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विकास दी ग्रेट complete

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झपटकर चीनी ने हंटरका दूसरा सिरा भी पकड़ लिया और जोर से खींचने लगा । विजय छटपटाया लेकिन फंस गया था ।

"मैं तुम्हें जिंदा नहीं छोडूंगा, कुत्ते !" दांत भीचकर चीनी गुर्राया । साथ ही पैर से उसने समीप ही रखी एक बडी-मशीन का बटन दबा दिया ।

खटाक्-पटाक् की कई आवाजे एक साथ हुई और एक बहुत वड़ा लोहे का आरा नीचे आने लगा ।

मशीन ठीक ऐसी थी जैसे आरा मशीन होती है, जो मोटे-मोटे वृक्ष काटने के काम आती है ।

चीनी ने विजय का सिर झट उस स्थान पर रख दिया जहाँ आरा गिरता ।

यानी जहां रखकर मोटे-मोटे लट्ठे काटे जाते हैं ।

विजय की हालत खस्ता हो गई ।

लाख करना चाहकर भी वह कुछ नहीं कर पा रहा था । उसका सांस रुक गया था । आरा निरंतर उसकी गर्दन की तरफ बढ रहा था ।

चीनी की आंखें शोले की भाति दहक रही थीं ।

विजय को अपने सामने मौत नजर आ गई, लेकिन उसने जिन्दगी के अंतिम पलो तक मौत से लडना सीखा था ।

उसे और कुछ न सूझा तो अपने दाएं हाथ की दो उंगलियां चीनी चीफ़ की दहकती आंखों में दे मारीं ।

चीनी बुरी तरह चीख पड़ा । एक पल के लिए उसकी पकड शिथिल पड्री, उसी पल विजय ने अपनी पूरी शक्ति समेटकर एक झटके के साथ स्वयं को आरे के नीचे से हटाया । आरा बहुत करीब आ चुका था । अगले ही पल विजय ने ऐसी पुती दिखाई जिसका कोई उदाहरण नहीं, जिस तेजी से हटा था उसी तेजी से उसने चीफ को पकडकर अपने स्थान पर मारा।

सारा कमरा एक डरावनी और अंतिम चीख से कांप उठा । खून के छींटे बड़े वीभत्स ढंग से इधर-उधर लहराए ।

विजय भी खून से नहा उठा । आरा लहू से सन गया ।

चीनी चीफ़ की गर्दन और धड़ अलग-अलग पड़े थे । एक क्षण के लिए दोनों अलग-अलग पड़े तड़फते रहे । फिर शांत हो गए ।
 
विजय ने उसकी तरफ़ से ध्यान हटाया । कमरे के ऊपर हॉल में से अब भी यदाकदा गोलियां चलने की आवाज आ जाती थी ।

उसके सामने समस्या ये थी कि इस कमरे से बाहर कैसे निकला जाए? उसने इधर-उधर दृष्टि मारी ।

इतना तो वह समझ ही गया था कि यहाँ रास्ता खोलने का कोई आँटोमेटिक सिस्टम होगा । वह एक मेज के करीब पहुँचा और उस पर लगे एक टार्च का हरा बटन दबा दिया, परिणामस्वरूप कमरे के एक तरफ़ की दीवार हटती चली गई । वह दीवार के पार एक प्रयोगशाला में पहुच गया । एक झलक में उसने देखा कि तीन वैज्ञानिको को किसी ने मौत के घाट उतार दिया था ।

"आओं जासूस प्यारे, मामला लगभग फतह हो गया है ।" वहां अलफांसे की आवाज़ गूंजी ।

विजय की दृष्टि तुरंत प्रयोगशाला के उस कोने णे गई ।

अलफांसे ने उसी समय एक लकडी का डिब्बा बंद किया और अपनी जेब के हवाले करने ही जा रहा था कि विजय उसकी तरफ बढ़ता हुआ बोला------" ये क्या है, प्यारे लूमड़खान?"

"पांच मुर्गी के अंडे! "

" हाय...!" विजय सीने पर हाथ मारकर बोला-"यानी कि ये मिल गए ।" कहता हुआ विजय अलफांसे के पास पहुंच गया ।

" मिल तो गए हैं ।" अजीब ढंग से मुस्कराता हुआ वह बोला--“लेकिन तुम्हें नही मुझे ।"

" क्या मतलब लूमड़ मियां?" विजय की आंखें संकुचित हो उठी ।

"मतलब के चक्कर में मत पडो प्यारे वरना वूढे हो जाओगे और फिर भी समझ नहीं आएगा ।"

"मुझे तुम्हारे इरादे नेक नहीं लग रहे लूमड़ प्यारे! "

" केबल तुम्हारी नजरों में ।"' अलफांसे डिब्बा अपनी जेब में डालता हुआ बोला-" मेरी नजरों में यही इरादे नेक हैं ।"

“वह डिब्बा शराफत से मेरे हवाले कर दो बेटा लाल! "

विजय समझ गया कि वह रंग बदल गया है ।

"इतना मूर्ख नहीं हू।"

"और कितने मूर्ख हो ?”

" तुमसे कम ।"

"बेटा लूमड़ खान, उतर आए न अपनी दो टके की औकात पर ।" विजय बोला…“लेकिन हम भी विजय दी ग्रेट हैं, अगर गलत करोगे तो तुम्हारी मुंडी मरोड़कर तुम्हारे ही हाथ में रख देगें!"

"सब बेकार की बाते हैं ।"

“तो फिर कार की बातें तुम कर डालो ।"

"मेरे विचार से अब तुम्हारी समझ में आ गया होगा कि मैं तुम्हारी मदद क्यों कर रहा था?” वह बड़े आराम से कह रहा था…"तुम जानते हो कि कोई भी देश इन अंडों की कीमत मुंह मांगी दे सकता है, इसीलिए मैं इनके पीछे था । मैं जानता था कि चीन सरकार से मै अकेला नहीं टकरा सकूंगा, इसलिए तुम्हें चीन लाने के लिए बाध्य किया, तुम चीन अवश्य ही आआगे इसीलिए मैं भारत से विकास को चीन लाया, क्योंकि मैं जानता था कि विकास के लिए तुम यहां अवश्य आओगे?

तुम्हें याद होगा कि मैं रैना वहन के पास ऐसा पत्र लिखकर छोड़ आया था जिससे रघुनाथ, रैना और ठाकुर साहब ये समझे कि तुम्हें पता है विकास कहां है? मैं जानता था कि बे पूछेंगे तो तुम नहीं बताओगे और फिर तुम्हें वे लोग गिरफ्तार करने के लिए प्लान बनाऐगे , तुम्हारा वहां रहना मुश्किल कर देगे । लिहाजा तुम, चीन पहुंचने के लिए बाध्य हो जाओगे और ऐसा ही हुआ भी ।" कहकर चिरस्थाइं मुस्कान के साथ विजय को घूरने लगा ।

"तो मतलब ये हुआ कि तुम प्रारंभ से ही चला रहे थे ।"

"मुझे दुख है कि समझ नहीं सके ।" अलफांसे बोला-“मैँ तुम्हें यहां मी इसलिए साथ लाया मैं जानता था कि अकेला सफल न हो सकूगा, तुम्हारी मदद से यहां कब्जा किया और अब अंडे मेरी जेब में हैं ।"

“तो प्यारे लूमढ़ खान, तुम ये समझते हो कि हम तुम्हें यूं ही जाने देगे ।" विजय समझ गया अलफांसे अपनी असलियत पर उतर आया है और अब बिना दो-दो हाथ किए काम नहीं चलेगा ।

" ऐसी गलती भला मैं कैसे कर सकता हूं !"

"तो फिर मुने राजा, वह डिब्बा शराफत से हमेँ दे दो ।"

“बैसे एक बात है, लुमड प्यारे! हैं, विजय अलफांसे से टकराने के लिए पूरी तरह तैयार होता हुआ बोला…“जब तुम इस तरह गिरगिट की भाँति रंग बदलते हो तो अल्ला कसम, मेरी कुतिया कलो परी से भी खूबसूरत लगते हो ।"

“तो फिर लो एक चुंबन! "

“ओ.के. !" एक सैकिंड में विजय ने कहा और विद्युत गति से उछल पड़ा, विजय का जबरदस्त घूंसा सीधा अलफांसे के गाल से टकराया ।

यूं तो अलफांसे सतर्क था लेकिन उसे यह उम्मीद नहीं थी कि विजय विना किसी अल्टीमेटम के ही मोहर लगा देगा, इसलिए वह स्वयं को बचा न सका और घूंसा खाकर धड़ाम से गिरा ।

विजय ने तुरंत उस पर जम्प लगा दी किन्तु इस बार वह मात खा गया । गजब की फुर्ती से अलफांसे अपने स्थान से कई करवटें ले गया ।

अगले ही पल दोनों आमने-सामने खडे नजर आए । मुस्कराता हुआ अलफांसे बोला---------" तुमसे दो-दो हाथ हुए विना बहुत दिन हो गए थे, आज़ मजा आएगा, वास्तव में यार तुम्हारे अलावा किसी से टकराने में मजा नहीं आता था ।” कहता हुआ अलफांसे अपने हाथ कैरेट की शक्ल में ले आया ।
 
"बेटा लूमडा" विजय बोला---"जब तुमने अमेरिका में रैना भाभी को बहन बनाया, मैं समझा कि हुम सुधर गए, इसी प्रकार जब मैंने सोचा कि बिकास के लिए तुम अपराध प्रवृति छोड़ दोगे किन्तु आज तुम्हारा ये गिरगिट की तरह बदला हुआ रंग देखकर मैं कह सकता हैं कि तुम कुत्ते की वह पूंछ हो जो कभी सीधी नहीं हो सकती ।"

"लगता है तुम्हें बीच में काफी गलतफहमियां हो गई थी ।"

विजय के हाथ भी कैरेट की सूरत में आ चुके थे । दोनों ही एक-दूसरे से पूरी तरह सतर्क थे ।

प्रयोगशाला की छत पर रिक्त स्थान था ।

जिससे कूदकर अलफांसे यहाँ आया था । इस समय उस रिक्त स्थान के समीप खड़ा जोबांचू नीचे का दृश्य देख रहा था ।

अपनी रायफल से समस्त चीनी सैनिकों को मौत का परमिट थमा चुका था । इस समय भी उसके हाथ में रायफल थी, लेकिन नीचे का दृश्य देख, वह बेहद आश्चर्य के सागर में गोते लगा रहा था ।

उसकी समझ में नहीं जा रहा था कि यह दोनो दोस्त है अथवा दुश्मन?

दोस्त हैं तो कैसे?

दुश्मन हैं तो कैसे?

जोबांचू नीचे आ चुका था ।

अलफांसे विजय पर झपट पड़ा ।

उसकी समझ में नहीं जा रहा था कि यह दोनो दोस्त है अथवा दुश्मन?

दोस्त हैं तो कैसे?

दुश्मन हैं तो कैसे?

जोबांचू नीचे आ चुका था ।

अलफांसे विजय पर झपट पड़ा ।

उसके देखते ही देखते वे दोनों फिर गुथ गए ।

मूर्खों की भाति अपलक वह दोनो विचित्र इंसानों को देखता रहा । वे फिर एक-दूसरे के साथ उठना-पटक करने लगे । इसी प्रकार उन्हें लगभग पंद्रह मिनट गुजर गए और इन पंद्रह मिनटों में जोबांचू ने देखा कि उसका मास्टर यानी अलफांसे विजय के सामने कमजोर पड़ गया था ।

अचानक अलफांसे ने उसे विचित्र आदेश दिया------" इस जासूस के बच्चे को बेहोश कर दो !"

जोबांचू की खोपडी घूम गई ।

वह करे तो क्या करे?

क्या उसी विजय को मारे जिसकी अब तक सहायता करता आया था । अनायास ही उसके मुख से निकला-“लेकिन . . . ।"

"जोबांचू ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ. . . ।" अचानक अलफांसे इतने खतरनाक स्वर में गुर्राया कि जोबांचू एडी से चोटी तक कांप उठा । वास्तव में अलफांसे बहुत खतरनाक हो गया था-" यह मेरा आदेश है!"

अगले ही पल जोबांचू भी तैयार होकर विजय की तरफ़ बडा, वह निश्चय कर चुका था कि उसे अपने मास्टर का आदेश मानना चाहिए ।

विजय तुरंत इस खतरनाक स्थिति को भांप गया ।

वह एकदम सतर्क होकर बोला…“लूमड़ प्यारे! जब अकेले का बस नहीं चला तो हिमायती लगा दिया ।"

और फिर क्या था? जोबांचू भी विजय पर झपट पडा ।

एक तो अलफांसे किसी प्रकार विजय से कम नहीं था, उस पर जोबांचू जैसा बलशाली व्यक्ति उसकी सहायता करने लगा तो विजय को संभलना भारी हो गया ।

परिणामस्वरूप विजय की हालत बैरंग हो गई और अंत ये हुआ कि वह बेहोश होकर अलफांसे की बांहों में झूल गया ।

अपनी सफलता पर अलफांसे विचित्र ढंग से मुस्कराया।

"अब तुम इसे लेकर फौरन अपने अड्डे पर चले जाओ ।" कहते हुए उसने विजय के बेहोश जिस्म को जोबांचू की तरफ धकेल दिया ।

तभी अलफांसे फिर बोला-----' देखो. . इसे किसी प्रकार के खतरे में मत पडने देना । यह तुम्हारे लिए ठीक वेसा ही है जैसा मैं हूं । हर खतरे में तुम इसकी सहायता करोगे, चाहै तुम्हें जान देनी पड़े ।"

"लेकिन मास्टर... ।" जोबांचू उलझा।

“मैं जानता हैं कि तुम क्या कहना चाहते हो, तुम नहीं जानते मेरा और इसका रिश्ता ही ऐसा लेकिन अपना यार है ।"

जोबांचू अवाक् !

"अब तुरंत यहां से निकल जाओं क्योंकि यहाँ खतरा है ।" कहते हुए अलफांसे ने फुर्ती के साथ एक जम्प लगाई और वहाँ से गायब हो गया ।

जबकि जोबांचू सोच रहा था…"आखिर इन दोनों व्यक्तियों के बीच रिश्ता क्या है? ये कैसी यारी है?"

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विकास यूं तो पूर्णतया स्वस्थ हो चुका था फिर भी अपने गुरु लोगों के अनुरोध से बिस्तर पर ही पड़ा था ।

इन दिनों में उसने इस अड्डे पर उपस्थित जोबांचू के प्रत्येक साथी का दिल जीत लिया था ।

सब इस कम उम्र के अनोखे साहसी लड़के से बहुत अधिक प्रभावित थे । संध्या की स्थिति ऐसी हो गई थी कि एक पल के लिए भी वह विकास को अपनी आंखों से ओझल नहीं होने देना चाहती थी ।

वह स्वयं नहीं जान पा रही थी कि बिकास उससे छोटा है फिर भी हदय में ये कैसा प्रेम जाग्रत हुआ है? क्यों वह विकास को हमेशा अपनी आंखो के सामने देखना चाहती है? वह कुछ भी समझ नहीं पा रही थी ।

इस समय रात के बारह बज रहे थे ।

वह विकास की चारपाई के समीप ही पड़े एक स्टूल पर बैठी थी । अभी कुछ देर पूर्व तो वह अपने कमरे में थी लेकिन नींद न आने के कारण वह चुपचाप वहां आ गई थी ।

उसे रात के समय यहाँ आते हुए किसी ने नहीं देखा था ।

विकास को भी जैसे उसकी उपस्थिति का ज्ञान नहीं था । संध्या अपलक उस मासूम, गोरे और बेहद सुंदर मुखड़े को निहारे जा रही थी ।

कैसा सुन्दर मुखडा था ।

मानो स्वयं सौंदर्य कुंडली मारकर उसके मुखड़े पर बैठ गया हो । बडी-बडी सुंदर आंखे इस समय बंद थी । गुलाबी अधर आपस में आलिंगन किए हुए थे ।

मानो स्वयं सौंदर्य कुंडली मारकर उसके मुखड़े पर बैठ गया हो । बडी-बडी सुंदर आंखे इस समय बंद थी । गुलाबी अधर आपस में आलिंगन किए हुए थे ।

बह निहारती रही, उसके ह्रदय में अजीब-अजीब सी भावनाओं का उत्थान-पतन हो रहा था । भावनाओं के भावावेश में संध्या इतनी बह गई कि उसे अपनी सुध ही न रही ।

अनजाने में ही उसके अधर बड़े और फिर बडते ही चले गए । उसके गुलाबी अधर धीरे-धीरे कांप रहे थे मानो समीर के मंद झोंकों के साथ गुलाब की पंखुरियां ।
 
सहसा उसके अधर विकास के गुलाबी अधरों से स्पर्श कर गए ।

इससे पूर्व कि किसी चुंबन की ध्वनि वहां गूंजे ।

“अरे...अरे...!" विकास उसी प्रकार शांत पड़ा हुआ बोला----" मै सब देख रहा हूं यह क्या बात है?” कहने के साथ बिकास उछलकर खडा हो गया ।

और संध्या, बह तो एकदम चकरा गई ।

अजीब हालत हो गई उसकी ।

शर्म से जैसे धरती में गडी चली जा रही थी । दृष्टि झुक गई । उसकी चोरी पकड़ी गई ।

विकस बहुत शेतान था, वास्तव में यह आरंभ से ही जाग्रत अवस्था में था ।

“कर दिया न मुंह जूठा. . .क्या तुम नहीं जानती कि मेरी आयु अभी इश्कबाजी की नहीं!" चहकता हुआ विकास उछलकर खड़ा हो गया और शरारत के साथ बोला------------------“जो अभी-अभी तुमने किया था उसे क्या बोलते हैं?''

संध्या जैसे शर्म से धरती में धंसी जा रही थी ।

"दिल तो मेरा भी चाहता है कि ऐसा ही मैं भी करू' ।" लडका शेतान था और शैतानी में वह कह भी गया था'-----"लेकिन क्या करूं कि मेरे गुरु लोगों को पता लग गया तो मेरे कान किसी खरगोश की तरह लंबे कर देगे ।"

"बहुत शैतान हो तुम, सब कुछ देख रहे वे ।" स्वयं पर संयम पाकर संध्या बोली ।

"हम तो इससे भी बड़े शेतान हैं ।” बिकास गर्व से सीना फुला कर बोला…"लेकिन शैतानी दिखाते नहीं, हमें तो यह भी पता है कि हमारे गुरु लोग यहां नहीं है ।”

“गलतफहमी है तुम्हें, वे सव बराबर वाले कमरे में सो रहे है ।"

"गुरु नहीं बल्कि तकिए सो रहे हैं ।"

"क्या मतलब?"

"मतलब ये कि गुरु लोग चेले को झांसा देकर एक खतरनाक मुहिम पर गए है, समझते हैं कि शिष्य नादान है, कुछ नहीं जानता लेकिन बे नहीं जानते कि एक साथ चार-जार हस्तियों का शिष्य हूं ।"

"मुझे तो लगता है तुम गुरु हो ।"

"ऐसा कभी मत सोचना । गुरू तो गुरु ही रहेगे ।"

"जब तुम्हें यह पता था कि लोग तुम्हें झांसा देकर जा रहे हैं तो तुम झांसे मे क्यों आए?"

--------॥॥------

"जब तुम्हें यह पता था कि लोग तुम्हें झांसा देकर जा रहे हैं तो तुम झांसे मे क्यों आए?"

“कलयुगी चेला जरूर हू लेकिन गुरुओं का ख्याल सबसे पहले है ।" विकास बोला----------"उन्हें यह जानकर खुश होने दो कि उन्होंने शिष्य को झांसा दे दिया है ।"

“लेकिन तुम उनके साथ क्यों नहीं गए?"

"गुरुओं सामने भला चेला क्या करता?" विकास बोला----" फिर तुमसे इस तरह मिलने का अवसर कैसे मिलता?"

संध्या एकदम लज्जा लगी गई । ह्रदय में उगे प्रेम-पुष्य ने नेत्र खोले । साहस करके वह बोली-----"तुम मुझसे कहां मिले, मैं ही तुम्हारे पास... ।"

और बस. . . . यहीं संध्या का लहजा कांप गया । इधर ड्रिकास ठीक उसके सामने आ गया और यकायक बहुत ही गंभीर स्वर में बोला “संध्या!"

संध्या ने एकदम पलकें उठा दी । दोनों के नेत्र टकराए ! एक पल के लिए जैसे दोनों खो गये ।

फिर अचानक विकास बोला----- ! मैं तुम्हारी भावनाओं की क्रद्र करता हू।" संध्या का ह्रदय जैसे गदगद हो गया ।

"लेकिन मैं ऐसे गुरुओं का चेला हू जो भावनाओं को महत्व नहीं देते ।" संध्या के दिल पर जैसे विस्फोट हुआ ।

जबकि विकास उसी गंभीरता के साथ कहता गया ।

"इसीलिए मैं तुम्हारे प्यार के बदले प्यार नहीं दे सकता ।"

"म . .म. . .मैंने कब मांगा?” कांपती-सी संध्या कह गई…“मैं प्यार. . प्यार नहीं . मांगती !"

" संध्या ! मेरा मतलब है तुम भी यह भावना निकाल दो ।" इस समय विकास का एक अन्य अनोखा रूप सामने आ गया था ।

" कैसी भावना?" कहते-कहते संध्या की आंखों में आंसू आ गए…"मेरे मन में कोई भावना नहीं है. . .म. .म. . .मैँने कब कहा कि मैं तुमसे प्यार. . . . . ?"आगे बह एक भी शब्द न कह सकी । दिल की पीड़ा को दबाकर वह कमरे से भागी । अभी पहला ही पग उठाया था कि भयानक विस्फोट से सारा वातावरण कांप उठा ।

इतनी बुरी तरह कि संध्या लड़खड़ाकर धड़ाम से गिर पडी । बिकास तेजी के साथ लपका और संध्या को सहारा देकर उठाया ।

अगले ही पल वह स्वयं ही संभल गई ।

भावुक वातावरण जैसे एकदम समाप्त हो गया ।

वह जोरदार धमाका निश्चित रूप से किसी बम का था । सारे अड्डे में एकदम कोलाहल मच गया ।

उस समय संध्या विकास को देखती ही रह गई जब उसने किसी बाज़ की भाति झपटकर अपने तकिए के नीचे से रिवॉल्वर निकाला और संध्या की तरफ देखकर चीखा…“संध्या... लगता है चीनी सूअरों ने हमला कर दिया है ।"

संध्या के प्यारे मुखड़े पर भी जैसे एकदम तनाव आ गया ।

वह भावुक नारी जो अभी एक ही पल पूर्व स्वयं को विकास के सामने समर्पित कर रही थी, न जाने कहाँ जाकर खो गई?

---॥॥॥॥॥-----

न जाने वे आसू कहां चले गए जो दो पल पूर्व संध्या की आंखों में थे ।
 
पल-भर में संध्या ने भी अपने वक्षस्थल से दशमलव तीन का एक नन्हा किन्तु खतरनाक रिवॉल्वर निकाल लिया ।

तभी उस कमरे में बदहवासी की स्थिति में भागता एक जोबांचू का आदमी प्रविष्ट हुआ और बोला-"चीनी सैनिकों ने इस अड्डे को घेर लिया है !"

'कितने सेनिक हैं?” विकास ने पूछा ।

"बहुत अधिक, उनका नेतृत्व गोयरिग कर रहा है ।"

रेट. . .रेट . .रेट . . . !

तभी मशीनगनों की गड़गड़ाहट से वातावरण गूंज उठा ।

"गोयरिंग. .कौन गोयरिग?"

"चीन का सबसे बड़ा हत्यारा जासूस. ..!" उसके लहजे में भय का पुट था ।

"क्या इरादा है?" विकास उसका मनोबल देखना चाहता था !

"आपके दोनों गुरु और मास्टर गायब है । मास्टर से मतलब जौबांचू से था ।

"घबराने की कोई बात नहीं है ।" विकास दृढ़ता के साथ बोला-----" उनका मुकावला करेंगे ।" कहते हुए विकास ने रिवॉल्वर संभालकर, तेजी के साथ कमरे बाहर जम्प लगा दी ।

चीख-पुकार, मार-काट मची हुई थी ।

अड्डे के अंदर उपस्थित जोबांचू के आदमी रायफल, एल.एम.जी, टॉमीगन, मशीनगन और दस्तीबम जैसे शस्त्र लिए बाहर की तरफ दौड़ रहे थे ।

विकास भी उनके उपर से होता हुआ हवा में किसी तीर की भाति सनसनाता हुआ आगे बडा ।

संध्या भी उसके पीछे झपटी थी । उसने विकास को हवा में सनसनाता भी देखा था और न जाने क्यो इस शैतान की वह करामात देखकर वह भयभीत-सी हो गई ।

अड्डे के बाहर…चारों तरफ की पहाडियों में छाया गहन अंधकार!

उधर पहाडियों में जोबांचू के साथियों ने मोर्चा संभाल रखा था और अंधेरे के पार गहन अंधकार में डूबी सामने की पहाडियों में शायद चीनी सैनिक थे । बिकास कुछ पल तक गहराई से स्थिति का अध्ययन करता रहा ।

गोली थम-थम कर चल रही थी ।

दोनों तरफ़ के जांबाज मोर्चा लगाए हुए थे ।

अचानक बिकास ने समीप बाले इंसान से पूछा-“क्या स्थिति है?”

"हम बुरी तरह धिर गए है ।" वह ध्यान से सामने वाली अंधेरी पहाडियों को घूरता हुआ थोड़े भयभीत से लहजे में बोला…“सैनिक संख्या में सैकडों हैं और उनका नेतृत्व स्वयं गोयरिग कर रहा है ।"

विकास ने अनुमान लगाया कि उपस्थित सब इंसानों पर गोयरिग का भय भूत बनकर छाया हुआ है ।

अभी वह कुछ सोच ही रहा था कि अचानक पहाडियों से एक डरावनी आवाज गूंजी…"आप लोगों के इस अड्डे को चारों ओर से धेर तिया गया है, अगर आप अपनी भलाई चाहते हैं तो आत्मसमर्पण कर दे वरना पहाडियों को भूनकर रख दिया जाएगा ।"

वह चेतावनी रह…रहकर पहाडियों से गूंज रही थी । विकास यह जानने का लाख प्रयास कर रहा था कि यह आबाज कहां से आ रही है किन्तु पहाडियों से टकराकर आवाज कुछ इस प्रकार प्रतिध्वनित हो रही थी कि यह पता लगाना बड़ा कठिन कार्य था । एकाएक उसको सर्चलाइटों का ध्यान आया ।

यहां रहते समय उसे बातों के मध्य पता चला कि पहाडी के नीचे यह अड्डा है ।

उस पहाडी की उभरी हुई चट्टानों पर सर्चलाइट सिस्टम है । यह ध्यान आते ही विशेष ढंग से उसकी आंखें चमक उठी ।
 
अगले ही पल दस्ती बम हाथ में दबाए वह पीछे की और रेग गया । उसने देखा कि यह संध्या थी जो बडी चतुराई और सावधनी के साथ एक ऊंची-सी चट्टान की और रेग रही थी । इस समय उसके हाथ में एक टांमीगन थी ।

विकास उसके पास पहुचा और शरारत के साथ बोला-----"जितने सेनिक मारोगी उतना ही प्यार दूंगा !"

"धांय . . धांय . . . !" तभी दो बार संध्या की टांमीगन ने खांसा । उत्तर में पूरी दो चीखों से वातावरण कांपा ।

वास्तव में संध्या का निशाना भी एकदम अचूक था ।

उत्तर में गोलियों की बाढ दोनों के उपर से गुजर गई । जबकि संध्या अंधेरे में विकास को घूरते हुए बोली-----"चार पहले मारे गए थे, दो अब मार दिए, लाओ छ: प्यार !"

विकास भी उनके उपर से होता हुआ हवा में किसी तीर की भाति सनसनाता हुआ आगे बडा ।

संध्या भी उसके पीछे झपटी थी । उसने विकास को हवा में सनसनाता भी देखा था और न जाने क्यो इस शैतान की वह करामात देखकर वह भयभीत-सी हो गई ।

अड्डे के बाहर…चारों तरफ की पहाडियों में छाया गहन अंधकार!

उधर पहाडियों में जोबांचू के साथियों ने मोर्चा संभाल रखा था और अंधेरे के पार गहन अंधकार में डूबी सामने की पहाडियों में शायद चीनी सैनिक थे । बिकास कुछ पल तक गहराई से स्थिति का अध्ययन करता रहा ।

गोली थम-थम कर चल रही थी ।

दोनों तरफ़ के जांबाज मोर्चा लगाए हुए थे ।

अचानक बिकास ने समीप बाले इंसान से पूछा-“क्या स्थिति है?”

"हम बुरी तरह धिर गए है ।" वह ध्यान से सामने वाली अंधेरी पहाडियों को घूरता हुआ थोड़े भयभीत से लहजे में बोला…“सैनिक संख्या में सैकडों हैं और उनका नेतृत्व स्वयं गोयरिग कर रहा है ।"

विकास ने अनुमान लगाया कि उपस्थित सब इंसानों पर गोयरिग का भय भूत बनकर छाया हुआ है ।

अभी वह कुछ सोच ही रहा था कि अचानक पहाडियों से एक डरावनी आवाज गूंजी…"आप लोगों के इस अड्डे को चारों ओर से धेर तिया गया है, अगर आप अपनी भलाई चाहते हैं तो आत्मसमर्पण कर दे वरना पहाडियों को भूनकर रख दिया जाएगा ।"

वह चेतावनी रह…रहकर पहाडियों से गूंज रही थी । विकास यह जानने का लाख प्रयास कर रहा था कि यह आबाज कहां से आ रही है किन्तु पहाडियों से टकराकर आवाज कुछ इस प्रकार प्रतिध्वनित हो रही थी कि यह पता लगाना बड़ा कठिन कार्य था । एकाएक उसको सर्चलाइटों का ध्यान आया ।

यहां रहते समय उसे बातों के मध्य पता चला कि पहाडी के नीचे यह अड्डा है ।

उस पहाडी की उभरी हुई चट्टानों पर सर्चलाइट सिस्टम है । यह ध्यान आते ही विशेष ढंग से उसकी आंखें चमक उठी ।

अगले ही पल दस्ती बम हाथ में दबाए वह पीछे की और रेग गया । उसने देखा कि यह संध्या थी जो बडी चतुराई और सावधनी के साथ एक ऊंची-सी चट्टान की और रेग रही थी । इस समय उसके हाथ में एक टांमीगन थी ।

विकास उसके पास पहुचा और शरारत के साथ बोला-----"जितने सेनिक मारोगी उतना ही प्यार दूंगा !"

"धांय . . धांय . . . !" तभी दो बार संध्या की टांमीगन ने खांसा । उत्तर में पूरी दो चीखों से वातावरण कांपा ।

वास्तव में संध्या का निशाना भी एकदम अचूक था ।

उत्तर में गोलियों की बाढ दोनों के उपर से गुजर गई । जबकि संध्या अंधेरे में विकास को घूरते हुए बोली-----"चार पहले मारे गए थे, दो अब मार दिए, लाओ छ: प्यार !"

विकास भी उनके उपर से होता हुआ हवा में किसी तीर की भाति सनसनाता हुआ आगे बडा ।

संध्या भी उसके पीछे झपटी थी । उसने विकास को हवा में सनसनाता भी देखा था और न जाने क्यो इस शैतान की वह करामात देखकर वह भयभीत-सी हो गई ।

अड्डे के बाहर…चारों तरफ की पहाडियों में छाया गहन अंधकार!

उधर पहाडियों में जोबांचू के साथियों ने मोर्चा संभाल रखा था और अंधेरे के पार गहन अंधकार में डूबी सामने की पहाडियों में शायद चीनी सैनिक थे । बिकास कुछ पल तक गहराई से स्थिति का अध्ययन करता रहा ।

गोली थम-थम कर चल रही थी ।

दोनों तरफ़ के जांबाज मोर्चा लगाए हुए थे ।

अचानक बिकास ने समीप बाले इंसान से पूछा-“क्या स्थिति है?”

"हम बुरी तरह धिर गए है ।" वह ध्यान से सामने वाली अंधेरी पहाडियों को घूरता हुआ थोड़े भयभीत से लहजे में बोला…“सैनिक संख्या में सैकडों हैं और उनका नेतृत्व स्वयं गोयरिग कर रहा है ।"

विकास ने अनुमान लगाया कि उपस्थित सब इंसानों पर गोयरिग का भय भूत बनकर छाया हुआ है ।

अभी वह कुछ सोच ही रहा था कि अचानक पहाडियों से एक डरावनी आवाज गूंजी…"आप लोगों के इस अड्डे को चारों ओर से धेर तिया गया है, अगर आप अपनी भलाई चाहते हैं तो आत्मसमर्पण कर दे वरना पहाडियों को भूनकर रख दिया जाएगा ।"

वह चेतावनी रह…रहकर पहाडियों से गूंज रही थी । विकास यह जानने का लाख प्रयास कर रहा था कि यह आबाज कहां से आ रही है किन्तु पहाडियों से टकराकर आवाज कुछ इस प्रकार प्रतिध्वनित हो रही थी कि यह पता लगाना बड़ा कठिन कार्य था । एकाएक उसको सर्चलाइटों का ध्यान आया ।

यहां रहते समय उसे बातों के मध्य पता चला कि पहाडी के नीचे यह अड्डा है ।

उस पहाडी की उभरी हुई चट्टानों पर सर्चलाइट सिस्टम है । यह ध्यान आते ही विशेष ढंग से उसकी आंखें चमक उठी ।

अगले ही पल दस्ती बम हाथ में दबाए वह पीछे की और रेग गया । उसने देखा कि यह संध्या थी जो बडी चतुराई और सावधनी के साथ एक ऊंची-सी चट्टान की और रेग रही थी । इस समय उसके हाथ में एक टांमीगन थी ।

विकास उसके पास पहुचा और शरारत के साथ बोला-----"जितने सेनिक मारोगी उतना ही प्यार दूंगा !"

"धांय . . धांय . . . !" तभी दो बार संध्या की टांमीगन ने खांसा । उत्तर में पूरी दो चीखों से वातावरण कांपा ।

वास्तव में संध्या का निशाना भी एकदम अचूक था ।
 
उत्तर में गोलियों की बाढ दोनों के उपर से गुजर गई । जबकि संध्या अंधेरे में विकास को घूरते हुए बोली-----"चार पहले मारे गए थे, दो अब मार दिए, लाओ छ: प्यार !"

अचानक वह चौक पड़ा । एक कमरे में उसे नारी चीख सुनाई पडी ।

लपककर बिकास कमरे के दरवाजे पर पहुंच गया ।

अंदर का दृश्य देखते ही उसका खून खौल उठा ।

लड़के का जिस्म तन गया । चेहरा दहक उठा । आंखें अंगारे वन गई ।

एक पल के लिए तो वह देखता ही रह गया ।

अंदर कमरे में उफ् !

संध्या निर्वस्त्र खडी थी । एकदम नग्न. . .जिस्म पर एक भी कपडा नहीं था । सिमटी, किसी भयभीत हिरनी की तरह... ।

उसके चारों ओर चीनी कुत्ते खड़े थे ।

वासना के क्रीड़े । हवस के पुजारी । सब जैसे मासूम नारी के शरीर को रोंद देना चाहते थे ।

असहाय अबला पर ये जुल्म । अचानक संध्या के नग्न उरोजों को एक चीनी ने बड़े भद्दे ढंग से मसला और बोला…“बता दो मेरी जान, वो लड़का कहां है?"

“नहीं ।" असहाय संध्या अपने आप में सिमटकर झिझक पडी ।

विकास. . शैतानियत की चरम सीमा पर पहुच गया ।

अगले ही पल वह भयानक और डरावनी आवाज में गरज उठा'-----संध्या. . .घबराओ नहीं मैं आ गया हू----लाशें बिछा दूगा ।" शब्दों के एकदम बाद ही उसकी टांमीगन का जबड़ा खुल गया और पलक झपकते ही सारे सैनिक चीखकर फर्श पर गिरे और तड़पने लगे ।

संध्या की हालत बिचित्र. . . ।

क्रोध में धधकता हुआ विकास । चेहरा----जैसे भट्ठी तप रही थी ।

आंखे…मानो आग उगल रही थी । संध्या दहल उठी मानो कोई वहशी राक्षस सामने खडा था ।

बिल्कुल कोई खूनी भेडिया ।

उन दोनों के नेत्र टकराए ।

न विकास को उसकी नग्नता का ध्यान रहा और न ही स्वयं संध्या को ।

एक-दूसरे की आंखों में खो गए ।

वह अवाक् चमत्कृत, बदहवास न जाने कितने भाव अपनी आंखों में लिए हुए थी । जबकि विकास की आंखे दहक रहीं थी ।

अचानक वहां भागते कदमों की आहट हुई । दोनों की तन्द्रा जैसे एकदम मंग हुई ।

विकास तेजी के साथ घूमा ।

वह अपने वस्त्रों की तरफ लपकी ।

घूमते ही विकास ने देखा कमरे के दरवाजे पर एक अमेरिकन खड़ा था, भयानक चेहरे और बिल्लोरी आंखों बाला अमेरिकन ।

बह गोयरिग के अलावा कोई नहीं था । गोयरिंग एकदम निहत्था था । विकास ने टॉमीगन चलानी चाही, किन्तु भाग्य की अनोखी बात कि टांमीगन में गोलियां समाप्त हो चुकी थी ।

“हा. . .हा. . .हा. . . ।" अचानक गोयरिंग भयानक तरीके से अट्टहास कर उठा ।

विकास का चेहरा कनपटी तक दहल उठा ।

इधर संध्या इस बीच अपनी स्कर्ट पहन चुकी थी ।

यकायक कहकहे के बाद गोयरिग गरजा…“तो तू है बो कुत्ता, जिसने सारे चीन को कंपा दिया है ।"

वह आगे बढता हुआ बोला…"गोयरिंग को तेरी ही तलाश थी ।"

गोयरिग . .यह नाम सुनते ही विकास के जिस्म की समूची नसें तन गई ।

वह भयानक भेडिए की तरह गुर्रा उठा-----------"तो तु है दो हजारों इंसानों का अमेरिकन हत्यारा गोयरिग, अपने देश से भागकर यहां चीनियों का मैला खा रहा है, गंदे सूअर !"

" तूने अभी गोयरिग की शक्ति नहीं देखी है-हिन्दुस्तानी खटमल! " गोयरिग गुर्राया ।

" तेरे जैसे हत्यारे को ही चमगादड़ बनाने के लिए विकास ने ज़न्म लिया है, खटमल की औलाद!" विकास भी भयानक स्वर में गुर्रा रहा था ।

"तो संभल मच्छर !" कहते हुए गोयर्रिग ने उस पर जम्प लगा दी । तभी विकास ने घुमाकर रायफल का कुंदा गोयरिग के पेट में मारा और साथ ही चीखा-" ले तो मच्छर की दुम, आज़ तेरे पापों का घड़ा भर गया है ।" लहराकर चीखता हुआ गोयरिग फर्श पर गिरा परंतु गिरते ही उसने रिवॉल्वर निकाल लिया और विकास की तरफ तानकर बोला-----“हिलना मत्त गीदड़ वरना सारा जिस्म छलनी कर दूगा ।"

विकास ठिठका । ध्यान से अपने सामने रिवॉल्वर तानकर खड़े गोयरिग को देखा ।

इधर संध्या अबाक्. . .वह कपड़े पहन चुकी थी ।

इस समय वह ठीक विकास के बराबर में खडी थी ।

उसने धीमे से पैर चलाकर फर्श पर किसी सैनिक की टांमीगन खोजने का प्रयास किया तो गोयरिग गुर्राया----- लडकी चालाकी मत दिखा, वरना इससे पहले तुझे गोली मार दूगा ।"

संध्या ठिठक गई ।

गोयरिग फिर विकास पर दृष्टि गड़ाकर खूंखार स्वर में बोला-------"सुना है तुम शैतान हो और शैतान को अधिक देर तक जीवित रखना ठीक नहीं होता ।" कहने के साथ ही गोयरिग ने फायर झोंक दिया !

धांय . . . । "नहीं . . . !" चीखती हुई संध्या एकदम विकास के सामने आ गई ।

उफ्-गोली संध्या का कलेजा फाड़ गई ।

एक पल के लिए तो गोयरिग भी अवाक् रह गया ।

जो गोली विकास का सीना तोडने जा रही थी वह संध्या का कलेजा चीर गई । संध्या ने विकास को बचा लिया ।

बिकास भी न रह सका । वह एकदम चीखा…“संध्या...!"

"धांय . . . ! तभी एक गोली चली । लहराकर विकास फर्श पर गिर गया । गोली उसके पैर में लगी थी ।

गोली चलाने वाला गोयरिग था ।
 
वह अभी तीसरी बार ट्रेगर दबाना ही चाहता था कि-धांय.. .!

एक गोली विकास के रिवॉल्वर से चली ।

निशाना सीधा गोयरिग के हाथ में दबा रिवॉल्वर था । रिवॉल्वर छिटककर दूर जा गिरा ।

विकास ने अपना रिवॉल्वर पैर में गोली लगने के कारण लहराकर फर्श पर गिरते समय निकाल लिया था ।

रिवॉल्वर हाथ से निकलते ही गोयरिग ने फौरन ही कमरे से बाहर जम्प लगा दी ।

विकास गोली लगी होने के बावजूद भी झपटा लेकिन गोयरिग भाग चुका था । गैलरी के मोड़ तक विकास भागा लेकिन गोयरिग नजर नहीं आया ।

तभी उसे संध्या का ध्यान आया । बह लड़खड़ाता हुआ वापस कमरे में ।

संध्या की लाश देखकर विकास जैसा शैतान भी कांप उठा ।

उसकी पथराई आंखें मानो उसी को निहार रही थी ।

विकास भी दहल उठा ।

उसका हदय भी कराह उठा ।

एक क्षण पहले का वह दृश्य उसकी आंखों में घूम गया जब उसके सीने पर लगने वाली गोली संध्या ने अपने कलेजे पर खा ली थी ।

संध्या का प्रेम महान था । इसी का नाम ही तो त्याग है । संध्या ने अपना त्याग दे दिया था ।

विकास उससे छोटा था------"यह कैसा प्यार था? कैसा प्रेम. . कौन-सा अनुराग? घुटनों के बल विकास संध्या की लाश के समीप बैठ गया । उसे लगा जैसे संध्या खडी हो गई हो और वह कह रही हो--"चार पहले मारे थे, दो अब मार दिए, छः . . लाओ प्यार. . .सात. . ।

अभी नहीं. . . । विकास को अपने ही शब्द याद आये-दस युद्ध के बाद सब एक साथ लेना ।

लेकिन अगर इस युद्ध में मैं मारी गई. .. ।

संध्या का वाक्य उसके कान में गूजा----------"अगर मैं मारी गई तो तुम मेरी लाश के इतने ही प्यार लेना विकासा !

"नहीं...नहीँ...संथ्या...!" तड़पकर विकास बुदबुदा उठा------“तुम मरी नहीं हो... मरी नहीं हो ।" कहकर वह पागलों की भाति संध्या के जिस्म से लिपट गया दीवाना-सा होकर बार-बार उसका मुखड़ा चूमने लगा ।

क्या था बिकास?

भावुक...अथवा पत्थर दिल ।

रेट. . .रेट . . .रेट. . . !

टोंमीगनों इत्यादि की गर्जना से जोबांचू दहल उठा । अभी वह अपने अड्डे के समीप वाली पहाडियों में प्रविष्ट ही हुआ था कि एकदम भांप गया कि आज चीनी सैनिकों ने उसके अड्डे को घेर लिया है ।

यह सोचते ही जोबांचू की नसों में तनाव आ गया ।

उसके कंधे पर अभी तक अचेत विजय पड़ा हुआ था ।

अभी वह कुछ सोच ही रहा था कि उसके कंधे पर पड़ा हुआ विजय कुनमुनाया और घीरे धीरे होश में आने लगा ।

जोबांचू ने जल्दी से विजय को एक पथरीली चट्टान पर लिया और होश में आते हुए विजय के गाल पर हल्के-हल्के चपत मारता हुआ प्यार से कहने लगा…"मास्टर. . .उठो मास्टर! "

अचानक विजय खड़ा हो गया और अपने सामने जोबांचू को देखकर वह अपनी बांह बढाता हुआ बोला…“अच्छा बेटा , अब मैं तुम्हारी चटनी वना दूगा ।"

"नहीं मास्टर!'' जोबांचू एकदम बोला…“आप परिस्थितियों को समझने की चेष्टा कीजिए। इस समय हम अपने अड्डे के बहुत समीप है और अड्डे को चीनी सैनिकों ने घेर रखा है ।"

अभी जोबांचू का वाक्य पूरा ही हुआ था कि एक भयानक विस्फोट से समूचा वातावरण दहल उठा ।

विजय ने फौरन उसकी तरफ देखा । उसे याद आया कि विकास उसी अड्डे'मेँ फंसा हुआ है ।

वह जोबांचू से बोला-“लूमड़ कहां है?"

“फ्ता नहीं मास्टर किंतु फिलहाल तो आप इधर की सोचिए!"

"सोचना क्या है बेटे, हमारा शैतान चेला कहां फंसा हुआ है? जो आंखें उसकी तरफ उठेगी उनका भूर्ता बनाकर खा जाऊंगा ।" कहने साथ ही विजय ने तेजी से अड्डे की तरफ़ दौडना आरंभ कर दिया र्कितु तभी पीछे से जोबांचू लपकता हुआ बोला…“मास्टर! यह रिवॉल्वर तो रख लीजिए ।" उसके पश्चात् जोबांचू और विजय भी उस युद्ध में कूद पडे ।

युद्ध उस समय अपने अंतिम दौर में चल रहा था । स्वयं उन दोनों को पता नहीं कि उन्होंने कितने आदमियों को मौत के धाट उतार दिया ।

कल्लेआम करते हुए वे तेजी के साथ अड्डे की तरफ बढते रहे । लाशे बिछाते हुए वे अग्रसर रहे ।

कुछ समय पश्चात् सब कुछ शांत हो गया । कुछ लोग जो जिंदा थे, इधर-उपर दरों में छुप रहे थे । जोबांचू विजय से बिछुड गया था ।

इस समय विजय अड्डे के अंदर पहुच चुका था । उसे विकास की तलाश थी ।

सहसा उसकी नजर एक कमरे में पडी तो विकास को देखकर दंग रह गया ।

पागलों की तरह वह संध्या से लिपटा उसकी लाश को रह-रहकर चूम रहा था ।

बिजय अवाक्-सा खडा हुआ उसे देखता रहा।

एकाएक विकास वहुत ही खतरनाक और ठंडे स्वर में गुर्राया, इतने अधिक ठंडे लहजे में कि सारा कमरा जमता-सा लगा------" तुम्हारी कसम खाता हूं संध्या कि; उस गोयांरेंग नामक कुत्ते की टांग-पर-टांग रखकर चीर दूगा. . . । मैं तुम्हारी मौत का भयानक बदला लूगा ।"

परिस्थिति ऐसी थी कि विजय भी भावुक होने जा रहा था किन्तु इस समय ठीक नहीं समझा, अपनी भावुकता का गला घोंटकर विजय अपने ही लहजे में बोला…“क्यो वे दिलजले, ये क्या कन्याबाजी हो रही है?"

एक झटके के साथ विकास विजय की तरफ़ घूम गया । विकास का रूप देखकर अंदर-ही-अंदर विजय दहल उठा ।

विकास वहशी भेडिया नजर आ रहा था । विजय के जिस्म में अंदर-ही-अंदर एक झूरझूरी-सी दौड गई, लेकिन प्रकट मे वह बोला-------" क्यों बे बालब्रहाचारी का होकर ये हरकत ।”

“मैं उस गोयरिग के बच्चे को जिंदा नहीं छोडूंगा अंकल" विकास किसी शेर की भाँति दहाड़ उठा…"मैं उस कुत्ते को फाडकर सुखा दूगा, उसने संध्या को मारा है।"

“लेकिन प्यारे दिलजले फिलहाल तो यहां से चलो...यहां खतरा है ।"

"अंकल . . ।" विकास किसी सर्पं की भांति फुंफ़कार उठा----"आप अंकल होने के साथ-साथ मेरे गुरु भी हैं, आपका चेला खतरों से नहीं डरता अंकल, सारे चीन में आग लगा दूगा । सबको जलाकर खाक कर दूगा ।"

" तुम भावुक हो रहे हो बेटे?" विजय बोला--------“जबकि सबसे पहली शिक्षा तुम्हें यही गई कि भावुकता को ताक पर रख दो ।"
 
"भाड में गए अपके सिद्धांत ।" विकास खूनी होकर गुर्रा उठा------" ऐसे गुरु को मुझे गुरु कहते हुए शर्म आती है जो नारी के इतने बड़े बलिदान को देखकर भी पत्थर बना रहे ।"

"तुम आवश्यकता से कुछ अधिक ही भावुक हो बेटे!" यू अंदर-ही-अंदर विजय की स्थिति भी विकास जैसे ही हो रही थी किंतु प्रकट में बोला-------"तुम ये भी भूल गए कि तुम्हारे सामने कौन खडा है?"

"मूला नहीं हूं अंकल!" यह गुर्राया---------------" जानता हूं कि सामने मेरे पूज्यनीय गुरु खड़े हैं, जिनका दिल पत्थर है, भाबुकता से जिनका नाता नहीं है । वे गुरु खडे है जिनका खून भावुकता के मामले में एकदम सफेद है [ आप भी सुन लीजिए अंकल, आपको याद नहीं रहा है कि अपके सामने आपका शिष्य खडा है है अगर संध्या अपनी जान न दे देती तो इस समय आपके सामने विकास की लाश होती ।"

“क्या मतलब?" इस बार वास्तव में विजय चौका ।

"जो गोली मेरी जान लेने जा रही थी, वह संध्या ने अपने सीने पर खाई है ।" बिकास गरज रहा था…"मैं उसक कुत्ते के चीथड़े कर दूगा ।"

यह जानकर तो विजय का दिल भी जैसे पिघल गया । ह्रदय भी भर आया । उसकी दिल ने भी चाहा कि गोयरिग को फाड़कर सूखा दे, लेकिन इस समय भावुकता प्रकट करना एकदम गलत था । विकास उस समय पुरी तरह भावुक था, विजय जानता था कि विकास एक जिद्दी प्रवृत्ति का लड़का है । अपनी जिद के सामने वह किसी की नहीं सुनता, विजय उसे समझाने वाले भाव में बोला----“लेकिन इस जिदगी में इस तरह की घटनाएं तो आए दिन की है, कब तक भावुक बने रहोंगे ?"

"जब तक संध्या जैसी बलिदानी इस धरती पर है !" विकास दृढ़ स्वर में बोला ।

"लेकिन अब गोयरिग को कहां खोजोगे?"

"मैं उसे पाताल में भी नहीं छोडूंगा ।"

“लेकिन इस समय तुम चीन में हो और ये बेकार की बाते... ।"

"बस ।" विकास बीच में ही चिंघाड़ उठा---------चुप हो जाइए अंकल, ऐसे शब्द मत कहिए कि शिष्य की नजरों में गुरु गिर जाए.. आपको ये सब बाते बेकार की लगती है ?"

"जुबान को लगाम दो, शैतान लड़के!" इस बार विजय भी खूंखार स्वर में गुर्रा उठा…"तुमसे ज्यादा मैंने दुनिया देखी है । हर काम भावुकता से नहीं चलता। भावुकता पर रखे गए फैसले हमेशा धोखा देते है ।"

गुरु की गुर्राहट सुनकर विकास कांप उठा ।

विकास ने आज पहली बार विजय को गुर्राते देखा, गुर्राहट सुनकर वह सहम गया था परंतु साहस करके वह बोला…“आपने इस दुनिया को पत्थर दिल ह्रदय से देखा है अंकल, आपको वह नज़र नहीं आएगा, जो मैं देख सकता हूं !"

"तुम्हारी जुबान बहुत लंबी हो गई है, लड़के!'' विजय बोला-“तुम्हें यह ध्यान नहीं रहता कि सामने कौन खडा है?"

“मैं आपकी बेहद इज्जत करता हू अंकल!" विकास का लहजा एकदम सर्द था--------------“आप मेरे गुरु है, आपके चरणों की सौगंध लेकर कहता हू गुरु कि मैं गोयरिग से संध्या की मौत का बदला अवश्य लूगा ।"

"तुम नहीं जानते कि तुम्हारी यह जिद्द तुम्हें कितने खतरे में डाल सकती है ।"

"बिजय अंकल! आप. . .मेरे गुरु मुझे खतरों से डरा रहे है ।"

"व्यर्थ के खतरों से खेलना कहां की बुद्धिमानी है?”

"अंक्ल...!" एक बार फिर विकास भयानक ढंग से चीख पडा…“व्यर्थ का खतरा होगा, आपके लिए...म...मैं...मैंने ।"

अभी विकास कुछ कहने ही जा रहा था कि तभी जोबांचू ने कमरे में प्रवेश किया ।

प्रविष्ट होते ही वह बोला-----"कुछ सैनिक मारे गए और कुछ पकड़े गए. . उनमे गोयरिग भी है ।"

तभी जोबांचू के कुछ आदमी गोयरिग को लेकर अंदर प्रविष्ट हुए, गोयरिंग इस समय रायफ्लॉ के साए में था ।

गोयरिंग.......!

विकास के समूचे जिस्म में एक अनोखा तनाव आ गया । समस्त नसें बुरी तरह तन गई ।

जिस्म क्रोध से कांप उठा ।

सारा चेहरा दहकती हुई भट्ठी में बदल गया ।

लडके का यह रूप देखकर सभी कांप गए ।

और गोयरिंग... ।

उसकी हालत.. . ।

जैसे कसाई के सामने बकरा, हजारों का हत्यारा कांप उठा ।

विकास का भय तो पहले से ही उसके दिमाग पर था जिसको वह ऊपरी शक्ति से दबा रहा था, परंतु उस समय तो पंद्रह वर्षीय उस शैतानी रूप के सामने उसकी रूह तक फ़ना हो गई ।

विजय भी कुछ नहीं बोला, वह जानता था कि इस समय विकास अर्ध-पागल की स्थिति में है ।

इस समय वह उसका भी ख्याल नहीं करेगा । इधर विकास खूंखार स्वर में चीखा--------------"गोयरिंग......... अमेरिकन कुत्ते! तेरी मौत बड्री भयानक होगी ।" कहने के साथ ही वह गोयरिग पर झपट पड़ा । एक फ्लाइंग किक में गोयरिग पथरीली धरती पर गिरा ।

तभी जोबांचू के एक साथी ने लपककर विकास को पकड़ना चाहा किन्तु विकास ने एक झटके में उसे दूर फेक दिया---- "जोबांचू!" कहने के तुरंत बाद वह फिर गोयरिग पर झपट पड़ा ।

फिर जो गोयरिग के चेहरे पर घूंसों की वर्षा हुई कि… ।

विजय चुपचाप खडा देखता रहा।
 
अचानक गोयरिग ने भी विकास को टांगों पर रखकर दूर उछाल दिया । इधर गोयरिग उछलकर खड़ा हुआ । उधर विकास न केवल खडा हो गया बल्कि उसकी उंगलियों के मध्य एक आलपिन नृत्य कर उठा ।

अभी गोयरिग कुछ संभल भी नहीं पाया था कि भयानक वेग के साथ सनसनाता हुआ आलपिन उसकी आंख में आ धंसा ।

आंख फूट गई ।

गोयरिग बुरी तरह चीखा ।

गर्म खून की धारा वह निकली ।

तभी विकास ने एक फ्लाइंग किक मारकर उसे फर्श पर गिरने के लिए विवश कर दिया । जोबांचू के कुछ साथियों ने तो घृणा से आंखें बंद कर ली । तभी एक अन्य जालपिन सनसनाया और गोयरिग की दुसरी आँख भी फूट गई ।

गोयरिग अंधा हो गया ।

वह बुरी तरह चीखने लगा ।

लेकिन विकास पागलों की भांति उस पर पिल गया । लात-धुसे ठोकरों से वह उहे बुरी तरह मारने लगा ।

गोर्यारेग असहाय ढंग से चीख रहा था ।

विजय और जोबांचू सहित सभी, मूर्तियों की भाति यह सब देख रहे थे । एकाएक बिकास के हाथों में ब्लेड नजर आया ।

अब उसकी आंखों का वहशीपन बढ़ गया था । ब्लैड देखकर सभी के जिस्मों में कंपकंपी दोड़ गई ।

जोबांचू विकास को रोकने के लिए आगे बढा, तभी विजय ने उसकी कलाई पकड़कर वापस खींच लिया और धीमे से बोला…“सब बेकार है, ऐसे मैंके पर वह किसी की नहीं सुनता ।"

जोबांचू का कंठ सूख गया ।

अंधा गोयरिग बुरी तरह तड़प रहा था ।

तड़पते हुए गोयरिग के जिस्म में एक स्थान पर ब्लैड धंसाकर बिकास एक रेखा-सी खींचता चला गया ।

गोयरिग पीड़ा से बिलबिला उठा, जोबांचू जैसे व्यक्ति ने घृणा से मुंह फेर लिया ।

विजय को ऐसा लगा जैसे विकास को धरती पर उतारकर विधाता ने बड़ा बुरा किया है ।

विकास गोयरिंग के तड़पने की चिंता न करता हुआ बार-बार ब्लैड से उसके जिस्म पर बड्री-बड्री रेखाएं खींचता जा रहा था ।

अंत में.. . . . ।

बुरी तरह लहुलुहान होकर गोयरिग धरती पर गिर गया ।

बह बुरी तरह तड़प रहा था ।

चीख रहा था, चिल्ला रहा था, किंतु अब उसमें उठने की शक्ति शेष नहीं रह गई थी ।

ब्लैड एक तरफ़ फेंककर विकास उसकी तरफ़ लपका और उसकी एक टांग दोनो हाथों में लेकर उठाई, दूसरी टांग पर अपनी दाई टांग रख दी और... ।

उफ्.. .इस बार विजय जैसे व्यक्ति ने भी घृणा से मुंह फेर दिया ।

टांग-पर-टांग रखकर विकास ने गोयरिग के जिस्म को बीच में से चीर दिया ।

मानो कोई कपड़ा फटता चला गया । दिल को चीरकर निकल जाने वाली चीख के साथ गोयरिग मर गया ।

गोयरिग की लाश के लबांई में दो टुकड़े पडे थे ।

गोश्त, और हड्डियां फैली हुई थी ।

विजय ने तो उसे उबकाई---सी जाने को हो गई ।

हजारों व्यक्तियों के हत्यारे गोयरिग का अंत कितना खौफनाक था । उसके चेहरे पर छाए वहशीपन के भाव धीरे--धीरे समाप्त होते जा रहे थे ।

भट्ठी की तरह धधकता हुआ चेहरा शांत पडता जा रहा था ।

उस समय वह चौका जव उसने विकास को, गोयरिग की लाश को 'वी' की शक्ल में रखते देखा ।

वह देख रहा था-विक्रास मासूम लड़के में बदलता जा रहा था ।

"हैलो फूचिंग बेटे, मैं अलफांसे बोल रहा है ।" अलफांसे ने माउथपीस में कहा ।

"तुम. .. ।" दूसरी तरफ से बोलने वाला फूचिंग जैसे अलफांसे का नाम सुनते ही आगबबूला हो गया…“तुम. . .तुम कहाँ हो, मैं तुम्हे जिंदा नहीं छोडूंगा ।”

"मैं तुमसे एक सौदा करना चाहता हू।”

"सोदा. . कैसा सौदा?”

“अंडों का सौदा!”

“अंडे... ।” फूचिंग के मुख से एकदम निकला ।

" यस फूचिंग बेटे, अंडों का सौदा. . . . तुम्हें मालूम होना चाहिए इस समय पांचों अंडे पर मेरे कब्जे में है और मैं तुमसे उनका सौदा करना चाहता हू।”

"फिर कोई चाल. . . . !"

“कोई जाल नहीं फूचिंग बेटे, अब मुझे किसी प्रकार की चाल चलने की आवश्यकता नहीं है । तुम भी जानते हो कि मैं अगर किसी का भी साथ देता हूं तो उसके पीछे मेरा तो कोई-न-क्रोई स्वार्थ होता है । विजय का साथ देने में मेरा यही स्वार्थ था कि अंडे मेरे हाथ लग जाएं और उनके साथ आया और तुम्हारे विरुद्ध कार्य किया, लेकिन अव, जबकि मेरे हाथ में ये अंडे आ चुके हैं तो मैं तुम दोनो के बीच तटस्थ हूं।"

"मतलब? "

“मतलब विल्कुल साफ है । अंडों की जो भी अधिक कीमत देगा अंडे उसी को दे दिए जाएंगे ।"

फूचिंग चकरा गया ।

एक तरफ उसे लग रहा था कि अलफांसे जो कह रहा है वास्तव में सही है और दूसरी तरफ उसे यह संदेह था कि कहीं ये लोग फिर कोई चाल न चल रहे हों । लेकिन विवशता थी, बोला…“क्या कीमत चाहते हो?"

“पचास हजार!"

"पचास हजार?"

"विजय इन अंडो के बदले में मुझे इससे भी अधिक धन दे सकता है ।" एक पल के लिए फूचिंग सोच में पड़ गया ।

फिर बोला----" सौदा कहाँ होगा?"

"बैनसीन की घाटी पर !"

“ओ.कै!"

"लेकिन ध्यान रखना !" अलफांसे चेतावनी-के लहजे में बोला-"अलफांसे से चाल चलने का मतलब बड़ा भयानक होता है । पैसे लेकर तुम अकेले ही आओगे, रात के ठीक तीन बजे, इस समय डेढ़ बजा है । यानी डेढ़ घंटे पश्चात् ।"

इधर मे सौदा हुआ और उधर ।

अचानक विकास के सिर पर एक चपत पडा । उसकी आंखों के सामने रंग-बिरंगे तारे नाच उठे ।

उसने चौंककर देखा तो अपने सामने गन्ने को लहराते देखा । यानी सामने दुम्बकटू खड़ा था ।

विजय एकदम बोला…“बेटा टुम्बकटू यहाँ क्या मटर भूना रहे हो?"

"मैं आपको यह बताने आया हुकि आप यहां आराम फरमा रहे है जबकि बो अंतर्राष्टीय अपराधी पांच अंडों का सौदा फूचिंग से पचास हजार में कर चुका है !"

"क्या मतलब. ..?" विकास चौका…“क्राइमर अंकल . . . ।"

"यस प्यारे दिलजले, बो साला अपनी असलियत पर उतर आया है । अंडे हाथ में आते ही गिरगिट की तरह रंग बदल गया और उसके साथ अपना ये जोबांचू भी मिल गया था ।"

एक पल के लिए विजय सोचता रहा।

सहसा दुम्बकटू बोला-----" रात के ठीक तीन बजे बैनसीन की धरती पर यह सौदा होगा ।" कहने के साथ ही वह कमरे के दरवाजे पर नजर आया ।

तभी विजय चीखा'-'"लेक्लि टुम्बकटू तुम्हें यह खबर यहाँ पहुचाने से क्या लाभ?"

"मैं जानता हूं कि अब आप लोग वहां पहुंचेंगे और मजा रहेगा !”

कहने के साथ ही टुम्बकटू वहां से गायब हो गया ।

विजय, जोबांचू और विकास अवाक से खडे रह गए ।

किसी की भी समझ में टुम्बकटू का चरित्र नहीं आ रहा था ।
 
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