे? तेरा दिमाग तो ठीक है ? वह नहीं सुन सकता है तेरी बात, हट जा रस्ते से बिटिया ।

पल्लवी के पापा का चेहरा लगातार आंसुओं से भीग रहा था ।

पल्लवी -- पापा प्लीज मत रोकिये मुझे मुझे उससे कुछ बताना है,बहुत जरुरी है मेरे और उसके लिए , वो इन्तजार कर रहा है यह बात सुनने के लिये ।

अपने सुखे होंठो पर जबान फेरते हुये पल्लवी ने कहा ,अब भी उसकी आंखे बता रही थी की कभी भी वह अपनी सुध- बुध खो देगी । थोड़ा ना नुकुर के बाद पल्लवी को अपने पापा , आरव के पापा और पण्डित जी के सामने आरव के पार्थिव शरीर से बात करने का मौका दे दीया गया , सभी थोडा असहज हो रहे थे पल्लवी की इस हरकत से। हिन्दू रीत रिवाज़ के विरुद्ध था सब उपर से आसमान काले बादलों से भर गया था जैसे किसी अपशगुन की चेतावनी दे रहा हो खैर पल्लवी पार्थिव शरीर के पास जाकर पहले तो फूट कर रोने लगी , फिर खुद को सम्हालते हुये वो आरव के पार्थिव शरीर के कान के पास जाकर बोली --

पल्लवी-- बाबू तुम आराम से सो जाओ पर एक खुश खबर सुन लो, "तुम पापा बनने वाले हो और मै मां, हम देश को एक और बहादुर सैनिक देने वाले हैं, तुम्हरा अधूरा काम वो पूरा कर देगा और हम सब का खयाल भी रखेगा , अब तुम चेन से सो जाओ मेरी जिन्दगी "

इससे ज्यादा नहीं बोल पायी वो और वही धूल मे ढेर हो गयी , पल्लवी की बात सुन उसके पिता को बहुत बड़ा आघात लगा जबकि आरव के पिता का सब्र वापस टूट गया , जवान बेटे का दर्द तो सह गये थे पर बिन बसे उसका उजड़ चुका संसार उनकी आत्मा को छलनी कर रहा था । उनकी आंखो के सामने उनके बेटे की हसरत बिन ब्याही बिधवा सी पड़ी थी ।

आरव के पापा कभी आरव के पार्थिव शरीर को तो कभी पल्लवी को देख रहे थे , उनके दिमाग में हजार बातें चल रही थी परंतु उन सब बातों पर अमल करने का यह सही वक्त नहीं था , पंडित जी ने उनको इशारा किया और वापस शव यात्रा चल पड़ी । अपने अंतिम पड़ाव की ओर।

सभी चले गए । सब कुछ सुना हो गया था । घर की दहलीज पर आरव की मां और रास्ते की धूल पर पल्लवी पड़ी थी । पल्लवी की मां लगातार पल्लवी को उठाने की कोशिश कर रही थी, पर पल्लवी के शरीर में तो जान ही नहीं बची थी जैसे ।

आरव को गए 13 दिन बीत चुके थे , घर पर आयोजन था जिसे आम भाषा में तेरहवीं भी कहा जाता है । आस-पास के गांव उमड़ पड़े थे सांत्वना और उसकी आत्मा की शांति वाले भोज के लिए । आज तो आरव के फौजी मित्र भी आए थे साथ ही उसका छोटा भाई भी आया था जो खुद भी फौज में था । अर्नव नाम था उसका । उसके आते आज फिर 13 दिन पहले वाला माहौल हो गया था। अर्नव का बिलखना घरवालों की आत्मा को चीर रहा था।

दर्द और शांति के साथ तेरहवीं का आयोजन संपूर्ण हो गया । अर्नव 15 दिन के अवकाश पर आया था गांव। 4 दिन तो शांति से निकल गए पर पांचवें दिन अर्नव के पिता ने एक बहुत बड़ा धमाका कर दिया । उन्होंने अर्नव और उसकी मां को बिठाकर पल्लवी के गर्भवती होने की बात रख दी सामने । बेहद कड़वा सच था यह , पर एक आस भी बनी थी क्योंकि आरव सदा के लिए जा चुका था पर उस का एक अंश जो अब भी उपस्थित था, ममता का अंकुर मां के कलेजे को द्रवित करने लगा । अर्नव को भी समझ नहीं आ रहा था कि वह इस बात पर कैसे रिएक्ट करें । आरव के पापा तो बोलकर खामोश हो गए पर अचानक जैसे उनका मन पढ़कर आरव मां का कलेजा ही फट गया और वह चिल्लाते हुए बोली,

आरव की मां -- कहीं मैं जो समझ रही हूं वह सच तो नहीं है , कहीं आप अर्नव और पल्लवी के ,

बस इतना ही बोल पाई थी आरव की मां इसके आगे उनका गला रुंध गया और वह बोल ही नहीं पाई । अर्नव भी उछल कर खड़ा हो गया पर सच तो यही था कि आरव के पिता के दिमाग में यही चल रहा था । उन्होंने शुन्य में आंखें गड़ाए हुए ही उत्तर दिया,

आरव के पिता -- हां तुम लोग सही समझ रहे हो , मैं आरव की अंतिम निशानी को इस दुनिया में लाना चाहता हूं , मैं उसे मिटने नहीं देना चाहता । हां मैं चाहता हूं कि पल्लवी इसी घर आए और इसका सिर्फ यही एक रास्ता है ,

आरव के पिता ने गहरी वेदना से अपनी आंखें बंद कर ली और आंखों मे भरे हुये आंसू उनके गालों लुढक गये ।

आरव की मां-- आपका दिमाग तो नहीं खराब हो गया है जी , कैसी बहकी बहकी बातें कर रहे हैं आप ।

आरव के पिता -- मेरा दिमाग बिल्कुल दुरुस्त है ,

आरव की मां -- अगर दिमाग दुरुस्त है तो जरा तो सोच कर बोलिए , क्या आप ने यह फैसला लेने से पहले अर्नव से पूँछा ? अरे बच्चा नही है वो अब और ये कोई एक दिन का नही बल्कि उम्र भर का बन्धन होता है ,

आरव के पिता -- सब सोच लिया है मैने ।

आरव के पिता की आवाज मे दुनिया जहन की मायूसी भरी थी ,

आरव की मां-- पल्लवी की रजामंदी जानने की कोशिश की ? उसके घर वालों की रज़ा जानने की कोशिश की ? ऐसे कैसे आपने अपने आप ये फैसला ले लिया ?

आरव की मां का स्वर तेज़ होने लगा

आरव के पिता -- तो क्या करूं मै , सोच सोच कर पागल हो गया हूँ मै , चलो तुम जो बोलोगी मैं वही करूंगा , तुम बोलोगी तो बोल दूंगा पल्लवी के पिता को कि उसका गला घोट कर उसे मार डाले , तुम बोलोगी तो खुद पल्लवी को कल्मुही का दर्ज़ा देकर गाव से निकलवा दूंगा मै । अब सब तुम्हारे हाथ में है बताओ क्या करूं मैं ।

आरव के पिता पहले पूरी ताकत से चिल्लाने लगे और उसके तुरन्त बाद रोना भी शुरु कर दिया उन्होने लेकिन आरव की मां अब भी अपनी बात दोहराती रही ।

आरव की मा --मैं कुछ नहीं जानती हूं , मुझे कुछ नहीं पता है पर मैं सिर्फ इतना जानती हूं कि मेरे किसी भी बेटे के साथ अन्याय नहीं होना चाहिए । मेरे किसी भी बेटे के साथ अन्याय नही होना चाहिये ।

आरव के पिता -- तो क्या आरव का बच्चा हमारा नही है ?

आरव की मां-- है पर ... मै कुछ नही जानती बस ,

आरव की मां अब भी कायम थी अपनी बात पर ,

आरव के पिता-- वाह जब तुम्हारे ऊपर मैंने फैसला छोड़ दिया तो तुमने अपना पल्ला झाड़ लिया , कभी सोचा है कितना कठिन होता है फैसला लेना । आसान होता है तो फैसले पर उंगली उठाना जो तुम कर रही हो । इस समय अगर तुम्हारे पास स्वयं का कोई फैसला नहीं है तो तुम इस कमरे से बाहर निकल जाओ। मैं और अर्नव बात कर लेंगे ।

गुस्से में आरव के पिता की आवाज तेज होने लगी थी,

आरव की मां -- हां हां मैं जा रही हूं लेकिन इतना याद रखिएगा कि मेरे बेटे के साथ अन्याय नहीं होना चाहिए । पहले ही मैं अपना एक लाल खो चुकी हूं कहीं आपकी नादानी पूर्ण फैसले से मेरा यह बच्चा भी यहां से चला ना जाए ।

आरव के पिता -- क्यों तुम्हारा अकेले का बच्चा है , मेरा नहीं है ? क्या मैं इसका भला बुरा नहीं सोचता हूं ? बोलो मायके से लेकर आई थी क्या तुम ?

उन दोनों को बुरी तरह झगड़ते देख अर्नव ने हाथ जोड़कर रुंधे गले से कहा,

अर्नव -- मम्मी पापा आप लोग बहस करना बंद कीजिए । मां आप बाहर जाइए मैं पापा से बात करता हूं , बताइए बात पापा क्या कहना चाहते हैं आप ?

अर्नव अब भी हाथ जोड़े हुये था ,

आरव के पिता-- अर्नव बेटा मै बातों को ज्यादा घुमा फिरा कर नहीं बोलूंगा सिर्फ इतना चाहता हूं पल्लवी की इज्जत बचा लो और इस घर का अंश इस घर को दे दो । मैं तुम्हारे आगे हाथ जोड़ता हूं , तुम्हारे पैर पड़ता हूं। वरना पल्लवी या तो मर जायेगी या बदनामी के डर से आरव का अंश मिटा दिया जायेगा । मेरे पास और कोई रास्ता नही है बेटा,

आरव के पापा वाकई अर्नव के पैरों पर झुक कर फफक पड़े । पिता को इस दशा मे देख अर्नव को अपने सीने मे कुछ टूटता सा महसूस हुआ ।

अर्नव -- पापा यह क्या कर रहे हैं आप प्लीज उठिए । आप जैसा कहेंगे मै वैसा ही करूंगा । मै करूंगा पल्लवी से शादी । मुझ पर यकीन रखिए मैं आप ही का बेटा हूं , मै आपके हर फैसले का सम्मान करता हूँ ।

अर्नव की सहमती पाकर उसके पिता के आंसू तो नही रुके पर चेहरे पर एक राहत के भाव को आसानी से देखा जा सकता था , जवान बेटे को खोने का गम तो कोई भी हल्का नही कर सकता था पर दो मासूम जिंदगियों को बचा लेने की संतुष्टी उनको गहरी तसल्ली जरुर दे रही थी । अर्नव अपने फ़ौजी दोस्तों को स्टेशन छोड़ कर जब वापस आया तो उसने किसी से बात नही की और सीधे अपने कमरे चला गया ।

उस रात आरव के घर का चूल्हा नहीं जला । एक तरीके से दोहरे दुख की मार मे सभी भूखे ही सो गए । सोना तो सिर्फ एक दिखावा था , आंखें मूंदे सभी अपने ख्यालों में गुम थे ।

आरव की मां अपने भाग्य पर रो रही थी । उन्होंने जवान बेटा खोया था । यूं तो उन्होंने देश को एक शहीद दिया था पर औलाद खोने का दुख एक मा ही समझ सकती है। उपर से आरव जैसी औलाद जिसे पाने के लिये ही शायद मातायें छठ देवी की पूजा करती हैं । सेना मे भर्ती होते ही उसने सिर्फ घर ही नही गाव का भी नक्शा बदलवा दिया था । आरव के मां के सीने मे बेटे को याद ममत्व तड़पने लगा । उनके मुह से एक दर्द भरी आह निकली और वो तकिया मे मुह छिपा कर पूरे वेग से रो पडी । बगल मे लेटी अंकिता से अपनी मां की तडप नही देखी जा रही थी पर वो लाचार थी । अंकिता ने अपना सर अपने मां के आंचल मे छिपाया और फफक पड़ी ।

आरव के पापा का भी हाल बुरा था , ऐसा फैसला उनके सर पर आया था कि दिमाग ने काम करना बंद कर दिया था तो दिल धड़कने से इंकार कर रहा था । एक तरफ वह अर्नव की पसंद और उसकी जिंदगी का फैसला उस पर जबरदस्ती नहीं थोपना चाहते थे तो दूसरी तरफ पल्लवी की जिंदगी और आरव की अंतिम निशानी के मोह ने उन्हें पूरी तरह बांध रखा था। वह नहीं चाहते थे कि पल्लवी के घरवाले मारपीट कर आरव की निशानी को मिटा दें और पल्लवी को झोंक दें मरने के लिए किसी अनजान कुएं में । आरव के पापा को एक और बात आहत कर रही थी कि कही पल्लवी की बदनामी ना हो जाए,लड़की के पिता होने के नातेवो बखूबी जानते थे की कितनी नाजुक परिस्थिती थी ये । लेकिन वह यह भी नहीं चाहते थे की अर्नव जबरदस्ती उनकी बात मानकर अपने जीवन की खुशियों को सदा के लिए कुर्बान कर दें। शायद ही उनका दुख कोई समझ सकता था ।

अर्नव की तो बात ही ना पूछें जिस अपार दर्द से वह गुजर रहा था घरवालों को तो उसका अंदाजा भी नही था । उसने अपने प्यारे भाई को खोया था जो उसका गॉड फादर , गाईड, मेंटोर सब था । उपर से पल्लवी से शादी की बात । सपने मे भी नही सोच सकता था वो । हमेशा आरव को चिढ़ाने के लिये यही कहता था की " भाभी से शिकायत करूंगा " लेकिन वक्त ऐसा आ गया था कि सोचना पड़ रहा था। अर्नव का काफी देर से रो रो कर बुरा हाल हो गया था , सर भारी हो रहा था ।उसने स्मोक करने की सोची, बैग खोला सिगरेट निकलने के लिये तो हाथ मे कलाई घड़ी आ गयी ।

दिल धडक गया अर्नव का । ये उसे नैना ने दी थी । नैना को तो वह इन सब बातों मे भूल ही गया था । वह नहीं समझ पा रहा था कि क्या जवाब देगा नैना को। वह भी तो नैना के साथ जिंदगी जीना चाहता था, बेइंतहा मोहब्बत करता था उससे। आरव को तो मिलवा भी चुका था उससे । दो साल का साथ था दोनों का पल भर मे कैसे छोड़ सकता था । उसके कलेजे में दर्द धड़क रहा था ।उसे यही बात खाए जा रही थी कि कैसे वह सामना करता नैना का , कैसे उसे बताएगा कि वह अपने माता पिता की मर्जी से खुद को मर्यादा और कर्तव्य के हवन में भस्म कर रहा है। अर्नव अच्छी तरह जानता था कि नैना भी नंबर 1 की जिद्दी थी , वह इतनी आसानी से तो नहीं मानेगी या उसके बारे में यही बोलना सही होगा कि वह तो इस घर की ईंट से ईंट बजाने वाली थी । आने वाला समय सोच कर ही अर्नव के रोए खड़े हो गए थे ।

इनके घर इनके परिवार और इनकी समस्याओं से कुछ दूर अपने घर में आधी रात के समय पल्लवी आंसू बहा रही थी। उसके बिस्तर पर आरव की तमाम तस्वीरें जहां तहां बिखरी हुई थी । किसी में वह दोनों खुशी से घूम रहे थे , तो किसी में झूला झूल रहे थे , एक तस्वीर जो पल्लवी की गोद मे पड़ी थी उसमे वो दोनो किसी मन्दिर के बाहर खड़े हुये थे । हर एक लम्हे की यादें इस समय पल्लवी के सामने फैली थी। पल्लवी को भी समझ नहीं आ रहा था की कौन सा रंग दिखाने वाली है जिंदगी अब उससे आखिर कैसा होगा उसका आने वाला कल । वह आरव की तस्वीरों को अपने सामने रखकर उससे जीने की हिम्मत मांग रही थी। कुछ तस्वीरें तो ऐसी थी की अनायास ही पल्लवी के चेहरे पर मुस्कान तैर जा रही थी । यूँ ही आंखों ही आंखों मे सभी की रात बीत गयी ।

इस गाव से दूर जसलमेर के एक बड़े होटल के कमरा नं 42 मे हंगामा मचा हुआ था , एक लड़की अपनी पूरी ताकत से चीख कर किसी से फ़ोन पर बात कर रही थी ।

" मै अभी उसके अभी उसके गाँव जा रही हूँ, प्लीज मुझे ऐड्रेस बताओ, मै देखती हूँ वो कैसे किसी और से शादी करता है, नानी ना याद दिला दी अर्नव के बच्चे को तो मेरा नाम नैना नहीं "

थोड़ी ही देर में लड़की अपने छोटे से बैग को पैक करके बाहर खड़ी टैक्सी की प्रतीक्षा कर रही थी , टैक्सी वो सारे सोच मे गुम रही , ट्रेन मे भी बिना कुछ खाए पिए पड़ी रही । बस कभी सिसक कर रोती तो कभी गुस्से से तमतमा उठती । कभी कभी तो अपनी शिकायतें खुद से ही बुदबुदा उठती । दूसरी सुबह भोर मे ही वो जा पहुंची वो अर्नव के गाव के स्टेशन । कडाके की ठंड उपर से नैना के पास शाल भी नही थी, ठंड ने गुस्से की आग मे घी का काम कर दिया । खैर बेचारी बडी हाय मुश्किलों से पता पूंछते पूंछते 10 बजे के करीब वो अर्नव के घर तक पहुंच पायी ।

अर्नव और उसके पापा घर के बाहर ही बैठे हुए मिल गए नैना को , अर्नव को देखते ही उसे यह भी ख्याल नहीं रहा कि अर्नव के पापा भी बगल में ही बैठे हुए हैं, वो धड़ धडाते हुये अर्नव के सामने जाकर खड़ी हो गयी और चिल्लाने लगी ,

नैना-- अर्नव तेरा दिमाग खराब हो गया क्या ? तुझे जान से मार दूंगी मैं ? तू समझता क्या है खुद को ? जब तेरी जो मर्जी आयेगी करेगा ?

नैना की बात का अर्नव कोई जवाब देता इससे पहले ही अर्नव के पिता बोल उठे,

अर्नव के पिता-- क्या हुआ बेटा कौन हो आप और चिल्ला क्यू रही हो ?

नैना-- मै कौन हूं यह तो आप अपने बेटे से ही पूछें , यह ज्यादा बेहतर बताएगा ।

नैना की बात सुन कर पापा अर्नव की ओर देखने लगे,

अर्नव-- पापा मैं ,पापा वो ,पापा इसको , मै आपको सब समझा दूंगा ।

अर्नव को हकलाते देख नैना तपाक से बोली,

नैना -- यह क्या पापा पापा पापा लगा रखा है , क्यों नहीं बताते हो मैं कौन हूं या तुमको शरम आ रही हो तो मै खुद बता दूं ?

अर्नव -- नैना तुम चुप रहो ,

अर्नव ने नैना को घूरते हुये कहा और खड़ा होकर उससे धीरे बात करने को कहा । नैना का गुस्सा काम नही हुआ पर अर्नव की बात मानकार उसने अपना वॉल्यूम जरुर काम कर लिया अब वो उतने हाय गुस्से मे फुसफुसा कर बोलने लगी ।

नैना-- बहुत अच्छे महाशय , मैं चुप रहूं और तुम किसी और के साथ शादी करके नई दुनिया बसा के बैठ जाओ, इतनी बड़ी वाली उल्लू समझ रखा है क्या ?

अर्नव के पापा-- बेटा यह क्या बोल रही हो ?

नैना -- पिता जी प्रणाम, गौर से सुनिये, मेरे साथ कितना बड़ा अन्याय हो रहा है, आपका बेटा मेरे साथ धोखा कर रहा है, वहां पर तो बड़े-बड़े वायदे किये इसने और अब अपने फायदे के लिए उन वायदों को भूल गया है, मै बहुत दूर से फरियाद लेकर आई हू और एक रिवोल्वर भी ।

नैना का अंदाज नाटकीय था पर रिवोल्वर और आंसू असली थे ।
 


अर्नव के पापा-- बेटा तुम क्या बोल रही हो मेरी तो कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है ?

नैना-- पिता जी पहले मुझे कुछ खाने को दीजिये वरना मै अपना हक मांगने से पहले ही मर जाऊंगी , टेंशन में कल से कुछ खाया ही नहीं है, पहले कुछ खा लूं फिर आराम से आपको सारी कहानी सुनाऊंगी ।

नैना ने आंसू भरी आंखों का राम बाण फैंका,पर पिता जी से पहले ही अर्नव बोल पड़ा ।

अर्नव-- जी नही ऐसा कुछ नहीं है । तुम अभी तुरन्त यहां से जा रही हो समझी ,चलो मैं बाहर कुछ खिला दूंगा ,

अर्नव ने नैना का हाथ पकड़ कर घसीटना चाहा ,

नैना-- अगर तुमने ऐसा किया तो मैं सारे गांव को चीख-चीखकर तुम्हारा और मेरा रिश्ता बता दूंगी , वह भी सबूत के साथ फिर मत कहना कि मैंने तुमको वार्न नहीं किया था ।अहसान फ़रामोश कही का । मेरी 15 मैगी खा कर पचा चुका है और मुझे 1रोटी भी ऑफ़र नही किया ।

नैना के तेवर देखकर अर्नव चुप हो गया,अब उसके पास नैना को अंदर ले जाने के सिवा कोई चारा नहीं था ।

नैना किसी विजयी योद्धा की तरह अन्दर आई पर अन्दर का मातमी नजारा देख कर नैना सोच मे पड़ गयी , उसे अचानक आरव के शहीद होने वली बात याद आ गयी जो इन सब बवाल मे वो भूल गयी थी । अब उसे ये बात भी परेशान करने लगी की आरव की मृत्यू को मात्र 15 दिन ही बीते थे , तब क्यू अर्नव की शादी की चर्चा हो रही थी। वो आंगन के कोने मे खामोश खड़ी अपनी सोच मे गुम थी । उसे कोने मे खामोश खड़ी देख अर्नव की मां नैना के पास गयी और बोली ,

अर्नव की मां-- कौन हो बेटी तुम और किससे मिलना है?

नैना -- मां जी मेरा नाम नैना है, मैं अर्नव की दोस्त हूं, शहर से आई हूं ।

अर्नव की मां -- अच्छा तो तुम अर्नव की दोस्त हो । कुछ काम था क्या बेत उससे ?

नैना- नहीं मां मुझे बस कुछ बात करनी थी उनसे ,

अर्नव की मां-- ठीक है बेटा अंदर आओ , नहा धो लो , कुछ खा लो ,अर्नव आता होगा ,

नैना--जी मां जी,

नैना को आरव की मां ने अंकिता के कमरे मे पहुंचा दिया ।वो नहा-धोकर तैयार हो गई । आब उसने सिंपल सी प्याजी रंग की साड़ी पहन ली थी , जब अर्नव अंदर आया तो उसका मुंह उतरा हुआ था , नैना ने तुरंत ही पढ़ लिया कि आखिर अर्नव के मन में क्या है। वह जानती थी कि अर्नव डर रहा है कि कहीं नैना उसकी बेइज्जती ना करें । अर्नव का चेहरा देखकर नैना ने शांत लफ़्ज़ों में कहा,

नैना-- डरो मत मैं तुम्हारी बेइज्जती नहीं करूंगी मैं तो सिर्फ तुमसे इतना कहना चाहती हूं कि मैं तुमसे प्यार करती हूं । तुम्हारी जिंदगी में मेरी भी जिंदगी का फैसला शामिल है, अगर कुछ बात है तुम मुझसे भी तो , कहो मिलकर फैसला कर लेंगे, मै कभी तुम्हारी खुशी की दुश्मन नही बनूंगी ये याद रखना ।

नैना ने सिसकते हुये हाथ जोड़कर कहा तो अर्नव का भी गला भर आया ।

अर्नव-- नैना सॉरी , सब कुछ इतना अचानक हो गया कि तुम्हें बताने का मौका ही नहीं मिला ।

नैना-- मुझे मत सिखाओ अर्नव शादी के फैसले अचानक नहीं होते है। यह जिंदगी और मौत के फैसले होते हैं। सिर्फ एक नहीं दो लोगों की जिंदगी जुडी होती हैं बल्कि उनसे जुड़ी तमाम जिंदगियां शामिल होती हैं । कैसे कोई एक पल में शादी का फैसला कर सकता है ?

अब नैना के आंसू बेकाबू हो चले थे ,

अर्नव-- मत मानो तुम पर सच यही है , प्लीज समझने की कोशिश करो तुम , कुछ मजबूरियां हैं मेरी , मै उस इन्सान को ना नही बोल सकता हू जिसने मेरी खुशियों के लिये खुद को समर्पित कर रखा है और ना ही मै फर्ज से पीछे हट सकता हूँ । मुझे उन सांसो को समेटना है जिसमे मेरे भैया का दिल अब भी धडक रहा है ।

नैना-- मै कुछ भी नही समझी यार तुम्हारी क्या मजबूरी है । प्लीज एक बार खुल कर बताओ तो सही हो सकता है मेरे पास कोई उपाय हो । मै भी तो कुछ हूँ तुम्हारी ऐसे एक पल मे पराया तो ना करो ।

नैना ने साड़ी के पल्लू से अपने आंसू पोंछते हुये कहा तो अर्नव नैना के आंसू देख पिघल गया । क्यू ना पिघलता ये वही लड़की थी जिसके लिये वो मौत से भी टकराने को तैयार था । इसी लड़की से मिलने के लिये कितनी बार उसने बिमारी का नाटक किया था ( नैना फौज मे डॉक्टर है ) । अर्नव सब कुछ बताना ही उचित समझा लेकिन वो कुछ बोलता उससे पहले ही वहां पर खाने की प्लेट लिये अंकिता आकर खड़ी हो गयी ।

अंकिता के तेवर देख अर्नव को कुछ नही समझ आया कि कैसे रिएक्ट करे तो वह तुरन्त ही वहां से चला गया । काफी परेशान था अर्नव क्यू की वो नैना की जिद्द से भली भान्ति परिचित था । नैना दुखी मन से अर्नव को जाते हुये देख रही थी और अंकिता नैना के चेहरे पर आने वाले भावो को पढ़ रही थी अंकिता ने बड़े प्यार से नैना से कहा ,

अंकिता-- कैसे जानती हो अर्नव को तुम ?

नैना-- जी मेरे भैया अर्नव के दोस्त हैं और मै भी फौज मे डॉक्टर हू ।

नैना उम्मीद भरी आवाज मे कहा ।

अंकिता-- अच्छा फौज से पहचान हुई तुम दोनो की ?

नैना-- जी हां ।

अंकिता-- यहां क्यों आई हो नैना ?

अंकिता ने नैना की आंखें पढते हुये यह सवाल किया था , सकपका गयी नैना इस सवाल को सुनकर ।

नैना -- जी मैं समझी नहीं ।

अंकिता-- क्या नही समझी , अरे यहां पर किसी काम से आई हो ?

नैना-- जी मै अर्नव से कुछ बात करने आई हूँ ।

नैना की आंखें एक बार फिर नम हो गयी थी ।

अंकिता -- बात करने या कुछ और मतलब है तुम्हारा ??

अंकिता ने कडवाहट से कहा ।

नैना-- मेरा क्या मतलब हो सकता है आप ऐसे क्यों बात कर रही है ?

अंकिता-- बुरा मत मानना अगर मै जो सोच रही हूँ वही बात है तो तुमसे हाथ जोड़कर निवेदन है कि अर्नव को भूल जाओ । उसी में तुम्हारा और अर्नव का दोनों का भला है ।

अंकिता सर पर हाथ रखे चारपाई के कोने पर बैठ गयी ।

नैना-- अरे वाह! कितनी आसानी से बोल दिया आपने की भूल जाओ । हलवा है क्या , कान खोल कर सुन लिजिये अब इस जनम मे तो यह सम्भव नही है बाकी आप सब लोग खुद भी समझदार हैं ।

नैना ने खाने की प्लेट को हाथ तक ना लगाया और कमरे से बाहर आकर आंगन मे खड़ी हो गई । उसने देखा की अर्नव की मां वही आंगन के कोने मे चटाई डालकर लेटी हुई हैं और अर्नव आंगन मे लगे हैण्ड पम्प से पानी भर रहा है । नैना को एकदम से घुटन सी होने लगी ।उसने सोच भी नही था कि जिन्दगी मे कभी ऐसे हालात का भी

सामना करना पड़ेगा । आज वो उसी घर मे थी जिसके सपने देखा करती थी पर वो सबकी आंखों मे खटक रही थी ,हर चेहरे पर उसके लिये नफरत थी ।

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दोपहर के 12 बज गए थे लेकिन पल्लवी अब तक अपने कमरे से बाहर नही निकली थी । सारी रात तो रोते हुए काटी थी उसने , भोर के वक्त आंखों ने और रोने से मना कर दिया तो जहाँ की तहाँ पैरों को मोड कर लुढक गयी जैसे किसी ने सजा दी हो ।पिछ्ले 15 दिन से यही सिलसिला चल रहा था । जिस दिन आरव की चिता जली थी उस रात पल्लवी छत के कोने मे पैर लटका कर बैठी थी और उस रास्ते को घूर रही थी जिस पर उसकी हसरत ने अन्तिम तकनी दी थी । भोर जब मां को वो कही नही दिखी तो वो घबराकर छत पर आई थी ।

यहाँ हाड़ गलाने वाली ठंड मे पल्लवी को यूं उस रस्ते को घूरते देख उनका कलेजा फट गया था ।अपनी बेटी को सीने से लगा उसके ठंडे पड़ चुके शरीर को अपनी शाल मे छुपा लिया उन्होने और रुंधे गले से बोली थी वो ,

मां--पल्लू रो ले खुल के मेरी लाडो कब तक ऐसे खामोश रहेगी ।

पल्लवी -- मना किया था उसने रोने को मां कैसे रोऊ। कह कर गया था की मेरी मिट्टी जाने के बादआंसू ना बहाना ।

मां--कब तक ऐसे ही सीने मे दर्द भरे रहेगी तू बेटा अब भूल जा उसे ।चल नीचे । सो जा थोडी देर ,

पल्लवी -- कैसे भूलजाऊं मां मेरी जिस्म मे धडक रहा है वो , मेरी सांसों से सांसे ले कर जीने की कोशिश कर रहा है वो । मां मेरे अन्दर पनप रहा है वो ।

अन्तिम पंक्तियाँ पल्लवी ने अपने पेट पर हाथ रख कर कही तो उसकी मां के होश उडते उडते बचे थे । उस घटना को आज 15 दिन हो गये है । पल्लवी को ना देख कर उसके पापा ने पूँछा ,

पल्लवी के पापा -- क्या हुआ आज अब तक सो रही है पल्लू ?

पल्लवी की मां-- दिन रात सिर्फ कुढ़ती ही रहती है ,बड़े दिन बाद चैन की नींद सो रही थी तो मैने नही जगाया ।

पल्लवी के पापा-- कब तक ऐसे मातम मनाएगी । तुमने पूँछा जो मैने कहा था ?

पल्लवी की मां-- किस मुह से पून्छू मै उससे ,कुछ समझ नही आ रहा है ।

पल्लवी के पापा--कही देर नहीं हो जाए पल्लवी की मां ,तब रोने के सिवा कोई चारा नही रह जाएगा । बस उससे बात कर इस मुसीबत से छुटकारा पा लेते हैं ।

पल्लवी की मां को अपने पति की बात सुनकर अच्छा खासा सदमा लगा थोडी देर यूं ही खड़ी रहने के बाद वो धीमी आवाज मे बोली ,

पल्लवी की मां-- यह क्या कह रहे हैं आप पल्लू के पापा ? छुटकारा ? पर ऐसा तो कुछ नहीं कहा था आपने मुझसे । आपने तो बस पल्लवी को उसकी मौसी के घर ले जाने के लिए कहा था ।

पल्लवी की मा काफी परेशान हो गयी थी अचानक से ,

पल्लवी के पापा -- तो क्या इन परिस्थितियो मे मैं उसे घूमने जाने के लिए बोल रहा था । एक तो पहले से ही वो अपने पेट मे पाप लेकर टहल रही है उपर से तुम्हरा दिमाग भी चलना बंद हो गया है ।

इसके आगे वह कुछ नहीं बोल पाए क्यो की पल्लवी की मा चीख पड़ी,

पल्लवी की मां-- यह क्या कह रहे हैं आप ? अभी 15 दिन भी नहीं हुए हैं आरव को गुजरे हुये और आप ? अरे किस मुह से उससे ये बात कहेंगे?

पल्लवी की मा रो पड़ी,

पल्लवी के पापा -- तो क्या करु मैं ? क्या उसने जो किया वह सही है बोलो ? बिना ब्याह के यह सब करना कहां के संस्कार है ये ? अरे हम समाज में रहते हैं समाज से बाहर नहीं रह सकते । कल को जब सबको पता पड़ेगा तो कितनी उंगलियां उठेंगी उस पर । अरे ताने मारेंगे सब पल्लवी को तब क्या कहोगी ? तब भी क्या यही दुहाई देती फिरोगी की अभी लांछन मत लगाईये अभी आरव को गुजरे 15 दिन ही हुये है।

सपने और हकीकत में बहुत अंतर होता है , इंसान अगर चांद पर भी पहुंच जाए तब पर भी रहेगा इंसान भगवान नहीं बन जाएगा । सही यही है कि समाज के नियमों का उल्लंघन करने की जगह इन्हीं नियमों का पालन करा जाए और इस बच्चे को हटाकर जल्द से जल्द कोई अच्छा रिश्ता देखकर पल्लवी की शादी कर दी जाए वर्ना कल को उसकी दुर्गति पर खून के आंसू बहाने के सिवा कोई चारा नही रहेगा ।

बात पूरी करके पल्लवी के पापा भी रो पड़े ।

पल्लवी की मा -- आप सही कह रहे हैं, आप पिता है अपनी बेटी का कभी बुरा नहीं चाहेंगे । पर मुझे माफ करिएगा मैं भी मां हूं और मुझमें इतनी हिम्मत नहीं है कि मैं 1 मां से अपना बच्चा मारने के लिए कहूँ । बेहतर यही होगा कि आप अपनी यह समाजिक ठेकेदारी जाकर अपनी बेटी पर खुद उतारो ।

पल्लवी की मां अपने आँचल मे मुह छिपा कर रोने लगी ।

पल्लवी के पापा-- वह भी कर लूंगा मै , तुम ये याद रखो की बड़ी बड़ी बातें करके कुछ नही मिलता है । बिना ब्याही लड़की को बच्चा पैदा करने के लिए कहोगी और उसके बाद उसका बाद क्या होगा ? चलो मान लो हम उसे लेकर दूर चले जाए सब कुछ छोड़कर पर कल जब समाज उसके बच्चे के बाप का नाम पूछेगा तब क्या जवाब दोगी तुम ? वह बच्चा क्या कहेगा सबसे बोलो ना ? बातें करना बहुत आसान होता है पर सच्चाई में जीना बहुत मुश्किल होता है। सच कड़वा होता है पर सच यही है कि पल्लवी ने गलत किया है, पाप किया है । इससे पहले दुनिया समाज उसे दुष्चरित्र कहे और उसकी बदनामी करें इस बच्चे को खत्म करना पड़ेगा ।इसके अलावा हमारे पास कोई चारा नहीं है समझी तुम।

पल्लवी के पापा ने जब बात तो पल्लवी की मा से कही थी पर पल्लवी भी अपने कमरे के दरवाजे पर खड़ी सुन रही थी । पल्लवी के अन्दर बहुत कुछ टूट गया था पर अपने मां बाप को कुछ कहने की जगह वो घर से चुपचाप निकल गयी , दुख इतना गहरा था की वो असहाय ठीक से चल भी नही पा रही थी । अचानक उसे जोर का चक्कर आया और वो रास्ते मे ही गिर गयी । पल्लवी के गिरते ही औरतों की भीड ने उसे घर लिया ।

दूसरी तरफ नैना आंगन में खड़ी होकर अर्नव के परिवार को बारी-बारी से देख रही थी । उसे समझ में नहीं आ रहा था की उसका भविष्य क्या होगा । अर्नव भी सिर झुकाए हुए था । अपमान का घूंट पीकर रह गई नैना और तेज कदमों से घर से बाहर निकल गई । अर्नव सिर उठाकर उसे जाते देखता रहा पर उसने रोका नहीं । आंसुओं की बूंदें अर्नव के गालों पर टपक गए जिसे किसी ने देखा हो या नहीं पर अर्पिता ने देख लिया ।

अर्नव की आंखों से तो दो बूंद ही टपका था पर अंकिता फूट-फूट कर रोने लगी और हाथ जोड़कर भगवान से बोली,

" भगवान यह कैसा दिन दिखा दिया तूने मेरे भाइयों को । एक तो ले लिया और दूसरे को मौत से बदतर जिंदगी देने वाला है ।कैसा भगवान है तू और कैसा न्याय है यह। एक लड़की की इज्जत को बचाने के लिये मेरा भाई एक लड़की के दिल को तोड़ रहा है । किसी की कोई गलती नही है फिर भी सब को सजा क्यू दे रहे हो भगवान "

अर्नव के घर से निकल कर नैना रोते हुये बिना जाने समझे पैदल ही स्टेशन की ओर चल दी । उसने अब यहाँ एक मिनट भी नही रुकने का फैसला कर लिया था । नैना थोड़ा बहुत ही आगे चली थी की उसे लोगों की भीड़ दिखाई दी जो किसी को घेर कर खड़े थे । किसी हादसे की आशंका होते ही नैना भीड़ की ओर बढ़ गयी ।

नैना ने देखा की भीड़ एक लड़की को घेरकर खड़ी हुई है । लड़की जमीन पर बेहोश पड़ी थी । जैसा कि शहरों में होता है नैना को वही गांव में भी देखने को मिला सभी उस लड़की को घेरे तमाशा देखने के लिए खड़े थे , उसकी मदद के लिए कोई भी आगे नहीं बढ़ा था । नैना बहुत बुरा लगा और उसने आगे बढ़कर कहा,

नैना-- हटिए प्लीज मुझे रास्ता दीजिये , डॉक्टर हूं । मुझे देखने दीजिए।
 


सभी हट तो गये लेकिन गांव वाले ऐसा मुंह बना कर नैना को देख रहे थे जैसे पहली बार कोई महिला डॉक्टर देखी हो ।

नैना को यह सब बहुत अजीब लग रहा था पर फिलहाल उसे फ़िकर सड़क पर पड़ी हुई लड़की की थी ।

नैना ने उसकी नब्ज़ टटोली फिर बगल में खड़ी एक औरत को पानी लाने के लिए कहा । औरत अपने घर से एक लोटा पानी लेकर आई । नैना ने लड़की के चेहरे पर पानी के छींटे मारे , एक दो बार ऐसा करने पर पल्लू ने अपनी आंखों को खोल दी । पल्लू भीड़ देखकर घबरा कर उठ गई। नैना ने उसे पानी पीने के लिए दिया। पल्लवी ने पानी पी तो लिया पर उसने नैना से पूछा ,

पल्लवी-- मैं यहां कैसे पहुंची,

नैना -- आप सड़क पर गिरी हुई थी । आप कहां रहती हैं चलिए मैं आपको आपके घर छोड़ दूं ।

पल्लवी नैना को इनकार करना चाहती थी पर एक बहुत ही विशेष आदत थी पल्लवी की ना कभी किसी का दिल तोड़ती थी ना कभी किसी बात का फ़साना बनाती थी ,पल्लू ने हौले हाँ मे सिर हिला दिया और उंगली से अपने घर की दिशा की ओर भी इशारा कर दिया । नैना ने उसे सहारा दिया और उसका घर लेकर गई ।

पल्लवी की हालत देखकर उसके मां-बाप बहुत घबरा गए । मां के तो हाथ पैर फूल गए और पिता भी दौड़ कर कहीं चारपाई बिछा रहे थे तो कहीं बिछौना बिछा रहे थे। एक पिता का अपनी पुत्री के लिए जिस तरीके से तड़पता है वैसे ही तड़प रहे थे ।सच ही कहा है किसी ने की इंसान को बनाने और बिगाड़ने वाला हालात होता है। थोड़ी देर पहले जो पल्लवी के बच्चे को मारने के लिए बड़ी-बड़ी दलीलें दे रहे थे इस वक्त जब अपनी बच्ची पर संकट आया तो आंखों से आंसू आ रहे थे । वाह रे भगवान खैर नैना बड़े प्यार से सब कुछ देख रही थीं । पल्लवी की मां ने नैना से कहा ,

पल्लवी की मा -- बेटा तुम कौन हो तुम?

नैना ने सिर्फ इतना कहा कि मैं डॉक्टर हूं,ये मुझे रास्ते में मिली ।नैना ने इससे ज्यादा कुछ बताया ना हीं किसी ने पूछा।

नैना जब जाने के लिए उठी तो पल्लवी की मां ने मना कर दिया और बोली,

पल्लवी की मां-- भगवान बन कर आई हो हमारे लिए बिटिया । बैठो चाय चढा दी है। मै कुछ खाने को लाती हूँ तुम्हारे लिये ।

नैना कुछ नहीं बोली । दुख तो उसके अंदर इतना था कि शायद वो सात जन्म नहीं खाती लेकिन वह कहते हैं ना कि पेट की आग अच्छे-अच्छों को पिघला देती है। हौले से सिर हिला दिया नैना ने आंख में आंसू था उसे साड़ी के आंचल के किनारे से साफ कर लिया।

पल्लवी टुकुर-टुकुर नैना की तरफ देख रही थी । मां के जाने के बाद पल्लवी ने नैना से कहा ,

पल्लवी -- बहन बुरा ना मानो तो एक बात पूछूं ?

नैना-- हां पूछिए ना क्यों बुरा मानूंगी मैं।

पल्लवी -- तकलीफ में हो , ऐसे रो क्यों रही हो ?

नैना -- तकलीफें तो लगी रहती है। देखा जाए तो इंसान की असली परीक्षा तकलीफों के समय ही होती है । अपने पराए का भेद, प्यार महोब्बत का पता सब कुछ ऐसी ही परिस्थितियों में ही परखे जाते है । खैर छोडिए आप बताइए कैसे इतनी कमजोर हो गयी ?

नैना ने बडी होशियारी से बात को बदल दिया था ।

पल्लवी -- कमजोर नही हूँ मै , बस हार गयी हू , अकेली पड़ गयी हूँ ?

नैना -- समझी नही ,

पल्लवी को समझ ही नही आ रहा था की क्या जवाब दे नैना की बात का क्यू की थी तो वो आजनबी ही ।पल्लवी को खामोश देख कर नैना बोली ,

नैना -- एक और बात पून्छू ?

पल्लवी-- हाँ हाँ पून्छिये ना ।

(पल्लवी को नैना की मासूमियत पर हसी आ गयी )

नैना -- शादी शुदा हो आप ?

पल्लवी -- हाँ पर सिर्फ अपनी और अपने इश्वर की निगाह मे ।बाकी समाज की निगाह मे नही ।

पल्लवी के कब से रोके हुये आंसू उसके गालो पर लुढक गये तो नैना ने आगे बढ़ कर उसका हाथ थम लिया ,

नैना -- आपके घर वालों को भी नही पता?

पल्लवी -- नहीं ।

नैना -- तब जल्द से जल्द सबके सामने वाली शादी भी कर लिजिये और खुश खबर सुना दीजिये ।

पल्लवी -- अब नही हो सकती , वो चला गया बहुत दूर , कभी नही लौट कर आयेगा अब ।

पल्लवी के सीने मे हूक सी उठी ।

नैना-- ये तो धोखा है ।

पल्लवी -- नही बहन वो किसी को धोखा दे ही नही सकता है ,

नैना -- तब क्यूँ चला गया आपको छोडकर । ये सब आदमी एक ही तरह होते है क्या । जज़्बातो की बेकदरी करने वाले ।आखिर क्या मिलता है किसी को किसी के दिल से खेल कर । क्यू भूल जाते हैं दिल तोडने से पहले की जिसका दिल तोड़ रहे हैं वह भी इन्सान है । कितना आसान हो गया है आज कल । जबतक जी मे आया प्यार किया और जी भर गया तो मुह फेर लिया । और हमारी मजबूरी की हम बददुआ भी नही दे सकते । यहाँ तक की कभी इल्जाम भी नही देते हम ।

नैना ने पल्लवी के गले लग कर अपनी भड़ास निकल दी । पल्लवी की मा दोनो को देख कर हैरांन थी क्यू की दोनो को मिले अभी एक घन्टा भी नही हुआ था । पल्लू की मां ने नैना के सामने गर्म गर्म दाल वड़ा और चाय रख दी । नैना ने दो दिन से कुछ नही खाया था । बेचारी ने जल्दी जल्दी खाना शुरु कर दिया । पल्लू ने भी खाया नैना के कहने पर । मां इन दोनो का प्यार देख कर गदगद थी तो वही पल्लवी के पिता को नैना मे पल्लवी की समस्या का समाधान करने वाली डाक्टर दिख रही थी ।

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नैना नाश्ता करने में व्यस्त थी और पल्लवी के पापा नैना से अपनी बात कहने का जुगाड़ खोज रहे थे । बात कोई हल्की फुल्की तो थी नही इसलिये बहुत संकोच हो रहा था पल्लू के पापा को । नाश्ता खत्म होते ही नैना उठ खड़ी हुई और उन लोगों से इजाजत मांगते हुए बोली ,

नैना -- मुझे अब चलना चाहिए । देर हो रही है , वरना कोई गाड़ी नहीं मिलेगी शहर जाने के लिए । यह कुछ दवाएं मैंने लिख दी हैं । आप इन्हे खिलाते रहिएगा और साथ में मैंने मेरा कोंटेक्ट नंबर लिख दिया है अगर आप लोगों को मेरी जरूरत पड़े तो आप मुझे फोन कर सकते हैं ।

नैना के जाने की बात सुनकर पल्लवी के पापा का चेहरा उतर गया और वो हड़बड़ाकर बोले ,

पल्लवी के पापा -- कहां जाओगे बिटिया एक-दो दिन रुक जाओ ।

नैना --( हंसते हुये ) अंकल जाना होगा मुझे ।

अचानक पल्लवी के पापा के दिमाग में एक रास्ता सूझा और उन्होंने नैना से झटपट कहा ,

पल्लवी के पापा -- एक काम करो बिटिया तुम अभी आराम से बातें करो पल्लू से मैं स्टेशन जाकर गाड़ी का पता करके टिकट लेकर आता हूं। बिना गाड़ी का पता किए जाने से कोई फायदा नहीं है।

पल्लवी और उसकी ।माँ ने भी जोर दिया तो नैना को भी सही लगा । हां बोल दिया नैना ने और वापस बैठ गई । पल्लवी के पापा को आशा की किरण नजर आने लगी । वह तेजी से घर से बाहर निकल गये । पल्लवी की मां बहुत खुश हो गयी और हर मां की तरह बच्चे को खुश करने के लिये कुछ अच्छा खाना बनाने के लिए रसोई में घुस गई ।

एक बार फिर पल्लवी और नैना अकेले बचे थे । थोड़ी देर की खामोशी के बाद पल्लवी ने बोला ,

पल्लवी -- अरे हाँ आपने बताया नहीं आप यहां किसके घर आइ थीं ।

नैना -- किसी पहचान वाले को खोजते हुए आई थी।

पल्लवी -- अच्छा तो मुलाकात हो गई।

नैना -- नहीं अब वह यहां नहीं रहता है।

पल्लवी -- अरे फिर तो आप का आना यहां बेकार रहा ।

नैना -- सिर्फ आना ही क्यों अब तो जीना भी बेकार हो गया है ।

नैना का एक बार फिर गला रुंध गया ।

पल्लवी -- दोस्त लगता है तुमने भी दिल पर चोट खाई है।

नैना -- सिर्फ चोट नही कह सकते इसे बहुत बड़ा धोखा खाया है मैंने। मुझे उस गुनाह की सजा मिली है जिस गुनाह का मुझे पता ही नहीं है ।

नैना की आवाज मे रोने की वजह से कम्पन हो रहा था जिसे सुनने मात्र से पल्लवी का दिल जोर से धड़कने लगा ।

 


पल्लवी-- शायद वक्त ही ऐसा चल रहा है। मेरी भी दुनिया बसने वाली थी । इसी महीने सगाई थी । लेकिन पता चला कि सब कुछ खत्म हो गया ।

पल्लू ने अपना सर घुटनो मे छिपाते हुये कहा ।

नैना -- धोखा ही आपको भी मिला।

पल्लवी -- अरे नहीं धोखा नहीं, वह धोखा किसी के साथ कर ही नहीं सकता है । वह तो अब भी मुझसे बहुत ज्यादा प्यार करता है । जान हूँ मैं उसकी । देखो ना अब भी मुझमे बाकी है वो ।

नैना ने पल्लू को इस तरह देखा जैसे वो दुनिया के सबसे बड़े बेवकूफ को देख रही हो ।

नैना -- अगर ऐसा है तो वह क्यों छोड़ कर चले गए आप को ।

पल्लवी --और भी फर्ज निभाने थे इसलिए ।

नैना-- यह कौन सी बात हुई ! और फर्ज निभाने का ये कोई नया बहाना मशहूर हुआ है क्या ? इसी के लिए मुझे भी धोखा मिल रहा है और आपको भी । यह कैसा न्याय है और यह धोखा नहीं है तो और क्या है।

नैना ने हर शब्द चबाते हुये कहा पर पल्लवी के आंसुओं से भीगे मुरझाए चेहरे पर एक गौरव बिखर गया और उसके खुश्क सूखे होंठों पर मुस्कान तैर गयी ।

पल्लवी -- तुम्हारा तो मैं नहीं जानती हूं पर मेरे हिसाब से वह गलत नहीं था। वह एक फौजी था और देश की राह में शहीद होने को गलत तो नहीं कह सकते हैं ना। वो हस्ते मुस्कुराते हुये दुनिया से चला गया जिससे हम सब इस दुनियां मे खुशी और अमन से रहे । उसकी वतन परस्ति को मेरा शत शत नमन है ।

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पल्लवी के पापा जब नैना से स्टेशन जाने का बोल कर बाहर निकले तो उन्हें समझ नहीं आया कि वह किधर जाए , क्योंकि सच तो यह था कि वह टिकट लेने नहीं बल्कि सिर्फ बहाना बनाकर निकले थे। जिससे नैना आज उनके ही घर पर रुक जाए और उनको उसके सामने अपनी बात रखने का मौका मिल जाए ।

उन्होने मन्दिर जाकर बैठने का सोचा ! ठीक उसी वक्त आरव के पापा ने उन्हें देखा । आरव के पापा उनके ही घर जा रहे थे । उन्होने कई आवाज दी पर पल्लवी के पापा ने सुन कर भी अनसुना कर दिया । करते भी क्या पल्लवी के पापा आरव के पिता को पल्लवी की स्थिति का पता था । बहुत छोटा महसूस कर रहे थे अपने आपको पल्लवी के पापा । बस आरव के पापा से मुंह छिपाना चाहते थे और आरव के पापा उनका यह दुख अच्छी तरह समझते थे ।

पल्लवी के पापा ने जब कोई भाव नहीं दिया तो आरव पापा तेज़ कदम से पल्लवी के पापा की ओर बढ़ गये और पुराने ट्यूबवेल के पास पकड़ने मे कामयाब भी हो गये ।

आरव पापा -- क्या हुआ भाई, मैं इतनी देर से आपको रोक रहा हूं । मेरी आवाज नहीं सुन पा रहे थे क्या आप ?

पल्लवी के पापा -- कभी-कभी सुन कर भी अनसुना करना पड़ता है । क्या बात करूं मैं आपसे । कुछ समझ नहीं आ रहा था इसलिये रुकना उचित नही समझा ।

आरव पापा -- मैं आपका दुख अच्छी तरह समझता हूं मैं इसीलिए आपके पास आ रहा था ।

पल्लवी के पापा -- कोई नहीं समझ सकता है मेरा दुख मेरा दुख । हर उस पिता का दुख है जिसकी बेटी उसके मुंह पर कालिख पोतने के लिए तैयार हो । बहुत प्यार दिया था मैंने अपनी बेटी को पर शायद मेरे प्यार में कोई कमी रह गई थी जो यह दिन देखना पड़ रहा है मुझे । अपनी कोई चिंता नहीं है मैं बस पल्लवी का भला चाहता हूं जल्द से जल्द बस उसके हाथ पीले करना चाहता हूं लेकिन उससे पहले मुझे उस मुसीबत से छुटकारा पाना है जो उसके पेट में है।

पल्लवी के पापा ने अपनी बात कह तो दी पर अपने आंसुओं को छिपने के चक्कर मे वो सामने वाले का आंसू नही देख पाये ।

आरव के पापा -- यह कैसी बातें कर रहे हैं भाई साहब , मुसीबत मत कहिए।

पल्लवी के पापा -- तो क्या कहूं मैं ? वरदान बनकर तो आया नहीं है वह ।

आरव के पापा -- बन जाएगा वरदान । अगर आप बुरा ना माने तो क्या आप अपनी बेटी पल्लवी का हाथ मेरे छोटे बेटे अर्नव के लिए दे सकते हैं?

आरव के पापा की बात को सुनकर पल्लवी के पापा जहां जहां खड़े रह गए उनको अपने कानों पर यकीन नहीं हो रहा था । उनकी आंखों से आंसू की अविरल धारा बह निकली । 2 मिनट तक उनका चेहरा देखने के बाद उनके पैरों से लिपट गए और फूट-फूट कर रोने लगे। सिर्फ एक लाइन में पल्लवी के पापा को नई जिंदगी दे दी थी जाने कितनी मुसीबतों से छुटकारा दे दिया था अपार संभावनाएं दे दी थी पल्लवी के भविष्य की वह मारे खुशी के दौड़ते हुए अपने घर की ओर चल पड़े और आरव के पापा चेहरे पर मुस्कान भी एक गहरी तसल्ली के साथ ले जाता हुआ देखते रहे।

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पल्लवी नैना को अपने फौजी का नाम बताने ही जा रही थी कि उसी वक्त पल्लवी की मां वहां पर आ गई और गुस्सा दिखाते हुए पल्लवी से बोली ,

पल्लवी की मां-- यह ठीक नहीं है बेटा, सुबह से तूने अभी तक मंजन भी नहीं किया है । यह गलत बात है ।

पल्लवी -- मां बस थोडी देर और मुझे नैना को कुछ बताना है ।

पल्लवी की मां-- तुझे मेरी कसम है , उठ पहले मंजन करके कुछ खा ले । उसके बाद तू अपनी सखी से चाहे जितना बतियाना मैं मना नहीं करूंगी बिटिया । वैसे भी मै नैना को आज जाने भी नही दूंगी ।

पल्लवी की मां की बात सुनकर नैना चकित रह गयी ।

नैना -- अरे कितनी दोपहर हो गई है और अभी आपने कुछ खाया भी नहीं है ।बिल्कुल गलत बात है ये , आपको पता है ना ऐसी स्थिति में यह सब बिल्कुल ठीक नहीं है। आप तुरंत उठिए और कुछ खा कर आइए फिर हम दोनों को ढेर सारी बातें करेंगे।

नैना ने डॉक्टरी अंदाज मे कहा ,

पल्लवी -- मुझे भूख ही नहीं लग रही है वैसे भी आज कल दिल ही नहीं करता है कुछ खाने का,

पल्लवी उदास होकर बोली ,

पल्लवी की मां -- बिटिया 15 दिन से इसने ढंग से खाया नहीं है कभी एक रोटी तो कभी आधी । बताओ भला कितने दिन ऐसे जिएगी । आज कल तो चक्कर भी आने लगे हैं इसे ।

नैना -- आप समझ नहीं रही हो आप की जो स्थिति है आपको डबल खाना चाहिए । आपको हर चीज इस समय दुगनी चाहिए , आपकी सेहत और पौष्टिकता के लिए।

पल्लवी -- मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि मेरा क्या होगा । इसी सोच में पागल हुई जा रही हूँ । क्या तुम मेरी एक मदद कर सकती हो ?

पल्लवी ने जैसे मन ही मन में कोई दृढ निश्चय किया था ।

नैना -- हां मैं आपकी हर मदद करूंगी । मैं आपके लिए कुछ भी करूंगी लेकिन सबसे पहले आपको मेरी बात माननी होगी। पहले जाईये नहा कर और पेट भर कर खाना खाइए और दवा भी । अपने लिए नहीं सही पर कोई और भी है जो आप पर निर्भर है उसके लिये । आप उसे कैसे भूखा रख सकती हैं । उसे तो सब कुछ आप से ही मिलना है । "बहुत अद्भूत रिश्ता है उसका और आपका , वो आपकी सांसो से , आपकी मुस्कराहट से , आपकी धड़कनो से जुड चुका है ।"

नैना की बात सुनकर पल्लवी की आंखों से आंसू बह निकले पर होठों पर मुस्कान तैर गई और उसने हां में सिर हिलाया और उठ कर चली गई । पल्लवी की मां उसे जाते हुए देख रही थी अपनी साड़ी के आंचल के किनारे से अपने आंसुओं को पूछते हुए नैना से बोली ,

पल्लवी की मां -- नैना बेटा इस को संभाल लो । बडी अभागी है मेरी बेटी। रो रो कर मर जाएगी , इस को बचा लो बिटिया । बड़ा पुण्य मिलेगा तुमको । तुम तो डॉक्टरनी हो जानती हो कैसे हालात से गुजर रही है वह । ऐसे में आरव का मरना बहुत बड़ा दर्द दे गया है उसे । नहीं भूल पा रही है उस दर्द को । सदमे को धीरे धीरे गलती जा रही है पर कहती कुछ नही है ।आज 15 दिन बाद मुस्कराई है ।

पल्लवी की मां का गला रुंध गया था ।

 


नैना-- क्या नाम लिया मां जी आपने अभी फिर से बोलिएगा?

आरव का नाम सुन कर वो खड़ी हो गयी थी ।

पल्लवी की मा -- मैंने आरव बोला बिटिया , बड़ा होनहार बच्चा था । हमारे गांव का गौरव । वह बड़ी जल्दी फौज में बड़े ऊंचे ओहदे पर पहुंच गया था , क्या नहीं क्या उसने इस काम के लिए । स्कूल अस्पताल यह सब इमारतें बनी पड़ी थी पर उसमें काम नहीं हो रहा था । वह ऊपर वाले अधिकारीयों, मंत्रियों तक गया और आज देखो हमारे गांव का स्कूल चल रहा है बच्चे पढ़ने जाते हैं । अस्पताल भी कितना अच्छे से चल रहा है । हमारे गांव की सड़क के लिए भी वह कितनी बार मंत्रियों से मिला । यही नहीं बांध का काम भी उसने हाथ पैर जोड़कर करवाया था । बहुत अच्छा बच्चा था । गांव आज हरा-भरा है , सांसे ले रहा है तो सिर्फ उसी के बदौलत । कितने ही लोगों को उसने रोजगार दिलवाया था ।

पल्लवी की मा ने आरव की तारीफों के अम्बार लगा दिये ।

नैना -- मा जी में आरव भैया को जानती हूं।

नैना को पल भर मे सब अपने लगने लगे , उसने शर्माते हुये हौले से अपना आंचल कन्धे पर रख लिया ।

पल्लवी की मां -- तुम कैसे जानती हो बिटिया ?

नैना -- मांझी में फौज में डॉक्टर हूं । वह मेरे सीनियर ऑफिसर थे । उन्हीं के तो घर आई थी मैं ।

पल्लवी की मां -- तुम आरव के घर आई थी मतलब तुम हमारी भी तो मेहमान हुई ।

तब तो यह दुगनी खुशी की बात है । पल्लवी सुनेगी तो बहुत खुश होगी ।

नैना -- जी मैं भी बहुत खुश हूं बहुत खुश हूं मैं कि मैं आरव भैया की पल्लू से मिली ।

इस नाम को हमारा ग्रुप जानता है ।आरव भैया बहुत प्यार करते हैं इनको ।

नैना ने नही बताया की उसे ये सब अर्नव ने बताया है ।

पल्लवी की मा -- पर वो तो शहीद हो गया और छोड़ गया अपने पीछे इस बावरी को। अब यह पगली ना जी पा रही है ना मर पा रही है ।

नैना पल्लवी की मां को पल्लवी की अच्छी जिन्दगी के लिये आश्वस्त कर रही थी उसी वक्त पल्लवी के पापा वहां पर आ गए ।वो बहुत खुश थे । उन्होंने नैना को उसका टिकट दिया ( दरअसल आरव के पापा से मुलाकात होने के बाद सीधे रेलवे स्टेशन चले गए थे और जैसलमेर के लिए टिकट उठा लाए थे ) ।

नैना को टिकट देने के बाद उन्होंने पल्लवी की मां को आरव के पिता से हुई सारी बात का वृत्तांत कह सुनाया । पल्लवी तक अभी बात नहीं पहुंची थी पर एक बिजली नैना के प्यार भरे छोटे से दिल पर गिर गई थी ।ऐसी जगह आकर वह फस गई थी जिसका कोई रास्ता ही नही था । नैना को तुरन्त अर्नव की मजबूरी समझ आ गयी । उसके भीतर कुछ टूटता चला गया । बिना किसी से कुछ कहे अपने टिकट को मुट्ठी में भींचे नैना स्टेशन की तरफ दौड गई ।

नैना को यूं लग रहा था कि उसके पैरों के तले से किसी ने जमीन खींच ली है । उसकी दुनिया में अचानक से ही इतना बड़ा तूफान आया था जिसकी शायद उसने कभी कल्पना भी नही की थी । अर्नव से दूर होना पड़ेगा उसने कभी सपने मे भी सोचा नही था । हां उससे थोड़ी नाराज जरूर थी पर मान भी जाती मनाने पर लेकिन अभी थोड़ी देर पहले आए तूफान ने नैना के दिलों दिमाग में भी हलचल मचा दी थी । उसकी आंखों से आंसू की झड़ी बह रही थी । पूरी दुनिया वीराना नजर आ रही थी ।ऐसे लग रहा था जैसे जीने का कोई मक़सद ही नही बचा है ।

वह बस तेज कदमों से स्टेशन के रस्ते की तरफ भागती हुई चली जा रही थीं । कड़ाके की ठंड के चलते घने कोहरे ने दिन ढलते ही गांव को अपने आगोश में ले लिया था। सुरमई शाम काली अंधियारी रात जैसी लग रही थी। नैना ने शॉल तक नही ओढ़ रखी थी । वो काफी तेज चलती हुई गाव के बाहर तक आ गयी । एक तो ठंड ने गाव मे कर्फ्यू लगा दिया था उपर से कोई सवारी भी नही मिल रही थी । नैना थक कर हांफती हुई एक बड़े पेड़ की जड़ पर जा बैठी । अकेली होने कि वजह से थोडा डर भी लग रहा था उसे ।

अभी बैठी ही थी कि वह उसी वक्त उसके कंधे पर किसी ने हाथ रखा , नैना की तो जान ही निकल गयी, इतना बुरी तरह चौंक गयी थी की उसकी चीख निकल गयी जो सन्नाटे मे गूंज गयी । अंधेरा होने की वजह से वह पास खड़े शख्स का चेहरा नहीं देख पा रही थी । नैना ने डर पर काबू पाते हुये कहा ,

नैना-- कौन है ... कौन है वहां पर ? बोलो वर्ना मुझसे बुरा कोई नही होगा ।

अगली आवाज ने नैना के दिल में वापस दर्द का तूफान मचा दिया क्योंकि आवाज और किसी की नही बल्कि उसके अर्नव की थी ।जो उसके बाजू मे आकर बैठ गया था । वह अर्नव का चेहरा तो नही देख पा रही थी पर उसकी मौजूदगी के अह्सास को पहचान रही थी । आज भी अर्नव के पास आने पर नैना का दिल जोरों से धडक उठा था पर आज चेहरे पर शर्म नही अथाह पीड़ा थी ।

अर्नव-- नैना मैं हूं तुम्हारा अर्नव ... सुबह से खोज रहा हूं तुम्हें । कहां चली गयी थी तुम । क्यों परेशान कर रही हो मुझे । पहले से ही बहुत परेशान हूँ इससे अच्छा मार ही डालो मुझे ।

अर्नव ने भर्राये गले से कहा तो नैना उससे लिपट कर हिचकी लेकर रो पड़ी । नैना का रोना ही कुछ ऐसे था की अर्नव भी खुद पर काबू नही रख सका और वो भी रो पड़ा ।

नैना -- सॉरी अर्नव । माफ कर दो मुझे । प्लीज मरने की बातें मत किया करो कितनी बार रोका है तुमको । जैसा तुम समझ रहे हो ऐसा कुछ भी नहीं है, सब ठीक है। मैं तुम्हारी बहुत इज़्ज़त करती हूँ और तुम्हारे हर फैसले मे तुम्हारे साथ हूं । थोड़ा गुस्सा थी इसलिए दूर भाग रही थी । मैंने तुमसे प्यार किया है तुम्हारे हर अच्छे बुरे कदम में अपनी सहभागिता मरते दम तक निभाऊंगी ।

नैना ने अर्नव का माथा और उसका आंसुओ से भीग चेहरा बुरी तरह चूम्ते हुये कहा, बिल्कुल पागल हो चुकी थी वो दुख से । करती भी क्या शायद आज की ही रात जिन्दगी की अन्तिम रात थी जो अर्नव के साथ थी ।

अर्नव-- नैना तुम समझ नहीं रही हो दरअसल बात यह है कि ...

अर्नव इतना ही बोल पाया था तभी नैना ने अपनी उँगली उसके होंठों पर रख उसे कुछ भी बोलने से रोक दिया ।

नैना-- तुम्हें कुछ भी बताने की जरूरत नहीं है । मुझे सब कुछ पता चल चुका है। सब कुछ जान चुकी हूं । मै पल्लवी के ही घर थी । उसका ट्रीटमेंट कर रही हूँ मै । सब कुछ समझ जान चुकी हूँ ।

दोनो लिपटकर बिलख-बिलख कर रोने लगे ऐसा लग रहा था जैसे दोनो आज अपनी आत्मा खोने वाले हैं। अब अर्नव को बहुत हल्का महसूस हो रहा था ।

नैना -- चुप हो जाओ अर्नव , कभी-कभी हमें ऐसे भी फैसले लेने होते हैं जिस में हमने मर कर दोबारा जीना पड़ता है । हो सकता है हम दोनों ने अपने हिस्से की जिंदगी साथ में जी चूके हो और आगे की जिंदगी हमारी हमारे अपनों के काम आने वाली हो । मैं बहुत शर्मिंदा हूं जो मैंने तुमसे लड़ाई की । जबकि तुम हो कि बिना कुछ कहे अपना सब कुछ अपने भगवान रुपी भाई के चरणों में अर्पण करने वाले हो । तुमसे प्यार तो पहले से करती थी पर अब तुम मेरे लिये बहुत ऊंचे कद के हो चूके हो ।

नैना ने अर्नव मे सर पर हाथ फेरते हुये कहा । उसका रोना अब सिसकियों मे बलद चुका था ।

अर्नव -- नैना मै मजबूर हूँ । मै चाह कर भी इतने बुरे हालात मे अपने घर वालों को पीठ नही दिखा सकता हूँ । चाहता तो मै भी घर छोड़ कर जा सकता था और तुमसे शादी कर के अपनी छोटी सी दुनिया बसा सकता था । हम दोनों तो शायद दुनिया की हर खुशियां पा लेंगे लेकिन क्या ये सच्ची खुशियां होंगी ? मेरे पीछे मेरे पिता का क्या होगा ? पल्लवी का क्या होगा ? उसकेऔर मेरे भैया के बच्चे का क्या होगा ? दम घुटता है मेरा इन सब बातों को सोच कर । पापा ने सही फैसला किया है । दोनो घर की इज़्ज़त , पल्लवी की जिन्दगी , भैया की निशानी सब बचाने का यही एक रास्ता है ।

नैना -- कुछ भी कहने या सोचने की जरूरत नहीं है अर्नव । सब नियति का खेल है । कोई एतराज नहीं है मुझे, हमेशा साथ रहूंगी । माफ करना तुमसे मैंने इतनी लड़ाई की पर क्या करूँ जिस दिन से प्यार किया है उस दिन से कोई ऐसा पल नही गुजर जब तुम्हरा खयाल ना साथ हो , तुम्हें सोचना मेरी आदत और तुम्हे चाहना जिन्दगी का मक़सद बन चुका है । आसान नही है खुद तुम्हे जाने के लिये बोलना पर 2साल की महोब्बत के लिये 25सालों की परवरिश पर दाग लगने दूं इतनी भी संगदिल नही हूँ मै ।

नैना और अर्नव अब एक ऐसे दर्द मे डूबते जा रहे थे जिसमे सांस लेना भी दोनो के लिये महाल था लेकिन फिर भी एक दूसरे को ढाढ़स बंधा रहे थे ।

तु जो नज़रों के सामने

कल होगा नहीं

तुझको देखे बिन मैं

मर ना जाऊं कहीं

तुझको भूल जाऊं कैसे

माने ना मनाऊं कैसे ?

तू बता

रोके ना रुके नैना

तेरी ओर है इन्हें तो रहना

रोके ना रुके नैना

जब पल्लवी नाश्ता कर के आई तो वह बेचैनी से नैना को खोजने लगी । कुछ ही देर मे नैना से काफी लगाव हो गया था उसे और कुछ ऐसा भी था जो उसने नैना के साथ मिलकर करने का सोचा था । घर में नैना को ना पाकर उसने अपनी मां से पूछा ,

पल्लवी -- मां नैना कहां चली गई ?

पल्लवी के सवाल के बाद उसके माता पिता को यह एहसास हुआ कि नैना नदारद है वह लोग चारों तरफ खोजने लगे , जितना पल्लवी दुखी थी उतना ही पल्लवी की मां भी । वो परेशान हो कर नैना को इधर उधर खोजने लगी ।

पल्लवी-- मां मै नैना की बात कर रही हूँ किसी छडी की नही जो आप दरवाजे के पीछे रखी होगी । बताईये ना कहां गयी वो ?

पल्लवी ने दुखी होकर कहा ,उसकी बातों से उसकी बेचैनी साफ झलक रही थी ।

पल्लवी की मां-- यही तो खड़ी थी जब मै और तेरे पापा बात कर रहे थे एकाएक ना जाने कहां चली गयी ,

अचानक पल्लवी के पापा ने कुछ याद करते हुये कहा,

पल्लवी के पापा -- अरे हां शायद नैना चली गई ।

पल्लवी -- क्या मतलब है चली गई,अरे कहां चली गयी ?

पल्लवी के पापा-- मै उसके लिये टिकट लाया था । 10बजे की गाडी है । शायद वो बिना बताये स्टेशन चली गयी ।

पल्लवी-- मै स्टेशन जा रही हूँ ।

 
पल्लवी के पापा -- तू पागल हो गयी है क्या ? कही नही जा रही है तू । चल तेरे कमरे मे जा और थोडी देर मे अर्नव और उसके घरवाले यहाँ आ रहे है ,खाने पर ।

पल्लवी के पापा को लगा की आरव के पिता और घरवालों के आने की बात सुन पल्लवी खुश हो जायेगी पर पल्लवी ने उनकी बात को सुन कर भी अनसुना कर दिया । पल्लवी को अपने पापा का व्यवहार बहुत बुरा लग रहा था और उतना ही गुस्सा अपनी मां की खामोशी पर आ रहा था । आज फिर से पापा उस पर अपनी मर्जी थोप रहे थे और मां खामोश थी । क्या पापा और मां को नहीं पता था कि नैना का साथ पल्लवी के लिए कितना जरूरी था।

पल्लवी दुखी मन से अपने कमरे मे चली गईं वो जल बिन मछली की तरह छटपटा रही थी । पल्लवी को कभी नैना पर गुस्सा आता कि बिना बताए क्यों चली गई तो कभी आरव पर भी गुस्सा आता । रोते रोते वो आरव की तस्वीर से कहने लगी

" सारे फसाद की जड़ तुम हो । सब कुछ तुम्हारी वजह से हो रहा है । साथ क्यों नहीं ले गये मुझे, छोड़ दिया मुझे पागलों के बीच में। कोई समझता ही नहीं है मुझे । कोई भाग जाता है बिना मिले , तो कोई मुझे भागने से रोक देता है और एक मेरी मां है , न जाने किस मिट्टी की बनी है । मन कर रहा है कि जान दे दूं पर क्या करूं तुम्हारे प्यार की निशानी है मेरे पास । हाँ मैं आज रात घर छोड़ कर चली जाउंगी चाहे जो भी हो संभाल लेना मुझे । "

पल्लवी खुद से बातें करते करते रोते हुए दरवाजे की ओर पलटी तो उसकी निगाह अपने कमरे के दरवाजे की ओर चली गई । अंकिता खड़ी थी । पल्लवी के अन्दर से दर्द का गुबार आंसुओ के रूप मे फूट पड़ा । आज पल्लवी ने आरव की कसम तोड़ दी और अंकिता के गले लग फूट फूट कर रो पड़ी । घर के सारे लोग पल्लवी के कमरे के बाहर खड़े थे । सब की हालत एक जैसी थी । आंख मे आन्सू और चेहरे पर अथाह पीड़ा ।

अंकिता -- चुप हो जा पल्लू चुप हो जा सब ठीक हो जाएगा

पल्लवी-- क्या खाक ठीक हो जाएगा अंकिता दीदी कोई रास्ता दिखता है और फिर अचानक से वह खो जाता है । आरव अपने साथ मेरा सब कुछ लेकर चला गया , मेरा सुख , मेरा चैन यहां तक कि मेरी किस्मत भी ले गया वह ।

पल्लवी बेबसी से तडप कर रो रही थी ।

अंकिता -- मत रो ! ऐसा कुछ नहीं है सब ठीक हो जाएगा अगर समस्या है तो उसका समाधान भी है , तू बस धैर्य रख ।

पल्लवी -- कैसे ठीक होगा दीदी । जो सब ठीक कर सकता था उसने तो मुह फेर लिया ना वर्ना आज कुछ और ही दिन होते ।

अंकिता --पापा ने सब सोच लिया है पल्लू । तू और आरव की निशानी सकुशल मेरे ही घर मे आओगे । अब कोई उँगली भी नही उठा सकता है तुम पर।

अंकिता ने बेझिझक अपनी बात कह दी । नैना और अर्नव भी पल्लवी के घर पहुंच चूके थे सभी पल्लवी के चेहरे के आते जाते भावों को पढ़ रहे थे ।

पल्लवी के चेहरे से साफ पता चल रहा था की उसे कुछ भी समझ नही आया है , ऊपर से सभी के देखने से वो खुद को बहुत असहज महसूस कर रही थी । थोड़ी देर तक उसने सबको देखा और फिर अंकिता से पूछा,

पल्लवी-- पर कैसे दीदी , मुझे कुछ समझ नहीं आया की आप क्या कहना चाहती हो ?

पल्लवी ने माथे को सिकोड़ कर ये बात कही थी । उसकी इस मुद्रा से ही उसकी अच्छी खासी परेशानी का पता चलता था ।

अंकिता-- अरे इसमें ना समझने जैसा क्या है पल्लू । पापा ने रास्ता निकाल दिया है । ऐसा रास्ता है जिससे दुनिया और समाज भी तुझ पर उंगली नहीं उठा पाएगी और आरव की निशानी को भी हम सीने से लगा कर रखेंगे।

अंकिता खुशी से झूमते हुए पल्लवी को गले लगा लिया था ।

पल्लवी-- मेरी समझ मे अब भी कुछ नही आया , साफ-साफ बोलिए दी ।

अंकिता -- तुम्हारी मां ने तुम्हें कुछ बताया नहीं क्या ?

पल्लवी -- नहीं मुझे फिलहाल कुछ भी नहीं पता है ।

पल्लवी की मां -- पल्लवी बेटा मैं तुझे बताने वाली थी पर तभी तू नैना को खोजने लगी। देख नैना भी आ गई है ।

नैना को देख कर पल्लवी का दिमाग नैना के उपर चला गया जबकि अंकिता का चेहरा गुस्से से तमतमा उठा । वो अर्नव को आंखें तरेरने लगी

पल्लवी -- नैना तुम बिना बताए कहां चली गई थी । मैने कहा था ना मुझे तुमसे बहुत जरूरी काम है , मुझसे मिले बिना कहीं मत जाना और अर्नव कहां से मिल गया ।

नैना-- ये मुझे आपके घर के बाहर ही मिले है । अब मै नहीं जाऊंगी पल्लवी ! कहीं नहीं जाऊंगी । इत्मीनान से बताना मुझे तुम जो काम है ।अभी आप लोग बात करिये मैं अंदर जा रही हूं ।

नैना ने झूठी मुस्कान का चोला चेहरे पर जरूर ओढ़ रखा था लेकिन उसकी आवाज और उसकी आंखें बता रही थी कि वह किसी भी वक्त रो सकती थी। अर्नव को बहुत तकलीफ हो रही थी उसकी हालत देखकर बाकी अंकिता के सिवा किसी को अंदाजा भी ना था उसकी हालत का, और अंकिता की हालत यह थी कि उसका बस चलता तो नैना को घर से निकाल देती।

पल्लवी -- नहीं कहीं नहीं जाएगी तू ।बताओ मां क्या बोल रही है अंकिता दीदी ?

पल्लवी वापस पुरानी बात पर आ गई थी । नैना को देखने से उसमें अजीब सी शक्ति आ गई थी , जाने क्या उसने प्लान कर रखा था नैना के साथ मिलकर करने के लिए जो से इतनी ताकत दे रहा था ।

पल्लवी के पापा -- देखो पल्लवी आरव पापा चाहते हैं आरव की निशानी और तुम्हारी इज्जत बची रहे और मेरी पगड़ी भी सलामत रहे और इसका सिर्फ एक ही रास्ता है जो इन्होंने निकाला है ।

पल्लवी-- किसने कहा आप लोगो से की मै मजबूर हूँ और मेरे पास कोई रास्ता नही है । वैसे क्या रास्ता निकला है आप लोगो ने मिलकर पापा ?

पल्लवी के पापा -- तुम्हारी और अर्नव की शादी।

पल्लवी मुंह फाड़े सबकी तरफ देख रही थी जैसे उसने दुनिया का आठवां आश्चर्य सुन लिया हो , आंखे यूं खुल गयी थी जैसे कोई अनहोनी उसके कानों से टकराई हो । वह सभी के बीच में खड़ी हुई थी , हैरान सभी के चेहरों को देखती हुई । एक बार फिर से आंखें डबडबा आई थी उसकी और अपने दुपट्टे की किनारी को अपनी उंगली में लपेटना शुरू कर दिया था उसने । गला रुंध आया था ।

अचानक उसने अपनी आंखें बंद की और थोड़ा आवाज तेज मे बोली,

पल्लवी -- पागल हो गए हैं क्या आप सब। यह क्या बेहूदा तरीका निकाला है आप लोगों ने । यह सब बकवास करने से पहले क्या आपने एक बार भी अपने दिल पर हाथ रख कर सोचा ?मेरी शादी अर्नव के साथ ? कैसी बचकानी सोच है यह! क्या सोच कर आपने यह निर्णय लिया है ? क्या आपको मेरा और अर्नव का रिश्ता पता भी है वाह वाह?

पल्लवी किसी घायल शेरनी की तरह गुर्रा रही थी ।

पल्लवी के पापा -- क्या रिश्ता है तुम्हारा और अर्नव का ? वो आरव का भाई है , उसकी परछाई है ।

पल्लवी -- सोचा था कभी आपको किसी बात के लिए जवाब नहीं दूंगी , लेकिन सच तो यह है कि आज मेरा दिल कह रहा है कि कितने कड़वी बातें मैं आपसे कह दूं कि आप मुझ से अपना संबंध खत्म कर ले । ऐसा नहीं लग रहा है कि अपनी झूठी शान , शौकत, मर्यादा और अपनी छोटी सोच के लिए आप किसी मासूम की बलि चढ़ा रहे हैं ? आपको पता भी है की उसकी जिंदगी में कोई और भी है ।

पल्लवी की बात को बीच मे ही काट कर अंकिता ने नैना की कलाई पकड़ कर उसे घसीटती हुई सबके बीच ले आई ,

अंकिता -- इसी चुड़ैल ने तेरे कान भरे होंगे ना । इसको कितना समझाया था पर मनी नही ये ।

पल्लवी ने नैना का हाथ पकड़ कर उसे अपने पीछे खड़ा कर लिया ।

पल्लवी -- कौन चुड़ैल किसकी बात कर रही हो तुम दीदी और प्रार्थना है की किसी की इज़्ज़त को यूं ठेस ना पहुँचाईए ।

अंकिता -- ये ही चुड़ैल जो तेरे पीछे डुबकी है ।

पल्लवी -- नैना की तरफ क्यू इशारा कर रही है आप । किसी चुड़ैल ने मेरा कोई कान नहीं भरा है । अर्नव के बारे में मुझे आरव ने बताया था । उसकी इच्छा थी कि हमारी सगाई के बाद अर्नब की सगाई होगी और शादी साथ में होगी दोनों की । वो अपने भाई को उसकी हर खुशी देना चाहता था और मुझे तो पता भी नही था की ये अर्नव की नैना है ।

पल्लवी की बात सुन सभी आवाक रह गये थे । कहां से शुरु हुई बात कहां आकर रुक गयी थी ।

अर्नव की मां -- मैं पहले ही कह रही थी। मेरी कोई बात नहीं सुनताहै । मे मेरा एक बेटा तो चला गया और मेरे दूसरे बेटे के साथ सब अन्याय कर रहे हैं ।

आरव की मां ने भी अपनी खामोशी तोड़ दी और रोते हुये पल्लवी के पास आकर खड़ी हो गई । पल्लवी ने उनको समझाते हुये कहा,

 
पल्लवी -- मां जी आप निश्चिंत रहें। यहां कोई तमाशा नहीं हो रहा है और ना ही शादी विवाह कोई गुड्डे गुड़ियों का खेल है, कि जब जी में आया जिसके साथ जिस को विदा कर दिया । इतनी अशक्त नहीं हूं मैं । मुझे अगर यही सब करना होता जिस दिन आरव ने मुझसे मंदिर में शादी की थी उस दिन मैं सारे गांव में फैला देती कि मैं आरव की पत्नी बन चुकी हूं लेकिन वो चाहता था कि सब कुछ विधि-विधान से हो इसलिए हम रुके रहे । रुकिए मैं आपको सभी को दिखाती हूं मन्दिर मे शादी की सारी तस्वीरें।

पूरी तरह सन्नाटा छा चुका था पल्लवी की बातों से । पल्लवी के पापा सिर थामे वही जमीन पर बैठ गए थे और आरव के पापा अर्नव के कंधे पर हाथ रख कर खड़े थे जबकि पल्लवी की मां नैना के पास खड़ी हुई थी । सिर्फ पल्लवी बोल रही थी और अब भी अगर कोई विरोधी बचा था तो वह थी अंकिता जिसने पल्लवी की कलाई पकड़ कर दांत पीसते हुए कहा ,

अंकिता -- तू अभी गुस्से में है । ठंडे दिमाग से सोच जरा किस किस को तेरी तस्वीरे दिखाती फिरेगी । जब लोग तेरे उपर उँगली उठायेंगे ना तो सारा जोश काफूर हो जायेगा । इतना आसान नही होता है अकेली औरत का इस संसार मे रहना । पल्लू पापा की बात मान ले बहन ।

पल्लवी -- दीदी ये बोलने से पहले कम से कम अपने छोटे भाईयोँ का तो चेहरा देख लेती । मै आरव की विधवा हूँ कोई कुमारी नही जो मेरे कोख का बीज़ कलंक होगा । ये आरव सिंह का बेटा है ये । इसके पिता का नाम है इसके पास । रही बात अर्नव की तो जैसे मैने आरव के मां बाप को अपने मा बाप माना था वैसे ही उसके भाई को अपना भाई भी माना था ।

पल्लवी की बात ने अंकिता को निरूत्तर कर दिया था । पल्लवी के मन गुबार निकल चुका था । पल्लवी अपनी मा के सीने से लिपट कर रो रही थी । अर्नव भी आकर पल्लवी के पास हाथ जोड़कर वही जमीन पर बैठते हुये बोला ,

अर्नव-- माफ कर दीजिए प्लीज मुझे माफ कर दीजिए , पाप हो गया हम सब से जो ये सोचा पर विश्वाश किजीये सभी आपका भला चाहते हैं ।

पल्लवी -- कैसे माफ कर दूं । तुम सब उसे भूल गए । सोच भी कैसे हो सकते हो तुम सब । तुम लोगों को उसकी निशानी की फिक्र है और मैं जो जीती जागती उसकी मोहब्बत तुम्हारे सामने खडी हूं तुम लोगों को मेरी कोई परवाह नहीं है और मेरे पापा को उनकी इज्जत उनके सम्मान की फिक्र है । लोग क्या सवाल पूछेंगे उसकी फिक्र है पर उनको यह फ़िक्र नहीं क्या होगा अगर उनकी बेटी अपनी जान दे दे तो ।

पल्लवी की बात सुन कर पल्लवी के पापा चकित थे । क्यू की आज उनकी गूँगी गुडिया बोल पडी थी । उनके लिये यकीं कर पना मुश्किल था की जिसे वो कांच की समझ रहे थे वो तो फ़ौलाद से भी ज्यादा मजबूत इरादे रखती थी ।

पल्लवी की मां-- पल्लू माना की तेरी बात सही है बिटिया पर गलत तो तेरे पापा भी नही हैं । दुनिया देखी है उन्होने । अकेली औरत के लिये जीना बड़ा ही मुश्किल हो जाता है । इस समाज मे सभी एक से नही होते हैं। ऐसे भी गिद्ध है जो नोच कर खा जाते हैं अकेली चिडिया को ।

एक मां अपने बच्चे को रास्ता दिखा रही थी , वह कैसे कहती कि वह समाज के दरिंदे और खूंखार भेड़ियों की बात कर रही हैं जो रोज एक अबला को अपनी हवस का शिकार बनाते हैं । हर रिश्ते की मर्यादा होती है लेकिन राह दिखाना तो मां का कर्तव्य होता है इसलिए उन्होंने दबे लफ्जों में ही सही पर अपना डर रख दिया पल्लवी के सामने।

पल्लवी -- तब क्यू पाल रहा है समाज ऐसे गिद्धों को मां ? उनपर काबू रखने की जगह क्यू मासूम पक्षियोँ की उड़ान पर रोक लगाई जा रही है । माफ कीजियेगा मां ये तो समझौता है , समझौता और अस्तित्व की जंग अलग बात है पर अपने अभिमान में चूर होकर सामने वाले की मजबूरियों को ना समझना और अमानवीय व्यवहार करना कहां का समाज है ये । ऐसा क्यों होता है कि हर बार समाज के खोखले आदर्श सही और हम गलत होते हैं । मै नही मानती ऐसे समाज और उसके कायदे कानून को और लानत है आप सब पर भी जो खुद इसी का हिस्सा हो और मुझे भी इसका हिस्सा बनने के लिये पैरवी कर रहे हो ।

समाज भी तो हम सभी से मिल कर बंटा है ना , तो अगर समाज मे इतनी समझ नहीं है कि वो सही और गलत का फर्क कर सके तो क्या सिर्फ इसलिए आंख मूंद लूँ कि मैं औरत हूं । थू है ऐसी सोच पर ।

पल्लवी का रोना और उसका गुस्सा होना एक साथ होने की वजह से वह अपनी बात चिल्ला-चिल्लाकर हांफते हुए बोल रही थी। बार-बार उसे खांसी आ जाती थी। नैना परेशान उसे कभी बैठने के लिए कहती तो कभी पानी का गिलास लेकर खड़ी हो जाती । लेकिन पल्लवी की तो जैसे से जिद थी की आज आर या पार हो जाना है ।

पल्लवी के पापा -- देखो पल्लवी , इन बड़ी-बड़ी बातों से जिन्दगी नहीं चलती है। यह बड़ी-बड़ी बातें सिर्फ किताबों और किस्से कहानियो मे ही अच्छी लगती हैं । आटे दाल का भाव तो तब पता चलता है जब खुद पर मुसीबतों का अम्बार लगता है ।

पल्लवी के पापा बेहद हताश हो गए थे लेकिन फिर भी अब उनकी आवाज में वह तेजी नहीं रह गई थी शायद वह कहीं ना कहीं पल्लवी से सहमत हो ही चुके थे । पल्लवी के पापा को पीछे कर आरव के पापा आगे आ गए थे ,

आरव के पापा -- पल्लवी पता नहीं मुझे हक है कि नहीं बेटा तुम्हारे बीच बोलने का पर अपने बाप की भी तो परेशानी समझो। चलो मान लो बेटा कि तुम्हारा आरव का विवाह स्वीकार कर लेते हैं हम तो अभी मात्र 23 साल की हो तुम । क्या करोगी आगे । पहाड़ सी जिंदगी पड़ी है तुम्हारे सामने । क्या करोगी क्या कुछ सोचा है तुमने?

पल्लवी -- हां पापा सोच रखा है मैंने।

आरव के पापा -- क्या सोचा है बेटा ?

पल्लवी -- पापा मैं मैं आरव का अधूरा काम पूरा करना चाहती हूं ।

आरव के पापा -- मैं कुछ समझा नहीं,

पल्लवी -- पापा मैं देश की सेवा करना चाहती हूं । पापा मैं आप सबका ख्याल रखना चाहती हूं अपने पापा मम्मी का ख्याल रखना चाहती हूँ ।

अत्यधिक भावुक होने की वजह से पल्लवी की आवाज स्पष्ट नहीं आ रही थी और गला रुंध गया था वह अरब के पापा के पैरों के पास हाथ जोड़कर बैठ गई थी और सिर नीचे करके बस उनके हाँ की प्रतीक्षा कर रही थी ।

आरव के पापा -- तेरा दिमाग खराब हो गया है क्या बेटा । तू जानबूझकर अपने के लिए अपने लिए काटो भरी राह क्यों चुन रही है।

पल्लवी -- पापा खुशियां तो उसके साथ चली गई है और रही बात कांटों की तो यकीन मानिए अगर कांटो पर हंस कर चलो तो वह चुभते नहीं है और अगर चुभते भी है तो उनका दर्द बहुत अच्छा लगता है, पीड़ा नहीं होती है । उसमें गौरव होता है । अभिमान होता है । प्लीज मैं आपके आगे हाथ जोड़ रही हूं मुझे मेरी जिंदगी जीने का एक मौका दे दीजिए , मेरे हिस्से का आसमान तो उपर वाले ने लूट लिया पर मेरे पैरों तले की जमीन मुझे दे दीजिये ।

सभी खामोश हो गए थे , पल्लवी अब भी रो रही थी लेकिन न जाने क्यों अब आरव के पापा नहीं रो रहे थे । उनके चेहरे पर एक संतुष्टि दिख रही थी । नैना को भी समझ आ चुका था कि पल्लवी उससे क्या मदद चाहती थी । पल्लवी पर गर्व हो रहा था नैना को और खुद पर शर्म आ रही थी । थोड़ी देर पहले वह हर मुसीबतों से पीछा छुड़ा कर भाग रही थी पर आज उसे पल्लवी में एक ऐसी औरत दिख रही थी जो यह जानते हुए भी कि सामने पहाड़ जैसी कठिनाइयां है और उसका शरीर बहुत सूक्ष्म है फिर भी उस से लड़ने के लिए तैयार थी।

नैना आगे बढ़कर पल्लवी के गले लग गई, नैना के गले लगने से पल्लवी और भी जोर से रोने लगी , पर आरव के पापा ने आगे बढ़कर पल्लवी के सर पर हाथ रख दिया और बड़े अभिमान के साथ बोलें,

आरव के पापा -- वेलकम बैक बेटा । नाज है मुझे तुझ पर । तू चला तो गया पर वापस किसी रूप में लौट भी आया। पल्लवी तुझ जैसी औलाद हर मां बाप को मिले और हर देश को तुझ सी बेटी मिले ।

आरव के पापा ने पल्लवी के सामने हाथ जोड़ लिया था । अब माहौल बदल चुका था । दुख दर्द गम तो अब भी था पर उससे भी परे एक अभूतपूर्व संतुष्टि सबके चेहरों पर थी जो शायद विरले ही प्राप्त होती है ।

अंकिता ने आगे बढ़कर पल्लवी के आगे हाथ जोड़ लिया था पर पल्लवी ने उसे गले लगा लिया क्योंकि सभी को पता था यहां कोई किसी का दुश्मन नहीं था सब सिर्फ और सिर्फ एक दूसरे के भले की सोच रहे थे आरव की मम्मी ने आगे बढ़कर नैना के सिर पर हाथ रखा तो नैना उनके गले लग कर रो पड़ी लेकिन पल्लवी ने तुरंत ही अर्नव का हाथ नैना के हाथ पर रख दिया और बोली,

पल्लवी -- अर्नव तू तो बड़ा सयाना हो गया । इतना बड़ा फैसला ले लिया पर माफ करना जिन फैसलों से किसी का भला ना हो और कोई घर टूटे वह फैसला कभी भी अच्छा नहीं हो सकता है । मुझे पता है जरुरी नहीं है कि हर फैसला का अंत गलत हो पर जब हमें पता है कि हम कुछ अच्छा कर सकते हैं , सही कर सकते हैं तो किसी गलत फैसले के सही होने के लिए सालों का इंतजार क्यों करें ।

अर्नव के पास पल्लवी की बात का कोई उत्तर नही था । पर पल्लवी ने पहला युद्ध जीत लिया था ।

25 साल बाद --

तुम बिन जाऊँ कहाँ,

के दुनिया में आके

कुछ न फिर चाहा कभी,

तुमको चाहके,

तुम बिन ...

रह भी सकोगे तुम कैसे,

हो के मुझसे जुदा

ढह जाएंगी दीवारें,

सुन के मेरी सदा

आना ही होगा तुम्हें मेरे लिये साथी मेरे, सूनी राह के ...

देखो मेरे ग़म की कहानी,

किसीसे मत कहना

कहीं मेरी बात चले तो,

सुनके चुप रहना

मेरा क्या है कट जाएगी कहीं ये ज़िंदगी, तुमको चाह के ...

15 अगस्त के गौरवशाली दिन और सेना के आयोजन मे ये पँक्तियाँ सेना नायक विराट सिंह ने गुनगुनायी और अपनी मां पल्लवी को समर्पित की जो सामने दर्शक दीर्घा की पहली कतार मे बैठी अपने बेटे को देख निहाल हुई जा रही थी । साथ ही पूरा परिवार बैठा था ।

आज पल्लवी की जिद्द , मुहोब्बत और तपस्या रंग लायी थी । उसका बेटा फौज मे था और वो खुद सेना के परिवार वालों की सहयता के लिये NGO चला रही थी जिसमे उसका परिवार 100%सहयोग कर रहा था । अर्नव और नैना भी पूरे लगन के साथ देश की सेवा कर रहे थे ।

अंत मे --

दोस्तों वैसे तो यह कहानी पूरे तौर पर मेरी कल्पना पर आधारित है पर सच कहूं तो मुझे उस दिन अचंभा हुआ जब कहानी का अंत लिखते वक्त मैंने वाकई में एक ऐसी शख्सियत को पाया जो इस कहानी के मुख्य किरदार पल्लवी के जैसी थी। इस कहानी का अंत तो 25 साल आगे बढ़ गया पर हकीकत में तो 25 साल पार होने में बहुत वक्त लग जाएगा ।

रियल लाइफ वाली पल्लवी यानी उस महिला ने शादी के कुछ महिनो बाद ही सेना में अपने पति की आतंकवादियों के द्वारा हत्या के बाद ना सिर्फ खुद को टूटने से बचाया बल्कि अपने साथ घरवालों को भी बचाया । और मात्र 22 वर्ष की अवस्था में इतना बड़ा आघात को सहते हुए उन्होंने मेहनत की और आज वो अपने पति के पद के पर कार्यरत है लेकिन अनुकंपा नियुक्ति नहीं है । वह उसकी मेहनत और लगन का नतीजा है ।

सलाम है ऐसे जज्बे को और प्रणाम है ऐसी मोहब्बत को।


समाप्त
 
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