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नीले परिन्दे ( एक थ्रिलर उपन्यास )



इमरान ने सबसे पहले दफ़्ती के उस डिब्बे का जायज़ा लिया जिसमें से मुर्दा परिन्दे निकाल-निकाल कर अंगीठी में डाले गये थे। मगर डिब्बा अब ख़ाली था।

इमरान दूसरी तरफ़ मुड़ा।

“ख़बरदार!'' अचानक उसने अँधेरे में शौकत की आवाज़ सुनी! “तुम जो कोई भी हो अपने हाथ ऊपर उठा लो...."

मगर उसका जुमला पूरा होने से पहले ही इमरान की टॉर्च बुझ चुकी थी। वह झपट कर एक अलमारी के पीछे हो गया।

"ख़बरदार। ख़बरदार....” शौकत कह रहा था “रिवॉल्वर का रुख़ गेट की तरफ़ है। तुम भाग नहीं सकते।"

इमरान ने अन्दाज़ा कर लिया कि शौकत धीरे-धीरे स्विच बोर्ड की तरफ़ जा रहा है....अगर उसने रोशनी कर दी तो....? इस ख़याल ने इमरान के जिस्म में बिजली की सी लहर दौड़ गयी और वह तेज़ी से धीमे क़दमों से चलता हुआ गेट के करीब पहुँच गया उसे शौकत की बेवकूफ़ी पर हँसी भी आ रही थी। एक तो इतना अँधेरा था कि वह उसे देख नहीं सकता था। दूसरा उस कमरे में अकेला एक वही गेट नहीं था....लेकिन इमरान ने उसी गेट को भागने का रास्ता बनाया जिसकी तरफ़ शौकत ने इशारा किया था। वह बहुत ही आसानी से इमारत के बाहर निकल आया और फिर तेज़ी से कोठी की तरफ़ जाते वक्त उसने मुड़ कर देखा तो लेबोरेटरी वाली इमारत की सारी खिड़कियाँ रौशन हो चुकी थीं।

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रूशी ने हैरत के अन्दाज़ में इमरान की तरफ़ देखा।

__“हाँ मैं ठीक कह रहा हूँ।” इमरान ने सिर हिला कर कहा। “पिछली रात शौकत ने मुझे धोखा दिया था....शायद उसे किसी तरह पता चल गया था कि मैं खिड़की से झाँक रहा हूँ!"

“रिवॉल्वर था उसके पास?"

हाँ!" लेकिन उसकी अहमियत नहीं। हो सकता है कि वह उसका लाइसेंस भी रखता हो।"

“और वह परिन्दे नीले ही थे।"

“सौ फ़ीसदी!'' इमरान ने कहा। कुछ देर ख़ामोश रहा फिर बोला। “तुम पिछली रात कहाँ गायब थीं?"

“मैं उसी आदमी सलीम के चक्कर में गयी थी।"

“हाय रूशी! तुम सचमुच जासूस होती जा रही हो....बहुत खूब....हाँ तो फिर....तुमने शायद....!"

"ठहरो! बताती हूँ....! मैंने उसके बारे में बहुत-सी मालूमात हासिल की हैं।"

“शुरू हो जाओ।"

"उसके कुछ रिश्तेदारों ने उसकी ज़मानत लेनी चाही थी, लेकिन उसने उसे मंजूर नहीं किया। इस पर खुद पुलिस को भी हैरत है।'

“उससे इसकी वजह ज़रूर पूछी गयी होगी।"

"हाँ, हाँ। लेकिन उसका जवाब कुछ ऐसा है जो किसी फ़िल्म की कहानी बन कर ज़्यादा दिलचस्प साबित हो सकता है।"

"यानी....”

“वह कहता है कि मैं अपना दाग़ी चेहरा किसी को नहीं दिखाना चाहता। मैंने एक ऐसे मालिक को धोखा दिया है जो बहुत ही नेक, शरीफ़ और मेहरबान था। मैं नहीं चाहता कि अब कभी उसका सामना हो। मैं जेल की कोठरी में मर जाना पसन्द करूँगा।"

“अच्छा!'' इमरान बेवकूफ़ों की तरह आँखें फाड़ कर देखने लगा।

“मैं नहीं समझ सकती कि बीसवीं सदी में भी इतने अच्छे आदमी पाये जाते होंगे। ज़ाहिर है जो इतना अच्छा होगा वह चोरी ही क्यों करने लगा....वैसे उसके जानने वाले कहते हैं कि वह एक बहुत अच्छा आदमी है और वह चोरी जैसा काम कर ही नहीं सकता, मगर दूसरी तरफ़ वह ख़ुद ही जुर्म कबूल करता है।"

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"तो फिर उसके जानने वालों में कई तरह के ख़याल पाये जाते होंगे?'

“हाँ, मैंने भी यही महसूस किया है।' रूशी सिर हिला कर बोली।

“कुछ लोग कहते हैं कि यह सिर्फ किसी किस्म का ड्रामा है।"

 
"लेकिन किस किस्म का ड्रामा? उसके मक़सद पर भी किसी ने रोशनी डाली या नहीं?"

"नहीं, उसके बारे में किसी ने कुछ नहीं कहा।" इमरान कुछ सोचने लगा। फिर उसने कहा। “मामला काफ़ी पेचीदा है।"

“पेचीदा नहीं, बल्कि मज़ाक़िया कहो।" रूशी मुस्कुरा कर बोली।

“सलीम, शौकत का नौकर था। अगर शौकत को असल मुजरिम मान लिया जाय तो सलीम के जेल जाने की बात बिलकुल बेईमानी हुई।" ।

“किसी हद तक तुम्हारा ख़याल बिलकुल सही है।"

“किसी हद तक क्या? बिलकुल सही है।' रूशी बोली।

“नहीं, उस पर बिलकुल की छाप लगाना ठीक नहीं!” इमरान कुछ सोचता हुआ बोला।

“अच्छा, फिर तुम ही बताओ कि उसे जेल क्यों भिजवाया गया।"

“हो सकता है कि उसने सचमुच चोरी की हो।'

“ओहो! क्या तुम्हें वह बातचीत याद नहीं जो जेल में मेरे और उसके बीच हुई थी।"

“मुझे अच्छी तरह याद है।"

“फिर!"

"फिर कुछ भी नहीं! मुझे सोचने दो। हाँ, ठीक है उसे यूँ ही समझो। मान लो कि सलीम शौकत के जुर्म के बारे में जानता है, इसीलिए वह उस पर चोरी का इल्ज़ाम लगा कर उसे जेल भिजवा देता है।" ।

“अगर यही बात है!” रूशी जल्दी से बोली। “तो वह बहुत ही आसानी से शौकत के जर्म का राज़ फ़ाश कर सकता था। अदालत को वह बता सकता था कि उसे किसलिए जेल भिजवाया गया है।"

_ “आँ....हाँ!” इमरान हाथ नचा कर बोला। “तुम बिलकुल बुद्ध हो....अदालत में शौकत भी यही कह सकता था कि वह अपनी गर्दन बचाने के लिए उस पर झूठा इल्ज़ाम लगा रहा है.... आख़िर उसने गिरफ़्तार होने से पहले ही उसके जुर्म की पुलिस को क्यों नहीं इत्तला दी....साफ़ रहे कि सलीम की गिरफ़्तारी जमील वाले वाकये के तीन दिन बाद हुई थी।"

"चलो, मैं इसे मान लेती हूँ।'' रूशी ने कहा। “सलीम ने मुझसे यह क्यों कहा था कि तुम मुझको गुस्सा नहीं दिला सकतीं।"

____ "तुम ख़ामोशी से मेरी बात सुनती जाओ!” इमरान झुंझला कर बोला। “बात ख़त्म होने से पहले न टोका करो....मैं तुम्हें सलीम के उन अलफ़ाज़ का मतलब भी समझा दूँगा और उसी रोशनी में कि शौकत ही मुजरिम है, वैसे एक बात साफ़ है कि सलीम शौकत से भी ज़्यादा घाघ है। मान लो, सलीम ने सोचा हो कि वह जेल ही में ज़्यादा महफूज़ रह सकेगा, वरना हो सकता है कि शौकत अपना जुर्म छिपाने के लिए उसे क़त्ल ही करा दे। शौकत ने उसे इस उम्मीद पर चोरी के इल्ज़ाम में जेल भिजवाया होगा कि वह उसका राज़ ज़रूर उगल देगा, लेकिन खुद भी शामिल होने की बिना पर अदालत को उसका यकीन दिलाने में कामयाब न होगा। शौकत के पास इस सरत में सबसे बड़ा एतराज़ यही होगा कि उसने गिरफ़्तार होने से तीन दिन पहले पुलिस को इसकी ख़बर क्यों नहीं दी।”

“मैं समझ गयी....लेकिन सलीम के वो जुमले....' रूशी ने फिर टोका।

“अरे, खुदा तुम्हें गारत करे....सलीम के जुमलों की ऐसी-की-तैसी....मैं ख़ुद फाँसी पर चढ़ जाऊँगा। तुम्हारा गला घोंट कर....! हाँ....मुझे बात पूरी करने दो। रूशी की बच्ची!"

इमरान ने कुछ इसी किस्म के मज़ाकिया अन्दाज़ में झल्लाहट ज़ाहिर की थी कि रूशी हँस पड़ी।

__ “अरे, उस उल्ल के पट्टे ने बिलकुल ख़ामोशी अपना ली....यानी शौकत के जुर्म का मामला बिलकुल ही घोंट कर अपना जुर्म कबूल लिया....अब तुम ख़ुद सोचो, शैतान की ख़ाला, कि शौकत पर उसका क्या असर हुआ होगा? ज़ाहिर है उसने यह ज़रूर चाहा होगा कि सलीम के उस रवैये की वजह मालूम करे....और दूसरी तरफ़ सलीम ने भी यह सोचा होगा कि शौकत उसकी वजह मालूम करने की कोशिश ज़रूर करेगा....फिर तुम वहाँ जा पहुँचीं! सलीम समझा कि तुम शौकत ही की तरफ़ से उसकी टोह में आयी हो। इसलिए उसने तुम्हें उड़नघाइयाँ बतायीं और यहाँ तक कह दिया कि तुम उसे गुस्सा दिला कर भी असलियत नहीं उगलवा सकती....हो सकता है कि उसने अपनी जानकारी में शौकत को और ज़्यादा डराने के लिए तुमसे इस किस्म की बातचीत की हो।"

“मगर!"

“मगर की बच्ची! अब अगर तुमने कोई नया पेंच निकाला तो मैं एक बोतल कोकाकोला पी कर हमेशा के लिए ख़ामोश हो जाऊँगा।"

"तुम्हारा नज़रिया ग़लत भी हो सकता है।'' रूशी ने संजीदगी से कहा।

"नहीं....मैं जेम्स बॉन्ड हूँ!' इमरान गला फाड़ कर चीख़ा। “मुझसे कभी कोई ग़लती नहीं हो सकती....मैं जूते का चमड़ा देख कर बता सकता हूँ कि कबूतर की खाल का है या मेंढक की खाल का है....अभी मुझे डॉक्टर वॉटसन जैसा कोई चुग़द नहीं मिला। यही वजह है कि मैं तेज़ी से तरक्की नहीं कर सकता!"

“अच्छा, मान लो अगर नाइट क्लब के मैनेजर ही की बात सच हो तो!”

“मुझे बड़ी ख़ुशी होगी! ख़ुदा हर एक को सच बोलने की सलाहियत अता करे!"

“मुझसे बेतुकी बातें न किया करो!” रूशी झल्ला गयी।

“ऐ....रूशी तुम अपना हुलिया ठीक करो। मैं तुम्हारा शौहर नहीं हूँ....हाँ!"

"तुम्हें शौहर बनाने वाली किसी गधी ही के पेट से पैदा होगी।'

"ख़बरदार, अगर तुमने गधी की शान में कोई ग़लत बात मुँह से निकाली!" इमरान गरज कर बोला और रूशी बुरा-सा मुँह बनाये हुए कमरे से बाहर निकल गयी।

इमरान का एक-एक पल बड़ी मुश्किल से बीत रहा था। उसकी जानकारी में मुजरिम सामने मौजद था। बस,उसके ख़िलाफ़ ऐसे सबत हासिल करना बाकी रह गया था जिन्हें अदालत में पेश किया जा सके।

उसने शौकत के पास मुर्दा परिन्दे देखे थे जिन्हें वह आग में जला रहा था....लेकिन इस बात का कोई सबूत उसके पास नहीं था और अदालत सबूत माँगती है।

परवीन शौकत की चचेरी बहन थी और नवाब जावेद मिर्जा की इकलौती बेटी। ज़ाहिर है कि नवाब के बाद उनकी जायदाद की मालिक वही होती। शौकत भी कभी जायदाद का मालिक था, लेकिन उसकी जायदाद साइण्टिफ़िक तजरबे में घुस गयी....

 


इसलिए वह दोबारा अपनी माली हालत सुधारने के लिए परवीन से शादी के ख्वाब देख सकता था। इमरान ने अपना यह ख़याल कैप्टन फ़ैयाज़ पर ज़ाहिर किया जिसे उसने तार दे कर ख़ास तौर से सरदारगढ़ बुलाया था।

“मगर! इमरान!'' फ़ैयाज़ ने कहा था।

“यह जरूरी नहीं कि परवीन की शादी इस वाकये के बाद शौकत ही से हो जाये। अगर जावेद मिर्जा को उसकी शादी अपने भतीजों ही में से किसी के साथ करनी होती हो बात जमील तक कैसे पहुँचती।"

“तुम अपनी जगह ठीक कह रहे हो!” इमरान बोला।

“लेकिन मेरे पास और भी दलीलें हैं जिनकी बिना पर मेरा नज़रिया वही रहेगा।"

“अच्छा, मुझे बताओ....अब तुम्हारी दलीलें क्या हैं।"

“इन्सानी फ़ितरत की रोशनी में इसे देखने की कोशिश करो। यह इन्सानी फ़ितरत होती है कि हम निजी सुख-चैन चाहते हैं हर मामले में! लेकिन हालात के साथ ही उससे हासिल करने का तरीका भी बदलता रहता है। शौकत अगर परवीन से शादी कर लेगा तो उससे उतना ही सुकून मिलेगा जितना उसको उसके दूसरे मॅगेतरों की शक्ल बिगाड़ने पर मिलता है।"

फ़ैयाज़ कुछ देर कुछ सोचता रहा फिर धीरे से बोला। “तुम ठीक कहते हो।”

“मैं झक मार रहा हूँ। और तुम बिलकुल गधे हो।” तभी इमरान का मूड बिगड़ गया।

“क्या!” फ़ैयाज़ उसे हैरानी से घूरने लगा।

“कुछ नहीं मैं सिर्फ यह कहना चाहता था कि तुम इस विभाग के लिए ठीक नहीं हो। इस्तीफ़ा दे कर मेरी फ़र्म में नौकरी कर लो। तलाक़ के हिसाब से कमीशन अलग....यानी उससे और तनख़्वाह से कोई मतलब न होगा।"

"इमरान प्यारे, काम की बात करो!” फ़ैयाज़ बड़ी शर्मिन्दगी से बोला। “मैं चाहता हूँ कि तुम इस मामले को जल्द-से-जल्द निपटा कर वापस चलो....वहाँ भी कई मुसीबतें तुम्हारा इन्तज़ार कर रही हैं।''

"हाँय! कहीं मेरी शादी तो नहीं तय कर दी....!"

“ख़त्म करो!" फ़ैयाज़ हाथ उठा कर बोला। “शौकत वाले नज़रिये के अलावा किसी और का भी इमकान है या नहीं....!"

"है क्यों नहीं....ये हरकत जमील के चचा या माम की भी हो सकती है।"

"हाँ, हो सकती है! मगर मैं इस पर यकीन करने के लिए तैयार नहीं।"

“सिर्फ इसलिए कि सज्जाद से तुम्हारे दोस्ताना ताल्लुकात हैं। क्यों?"

“नहीं! यह बात नहीं! उनमें से हर एक मेरे लिए खुली हुई किताब है। उनमें कोई भी इतना अक्लमन्द नहीं है...."

 
___“खैर, मुझे इससे बहस नहीं है। मैंने जिस काम के लिए बुलाया है, उसे सुनो।" इमरान ने कहा और फिर ख़ामोश हो कर कुछ सोचने लगा।

थोड़ी देर बाद फिर बोला। “सलीम का किस्सा सुन ही चुके हो। मैं चाहता हूँ कि किसी तरह उसे जेल से बाहर लाया जाये।"

“भला यह कैसे हो सकता है?"

“कोई सूरत निकालो!"

" आखिर उससे क्या होगा?"

“बच्चा होगा और तुम्हें मामू कहेगा।” इमरान झल्ला कर बोला।

“नामुमकिन है....यह किसी तरह नहीं हो सकता।"

“बच्चा!'' इमरान ने पूछा।

"बको मत! मैं सलीम की रिहाई के बारे में कह रहा हूँ। वह चोरी के जुर्म में बन्द है। उसे कानून के सुपुर्द करने वाला शौकत है। जब तक कि वह खुद अदालत से उसकी रिहाई की अपील न करे ऐसा नहीं हो सकता।"

“मैं भी इतना जानता हूँ?" "इसके बावजूद भी इस किस्म के बेवकूफ़ों जैसे ख़यालात रखते हो।"

“अगर वह रिहा नहीं हो सकता तो फिर असल मुजरिम का हाथ आना भी मुश्किल है।"

" आख़िर शौकत के ख़िलाफ़ सबूत क्यों नहीं मुहैया करते....''

"मुझे यह सब कुछ बण्डल मालूम होता है....खास तौर पर परिन्दों की कहानी!"

"फिर शौकत उन मुर्दा परिन्दों को आग में क्यों जला रहा था?” फ़ैयाज़ ने कहा।

"वह झक मार रहा था। उसे जहन्नम में डालो। लेकिन क्या तम किसी ऐसे परिन्दे के वजूद पर यकीन रखते हो जिसके चोंच मारने से आदमी कोढ़ी हो जाय और उसके जिस्म में ऐसे वाइरस पाये जायें जो सारी दुनिया के लिए बिलकुल नये हों। ज़ाहिर है कि सफ़ेद दाग़ों के वही वाइरस हैं।''

___ “हो सकता है किसी साइण्टिफ़िक तरीके से उन परिन्दों में उस किस्म के असर पैदा किये गये हों।"

“अच्छा....अच्छा....यानी तुम भी यही समझते हो। इसका यह मतलब हुआ कि हर आदमी किसी ऐसे साइण्टिफ़िक तरीके के बारे में सोच सकता है। तो समझो शौकत बिलकल बद्ध है उसने जान-बझ कर अपनी गर्दन फँसवायी है। सारा सरदारगढ़ इस बात को जानता है कि शौकत एक अक्लमन्द साइण्टिस्ट है और वाइरस उसका ख़ास टॉपिक हैं।"

“फिर वो मुर्दा परिन्दे....!''

“मैं कहता हूँ इस बात को ख़त्म ही कर दो तो अच्छा है। सलीम की रिहाई के बारे में सोचो।"

"वह ऐसा है जैसे मच्छर के पेट से हाथी पैदा कराना?"

“तब फिर असल मुजरिम का हाथ आना भी मुश्किल है....और मैं अपना बिस्तर गोल करता हूँ।''

"तुम खुद ही कोई तरीका क्यों नहीं सोचते।'' फ़ैयाज़ झुंझला कर बोला।

“मैं सोच चुका हूँ।"

"तो फिर क्यों झक मार रहे हो। मुझे बताओ क्या सोचा है।"

“उसके किसी रिश्तेदार को ज़मानत के लिए तैयार कराओ।"

“मगर वह जमानत पर रिहा होने से इनकार करता है।"

“उसके इनकार से क्या होता है....मैं उसे अदालत में झकी साबित करा दूंगा और फिर उसे इस बात की इत्तला देने की ज़रूरत ही नहीं है कि उसकी ज़मानत होने वाली है। इतना तो तुम कर ही सकोगे कि जेल से अदालत तक लाने से पहले उस पर यह ज़ाहिर किया जाये कि मुकदमे की पेशी के सिलसिले में उसे ले जाया जा रहा है।"

"हाँ, यह हो सकता है।"

"हो नहीं सकता, बल्कि उसे कल तक हो जाना चाहिए।” इमरान ने एक-एक लफ़्ज़ पर जोर दे कर कहा।

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10 Minute Beet Gaye Lekin Koi Aisi

Cheez Haath Na Lagi Jise Shaukath Ke Khilaaf Saboot Ke Taur Par Istemaal

Kiya Jaa Sakta

Do Kamro Ki Talaashi Lene Ke Baad Wo

Labouratory Mein Daakhil Hua Yaha Bhi Andhera Tha, Lekin Anghethi Mein Ab Bhi Koyele Dahek Rahe The….

Imran Ne Sab Se Pahle Dafti Ke Uss Dibbe Ka Jayeza Liya Jisme Se Murda Pareende Nikaal-Nikaal Kar Anghethi

Mein Daale Gaye The Magar Dibba Ab

Khaali Tha

Imran Dusri Taraf Muda

“Khabardaar” Achanak Usne Andhere Mein Shaukath Ki Awaaz Suni.! Tum Jo Koi Bhi Ho Apne Haath Upar Utha Lo….

Magar Uska Jumla Pura Hone Se Pahle Hi

Imran Ki Torch Bujh Chuki Thi Wo

Jhapath Kar Ek Almaari Ke Peeche Ho

Gaya

“Khabardaar Khabardaar”….Shaukath Kahe

Raha Tha Rivolver Rukh Gate Ki Taraf

Hai Tum Bhaag Nahi Sakte

Imran Ne Andaaza Kar Liya Ki Shaukath

Dheere-Dheere Switch Board Ki Taraf Jaa Raha Hai….Agar Usne Roshni Kar

Toh….? Iss Khayaal Ne Imran Ke Jism

Mein Beejli Ki Si Laher Daud Gayi Aur

Wo Tezi Se Dheeme Khadmo Se Chalta Hua

Gate Ke Khareeb Pahunch Gaya Use

Shaukath Ki Bewaqoofi Par Hasi Bhi Aa

Rahi Thi Ek Toh Itna Andhera Tha Ki Wo

Use Dekh Nahi Sakta Tha Dusra Uss

Kamre Mein Akela Ek Wahi Gate Nahi

Tha….Lekin Imran Ne Usi Gate Ko

Bhaagne Ka Raasta Banaya Jiski Taraf

Shaukath Ne Ishara Kiya Tha

Wo Bohath Hi Asaani Se Imarath Ke

Bahar Nikal Aaya Aur Fir Tezi Se Kothi

Ki Taraf Jate Waqt Usne Mud Kar Dekha

Toh Labouratory Wali Imarath Ki Saari Khidkiya Roshan Ho Chuki Thi

Rushi Ne Hairath Ke Andaaz Mein Imran Ki Taraf Dekha

Haa Main Thik Kahe raha Hu.! Imran Ne

Sar Hila Kar Kaha.! Pichli Raat

Shaukath Ne Mujhe Dhoka Diya

Tha….Shayad Use Kisi Tarah Pata Chal

Gaya Tha Ki Main Khidki Se Jhaank Raha

Hu

Rivolver Tha Uske Paas.?

Haa.! Lekin Uski Ahmiyath Nahi.! Ho

Sakta Hai Ki Wo Uska Licence Bhi

Rakhta Ho

Aur Wo Pareende Neele Hi The

Sau Feesadh.! Imran Ne Kaha.! Kuch Der Khamosh Raha Fir Bola.! Tum Pichli Raat Kaha Ghayab Thi.?

Main Usi Aadmi Saleem Ke Chakkar Mein

Gayi Thi

Haaye Rushi.! Tum Sach-Much Jasoos Hoti Jaa Rahi Ho….Bohath Khoob….Haa Toh Fir….Tumne Shayad….!

Thehro.! Batati Hu….! Maine Uske Baare

Mein Bohath Si Maalumaath Haasil Ki

Hai

Shuru Ho Jao

Uske Kuch Rishtedaaro Ne Uski Zamanath Leni Chahi Thi, Lekin Usne Use Manzoor

Nahi Kiya Iss Par Khud Police Ko Bhi

Hairath Hai

Usse Iski Wajah Zaroor Puchi Gayi Hogi

Haa, Haa.! Lekin Uska Jawaab Kuch Aisa

Hai Jo Kisi Fil Ki Kahani Bann Kar Zyada Dilchasp Sabeet Ho Sakta Hai

“Yaani”

Wo Kehta Hai Ki Main Apna Daaghi

Chehra Kisi Ko Nahi Dikhan Chahta

Maine Ek Aise Maalik Ko Dhoka Diya Hai

Jo Bohath Hi Nek, Shareef Aur

Maherbaan Tha.! Main Nahi Chahta Ki Ab

Kabhi Uska Saamna Ho Main Jail Ki

Kothri Mein Mar Jana Pasand Karunga

Acha.! Imran Bewaqoofo Ki Tarah Aankhe Faadh Kar Dekhne Laga

Main Nahi Samajh Sakti Ki Beesvi Sadhi

Mein Bhi Itne Ache Aadmi Paaye Jate

Honge.! Zaahir Hai Jo Itna Acha Hoga

Wo Chori Hi Kyun Karne Laga….Waise

Uske Jaanne Wale Kahte Hai Ki Wo Ek

Bohath Acha Aadmi Hai Aur Wo Chori

Jaisa Kaam Kar Hi Nahi Sakta, Magar

Dusri Taraf Wo Khud Hi Jurm Qabool Karta Hai

Toh Fir Uske Jaanne Walo Mein Kayi Tarah Ke Khayaal Paaye Jate Honge.?

Haa, Maine Bhi Yehi Mehsoos Kiya Hai.!

Rushi Sar Hila Kar Boli.! Kuch Log Kahte Hai Ki Yeh Sirf Kisi Qism Ka

Drama Hai
 
Lekin Kis Qism Ka Drama.? Uske Maqsadh Par Bhi Kisi Ne Roshni Daali Ya Nahi.?

Nahi, Uske Baare Mein Kisi Ne Kuch Nahi Kaha

Imran Kuch Sonchne Laga.! Fir Usne

Kaha.! Maamla Kaafi Pechida Hai

Pechida Nahi, Balki Mazaqiya Kaho.!

Rushi Muskura Kar Boli.! Saleem,

Shaukath Ka Naukar Tha Agar Shaukath

Ko Asal Mujrim Maan Liya Jaaye Toh Saleem Ke Jail Jaane Ki Baat Biljul

Be-Imaani Hui

Kisi Hadh Tak Tumhara Khayaal Bilkul

Sahi Hai

Kisi Hadh Tak Kya.? Bilkul Sahi Hai.!

Rushi Boli

Nahi, Uss Par Bilkul Ki Chaap Lagana

Thik Nahi.! Imran Kuch Sonchta Hua

Bola

Acha, Fir Tum Hi Batao Ki Use Jail

Kyun Bijhwaya Gaya

Ho Sakta Hai Ki Usne Sach-Much Chori

Ki Ho

Oho.! Kya Tumhe Wo Baat-Cheet Yaad

Nahi Jo Jail Mein Mere Aur Uske Beech

Hui Thi

Mujhe Achi Tarah Yaad Hai

“Fir”

Fir Kuch Bhi Nahi.! Mujhe Sonchne Do.! Haa, Thik Hai Use Yun Hi Samjho Maan

Lo Ki Saleem Shaukath Ke Jurm Ke Baare

Mein Jaanta Hai, Isi Liye Wo Uss Par

Chori Ka iLzaam Laga Kar Use Jail

Bijhwa Deta Hai

Agar Yahi Baat Hai.! Rushi Jaldi Se

Boli.! Toh Wo Bohath Hi Asaani Se

Shaukath Ke Jurm Ka Raaz Faash Kar

Sakta Tha Adalath Ko Wo Yeh Bata Sakta

Tha Ki Use Kis Liye Jail Bijhwaya Gaya

Hai

“Aha….Aha”.! Imran Haath Nacha Kar

Bola.! Tum Bilkul Buddhi Ho….Adalath Mein Shaukath Bhi Yehi Kahe Sakta Hai Ki Wo Apni Gardan Bachane Ke Liye Uss

Par Jhoota iLzaam Laga Raha

Hai….Aakhir Usne Giraftaar Hone Se

Pahle Hi Uske Jurm Ka Police Ko Kyun

Nahi Ittela Di….Saaf Rahe Ki Saleem Ki

Giraftaari Jameel Wale Waqaiye Ke Teen

Din Baad Hui Thi

Chalo, Main Ise Maan Leti Hu.! Rushi Ne Kaha.! Saleem Ne Mujh Se Yeh Kyun

Kaha Tha Ki Tum Mujh Ko Ghussa Nahi

Dila Sakti

Tum Khamoshi Se Saari Baat Sunti Jao.!

Imran Jhunjhula Kar Bola.! Baat Khatm

Hone Se Pahle Na Toka Karo….Main Tumhe

Saleem Ke Unn Alfaaz Ka Matlab Bhi

Samjha Dunga Aur Usi Roshni Mein Ki

Shaukath Hi Mujrim Hai, Waise Ek Baat

Saaf Hai Ki Saleem Shaukath Se Bhi

Zyada Ghagh Hai Maan Lo, Saleem Ne

Soncha Ho Ki Wo Jail Hi Mein Zyada

Mehfooz Rahe Sakega, Warna Ho Sakta

Hai Ki Shaukath Apna Jurm Chupane Ke

Liye Use Qatl Hi Kara De.! Shaukath Ne Use Iss Umeed Par Chori Ke iLzaam Mein

Jail Bijhwaya Hoga Ki Wo Uska Raaz

Zaroor Ugal Dega, Lekin Khud Bhi

Shaamil Hone Ki Bina Par Adalath Ko

Uska Yaqeen Dilana Mein Kaamyaab Na

Hoga.! Shaukath Ke Paas Iss Surat Mein

Sab Se Bada Aitraaz Yahi Hoga Ki Usne

Giraftaar Hone Se Teen Din Pahle

Police Ko Iski Khabar Kyun Nahi Di

Main Samajh Gayi….Lekin Saleem Ke Wo Jumle….Rushi Ne Fir Toka

Arey, Khuda Ghaarath Kare….Saleem Ke

Jumlo Ki Aisi-Ki-Taisi….Main Khud

Faansi Par Chadh Jaunga.! Tumhara Gala

Ghont Kar….! Haa….Mujhe Baat Poori Karne Do.! Rushi Ki Bachchi

Imran Ne Kuch Isi Qism Ke Mazaqiya

Andaaz Mein Jhallahath Zaahir Ki Thi

Ki Rushi Hass Padhi

Arey, Uss Ullu Ke Patthe Ne Bilkul

Khamoshi Apna Li….Yani Shaukath Ke

Jurm Ka Maamla Bilkul Hi Ghont Kar

Apna Jurm Qubool Liya….Ab Tum Khud

Soncho, Shaukath Ki Khala, Ki Shaukath

Par Uska Kya Asar Hua Hoga.? Zaahir

Hai Usne Yeh Zaroor Chaha Hoga Ki

Saleem Ke Uss Rawwaiye Ki Wajah Maalum Kare….Aur Dusri Taraf Saleem Ne Bhi

Yeh Soncha Hoga Ki Shaukath Uski Wajah

Maalum Karne Ki Koshish Zaroor Karega….Fir Tum Waha Jaa Pahunchi.!

Saleem Samjha Ki Tum Shaukath Hi Ki

Taraf Se Uski Thoh Mein Ayi Ho.!

Isliye Usne Tum Se Aisi Baat Ki Aur

Yaha Tak Kahe Diya Ki Tum Use Ghussa

Dila Kar Bhi Asliyath Nahi Ugalwa

Sakti….Ho Sakta Hai Ki Usne Apni

Jaankaari Mein Shaukath Ko Aur Zyada

Darane Ke Liye Tumse Iss Qism Ki Baat-

Cheet Ki Ho

“Magar”
 
Magar Ki Bachchi.! Ab Agar Tumne Koi

Naya Pench Nikala Toh Main Ek Bottle

Coco-Cola Pi Kar Humesha Ke Liye

Khamosh Ho Jaunga

Tumhara Nazariya Ghalath Bhi Ho Sakta Hai.! Rushi Ne Sanjeedhgi Se Kaha

Nahi….Main James-Bond Hu.! Imran Gala Faadh Kar Cheekha.! Mujh Se Kabhi Koi

Ghalthi Nahi Ho Sakti….Main Jute Ka

Chamda Dekh Kar Bata Sakta Hu Ki

Kabootar Ki Khaal Ka Hai Ya Mendak Ki

Khaal Ka Hai….Abhi Mujhe Docter Watson

Jaisa Koi Chugaadg Nahi Mila.! Yehi Wajah Hai Ki Main Tezi Se Tarrakhi

Nahi Kar Sakta

Acha, Maan Lo Agar Night-Club Ke

Manager Hi Ki Baat Sach Ho Toh

Mujhe Badi Khushi Hogi.! Khuda Har Ek Ko Sach Bolne Ki Salaahiyath Ata Kare

Mujh Se Be-Tooki Baate Na Kiya Karo.! Rushi Jhalla Gayi

Aye….Tum Apna Huliya Thik Karo.! Main

Tumhara Shohar Nahi Hu….Haa

Tumhe Shohar Banane Wali Kisi Gadhi Hi

Ki Pet Se Paida Hogi

Khabardaar, Agar Tumne Gadhi Ki Shaan Mein Koi Ghalath Baat Muh Se Nikaali.! Imran Garaj Kar Bola Aur Rushi Bura Sa

Muh Banaye Hue Kamre Se Bahar Nikal

Gayi

Imran Ka Ek-Ek Pal Badi Mushkil Se

Beet Raha Tha.! Uski Jaankaari Mein

Mujrim Saamne Maujood Tha.! Bas, Uske

Khilaaf Aise Saboot Haasil Karna Baaqi

Rahe Gaya Tha Jinhe Adalath Mein Pesh

Kiya Jaa Sake

Usne Shaukath Ke Paas Murda Pareende

Dekhe The Jinhe Wo Aag Mein Jala Raha

Tha….Lekin Iss Baat Ka Koi Saboot Uske

Paas Nahi Tha Aur Adalath Saboot

Maangti Hai

Parveen Shaukath Ki Chacheri Bahen Thi

Aur Nawab Jawed Mirza Ki Ek-Lauti Beti.! Zaahir Hai Ki Nawab Ke Baad Unki Jaidaad Ki Maalik Wahi Hoti.!

Shaukath Bhi Kabhi Jaidaad Ka Maalik Tha, Lekin Uski Jaidaad Sientific Tajoorbe Mein Ghoos Gayi….

Isliye Wo Dobara Apni Maali Haalaath

Sudhaarne Ke Liye Parveen Se Shaadi Ke

Khwaab Dekh Sakta Tha.! Imran Ne Apna

Yeh Khayaal Captain Fayaz Par Zaahir Kiya Jise Usne Taar De Kar Khaas Taur

Se Sadargarh Bulaya Tha

Magar.! Imran.! Fayaz Ne Kaha Tha.!

Yeh Zaroori Nahi Ki Parveen Ki Shaadi

Iss Waqaiye Ke Baad Shaukath Hi Se Ho

Jaaye.! Agar Jawed Mirza Ko Uski

Shaadi Apne Bhateejo Hi Mein Se Kisi Ke Saath Karni Hoti Toh Baat Jameel

Tak Kaise Pahunchti

Tum Apni Jagah Thi Kahe Rahe Ho.!

Imran Bola.! Lekin Mere Paas Aur Bhi

Daleele Hai Jinki Bina Par Mera

Nazariya Wahi Rahega

Acha, Mujhe Batao….Ab Tumhari Daleele

Kya Hai

Insaani Fithrath Ki Roshni Mein Ise

Dekhne Ki Koshish Karo.! Yeh Insaani

Fithrath Hoti Hai Ki Hum Niji Sukh-

Chain Chahte Hai Har Maamle Mein Lekin Haalaath Ke Saath Hi Usse Haasil Karne

Ka Tareeqa Bhi Badalta Rehta Hai.!

Shaukath Agar Parveen Se Shaadi Kar Lega Toh Usse Utna Hi Sukoon Milega

Jitna Usko Uske Dusre Mangetaro Ki

Shakl Bigaadhne Par Milta Hai

Fayaz Kuch Der Sonchta Raha Fir Dheere

Se Bola.! Tum Thik Kahte Ho

Main Jhak Maar Raha Hu Aur Tum Bilkul Gadhe Ho.! Tabhi Imran Ka Mood Bigadh

Gaya

Kya.! Fayaz Use Hairaani Se Ghoorne

Laga

Kuch Nahi Main Sirf Yeh Kehna Chahta

Tha Ki Tum Iss Vibaagh Ke Liye Thik

Nahi Ho Istifa De Kar Meri Firm Mein

Naukri Kar Lo.! Talaaq Ke Hisaab Se

Commision Alag….Yani Usse Aur

Tankhwaah Se Koi Matlab Na Hoga

Imran Pyare, Kaam Ki Baat Karo.! Fayaz

Badi Sharmindgi Se Bola.! Main Chahta

Hu Ki Tum Iss Maamle Ko Jald-Se-Jald Nipta Kar Wapas Chalo….Waha Bhi Kayi

Musibathe Tumhara Intezar Kar Rahi Hai

Haaye.! Kahi Meri Shaadi Toh Nahi Taaye Kar Di….!

Khatm Karo.! Fayaz Haath Utha Kar Bola.! Shaukath Wale Nazariye Ke Alawa Kisi Aur Ka Bhi Imkaan Hai Ya Nahi….
 
Hai Kyun Nahi….Yeh Harkath Jameel Ke Chacha Ya Mamu Ki Bhi Ho Sakti Hai

Haa, Ho Sakti Hai Magar Main Iss Par

Yaqeen Karne Ke Liye Tayyaar Nahi

Sirf Isliye Ki Sajjad Se Tumhare Dostana Talooqath Hai.! Kyun.?

Nahi.! Yeh Baat Nahi.! Unme Se Har Ek

Mere Liye Khuli Hui Kitaab Hai.! Unme Koi Bhi Itna Aqalmand Nahi Hai….

Khair, Mujhe Isse Bahez Nahi Hai.!

Maine Jiss Kaam Ke Liye Bulaya Hai,

Use Suno.! Imran Ne Kaha Aur Khamosh

Ho Kar Kuch Sonchne Laga

Thodi Der Baad Fir Bola.! Saleem Ka

Qissa Sunn Hi Chuke Ho.! Main Chahta

Hu Ki Kisi Tarah Use Jail Se Bahar

Laya Jaye

Bhala Yeh Kaise Ho Sakta Hai.?

Koi Surat Nikaalo

Aakhir Usse Kya Hoga.?

Bachcha Hoga Aur Tumhe Mamu Kahega.! Imran Jhalla Kar Bola

Na-Mumkin Hai Yeh Kisi Tarah Nahi Ho

Sakta

“Bachcha”.! Imran Ne Pucha

Bako Mat.! Main Saleem Ki Rihayi Ke

Baare Mein Kahe Raha Hu.! Wo Chori Ke

Jurm Mein Bandh Hai Use Khanoon Ke

Supurd Karne Wala Shaukath Hai.! Jab

Tak Ki Wo Khud Adalath Se Uski Rihayi

Ki Apeal Na Kare Aisa Nahi Ho Sakta

Main Bhi Itna Jaanta Hu

Iske Ba-Wajood Bhi Iss Qism Ke

Bewaqoofo Jaise Khayaal Rakhte Ho Agar Wo Riha Nahi Ho Sakta Toh Fir

Asal Mujrim Ka Haath Aana Bhi Mushkil

Hai

Aakhir Shaukath Ke Khilaaf Saboot Kyun Nahi Muhaiya Karte….

Mujhe Yeh Sab Kuch Bandal Maalum Hota

Hai….Khaas Taur Par Pareendo Ki Kahani

Fir Shaukath Unn Murda Pareendo Ko Aag

Mein Kyun Jala Raha Tha.? Fayaz Ne

Kaha

Wo Jhak Maar Raha Tha.! Use Jahannum Mein Daalo.! Lekin Kya Tum Kisi Aise Pareende Ke Wajood Par Yaqeen Rakhte

Ho Jiske Chonch Maarne Se Aadmi Kodi

Ho Jaye Aur Uske Jism Mein Aise Virus

Paaye Jaye Jo Saari Duniya Ke Liye

Bilkul Naye Ho.! Zaahir Hai Ki Safed Daagho Ke Wahi Virus Hai

Ho Sakta Hai Kisi Scientific Tareeqe

Se Unn Pareendo Mein Uss Qism Ke Asar

Paida Kiye Gaye Ho

Acha….Acha….Yani Tum Bhi Yehi Samajhte

Ho.! Iska Yeh Matlab Hua Ki Har Aadmi

Kisi Aise Scientific Tareeqe Ke Baare

Mein Sonch Sakta Hai.! Toh Samjho

Shaukath Bilkul Buddhu Hai Usne Jaan-

Boojh Kar Apni Gardan Faswayi Hai Sara Sadargarh Iss Baat Ko Jaanta Hai Ki

Shaukath Ek Aqalmand Scientist Hai Aur

Virus Uska Khaas Topic Hai

Fir Wo Murda Pareende….!

Main Kehta Hu Iss Baat Ko Khatm Hi Kar Do Toh Acha Hai.! Saleem Ki Rihayi Ke

Baare Mein Soncho

Wo Aisa Hai Jaise Machchar Ke Pet Se

Haathi Paida Karna

Tab Fir Asal Mujrim Ka Haath Aana Bhi

Mushkil Hai….Aur Main Apna Bistar Gol

Karta Hu

Tum Khud Hi Koi Tareeqa Kyun Nahi

Sonchte.! Fayaz Jhunjhula Kar Bola

Main Sonch Chuka Hu

Toh Fir Kyun Jhak Maar Rahe Ho.! Mujhe

Batao Kya Soncha Hai

Uske Kisi Rishtedar Ko Zamanath Ke Liye Tayyaar Karao

Magar Wo Zamanath Par Riha Hone Se

Inkar Karta Hai

Uske Inkar Se Kya Hota Hai….Main Use

Adalath Mein Jhakki Sabeet Kara Dunga

Aur Fir Use Iss Baat Ki Ittela Dene Ki

Zaroorath Nahi Hai Ki Uski Zamanath

Hone Wali Hai Itna Toh Tum Kar Hi

Sakoge Ki Jail Se Adalath Tak Laane Se

Pahle Uss Par Yeh Zaahir Kiya Jaye Ki Muqadme Ki Peshi Ke Silsile Mein Use

Le Jaya Jaa Raha Hai

Haa, Yeh Ho Sakta Hai

Ho Nahi Sakta, Balki Use Kal Tak Ho

Jana Chahiye.! Imran Ne Ek-Ek Lafz Par

Zor De Kar Kaha
 
ज़मानत हो जाने के बाद भी सलीम अदालत से नहीं टला। उसके चेहरे पर परेशानी के आसार थे। वह अदालत ही के एक बरामदे में टहल रहा था और कभी-कभी ख़ौफ़नाक आँखों से इधर-उधर भी देख लेता था।

इमरान उसके लिए बिलकुल अजनबी था, इसलिए उससे बहुत क़रीब रह कर भी उसकी हालत का जायज़ा कर सकता था।

शाम हो गयी और सलीम वहीं टहलता रहा। जिसने उसकी ज़मानत दी थी, वह हथकड़ियाँ खुलने से पहले ही अदालत से खिसक गया था।

फिर वह वक्त भी आया जब सलीम उस बरामदे में बिलकुल अकेला रह गया। इमरान भी अब वहाँ से हट गया था, लेकिन अब वह ऐसी जगह पर था जहाँ से वह उसकी निगरानी आसानी से कर सकता था। सलीम को शक करने का मौका दिये बगैर।

अदालत में सन्नाटा छा जाने के बाद सलीम वहाँ से चल पड़ा। इमरान उसका पीछा कर रहा था। सलीम ने टैक्सियों के अड्डे पर पहुँच कर एक टैक्सी की। इमरान की टू-सीटर भी वहाँ से दूर नहीं थी।

बहरहाल, पीछा जारी रहा। लेकिन इमरान महसूस कर रहा था कि सलीम की टैक्सी यूँ ही बेमक़सद शहर की सड़कों के चक्कर काट रही है। फिर अँधेरा फैलने लगा। सड़कों पर बिजली की रोशनी चमकने लगी। इमरान ने सलीम का पीछा नहीं छोड़ा। वह अपना पेट्रोल ड्कता रहा।

जैसे ही अँधेरा कुछ और गहरा हुआ अगली टैक्सी जैक्सन रोड पर लगी और इमरान ने जल्द ही अन्दाज़ा कर लिया कि उसका रुख़ नवाब जावेद मिर्जा की हवेली की तरफ़ है।

दोनों कारों में लगभग चालीस गज़ का फ़ासला था और यह फ़ासला इतना कम था कि सलीम को पीछा किये जाने का शक ज़रूर हो सकता था। हो सकता है कि सलीम को पहले ही शक हो गया हो और वह टैक्सी को इसीलिए इधर-उधर चक्कर खिलाता रहा हो।

जावेद मिर्जा की हवेली से लगभग एक फ़रलाँग इधर ही टैक्सी रुक गयी। लेकिन इमरान ने सिर्फ़ रफ़्तार कम कर दी....कार नहीं रोकी। अब वह धीरे-धीरे रेंग रही थी।

सड़क सुनसान थी। टैक्सी वापसी के लिए मुड़ी। इमरान ने उसे रास्ता दे दिया।

अपनी कार की अगली लाइट में उसने देखा कि सलीम ने बेतहाशा दौड़ना शुरू कर दिया है। इमरान ने अपनी रफ़्तार तेज़ कर दी....और साथ ही उसने जेब से कोई चीज़ निकाल कर बाहर सड़क पर फेंकी। एक हल्का-सा धमाका हुआ और सलीम दौड़ते-दौड़ते गिर पड़ा, लेकिन फिर फ़ौरन ही उठ कर भागने लगा....फिर इमरान ने उसे जावेद मिर्जा के बाग़ में छलांग लगाते देखा....

इमरान की कार फ़र्राटे भरती हुई आगे निकल गयी....लेकिन अब उसकी सारी लाइटें बुझी हुई थीं।

दो फ़रलाँग आगे जा कर इमरान ने कार रोकी और उसे एक बड़ी-सी चट्टान की ओट में खड़ा कर दिया। अब वह पैदल ही बाग़ के उस हिस्से की तरफ़ जा रहा था जहाँ लेबोरेटरी वाली इमारत थी। अचानक उसने एक फ़ायर की आवाज़ सुनी जो उसी तरफ़ से आयी थी। जिधर लेबोरेटरी थी....फिर दूसरा फ़ायर हुआ और एक चीख़ सन्नाटे का सीना चीरती हुई अँधेरे में डूब गयी....इमरान ने पहले तो दौड़ने का इरादा किया फिर रुक गया....अब उसने लेबोरेटरी की तरफ़ जाने का इरादा भी छोड़ दिया था वह जहाँ था वहीं रुका रहा। जल्द ही उसने कई आदमियों के दौड़ने की आवाजें सुनीं। उनमें हल्का-सा शोर भी शामिल था....इमरान कार की तरफ़ पलट गया उसका जेहन बहुत तेज़ी से सोच रहा था।

 


लेकिन अचानक उसके जेहन में एक नया ख़याल पैदा हुआ। क्या वह अकेले में भी बेवकूफ़ी करने लगा है? क्या वह बेवकूफ़ी नहीं थी? उसने फ़ायरों की आवाजें सुनीं और वह चीख़ भी किसी ज़ख़्मी ही की चीख़ मालूम हुई थी। फिर आख़िर वह कार की तरफ़ क्यों पलट आया था....उसे आवाज़ की तरफ़ बेतहाशा दौड़ना चाहिए था....

इमरान ने कार स्टार्ट की और फिर सड़क पर वापस आ गया....कोठी के करीब पहुँच कर उसने कार बाग़ की तरफ़ मोड़ दी और उसे सीधा पोर्च में लेता चला गया।

जावेद मिर्जा कोठी से निकल कर पोर्च में आ रहा था। उसकी रफ़्तार तेज़ थी चेहरे पर हवाइयाँ उड़ रही थीं....और हाथ में राइफ़ल थी।

“खैरियत नवाब साहब!” इमरान ने हैरत ज़ाहिर की।

“ओह....सितवत जाह....इधर....!'' उसने लेबोरेटरी की तरफ़ इशारा करके कहा। “कोई हादसा हो गया है....दो फ़ायर हुए थे....चीख़....भी....आओ....आओ....!"

जावेद मिर्जा उसका बाजू पकड़ कर उसे भी लेबोरेटरी की तरफ़ घसीटने लगा....!

कोठी के सारे नौकर लेबोरेटरी के क़रीब इकट्टा थे। सफ़दर, इरफ़ान और शौकत भी वहाँ मौजद थे। शौकत ने जावेद मिर्जा को बताया कि वह अन्दर था। अचानक उसने फ़ायरों की आवाजें सुनी....फिर चीख़ भी सुनाई दी....बाहर निकला तो अँधेरे में कोई भागता हुआ दिखाई दिया लेकिन उसके सँभलने से पहले ही वह गायब हो चुका था...

“और....लाश!" जावेद मिर्जा ने पूछा।

"हम अभी तक किसी की लाश ही तलाश करते रहे हैं!” इरफ़ान बोला।

"लेकिन अभी तक कामयाबी नहीं हुई।"

“लाश!” इमरान धीरे से बड़बड़ा कर चारों तरफ़ देखने लगा।

___“तुम अब यहाँ अकेले नहीं रहोगे समझे!" जावेद मिर्जा शौकत की कन्धा झिंझोड़ कर चीख़ा।

शौकत कुछ न बोला। वह इमरान को घूर रहा था।

“कोई भूत-प्रेत ही होगा....मेरा दावा है....!'' इमरान मुक्का हिला कर रह गया।

"आप इस वक्त यहाँ कैसे?" शौकत ने उससे पूछा।

“शौकत तुम्हें बात करने की तमीज़ कब आयेगी!" जावेद मिर्जा ने झल्लायी हुई आवाज़ में कहा और इमरान हँसने लगा....अचानक उसके दायें गाल पर दो तीन गर्म गर्म बँदें फिसल कर रह गयीं और इमरान ऊपर की तरफ़ देखने लगा। फिर गाल पर हाथ फेर कर जेब से टॉर्च निकाली। उँगलियाँ किसी चीज़ से चिपचिपाने लगी थीं। ____ टॉर्च की रोशनी में उसे अपनी उँगलियों पर खून दिखा....ताज़ा खून....

सब अपनी अपनी बातों में लगे थे। किसी का ध्यान इमरान की तरफ़ नहीं था....

इमरान ने एक बार फिर ऊपर की तरफ़ देखा वह एक पेड़ के नीचे था और पेड़ का ऊपरी हिस्सा अँधेरे में गुम था।

"लेकिन....हमें यहाँ किसी के जूते मिले हैं!” सफ़दर कह रहा था। “शायद भागने वाला अपने जूते छोड़ गया है।'' उसने पेड़ के तने की तरफ़ टॉर्च की रोशनी डाली....जूते सचमुच मौजूद थे। इमरान आगे बढ़ कर उन्हें देखने लगा, लेकिन सफ़दर ने टॉर्च बुझा दी और इमरान को अपनी टॉर्च जलानी पड़ी।

“ख़त्म करो ये किस्सा! चलो यहाँ से!'' जावेद मिर्जा ने कहा। “शौकत, मैं तुमसे ख़ास तौर पर कह रहा हूँ तुम अब यहाँ नहीं रहोगे।"

“मेरे लिए खतरा नहीं है।' शौकत बोला।

“है क्यों नहीं!" इमरान बोल पड़ा। “मैं भी आपको यही मशविरा दूँगा।"

“मैंने आपसे मशविरा नहीं माँगा है।"

 
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