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ऐसी मोहब्बत को सलाम
आरव और पल्लवी का इश्क सारे गांव में मशहूर था , शायद ही कोई ऐसा हो जो इस मोहब्बत से अनजान हो , बेहद अजीब था उनका प्यार , सोते- जागते खाते-पीते सिर्फ और सिर्फ एक दूसरे का ही ख्याल रहता था उनके जहन में । एक को चोट लगती है दर्द दूसरे को होता था । हर त्यौहार साथ मनाते थे दोनों। एक पल के लिए भी अलग होते तो एक दूसरे को खोजना शुरू कर देते थे ।
जितनी मोहब्बत थी उतनी ही लड़ाई भी थी। दिन में कम से कम 10 बार पल्लवी रूठती थी और उसे मनाने के लिए आरव हर हद से गुजरने को तैयार होता था , एक बार पल्लवी आरव से रूठ कर छिप गयी, पहले तो आरव ने उसे सब जगह खोजा पर जब ना मिले तो सबसे ऊंची इमारत पर चढ़ गया था जिद्द यह कि पल्लवी को लाओ नहीं तो कूद जाऊंगा । बड़ी जद्दोजहद के बाद पल्लवी उसी इमारत से निकली I बहुत-बहुत कहानियां प्रसिद्ध थी इन दोनों की ।
आज का मंजर बहुत ही ह्रदय विदारक था , देश ने अपने जांबाज सैनिक खोया था , गांव ने अपना सपूत खोया था लेकिन पल्लवी ने तो अपना सब कुछ खो दिया था , उसने अपना बचपन खो दिया था, अपनी जिंदगी के सपने खो दिये थे , अपनी मोहब्बत खो दी थी । उसमे तो जैसे जीने की चाह ही नही बची थी, वह बार-बार बेहोश हो जाती थी और होश में आती तो आरव के शरीर को निहारती थी ।
वक्त किसी के लिए नहीं ठहरता है, देखते ही देखते वह घड़ी भी आ गई जब आरव का पार्थिव शरीर चार कन्धों पर सवार होकर अन्तिम यात्रा के लिए निकल पड़ा ।आस पास के गाँव के लोग भी उमड़ पड़े थे देश के सपूत के अन्तिम दर्शन के लिये ।माँ चेहरे पर पीड़ा लिये मुर्छित पड़ी थी जबकि पल्लवी की पथरायी आंखे अपनी हसरतों के जनाजे को जाता देख रही थी ,अचानक जैसे पल्लवी को कुछ याद आया हो इस तरह उठ कर वो भाग कर सभी के सामने जाकर खड़ी हो गई और हाथ जोड़कर बोली ,
" मुझे दो मिनट के लिए आरव से अकेले मे बात करनी है ,अगर आप लोगों को एतराज ना हो तो, यह हम दोनों के लिए बहुत ज्यादा जरूरी है। "
पल्लवी के इस अनुरोध ने सीधे पंडित जी पर प्रहार किया ,वो लगभग उछलते हुये बोले ,
पंडित जी-- यह क्या कह रही हो बिटिया तुम ? ऐसा भी कभी होता है क्या एक बार अर्थी निकलने के बाद उसे ऐसे कैसे रोक दें, आत्मा को शन्ति नही मिलेगी ।
पंडित जी ने अपना ज्ञानसाझा किया पर पल्लवी वही धूल मेहाट जोड़ कर बैठ गयी ।
पल्लवी-- पर मेरी बात बहुत जरूरी है, आप जिस व्यक्ति की बात कर रहे हैं उसकी आत्मा की शांति के लिए है मेरी बात । यकीन मानिए सिर्फ 2 मिनट लूंगी आपका ।
पंडित जी पल्लवी के आंसू देख कर पिघल गए और पल्लवी और आरव के पिता की ओर देखने लगे पल्लवी के पिता ने लगभग रोते हुए पल्लवी से पूछा
पल्लवी के पापा-- यह तू क्या कह रही है पल्लवी , क्या बात करनी है तुझे? तेरा दिमाग तो ठीक है ? वह नहीं सुन सकता है तेरी बात, हट जा रस्ते से बिटिया ।
पल्लवी के पापा का चेहरा लगातार आंसुओं से भीग रहा था ।
पल्लवी -- पापा प्लीज मत रोकिये मुझे मुझे उससे कुछ बताना है,बहुत जरुरी है मेरे और उसके लिए , वो इन्तजार कर रहा है यह बात सुनने के लिये ।
अपने सुखे होंठो पर जबान फेरते हुये पल्लवी ने कहा ,अब भी उसकी आंखे बता रही थी की कभी भी वह अपनी सुध- बुध खो देगी । थोड़ा ना नुकुर के बाद पल्लवी को अपने पापा , आरव के पापा और पण्डित जी के सामने आरव के पार्थिव शरीर से बात करने का मौका दे दीया गया , सभी थोडा असहज हो रहे थे पल्लवी की इस हरकत से। हिन्दू रीत रिवाज़ के विरुद्ध था सब उपर से आसमान काले बादलों से भर गया था जैसे किसी अपशगुन की चेतावनी दे रहा हो खैर पल्लवी पार्थिव शरीर के पास जाकर पहले तो फूट कर रोने लगी , फिर खुद को सम्हालते हुये वो आरव के पार्थिव शरीर के कान के पास जाकर बोली --
पल्लवी-- बाबू तुम आराम से सो जाओ पर एक खुश खबर सुन लो, "तुम पापा बनने वाले हो और मै मां, हम देश को एक और बहादुर सैनिक देने वाले हैं, तुम्हरा अधूरा काम वो पूरा कर देगा और हम सब का खयाल भी रखेगा , अब तुम चेन से सो जाओ मेरी जिन्दगी "
इससे ज्यादा नहीं बोल पायी वो और वही धूल मे ढेर हो गयी , पल्लवी की बात सुन उसके पिता को बहुत बड़ा आघात लगा जबकि आरव के पिता का सब्र वापस टूट गया , जवान बेटे का दर्द तो सह गये थे पर बिन बसे उसका उजड़ चुका संसार उनकी आत्मा को छलनी कर रहा था । उनकी आंखो के सामने उनके बेटे की हसरत बिन ब्याही बिधवा सी पड़ी थी ।
आरव के पापा कभी आरव के पार्थिव शरीर को तो कभी पल्लवी को देख रहे थे , उनके दिमाग में हजार बातें चल रही थी परंतु उन सब बातों पर अमल करने का यह सही वक्त नहीं था , पंडित जी ने उनको इशारा किया और वापस शव यात्रा चल पड़ी । अपने अंतिम पड़ाव की ओर।
सभी चले गए । सब कुछ सुना हो गया था । घर की दहलीज पर आरव की मां और रास्ते की धूल पर पल्लवी पड़ी थी । पल्लवी की मां लगातार पल्लवी को उठाने की कोशिश कर रही थी, पर पल्लवी के शरीर में तो जान ही नहीं बची थी जैसे ।
आरव को गए 13 दिन बीत चुके थे , घर पर आयोजन था जिसे आम भाषा में तेरहवीं भी कहा जाता है । आस-पास के गांव उमड़ पड़े थे सांत्वना और उसकी आत्मा की शांति वाले भोज के लिए । आज तो आरव के फौजी मित्र भी आए थे साथ ही उसका छोटा भाई भी आया था जो खुद भी फौज में था । अर्नव नाम था उसका । उसके आते आज फिर 13 दिन पहले वाला माहौल हो गया था। अर्नव का बिलखना घरवालों की आत्मा को चीर रहा था।
दर्द और शांति के साथ तेरहवीं का आयोजन संपूर्ण हो गया । अर्नव 15 दिन के अवकाश पर आया था गांव। 4 दिन तो शांति से निकल गए पर पांचवें दिन अर्नव के पिता ने एक बहुत बड़ा धमाका कर दिया । उन्होंने अर्नव और उसकी मां को बिठाकर पल्लवी के गर्भवती होने की बात रख दी सामने । बेहद कड़वा सच था यह , पर एक आस भी बनी थी क्योंकि आरव सदा के लिए जा चुका था पर उस का एक अंश जो अब भी उपस्थित था, ममता का अंकुर मां के कलेजे को द्रवित करने लगा । अर्नव को भी समझ नहीं आ रहा था कि वह इस बात पर कैसे रिएक्ट करें । आरव के पापा तो बोलकर खामोश हो गए पर अचानक जैसे उनका मन पढ़कर आरव मां का कलेजा ही फट गया और वह चिल्लाते हुए बोली,
आरव की मां -- कहीं मैं जो समझ रही हूं वह सच तो नहीं है , कहीं आप अर्नव और पल्लवी के ,
बस इतना ही बोल पाई थी आरव की मां इसके आगे उनका गला रुंध गया और वह बोल ही नहीं पाई । अर्नव भी उछल कर खड़ा हो गया पर सच तो यही था कि आरव के पिता के दिमाग में यही चल रहा था । उन्होंने शुन्य में आंखें गड़ाए हुए ही उत्तर दिया,
आरव के पिता -- हां तुम लोग सही समझ रहे हो , मैं आरव की अंतिम निशानी को इस दुनिया में लाना चाहता हूं , मैं उसे मिटने नहीं देना चाहता । हां मैं चाहता हूं कि पल्लवी इसी घर आए और इसका सिर्फ यही एक रास्ता है ,
आरव के पिता ने गहरी वेदना से अपनी आंखें बंद कर ली और आंखों मे भरे हुये आंसू उनके गालों लुढक गये ।
आरव की मां-- आपका दिमाग तो नहीं खराब हो गया है जी , कैसी बहकी बहकी बातें कर रहे हैं आप ।
आरव के पिता -- मेरा दिमाग बिल्कुल दुरुस्त है ,
आरव की मां -- अगर दिमाग दुरुस्त है तो जरा तो सोच कर बोलिए , क्या आप ने यह फैसला लेने से पहले अर्नव से पूँछा ? अरे बच्चा नही है वो अब और ये कोई एक दिन का नही बल्कि उम्र भर का बन्धन होता है ,
आरव के पिता -- सब सोच लिया है मैने ।
आरव के पिता की आवाज मे दुनिया जहन की मायूसी भरी थी ,
आरव की मां-- पल्लवी की रजामंदी जानने की कोशिश की ? उसके घर वालों की रज़ा जानने की कोशिश की ? ऐसे कैसे आपने अपने आप ये फैसला ले लिया ?
आरव की मां का स्वर तेज़ होने लगा
आरव के पिता -- तो क्या करूं मै , सोच सोच कर पागल हो गया हूँ मै , चलो तुम जो बोलोगी मैं वही करूंगा , तुम बोलोगी तो बोल दूंगा पल्लवी के पिता को कि उसका गला घोट कर उसे मार डाले , तुम बोलोगी तो खुद पल्लवी को कल्मुही का दर्ज़ा देकर गाव से निकलवा दूंगा मै । अब सब तुम्हारे हाथ में है बताओ क्या करूं मैं ।
आरव के पिता पहले पूरी ताकत से चिल्लाने लगे और उसके तुरन्त बाद रोना भी शुरु कर दिया उन्होने लेकिन आरव की मां अब भी अपनी बात दोहराती रही ।
आरव की मा --मैं कुछ नहीं जानती हूं , मुझे कुछ नहीं पता है पर मैं सिर्फ इतना जानती हूं कि मेरे किसी भी बेटे के साथ अन्याय नहीं होना चाहिए । मेरे किसी भी बेटे के साथ अन्याय नही होना चाहिये ।
आरव के पिता -- तो क्या आरव का बच्चा हमारा नही है ?
आरव की मां-- है पर ... मै कुछ नही जानती बस ,
आरव की मां अब भी कायम थी अपनी बात पर ,
आरव के पिता-- वाह जब तुम्हारे ऊपर मैंने फैसला छोड़ दिया तो तुमने अपना पल्ला झाड़ लिया , कभी सोचा है कितना कठिन होता है फैसला लेना । आसान होता है तो फैसले पर उंगली उठाना जो तुम कर रही हो । इस समय अगर तुम्हारे पास स्वयं का कोई फैसला नहीं है तो तुम इस कमरे से बाहर निकल जाओ। मैं और अर्नव बात कर लेंगे ।
गुस्से में आरव के पिता की आवाज तेज होने लगी थी,
आरव की मां -- हां हां मैं जा रही हूं लेकिन इतना याद रखिएगा कि मेरे बेटे के साथ अन्याय नहीं होना चाहिए । पहले ही मैं अपना एक लाल खो चुकी हूं कहीं आपकी नादानी पूर्ण फैसले से मेरा यह बच्चा भी यहां से चला ना जाए ।
आरव के पिता -- क्यों तुम्हारा अकेले का बच्चा है , मेरा नहीं है ? क्या मैं इसका भला बुरा नहीं सोचता हूं ? बोलो मायके से लेकर आई थी क्या तुम ?
उन दोनों को बुरी तरह झगड़ते देख अर्नव ने हाथ जोड़कर रुंधे गले से कहा,
अर्नव -- मम्मी पापा आप लोग बहस करना बंद कीजिए । मां आप बाहर जाइए मैं पापा से बात करता हूं , बताइए बात पापा क्या कहना चाहते हैं आप ?
अर्नव अब भी हाथ जोड़े हुये था ,
आरव के पिता-- अर्नव बेटा मै बातों को ज्यादा घुमा फिरा कर नहीं बोलूंगा सिर्फ इतना चाहता हूं पल्लवी की इज्जत बचा लो और इस घर का अंश इस घर को दे दो । मैं तुम्हारे आगे हाथ जोड़ता हूं , तुम्हारे पैर पड़ता हूं। वरना पल्लवी या तो मर जायेगी या बदनामी के डर से आरव का अंश मिटा दिया जायेगा । मेरे पास और कोई रास्ता नही है बेटा,
आरव के पापा वाकई अर्नव के पैरों पर झुक कर फफक पड़े । पिता को इस दशा मे देख अर्नव को अपने सीने मे कुछ टूटता सा महसूस हुआ ।
अर्नव -- पापा यह क्या कर रहे हैं आप प्लीज उठिए । आप जैसा कहेंगे मै वैसा ही करूंगा । मै करूंगा पल्लवी से शादी । मुझ पर यकीन रखिए मैं आप ही का बेटा हूं , मै आपके हर फैसले का सम्मान करता हूँ ।
अर्नव की सहमती पाकर उसके पिता के आंसू तो नही रुके पर चेहरे पर एक राहत के भाव को आसानी से देखा जा सकता था , जवान बेटे को खोने का गम तो कोई भी हल्का नही कर सकता था पर दो मासूम जिंदगियों को बचा लेने की संतुष्टी उनको गहरी तसल्ली जरुर दे रही थी । अर्नव अपने फ़ौजी दोस्तों को स्टेशन छोड़ कर जब वापस आया तो उसने किसी से बात नही की और सीधे अपने कमरे चला गया ।
उस रात आरव के घर का चूल्हा नहीं जला । एक तरीके से दोहरे दुख की मार मे सभी भूखे ही सो गए । सोना तो सिर्फ एक दिखावा था , आंखें मूंदे सभी अपने ख्यालों में गुम थे ।
आरव की मां अपने भाग्य पर रो रही थी । उन्होंने जवान बेटा खोया था । यूं तो उन्होंने देश को एक शहीद दिया था पर औलाद खोने का दुख एक मा ही समझ सकती है। उपर से आरव जैसी औलाद जिसे पाने के लिये ही शायद मातायें छठ देवी की पूजा करती हैं । सेना मे भर्ती होते ही उसने सिर्फ घर ही नही गाव का भी नक्शा बदलवा दिया था । आरव के मां के सीने मे बेटे को याद ममत्व तड़पने लगा । उनके मुह से एक दर्द भरी आह निकली और वो तकिया मे मुह छिपा कर पूरे वेग से रो पडी । बगल मे लेटी अंकिता से अपनी मां की तडप नही देखी जा रही थी पर वो लाचार थी । अंकिता ने अपना सर अपने मां के आंचल मे छिपाया और फफक पड़ी ।
आरव के पापा का भी हाल बुरा था , ऐसा फैसला उनके सर पर आया था कि दिमाग ने काम करना बंद कर दिया था तो दिल धड़कने से इंकार कर रहा था । एक तरफ वह अर्नव की पसंद और उसकी जिंदगी का फैसला उस पर जबरदस्ती नहीं थोपना चाहते थे तो दूसरी तरफ पल्लवी की जिंदगी और आरव की अंतिम निशानी के मोह ने उन्हें पूरी तरह बांध रखा था। वह नहीं चाहते थे कि पल्लवी के घरवाले मारपीट कर आरव की निशानी को मिटा दें और पल्लवी को झोंक दें मरने के लिए किसी अनजान कुएं में । आरव के पापा को एक और बात आहत कर रही थी कि कही पल्लवी की बदनामी ना हो जाए,लड़की के पिता होने के नातेवो बखूबी जानते थे की कितनी नाजुक परिस्थिती थी ये । लेकिन वह यह भी नहीं चाहते थे की अर्नव जबरदस्ती उनकी बात मानकर अपने जीवन की खुशियों को सदा के लिए कुर्बान कर दें। शायद ही उनका दुख कोई समझ सकता था ।
अर्नव की तो बात ही ना पूछें जिस अपार दर्द से वह गुजर रहा था घरवालों को तो उसका अंदाजा भी नही था । उसने अपने प्यारे भाई को खोया था जो उसका गॉड फादर , गाईड, मेंटोर सब था । उपर से पल्लवी से शादी की बात । सपने मे भी नही सोच सकता था वो । हमेशा आरव को चिढ़ाने के लिये यही कहता था की " भाभी से शिकायत करूंगा " लेकिन वक्त ऐसा आ गया था कि सोचना पड़ रहा था। अर्नव का काफी देर से रो रो कर बुरा हाल हो गया था , सर भारी हो रहा था ।उसने स्मोक करने की सोची, बैग खोला सिगरेट निकलने के लिये तो हाथ मे कलाई घड़ी आ गयी ।
दिल धडक गया अर्नव का । ये उसे नैना ने दी थी । नैना को तो वह इन सब बातों मे भूल ही गया था । वह नहीं समझ पा रहा था कि क्या जवाब देगा नैना को। वह भी तो नैना के साथ जिंदगी जीना चाहता था, बेइंतहा मोहब्बत करता था उससे। आरव को तो मिलवा भी चुका था उससे । दो साल का साथ था दोनों का पल भर मे कैसे छोड़ सकता था । उसके कलेजे में दर्द धड़क रहा था ।उसे यही बात खाए जा रही थी कि कैसे वह सामना करता नैना का , कैसे उसे बताएगा कि वह अपने माता पिता की मर्जी से खुद को मर्यादा और कर्तव्य के हवन में भस्म कर रहा है। अर्नव अच्छी तरह जानता था कि नैना भी नंबर 1 की जिद्दी थी , वह इतनी आसानी से तो नहीं मानेगी या उसके बारे में यही बोलना सही होगा कि वह तो इस घर की ईंट से ईंट बजाने वाली थी । आने वाला समय सोच कर ही अर्नव के रोए खड़े हो गए थे ।
इनके घर इनके परिवार और इनकी समस्याओं से कुछ दूर अपने घर में आधी रात के समय पल्लवी आंसू बहा रही थी। उसके बिस्तर पर आरव की तमाम तस्वीरें जहां तहां बिखरी हुई थी । किसी में वह दोनों खुशी से घूम रहे थे , तो किसी में झूला झूल रहे थे , एक तस्वीर जो पल्लवी की गोद मे पड़ी थी उसमे वो दोनो किसी मन्दिर के बाहर खड़े हुये थे । हर एक लम्हे की यादें इस समय पल्लवी के सामने फैली थी। पल्लवी को भी समझ नहीं आ रहा था की कौन सा रंग दिखाने वाली है जिंदगी अब उससे आखिर कैसा होगा उसका आने वाला कल । वह आरव की तस्वीरों को अपने सामने रखकर उससे जीने की हिम्मत मांग रही थी। कुछ तस्वीरें तो ऐसी थी की अनायास ही पल्लवी के चेहरे पर मुस्कान तैर जा रही थी । यूँ ही आंखों ही आंखों मे सभी की रात बीत गयी ।
इस गाव से दूर जसलमेर के एक बड़े होटल के कमरा नं 42 मे हंगामा मचा हुआ था , एक लड़की अपनी पूरी ताकत से चीख कर किसी से फ़ोन पर बात कर रही थी ।
" मै अभी उसके अभी उसके गाँव जा रही हूँ, प्लीज मुझे ऐड्रेस बताओ, मै देखती हूँ वो कैसे किसी और से शादी करता है, नानी ना याद दिला दी अर्नव के बच्चे को तो मेरा नाम नैना नहीं "
थोड़ी ही देर में लड़की अपने छोटे से बैग को पैक करके बाहर खड़ी टैक्सी की प्रतीक्षा कर रही थी , टैक्सी वो सारे सोच मे गुम रही , ट्रेन मे भी बिना कुछ खाए पिए पड़ी रही । बस कभी सिसक कर रोती तो कभी गुस्से से तमतमा उठती । कभी कभी तो अपनी शिकायतें खुद से ही बुदबुदा उठती । दूसरी सुबह भोर मे ही वो जा पहुंची वो अर्नव के गाव के स्टेशन । कडाके की ठंड उपर से नैना के पास शाल भी नही थी, ठंड ने गुस्से की आग मे घी का काम कर दिया । खैर बेचारी बडी हाय मुश्किलों से पता पूंछते पूंछते 10 बजे के करीब वो अर्नव के घर तक पहुंच पायी ।
अर्नव और उसके पापा घर के बाहर ही बैठे हुए मिल गए नैना को , अर्नव को देखते ही उसे यह भी ख्याल नहीं रहा कि अर्नव के पापा भी बगल में ही बैठे हुए हैं, वो धड़ धडाते हुये अर्नव के सामने जाकर खड़ी हो गयी और चिल्लाने लगी ,
नैना-- अर्नव तेरा दिमाग खराब हो गया क्या ? तुझे जान से मार दूंगी मैं ? तू समझता क्या है खुद को ? जब तेरी जो मर्जी आयेगी करेगा ?
नैना की बात का अर्नव कोई जवाब देता इससे पहले ही अर्नव के पिता बोल उठे,
अर्नव के पिता-- क्या हुआ बेटा कौन हो आप और चिल्ला क्यू रही हो ?
नैना-- मै कौन हूं यह तो आप अपने बेटे से ही पूछें , यह ज्यादा बेहतर बताएगा ।
नैना की बात सुन कर पापा अर्नव की ओर देखने लगे,
अर्नव-- पापा मैं ,पापा वो ,पापा इसको , मै आपको सब समझा दूंगा ।
अर्नव को हकलाते देख नैना तपाक से बोली,
नैना -- यह क्या पापा पापा पापा लगा रखा है , क्यों नहीं बताते हो मैं कौन हूं या तुमको शरम आ रही हो तो मै खुद बता दूं ?
अर्नव -- नैना तुम चुप रहो ,
अर्नव ने नैना को घूरते हुये कहा और खड़ा होकर उससे धीरे बात करने को कहा । नैना का गुस्सा काम नही हुआ पर अर्नव की बात मानकार उसने अपना वॉल्यूम जरुर काम कर लिया अब वो उतने हाय गुस्से मे फुसफुसा कर बोलने लगी ।
नैना-- बहुत अच्छे महाशय , मैं चुप रहूं और तुम किसी और के साथ शादी करके नई दुनिया बसा के बैठ जाओ, इतनी बड़ी वाली उल्लू समझ रखा है क्या ?
अर्नव के पापा-- बेटा यह क्या बोल रही हो ?
नैना -- पिता जी प्रणाम, गौर से सुनिये, मेरे साथ कितना बड़ा अन्याय हो रहा है, आपका बेटा मेरे साथ धोखा कर रहा है, वहां पर तो बड़े-बड़े वायदे किये इसने और अब अपने फायदे के लिए उन वायदों को भूल गया है, मै बहुत दूर से फरियाद लेकर आई हू और एक रिवोल्वर भी ।
नैना का अंदाज नाटकीय था पर रिवोल्वर और आंसू असली थे ।