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इमरान ने सबसे पहले दफ़्ती के उस डिब्बे का जायज़ा लिया जिसमें से मुर्दा परिन्दे निकाल-निकाल कर अंगीठी में डाले गये थे। मगर डिब्बा अब ख़ाली था।
इमरान दूसरी तरफ़ मुड़ा।
“ख़बरदार!'' अचानक उसने अँधेरे में शौकत की आवाज़ सुनी! “तुम जो कोई भी हो अपने हाथ ऊपर उठा लो...."
मगर उसका जुमला पूरा होने से पहले ही इमरान की टॉर्च बुझ चुकी थी। वह झपट कर एक अलमारी के पीछे हो गया।
"ख़बरदार। ख़बरदार....” शौकत कह रहा था “रिवॉल्वर का रुख़ गेट की तरफ़ है। तुम भाग नहीं सकते।"
इमरान ने अन्दाज़ा कर लिया कि शौकत धीरे-धीरे स्विच बोर्ड की तरफ़ जा रहा है....अगर उसने रोशनी कर दी तो....? इस ख़याल ने इमरान के जिस्म में बिजली की सी लहर दौड़ गयी और वह तेज़ी से धीमे क़दमों से चलता हुआ गेट के करीब पहुँच गया उसे शौकत की बेवकूफ़ी पर हँसी भी आ रही थी। एक तो इतना अँधेरा था कि वह उसे देख नहीं सकता था। दूसरा उस कमरे में अकेला एक वही गेट नहीं था....लेकिन इमरान ने उसी गेट को भागने का रास्ता बनाया जिसकी तरफ़ शौकत ने इशारा किया था। वह बहुत ही आसानी से इमारत के बाहर निकल आया और फिर तेज़ी से कोठी की तरफ़ जाते वक्त उसने मुड़ कर देखा तो लेबोरेटरी वाली इमारत की सारी खिड़कियाँ रौशन हो चुकी थीं।
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रूशी ने हैरत के अन्दाज़ में इमरान की तरफ़ देखा।
__“हाँ मैं ठीक कह रहा हूँ।” इमरान ने सिर हिला कर कहा। “पिछली रात शौकत ने मुझे धोखा दिया था....शायद उसे किसी तरह पता चल गया था कि मैं खिड़की से झाँक रहा हूँ!"
“रिवॉल्वर था उसके पास?"
हाँ!" लेकिन उसकी अहमियत नहीं। हो सकता है कि वह उसका लाइसेंस भी रखता हो।"
“और वह परिन्दे नीले ही थे।"
“सौ फ़ीसदी!'' इमरान ने कहा। कुछ देर ख़ामोश रहा फिर बोला। “तुम पिछली रात कहाँ गायब थीं?"
“मैं उसी आदमी सलीम के चक्कर में गयी थी।"
“हाय रूशी! तुम सचमुच जासूस होती जा रही हो....बहुत खूब....हाँ तो फिर....तुमने शायद....!"
"ठहरो! बताती हूँ....! मैंने उसके बारे में बहुत-सी मालूमात हासिल की हैं।"
“शुरू हो जाओ।"
"उसके कुछ रिश्तेदारों ने उसकी ज़मानत लेनी चाही थी, लेकिन उसने उसे मंजूर नहीं किया। इस पर खुद पुलिस को भी हैरत है।'
“उससे इसकी वजह ज़रूर पूछी गयी होगी।"
"हाँ, हाँ। लेकिन उसका जवाब कुछ ऐसा है जो किसी फ़िल्म की कहानी बन कर ज़्यादा दिलचस्प साबित हो सकता है।"
"यानी....”
“वह कहता है कि मैं अपना दाग़ी चेहरा किसी को नहीं दिखाना चाहता। मैंने एक ऐसे मालिक को धोखा दिया है जो बहुत ही नेक, शरीफ़ और मेहरबान था। मैं नहीं चाहता कि अब कभी उसका सामना हो। मैं जेल की कोठरी में मर जाना पसन्द करूँगा।"
“अच्छा!'' इमरान बेवकूफ़ों की तरह आँखें फाड़ कर देखने लगा।
“मैं नहीं समझ सकती कि बीसवीं सदी में भी इतने अच्छे आदमी पाये जाते होंगे। ज़ाहिर है जो इतना अच्छा होगा वह चोरी ही क्यों करने लगा....वैसे उसके जानने वाले कहते हैं कि वह एक बहुत अच्छा आदमी है और वह चोरी जैसा काम कर ही नहीं सकता, मगर दूसरी तरफ़ वह ख़ुद ही जुर्म कबूल करता है।"
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"तो फिर उसके जानने वालों में कई तरह के ख़याल पाये जाते होंगे?'
“हाँ, मैंने भी यही महसूस किया है।' रूशी सिर हिला कर बोली।
“कुछ लोग कहते हैं कि यह सिर्फ किसी किस्म का ड्रामा है।"