दुकानदार मुझे एक बोतल निकाल कर देता है और बोलता है सर इसी बोतल के बारे में बात कर रहे हो क्या आप...
में वो बोतल देखते ही पहचान जाता हूँ ...
में--हाँ भैया यही वाली ....कितने पैसे दूं...
दुकानदार--भैया 310 र्स...
में--कितने...310र्स...बस
इन दिनो जो मैने शराब पी थी उसका एक पेग 2000 से कम का नही था और 310 रुपये की बात ने मुझे सचमुच चौका दिया था...
मैने दुकानदार को वो पैसे दे दिए और उसने खुले पैसे के बदले मुझे एक ग्लास और पानी की बोतल और एक नमकीन का पाउच पकड़ा दिया...
में--भैया ये अच्छी तो है ना
दुकानदार--ये सिर्फ़ मजबूत दिल वालो के लिए है...इसको अधिकतर आर्मी वाले ही यूज़ करते है...
उसके बाद में वहाँ से निकल कर अपनी कार के पास पहुँच गया और बोतल को और सारे सामान को मेरी बगल वाली सीट पर रख दिया...
कार में बैठ के सब से पहले उस पानी की बोतल को खोल कर उसमें से थोड़ा पानी पिया और फिर इस शराब की बोतल को उठा कर देखने लग गया...फिर उसका ढक्कन खोल कर साथ में लाए हुए ग्लास में आधा भर देता हूँ और उपर से थोड़ा सा पानी मिला देता हूँ...
पहला सीप लेते ही मेरे पूरे बदन में झुरजुरी आ जाती है...में उस में थोड़ा पानी और मिला देता हूँ...और फिर पीने लगता हूँ अब उसका टेस्ट मुझे थोड़ा मीठा मीठा लग रहा था. उसके बाद में वो ग्लास ख्तम करके कार आगे बढ़ा देता हूँ....में काफ़ी आगे निकल कर एक गाँव को क्रॉस करता हुआ एक तालाब के किनारे पहुँच जाता हूँ अंधेरा हो चुका था लेकिन चाँद की चाँदनी में वो झील चमक रही होती है.
सामने हरे भरे पहाड़ इस हल्के से उजाले में बिल्कुल सॉफ दिखाई दे रहे थे...में अपनी गाड़ी वही लगा देता हूँ और कार के बोनट पर बैठ कर ग्लास में शराब भरने लग जाता हूँ...तभी एक ग्रामीण वहाँ पहुँच कर मुझे बोलता है....बेटा यहाँ ज़्यादा देर मत रहना यहाँ पानी पीने के लिए पन्थेर आते रहते है...इस लिए जल्दी ही यहाँ से निकल जाना......
में उस ग्रामीण की बातो से घबराया नही क्योकि अगर कोई बाहर का आदमी होता तो तुरंत वहाँ से चला जाता....उसने सच बोला था वहाँ पेंथर्स आते है लेकिन वो इंसानो पर आम तौर पर हमला नही करते...
में कार के बोनट पर बैठा बैठा शराब पीने लग गया .....और सोचता जा रहा था अब कैसे क्या करना है....कैसे इस परिवार को संभालना है...लेकिन मुझे कोई रास्ता दिखाई नही दे रहा था...तभी मेरे मन में पता नही क्यो सुहानी की याद आ गयी...मैने तुरंत उसे फोन लगा दिया...
सुहानी--हेलो सर कैसे है आप अब...
में--सुहानी में ठीक हूँ लेकिन किन्ही बातो से थोड़ा परेशान भी हूँ...
सुहानी--सर आपकी आवाज़ से ऐसा लग रहा है जैसे आपने काफ़ी ड्रिंक कर ली है....
में--तुमने सही पहचाना सुहानी ....मैने आज काफ़ी ड्रिंक कर ली है...
सुहानी--ठीक है सर पी लीजिए लेकिन अपने होश में रहो तब तक ही पीना...क्योकि आपको इस हाल में देख कर आपके घर वाले दुखी हो जाएँगे...
में--सुहानी मुझे कुछ समझ नही आ रहा में अब क्या करूँ....कैसे अपने परिवार को खुश रखू...कैसे उन लोगो के चेहरो पर मुस्कुराहट फिर से ले आउ...
सुहानी--जवाब बड़ा सिंपल है सर....सब से पहले आपको खुश रहना सीखना होगा उसके बाद ही आप किसी को खुश रख सकते है...
में सुहानी की इस बात से प्रभावित हुए बिना नही रह सका ...
में--सुहानी तुमने बिल्कुल ठीक कहा अब से में खुद को पूरी तरह से बदल लूँगा....
सुहानी--सर आपको बदलने की कोई ज़रूरत नही है...आपको आपके परिवार वाले इसी रूप में पसंद करते है...खुद को बदल लेने से आप उनको और दुख पहुचाओगे...
में--सुहानी तुम्हारी इन्ही बातो के कारण मैने तुम्हे फोन लगा दिया...तुम मेरे सारे सवालो का जवाब बड़ी आसानी से दे देती हो....
सुहानी--ठीक है सर आप अपना ख्याल रखिए मेरा भाई और बहन आने ही वाले है में उनके लिए कुछ बना रही थी....
में--लेकिन तुमने तो बताया था कि तुम्हारा बस छोटा भाई है...
सुहानी--मेरे पापा ने दो शादिया करी थी उनकी दूसरी शादी से उनको एक बेटी भी थी...लेकिन उस दुर्घटना में पापा और उनकी दूसरी वाइफ की डॅत हो गयी थी और रीना बच गयी थी...
में--क्या नाम लिया तुनने रीना???
सुहानी--हाँ सर क्या आप उसे जानते है....
में--कल ही एक रीना से मिला था जो एर होस्टेस्स थी...वो बिल्कुल तुम्हारी तरह बाते किया करती है....
सुहानी--सर आप उसी रीना से मिले थे जो मेरी बहन है में आपको बताना भूल गयी थी जिस फ्लाइट से आप जा रहे थे उसकी जानकारी मैने रीना से ही ली थी...
में--देखो ना सुहानी ये दुनिया भी कितनी अजीब है जब भी मुझे किसी की ज़रूरत पड़ी तुम किसी ना किसी रूप में मुझे सम्भालने के लिए मिल ही गयी....पहले रिजोर्ट में...फिर फ्लाइट में...और अब फोन पर...पता नही तुम्हारा ये क़र्ज़ में कैसे चुका पाउन्गा....रीना आए तो उसको मेरी तरफ़ से शुक्रिया कहना क्योकि में उसको कुछ बोल भी नही पाया...
सुहानी--सर आप अपना ध्यान रखिए और आप जहाँ भी है वहाँ से घर जाइए आप का वेट कर रहे होंगे सभी...
और उसके बाद सुहानी ने दुबारा कॉल करने का बोलकर फोन काट दिया.
मैने अपने हाथ में रखा हुआ ग्लास एक साँस में ख्तम किया.
वो बोतल अब ख्तम हो गयी थी में उस बोतल को हाथ में लेकर देख ही रहा था के मेरी नज़र मुझ से कुछ ही दूर खड़े एक पेंथर से टकरा गयी.
उसकी आँखे किसी छोटे बल्ब की तरह चमक रही थी मैने हाथ में पकड़ी हुई बोतल उसके उपर फेकि और फुर्ती से कार का दरवाजा खोल कर कार के अंदर घुस गया.,.,,,