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पतझड़ के बाद

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पतझड़ के बाद

सुहाग के सेज पर बैठी दुल्हन, आँखो में हजारों ख्याल सजाए, उमंगो भरा दिल लिए, कितनी चाहत और अरमानों के साथ अपने हमसफ़र का इंतजार करती है, मगर वह शायद पहली ऐसी दुल्हन है जो बेहद गुस्से में बैठी आने वाले पलों के बारे में सोच रही थी।

उसके पास बैठी उसकी दीदी की बेटी उसकी चुप्पी से उकता कर बाहर चली गयी। उसके बाहर जाते ही दरवाजा अंदर से बंद करने की आवाज आती है।

उसने बड़ी-बड़ी, काली, जादुई आँखो से सामने खड़े आदमी को देखा तो दिल के सिंघासन पर विराजमान हीरों जैसी पर्सनाल्टी वाले जीवनसाथी की तस्वीर चकनाचूर होकर बिखर गयी। उसकी हमेशा से ख्वाहिश थी कि उसका जीवनसाथी उसी की तरह बेहद ही खूबसूरत हो, पर आज उसका सपना चूर-चूर हो गया था।

मयंक ने अपनी परियों जैसी बेहद ही खूबसूरत दुल्हन को देखा। वो घूंघट हटाये उसे ही देख रही थी। उसकी आँखों में नयी दुल्हन की कोई शर्माहट नहीं थी। खिड़की से चाँद आज कुछ

उदास दिख रहा था। वो उसके पास बैठकर उसका हाथ अपने हाथों में पकड़ता है और चूम लेता है।

" जानती हो आज तुम चाँद से भी ज्यादा रौशन और खुबसूरत दिख रही हो।" मंयक ने उसकी ठोड़ी को पकड़ कर अपनी ओर मोड़ा तो वह गुस्से से 'और तुम चाँद पर गहन' सोचते हुए उसका हाथ झटक कर उठ खड़ी हुयी।

मंयक ने आश्चर्य से उसका ये अंदाज देखा।

"मुझे चेंज करना है, वाशरूम कहाँ है??" वो हाथ से दूसरी ओर इशारा कर

देता है। वह यह भी नहीं कह सका कि कुछ देर अभी रूक जाओ। मुझे तुम्हारे इस रूप को जी भर कर देख तो लेने दो।

आईने के सामने जाकर उसने सारा गहना-जेवर नोंच-नोंच कर फेंक दिया और अलमारी से सादा कॉटन का सूट निकाल कर बाथरूम में घुस गयी।

पूरे आधे घंटे बाद जब वो बाहर आयी तो मंयक को अपना इंतजार करते पायी। वो दिल में हैरान रह गयी। वो तो सोच रहीं थीं, मंयक कब का सो चुका होगा। पर वो सोये या जागे उसे क्या फर्क पड़ता है। सोचते हुए बेडरूम की तरफ देखा। कमरा काफी बड़ा था। वो अपना

तकिया लेकर सोफे पर सोने का सोच रहीं थीं।

बेड से तकिया उठाकर सोफे की तरफ मुड़ने ही वाली थी कि मंयक ने उसका इरादा भांपते हुए उसका नाजुक हाथ थाम कर अपने करीब बैठा लिया "तुम मेरे साथ ऐसा क्यो कर रही हो ज्योति?

"जब मैंने कहा था कि मुझे आपसे शादी नहीं करनी तो आपने मना क्यों नहीं किया? क्यों की ये शादी??" उसकी मासूमियत पर वो दाँत पीसते हुए बोली।

"मगर तुम्हें मुझसे शादी से क्या प्रोब्लेम

है?"

" वह मैं आपको बताना जरूरी नहीं समझती।" कहकर वहीं बेड पर सोते हुए चादर तान ली। अंदर से उसका दिल जल रहा था।

"ऊन्ह !! प्रोब्लेम इन्होंने शायद कभी आईने को नहीं देखा है।" पिछले दिनों को सोचते हुए उसकी आँखे भर आयी। दिल के आईने पर लगी खूबसूरत हमसफ़र का ख्वाब जो टूटा था।

वो एक खूबसूरत सी शाम थी जब वो अपने घर के लॉन में खरगोशों से खेल रहीं थीं। सब घर में कामों में व्यस्त थे,

पर उसे घर के कामों से कोई मतलब ना था। मेन गेट का दरवाजा खुला हुआ था जिससे मौका पाकर दोनों खरगोश भागने लगे, एक को तो उसने पकड़ लिया था। दूसरा छलांग लगाते हुये बाहर की ओर भाग गया था। वह उसे पकड़ने लपकी फिर ठिठक कर रूक गयी।

सामने एक ब्लैक हुन्डई गाड़ी वहां रूकी और उसमें से एक आदमी निकल कर खरगोश को पकड़ कर उसे थमाता है "आपका खरगोश।"

वो पलके झपकाना भूल जाती है उसे देखकर। उसने आजतक किसी मर्द को इतना खूबसूरत नहीं देखा था। वह

खरगोश थामते हुए उसे देखती रही। उसके होंठ आपस में चिपके ही रह गये, शुक्रिया तक ना कह सकी। वह आदमी वापस पलट कर मुस्कुराते हुए उसे गौर से देखकर चला जाता है।

वह खड़ी उसे देखती रही। यहां तक की जब बारिश की तेज बूंदो ने उसे एहसास दिलाया कि वह जा चुका है तो वह भींगती हुयी दौड़कर घर में घुस गयी। उन्हीं दिनों उसकी बड़ी दीदी अपने डाक्टर देवर का रिश्ता लेकर चली आयी।

अब भला इतना अच्छा लड़का कौन हाथ से जाने देता, सो चट मंगनी और

पट ब्याह की तैयारी शुरू हो गयी।

मंयक अच्छा तो था पर उसे वो ब्लैक हुन्डई वाला खूबसूरत आदमी चाहिए था। उसने घर में खूब हो-हंगामा मचाया पर किसी ने उसकी एक ना सुनी। वो दो भाई और तीन बहनें थी। सबकी शादियाँ हो चुकी थी, इसीलिए अब इसकी बारी थी। सबसे छोटी होने के कारण वह सबके आँखो का तारा थी पर इस शादी से इंकार करने में किसी ने उसका साथ नहीं दिया।

तंग आकर ज्योति ने मंयक को ही फोन लगा लिया और उसे शादी से इंकार करने कहा।

मंयक उसकी फरमाइश सुनकर अजीब उलझन में पड़ गया। कैसा अटपटा और फिल्मी सा लग रहा था। कितनी मुश्किल से सबको राजी किया था शादी कराने के लिए, अब जो इंकार करेगा तो भाई के ससुराल वालों से रिश्ता टूट जायेगा। फिर तो उसकी मोहिनी सी सूरत का वह दीवाना हो चुका था, पीछे हटना तो बहुत मुश्किल था।

वो इस उम्मीद, पर कि ज्योति खुद ही इंकार कर देगी, चुप रह गया, मगर ऐसा नहीं हुआ। दोनों एक-दूसरे के इंकार का इंतजार करते रह गये और शादी हो भी गयी जिसे मंयक ने दिल की गहराइयों से स्वीकार किया था और वह ये रिश्ता

निभाने के बिलकुल भी मूड मे नहीं थी।

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पिछले दो घंटों से वह बालकनी में सिगरेट फूंक रहा था। आसमान का चाँद भी उसका मजाक उड़ाता महसूस हो रहा था जैसे उसकी हालत पर मजा उठा कर अपनी बेइज्जती का बदला ले रहा हो। अभी कुछ देर पहले उसने अपने ज्योति को चाँद से भी ज्यादा रौशन और खुबसूरत जो कहा था।

"आह !! ज्योति के नाम पर उसके दिल

में टीस सी उठी थी।

वो उसकी भाभी की बहन थी। वो जब भी उसकी भाभी यानी अपनी बहन से मिलने आती थी, सबसे खूब बात करती थी, पर मयंक से एक दूरी बना कर रखती थी। जब वो ज्योति को देखता था तो उसका दिल अजीब ही लय में धड़कने लगता था। यहीं वजह थी कि जब घर में उसकी शादी की बात चली तो उसने भाभी को ज्योति का नाम बता दिया।

भाभी थोड़ी उलझन में पड़ गयी। ज्योति उसकी बहन थी पर वो बहुत ही जिद्दी, घमंडी और मुँहफट लड़की थी। वो खुद तो बेहद खूबसूरत थी ही साथ ही अपने

आस-पास भी खूबसूरत लोगों को ही ढूढती थी, इसीलिए वो मयंक से ज्यादा बातचीत नही करती थी। मयंक बहुत ही शांत, ठंडे मिजाज का सुलझा हुआ लड़का था। वो दिखने में सामान्य सा ही था, पर उसका दिल बहुत साफ था। अपनों के प्रति उसका स्वभाव हमेशा मदद करने वाला होता था

सबने घर में मयंक को काफी समझाया पर वो नहीं माना। इस तरह वो दुल्हन बन कर आज उसके कमरे को रौशन कर रहीं थीं। उसने पलट कर ज्योति की ओर देखा। वो सोती हुयी बहुत ही प्यारी और मासूम सी लग रही थी।

शादी की अगली सुबह दरवाजे पर लगातार होने वाली दस्तक से मंयक की नींद टूटी तो उसने घड़ी की ओर नजर डाली जो दिन के दस बजा रहे थे। वह बड़बड़ा कर उठा तो नजरें सोफे पर

सोयी ज्योति से उलझ गयी। वो भी जाग गयी थी और उसकी ओर ही देख रही थी।

"ज्योति" उसने पास आकर पुकारा।

"क्या है??" वह उसे सर पर सवार देख झुन्झलाई।

"उठो और बेड पर जाकर सो। मुझे सबके सामने कोई तमाशा नही चाहिए।" अजीब वार्निंग वाला अंदाज था।

वह उठ गयी पर मंयक का सख्त लहजा उसे बेहद बुरा लगा। दीदी उन दोनों के लिए नाश्ता लायी थी जो वो टेबल पर

रख कर दोनों को करने बोल गयी।वह फ्रेश हो कर टेबल पर आ बैठा।

"नाश्ते में तुम क्या लोगी।" उसने खामोश बैठी ज्योति से पूछा।

"जहर" वह काट खाने को दौड़ी।

"वह तो इस वक्त उपलब्ध नहीं है, फिलहाल ब्रेड और बटर से काम चलाओ। हलवा पूरी भी है खाना चाहों तो कोई पाबंदी नहीं है। अगर इस जहर के सिवा कुछ और खाने का दिल करे तो बंदा हाजिर है।" वह उसके भींगे-भींगे चेहरे को प्यार से देखते हुए मुस्कुरा कर बोला।

ज्योति का जी चाहा इस शख्स का गला दबा दे। उसके होंठ गुस्से से फड़फड़ा रहे थे, पर और ज्यादा भूख उसकी बर्दास्त के बाहर था। वो नाश्ते पर टूट पड़ी।

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"ज्योति!! मैंने तुम्हारी साड़ी निकाल दी है। तुम तैयार हो जाओ, पड़ोस वाले तुम्हें देखने आयेंगे।" दीदी उसके लिए भारी कामदार लाल साड़ी लेकर आयी थी।

"सॉरी दीदी!! आपने बेकार में मेहनत की। आपको पता है ना मैं दूसरों की

पसंद की चीजे नहीं पहनती।" मुँह चमकाते हुए उसने कहा और उठ कर अलमीरा से खुद की पसंद का हल्का कामदार साड़ी निकालने लगी।

भाभी के चेहरे का रंग एक मिनट के लिए बदला फिर वह जताती हुयी निगाह मयंक पर डालकर बाहर चली गयी।

मयंक ने डांटना चाहा था "ज्योति!!तुम्हे भाभी से ऐसे बात नहीं करनी चाहिए थी। वो तुम्हारी सगी बहन है। कितना बुरा लग उनको।"

" ऐसे से क्या मतलब है आपका?? उसने तीखी नजरों से उसे घूरते हुए

कहा।

"तुम अच्छी तरह जानती हो, अपने बोलने के अंदाज को और मेरे मतलब को भी।

" मुझे अपनी पर्सनल लाइफ में दूसरों की मर्जी चलाना बिलकुल भी पसंद नहीं है।"

" वो दूसरे नहीं मेरे और तुम्हारे अपने है।"

" मेरी सिर्फ दीदी है जिन्होंने मेरी एक नहीं सुनी तो अब मैं भी किसी की कुछ नहीं सुनुंगी।" कहकर बाथरूम में घुस

गयी।

मयंक के कान गुस्से से लाल हो गये।

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आज उनदोनों का रिशेप्सन था, जो एक बहुत बड़े होटल में रखी गयी थी। घर के सब लोग पहले ही वहाँ जा चुके थे। वहाँ पूरी तैयारियां हो चुकी थी और इन दोनों का इंतजार हो रहा था।

जब वह शेव करके निकला तो ज्योति हरी साड़ी पहने बिलकुल तैयार थी। मयंक ने बड़े शौक से उसके लिए हरी

साड़ी रिशेप्सन के दिन पहनने के लिए खरीदा था। वो उसे हरी साड़ी में देखने के लिए बेचैन था इसीलिए उसने ज्योति से लाल साड़ी पहनने कहा, जानता था लाल के उलट काला या हरा वो पहनेगी। अब उसकी मर्जी के अनुसार रिजल्ट सामने था। उसके चेहरे पर मुस्कान उमड़ आयी।

"बहुत सुन्दर और अच्छी लग रहीं हो।" वो उसे आँख मारते हुए कहकर खुद तैयार होने लगा। वो तो जल-भुन ही गयी, पर उम्मीद के खिलाफ चुप रहीं।

सिग्नल पर जब गाड़ी रूकी तो गजरे वाले से गजरे खरीद कर उसकी तरफ

बढाए, पर वो चेहरा घुमाएं बैठी रही।

" ज्योति!! मुझे लगता है हमें एक-दूसरे को समझने के लिए थोड़ा वक्त चाहिए। हम लोग दोस्त की तरह भी तो रह सकते है।" वो उसकी ओर एक हाथ से ड्राइव करते हुए दूसरा हाथ उसकी हाथ पर रखता है।

"थोड़ा वक्त साथ गुजारने से क्या मुझे आपसे मुहब्बत हो जायेगी??" वो उसका हाथ झटकते हुए मुंह चमकाते हुए बोलती है।

" आई थिंक।" वो मुस्कुरा कर बोला।

"नेवर" वो उसकी मुस्कुराहट से चिढ गयी थी।

" चलो मैं प्रार्थना करूंगा कि तुम्हें मुझसे मुहब्बत हो जाएँ , सुना हैं प्रार्थना में बहुत शक्ति होती है।

" ख्वाबों पर कोई रोक नहीं है।"

" ख्वाब भी तो तुम्हारे ही है।" वह कहाँ खामोश रहने वाला था।

ज्योति ने गुस्सा कर मोबाइल निकाल लिया और मेसेज चेक करने लगी।

"काश मैं मोबाइल होता। तुम मुझे

अपने नाजुक हाथों से चलाती। मैं उसकी खुशबू से महक उठता।" वो कह कर गुनगुनाने लगता है। वह चिढकर मुँह घूमा लेती है।

होटल पहुँच कर उनका भव्य स्वागत किया जाता है। रिशेप्सन हॉल में उन दोनों को बैठा दिया जाता है। सब लोग उन्हें देखकर राम-सीता की जोड़ी कहते हैं। मयंक के माता-पिता बहुत खुश है, बेटे की शादी से। उसकी इच्छानुसार वो चेहरे पर नकली हँसी का खोल चढाए रहती है पर मयंक बहुत ही खुश है। वो सबसे हँस कर आशीर्वाद लेता है। देर रात तक फंक्शन चलता है। सब लोग सुबह घर आ जाते हैं।

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मयंक मिलिट्री में डाक्टर था। शादी से दो महीने पहले उसकी पोस्टिंग पूना में हुयी थी। छुट्टियाँ खत्म होने के कारण आज उसे जाना था। ज्योति तो उसके साथ नहीं जाना चाहती थी। मयंक को पूना में घर मिला हुआ था तो सास-ससुर के जिद्द पर उसे भी उसके साथ दिल्ली से पूना शिफ्ट होना पड़ा।

आज उनका इस घर में पहला दिन था। शाम हो चुकी थी। मयंक होटल से खाना पैक करवा लाया। सुबह ड्यूटी पर भी

जाना था। खाने के बाद उसे डायनिंग हॉल में किसी किताब पढते देख वह सोने के इरादे से बेडरूम में चला आया था। नींद की हसीन वादियों में सफर करतें हुए कोई चीज जो से उसके सर से लगी। वह बड़बड़ा कर उठा बैठा। कुशन अब जमीन पर गिर चुका था और वह मुसीबत बन उसके सर पर खड़ी थी।

" अपना बिस्तर जमीन पर लगाइए।"

"क्यों??"

मयंक का यह सवाल सुन ज्योति का दिमाग सुलग ,उठा-- "क्योंकि इस घर में एक ही बेड है।"

" हाँ, और तुम्हें इस बेड पर सोना पसंद नहीं है तो जमीन पर बिस्तर तुम लगाओ वर्ना चाहो तो यहाँ भी सो सकती हो, मुझे कोई प्रोब्लेम नहीं है। मुस्कुरा कर कहते हुए सर से पांव तक चादर तान ली।

कुछ देर तो वह खड़ी उसे घूरती रही फिर जाकर घर की सारी खिड़कियाँ खोल दी। घर के पीछे झरना था जिससे पानियों का शोर आता था।

" खिड़की बंद करों, मैं डिस्टर्ब हो रहा हूँ।" चादर उसे उतारनी पड़ी।

"आप डिस्टर्ब हो रहें हैं तो डायनिंग हॉल में सोइए। मुझे पानी की आवाज सुनना अच्छा लगता है।" बेड के किनारे बैठ टांगे झूलाते हुए वह मजे लेकर बोली।

मयंक ने दोनों कुशन उठा कर कानों को ढक लिया। वो गुस्से से बेड के दूसरी ओर अपना तकिया बीच में रखकर सो गयी।

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"अब उठ भी जाओं, मैं लेट हो रहा हूँ, नाश्ता नहीं मिलेगा क्या??" मयंक ने टाई ठीक कर, बालों में कंघी करते,

परफ्यूम स्प्रे करते हुए कोई दसवीं बार उसे आवाज दी थी।

"देखिए मुझे सुबह दस बजे से पहले उठने की आदत नहीं है और अपने सजने-संवरने का काम लाउंज किया कीजिये। सारी नींद खराब कर दी।" वो बड़बड़े हुए करवट बदल कर फिर सो गयी।

मयंक ने उसका हाथ पकड़ कर खींचते हुए किचन में ला खड़ा किया। उसकी कितनी ही चूड़ियाँ टूट कर बिखर गयी।

"अगले दस मिनट में मुझे नाश्ता तैयार चाहिए।" कहकर अपने बैग पैक करने

बेडरूम में चला गया।

"जाहिल, आवारा, जंगली।" वह अपना गुस्सा बर्तनो को पटक-पटक कर निकालती रहीं।

चाय का एक घूंट पीते ही वो दौड़कर बेसिन में फेंक आया। ब्रेड अलग जले हुए थे

" क्या बदतमीज़ी है यह??ये नाश्ता है क्या??" उसका मूड खराब हो चुका था।

" मुझे ऐसा ही नाश्ता बनाने आता है, कहिए तो कल से रोज बना दूँ?" उसकी अदाकारी देखने लायक थी।

"शुक्रिया" मयंक वहीं जली हुई ब्रेड और नमक वाली चाय पीकर ऑफिस चला गया।

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आज उसका दिन, बहुत बोर गुजरा। आखिर सोती भी तो कितना!! रेलिंग से सट कर खड़ी झरनों के पानियों को घर के खिड़की से देखती रही। शापिंग का मूड हुआ तो मॉल चली आयी। यहां काफी भीड़ थी। उसने सुबह से कुछ नहीं खाया था, इसीलिए पहले मॉल के ही रैस्टोरेंट में जाकर पेट भर खाना खायी फिर कपड़े की ओर देखने लगी।

कुछ कपड़े पसंद आये तो ट्राली में डालती गयी। उसी समय पीछे से आवाज आयी

" हैलो मिस

वह पलटी और अपनी जगह जम सी गयी।

वह एक बार फिर से उसके सामने खड़ा था। हकीकत था या ख्वाब लेकिन नहीं, वह सच ही में तो सामने खड़ा था, अपनी बड़ी-बड़ी, काली आँखे उसपर जमाये।

"हम पहले भी मिल चुके है, शायद आपने पहचाना नहीं??"

"आप कोई भूलने वाली चीज हो क्या? जो मैं भूल जाऊँ

"चीज??"

"सॉरी मिस"

"मेरा नाम ज्योति है।"

"और मैं विनित ठाकुर।" उसने अपना हाथ उसकी ओर बढाया जिसे हल्का सा थाम कर उसने छोड़ दिया।

"अगर मैं आपको एक कप कॉफी की ऑफर करूँ तो??" वह इतना अच्छा था

या बन रहा था।

"तो मैं इनकार कर दूंगी, क्योंकि कुछ देर पहले ही मैंने बहुत सारा कुछ खाया है, पर आपकी कॉफी उधार रहीं, फिर कभी।" वह शरारत से बोली और दोनों हँसने लगे।

" फैमिली के साथ आयी है ?"

"नहीं दोस्तों के साथ।" तेजी से उसने झूठ बोला और फिर मिलने का वादा कर चली आयी।

क्या किस्मत उस पर इतनी ही मेहरबान थी जो उसे वह ना सिर्फ दुबारा मिला

बल्कि उसकी आँखो में चाहत के बारे रंग पहचान भी चुका था वो ख्वाब जिन्हें वह अपने उपर ओढ़ लेना चाहती थी

इन सारे सवालों के जवाब मैं अगले भाग में बताऊंगी

आज वह बहुत खुश थी। वो ऑटो से उतर कर गुनगुनाने हुए घर में घुसती है जहाँ मयंक लाउंज में बैठा उसका

इंतजार कर रहा था। उसका गुनगुनाना बंद हो गया। वो उसे पूछ बैठा "कब से तुम्हारा वेट कर रहा हूँ, कहाँ गयी थी??"

उसका अंदाज गुस्साने जैसा नहीं था, पर वह डर गयी थी। फिर अकड़ कर सोची, मयंक से डर भला क्यों "यहीं मॉल में गयी थी। कुछ कपड़े लेने।" उसे लगा उसकी चोरी पकड़ी गयी है

"अच्छा आओ खाना खा लो। मैंने बड़े प्यार से तुम्हारी फेवरेट डिश बनाई है।" वह बहुत ही मुहब्बत से बोला।

"मुझे भूख नहीं है। मैंने मॉल में खा

लिया था। तुम ही खाओ।" उसने बेडरूम की ओर कदम बढा दिए।

"ज्योति3 मेरा साथ देने के लिए तो रूक जाओ थोड़ी देर।"

मयंक ने पुकारा पर वह उसका साथ देने के लिए नहीं रूक सकती थी। उसे मयंक का साथ मंजूर नहीं था।

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"शाम में मेरे कुछ दोस्त डिनर पर आ रहे है। एक तो शादी की पार्टी और दूसरी तुमसे मिलने की खातिर इसीलिए ये

छोटी सी पार्टी रखी है मैंने।" नाश्ते के समय मयंक ने उसे बताया।

वो खाते-खाते रूक गयी और बोली "तो मैं क्या करूँ।"

"तुम अच्छे से तैयार हो जाना और उनके सामने अपने मुँह का नक्शा ठीक रखना।" वह तप कर बोला।

" कोशिश करूंगी।"

" गुड, कोशिश ही मंजिल की पहली सीढ़ी होती है।" वह खुश होते हुए बोला और ज्योति का मूड ऑफ हो गया।

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मयंक ने खाना होटल से ही मंगवा लिया था। बाहर लॉन में पार्टी की व्यवस्था रखी गयी थी। पिंक जार्जट साड़ी में जिस पर हल्के मोतियों का काम किया गया था, वो हमेंशा की तरह बहुत खूबसूरत लग रहीं थी। मयंक भी पिंक शर्ट, ब्लैक पैंट और ब्लैक कोर्ट में अच्छा लग रहा था। सब दोस्त और उनकी पत्नी हँसी-मजाक कर रहे थे पर जिसके लिए ये पार्टी रखी गयी थी वो गायब थी। वो कोई पाँचवीं बार वह बेडरूम में आया था जब वो अपने बाल ही सुलझा रही थी।

" जल्दी करों ज्योति, वो लोग बुला रहे है तुमको।"

" तुम बस खड़े-खड़े आर्डर कर सकते हो। कहां बनाने आते है मुझे बाल? घर में मम्मी बनाती थी और शादी के बाद दीदी। अब यहाँ एक सप्ताह से मोड़ कर पिन लगा लेती थी। अब सीधे हो बाल तब ना बांधू।"तेज आवाज में बोलते-बोलते वह आखिर में रोने पर आ गयी थी। बाल थे या मुसीबत, फिर थे भी घुंघराले।

मयंक मुश्किल से अपनी हँसी छुपाते हुए उसके पास चला आया " अच्छा

लाओ, मैं कोशिश करता हूँ।"

उम्मीद के खिलाफ वो खामोशी से कंघी उसके हाथों में पकड़ा कर स्टूल पर बैठ जाती है। मयंक ने पहले धीरे-धीरे अंगुलियों से पोरों से बालों के गिरहों को सुलझाया, फिर कंघी से सबको सीधा करने लगा।

कुछ देर बाद ज्योति को अपनी गर्दन पर अजीब सा एहसास हो रहा था। उसने अपनी गर्दन जरा सी मोड़ी तो उसको अपने बहुत करीब देख उसका दिल धक से रह गया। मयंक का अंदाज बदल रहा था, वो मदहोश सा होकर उसके गर्दन पर अपने होठों को लगाए हुए था। वो

डर कर उसे धक्का देती है और दूर हो जाती है।

" जाओं तुम बाल सुलझ गया है, अब मैं बांध लुंगी। आती हूँ पाँच मिनट में।" कंघी उसके हाथों से छीन लेती है।

वो जो उसे अपने इतने पास पाकर बेखुद सा हो सबकुछ भूलने जा रहा था, धक्के से होश में आ जाता है " सॉरी।" बोलकर तेजी से निकल जाता है। वो लॉन में आता है और शर्मिंदा होते हुए सोचता है "ये क्या करने जा रहा था मैं। उसकी मर्जी के बिना नहीं-नहीं, वो मेरी पत्नी है फिर भी जब तक वो मुझे दिल से स्वीकार ना कर ले, मुझे उसके

पास होने का हक नहीं है। मुझे अब अपनी बेताबियों पर कंट्रोल रखना होगा।" तभी वह सब एक साथ उसके पास आते है।

" अच्छे मेजबान हो तुम, हम सबको अकेला छोड़ कर खुद गायब हो गये।"

ज्योति भी आ गयी है। माहौल में छाई खामोशी टूट गयी। मयंक सबका परिचय करवाता है। मीनू और संजय की पिछले साल शादी हुयी थी। राज और नीतिश बैचलर ही है और बड़े जोर-शोर से अपने लिए लड़की ढूंढ रहे हैं। वह सब एक साथ डाक्टरी की पढाई किए थे। मीनू, संजय के भूल्लकरपन से परेशान रहती

है। आज भी वह मयंक- ज्योति के लिए गिफ्ट लाना भूल गया था तो वो खुद से लेते हुए आयी थी।

"मीनू यार तुम तो जानती ही हो आज मेरी नाइट ड्यूटी थी। कितनी मुश्किल से अपनी ड्यूटी डाक्टर रंजीत को सौंप कर आ पाया हूँ, जल्दी-जल्दी में याद ही नहीं रहा। पर तुम हो ना मेरी गलतियों पर पर्दा डालने वाली, सब ठीक हो जाता है।" वह उसे मनाने के लिए मख्खन लगा रहा था।

" देखियेगा मीनूभाभी!! एक दिन जल्दी में यह आपको भी भूल जायेगा।" राज ने मीनू के गुस्से को और बढाने के लिए

हँसकर कहा।

संजय उठकर उसके पीठ पर एक मुक्का जमा देता है "एक बार तेरी शादी हो जाने दे बच्चू, फिर तेरे कारनामों की पूरी लिस्ट भाभी को पूरे सबूत के साथ दिखाऊंगा।।"

"अरे!! बचाओ कोई, कोई तो बचाओ मुझे " वो नौटंकी करता हुआ चिल्लाने लगता है। सब हँसने लगते है।

सब मेज पर बैठ खाना खा रहें थे। नीतीश जल्दी-जल्दी खा रहा था। मयंक उसे टोकता है4 Dash "यार!! धीरे खाओ, खाना भागा नहीं जा रहा है।"

"तुम्हारे पार्टी के चक्कर में आज मैंने दिन का खाना भी नहीं खाया था। बड़े जोरों की भूख लगी है।" लोग दिन में तीन बार खाते है, वो छ: बार खाता था। नीतिश खाते हुए कहता है।

"तब तो ठूंस-ठूंस कर खा तू वरना आधी रात में फिर भूख लग जायेगी तुझे।" राज कहते हुए ठहाके लगाता है।

ज्योति उनलोगों की नोक-झोंक को इनज्वाय करने लगी थी। उसे अच्छा लग रहा था। वो कम बोल रही थी पर खुश थी इतने लोंगो से मिल कर।

"मयंक!! कोई रंग जमाओ यार, मजा नहीं आ रहा है।" नीतीश कहता है।

"हाँ मयंक!! कुछ सुनाओ ना, बहुत दिन हो गये तुम्हारे गाने सुने।" मीनू बोलती है।

मयंक की नजरे ज्योति पर थी। सब जिद्द करने लगे तो वह गाना सुनाने को मान गया था। उसकी आवाज बहुत ही अच्छी थी। वो लोग अक्सर उससे गाने सुनते थे। कभी-कभी वो उकता कर उनसे कहता " क्या मैं तुमलोगों का रेडियो हूँ।" वो चारों एक स्वर में 'हाँ' कहते।

"धीरे-धीरे से मेरी जिंदगी में आना,

धीरे-धीरे दिल को चुराना।

तुमसे प्यार हमें है कितना जानेजाना,

तुमसे मिलकर तुमको है बताना ।"

गिटार बजाते हुये वो धीमी आवाज में बहुत अच्छा गा रहा था। ज्योति सहित सब उसकी आवाज की जादू में खोये हुए थे।

पार्टी खत्म होने के बाद सब उनदोनों को गिफ्ट्स और बेस्ट विशेज देते हुए चले गये। वो दोनों भी कपड़े बदल कर बेड के अलग-अलग किनारों पर सो गये।

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" कहाँ थी तुम? पिछले चार दिनों से मैं इस मॉल में चक्कर काट रहा हूँ।" नाराज सा वीनित उसके सामने आ गया था। वो आज फिर घूमने मॉल आ गयी थी।

"क्यों? मेरे लिए चक्कर काट रहें है आप? मैं आपकी कोई लगती तो नहीं हूँ जो चार दिनों से परेशान हो रहे है? हमारा कोई रिश्ता भी तो नहीं है जिसके हक से आप मुझे ढूंढ रहे थे??" वो उसे परखती हुयी कहती है।

वीनित ने उसके करीब आकर दोनों हाथ थाम लिए। बगल से गुजरने वाले लोगों

ने उनको गौर से देखा।

" I Love You ज्योति!! मैं तुम्हें चाहने लगा हूँ।" कहकर उसके हाथों को अपने होठों से लगा लेता है।

वह बेयकीन सी रह जाती है। जिसका इंतजार वो हमेशा से करती थी, आज वो उसके पास आ रहा था। अचानक उसे मयंक की याद आयी, वो उसके हाथों को झटक कर दौड़ती हुयी भाग जाती है।

रास्ते में बारिश हो जाती है जिससे उसके कपड़े भींग जाते है। वो अंदर आ कर टुप्पटा उतारती है जब मयंक किचेन से

खाना निकालते हुए आता है। वो सिटपिटा कर टुप्पटा ओढ लेती है। मेनडोर पर चौकीदार रहता था जिस कारण वो घर को लॉक किए बिना चली जाती थी जिससे उसे पता नहीं चला कि मयंक घर आया है ।

"तुम तो हास्पीटल गये थे ना।"

" एक फाइल छूट गया था तो लेने आया और साथ में तुम्हारे लिए डिनर भी पैक करवा लाया।" टेबल पर खाना रखते हुए वो उसके बेहद पास आ गया। भींगे कपड़ो में वह कयामत लग रही थी। आज वो सारे बंधन तोड़ देने का सोच रहा था।

ज्योति उसे पास देखकर पीछे हटती हैं पर मयंक उसका हाथ पकड़ लेता है।

" तुम शायद बारिश की वजह से रुके थे, छूट गया है पानी। तुम जाओ, मैं चेंज करके खा लुंगी।" वह हकलाते हुए खिड़की की ओर देखकर कहती हैं।

मयंक की नजरें उसके शरीर पर टिकी हुई थी जो भींग कर और भी खूबसूरत हो गयी थी

" ज्योति!! तुम मुझे इतना क्यो तड़पा रही हो? बहुत मुहब्बत करता हूँ तुमसे, दिल की अथाह गहराइयों से। मैं तुम्हें बेपनाह चाहता हूँ। तुम मेरी चाहतों की आखिरी हद हो। तुम मेरी

होकर, मेरे इतने पास होकर भी मीलों दूर खड़ी हो। मैं अब तुमसे दूर नहीं रह सकता। प्लीज ज्योति मुझे अपना लो, मैं तुम्हारे प्यार के लिए तड़प रहा हूँ।" वो मिन्नते करता हुआ कहता है।

ज्योति का गुस्सा सर से ऊपर जा रहा था छोड़ों मुझे " वह एक झटके से हाथों को छुड़ाकर पीछे चली गयी

" तुम मुझे जबरदस्ती हांसिल नहीं कर सकते।" चिल्लाते हुए कहती हैं।

" जबरदस्ती मैं तुम्हें हांसिल कर ही सकता हूँ ज्योति मगर इतने दिन से मेरे साथ रह रही हो, क्या तुम्हें ऐसा

लगता है कि मैं, तुम्हें जबरदस्ती हांसिल करना चाहता हूँ?? वह शिकायत भरी नजर उसपर डालते हुए निकल गया।

"हे भगवान मैं क्या करूँ?? अब तुम ही सही रास्ता दिखाओ मुझे।" कहकर वो अपना सर पकड़ कर बिस्तर पर लेट जाती है।

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उस दिन वह यूँही मॉल में इधर-उधर चक्कर लगा रही थी जब वीनित फिर उसके पास चला आया "देखों मेरी सच्ची मुहब्बत है जो तुम आज भी मिल

गयी।" वह उसे गहरी निगाहों से देखता कहने लगा।

"मैं तो बस ऐसे ही आयी हूँ। आपको क्या काम है यहाँ।" ज्योति उससे कहती हैं।

" तुम्हें ढूंढने आया था। मैं तुमको देखने को बेचैन था। अब दिल को राहत मिल गयी।" मुस्कुरा कर कहता है।

वो चुपचाप उसे देखती है। उसकी खूबसूरती और स्मार्टनेस से वो पिघल रही थी।

" अच्छा तुमसे कुछ मागूंगा तो दोगी??"

वो सवाल करता है।

"मेरे बस में हुआ तो जरूर दूंगी।

"अच्छा अपना मोबाइल नंबर दो मुझे। तुम्हारी याद आयेगी तो मेसेज करूंगा।"

वो कुछ देर सोचकर उसे नंबर दे देती है।

" तुम अपने मुँह से ना कहों पर तुम्हारी आँखे मुझे बता रही है कि तुम भी मुझे पसंद करती हो।"

वो मुसकुराते हुए घर चली आती है।

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घर में बैठा मयंक उसे खाली हाथ देखकर कहता है "आज क्या खरीदने गयी थी??"

"मन नहीं लग रहा था तो यूँ ही घूमने गयी थी। तुम्हें कोई दिक्कत है क्या??" वो उसे नाराज होकर कहती है।

"नहीं, मुझें कोई एतराज नहीं है। मैं तो बस ये कहना चाह रहा था कि मन नहीं लगता है तो टीवी पर फिल्में देखों, रंग-बिरंगे डिशेज बनाना सीखो, बालों के नये डिजायन सीखो, खूब मन लगेगा।" वो हँसते हुए बोलता है।

" अपनी सलाह अपने पास रखों। मुझे ये चीजें बिलकुल भी पसंद नहीं है।" मुँह बनाते हुए कहकर बाथरूम में घुस जाती है।

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सुबह से उसके कई मेसेज आ चुके थे।

"गुड मॉर्निंग"

"अब उठ भी जाओं"

"कोई तुम्हारा इंतजार कर रहा है"

"अब और मत परेशान करों। तुम अभी के अभी मॉल के सामने वाले गार्डेन में आओ। मुझे इतनी प्यारी सुबह तुम्हारे साथ बिताना है।"

वो मुस्कुरा कर तैयार होने चल देती है। आकर बालों को सुलझाते हुए मयंक की ओर देखती है। आज उसकी छुट्टी थी तो लेट तक सोने वाला था। वो गहरी नींद में सोया हुआ है। बालों को बांध कर चल देती है।

"तुम इतने दिन पहले कहाँथी ज्योति!!" वह प्यार की बुलंदियों पर बैठी थी और वीनित उसका हाथ थामें उसके कदमों में

बैठा पूछ रहा था।

" सितारों में।" वह खिलखिलाई।

" अब सोचता हूँ, कैसे तुम्हारे बिना जी रहा था। अब तो तुम्हारे बिना एक पल भी नहीं कटता। दिल करता है तुम हर पल मेरे साथ रहों।"

" अच्छा" वह एकदम से उदास हो गयी सोचती है। क्या उसे बता दूं कि मैं शादीशुदा हूँ? ज्योति ने सोचा पर जुबान से साथ देने से इंकार कर दिया।

"अच्छा चलो, अपना हाथ दिखाओ।"

"क्यों"

"दिखाओ तो सही।" जिद्द करते हुए बोला।

ज्योति ने अपना हाथ बढा दिया।

वीनित ने अपने हाथों से उसकी कलाई पर एक खूबसूरत सा ब्रेसलेट जो सोने का बना था और जिसपर हीरे के फूल जगमगा रहे थे, पहना दिया" हमारी मुहब्बत का पहला तोहफा।"

" यह तो बहुत मंहगा है, मैं नहीं ले सकती। वह उसे उतारने लगी थी।

"मुहब्बत से ज्यादा मंहगा कुछ नहीं है ज्योति, इसे हमेशा अपने हाथों में पहने रखना।" वो सर हिलाकर हाँ कर देती है।

घर आने पर मयंक अपने बड़े भैया और भाभी जो उसकी भी बड़ी बहन थी, के साथ लाउंज में बैठा चाय नाश्ता कर रहा था " अरे आओ मेरी छुटकी बहन, कैसी हो? बहुत सुंदर हो गयी हो। सुबह-सुबह कहां चली गयी थी?" उसकी दीदी पूछते हुए उसकी ओर चाय बढाती है।

वो दोनों को प्रणाम करती है " आपलोगों के आने के बारे में तो मयंक ने मुझे नहीं बताया था वरना मैं बाहर नहीं जाती। यूँ ही टहलने चली गयी थी।" वो

चाय की चुस्कियां लेती हुयी कहती है।

उनलोगों को बातों में लगा छोड़कर वहा किचेन की व्यवस्था देखने चली आती है।

सब लोगोंका आज मार्केट घूमने का विचार है पर ज्योति नहीं जाना चाहती है। उसे डर है कही वीनित उसे मयंक के साथ देख ना ले। वो खाना बना चुकी है और, सबको दो बार पुकार चुकी है।

"चलो भई उठो सब। तीसरी बार आवाज लगाने की बजाए वह खाना ही उठाकर रख देगी।" दीदी ने उन दोनों को कहते हुए उठाया।

"हे भगवान ज्योति आज तुमने खाना बनाया है?? मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा है??"। दीदी ने आश्चर्य से उससे पूछा।

जब मयंक ने सलाह दी तो उसे डाँट दिया था पर जब वो ऑफिस चला जाता था तो चुपके से टीवी में कुकरी शो देखकर सीखती थी, खाना बनाना। अब ठीक-ठाक बना लेती थी।

वह मुस्कुरा दी " क्यों तुम्हें मेरा ये सब करना अच्छा नहीं लगा दीदी।"

" मुझे तो बेहद खुशी हो रही है ज्योति!! पता है मयंक.. कालेज इसको जाना

होता था और पूरे घर में परेड मेरी होती थी। दीदी!! मेरे कपड़े आइरन कर दो, दीदी मेरे बाल बांध दो, दीदी मेरा नाश्ता ला दो। ओह मैं तो रोज परेशान हो जाती थी सुबह होते ही। जब शादी के बाद मैं चली गयी तब मम्मी का यही हाल होता था, पर कुछ-कुछ काम खुद भी कर लेती थी।" वो ज्योति की नकल उतारते हुए बोल रही थी।

ज्योति ने चोर नजरों से मयंक को देखा। वह दीदी की बातों पर खिलखिला रहा था। वह निश्चिंत होकर खाने लगी, वरना डर रही थी कि मयंक खाने में कोई कमी ना निकाल दे।

" मगर सच पूंछो तो ज्योति सारी रौनक तुम्हारे दम से थी। तुम किसी ना किसी बात पर मम्मी का मीटर घुमाएं रखती थी। अब तो वह किसी को डांटती भी नहीं है और पापा भी तुम्हें बहुत याद करते हैं।" दीदी उदासी से कहती हैं।

वो भी पापा-मम्मी को याद करने लगती है। सब खाना खाकर उसके शादी का वीडियो देखने लगते हैं और मार्केट जाना भूल जाते हैं। इसी सब में रात के आठ बज जाते हैं। ज्योति चैन की सांस लेती हुयी किचन में खाना बनाने चली जाती है।

कहानी के आगे के भाग में जानिए

वीनित और ज्योति का मिलन क्या रंग लायेगा ??

आज के लिए बस इतना ही। कहानी पढ़ने और कमेंट करने के लिए आप सबों को बहुत-बहुत

आज मयंक ने छुट्टी ले ली थी। भैया-भाभी को घुमाने के लिए। वो लंबी

भरपूर नींद लेकर ग्यारह बजे जगा। भाभी उसके सर पर खड़ी हो गयी " भला ऐसा भी दगाबाज देवर होता है जो भाभी को घुमाने ले जाने का वादा कर खुद सोया रहें।"

वो सर खुजाते हुए खिड़की की ओर देखता है जहाँ गार्डेन में ज्योति फूलों को पानी दे रही थी। फिरोजी रंग के साड़ी में उसकी दूधिया रंगत सोने की तरह चमक रही थी। लंबे घुंघराले बालों में चोटी गूँथ कर मोतियों वाली क्लिप लगायी थी जो उसे और भी सुन्दर बना रहे थे। वो हैरान सा उसको निहारें जा रहा था।

"अब उठो भी मयंक !!तुम्हारी भाभी

सुबह से तुम्हारे जगने के इंतजार में है।हमें दिल्ली घूमाओ चलकर।"भैया जो उसको लेट तक सोता देख उठाने आये थे, उसे भाभी से बात करता देख बोले।

"हाँभैया!! बस पन्द्रह मिनट" कहकर बाथरूम की ओर दौड़ लगा देता है। वो दोनों हँसते हुए बाहर आते है जहाँ वो लाउंज में आकर बैठ चुकी थी। सब तैयार होकर निकलने ही वाले थे जब ज्योति ने इनकार कर दिया।

" क्यों भई क्या प्रोब्लेम हैं??" दीदी ने पूछा।

"सर में बहुत दर्द है, आपलोग जाओ

घूम आओ।" उसे डर था कही वीनित ना उसे मयंक के साथ देख ले। वो लोग चले गये।

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कुछ देर बाद वीनित का मेसेज आया-- " कहाँ हो तुम? मैं यहाँ गार्डेन में तुम्हारा इंतजार कर रहा हूँ।"

" मैं नहीं आ सकती। मेरी तबियत ठीक नहीं है।"

"क्यों? क्या हुआ है?"

"बुखार हो गया है।"

"अच्छा, मुझें एड्रेस बताओ अपना, मैं आ रहा हूँ।"

उसके कहने पर वो अपने जगह से उछल पड़ी-"नहीं-नहीं, तुम नहीं आओगे बस। मैं ठीक हो जाऊँगी। दवा खा ली है।

" अच्छा दो दिन बाद बर्थ डे है मेरा, तब तक ठीक, हो जाना है तुमको। मैं कोई बात नहीं सुनूंगा।

"दो दिन बाद।" उसने दिल में सोचा--"तबतक तो दीदी और जीजाजी वापस चले जायेंगे।

"अच्छा ठीक हैं, जरुर आऊंगी मैं। ओके।" फोन रखकर अपना पर्स निकाल लायी और हर महीने जो रूपये मयंक उसे खर्च करने देता था, उसका हिसाब करने लगी। उसे वीनित को अच्छा सा गिफ्ट देना था।

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"ज्योति!! यह ब्रेसलेट किसका है?" टेबल पर खाना लगाते हुए दीदी ने रात में पूछा। मयंक की नजर अचानक ही उसकी कलाइयो पर गयी, वह हीरों का चमकता ब्रेसलेट देखकर ठिठक गया था।

" मेरा है।" वह एकदम घबराई थी।

मयंक से रहा नहीं गया3 Dash" डायमंड हैं क्या??" वह हैरान हुआ था।

"नहीं-नहीं, नकली हैं।" वह खुद को लापरवाह दिखाती हुई सब्जी सबके प्लेट में डालने लगी।

"लगता तो नहीं है नकली " मयंक का ध्यान उसी में अटक गया था, वो मन में सोचने लगा।

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दीदी-जीजाजी कल वापस जा चुके थे। आज उसका किसी काम में दिल नहीं लग रहा था। दिल्ली से दीदी का कॉल आया था। वो पहुंच कर ज्योति को फोन कर पहुंचने की बात बताती है साथ ही मयंक की मम्मी यानी उसकी सास से भी बात कराती है। मयंक रोज बातें किया करता था पर वो कभी भी उनलोगों से बात नहीं की थी जबसे दिल्ली से आयी थी।

"क्या हाल है ज्योति!! तूठीक है ना बेटी। कोई खुशखबरी है क्या??" वो मुस्कुरा कर पूछती है। उसका दिल जल कर रह जाता है। दीदी भी वही सवाल पूछती रहती थी। मम्मी को भी वही जबाब

चाहिए था, इसलिए वो किसी को फोन ही नहीं करती थी।

मयंक ऑफिस गया था। वो खाना खा कर चादर ओढ कर सो गयी।

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आज वह बहुत बोर हो रहा था। ऑफिस में भी उसका दिल नहीं लग रहा था इसीलिए वो रेस्ट रूम में आकर बैठा था। उसने भैया के दोनों बच्चों के साथ चार दिन खूब एन्जॉय किया था इसीलिए वो उन्हें मिस कर रहा था। बच्चे तो उसे खुद बहुत पसंद थे पर ज्योति का रवैया वो तो सीधे मुँह बात भी नहीं

करती थी।

"बस-बस बात मत कीजिये मुझसे। रोज के आपके बहाने, मैं तो परेशान हो गयी हूँ।" डाक्टर मीनू जो संजय की पत्नी थी, जोर से बोलते हुए अंदर आयी तो उसकी उलझी-बिखरी सोचों का सिलसिला टूटा।

" मीनू!! मेरी बात तो सुनों, माफ कर दो ना अब।" पीछे से संजय भी दौड़ता आया उसके पीछे।

"मुझे आपकी कोई झूठी सफाई नहीं सुननी। वह नाराज ही एक सीट पकड़ चुकी थी।

संजय ने मदद वाली निगाहों से मयंक की ओर देखा। वो मीनू से पूछता है " क्या हुआ भाभी !! क्यों गुस्सा रही है।

"अब आप बताओ कि इस झूठे,मक्कार,धोखेबाज आदमी पर कैसे विश्वास करूँ।

"ढंग से बात करो लड़की !! पति हूँ तुम्हारा।" संजय मुँह फूलाकर बोला।

उसी समय राज भी आया जो उनदोनों की नोक-झोंक को इनज्वाय करने आ गया था " पता तो चले भाभी !! कि बात क्या है??

"आप तो चुप ही रहिए राज!! हमारी नाक के नीचे चुपचाप सीनियर डाक्टर की बेटी से इश्क लड़ाया और अब आए है मंगनी का न्योता देने।" अपनी गुस्से को मीनू ने राज की ओर घूमा दिया " कोई हजारों में एक तो नहीं थी जो आपने शादी करने का इरादा कर लिया।"

"भाभी आपने लैला-मजनूँकी कहानी सुनी है न बस वही बात हो गयी मेरे साथ। अब आप अपनी बताओ।" बहुत चालाकी से उसने बात को घूमा दिया।

"कल शाम में इन्होंने मुझे फोन किया,

तैयार रहना, हम आज रात का डिनर बाहर करेंगे। मैं रात ग्यारह बजे तक इंतजार करती रही और ये महाशय बारह बजे आए। आते ही 'मैं बहुत थक गया हूँ' कह जा सोये। मेरा इतना मूड खराब था और इन्होंने मनाया भी नहीं।"

" हाँतो रात के उस वक्त तुमसे बात करने का मतलब मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डालने जैसा था और यह रिस्क मैं अपनी नींद खराब करके नहीं उठा सकता था। 'सॉरी' प्लीज माफ कर दो। आज की रात डिनर पक्की रही।" वो हँसकर कहता है।

संजय ने उठकर मीनूके बालों से क्लिप

को निकाल दिया जिससे उसके बाल बिखर गये और वो उसे हाथों में थमी फाइलों से मार रहीं थीं। दोनों मुस्कुरा कर हाथ मिलाते हैं।

मयंक उनदोनो को हसरत देखकर सोचता है " कितनी मुहब्बत है दोनों में। जिदंगी से भरपूर नोक-झोंक। कभी रूठना, कभी मनाना, एकदम 'हैप्पी फैमिली'।"

" मैं तो कहता हूँ भाभी!! आप इससे बिलकुल भी बात नहीं करना। कद्र नहीं है इसे आपकी। जिम्मेदारियों का कोई एहसास नहीं है। पता है कल रात दस बजे इसे मैंने होटल में किसी लड़की के

साथ डिनर करते देखा। मुझे तो लगा आप होंगी पर क्या वो आप नहीं थी?" राज, मीनू को उकसाने के लिए बोलता है।

यह नामुमकिन था कि इनदोनों के लड़ाई में राज टांगे ना अड़ाए।

मीनूउसे शक भरी नजरों से देखने लगती है। संजय वही पास में रखी गुलदस्ते को उठाता है " राज के बच्चे!! मैं तुम्हें छोड़ूगा नहीं।"पर वो ठहाके लगाता बाहर भाग जाता है।

राज का इमरजेन्सी केस आया था जबकि संजय और मीनू की नोक-झोंक

अभी भी चल रही थी और वह हजारों ख्वाहिश लिए उनदोनों को देख रहा था।

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दो दिन बाद उसने वीनित के लिए शर्ट और परफ्यूम खरीदा और अब उसकी गाड़ी में बैठी घूम रहीं थीं।

"पूरे तीन दिन बाद तुमने अपनी झलक दिखायी है।" वह दीवानगी से उसे देखता कह रहा था।

"ज्योति की नजरें झुक गयी। जाने कैसा अजीब सा एहसास था। उसे मयंक का बालों को बांधते-बांधते पास आना याद

आता है। वीनित की आँखों में एक मक्कारी सी दिखने लगी थी उसे, जैसे कह रही हो-- 'ये किसकी गाड़ी में बैठ गयी हो।'

वीनित उसे अपने घर लेकर आता है। महलों जैसा घर पूरा खाली पड़ा था बाकी के मेहमान कहाँ है?? वो पूछती है।

"मैं अपनी बर्थ डे सिर्फ तुम्हारे साथ इन्जांय करना चाहता हूँ।" कहते हुए वीनित ने पीछे से उसका कंधा थाम कर अपनी ओर घुमाया।

वह घबरा कर पीछे हटी।

"क्या हुआ? डर क्यों रही हो?

"मैं क्यों डरूंगी।" उसके दिल और दिमाग में सायरन बजने लगा था। उसने खुद को बहादुर दिखाने के लिए उसकी आँखो में झांककर पूछा।

"हाँ वही ना, मैं कोई ड्रैकुला थोड़े ना हूँ।" वह फालतू में हँसा।

"मुझे यहाँ अच्छा नहीं लग रहा है वीनित। चलो कहीं और चलते है।" उसने कहकर अपने कदम दरवाजे की ओर बढ़ा दिए।

वीनित ने उचककर उसकी कलाई पकड़ ली "चली जाना, इतनी भी जल्दी क्या है??" वह उसके करीब हुआ।

ज्योति ने अपनी कलाई झटके से छुड़ानी चाही पर मगर उसने मजबूती से उसे पकड़ रखा था।

" तुम इतने नखरे क्यो दिखा रहीं हो? यही तो प्यार है। इसके लिए ही तो तुम मेरे करीब आयी थी ना। मेरी इसी पर्सनैलिटी ने तुम्हें अपनी ओर खींचा था ना, फिर अब क्या प्रोब्लेम है। चलो दोनों मिलकर लाइफ को इनज्वाय करते है।"

"वीनित" वह अपने सपनों के

राजकुमार का ये घिनौना रूप देखकर दुःख से बोली।

यार!! हमें शादी थोड़ी ना करनी है फिर अगले ही लम्हे ज्योति ने एक झन्नाटेदार थप्पड़ उसे लगाया " घटिया इंसान साथ ही वही पड़ा गुलदान उसके सर पर मारा। वह गिर गया था। वो भागने लगी थी जब उसने गिरे हुए ही उसके पैरों को पकड़ कर अपनी ओर खींचा

क्रमशः
 
वो वीनित के कब्जे में छटपटा रही थी। आज उसे अपनी सारी गलतियों का एहसास हो रहा था। वो उसे अपने

बेडरूम में घसीट कर ले जा रहा था। जब वो उसे नीचे से उठाकर बिस्तर पर डालने लगा तभी ज्योति ने उसके चेहरे को अपने नाखूनों से नोंच डाला। वो तड़प कर अपना चेहरा उसकी हाथों से बचाता है और यहीं एक पल था जिसमें ज्योति अपनी पूरी ताकत से उसे धक्का देती है और कमरे से भागती है।

उसे रास्ते समझ में नहीं आ रहे थे। जल्दी में वह भागते -भागते बहुत दूर निकल आयी थी। जाने कौन सा इलाका था वो। सांप की तरह बल खाते रास्ते, सुनसान सड़के और उस पर रात का अंधेरा छाने लगा था। जब वह थक गयी तो रोड़ के साइड में बैठकर रोने लगी--"

मयंक !! मुझे आकर ले जाओ" अपने होश खोते हुए उसे अपना पति याद आया था। वो बेखबर होश से बेगानी हो चुकी थी

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"ज्योति!! उठो।"

नींद में उसे एहसास हो रहा था, जैसे कोई उसे पुकार रहा है। कुछ देर बाद उसके दिमाग ने काम करना शुरू किया और उसने अपनी आँखे खोली।

"शुक्र है तुम्हें होश आ गया।" सामने मयंक था।

"बुखार अभी भी है तुम्हें।" थर्मामीटर लगाते हुए वो उसे चेक कर रहा था।

"यहीं तो प्यार है जिसके कारण तुम मेरे करीब आयी थी।" उसके लफ्जों का घटियापन अभी भी उसके दिमाग पर हथौड़ो की तरह बरस रही थी। वो बेचैन सी हो उठ बैठी।

"तो मिस ज्योति यहीं था, तुम्हारे सपनों का राजकुमार।" उसकी अंतरआत्मा उस पर जोर से हंसी।

ज्योति ने अपने कानों पर कसकर हाथ रख लिए और आँखे कसकर बंद कर

ली।

"अब जल्दी से सूप पियो, फिर तुम्हें जबरदस्त नाश्ता करवाऊंगा।" वो उससे बोला।

मयंक ने गरमागरम सूप उसे पकड़ाया तो वो उसकी आँखो में देखने लगी। 'कितना प्यार और इज्जत की चाहत झलक रही है इनमें।' उसने घबरा कर पलकें झुका ली।दिल की दुनिया में एक तूफ़ान मच चुका था। वीनित के साथ गुजारे हर लम्हों की याद बहुत तकलीफ दे रहा था उसे।

"यह बहुत अच्छी नहीं है पर मैने

कोशिश की है।" मयंक ने चम्मच से उसे खिलाते हुए कहा।

ज्योति की आँखो में आँसू भरने लगे " तुम आज हास्पीटल नहीं गये।" वह मयंक से बोली।

"तुम्हें इस हालत में छोड़कर कैसे चला जाता।" वह बुरा मानते हुए बोला।

उसका यह अपनापन और प्यार भरा जबाब ज्योति के सोये एहसासों को झिंझोड़ कर रख देता है। वह हाथ में पकड़ी सूप के कटोरे को पूरी ताकत से जमीन पर मारते हुए फट पड़ी "मत करो मुझसे इतनी मुहब्बत। तुम्हारे इस

मुहब्बत के काबिल नहीं हूँ मैं।"

मयंक अपनी जगह खामोश रह गया। उसे लगा वो बुखार के कारण अपने होश में नहीं है।

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शाम में मीनूऔर संजय आये थे, उसका हाल जानने। वो दोनों ही कल रात उसे घर लाए थे। कल रात वो उन्हें सड़क किनारे बेहोश मिली थी। मीनू कुछ दिनों से मायके में थी। संजय उसे लेकर आ रहा था। दोनों में हमेशा की तरह नोक-झोंक चल रहीं थी। मीनू को कुछ दिन और रहना था मायके में, पर संजय उसे

ले आया।

संजय की सफाई "इतने दिनों से मैंने ढंग का खाना नहीं खाया, कपड़े रोज खुद आयरन करने पड़ते थे, कभी मोजे नहीं मिलते तो कभी टाई गायब हो जाती थी। जानती हो !! एई फाइल ढूंढने के चक्कर में पूरी आलमारी का रैक उल्टा पुल्टा हो गया। चाय भी उबल-उबल गिर जाती थी। आमलेट में नमक तेज और मिर्ची तो पूछो ही मत। उफ तुम सोच नहीं सकती मेरी जिंदगी तबाह हो रही थी।"

संजय ने अपने कान पकड़े और हाथ जोड़े तो मीनू ने मुस्कुराहट छुपाने के

लिए अपना मुंह दूसरी ओर घूमा लिया। तभी मीनू की नजर सड़क किनारे पड़ी लड़की पर पड़ी "आप गाड़ी रोकिए।" जल्दी में उसने स्टेयरिंग पर हाथ मारा।

"क्यों ? क्या हुआ??"

"वहाँसड़क पर कोई लड़की पड़ी है।"

"देख चुका हूँ, पर तुम जानती हो ना ये इलाका कितना खतरनाक है। ये कोई जाल भी हो सकता है, लोगों को फंसाया जा सके।"

"हम डाक्टर है मत भूलिए, हो सकता है

किसी को सच में मदद की जरूरत हो।"

"ओके, ठीक है, पर तुम अंदर ही रहोगी, मैं देखकर आता हूँ ।" कहकर वो गेट बाहर से लॉक करता लड़की के पास जाता है और उसका चेहरा देखकर चौंक जाता है। जल्दी से आकर गाड़ी का गेट खोलता है और मीनू के साथ उसे उठाकर गाड़ी में डालता है और मयंक के घर की ओर चल पड़ता है।

मयंक घर के बाहर लॉन में बेचैन होकर घूमता उसका इंतजार कर रहा था। आज से पहले वह इतना लेट कभी नहीं हुयी थी। उसने सोच लिया कि आज वह उसे बहुत डांटेगा। उसकी दी आजादी का

कुछ गलत फायदा उठाने लगी है वो, लेकिन उनदोनों के साथ होश से बेखबर ज्योति को देखकर वह अपना सारे गुस्सा भूल गया। वह बुखार से भर रात तड़प रही थी और मयंक उसके पास कुर्सी पर सारी रात बैठा रहा।

ज्योति की कटोरी फेंकने वाली हरकत ने उसे गुंगा कर दिया था और उसे आज पूरा यकीन हो गया कि वो उसके साथ बिलकुल भी खुश नहीं है। उसने सोच लिया, वह उसे इस शादी से आजाद कर उसकी खुशियाँ लौटा देगा।

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ढलते सूरज की लालिमा शाम होने का इशारा कर रही थी। ज्योति खिड़की से सर टिकाए अपने-अपने घरों को लौटती चिड़ियों की कतारों को गौर से देख रही थी।

वो सोच रही थी "मुझे भी अब लौटना चाहिए। कही ऐसा ना हो कि अंधेरी रात का अंधेरा मेरा सदा के लिए नसीब बन जाएँ। फिर उस नसीब के साथ भला मुझे कौन अपनायेगा, मगर मैं मयंक से क्या कहूँगी??" वह बेबसी से स्टडी रूम के बंद दरवाजे को देखने लगी। उसके दिल के सारे अरमानों को खोल कर वह खुद दरवाजे बंद किए बैठा था। उसका दिल चाहा वह दो कप चाय ले कर जाएँ

और आज मयंक के दिल की सारी बातें सुने जो उसे वो बेताब होकर कहना चाहता था।

कुछ सोचकर वो स्टडी रूम का दरवाजा खोल अंदर गयी। वो किसी किताब में बिजी था।

" कुछ चाहिये क्या?" मयंक ने किताब मोड़ कर एक तरफ रख दी और पूरे इत्मीनान से उसकी ओर घूमता बोला।

"मेरा दिल नहीं लग रहा, कहीं बाहर चलें।"

"पहले तो अकेले ही जाती थी।" वह

उसे ना चाहते हुए भी जताता सा बोला।

"हाँ, मगर अकेले मैं रास्ते में खो गयी थी और अब मैं भटकना नहीं चाहती।"

मयंक उठ खड़ा हुआ। सर्दियाँआ गयी थी इसीलिए उससे बोला--"बाहर बहुत सर्दी है, कोई शॉल ओढ़ लो।"

लाल रंग के साड़ी में वो बेहद खुबसूरत लग रही थी। मयंक का दिल नहीं चाहा कि इस रेशमी शिफॉन के महीन साड़ी में उसके सिवा कोई और देखे। उसने उसे ड्रेस चेंज करने कहा। ज्योति ने खामोशी से उसकी बात मान ली। वह उसकी इस बात पर बहुत हैरान हुआ, पर खुश नहीं

हो सका।

रास्ते भर दोनों के बीच चुप्पी छायी रही जिसे सिग्नल पर खड़े बच्चे ने तोड़ा " साहब मैडम के लिए गुलदस्ते ले लीजिये, बिलकुल ताजे गुलाब के है।

मयंक हल्का सा मुस्कुराया " छोड़ों तुम्हारी मैडम को फूल पसंद नहीं है।"

"पसंद समय के साथ बदल भी तो जाती है।" ज्योति ने हसरत से कहा।

मयंक का चेहरा खुशी से खिल उठा। उसने बच्चे की टोकरी के सारे गुलदस्ते

उसकी आँचल में भर दिये।

ज्योति को लगा वह दिन दूर नहीं जब उन गुलाबों की खुशबू से उसकी जिंदगी का हर पल महकेगा और सारी खुशियाँ उसके दामन में भर जायेंगी।

के.एफ.सी के शानदार होटल में वह मीनू कार्ड हाथों में लिए खाने की लिस्ट पर नजर दौड़ा रही थी जब " नमस्ते डाक्टर साहब" की आवाज उसके बहुत करीब से आयी। नजरें उठाकर जब देखा तो अपने जगह पर पत्थर सी हो गयी। वह मयंक से हाथ मिलाता उसे ही देख रहा था।

" यह आपकी

"मेरी पत्नी ज्योति है।" मयंक को ना चाहते हुए भी परिचय करवाना पड़ा।

ज्योति की रंगत हल्दी की तरह पीली पड़ चुकी थी। वह दो-चार बातें कर चला गया पर उसका ध्यान उसी में अटका रहा। वो मयंक से बोली " कौन था यह?"

"इस इलाके के मेयर का इकलौता, अय्याश और आवारा बेटा वीनित ठाकुर। और कुछ मंगवाऊँ

मयंक आइसक्रीम भी खाना चाहता था पर ज्योति ने घर जाने की रट लगा दी।

वो हैरानी से उसके पल-पल बदलते रूप को देख रहा था।

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अगली सुबह मयंक जब सो कर उठा तो सब काम रेडी था। आयरन किया हुआ ड्रेस, पालिश की हुयी जूते और तैयार नाश्ता। वह यहाँ से वहां घूमती हर काम जल्दी-जल्दी कर रही थी।

मयंक सपने नहीं देखना चाहता था मगर ज्योति का उसका ख्याल रखना बहुत अच्छा लग रहा था। परांठा कुछ कच्चा, कुछ पक्का सा था। सब्जी भी ठीक-ठाक ही थी। हाँ चाय अच्छी बनी थी।

वह बिना मुँह बिगाड़े खा कर ऑफिस चला गया था और ज्योति कितनी देर तक बैठी उसकी मासूमियत पर हँसती रही थी।

बर्तन और सफाई से फ्री होने के बाद वह टीवी के आगे बैठी ही थी कि फोन की बेल ने उसका ध्यान बँटाया

"हैलो!!" उसने रिसीवर कान से लगाया और दूसरी तरफ की आवाज सुनकर उसके हाथों से रिमोट छूट कर गिर गया।

"कैसी है मिसेज मयंक।"

वह रिसीवर रख वही सोफे पर गिर गयी।उसका दिल धड़कने लगा था। कल शाम

में भी वीनित का कॉल आया था। उसने सिम निकाल कर लॉकर में रख दिया था। उसे उम्मीद नहीं थी कि वो उसके घर के लैंड लाइन नंबर पर कॉल कर सकता है। फोन की बेल फिर बजने लगी थी और सारा दिन वह रुक-रुक कर बजती रही। आज उसे अपनी बेबकूफियों का एहसास हो रहा था।

आने वाले कल में छुपे तुफान का सोच कर उसका दिल काँप रहा था। अब ना जाने क्या-क्या बिखरने वाला था

"क्या चाहते हो तुम आखिर मुझसे??" तीन दिनों से वीनित के चूहे बिल्ली के खेल से तंग आ गयी थी। रोज मयंक के जाने के बाद दिन भर फोन बजता रहता था। वो रिसीवर से तार निकाल देती पर मयंक उसका हाल जानने के लिए फोन करता तो वह क्या जबाब देती?? अभी भी वह अपने लिए रात का खाना बना रही थी। मयंक आज रात नहीं आने वाला था क्योंकि उसकी आज नाइट ड्यूटी थी। बार-बार चिंघारती बेल ने उसके खून खौला दिये, तब ही वह फोन उठाकर चिल्लाती हुयी कहती है।

"मैं तो बस तुम्हें चाहता हूँ।" दूसरी तरफ से वह उसकी बेबसी का मजा लेते हुए

बोले था।

"बंद करो अपनी बकबास!!" वह जोर से चिल्लाई।

"कभी तो इसी बकबास के लिए दौड़ती चली आती थी।" उसका कहने का चुभता हुआ अंदाज था।

ज्योति ने दाँत पीसते हुए अपने आँसुओ को रोकने की कोशिश की "तुम जैसे आवारा, राह चलते गुंडे पर भरोसा करने की सजा भुगत रही हूँ।"

"सजा तो अभी बाकी है मेरी जान "

"देखों मेरा पीछा छोड़ दो।"

"छोड़ दूंगा मगर एक शर्त पर।"

"मुझे तुम्हारी किसी शर्त से कोई मतलब नहीं है।"

गुर्राते हुए "ऐसा मत बोलों तुम"" जो लम्हा अधूरा छोड़ कर भागी थी, वो पूरे कर दो बस एक बार।" अपनी आवाज चाशनी में डूबोते हुए बोला।

उसकी डिमांड पर ज्योति सर से पाँव तक सुलग गयी--"मैं क्या तुम्हें रास्ते पर नजर आती हूँ??"

"तुम्हें रास्ते पर लाना मेरे बाएं हाथ का खेल है।"

"तुम मुझे ब्लैकमेल कर रहे हो??"

"नहीं, बता रहा हूँ कि तुम्हारे पास इनकार का रास्ता नहीं है। अब बताओ कब आओगी या मैं आ जाऊं?? डाक्टर साहब तो आज घर आने वाले नहीं है।"

ज्योति की साँस जैसे रूक गयी। वह सारी खबर रखता था उसके बारे में?? फोन काटते हुए वह दौड़कर खिड़की और दरवाजे बंद कर लिए। चौकीदार भी कुछ दिनों की छुट्टी पर था। उसी वक्त

लाइट चली गयी। वह डर से दुबक कर कोने में बैठ गयी। बार-बार फोन लगाने पर भी मयंक का फोन नहीं लगा।

"हे भगवान!! मैं क्या करूँ?? वह रोते हुए सोचती है।

फोन फिर से बजने लगा था। वो तार निकाल कर फेंक देती है। कुछ देर बाद दरवाजे पर दस्तक की आवाज सुनकर वो अपने कानों को दोनों हाथों से बंद कर, लेती है। दस्तक धीरे-धीरे बढती जा रही थी। वो डर से कांपने लगी।

"ज्योति!! ज्योति!! दरवाजा खोलों, मैं हूँ मयंक।"

वह दौड़कर दरवाजा खोलती है। मयंक मोबाइल का टार्च जलाए रोशनी करके खड़ा था--" कहाँ थी तुम!! कब से गेट खटखटा रहा था।" वह उसकी रोते-रोते फूली हुई आखों को देखकर ठिठक गया--"क्या हुआ है तुम्हें??"

"मयंक!! वह अंधेरे । उससे आगे बोले नहीं गया। वह रोते हुए उसके सीने से लग जाती है और फूट-फूट कर रो देती है।

उसी वक्त लाइट आ जाती है। पूरे घर में रौशनी बिखर जाती है। वह उसे लाउंज में लिए आता है और सोफे पर बैठा कर

पानी पिलाता है।

"अब बताओ क्या हुआ??"

"मैं अंधेरे से डर गयी थी।" इतनी देर में वो संभल गयी थी तो एक बहाना बना दिया।

मयंक ने मुश्किल से अपनी मुस्कान रोकी--"काश!! यह डर तुम्हें मेरे घर में रहते हुए लगा करे, कम से कम मेरे पास तो रहोगी।

"मयंक" वह मुँह फुलाते हुए बोली।

"अच्छा भई अपने घर में नहीं डरते हैं।

दरवाजा लॉक कर लो, मुझे एक जरूरी फाइल लेने आना पड़ा। सो जाओ आराम से। गुड नाइट।" उसे लेट हो रहा था तो वह चलने को तैयार हुआ।

"नहीं, प्लीज मुझे छोड़कर मत जाओ।" वह उसका हाथ पकड़ कर बोली।

"पहले तो बहुत खुश होती थी मेरे जाने से। अब ऐसी क्या मुसीबत आ गयी कि अकेले नहीं रह सकती हो।" वह चिढ गया था, उसके पल-पल बदलते रंगत से।

"मुझे बहुत डर लग रहा है मयंक डर से मर जाऊँगी मैं, अगर तुम चले गये

तो।" वो फिर से सुबकने लगी थी।

"जरूरी केस है, मैं छुट्टी नहीं ले सकता। ठीक है चलो तुमको मीनू के पास छोड़ देता हूँ, उसकी नाइट ड्यूटी नहीं है। तुम्हें सुबह ले लूंगा।

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मीनूके घर पर वह पहली बार आयी थी। वह उसे देखकर बहुत खुश हुयी। वैसे भी वो दिल की बहुत अच्छी थी। मयंक उसे छोड़ कर वापस चला गया। संजय भी नाइट ड्यूटी पर था इसीलिए ये दोनों साथ में खाना खा कर सो गयी।

यह रास्ता कब तक चलता। सुबह ज्योति ने अपने फोन चेक किये तो वीनित का कोई कॉल-मेसेज नहीं था। वो बहुत हैरान हुयी। एक-एक दिन करके दो हफ्ते इसी तरह चैन से बीत गये। वीनित ने उसे परेशान नहीं किया। ज्योति को लगा वो उसे भूल चुका है। यह ये उसकी गलतफहमी थी।

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सर्दियों के लिए ज्योति को कुछ स्वेटर लेने थे तो वो मयंक के साथ बाजार गयी थी पर इमरजेन्सी आपरेशन का कॉल आ जाने के कारण वो उसे खरीददारी करके घर चले जाने बोल कर हास्पीटल

चला गया।

वह जब दुकान से निकली तो अचानक ही वीनित गाड़ी का दरवाजा खोल कर उसे "अंदर बैठो" कहता है।

वह जिस हक से बोला उससे ज्योति का खून खौलने लगा। फिर भी वह नर्मी से बोली " मैं मानती हूँ, मेरी गलती है। मुझे तुम से दोस्ती नहीं करनी चाहिए थी। मुझे अपनी गलती पर बहुत पछतावा हो रहा है। प्लीज तुम मुझे माफ कर दो और मेरा पीछा छोड़ दो।"

"तुम्हारे पछतावे से अब कुछ नहीं होने वाला। तुम जो गलती कर चुकी हो

उसकी सजा तो तुम्हें भुगतनी ही पड़ेगी। मैं आज रात दस बजे तुम्हारे घर के कुछ दूरी पर इंतजार करूंगा। अगर आज तुम नहीं आयी तो फिर मैं आऊंगा और तुम्हारी दुनिया तहस-नहस कर जाऊंगा।" कहकर वह गाड़ी भगा ले गया।

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"खाना तो ध्यान से खाओ।" रात में खाते वक्त ज्योति का ध्यान कही और देखकर मयंक बोला। वह बेख्याली में प्लेट में चम्मच चलाते हुए ना जाने क्या सोच रही थी, जिसकी सोच वह तो शायद नहीं था।

"हाँ अच्छा।" उसका खाने से मन उचट गया था। घड़ी की ओर नजर पड़ते ही वह काँप गयी।

नौ बजकर पचास मिनट हो चुके थे। वह बर्तन उठा रही थी मगर उसके हाथ-पैर थरथरा रहे थे और शरीर ठंडा पड़ता जा रहा था।

बस कुछ लम्हे और फिर जैसे कयामत आने वाली थी। वह बैठकर दस मिनट गुजरने का वेट करने लगी। उसने मयंक को देखा, वो कोई फाइल खोले बैठा था। घड़ी की सुइयां टिक टिक करती हुयी दस बजकर दस मिनट बजा चुकी थी,

तभी दरवाजे पर दस्तक हुयी जो ज्योति के सीने पर हथौड़ो की तरह पड़ती है।

मयंक उठकर गेट की तरफ बढ चुका था और ज्योति का शक सही हो गया।

"आप यहाँ ।" मयंक की आँखे वीनित को देखकर फैल सी गयी।

"आप यहाँ" वीनित को इतनी रात में अपने दरवाजे पर देख कर मयंक की

आँखे फैल जाती है। वो कोई अच्छा आदमी तो था नहीं जो वह खुश होता। वीनित की इमेज मुहल्ले में बहुत ही खराब थी। लोग अपनी बहू-बेटियों को उससे छुपा कर रखना चाहते थे।

"हाँ, डाक्टर साहब!! आपकी बीबी का हीरों का ब्रेसलेट मैं लौटाने आये हूँ जो वह गलती से मेरे बेडरूम में भूल आयी थी।" ज्योति को कनखियों से देखता हुआ मयंक से बोला और खुद ही उसका हाथ खींच कर उस पर ब्रेसलेट रखा और जाने लगा।

"गुड नाइट ज्योति तुम्हारे साथ गुजारा हर वक्त मुझे याद रहेगा।" जाने

से पहले वह पलटा और उसकी बेबसी का मजा लेते हुए उससे बोला।

मयंक खड़ा बेयकीन सा ज्योति की ओर देखते हुए बुत बना हुआ था।

ज्योति का जी चाहा जमीन फट जाए और वो उसमें समा जायें। नजरों से गिरने का एहसास किस कदर जानलेवा होता है वो भी उस वक्त जब दिल में बसे रहने का अरमान जग जाएं। मयंक लंबे-लंबे कदमों से गेट से बाहर चला गया।

"मयंक" उसने जोर से पुकारा पर वो अनसुना कर गया।

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वह रात भर नहीं आया। ज्योति की नजरें दरवाजे पर टिकी रही। रात भर वह कुछ ऐसा जोड़-तोड़ कर कहानी नहीं बना सकी जिससे वो मयंक के विश्वास को जीत पाती।

अगले रोज वह आया और आते ही बेडरूम में चला गया।वो उसके लिए नाश्ता बनाने लगी। दस मिनट में तैयार हो कर नीचे आया। उसका चेहरा बेहद सर्द हो रहा था। ज्योति को कुछ भी कहने की हिम्मत नहीं हुयी। वो नाश्ते पर नजर डाले बिना चला गया।

मयंक के जाने के दस मिनट बाद मीनू आयी थी। इतनी सुबह सुबह उसे देखकर वो हैरान रह गयी।

"आइए भाभी नाश्ता कीजिये।" पर उसके मना करने पर वह सबकुछ समेटने लगी।

"यह सब बाद में करना, पहले मेरी बाय सुनों। बहुत जरूरी बात है।" वो उसका हाथ पकड़ कर अपने पास दूसरी कुर्सी पर बैठाती है "ज्योति !! क्या मयंक तुमसे खुश नहीं है।" उसने बिना किसी बात को घुमाए-फिराए कहा।

ज्योति उम्मीद से उल्टा सवाल पर चौंक

कर उसे देखने लगती है।

"आज सुबह-सुबह मयंक आया था मेरे घर। बहुत परेशान था। बहुत डिस्टर्ब लगा मुझे। मैंने जब पूछा तो उसने बताया तुम उसके साथ खुश नहीं हो और वह तुम्हें छोड़ने का फैसला कर चुका है। आज उसकी वकील के साथ मीटिंग है।वह तलाक के कागज बनवाने गया है।

मीनूकी बात सुनकर वह कुर्सी से उठ खड़ी हुयी--" नहीं, यह नहीं हो सकता।।" उसकी काली आँखों से आँसुओ की धार बहने लगी थी " मीनू भाभी क्या आप उस वकील को

जानती है।" वो सिसकते हुए पूछ रही थी।

"मैं कन्फ़र्म तो नहीं हूँ पर एक वकील है आनन्द ठाकुर, उसके साथ मयंक सबों की दोस्ती है, शायद उसी के पास गया हो।

"क्या? आप मुझे ले चलेंगी वहाँ।"

"हाँ-हाँक्यों नहीं"

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"यह रहें तुम्हारे कागज।" आनन्द ने तलाक के कागज उस

के रखते हुए

कहा--"एक बार फिर सोच लो।"

अब वह सोचना ही तो नहीं चाहता था। पूरे रात सड़को पर भटकते हुए सोचता ही रहा कि उसकी चाहतों में कहाँ कमी रह गयी?? और सुबह उसे अपनी कैद से आजाद कर देने का सोच लिया। उसने खामोशी से कागजों को अपनी तरफ मोड़ा। पहले पन्ने पर साइन कर दिया। दूसरे और तीसरे की बारी आने ही वाली थी जब दरवाजा धड़ाम से खुला और ज्योति को सामने देख वह हैरान रह गया।

आते ही उसने कागज उसके हाथों से छीन कर टुकड़े टुकड़े कर के फेंक दिये।

आनन्द कमरे से बाहर निकल गये। मीनू भाभी उसे वहां तक पहुंच कर चली गयी थी।

अब कमरे में दोनों अकेले थे। मयंक उसे खामोशी से एकटक देखे जा रहा था जब ही वह भड़क उठी--"पहले मैं तुमसे शादी नहीं करना चाहती थी। तुमने जबरदस्ती मुझे अपनाया और अब जब मैं तुम्हारे साथ रहना चाहती हूँ तो तुम मुझे छोड़ना चाहते हो?? समझते क्या हो तुम अपने आप को। जो तुम्हारे दिल में आयेगा तुम वही करते फिरोगे। हर बार तुम्हारी मनमानी नहीं चलेगी। कुछ फैसले तुमने अपनी मर्जी से किए थे कुछ फैसले मेरी मर्जी से होगी।" गुस्से से

वह मयंक का शर्ट पकड़ कर झिंझोड़ रही थी।

वह उस वक्त अपने होश में नहीं लग रही थी--" तुमने जो किया है वो माफी के काबिल नहीं है।" वो अफसोस से बोला।

"मैं तो बस इतना समझती हूँ कि मैंने तुमसे मुहब्बत की है, बाकी जो सब था वो रेत का चमकता टीला था जिसने मुझे अपने जाल में फँसा लिया था। प्लीज मुझे माफ कर दो, मेरे कदम भटके जरूर थे पर लड़खड़ाऐ नहीं थे। वह आदमी मुझसे बदला लेने के लिए झूठ बोल रहा था। वह ब्रेसलेट मैं खुद उसके मुँह पर मारकर आयी थी, बीच बाजार

में। इससे पहले कि मैं तुम्हारे तरफ लौट पाती, उसने मुझे ब्लैकमेल करना शुरू कर दिया।" ज्योति ने रोते हुए सारा सच मयंक को बता दिया।

मयंक ने नाराजगी से उसे देखा--"और तुमने मुझे ये सब पहले क्यों नहीं बताया?? जब वह ब्रेसलेट दे रहा था तो मैं कितने ही पल इंतजार में रहा कि तुम उसे झुठलाओगी। अपनी सफाई में कुछ कहोगी या उसे थप्पड़ खींच मारोगी, मगर तुम्हारी खामोशी ।" एक पल रूककर वह उसके चेहरे को देखने लगा। रो-रो कर फूली आँखे, पीला पड़ता चेहरा, उलझे-बिखड़े बाल, उसका दिल रोने लगा, उसकी हालत देखकर।

"तुम्हारी खामोशी ने मुझे यह कदम उठाने पर मजबूर कर दिया। मुझे लगा तुम मेरे साथ नहीं रहना चाहती। तुम उसे चाहने लगी हो और उसके साथ खुश रहोगी। मैं तुम्हारी खुशी चाहता हूँ ज्योति। तुम मुझे उदास या रोती हुई अच्छी नहीं लगती।" उसका चेहरा अपनी हथेलियों में भरकर अपनी ओर किया।

"बहुत बुरी हूँना मैं" वो रोते हुए बोली।

"नहीं, बहुत ज्यादा तो नहीं मगर थोड़ी सी तो हो।" वह भी रोते हुए बोला और उसे कसकर खुद में समेट लिया।

ज्योति रोते हुए भी हँसने लगी। वापसी का सफर बहुत ही खुशनुमा था और क्यों ना होता पतझड़ ने आती हुयी बहार का खुले दिल से वेलकम किया था।

"समाप्त"
 
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