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विकास दी ग्रेट complete

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फूचिंग बिजली की गति से घूमा । देखा तो अवाक् रह गया…अलफांसे अब भी भयानक ढंग से हंस रहा था । उसका समूचा चेहरा लाल हो गया था । संध्या अवाक्-सी उन दोनों को देख रहीं थी । न जाने क्यों अलफांसे के इस सर्द अट्टहास पर फूचिंग कांप उठा ।

हालांकि इस समय स्वयं उसका चेहरा भी किसी भट्ठी की भांति तप रहा था ।

उसके हाथ में रिवॉल्वर था ।

एक पल के लिए फूचिंग जैसे व्यक्ति का हाथ भी कांप उठा परंतु अगले ही पल जैसे वह पागल हो गया ।

उसने तेजी से तीन फायर अलफांसे पर किए ।

लेकिन संगआर्ट का माहिर अलफांसे अब भी उसके सामने खड़ा किसी जिन की भाति कहकहे लगा रहा था ।

फूचिंग अवाक-सा उसे देख रहा था ।

संध्या भी हैरान थी ।

कुछ पलों तक यही स्थिति रही ।

फिर अलफांसे गुर्राया----"अपने जाल में खुद ही फंस गए, फूचिंग बेटे!" यह वाक्य अलफासे ने वहीँ आवाज़ बनाकर कहा था जो वह अज्ञात मददगार के रूप में फूचिंग को फोन करते समय करता था ।

“तुम.. .!" फूचिंग चौंककर दो कदम पीछे हट गया ।

"यस, फूचिंग बेटे, ये मैं हूं ।” अलफांसे गुर्राया ।

"तुम. .?" फूचिंग की समझ में नहीं आ रहा था कि वह साजिश क्या है? उसे कैसे फंसा लिया गया?

वह चकराकर रह गया ।

"मेरा तो बहुत बडा मतलब है, बेटे!" अलफांसे गुर्राया------"जिस विकास के खून के तुम इतने प्यासे हो कि सामने देखकर अपने आपको संभाल नहीं सके और तुरंत गोली से उड़ा दिया, मैं उसी विकास का गुरु हू बेटे, वही विकास मुझे जान से प्यारा है, तब भी पूछते हो कि मेरा क्या मतलब है?”

चाहते हुए भी फूचिंग कुछ नहीं बोल सका । उसकी जुबान जैसे अकड़कर रह गई ।

लेकिन अलफांसे अब भी गुर्रा रहा था-----------"विकास वह रसगुल्ला नहीं चीनी कुत्ते, जिसे तुम यूं ही हजम कर जाओं ।" अलफांसे का स्वर भयानक होता जा रहा था--------------“बिकास यह शेतान है जो तुम जैसे सैकडों जासूसों को पेड़ पर लटका देता है । उस लड़के को हमने ऐसे सोना नहीं सिखाया कि मौत उसके करीब आ जाए और वह सोता ही रहे ।" अलफांसे का लहजा भयानकता की चरम भीमा तक पहुच गया था-----“वैसे तो वह इतना प्रभावशाली है कि तुम जैसे कुते उससे कांपते है लेकिन अगर उस पर कोई हावी भी हुआ तो अलफांसे उसे फाड़कर रख देगा। उसकी बैक में हमेशा अलफांसे रहता है, फूचिंग बेटे! भूलकर भी उस लड़के से ना टकराना वरना या तो वह ही तुम्हें नहीं छोड़ेगा और अगर तुम उसे किसी प्रकार की हानि पहुंचने में सफल हो भी गए तो समझ लेना कि मैं दुनिया के तख्ते से चीनी जाति को समाप्त कर दूंगा ।" अलफांसे किसी सिंह की भांति गरज रहा था ।

अंतर्राष्टीय शातिर का यह अनोखा और भयानक रूप देखकर फूचिंग कांप उठा ।

अलफांसे फिर बोला----" तुम अपने आपको बहुत जालसाज समझते थे, फूचिंग बेटे! लेकिन खुद ही अपनी चालों में फंस गए ।" बोलते हुए अलफांसे का क्रोध जैसे कुछ कम होता जा रहा था---------"तुम्हें अज्ञात बदमाश के रूप में फोन मैंने ही किया था । वास्तविकता यह थी कि यह योजना विजय ने बनाई थी महज इसलिए कि आप विकास का कार्य कुछ हल्का कर सके । जब तक उस पर अलफांसे और विजय जैसे गुरुओं का हाथ है तब तक तुम जैसा कोई भी कुत्ता उसकी तरफ आँख भरके नहीँ देख सकता, विजय ने उसे बचाने के लिए अपने आपको फंसा लिया । अगर वक्तं पडा तो विकास को बचाने के लिए मैं अपना सिर कटा सकता हू ।"

“लेकिन इस सबसे लाभ?” फूचिंग स्वयं पर संयम पा चुका था ।

"लाभ भी पता लग जाएगा बेटे, पहले त्याग देखो ।” वह बोला------“बिजय ने खुद ही स्कीम बनाई थी कि वह सनकी बूढे के मेकअप में डीलारा के मेज नंबर तेरह पर बैठेगा और मैं तुम्हे विजय का एक अज्ञात दुश्मन बनकर यह जानकारी दे दूं। जैसा कि स्वाभाविक था तुमने तुरंत जाकर विजय को पकड़ लिया । योजनानुसार मैंने तुम्हें फिर इस प्रकार फोन किया तथा सही पता बताया और यह भी बता दिया कि तुम्हें यहां अकेले जाना चाहिए । हम जानते थे कि तुममें इतनी बुद्धि है कि तुम विजय के मेकअप में यहां पहुचोगे । वैसा ही हुआ । जिस विकास को देखकर तुम इतने भडक गए कि स्वयं को संभाल नहीं पाए, यह विकास नहीं बल्कि तुम्हारा ही तैयार किया गया एजेंट डबलक्रास है ।”

अवाक् फूचिंग अलफांसे को देखता रह गया ।

उसे अपनी बुद्धि पर क्रोध आ रहा था । किस सरलता से वह इन खतरनाक लोगों के जाल में फंस गया था ।

मन-ही-मन वह उनकी इस योजना की प्रशंसा कर उठा । वह किस प्रकार खुशी-खुशी ही उन लोगों के बीच फंस गया था ।

“लेकिन विजय इस समय चीन की कैद में है ।" फूचिंग के लहजे में धमकी का पुट था ।

"इसकी तुम चिंता मत करो, फूचिंग बेटे!'" अलफांसे बोला…“अभी तो कैद ही में जाना पड़ा है, विजय के जिस्म का एकाएक कतरा बिकास का है । विकास के लिए विजय अपनी जान भी दे सकता है, लेकिन वह इतना बेवकूफ भी नहीं है कि बैसे ही तुम्हारी कैद में जा फंसे । निश्चय ही उसने कोई प्रबंध किया होगा और अगर वास्तव में यह फंस गया होगा तो अभी तुम भी हमारी कैद में हो । अगर विजय के लिए चीन सरकार तुम्हारी भी बली देने लगे तो अभी अलफांसे मरा नहीं है । विजय को आजाद कराने के लिए मैं खून की नदियां बहा दूंगा ।"

"लेकिन इस प्रकार आप लोग विकास की क्या सहायता कर सकेंगे?" फूचिंग बोला------------एक मेरे न होने से क्या होना वहां पर अन्य सेनिक-पहरे तो मजबूत होंगे !"

"तुम तो वहां वहुत कुछ कर सकते हो ।"

कै' समझा नहीं ।"

"अब समझ जाओगे ।" कहते हुए अलफांसे ने अपनी जेब से फूचिंग के चेहरे का आटोमेटिक फेशमास्क निकलकर दिखाया तो फूचिंग की खोपडी घूम गई कि अब अलफांसे से फूचिंग बनकर बहा जा मिलेगा सारा मामला गडबड कर देगा। फूचिंग को कुछ नहीं सुझा तो... ।

एकाएक उसके जिस्म में बिजली दौड़ गई ।

भयानक ढंग से उसने अलफांसे पर जम्प लगाई किंतु अलफांसे धीमे से अपने

स्थान से हट गया, लेकिन उसी पल फूचिंग ने भी सिद्द कर दिया कि उसे भी चिनी विजय की उपाधि यूँ ही नहीं मिली है । इधर अलफांसे धीरे से हटा , उधर गिरता-गिरता भी फूर्चिग एक घूसा अलफांसे के ज़बड़े पर जमा गया।

अलफांसे का जबड़ा कांप उठा ।
 
उसे फूचिंग की शक्ति का सही अनुमान हुआ । उसे लगा कि वास्तव मे फूचिंग एक प्रतिभाशाली जासूस है लेकिन इस समय उसने भिड़ना सही नहीं समझा इस कार्य को पेंडिंग में डालकर उसने रिवॉल्वर फूचिंग की पसलियो से सटाया और सर्प की भाति फुंफ़कारा---------"अगर हरकत की तो पसलियां तोड दूगा।"

फूर्चिग एकदम निश्चल हो गया ।

"इस वक्त समय नहीं, फूचिंग वेटे!” अलफांसे बोता…“वरना तुम्हारी दिमागी शक्ति तो देख ही ली , अब तुम्हारी शारीरिक शक्ति देखते और साथ ही तुम्हें दिखाते कि शक्ति क्या होती है, लेकिन कोई बात नहीं, पहले आज की अपने चेले की करतूत देख ले, फिर तुमसे यह मुकाबला भी होगा ।"

उसके पश्चात् !

फूचिंग को अलफांसे ने अपने ढंग से एक कमरे में कैद कर दिया और उसकी सुरक्षा के लिए संध्या को तैनात करके तेजी से वह अपनी तैयारी करने लगा ।

उसने फूचिंग के चेहरे की झिल्ली उतारकर न जाने क्या सोचते हुए अपनी जेब में रख ली थी ।

स्थान का नाम स्वयं फूचिंग वार्तालाप के मध्य ले ही चुका था । अलफांसे पूर्णतया तैयार होकर मकान से बाहर निकल गया ।

गगन का चुंबन लेने का प्रयास करती हुई इमारत एक विशाल मैदान के ठीक बीचोंबीच स्थित थी ।

उसके चारों तरफ़ एक-एक फर्लाग मैदान पड़ा हुआ था।

इमारत गुंबद की भात्ति एकदम गोल थी । किसी मीनार की भाति वह गोलाकार ढंग से गगन की तरफ़ उठती चली गई थी ।

इमारत की ऊंचाई तीस मीटर से कम नहीं धी । नीचे उसकी चौडाई अधिक थी और जैसे-जैसे वह गगन की तरफ़ उठती जा ऱही थी, उसकी चौडाई कम होती चली गई थी ।

सबसे ऊपर का जो सिरा था वह किसी मंदिर की भाति नुकीला हो गया था । इमारत के शीर्ष तक पहुचने के लिए उसके अंदर गोलाकर स्थिति में सीढियां बनी हुई थी ।

अलफांसे फूचिंग बनकर यहाँ आ चुका था । वह चांगली से भी मिला था और चांगली को उसने यह कहकर टाल दिया था कि उसके वहां पहुचने से पूर्व ही विजयं के साथी वह स्थान छोड़ गए थे ।

चांगली के कथनानुसार विजय अभी तक चीनियों की कैद में था । अलफांसे पूरी तरह फूचिंग का अभिनय कर रहा था । उसका अभिनय ऐसा था कि अभी तक उसे किसी ने नहीं भांपा था !

इस समय रात के साढे दस बजे थे । अलफांसे स्वयं सैनिकों को जगा रहा था । अब तक वह काफी जानकारियां हासिल कर चुका था और उसने जो भी जाना था, वह मन-ही-मन चीनियों के प्रबंध के प्रशंसा भी कर चुका था ।

वह मन-ही-मन सोच रहा था कि उसका शैतान चेला अपने इस चेलेंज को पूरा भी कर पाएगा अथवा नहीं और अगर करेगा भी तो कैसे? वह जानता था कि बनर्जी को इस इमारत के शीर्ष वाले कमरे में रखा गया है । सबसे ऊपर का वह कमरा बहुत ही छोटा था । गुंबदनूमा समूची इमारत चीनी सैनिकों से भरी पडी थी ।

प्रोफेसर के कमरे तक पहुंचने लिए एक हजार सीढियां थी और प्रत्येक सीढी पर एक चीनी सैनिक खड़ा था जिसके हाथो में दबी टाँमीगन आग उगलने के लिए तत्पर थी ।

अलफांसे यह भी जानता था कि इस इमारत के भीतरी वातावरण में करेटयुवत विद्युत तरंगे दौड़ रही है ।

अगर कोई साधारण कपड़े पहनकर उस इमारत में प्रविष्ट हो जाए तो अदृश्य विद्युत करेटयुक्त तरंगे उसे अपने मे जकड ले और वे खून की प्यासी तरंगे इंसानी रक्त पीकर जिस्म के टूकड़े-टुकड़े कर देती है ।

जो सेनिक उसके अंदर है उनके जिस्म पर उन तरंगों के निरोधक थे । इस इमारत के चारों तरफ फैल हुआ गोल मैदान था । मैदान के चारों तरफ आठ सर्चलाइट स्टेशन इस प्रकार स्थित थे कि उनके प्रकाश से मैदान का कोना-कोना जगमगा रहा था । इस मैदान में भी कम-से-कम पचास सेनिक तो होगे ही । मैदान के चारों तरफ कटीले और करेंटयुक्त तारों की ऊंची दीवार थी ।

तीस मीटर ऊंची इमारत के ठीक शीर्ष पर जिस कमरे में बनर्जी को रखा गया था उस कमरे की नोकीली छत पर एक तोपची बैठा था ।

संभवतः इस बात का भी ख्याल रखा गया था कि कहीं विकास हवाई रास्ते से न आकर उत्पात मचा दे ।

जिस कमरे में बनर्जी थे उसके द्वार पर एक ऐसा आटोमेटिक सिस्टम था कि किसी के कमरे में प्रविष्ट होते ही समूचे इलाके में स्वयं ही खतरे का सायरन बज उठता था ।

उस कमरे की छत से बनर्जी को बांधा गया था और नीचे तीन खूंखार किस्म के वुलडॉग घूम रहे थे ।

उनके अतिरिक्त कमरे में अन्य कोई इंसान नहीं था । यह तो वह प्रबंध था जो अलफांसे की जानकारी में था, इसके अतिरिक्त भी बहुत कुछ हो सकता था ।

अलफांसे यह भी जानता था कि इस मैदान के बाहर मीलों तक सैनिक छावनी फैली हुई है ।

सभी एकदम सतर्क थे ।

अलफांसे फूचिंग के रूप में व्यस्त नजर आ रहा था ।
 
उधर. . . ।

चांगली. . . !

चांगली को फूचिंग के रूप में अलफांसे ने कहा था कि वह पूरी सैनिक छावनी संभाले । मैदान से बाहर सैनिक छावनी भी आज पूरी तरह सजग थी ।

चांगली अपने विशेष कमरे में बैठा था । उस कमरे के चारों और सैनिक फैले हुए थे ।

फूचिंग और अन्य सैनिकों ने भली-भाति विजय की तलाशी ले ली थी किन्तु इसका क्या किया जाए कि विजय इस प्रकार तैयारियां करके आया था कि चीनियों के बाप भी उसे नहीं पकड़ सके थे ।

उसे एक अंधेरी-सी दुर्गध और सीलन युक्त कोठरी में बंद कर दिया गया था ।

इस कोठरी का मात्र एक ही दरवाजा था अभी एक बार भी नहीं खुला था ।

वह जानता था कि इस जगह एक पहाडी कोठरी के बाहर गैलरी है और गेलरी में सेनिक है ।

उसके कपड़े और जूते इसके जिस्म पर से ले लिए गए थे और पहनने के लिए उसे दूसरे कपड़े दिए गए थे ।

यूं अधिकांश सैनिक आज प्रोफेसर बनर्जी की सुरक्षा कर रहे थे लेकिन विजय की सुरक्षा हेतु भी कम पहरा नहीं था परंतु विजय को जैसे इन सब वातो से कोई मतलव नहीं था ।

यह आराम से अंधेरे में पड़ा झकझकी गुनगुना रहा था ।

तब जबकि उसने रेडियम डायल हैंडवाच पर नजर मारी तो उसे साढे नौ बजाते हुए पाया ।

विजय के जिस्म में जैसे एकदम बिजली दौड गई ।

वह तेजी से उछलकर खडा हो गया और अपनी कलाई की कोहनी वाले स्थान पर उपडी हुई खाल को नाखूनों से पकडकर एक झटका दिया तो आश्चर्यजनक रूप से उसकी कलाई की खाल उतरती चली गई । वास्तव में यह खाल एकदम नकली थी ।

खाल का रंग विजय की त्वचा के रंग से एकदम समान था । तनिक भी अभास नहीं होता था कि उसने अपनी कलाई पर नकली खाल चढ़ा रखी थी । खाल के नीचे वाले भाग में विजय ने बड़े ध्यान से हाथ फिराया ।

उसके हाथ में एक नन्हा-सा कैपसूल आ गया ।

कुछ देर तक कैप्सूल को वह अपनी चुटकी में गोल करने का प्रयत्न करने लगा और फिर उसने कैप्सूल कोठरी के दरवाजे पर रख दिया और उसके करीब मुह ले जाकर मुंह की भाप निरंतर तेजी के साथ तीन वार फेंकी और तेजी के साथ अंधेरे में पीछे हट गया । पीछे हटते-हटते उसने खाल से चिपका एक अन्य कैपसूल निकाल लिया था ।

धड़ामा अचानक एक विस्फोट हुआ ।

कोठरी का दरवाजा उड़ गया था ।

विजय तेजी से एक कोने में छुप गया । धुल, आग और धुंए से वातावरण भर गया । उसके पार क्या था, यह विजय नहीं देख सका !

तभी भागते कदमों की आहट ने विजय को बता दिया कि सैनिक भागकर उसी तरफ़ आ गए हैं । उसने एक और कैप्सूल में तीन बार मुह की भाप मारी और दरवाजे की तरफ उछाल दिया ।

फिर एक भयानक विस्फोट हुआ ।

मानवीय चीखो से वातावरण कांप उठा ।

कोठरी की थोड्री-सी दीवार भी उड़ गई ।

विजय के हाथ एक अन्य कैपसूल आ गया था । उसने तेजी से गर्द और धुंध में जम्प लगा दो ।

कुछ देर बाद बो गैलरी में मागा जा रहा था । सारे अड्डे में हंगामा-सा हो रहा था ।
 
यकायक उसे गेलरी के एक मोड़ पर से भागते कदमों की आहट सुनाई दी । उसने तुरंत कैपसूल पर तीन बार भाप मारी और मोड़ पर उछाल दिया ।

भयानक विस्फोट के साथ पुन: चीखे उभरी ।

विजय झपटा और एक सेनिक की टोंमीगन उठा ली । सब से पहला फायर उसने उस बल्ब पर किया जो गैलरी में प्रकाश कर रहा था ।

बल्ब फूट गया । अंधकार छा गया ।

टॉमीगन संभाले विजय भागता जा रहा था ।

दो फायरों की आवाज ने समूची छावनी में कोलाहल मचा दिया ।

एकदम जैसे वहां हंगामा हो गया ।

वे फायर चागंली के कमरे में हुए थे । कुछ सेनिक जानते थे कि कमरे के अंदर केवल दो ही अधिकारी थे…चागंली और फूचिंग ।

पलक झपकते ही समूची छावनी के सैनिकों ने उस कमरे को घेर लिया । कमरा अंदर से बंद था ।

सैनिकों ने पहले तो दरवाजा थपथपाया लेकिन जब नहीं खुला तो रायफ्लो के कुंदों से उसे तोड़ने लगे ।

सैनिक वहुत अधिक उत्सुक और थे । कदाचित् वे जानना चाहते थे कि अंदर से बम फटने की आवाजें आने का क्या तात्पर्य है?

दरवाजा चरमराने लगा ।

अभी टूटने ही वाला था कि एक झटके के साथ दरवाजा खुला ।

सामने फूचिंग खड़ा था ।

लहूलुहान फूचिंग. . . ।

वर्दी कई स्थान से फट गई थी । वाल अस्त व्यस्त । ऐसी हालत थी मानो किसी से उसका जबरदस्त र्द्धद्धयुद्ध हुआ हो । उसके हाथ में रिवॉल्वर था और वह बडा भयानक नजर आ रहा था ।

"क्या हुआ सर? "

सहसा एक सेनिक अधिकारी ने हड़बडाई सी स्थिति में पुछा ।

"सब लोग सतर्क रहे । हिन्दुस्तानी कुत्ते यहां पहुंच चुके है !" फूचिंग ऊंची आबाज मे गर्जा !

फूचिंग के इस वाक्य पर चांगली बना विकास बुरी तरह चिहुंक उठा।

उसकी समझ में नहीं आया कि फूचिंग उसे इतनी मुख्य जगह क्यों लगा रहा है?

वह अलफांसे को पहचान न सका था । एक पल के लिए वह अतफासे को देखता रह गया उसी पल विकास और भी बुरी तरह चौक पड़ा ।

वास्तव में चौंकने की बात भी थी ।

सबकी नजरों से छुपकर सामने खडे फूचिंग ने उसे आख मारदी थी।

लड़के की खोपडी जैसे हवा में चकराने लगी ।

तभी फूचिंग ने एक विशेष अंदाज मे अपने बाल खुजाए, उस पल तो विकास की आंखों में हैरत मिश्रित प्रसन्नता उभर आई ।

वह पहचान गया कि सामने खडा हुआ फूचिंग फूचिंग नहीं बल्कि उसका गुरू अलफांसे है ।

सिर खुजाने का यह विशेष संकेत उसके गुरू का ही था । मन मे आया कि झपटकर वह अपने गुरू के चरण-स्पर्श करे लेकिन परिस्थिति ऐसी है कि उसे अपनी यह प्रबल इच्छा दबानी पडी मगर मन…ही-मन प्रसन्नता से झूमता हुआ बोला-------" ओह कॉमरेड, जैसी आपकी आज्ञा?"

"हर कार्य सतर्क रहकर करना !" अलफांसे ने समझाया।

"आप चिंता न करें, कॉंमरेड !" विकास ने चांगली के स्वर में कहा ।

तभी अलफांसे बोला…“ड्रेस कक्ष में पहुंचकर विशेष लिबास पहन तो ताकि इमारत के अंदर फैली वायु में विघुत तरंगों का तुम पर कोई तनाव न रहे जो इमारत के सबसे उपर वाले कमरे में बनती है, ध्यान रखना वहां तीन बुलडाग भी हैं, कमरे में मत घुसना, कहीं वह तुम्हें ही फाड़ दे ।”

“ओ.के. सर !" कहकर चांगली के मेकअप में छुपा विकास फूचिंग के रूप में छुपे अलफांसे का संकेत पाते ही उस कमरे की तरफ़ बढ गया जिसकी तरफ़ उसने ड्रेस कक्ष कहते हुए संकेत किया था ।
 
विकास उस तरफ़ बढ़ गया र्कितु इस समय उसका दिमाग भी बूरी तरह उलझा हुआ था ।

वह तो जोबांचू के साथ एक साधारण से चीनी-सैनिक के भेष में आया था । चांगली के कमरे में जिस समय फायर हुए थे । जब कमरा खुला और फूचिंग ने बाहर निकलकर बताया कि चांगली के मेकअप में यहां विजय आया हुआ था जिसकी उसने हत्या कर दी है ।

यह सुनते ही विकास के जिस्म की समस्त नसों मे तनाव आ गया था । क्रोध से उसका शरीर कांपने लगा था । उसका दिल चाहा कि फूचिंग को फाड़कर सुखा दे लेकिन इस छावनी में यह संभव नहीं था । उसने विवेक से काम लिया । वह वास्तव में यह समझा था कि उसके विजय अंकल मारे गए है ।

यही सोचकर लड़के का दिल रो उठा था । मन-ही-मन उसने भयानक होकर उस समूचे पीकिंग को दुनिया के नक्शे पर से खत्म करने की कसम ली थी ।

उसने विवेक से सोचा कि जव विजय अंकल यहाँ चांगली के मेकअप में आए है तो निश्चित है कि चांगली कहीं-न-कहीं कैद में होगा । बस, इसी बात का लाभ उठाते हुए उसने चांगली बनने की स्कीम जोबांचू को बताई ।

जिसे सुनकर वह विकास को खुदा मानने लगा था ।

वे दोनों छावनी से बाहर निकले । एक झोपडी को अपना स्थल बनाकर बिकास ने चांगली का सफल मेकअप किया और इस प्रकार का अभिनय करता हुआ छावनी में प्रविष्ट हुआ मानो बह विजय की कैद से फरार होकर भाग आया है । जोबांचू पहला सेनिक बना था जिसने चांगली को सबसे पहले देखा था । उस समय विकास के दिल में फूचिंग के लिए गहन घृणा थी ।

उसके लिए उसने एक दिल को हिला देने वाली मौत सोच ली थी लेकिन..अब यह जानकर तो वह बुरी तरह चौंका था कि फूचिंग के रूप में यहाँ उसके गुरू अलफांसे हैं ।

अब उसका दिमाग इस गुत्थी में उलझा हुआ था कि अगर फूचिंग के रूप में अलफांसे है तो उन्होंने चांगली के मेकअप में छुपे विजय की हत्या क्यों की?

यह बात किसी प्रकार ठीक नहीं हो सकती थी । इतना तो विकास समझ गया कि मरने वाला चाहे कोई भी हो लेकिन उसके विजय अंकल तो किसी भी कीमत पर नहीं है ।

यह भी समझ गया कि उसके गुरु लोग कोई चाल चल रहे है । निश्चित रूप से विजय अक्ल भी यहीं कहीं होंगे । लेकिन लड़का यह नहीं समझ सका कि चाल क्या है?

गुरु लोग क्या चक्कर चला रहे हैं किंतु इस समय यह सब सोचने का वक्त नहीं था । उसके गुरु ने बड़ी सफाई से उसको मंजिल की तरफ़ बढा दिया था ।

वह ड्रेस कक्ष में पहुंचा, विशेष ड्रेस पहनकर वह सीधा इमारत में प्रविष्ट हो गया था । वहां फैली तरंगों का प्रभाव उस पर होने का कोई प्रश्न ही नहीं था । बह तेजी से सीढियां तय करता हुआ ऊपर चढता जा रहा था । इमारत में जगह-जगह बल्ब रोशन थे, अतः पर्याप्त रोशनी थी ।

हर सीढी पर खड़ा सैनिक मुस्तेद था । किसी ने उसे रोकने की चेष्टा नहीं की क्योंकि इमारत के अंदर लगे लाउडस्पीकरों पर फूचिंग के आवाज में सैनिको के लिए यह सूचना गंज रही थी कि कामरेड चांगली की डूयूटी बनर्जी के कमरे के खास बाहर लगा दी गई ।

वे जा रहे हैं, अत: उनको रोका न जाए । इस सूचना के प्रसारण के पश्चात् भला किसमें साहस था जो उसे रोकने की चेष्टा करता । उसके पैर थम गए वे लेकिन विकास इन छोटी-छोटी बातों की चिंता कब करता था ।

वह चिमनी के आकार की उस इमारत के ऊपर चढता ही चला गया ।

वह गुप्त रखे हथियारों से पूर्णतया लैस था । दोनों तरफ़ डोलस्टर लटके हुए थे । चांगली का मेकअप करने के लिए उसे नीचे नकली पैरों की अनावश्यकता नहीं थी क्योंकि चांगली चीनी होने के कारण गुट्टा था और उसका कद विकास के बराबर ही था ।

वह जानता था कि वहाँ उपस्थित सैनिकों में जोबांचू के कुछ अपने आदमी भी है लेकिन विकास नहीं जानता था कि वे अभी कौन से है ।

अभी बनर्जी को लेकर भागने का जो प्लान उसके दिमाग में था वह वेहद साहसपूर्ण और खतरनाक था ।

उसके प्लान को सुनकर जोबांचू ने भविष्यवाणी कर दी थी कि अगर तुम ऐसा करोगे तो चीनी सैनिको की गोलियां तुम्हें भूनकर रख देगी ।

लेकिन विकास तो शुरू से ही खतरों का खिलाड़ी था ।

विकास ने एक बार दोनों तरफ निगाह दौडाई और अंधेरे कमरे मे जम्प लगा दी ।

विकास उछलकर खडा हो गया ।

तभी दो आंखे तेजी के साथ चमकी । अंधेरे में एक गुर्राहट गूंजी और तभी उस पर एक अन्य बुलडॉग झपट पड़ा ।

वह फिर गुथ गया ।

अभी वह स्वयं क्रो संभाल नहीं पाया था कि एक-एक करके दो अन्य बुलडॉग उसी पर झपट पड़े ।

लड़का फंस गया... ।

तीन बुलडॉग. . .एक लडका. . .अंधेरा घुप्प ।

विकास का बस नहीं चल रहा था ।

बुलडॉर्गों ने उसके सारे कपड़े फाड़ दिए । बूरी तरह घायल कर दिया । आदमी होते तो वह कुछ पार भी पा लेता लेकिन कुतों सामने उसकी एक नहीं चल सकी ।

सारी इमारत में हाहाकार मच रहा था ।

किंतु था बह भी पूरा शैतान ।

हार मानने वाला नहीं था वह ।
 
अवसर मिलते है उसने होलस्टर से रिवॉल्वर खींच ली और. . .ठीक तब जबकि अंधेरे में दो आंखे चमकी. . .धांय. . उसके रिवॉल्वर ने एक शोला उगला...चमकती हुई आंख फूट गई । एक भयानक, डरावनी और अंतिम डकार के साथ वुलडाँग उलट गया ।

तभी दूसरा और तीसरा बुलडाॅग उस पर झपटा, उनके बुड़का मारते ही वह स्वयं पीड़ा से बिलबिला उठा लेकिन तभी उसके रिवॉल्वर ने दो बार और खासा...परिणामस्वरूप दोनों बुलडॉग भयानक डकारों के साथ उलट गए।

विकास उछलकर खडा हो गया ।

सारा जिस्म घायल था । कुत्ते कई स्थानों का मांस नोचकर ले गए । सारे कपडे फट गए थे । स्थान-स्थान खून बह रहा था । हाथ में रिवॉल्वर था।

कोई साधारण-सा इंसान होता तो चीख-चीखकर वहीं लेट जाता ।

वह बिकास था. . .इस अल्पायु में ही दुनिया का सबसे बड़ा शैतान!

तभी कुछ सैनिको ने वहां प्रवेश किया । एक सेनिक गर्जा-----"कौन है. ..?"

"मैं हु, चांगली!" तेजी के साथ विकास बोला-------"टार्च रोशन करो !'

उसी पल टार्च जली ।

प्रकाश का दायरा ठीक बहाँ पड़ा जहाँ बनर्जी रस्सी के माध्यम से छत पर लटके थे ।

उसी पल--विकास की भयानक फुर्ती... ।

रिवॉल्वर से-निकले पहले शोले ने रस्सी तोड दी । बनर्जी झटके के साथ नीचे गिरते कि लड़के ने उन्हें रास्ते में ही लपककर कंधे पर ले लिया ।

इस समय मानो उसके रिवॉल्वर में विधुत भरी हुई थी, उसके रिवॉल्वर ने एक साथ दो बार आग उगली-----"गोली ने टार्च का शीशा तोड़ा और दूसरी ने सैनिक का सिर !

तभी अन्य सैनिकों की गोलियां उनकी तरफ लपकी लेकिन तव तक विकास अपना स्थान छोड़ चुका था । गोलियों के छूटते ही उसने अनुमान लगा लिया कि अन्य सैनिक कहां है । उसने तेजी के साथ दूसरे होलस्टर से रिवॉल्वर खीची और तीन फायरों के साथ तीन सैनिकों को लुढका दिया ।

बनर्जी बेहोश थे।

उनके जिस्म को कंधे पर लादे विकास ने दरवाजे की तरफ़ जम्प लगा दी ।

बाहर सैनिकों की टार्चों के दायरे इधर-उधर घूम रहे थे । जैसे ही एक दायरे ने उसकी तरफ आने का प्रयास किया उसके रिवॉल्वर से निकली गोली ने सेनिक का भेजा उड़ा दिया ।

बह चीखता हुआ गिरा । अनेक सैनिक-टार्चों के दायरे उसकी लाश पर स्थित हो गए ।

तब तक विकास एक सैनिक की टॉमीगन संभालकर एक थमले की बैक में हो चुका था ।

अगले ही क्षण उसकी र्टोंमीगन गर्ज उठी । चीखों के साथ सेनिक ढेर होने लगे । टार्च के प्रकाश के दायरे एकदम समाप्त हो गए । दूसरी तरफ से जितनी भी टांमीगने गर्जी, गोलियां उस थमले से टकराकर छितरा गईं जिसके पीछे विकास छुपा हुआ था ।

विकस जान गया कि जब उसका यहां से निकलना बेहद कठिन है । वह जमीन पर रेंगता हुआ तेजी के साथ पीछे हटने लगा ।

दूसरी तरफ के सैनिक भी शायद छुपकर धात लगाए बैठे थे । इमारत के बाहर से बराबर गर्जती हुई टांमीगनों और चीखों की आवाजें आ रही थीं । विकास उन सीढियों तक पहुच गया जिनके माध्यम से वह इमारत के विल्कुल ऊपर वहां पहुच सकता था जहाँ तोपची बैठा था ।

विकास बनर्जी को संभाले ऊपर चढने लगा ।

तभी एक टॉमीगन गरर्जी......पता नहीं कैसे किस सेनिक ने उसे देख लिया था । एक गर्म शोला उसकी टांग में आ धंसा उसके कंठ से चीख निकली-बस लड़खड़ा गया किंतु इस बीच उसकी टॉमीगन ने भी खासकर उस सैनिक को 'विदाई परमिट' थमा दिया था ।

उसी पल अनेक गोलियां उसकी तरफ़ लपकी भी थी लेकिन तब तक यह सीढियों के मोड़ पर घूमकर इमारत की छत पर पहुच गया था ।

छत बहुत छोटी और गोल थी ।

विकास ने आभास पाया कि नीचे से भागकर आने वाले सेनिक यहा पहुचने ही वाले है !

शेतान लड़के की टोंनीगन ठीक एक वार गरजी और तोपची टे. ..बोल गया ।

यह गोली उसकी टांमीगन की अंतिम गोली थी ।

क्योंकि उसके बाद उसने ट्रैगर दबाया किंतु गोली नहीं निकली ।

लड़का घबरा गया ।

क्योंकि गंभीर समय पर टांमीगन ने धोखा दिया था ।

भागते हुए सेनिक छत पर आए, वह भी भागकर छत के एक किनारे पर पहुँच गया ।

विकास फंस गया ।

तीस मीटर उपर, उसके पीछे टांमीगनों से आग हुए सेनिक. . . उसके कंधे पर बनर्जी, उसकी टांमीगन खाली... . . . ।

विकस की आँखें मुदी जा रही थीं ।

जिस्म के किसी भी भाग में जैसे जान न रह गई थी । बेहोशी उस पर अपना प्रभुत्व जमाना चाहती थी लेकिन फिर भी वह स्वयं को संभाले हुए था ।

इमारत से ही उसने कमर में लिपटा पैराशूट खेल दिया था । परिणामस्वरूप इस समय यह वायु में तैर रहा था ।

उसके कंधे पर पड़े बनर्जी अभी तक अचेत थे ।
 
एकाएक उसके कानों से एक हैलीकॉप्टर की गड़गड़ाहट टकराई, कुछ द्रेर तक वह केवल गड़गड़ाहट सुनता रहा और यह महसूस करता रहा कि हेलीकाप्टर ठीक उसके पैराशूट के ऊपर लहरा रहा था ।

उस समय वह चौंका जब हैलीकॉप्टर की सीढ़ी ठीक उसकी आंखों के सामने लहरा गई ।

हवा में तैरते हुए विकास ने झट सीढ़ी का एक डंडा पकड़ लिया, लेकिन पैराशूट उसे अपने साथ उठाए ले जाने का प्रयास कर रहा था ।

कारणवश उसे बहुत शक्ति लगानी पड़ रही थी ।

केवल दो मिनट के परिश्रम के पश्चात् उसने पैराशूट खोल दिया ।

पैराशूट उससे दूर हो गया ।

रेट.. .रेट. ..रेट... ।

तभी नीचे से किसी ने हैलीकॉप्टर पर गोलियों की वर्षा कर दी किंतु सीट पर विजय जैसा दक्ष व्यक्ति बैठा था ।

एक अजीब-सी झुकाई देकर हेलीकॉप्टर ऊपर उठता चला गया । साथ ही अधंकार का सीना चीरती हुई सीढी ऊपर चली गई ।

विकास ने मजबूती के साथ सीढ़ी के डंडे में अपनी टांग फंसा दी थी और प्रोफेसर बनर्जी को कसकर पकड लिया था । हेलीकॉप्टर क्षण-प्रतिक्षण उस स्थान से दूर गगन की तरफ उठता चला गया ।

सीढ़ी से लिपटा हुआ पंद्रह बर्ष का जवान.. . ।

तब जबकि वे उस स्थान से निकल आए ।

विजय ने हैलीकाप्टर की गति कम कर ली । अब स्थिति ये थी कि की सीढी अब विपरीत दिशा में उड़ती हुई-सी न रहकर सीधी लटक गई । इसी प्रकार गति कम करने का अर्थ विकास भली-भाति समझ गया ।

अभी उसके दिमाग में यह भी नहीं आया था कि उसका मददगार कौन है?

लेकिन फिर भी वह बडी सतर्कता के साथ एक डण्डा पकड़कर चढता जा रहा था । इस कार्य में उसे वेहद शक्ति लगानी पड रही थी । बनर्जी को लेकर चढना एकदम कठिन कार्य था ।

लड़के के जिस्म का कतरा-कतरा दुख रहा था किंतु फिर भी वह निरंतर प्रयास कर रहा था । इस बीच उसका मेकअप भी उतर चुका था परंतु इन बातों की विशेष चिंता न करके वह बढता जा रहा था ।

निरंतर पंद्रह मिनट के परिश्रम के पश्चात् वह सीढी के सबसे ऊपर वाले डंडे पर पहुचा, तभी किन्ही मजबूत हाथो ने बडी सरलता के पश्चात् उसे बनर्जी सहित ऊपर खीच लिया गया । प्रोफेसर बनर्जी को एक तरफ लिटा दिया गया ।

हैलीकाप्टर बिना चालक के खुली हवा में आगे बढ़ रहा था ।

उसे विजय ने पकडकर खीचा था ।

बंद होती आंखों को जबरदस्ती खोलने का प्रयास करते हुए विकास ने अपने मददगार को देखा-बे उसके गुरु थे-उसके प्यारे झकझक्रिए अंकल-विजय!

और विजय!

देखते ही वह भी शेतान लडके को पहचान गया । विकास की हालत देखते ही विजय का हृदय जेसे चीत्कार कर उठा ।

मिचमिचाती हुई आंखें, घायल जिस्म, लहूलुहान शरीर, फटे कपड़े, कई जगहों से गायब मांस, लहु-युक्त चेहरा और......... और उस पर यह दुस्साहस, पहले तो सोचकर विजय कांप गया ।

फिर उसकी बहादुरी पर आंखें भर आई । सीना न जाने क्यों गर्व से फूल गया । मासूम शेतान को वह देखता रह गया ।

"गुरु...!" एकदम दूटे-से स्वर में बोला और बडी श्रद्धा के साथ विजय के कदमों में झुक गया ।

विजय जैसे व्यक्ति का पत्थर-सा हृदय पिघल गया ।

दिल टूट गया ।

आंसुओं ने आंखों की सीमा तोड़ दी ।

झपटकर उसने कदमों में झुके विकास को झट अपनी बांहों में लेकर कलेजे से चिपका लिया और तड़पकर कह उठा-----“मेरे बेटे.....मेरे

बच्चे…मेरे लाला !" कहते हुए भावावेश में बहे विजय ने एक पल में विकास के चेहरे को सैकडों बार चूमा ।

"तुम. . . तुम . . .बहुत शेतान हो दिलजले. . . . . बहुत शेतान........ ।" भावावेश में विजय ने उसे सीने लगाकर चूम लिया ।

जीवन में शायद पहली बार विजय के आंसू निकले थे । मासूम बालक-सा विकास विजय के सीने में समा गया ।

विजय न जान सका कि उसके यह बहने वाले आंसू खुशी के है अथवा दुख के? कैसा है यह लडका?

"विकास...मेरे बच्चे... ।" विजय पुकार उठा ।

“अंकल. . . अप रो रहे है . . . ।" विकास का टूटा स्वर उभरा-----" मेरे गुरु होकर, में आपका चेला हू अंकल........अपने ही तो मुझे ये सब सिखाया है...अंकल अप मेरे गुरु होकर रोते हो...मुझे तो देखिए ।"

"नहीं . . .नहीँ मेरे बच्चे ! भावावेश में विजय कह उठा-----"मेरे पास तेरे जैसा कलेजा नहीं है----"तू कौन सी मिट्टी का बना है रे शेतान.. .कौन सी मिट्टी का...?"

विकास विजय की बाँहों मे बेहोश हो चुका था ।
 
वह नहीं जानती कि इस समय उसकी तदुरुस्ती कैसी है, कितना समय गुजर चुका था किन्तु इतना उसने अवश्य देखा कि उसके चारों तरफ़ काज़ल सा अंधेर था और जीप इस समय पहाडियों के मध्य से वनी संकरी-सी सडक पर खडी थी !

तब जबकि जोबांचू के एक साथी ने उन्हें अड्डे में पहुचा दिया ।

अलफांसे के लंबे लंबे पग इस गति के साथ उठ रहे थे कि संध्या को साथ चलने में लगभग भागना पड़ रहा था ।

वह एक साधारण-सा कमरा था जिसमें प्रविष्ट होता हुआ अलफ्रांसे बोल-----“कहां है हमारा बहादुर शिष्य?" किंतु कहीं से आवाज नहीं आई है अलफांसे बराबर आगे बढता हुआ कह रहा था-----“कहां है वो हरामखोर जरा शक्ल तो दिखाओ उसकी? साले को अगर दो-चार दांव सिखा दिए तो खुद को खुदा का बच्चा समझने लगा है ।" कहता हुआ अलफांसे जैसे ही अंदर वाले कमरे में प्रविष्ट हुआ, एकदम दरवाजे पर ठिठक गया । एक बिस्तर पर कोई पड़ा था । एक चेयर पर विजय बैठा था । थोडा चिंतित-सा । एक पर जोबांचू और बस....... ।

कमरे मे केवल तीन ही शख्स थे ।

अलफांसे की आवाज सुनते ही विजय और जोबांचू खडे हो गए और उसकी तरफ ताकने लगे । अलफांसे अंदर प्रविष्ट होता हुआ बोला…“अबे शुतुरमुर्ग की तरह क्या देख रहे हो, उस चोट्टी वाले को देखने दो, सालों , तुममें एक में भी वह कलेजा नहीं है जो हमारे इस नमकहराम चेले में है ।"

कहता हुआ अलफांसे विकास के समीप पहुच गया । वह झुका, तभी विजय बोला…“अभी तक बेहोश है, लूमड़ प्यारे! "

विजय के इस वाक्य पर अलफांसे ने एक बार नजर उठाकर विजय की तरफ़ देखा तो विजय, जोबांचू और संध्या भी अवाक रह गए ।

अपराधी की आंखों में पानी तैर उठा था ।

चेहरे की नसे उभर आई थी । विजय तो उसे देखता ही रह गया ।

अलफांसे भावुक हो उठा ।

वह एकदम बोला-----उसके होश आने पर कोई कच्ची बात नहीं होगी विजय ।"

“जेसी आज्ञा तूमड़ प्यारे मियां, हम बात को पकाकर करेगे ।"

"मेरा मतलब यह है कि कोई भी ऐसी बात नहीं होगी जिससे विकास का मनोबल टूटे ।"

"तुमने साहस दिला-दिलाकर ही तो इसका दिवाला निकाल दिया है ।" विजय बोला…“जरा इसके जिस्म से चादर हटाकर देखो ।"

अलफांसे ने जैसे ही चादर हटाई आश्चर्य से वह दो कदम पीछे हट गया ।

सारा जिस्म बुरी तरह घायल था । चार गोलियां लगी थी जिन्हें निकालकर मरहम-पट्टी कर दी गई थी । अलफांसे की आंखो से निकली एक बूद विकास के जिस्म पर गिर गई । वह चादर थापता बोला----" अपने चेले पर फक्र है ।” वह कह रहा था-----“मुझे यकीन नहीं होता कि मेरा चेला बहादुरी में मुझसे भी आगे हो सकता है, तुम्हें याद होगा कि एक बार "बदमाशों की बस्ती’ में जिस्म में 6 गोलियां लगी थी फिर भी मैं तुम्हे धोखा देकर माग गया था और आज म मेरे चेले को देख रहे हो--------गोलियां इसको दो कप लगी हैं पर हालत मुझसे खराब है, इसके बावजूद भी यह अपने काम में सफल हुआ है । दावा है कि विकास ग्रेट है !"

"लूमड़ मियां, तुम्हारी आंखों में आंसु. . ।"

"बहादुर खुशी आंसू बहाया करते है विजय ।" वह बोला…"मेरा शुक्रिया अदा करो कि तुम्हारे भारत को मैंने तुमसे भी नायाब हीरा दिया है । जिसके रहते हुए कोई भी गंदी नजर भारत पर नहीं डाल सकता ।"

इधर ये बाते हो रहीं थी और उधर...

संध्या तो जैसे अवाकूं थी । अपलक वह बिस्तर पर पड़े सुन्दर और भोले लड़के को देख रही थी । उसे यकीन नहीं हो पा रहा था कि यही विकास है । जिसने पीकिग पर लाशों की वर्षा कर दी, जिसने चीन सरकार को हिला दिया । उसकी आंखी के सामने सभी दृश्य घूम गए । अखबारों में छपे हुए लाशो के चित्र, खबरें इत्यादि! उन सबको देखते हुए उसकी कल्पना में एक ऐसा विकास उभरा था जो भयानक और डरावना हो लेकिन उसके सामने जो लड़का पडा था वह एकदम ऐसा था जिस पर हर दिल मोहित हो जाए । कुछ ऐसा ही संध्या के साथ हुआ…बिकास उसके दिल बस गया ।

" तो प्यारे लूमड़ भाई?" इधर विजय कह रहा था…“हुआ यूंकि हमने इस साले को हैलीकॉप्टर से बचाया, इसके बेहोश हो जाने पर इसके जिस्म से गोलियां निकाली, हैलीकाप्टर में ही एक बार होश में आया और तुम्हारे यार का पता बताकर फिर बेहोश हो गया और अभी तक. . . ।"

"और तुम. .. ।" अलफांसे ने जोबांचू से 'पूछा-“तुम वहाँ से कैसे भागे?"

"मैं तो किसी तरह भाग जाया मास्टर, लेकिन . . . ।"

"लेकिन . . . ?"

“मेरे कई साथी मारे गए और संभव है कोई पकडा भी गया हो ।" कहते-कहते उसका स्वर भर्रा गया ।

एक पल के लिए वहां सन्नाटा छा गया, कोई कुछ नहीं बोला । अलफांसे ने कंधे पर हाथ मारकर जोबांचू को सांत्वना दी ।

फिर वह विजय की तरफ घूमकर बोला----;------“विजया देखो, इस समय तो विकास कुछ सुनने की स्थिति में नहीं है लेकिन . . . ।"

“मैं सब सुन रहा हू गुरुदेव ।"

सव उछल पड़े, जैसे विस्फोट हुआ हो ।
 
सव उछल पड़े, जैसे विस्फोट हुआ हो ।

वास्तव में विस्फोट ही तो था । उपरोक्त वाक्य स्वयं विकास ने बोला ।

अलफांसे, विजय, जोबांचू और संध्या, सभी अवाक् और चकित से उसे देखते रह गए ।

दिलजली समाप्त होते ही सबने जोरदार ठहाका लगाया ।

संध्या भी मुखड़ा छुपाकर हंस रही थी ।

केवल विजय गर्दन अक्रड़ाए ऐसे मुंह बना रहा था मानो कुनैन की गोली चूस रहा हो ।

अलफांसे बोला…"देखों प्यारे, जासूस लडके की दिलजली तुम्हारी झकझकी से बेहतर है ।"

“अबे हुलड मियां का माल चोरी करके इस हरामी ने तुम्हें ठग लिया है।"

विजय की इस बात पर फिर ठहाका लगा ।

इस बार ठहाके मे विजय भी शामिल था ।

उसके पश्चात् वहां इसी प्रकार कहकहे लगते रहे ।

प्रत्येक ह्रदय बिकास से प्रभावित था ।

अचानक विकस ने एक नई बात छेडी-------------- "अंकल प्रोफेसर बनर्जी कहां है?"

“अरे. . .!" विजय जैसे एकदम चौका-"इस साले साले दिलजले के चक्कर में काम की बात तो भूल ही गया ।" वह जौबांचू की तरफ़ देखता हुआ बोला--------"प्यारे खान मियां, जरा उस खूसट को यहाँ लाना । अभी तो ये भी पूछना है कि उन साले अंडों पर लिखी उस गुप्तलिपि का क्या अर्थ है?"

तब जबकि प्रोफेसर बनर्जी को लाया गया वे पूर्णतया सुरक्षित थे ।

विजय को वे पहचानते थे कि वह एक देशभक्त भारतीय लड़का है ।

तब विजय ने पुरुवा-"हां तो प्रोफेसर, क्या आप अंडों पर लिखी गुप्तलिपि का रहस्य बताएंगे?"

"केवल तुम्हें. . अधिक लोगों को मैं यह बातें नहीं बता सकता ।" प्रोफेसर बनर्जी दृढ शब्दों में बोले…“तुम्हें भी केवल इस शर्त पर बता सकता हूँ कि तुम किसी को भी बताओगे नहीं ।"

विजय को बनर्जी की बात ठीक ही लगी । वह भी यह रहस्य सबके सामने नहीं खोलना चाहता था और विशेषरूप से अलफांसे के सामने तो बिल्कुल भी नहीं, क्योंकि उसका कुछ पता नहीं कि वह कब कौन-सा रुख करे । अत: विजय बोला----"जैसी आपकी इच्छा ।"

"खाओ हिन्दुस्तान की कसम कि यह रहस्य तुम अन्य किसी को नहीं बताओगे ।"

प्रोफेसर की इस बात पर तो विजय उनका मुह ताकता रह गया । उसे मानना पड़ा कि प्रोफेसर वास्तव में देशभक्त हैं ।

वह दोनों एक अन्य कमरे में चले गए । दरवाजा बंद कर लिया गया । प्रोफेसर के अनुरोध पर विजय को कसम लेनी ही पडी । प्रोफेसर विजय को इतने धीरे-धीरे समझाने लगे कि आवाज कमरे से बाहर न जा सके । वह बता रहे थे-"तुम्हें मालूम है कि पहले अंडे पर…रा.पे. 39 ला. 13 श 1 अ 3 लिखा हुआ है ।"

"जानता हूं ।"

"अब जरा ध्यान से सुनो ।" बनर्जी उसे समझते हुए बोले…“अंडों पर लिखी हुई यह प्रविष्टि हमने भारत की तीन महान धार्मिक पुस्तकों रामायण, गीता और महाभारत से ती है । इन्हीं तीनों पुस्तकों को आधार मानकर हमने वह गुप्तलिपि बनाई है । उसमे रा . का मतलब है रामायण, पे. का मतलब है पेज, ला. का मतलब है लाइन, श . का मतलब है शब्द और अ. का मतलब है अक्षर ।"

"यानी?"

"इसका मतलब हुआ कि रामायण के पेज नंबर 39 की लाइन नंबर 13 के शब्द 1 में अक्षर नंबर तीसरा लिया । इस समय मेरे पास इन तीन महान ग्रंथों में से कोई भी नहीं है । अत: तुम्हें दिखा नहीं सकता जबकि बता रहा हू कि उपरोक्त लिखे संकेत पर 'गु' अक्षर लिखा हुआ है । अब इस प्रकार समझे कि पहले अंडे पर 'गु' लिखा हुआ है ।"

“ओ...!" विजय समझता हुआ बोला ।

“इस प्रकार दूसरे अंडे पर गीता के पेज नंबर 49 की लाइन नंबर 15 के शब्द 8 का दूसरा अक्षर 'प्त' लिखा हुआ है जो कि गुप्तलिपि के माध्यम से दूसरे अंडे पर लिखा हुआ है । इसी प्रकार तीसरे अंडे पर लिखा अक्षर महाभारत से लिया गया है अत: महाभारत में पेज नंबर 62 की लाइन नंबर 18 के शब्द नंबर 21 में तीसरा अक्षर 'यो' है । जोकि गुप्तलिपि के माध्यम से तीसरे अंडे पर लिखा है !”

"वेरी गुड! "

बरबस ही विजय गुप्तलिपि के प्रशंसा कर उठा ।
 
"इसी प्रकार शेष दोनों अंडों पर क्रमश: गीता और महाभारत से अक्षर लिए गए है जो क्रमश: इस प्रकार हे…चौथे पर लिखा अक्षर 'ज' और पांचवे पर 'ना' -----इस प्रकार पांचों अंडों को इसी क्रम में रखने पर 'गुप्त योजना' शब्द बनता है । अब ध्यान देने की बात यह है कि उन अंडों के अंदर भी इसी प्रकार की गुप्तलिपि का प्रयोग किया गया है और प्रत्येक धारा का कोई-न-कोई अक्षर पांचो अंडों पर है यानी कोई भी धारा केवल एक अथवा एक से चार अडों तक पूरी नहीं हो सकती । कोई भी धारा तभी पढी जा सकती है जबकि पांचों अंडे सुरक्षित हों । यही कारण है कि अगर कोई एक अंडा समाप्त हो जाए तो शेष सब बेकार है क्योंकि एक के टूटने पर कोई भी धारा पूरी तरह नहीं पढी जा सकती । इसमे भी शर्त यह है कि अंडे केवल उसी सूरत में रखे जाने चाहिए जिससे "गुप्त योजना' शब्द की उत्पत्ति हो, अगर उसे उल्टे सीधे रखकर खोला गया तो कुछ नहीं पढा जा सकेगा क्योंकि सारा क्रम टूट जाएगा, यानी अगर इस प्रकार रख दे कि "प्त' अक्षर 'ग' से पहले आ जाए तो सब कुछ व्यर्थ होगा ! अथवा 'यो' से पहले 'ज' अथवा 'ना' आ जाए तो व्यर्थ होगा, मतलब यह कि अंडों को "गुप्त योजना' के क्रम में खोला जाए!"

बनर्जी सब समझाते चले गये ।

अलफांसे, जोबांचू और विजय एक जीप में बैठे हुए थे और जीप फर्राटे के साथ पीकिंग की साफ, चिकनी, सपाट और खाली सड़क का सीना रोदती भागती जा रही थी ।

ड्राइविंग सीट पर इस समय अलफासे बैठा हुआ था ।

विजय जोबांधू पीछे थे ।

इस समय रात के लगभग दो बजे थे ।

उन तीनों के जिस्सों पर चीनी लिबास और चेहरों पर चीनी मेकअप था ।

“वेसे जोबांबू यह रिपोर्ट पक्की है न कि वे पांचों अंडे वहीं हैं?" यकायक अलफांसे ने पूछा ।

"एकदम पक्की मास्टर, मेरी कोई रिपोर्ट झूठी नहीं होती ।"

इस समय वे तीनों वहां जा रहे थे जहाँ चीनियों वे पांच अंडे रखे हुए थे । इस बात का पता जोबांचू के आदमियों ने पांच दिन के कठिन परिश्रम के पश्चात लगायां था ।

यूं तो विकास स्वस्थ हो गया था लेकिन इस विषय में उसे कुछ नहीं बतायां गया था क्योंकि सब जानते थे कि अगर उसे यह पता लग गया तो लडका मानेगा नहीं और उनसे पहले ही कोई भयानक हरकत कर बैठेगा ।

रात के इस समय में इस अभियान पर भी गुप्त रूप से निकले थे । इस अभियान के विषय में जोबांचू के भी कुछ विशेष आदमी ही जानते थे ।

यकायक एक निर्जन स्थान पर जीप रुक गई ।

कुछ देर पश्चात् उन्होंने जीप को एक गड्डे में धक्का देकर समाप्त कर दिया और फिर खामोशी से आगे बढ़ गए । लगभग तीस मिनट पश्चात् वे एक इमारत के सामने बाली झाडियों में खडे थे ।

कुछ देर तक तीनों कोई योजना बनाते रहे और फिर शांति के साथ तीनों इमारत की तरफ़ रेग गए ।

अलफांसे ने इमारत के पीछे पहुंचकर, एक कुंदा-सा निकालकर इमारत की छत की ओर उछाल दिया । कुंदा ऊपर किसी जगह फंस गया और कुंदे में बंधी रस्सी पर वह किसी सरकस के खिलाडी की भांति चढता चला गया । कुछ समय पश्चात् वह छत से नीचे जाने वाली इमारत के अंदर प्रविष्ट हो गया ।

जोबांचू आश्चर्यजनक ढंग से उछला और एक रोशनदान थाम लिया । उसके दुसरी तरफ भी अंधकार था ।

अगले ही पल जोबांचूजो कुछ कर रहा था उससे पता लगता था कि वह गजब का बलशाली है । रोशनदान पर लगी तीन इस्पात की मोटी राडों को उसने किसी मोमबत्ती की भाति तोड़ दिया और अंदर प्रविष्ट हो गया ।

विजय सीधा इमारत के द्वार पर पहुंचा और बेखौफ कालबेल पर अंगूठा रख दिया ।

तुरंत आहट हुई और दरवाजा खुला । एक मजबूत दरबान बाहर झाकता हुआ बोला-""कौन?"

"चोट्ठी कहां है?" विजय ने अजीब प्रश्न किया ।

"जी. .. ।" दरबान चकराया ।

"जी...जी. . .क्या करता है मच्छर की दुम?".कहते हुए विजय ने विना किसी अल्टीमेटम के एक कैरिट उसकी गर्दन पर मारी और वह फौरन जीवन से रुठ गया ।

विजय फुर्ती के साथ अंदर प्रविष्ट हो गया, साथ ही उसने दरबान का शव भी अंदर खीच लिया । यह एक गेलरी थी जिसमें एक नाइट बल्ब हंस रहा था । विजय ने तेजी से दरवाजा बंद किया और लाश को एक कोने में खडी करके नाइट बल्ब होल्डर से निकाल लिया ।

वहां अंधकार का साम्राज्य हो गया । विजय अंधेरे में आगे बढ़ गया ।

अभी वह अंधकार में ही था कि सहसा उसकी दोनों पसलियों में रायफ़लों की नाल आ चिपकी ।

एक पल के लिए विजय चौका, किंतु तभी एक गुर्राती-सी आवाज उसके कानों में टकराई---हिलो मत, वरना भून दिए जाओगे ।"

"नहीं...नहीं...मैं कोई चना नहीं हूं।" विजय भयभीत व्यक्ति का अभिनय करता हुआ बोला ।

और फिर. .. ।

वह सात रायफ़लधारियों से धिर गया है, यह रहस्य उसे उस वक्त मालूम हुआ जब उसे एक हाॅल मे लाया गया !

इस हाँल में पर्याप्त प्रकाश था ।

अभी उनका चीफ जो ठीक विजय के सामने खडा था , विजय से कोई प्रश्न करना ही चाहता था कि यकायक एक तरफ से तीन चीनी जोबाचू को रायफ़लो की नोक पर लाते दीख पड़े । विजय और उसको पास-पास खडा कर दिया गया । दसों सेनिक उनके चारों ओर तथा चीफ उनके सामने खड़ा होकर गुरोंया--"कौन हो तुम?"

"हमेँ मालूम था कि आपका पहला प्रश्न यही होगा ।" विजय ने कहा ।

"बको मत ।"

"कैसी बाते करते हो मियां कबाडी दास?" विजय का बोलना था कि-चटाक-एक झापढ़ उनके गाल से टकराया ।

धाय . . . ।

तभी एक फायर. . .धांय. . पलक झपकते ही तीन अन्य फायर, निशाना थे वहां पर प्रकाश करने वाले बल्ब ।

पलक झपकते ही सब टूट गए । अंधकार हो गया । विजय ने झपटकर चीफ को दबोच लिया । जोबाचू ने एक तरफ जम्प लगाकर रिवॉल्वर निकाल लिया था ।

अंधेरे में गोलियां चलने लगी ।

विजय और चीनियों का चीफ आपस में गुथे हुए थे । यूं बिजय उससे लड़ता हुआ चटपटे डायलॉग बोल रहा था, किंतु इस बीच वह यह भी समझ गया था कि चीफ भी कमजोर नहीं है ।

अचानक चीफ ने उसे पेरों पर रखकर उछाल दिया । विजय स्वयं को संभाल न सका और लहरा गया, लेकिन उस वक्त वह चौंका जब वह फर्श पर गिरने के स्थान पर फर्श से नीचे धंसता चला गया और वह एकदम प्रकाश में आ गया ।

वह धड़ाम से फर्श पर गिरा, उसको चोट भी आई किंतु फुर्ती के साथ वह खडा हो गया और ऊपर देखा जहाँ से आया था ।

वह इस कमरे की छत थी यानी यह कमरा हाल के नीचे था । छत का वह भाग थोडा-सा हटा हुआ था । अभी वह कुछ करने ही जा रहा था कि एक इंसानी जिस्म जम्प मारकर कमरे में आ गया । वह इंसानी जिस्म किसी रबढ़ के बबुए की तरह उछलकर खडा हो गया । कमरे की छत का वह रिक्त भाग भर चुका था । वह इंसान अन्य कोई नहीं बल्कि स्वयं चीनी चीफ ही था ।

झपटकर एक हंटर उठा लिया और विजय के गले में खींचकर मारा । विजय के कंठ से हल्की-सी चीख निकल गई, इधर हंटर उसके गले से बुरी तरह उलझ गया था ।
 
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