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मौत का हाइवे

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"चिड़िया कहीं नहीं गई है! ..... ठीक से ढूँढो" उनके लीडर ने कहा, आज गौरी की किस्मत इस बेरहम मौसम के ऊपर है, तूफानी मौसम के अँधेरे और बेतहाशा होती बारिश की वजह से लाख ढूँढने के बाद भी गौरी उन शैतानो को नहीं दिखी। आज ये तूफानी मौसम गौरी को अच्छा लग रहा था क्यों की यही उसे छुपने में मदद कर रहा था, ..... शायद गौरी की किस्मत उसका साथ दे रही थी। ....... शायद वह मासूम लड़की उन बेरहम दरिंदों के चंगुल में पड़ने से बच जायेगी यह सोचकर उसके मन में उम्मीद की किरण जाग उठी।

"बस और नहीं! .... हम ज्यादा वक्त बर्बाद नहीं कर सकते उस लड़की के लिए, उसे छोड़ो और निकलते हैं यहाँ से! ....." लीडर की ये बातें सुनकर गौरी की जान में जान आई। लीडर चट्टान के ऊपर खड़ा था और उसी के नीचे वह लड़की छुपी थी पर घुप्प अँधेरे ने उसे छुपा रखा था। जैसे ही लीडर वापस जाने को मुड़ा, ..... एक जोरदार बिजली कड़की जिससे पूरा जंगल पलभर के लिए रोशनी से नाहा गया और ये एक पल गौरी की सभी उम्मीदों के दीयों को बुझाकर चला गया।

उन दरिंदों ने उसे ढूंढ लिया, गौरी की इज्जत बचाने वाला अब कोई नहीं था। उन पाँचों हैवानो ने गौरी के जिस्म के साथ खेलना शुरू किया, गौरी का बदन उन पाँचो के बीच पीसा जा रह था, कभी इस हाथ तो कभी इस हाथ। उन सबके हाथ गौरी के हर अंग को बेदर्दी से मसल रहे थे तभी लीडर का हाथ गौरी की चोली की तरफ बढ़ा, ………..गौरी ने भागने की कोशिश की पर सब बेकार था। उसकी सिसकियों से पूरा जहाँ गूँज रहा था, लीडर के हाथ गौरी की चोली के अंदर यहाँ-वहाँ घूम रहे थे की तभी उसने लड़की की चोली फाड़ दी। ........ खट, खट, खट करके उसकी चोली के सारे बटन इधर-उधर टूट के बिखर गए। वो सब गौरी के निर्वस्त्र स्तनों को बेदर्दी से मसल रहे थे जिसके दर्द से गौरी की चीखें आसमान को फाड़ने को बेताब थॆ।

थोड़ी ही देर में गौरी का घाघरा भी उसके बदन से जुड़ा हो गया और उस तूफानी रात में बारिश में भीगती निर्वस्त्र लड़की को खा जाने को बेताब थे वो कमीने। “रोती क्यों है मेरी रानी ………. तेरा चीर हरण तो हमने कर ही दिया है …….. एक बार हमें खुश कर दे, तुझे रानी बनी कर रखेंगे …..” लीड़र लार टपकाते हुए बोला, तभी दूसरे आदमी ने उसकी हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा “हाँ! ……. तू हमारी द्रौपदी है और हम तेरे पाँच पति! ……”।

“मैं तुम्हारे पैर पड़ती हुँ, मुझे जाने दीजिये ……” गौरी ने आखिरी बार विनती की पर शैतानों पर विनती का असर हुआ है कभी जो अब होता? “....... साली! … तुझे एक बार में बात समझ नहीं आती! ……. अब हम तुझे अपनी रखैल बनाकर रखेंगे!” लीड़र तमतमाते हुए बोला। “तुझे हमारे बच्चों की माँ बनाएँगे ….. “ दूसरा बोला इतनें में लीड़र बोला “नहीं! ……. उससे भी बुरा होगा तेरे साथ! …… अगर हमारी बात चुपचाप मान लेती तो हम तुझे छोड़ देते और बहुत पैसा भी देते लेकिन अब नहीं! ……… अब हम नहीं पूरा शहर तुझ पर पैसा लुटाएगा ………. अब तू हर मर्द का बिस्तर गर्म करेगी …………. रोज रात को तू एक नए मर्द के साथ होगी और वो तेरे साथ वही करेगा जो हम करने वाले हैं”।

लीड़र का इशारा पाते ही दो ने उसके हाथ पकड़कर जमीन हर फैला दिये, उधर दो ने गौरी की माँसल टाँगे फैला दी, ……….. लीड़र ने अपनी पैंट उतारकर दो हजार रुपए निकाले अपनी अडरवियर निकालने के बाद लीड़र गौरी के निर्वस्त्र बदन पर पैसे फेंकते हुए बोला “...... शहर की सबसे बड़ी रंडी बनेगी तू! …….. रंडी!! …… और इसकी शुरूआत होती है आज से ………. आज के बाद तु हमारी सूरत कभी नहीं भूलेगी!.....”।

दिसम्बर की वो सर्द तूफानी रात उस इंसानियत को शर्मिंदा करने वाले उस अपराध की गवाही बन गई। सारी रात वो उसकी अस्मत को लूटते रहे, उसके बदन को कुत्तों कि तरह नोंचते, खसोसटते, काटते और वो बेचारी अपनी किस्मत को रोती रही।

“बचाओ!!! …….. ब ……. चा!........” अंतिम साँस तक वो पुकारती रही कि शायद कोई उसे बचाने आ जाए। जिस हैवानियत के साथ एक कुँवारी लड़की का उन पाँचों ने बलात्कार किया था उससे तो कुदरत भी जैसे क्रोध में आ गई थी। बारिश और तूफ़ान की उस मनहूस रात की सुबह नहीं हुई।

उस प्राईवेट वार्ड में सब चुप थे, ….. मेरी आँखें जल रही थी और जैसे ही मैंने आँखें बंद की तो आँसुओं की एक बूँद उनसे टपक पड़ी।

थोड़ी देर में मैं संयत होते हुए बोला “उस लड़की के साथ बहुत ही अन्याय हुआ है ……… डंकिनी! तुमने हमारी मदद की है, …….. तुम सच बोल रही हो ………..” इतना सुनते ही डंकिनी के गालों पर पर खुशी की लाली छा गई, “मेरी बात पूरी नहीं हुई है! ……...….” मैंने डंकिनी को बीच में रोकते हुए कहा “..........तुम सच बोल रही हो ये मानने का मेरा मन कर रहा है …….. पर तुम झूठ बोल रही हो”। “क्या बात कर रहा है यार! ……… मुझे लगता है ये सच बोल रही है” नितिन के सवाल से सबकी नजर मुझपर आ टिकी।

“अभी पता चल जाएगा कि ये सच बोल रही है या नहीं! …….. डंकिनी, तुम्हारी कहानी ने कई सवाल खड़े कर दिये हैं और उनका जवाब दिये बगैर तुम्हारी किसी भी बात पर भरोसा करना असंभव है” मेरी बातों से डंकिनी के चेहरे पर दर्द साफ़ झलक रहा था तभी विवेक ने स्थिति संभालने की कोशिश करते हुए कहा “कमअॉन यार! …….. वो झूठ क्यों बोलेगी?” तभी डंकिनी ने अपने आँसु पोछते हुए कहा “रहने दो विवेक! ……….. मैं जानती थी कि तुम्हारे दोस्त आसानी से मेरी बातों का भरोसा नहीं करेंगे” मेरी तरफ़ मुँह करते हुए वह बोली “पूछो नरेन्द्र जो तुम्हें पूछना है, मैं तुम्हारे हर सवाल का जवाब देने को तैयार हुँ”।

मेरे होठों पर मुस्कान थी …… वो तैयार थी और मेरे सवाल भी।

------- सवाल नं १ ------

“तुम्हारे हिसाब से यह दुर्घटना ४० सालों पहले घटी थी लेकिन तुम इस घटना को इतनी बारीकी से कैसे जानती हो? ४० साल पहले हममे से कोई भी पैदा नहीं हुआ था और अगर तुम कोई चुड़ैल नहीं हो तो तुम्हारा जन्म भी इस घटना के कई सालों बाद हुआ होगा। एैसा तो तभी हो सकता है जब या तो तुम्हारे पास गौरी की पर्सनल डायरी हो ………. गौरी पढी-लिखी भी थी कि नहीं ये भी पता नहीं है ……… और एक पल को ये मान भी लें की गौरी अपने जीवन से जुड़ी हर बात लिखती हो तब भी गौरी की डायरी में इस घटना का कोई जिक्र नहीं हो सकता क्योंकि……..” सबकी नजरें मेरी तरफ़ थी, “....... क्योंकि मुर्दे डायरी नहीं लिखते! ……… गौरी तो उसी रात मर गई थी और ये राज उसके साथ ही दफन हो गया होगा, फिर भी तुम्हें इस घटना के बारे में इतनी पता है जैसे तुमने खुद ये मंज़र देखा हो जो संभव नहीं है…… इसका एक ही मतलब है कि ये कहानी तुम्हारे शैतानी दिमाग की उपज है”।

“तुम सही हो, ….!” सबकी नजर गौरी पर आ टिकी, वो आगे बोली “ये घटना ४० साल पहले हुई थी और उस समय मैं तो पैदा भी नहीं हुई थी………. तुम सही कह रहे हो, गौरी कोई डायरी नहीं लिखती थी पर एक डायरी थी जो मेरे दादाजी लिखते थे। वो एक जाने-माने तांत्रिक और ज्योतिषी थे, …...…. जिस जगह गौरी की अस्मत लूटी गई वो गुफ़ा मेरे दादाजी का साधना स्थल थी। उस दिन मेरे दादाजी नोएड़ा में एक गाँव के सरपंच के घर गए थे, उनकी बहु को कोई ऊपरी बाधा थी। वहाँ से जब दादाजी लौटे तो उन्हें गुफ़ा के आस-पास अजीब सी उर्जा का अहसास हुआ। थोड़ी ही देर में वो समझ गए कि क्या हुआ था। उस दिन के बाद से दादाजी बीमार रहने लगें ……. दादाजी गौरी की मदद करना चाहते थे पर उनकी यह विद्या उनके साथ ही लुप्त होने वाली थी, उन्हें किसी शिष्य की जरूरत थी जो उनके अधूरे काम को कर सके। करीब १५ सालों तक दादाजी इस राज को लेकर मन ही मन कुढ़ते रहे फिर मेरा जन्म हुआ। उम्र बढ़ने की वजह से उनकी साधना में मैं मदद करने लगी और मुझे दादाजी की क्रियॉओं में दिलचस्पी होने लगी।

धीरे-धीरे मैंने दादाजी की सभी विद्याओं में महारत हासिल कर ली पर दादाजी की उदासी और बीमारी की वजह के बारे में मुझे कुुछ भी पता नहीं था ………. शायद दादाजी फ़ैसला नहीं कर पा रहे थे कि मुझे उस खतरनाक राज़ के बारे में बताएँ या नहीं। एक रात दादाजी ने मुझे पास हिलाया ……… उस दिन उनकी तबीयत कुछ ज्यादा ही खराब थी ………. मेरे माता-पिता किसी शादी में गए हुए थे और रात को नहीं आने वाले थे …… “क्या हुआ दादाजी?......” मैंने पूछा पर दादाजी कुछ बुदबुदा रहे थे, शायद कोई मंत्र पढ़ रहे थे। उनके चेहरे पर दर्द साफ़ झलक रहा था।

“बेटी! ……..”, “हाँ दादाजी ……..” मेरी चिंता बढ़ रही थी। “जाने का वक्त आ गया बेटी” दादाजी बोल ही रहे थे कि मैंने उनकी बात काटते हुए कहा “एैसा मत कहिये दादाजी! …….. आपको कुछ नहीं होगा”।

“मुझे पर एक अहसान करेगी? दादाजी की आँखों में आँसु थे। “आज्ञा दीजिये दादाजी! ….. आपने मुझे ये सब सिखाया है” मेरी आँखों में भी आँसु आ गए।

“ये मेलोडी इतनी चॉकलेटी क्यों है?.....” दादाजी बोले।

पलभर के लिए तो मैं भी स्तब्ध रह गई फिर ठठाकर जोर से हँस पड़ी। दादाजी इस स्थिति में भी मजाक कर लेते हैं और इसी वजह से मेरी और दादाजी की खूब बनती थी। फिर वो गंभीर होकर बोले "बेटी! ....", "हाँ दादाजी! .... आप कुछ कहना चाहते हैं मुझसे। ...... प्लीज बताइये ना!" मैं बेचैन होते हुए बोली। दादाजी थोड़े हिचके फिर बोले "बेटी! मैंने तुम्हे मेरी सारी विद्या सिखाई। ...... अगर बदले में कुछ माँगू तो देगी?" मैं थोड़े अचरज से बोली "हाँ दादाजी! ...... बोलिये ना मैं आपके लिए क्या कर सकती हूँ"।

 


"बेटी मेरे दिल पर एक बोझ है। ....... एक कर्ज है जो मैं नहीं चुका पाया, तू मेरी मदद करेगी!" दादाजी खाँसते हए बोले "हाँ दादाजी मैं आपके लिए कुछ भी कर सकती हूँ, प्लीज बताइये मुझे क्या करना होगा। ......." मैंने जवाब दिया।

"उधर मेरी अलमारी की दराज में एक किताब लेकर आ बेटी" उन्होंने एक तरफ इशारा किया, मैंने अलमारी की दराज खोलकर एक छोटी सी किताब निकाली और दादाजी को थमा दी। थोड़ी देर तक दादाजी उस किताब के पन्ने पलटते रहे फिर एक छोटा सा कागज़ का टुकड़ा किताब के बीच से निकाल कर मुझे दिया और बोले "मैं तुम्हे एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी देने जा रहा हूँ बेटी! इसे ठीक से निभाना ......... उसके साथ बहुत गलत हुआ है ....... उसे मुक्ति देनी होगी"। "किसे मुक्ति देने की बात कर रहे है दादाजी?" मैंने पूछा तो वो आँखे बंद करते हुए बोले "सब पता चल जाएगा बेटी, ये कागज़ का टुकड़ा तुझे तेरी मंजिल तक पहुंचाएगा"।

वो दादाजी के आखिरी शब्द थे, दादाजी ने मुझसे कुछ माँगा था और मुझे हर हाल में उनकी अंतिम इच्छा पूरी करनी थी। उस कागज़ के टुकड़े में एक छोटा सा नक्शा था किसी जगह का जो नोएडा से १२० किलोमीटर दूर एक जंगल में था। ठीक एक महीने बाद मैं उस जगह की खोज में निकल पड़ी, मेरी यात्रा सामान्य थी पर अंतिम ५० किलोमीटर बहुत मुश्किल से पर हुए। जिसे देखो वो ही उस हाईवे तक जाना ही नहीं चाहता था, एक टैक्सी ड्राइवर से मैंने जाने को कहा तो वो अपनी गाडी छोड़कर ऐसे भागा जैसे मैंने किसी भूतमहल जाने की बात कर दी हो। थोड़ा आस-पास के गाँव से पूछने पर पता चला कि वो हाइवे भुतहा है और ना जाने कितनी दुर्घटनाये वहां हो चुकी थी। आलम तो ये था कि पिछले २० सालों में कम से कम ५० लोग लापता हो गए थे। मेरे दिल में डर की लहर दौड़ गई, दादाजी को ऐसी जगह में ना जाने कौन सा काम था। सबने मुझे वहाँ जाने से रोका पर मैं अपना वचन नहीं भुला सकती थी।

काफी कोशिशों के बाद मैं उस जगह पहुंची जहाँ दादाजी ने कहा था। यह जंगल के बीचो-बीच ऊँचाई पर एक छोटी सी गुफा थी जिसके चारों तरफ जंगल इतना घना था की दिन में भी डर लगता था। अजीब से शान्ति थी वहाँ, ..... बड़ा ही अजीब सा सन्नाटा फैला हुआ था वहाँ, ....... पता नहीं क्यों मेरा दिल वहाँ पर जोर-जोर से रोने को क्यों कर रहा था। मैं गुफा के अंदर गई, ये मेरे दादाजी की साधना का गुप्त स्थान था, अब मुझे समझ आया जब दादाजी अचानक ही कई-कई दिनों के लिए गायब हो जाते थे। पर दादाजी ने मुझे यहाँ क्यों भेजा? ......... क्या कोई राज दफ़न है यहाँ? मैं उस जगह की तलाशी लेने लगी तो एक छोटे से संदूक में एक छोटी सी डायरी मिली, ये दादाजी की डायरी थी। दादाजी डायरी भी लिखते थे ये उन्होंने कभी बताया नहीं।

मैं घरवालों को बताकर आई थी की सहेली की शादी में जा रहीं हूँ और २-३ दिनों बाद लौटूंगी, मैंने अपनी एक सहेली का नंबर देकर उसे समझ भी दिया अगर घर से फोन आये तो क्या करना है। शाम घिर आई थी, आज का दिन तो निकल ही गया था पर फिर भी मेरे पास पुरे दो दिन थे दादाजी की डायरी पढ़ने के लिए। मैंने अपना सामन जमाया, खाने पीने का सामान रखा और शुरू हो गई दादाजी की डायरी को पढ़ने के लिए।

-------- दादाजी की डायरी / पेज न. १ ---------

आज मैं बहुत खुश हूँ, मेरे घर में एक नन्ही से गुड़िया आई है,

मेरी पोती बहुत प्यारी है,

आखिर इतने सालों बाद मैं खुश हुआ हूँ,

मेरा बरसों से चला इन्तजार अब ख़त्म होने को है।

-------- दादाजी की डायरी / पेज न. २३ ---------

आज मैं और मेरी पोती बहुत खेले,

पौधों में पानी डालते हुए उसने मुझे पूरा भिगो दिया,

पूरी की पूरी शरारती है ये गुड़िया,

मैं भी उसे भिगोने के लिए दौड़ा तो वो भाग गई,

हा हा हा ।

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दादाजी की डायरी पढ़कर मुझे बहुत मजा आ रहा था, मैं पन्ने पर पन्ने पलटती रही कि तभी एक पन्ने पर आकर मेरी ख़ुशी गायब हो गई।

-------- दादाजी की डायरी / पेज न. २०६, १९७०, शनिवार ---------

आज मैं जबसे यहाँ आया हूँ बड़ा अजीब लग रहा है,

पूरा माहौल बदला हुआ था,

........ अजीब सी नाकारास्तमकता फैली हुई हैं यहाँ।

कुछ तो गलत हुआ है यहाँ, ...... जो भी हो मुझे पता करना पड़ेगा!

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-------- दादाजी की डायरी / पेज न. २११, १९७०, रविवार रात ३:४७ बजे ---------

जब से मैं यहाँ आया हुँ, बड़ा अजीब सी लग रहा है। हमेशा मेरी साधना से पवित्र यह जगह मानों किसी मनहूसियत का शिकार हो गई है। कई बार तो एैसा लगा जैसे कोई मुझे पुकार रहा हो …….… किसी लड़की की दर्द भरी कराह लगातार आ रही है। पहली बार एैसा लग रहा है कि शायद यह मेरी डायरी का आखिरी पेज़ है।

-------- दादाजी की डायरी / पेज न. २२३, १९७० ---------

……. रात के तीन बज रहेे है और मैं अभी भी उस सपने के बारे में सोंच रहा हुँ जो मुझे पिछली तीन रातों से जगा रहा है। सपने में कोई लड़की चीख रही थी …….. उसकी चीखें बड़ी दर्दनाक थी, एैसा लग रहा था जैसे कोई उसे जिन्दा ही खा रहा था।

मैंने टार्च संभाली और गुफ़ा के बाहर आया तो आसमान एकदम काला था, दूर-दूर तक सितारों का कोई निशाना ना था। पास में ही मेरी धूनी अभी भी जल रही थी ………. अचानक एैसा लगा जैसे किसी ने मेरे कंधे पर हाथ रखा, …….. मैंने पलटकर देखा तो कोई नहीं था। मैंने अपना रक्षा कवच मंत्रों से सक्रीय कर लिया। मेरा मंत्र पाठ जारी ही था कि किसी के जोर से चीखने की आवाज़ आई, …… सहसा ही मेरे कदम उस तरफ़ बढ़ चले। मैंने कुछ उड़द के दाने अभिमंत्रित कर रखे थे जो एैसा प्रेत माया का अंत कर सकते थें।

लड़की की दर्दनाक चीखें लगातार गूँज रही थी ……… अचानक मैंने टार्च की रोशनी जमीन पर डाली तो एक लड़की का हाथ दिख रहा था। शायद कोई उसे मारने के इरादे से यहाँ साया और जिंदा ही दफ़नाकर चला गया। मै आगे बढ़ा और लड़की का हाथ पकड़कर निकालने की कोशिश की तो लड़की का कटा हाथ निकला, …….. उससे पहले मैं अभी समझने की कोशिश कर ही रहा था कि कहीं से कुछ 'चपर चपर की आवाज़ आने लगी। दो खूंखार भेड़िये लड़की के दूसरे हाथ को नोंच-नोंच कर खा रहे थे। ……. हाथ पूरा खून से सना हुआ था और जमीन में सीधा धँसा हुआ था। हाँथ से खून निकलकर नीचे मिट्टी में मिल रहा था। सर्द रात में दो स्याह भेड़िये और उनकी खूनी लाल आँखें बड़े भयानक लग रहे थे, अगर मैं तांत्रिक ना होकर कोई साधारण इंसान होता तो कब का मेरा दिल धड़कना बंद कर देता। मुझे देखकर तरफ़ खूंखार भेड़िये गुर्राते हुए मेरी तरफ़ लपके, …… मैं पीछे हटा और अभिमंत्रित उड़द के दाने फेंके तो दोनों भेड़िये तड़पकर पीछे हटे।

मैंने आगे बढने के लिये कदम बढ़ाया तो मेरे पैर जमीन से चिपक से गए। दो हाथ जमीन फाड़कर निकले और मेरे पैरों को जकड़ लिये। ……… अचानक जमीन में गड़ा हाँथ काँपने लगा……… इससे पहले मैं कुछ समझ पाता, हाँथ के साथ-साथ एक लड़की का सडा-गला शरीर जमीन फाड़कर निकला। वो मेरी तरफ़ बढ़ी …..

मेरे दोनों हाथों को भेड़िये चबा गए, …….. मैं कुछ पकड़ भी नहीं सकता था। धीरे-धीरे वो मेरे पास आई और मेरे कान में बोली …… “ब…...द…….ला!!”

मेरी आँखें खुल गई …….. शुक्र है यह एक सपना था। पर उसने मुझे मारा क्यों नहीं? ……….. शायद उसकी कोई इच्छा अधूरी है। अब वक्त आ गया है इस सपने के पीछे का सच जानने का ……….. आज की रात! …….. फ़ैसले की रात होगी।

------- डायरी / पेज न. २२३ -------

दिनभर से मेरी साधना जारी है, मेरी तैयारी पूरी हो गई है और अब उस शैतानी शक्ति के बारे में पता चल ही जाएगा जिसने मेरे साधना स्थल को दूषित किया है। पता नहीं वो लड़की कौन थी? ....... क्या वो मेरी मदद चाह रही थी या वो भी कोई माया थी। ......

रात के दस बजी है और मैंने अपनी तैयारी शुरू कर दी है, पूजा का सामान तैयार है। मैंने माँ का नाम लेकर अपनी अलख जला दी, माँ का आह्वान करने के बाद भोग दिया और पूरी गुफा को अभिमंत्रित करने के बाद मैंने अपना रक्षा कवच धारण कर लिया। अपने चारों और रक्षा घेरा बनाकर मैंने अपनी साधना शुरू की। ..... जैसे जैसे आहुति पड़ रही थी पूरी गुफा में पवित्रता लौट रही थी। अभी ११ आहुतियाँ ही हुई थी कि पूरी गुफा में अजीब से हलचल शुरू हो गई। कोने में रखा पानी का मटका अपने आप गिर पड़ा, ....... अलमारी में रखी मेरी किताबें बाहर गिरने लगी, कुछ किताबों में तो आग भी लग रही थी। जैसे-जैसे मेरी आहुति पड़ती जा रही थी हलचल और बढ़ती जा रही थी, आखिरकार एक तेज हवा का झोंका आया और गुफा की सारी मशालें बुझ गई। सिर्फ मेरी धूनी ही जल रही थी, ....... आख़िरकार मैंने कहा "अगर तुम्हारा मन भर गया हो तो बात करें?"

 


"कौन हो तुम! ......" मैंने सवाल किया पर जवाब नहीं आया बदले में कोने में रखा बड़ा सा संदूक बड़ी तेजी के साथ उछलकर छत से टकराया और नीचे गिर गया। "तो तुम नहीं मानोगी! ......" मैं फिर बोला "क्यों आई हो यहाँ? ........ यह मेरा साधना स्थल है" इतना सुनते ही वो मेरी तरफ झपटी पर मेरे रक्षा घेरे से तड़पकर दूर हो गई। रात के बारह बजे थे और इस सन्नाटे में उस अँधेरी गुफा में मेरी आवाज गूँज रही थी, इससे पहले में मैं दूसरी बार आवाज लगता तभी उसने जवाब दिया "मैं आई नहीं हूँ ..... लाई गई हूँ"।

"कौन लाया है तुम्हे? ...... क्या चाहती हो!......." मैंने पूछा। "ब... बदला!!" उसकी आवाज भारी हो रही थी जैसे रोने वाली हो, मुझे अंदर से लगने लगा की ये कोई शैतानी शक्ति नहीं हो सकती, यह कोई भटकी हुई आत्मा है जो मुक्त नहीं हो पा रही है। "किससे बदला चाहती हो और क्यों?......" कोई जवाब न पाकर मैंने नरमी से कहा "मैं तुम्हारी मदद कर सकता हूँ। ....... पर उसके लिए तुम्हे मुझे बताना होगा की क्या हुआ था तुम्हारे साथ"। मेरा इतना पूछते ही वो जोर से चीखी की पूरा जंगल दहल गया, थोड़ी देर के लिए तो मुझे भी अपने कान बंद करने पड़े। "मार डालूंगी उनको। ...... मैं उन्हें मार डालूंगी!!" उसकी आवाज में दर्द था और साथ ही थी नफरत जिससे वो पूरी दुनिया को जलाना चाहती थी।

वो कुछ भी बताने की स्तिथि में नहीं थी, मैंने कर्णपिशाचिनी का आह्वान करके अपनी आँखे बंद की ताकि मैं इसके बारे में जान सकूँ। आँखें बंद करते ही पिछले कुछ दिनों पहले जो हुआ वो मेरे सामने चलचित्र की तरह आ गया। माँ ने मुझे बताया की मेरी गुफा में आई आत्मा कौन थी। मेरी शक्ति ने मुझे दिखाया की किस तरह पाँच दरिंदो ने उस मासूम लड़की को बेरहमी से नोंच-नोंचकर खाया है। मैंने देखा की कैसे वो जुल्मी भेड़िये उस लड़की को मसल रहे थे, दो ने लड़की के हाथ पकड़ रखे थे और बाकी दो लड़की के स्तनों का मर्दन करने में लगे हुए थे। पहले उस शक्तिशाली आदमी ने उस फूल सी लड़की का घाघरा फाड़कर फ़ेंक दिया बाकी दोनों ने लड़की की चोली जानवरों की तरह फाड़ डाली और उसके नग्न स्तनों को अपने नाखूनों से नोंचते, खसोटते, काटते, दर्द से लड़की की चीखों से पूरा जंगल गूँज रहा था पर उन शैतानों के कानों में जू तक नहीं रेंग रही थी।

पहले वो भीमकाय व्यक्ति लड़की की नंगी जांघो पर झुक गया और लड़की की दर्दनाक चीकों से आसमान गूँज गया। रात की घनघोर बारिश में पूरी जमीन लड़की के खून से रंग गई, .... वो दर्द से चिल्लाती रही पर इन हैवानों पर कोई असर ना हुआ, वो बारी-बारी अपनी भूख मिटाते रहे। काली रात में जंगल के बीचोंबीच पांच भेड़िये उस लड़की को नोंचते रहे और वो चीखती रही .... चीखती रही ..... चीखती रही तब तक जब तक उसके गले में आवाज थी और शरीर में प्राण। आखिरकार इंसानियत हार गई और हैवानियत जीत गई, उन पाँच भेड़ियों की हवस की भूख मिट गई और इसके साथ ही मिट गई एक फूल से बच्ची की हैसियत। ना जाने कितने सपने देखे होंगे उसने पर उन सपनों का ये अंत होगा ये कभी नहीं सोचा था। ये तो तय था कि उस दिन भगवान् भी वहां नहीं थे अन्यथा यह घोर पाप ना होता।

मैंने आँखे खोली, वो भी शांत हो गई थी जैसे उसका मकसद पूरा हो गया था। वो मुझे यही बताना चाहती थी, ..... वो मुझसे मदद चाहती थी। ......... मदद उन पाँचों को मारने में मदद। ..... जो मेरे सिद्धांतों के खिलाफ था। मैंने उसे समझाने की कोशिश की पर वो नहीं मानने वाली थी। मैंने उसे समझाया की बदला लेकर भी उसको शान्ति नहीं मिलेगी, भगवान् उनको सजा देंगे पर वो ना सुनी। देखते ही देखते उसने एक साल के अंदर उन पाँचों को मार डाला। उसका बदला पूरा हो गया था और मौत का ये सिलसिला भी अब ख़त्म होने वाला था। पर वो एक अंत नहीं था बल्कि शुरुआत थी एक नए खुनी संघर्ष की जिसमे ना जाने कितने लोगों को उसने बदले की इच्छा से मार डाला। जो भी उस हाइवे से निकला, वो घर नहीं पहुंचा। वो अँधेरी रात में लोगों से लिफ्ट लेती, भरी रात में सुनसान हाइवे पर एक सुन्दर से लड़की देखकर हर आदमी फँस गया, उसका गदराया बदन देखकर सबका ईमान डोला और फिर उसने किसी को नहीं छोड़ा। काश कोई वहां से सच्चा इंसान निकलता जो इस तुच्छ वासना से ऊपर उठ कर उस लड़की की मदद करता तो शायद उसको मुक्ति मिल जाती पर नहीं, उसकी मुक्ति आसान नहीं थी और अब यही मेरा लक्ष्य बन गया था।

“एक्सक्यूज मी!....” डाक्टर ने वार्ड में घुसते हुए कहा “पेशेंट की ड्रेसिंग का वक्त हो गया है, आप लोग बाहर जाइए”। सभी बाहर चले गए, डाक्टर ने आदतानुसार कुछ सवाल किये फिर संतुष्ट होकर चला गया। नितिन वापस आते वक्त मेरे लिये जूस ले आया और बाकी सबके लिये कॉफ़ी थी।

हॉस्पिटल के उस प्राईवेट वार्ड में खामोशी छाई हुई थी। डंकिनी की तरफ़ सबकी नज़रें थी तभी मैंने खामोशी तोड़ी “चलो मान लिया कि तुम सच बोल रही हो, ……. लेकिन इसका हमसे क्या संबंध है? ………. क्यों हमारे जंगल से बचकर आने के बाद वो अभिशाप खत्म हो गया, …………… अगर पिछल ४० सालों से इस मौत के हाइवे से कोई जिन्दा नहीं लौटा तो हम कैसे बच गए” ……….”और सबसे है सवाल……. वो पाँचों हैवान कौन थे?”। एक पल को तो डंकिनी थोड़ा झिझकी, तभी विवेक उठकर मेरे पास आया और बोला “नरेन्द्र की बातों का जवाब दो! …….. झिझको मत!”

“क्योंकि ……. क्योंकि! …….. तुम लोगों के पिता थे!” मुझे एैसा लगा जैसे कोई बहुत बड़ा धमाका मेरे कानों में हुआ था ……… आँखों के सामने अँधेरा छा गया, कुछ ना सुनाई दे रहा था और ना ही कुछ दिखाई दे रहा था। जैसे मैं किसी अंधेरे कमरे में हुँ जहाँ मीलों तक था सिर्फ़ अँधेरा। अचानक मेरे सामने का दृश्य साफ हुआ, ……. मैं अभी भी उसी वार्ड में था ……… मेरे दोस्त मेरे सामने थे और सामने थी वो जिसके टुकड़े करने को मेरा रोम-रोम कह रहा था।

“गोली मत चलाना नरेन्द्र!!! ….” विवेक मिन्नतें कर रहा था, सभी मुझे रोक रहे थे ………. मेरी आँखों में खून उतर रहा था ……… मेरे पिता का अपमान!!!!!

सामने डंकिनी खड़ी थी और उसकी आँखों में डर नहीं था, …….. मेरी आँखों की पुतलियाँ सिकुड़ गई, ……… मेरे जबड़े भिंच गए और रिवाल्वर के ट्रिगर पर मेरी अंगुलियाँ दबाव बढ़ा रही थी। आज मेरी सबसे बड़ी लड़ाई खुद से है, …….. इसे मार दूँ या इसे बोलने का का मौका। अगले किसी भी पल में गोली चल सकती थी

………. दिसम्बर की सर्द हवाएँ मेरे गले को छू रही थी। ………….आसमान में घुमड़ते बादल जैसे किसी अनहोनी की आशंका से सहमे हुए थे …………. परिंदे भी चीख-चीखकर मानों मुझे रोकना चाहते हों ………. गली में भौंकते कुत्तों का हुजूम भी आने वाली मौत की दहशत से डरकर मातम मनाने लगा।

“धाँ!.....य!......” मैंने ट्रिगर दबा दिया और एक दर्दनाक चीख के साथ सब शांत हो गया।

नितिन और सुनील ने अपनी आँखें बंद कर ली, …….. विवेक भौचक्का मुझे देख रहा था ……… सामने थी डंकिनी …… उसकी आँखें अभी भी मुझे देख रही थी, शायद उसे इसकी उम्मीद पहले से ही थी। वो अभी भी जिन्दा थी …..….. क्योंकि गोली उसके सिर के बगल से निकल गई। सबकी आँखों में हैरानी थी, ….. मेरा निशाना चूका नहीं था किन्तु बदल गया था। मैं डंकिनी की आँखों में झूठ का डर ढूँढ रहा था लेकिन आखिरी पल तक उसकी आँखों में तैरती सच्चाई मुझे बेचैन कर रही थी ………. वो सच कह रही थी।

“मैंने पूरी जाँच की है इसकी बात की!....” विवेक ने मेरी तरफ़ देखा और बोला “२४ दिसम्बर १९७०, शुक्रवार को हम सबके पिता मेरे पिता की गाड़ी में फ़तेहपुर से शाम साढे छः बजे निकले थे नोएड़ा के लिये”। “......... उनके दोस्त और हमारे अंकल सुनेर सिंह तोमर की शादी थी।….. वो निकले जरूर थे पर पहुँचे सुबह के १० बजे थे, अंकल के पूछने पर उन्होंने बताया एक जंगली जानवर ने हमला कर दिया था इसलिए देर हुई।

अचानक भड़ाक से वार्ड का दरवाजा खुला और डाक्टर के साथ तीन पुलिसकर्मी अंदर आए “गोली किसने चलाई!!.....” एक पुलिस वाले ने पूछा। नितिन ने घबराहट को छुपाते हुए कहा “क … किसी ने नहीं सर!..। “तुझे मैं क्या पागल दिखता हुँ क्या? यहाँ गोली चली है! …... किसने गोली चलाई है?” दूसरा पुलिस वाला आँखें तरेरकर बोला। हवलदार ने नितिन के कंधे पर हाथ रखा और बोला “रे भाया सुन! चुपचाप बता दे गोली किसने चलाई ………… वरना ताऊ, इब थारे को कौन बचाएगा”।

“मैं जानती हुँ गोली किसने चलाई!.....” डंकिनी की आवाज़ सुन सब पलटे। “तो मैडम आप ही बता दो गोली किसने चलाई! बड़ी मेहरबानी होगी” हवलदार डंकिनी के उभारों पर लालची नज़र डालते हुए बोला। ये देख हवलदार पर मुझे गुस्सा आने लगा, मन कर रहा था कि हवलदार को यहीं ठोक दूँ, पता नहीं डंकिनी के लिये मेरे दिल में हमदर्दी कब से आ गई।

 


डंकिनी की अंगुली मेरी तरफ़ घूम गई, हवलदार ने मेरी तरफ़ देखा और हँसते हुए बोला “अच्छा तो ये साहब थे? बहुत गर्मी है इनके हाँथों में”। हवलदार मेरे पास आया, एक पल को लगा जैसे सब खत्म हो गया, “अब तेरा क्या होगा कालिया!!” हँसते हुए हवलदार चला गया। मेरा सर चक्करघिन्नी बना हुआ था, तभी सब हँसने लगे और सबकी मेरी तरफ़ थी। विवेक ने मुझे पीछे देखने का इशारा किया और फिर मैं भी पेट पकड़कर हँसने लगा।

पीछे टेलीविजन पर 'शोले’ आ रही थी जिसमें गब्बर कालिया को गोली मार देता है।

ना जाने हम कितनी देर तक हँसते रहे पहली बार डंकिनी हँसते हुए अच्छी लग रही थी। उस एक पल ने वार्ड का पूरा माहौल बदल दिया और इसका सबूत था कि मेरे हाथ में रिवाल्वर की जगह जूस का ग्लास था। थोड़ी देर बाद मैंने डंकिनी की तरफ़ देखकर मुस्कुराते हुए कहा “तो तुम दुश्मन नहीं हो!” उसके गालों में लाली छा गई।

“अब मैं कोई सवाल नहीं करूंगा, …… अगर तुम कुछ कहना चाहती हो तो हम सब सुन रहे हैं” मैंने डंकिनी को कॉफ़ी देते हुए कहा।

डंकिनी ने कॉफ़ी का सिप लेते हुए आगे कहना शुरू किया

“मेरे सामने सबसे बड़ा सवाल था कि गौरी को मुक्ति कैसे दिलाई जाए ….. किसी आत्मा को सजा देना या उसे कैद करना आसान है पर मुक्ति का कोई तरीका मुझे नहीं पता था और शायद यही दुविधा दादाजी की भी थी। मुझे कुछ एैसा करना था जो मैंने कभी नहीं किया। महीनों मैं इस समस्या का हल ढूँढती रही लेकिन कुछ नहीं हुआ, …… फिर मेरी मुलाकात हुई विवेक से लंदन के एक पॅरानेचुरल साइंस फ़ाउंडेशन का वर्कशॉप था जो १० दिनों तक चला। मेरी शक्तियों की वजह से मैं जान गई कि विवेक के पिता उन पाँचों में से एक थे इसलिए मैंने विवेक से बात की”।

मेरी नज़रें विवेक पर जा टिकी, विवेक चुप था। डंकिनी फिर बोली “पहले-पहल तो विवेक ने मेरी बात का विश्वास नहीं किया ……. फिर जब मैंने उसे सबूत दिखाए तो उसने खुद जाँच की ……. आखिरकार उसे मेरी बातों पर भरोसा करना ही पड़ा।

गौरी के साथ घटी इस दुर्घटना ने मर्दों पर से उसका भरोसा उठा दिया। वो समझने लगी कि सारे मर्द हैवान होते हैं और इसी वजह से अपने दोषियों को मारने के बाद भी उसे मुक्ति नहीं मिली। ……. उसके सीने में आग धधक रही थी ……… नफ़रत की आग। उसकी मुक्ति का एक ही तरीका था कि उसे अहसास दिलाया जाए कि सभी मर्द एक जैसे नहीं होते हैं”।

डंकिनी ने मेरी तरफ़ देखते हुए कहा “कुछ मर्द होते हैं जो स्त्रियों का सम्मान करते हैं और उनकी रक्षा के लिये अपनी जान तक दे सकते हैं”।

“इसलिए तुमने इतिहास को दोहराया, विवेक की मदद से हम सबको उसी परिस्थिति में डाला ताकि हम हमारे पिता के द्वारा की गई गलती को सुधार सकें” मैंने डंकिनी की तरफ़ देखकर कहा, उसने सहमति में सिर हिला दिया और बोली “इसमें खतरा जरूर था लेकिन गौरी की मुक्ति तभी हो सकती थी जब उसे तुम बचाओ ………. अपनी जान देकर”।

मैं गहरी सोंच में डूबा हुआ था ….. “अगर एैसा था तो हम सबने हाइवे पर उसकी मदद की थी, फिर तुम्हारा वहाँ क्या काम था? अगर हम गौरी को सही-सलामत जंगल से बाहर छोड़ देते तो उसे मुक्ति मिल जाती”। डंकिनी मेरी बातों पर मुस्कुराते हुए बोली “ये इतना आसान नहीं था, मरने के बाद भटकती आत्मा के कुछ गुण इंसानों के रहते हैं और कुछ प्रेत योनी के। उसे सामान्य इंसानों की तरह नहीं समझाया जा सकता, वे कुछ भावनाएँ ही समझते हैं जैसे डर, दर्द, प्रेम, वासना, बदला आदि। तुम उसको तभी बचा पाते जब वो खतरे में हो, किसी भयंकर खतरे में।

इस कहानी में तुम्हें नायक बनाने के लिये किसी खलनायक की जरूरत थी, …….. तुम्हें राम बनाने के लिये मुझे रावण बनना पड़ा और मैं देविका से बन गई डंकिनी।

“चलो तुम्हारा असली नाम तो पता चला, ……… अब कम से कम मुझे तुम्हें डंकिनी नहीं कहना पड़ेगा, यह नाम मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं” मैंने कहा।

“मुझे भी यह नाम पसंद नहीं! जब तुम मुझे इस नाम से पुकारते थे तो मन करता था कि सच में तुम्हारा खून पी जाँऊ” वो बनावटी गुस्सा दिखाते हुए बोली।

वार्ड में शांती छाई हुई थी और ये सच में सुकून भरी शांती थी। काफ़ी देर तक कोई नहीं बोला फिर मैं उठा और देविका (डंकिनी) के पास गया और बोला - “देविका, ……. मैंने तुम्हें बहुत गलत समझा ….. यहाँ तक की तुम पर गोली भी चला दी पर फिर भी तुमने मेरी जान बचाई ……….”

मैंने उसका हाथ अपने हाँथों में लिया, वो थोड़ी असहज होने लगी, ……. मैंने उसकी आँखों में आँखें डालकर कहा “वैसे मैंने जितना बुरा व्यवहार तुम्हारे साथ किया है उसके लिये मैं माफ़ी के लायक भी नहीं हुँ लेकिन अगर हो सके तो मुझे माफ़ कर दो”।

थोड़ी देर के लिये वो सकते में आ गई फिर उसने मेरी आँखों में आई नमीं को पकड़ लिया, मैंने उसका हाथ छोड़कर अपना मुँह दूसरी तरफ़ कर लिया ……… रोना मेरे स्वभाव में नहीं है। तभी मेरे कंधे पर देविका ने हाथ रखा, मैंने पलटकर देखा तो उसकी आँखों में आँसु थे जिसे देखकर मेरा दिल तड़प उठा, इससे पहले मैं कुछ बोल पाता वो बोली - “इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं है नरेन्द्र, ….. जिस तरह डंकिनी बनकर मैंने तुम्हारे साथ जो व्यवहार किया, तुम्हें मारने की कोशिश की, गौरी को मारने की कोशिश की, उसे देखकर कोई भी होता तो यही करता”।

“लेकिन वह एक नाटक था, गौरी को मुक्ति देने के लिये तुमने अपनी जान तक खतरे में डाल दी, …… किसी भी पल नाटक में कुछ गड़बड़ होती तो तुम्हारी जान जा सकती थी” मैंने बीच में उसे टोकते हुए कहा “हमारा क्या है, जो हमारे पिता ने किया उस पाप का कुछ फल तो हमें मिलना ही चाहिये था ……… तुम चाहती तो बड़ी आसानी से हमारी जान की परवाह किये बिना गौरी को आसानी से मुक्ति दिला सकती थी लेकिन तुमने एैसा नहीं किया”।

“मुझे भी नहीं पता था कि देविका गौरी को मुक्ति कैसे दिलाएगी” विवेक ने सिगरेट सुलगाते हुए कहा “देविका ने मुझे सिर्फ़ हम सबको उसी हाइवे पर लाने को कहा था लेकिन उसके बाद क्या होगा ये मुझे पता नहीं था ………. मुझे लगा कि देविका वहाँ आई ही नहीं और हम जंगल से बाहर निकल आए”।

विवेक ने सिगरेट बुझाई और थोड़ी देर में बोला “डंकिनी के रूप में देविका को मैंने पहचाना ही नहीं और गोली चला दी, ……. बाद में मुझे पता चला कि देविका ने रिवाल्वर में नकली गोलियाँ डाल दी थी। उस दिन देविका को गोली मारने के बाद हम सब भी बेहोश हो गए, बाद में हम हॉस्पिटल में होश में आए थे”।

मैंने विवेक की तरफ़ देखा फिर देविका की तरफ़ देखकर बोला “अब समझा, तुम ४० साल पहले हुई गलती को सुधारना चाहती थी, गौरी के मन में बसी इच्छा कि काश कोई उसे बचा लेता ही उसकी अंतिम इच्छा थी लेकिन गौरी के मन में बसी मर्दों के प्रति नफ़रत को खत्म करने के लिये ये जरूरी था कि उसे अहसास दिलाया जाए कि सभी मर्द बुरे नहीं होते, …….. वो पाँच शैतान थे लेकिन अधिकतर मर्द अच्छे होते हैं और वो गुस्से में कई निर्दोष मर्दों को मार रही थी”।

मेरी बात सुनकर देविका ने सहमति में सिर हिलाया।

 
----------- Six months Later -----------

मुझे हॉस्पिटल से डिस्चार्ज होने में सिर्फ़ एक दिन बाकी है, काफ़ी कुछ बदल गया इन छः महीनों में, देविका हमारे ग्रुप की बेहतरीन सदस्य बन गई, नितिन का प्रमोशन हो गया, अब वह मैनेजर बन गया था ……. सबसे बड़ी खुशी की बात तो यह थी कि विवेक शादी कर रहा था और मैं उनकी शादी में जाने के लिये कल रवाना होऊँगा। सुनील मुझे लेने आया दूसरे दिन, विवेक के घर पर शादी की पूरी तैयारी थी, मंडप सज गया था कुछ ही घंटों में शादी का कार्यक्रम शुरू होने वाला था।

पहले नितिन मुझे मिला, पीले रंग का पंजाबी सूट उस पर जँच रहा था। विवेक ने मुझे देखते ही गले लगा लिया “आराम से यार! …….. अभी पूरी मरम्मत नहीं हुई हमारी” मेरी बात पर वो जोर से हँसा फिर उसने अपनी दुल्हन से मिलवाया। मैं सब लोगों से मिल चुका था फिर भी मेरी नज़रें जैसे किसी को ढूँढ रहीं थी तभी उपर से देविका आती दिखी। सिंदूरी रंग के लहंगे में उसे देखकर तो मेरी साँस रूक गई ……… मेरा गला सूख रहा था……. ना जाने कितनी देर से मैं उसे अपलक देखे जा रहा था कि तभी नितिन ने चुटकी ली “बस भी करो यार …….. कहो तो इसी मंडप में तुम दोनों की शादी भी करवा दें?” ….. मैं झेंप गया और देविका के गालों पर शर्म की लाली छा गई।

वो मेरे पास आई और बोली “कैसे हैं आप? …….” मेरे मुँह से बस इतना ही निकला “बस ठीक हूँ”।

पहली बार देविका को देखकर मेरा दिल धक-धक कर रहा था ………. क्यों पहली बार एैसा लग रहा है कि उसे देखता जाऊँ?” कम्बख्त ये इश्क तो डेंगू से भी तेज निकला …… बस एक बार नज़रें मिली और हो गया दिल पर इश्क सवार।

विवेक की शादी शुरू हुए दो घंटे बीत चुके थे, थोड़ी ही देर में फेरे पड़ने वाले थे। मैं सिगरेट सुलगाते हुए थोड़ा बाहर आया तो दूर वाशरूम की तरफ़ एक साया दिखा, मेरे कदम अनायास ही उस तरफ़ बढ़ गए। मैं वाशरूम की तरफ बढ़ने लगा तो वो साया अदृश्य हो गया, मैं ठिठककर रुक गया। थोड़ी देर इधर-उधर देखने के बाद मैं वापस जाने के लिए पलट तो कहीं से पायल की आवाज आई, ...... पहले मुझे लगा शायद किसी ने मुझे कोल्ड्रिंक में शराब तो नहीं पिला दी क्यों की मैं तो पीता नहीं था, अचानक दूसरी बार पायल की आवाज आई और ये मेरा भ्रम नहीं हो सकता। मैं वापस पलट तो देखा वही साया वाशरूम के बगल वाले कमरे में घुस गया। मैं ज्यादा तो नहीं देख पाया पर शायद वह किसी लड़की का साया था, सबसे अजीब बात यह थी की मुझे डर लगने की बजाय कुछ अलग ही महसूस हो रहा था।

मैं थोड़ा आगे बढ़ा और कमरे के पास आ गया, दरवाजा खुला हुआ था। मैंने दरवाजे से झाँककर देखा तो कोई लड़की सज-सँवर रही थी, मैंने पूछा "हैलो! क्या आप मुझे जानती हैं?..... अंदर आ सकता हूँ?" इससे पहले मैं कुछ और बोलता आवाज आई "आ जाइये ......." आवाज सुनते ही जैसे मुझे करंट लग गया, ...... ये तो गौरी की आवाज थी" मैंने झटके से दरवाजा खोला और कमरे में घुस गया।

कमरा छोटा सा था पर बड़े करीने से सजाया हुआ था, बगल में बिस्तर पर रेशमी चादर थी और पर्दो से छन-छनकर चाँद की रौशनी बिस्तर पर पड़ रही थी। छत पर झूमर लगा हुआ था जिसकी रौशनी में पूरा कमरा सुनहरी रौशनी से नहा रहा था, सामने अलमारी थी जिसमे ढेर सारे गहने और कपडे रखे हुए थे। मैं अलमारी के पास आया, वो पुराने जमाने की रॉयल अलमारी लग रही थी, शायद शीशम की लकड़ी की होगी जिसे दस लोग भी बड़ी मुश्किल से उठा पाते, अलमारी पर लगे कांच में मेरा अक्स मुझे देखे जा रहा था, मैं काँच के पास आया अपने अक्स को करीब से देखने के लिए, ...... अचानक कमरे का दरवाजा अपने आप बंद हो गया, मैंने पलटकर देखा तो कुछ नहीं था। मैंने दरवाजा खोलने की कोशिश की पर लगा जैसे किसी ने दरवाजा बाहर से बंद कर दिया हो, जरूर कोई शैतानी कर रहा है मेरे साथ।

मैं यह अभी सोच ही रहा था कि एक आवाज आई "बाबूजी!....." मैंने पलटकर देखा तो गौरी सामने खड़ी थी ।

"गौरी तुम? .... " मैं हैरान था पर उसे देखकर खुश भी था "कहाँ थी तुम अब तक? ..... मुझे सब पता चला जो तुम्हारे साथ हमारे पिताजी ने किया था, उसके लिए हम सब तुम्हारे दोषी हैं और अगर तुम मुझे कोई सजा देना चाहती हो तो मैं तैयार हूँ" वह कुछ कहना चाहती थी कि मैंने उसे रोक और बोला "जो तुम्हारे साथ हुआ है उस पाप का बोझ हमारे कंधो पर भी है इसलिए अगर तुम्हारी मुक्ति के लिए अगर मेरी जान भी चाहिए तो वो भी मैं देने को तैयार हूँ" इतना कहकर मैंने मेरे पास से रिवाल्वर निकाल कर उसे दिया "इसमें जितनी गोलियां है सब मुझमे दाग दो ताकि इन्साफ हो उस अन्याय का जो हमारे पूर्वजों ने किया था"।

"नहीं बाबूजी! मुझे आपसे कोई शिकायत नहीं है, आप ही तो मुझे मुक्ति दिलाई है। ....... जिस दिन से मेरे साथ वो दुर्घटना हुई, मैं सोचने लगी की सभी मर्द एक जैसे होते हैं और इसी नफरत में मैं हर आदमी को मार देती थी जो उस हाइवे से गुजरता था। नफरत और बदले की आग में मैंने तुम्हारे पिताजी को भी मार दिया पर मेरे मन की आग ठंडी नहीं हुई, ..... मैं इसी तरह लोगों को मारती रही पर फिर भी मेरे मन को शान्ति नहीं मिली, …… नहीं जानती थी की असली शान्ति तो क्षमा करने में होती है ना कि बदला लेने में। फिर एक देवी मेरी मदद के लिए आई, उसने मेरी दुश्मन बनकर मुझे मुक्ति देने के लिए आपको उसी हाइवे पर बुलाया। उस दिन मैं आपको ही मारने के लिए आई थी, मैं इन्तजार कर रही थी की आप भी अपने पिता की तरह मुझ पर अपनी बुरी नजर डालोगे और मैं आपको मार दूंगी लेकिन आपने मेरी इज्जत को ढंककर मुझे हैरान कर दिया। मैं इसी उधेड़बुन में थी कि एक हैवान के घर में भगवान् कैसे जन्म ले सकते हैं लेकिन आपको देखकर मैं ये फैसला नहीं कर पा रही थी की आप सही हैं या बुरे इंसान।

जब आपने अपने दोस्तों को भेजकर खुद मेरे साथ अकेले हाइवे पर रुकने का फैसला किया तो मैंने सोचा की यह आपका बहाना है, आप अपने दोस्तों को भेजकर मेरे साथ वही करने की कोशिश करेंगे जो आपके पिता ने की थी। मैं इस बार भी गलत थी, आपने मुझे छूना तो दूर ..... मुझे वैसी नजर से देखा तक नहीं। इससे पहले मैं आप पर हमला करती डंकिनी ने मुझपर हमला कर दिया और उसकी शक्तियाँ मुझे उसके पास ले गई। मैंने सोचा की अब मैं हमेशा कहीं कैद रहूंगी पर जब भैरव ने मेरी इज्जत लूटने की कोशिश की तो मेरा पुराना दर्द हरा हो गया। भैरव मेरा बलात्कार करना चाहता था और मैं उससे बचना लेकिन उसके आगे मेरी एक ना चली और मैं बेबस होने लगी, ....... एक-एक करके उसने मेरे सारे कपडे तार-तार कर दिए। .... मेरा निर्वस्त्र बदन उसकी आँखों की सामने था, मुझे लगा की मेरे साथ फिर वही होगा जिसने मुझे इतना दर्द दिया की मैं आज भी डर जाती हूँ। लेकिन, इससे पहले वो मुझे छु पाता, आपने आकर मुझे बचाने की कोशिश की। मैं जानती थी की आप उन शैतानों के सामने टिक नहीं पाएंगे और मारे जाएंगे पर फिर भी आपने मेरी इज्जत बचाने के लिए अपनी जान की परवाह नहीं की और अपनी आखिरी साँस तक मुझे बचाने के लिए लड़ते रहे।

मैं उस समय बेहोश नहीं थी जब मैंने देखा की डंकिनी के सामने आपने ये कबूला की आप मुझे चाहते हैं। मेरी आँखों में आँसु थे की काश आप मुझे पहले मिले होते तो मेरा जीवन धन्य हो गया होता। मर्दों के प्रति मेरा जो नजरिया था वो आपने ध्वस्त कर दिया, ………. आपकी जान खतरे में देखकर मुझे भी अपनी बेबसी पर रोना आ रहा था और मैंने एक ही प्रार्थना की भगवान् से कि मेरे कर्मों की सजा मुझे दें और आपको छोड़ दें। मौत आपकी तरफ बढ़ रही थी और मेरे दिल में एक अनजाने दर्द की लहार दौड़ रही थी, ……… आखिर मेरी पुकार भगवान् तक पहुँच गई और आपके दोस्त ने आपको बचा लिया मौत के मुंह से।

 
उस दिन मेरे अंदर से वो नफरत भी ख़त्म हो गई, ..... बाबूजी मैं भी आपसे प्यार करने लगी लेकिन अब मेरे पास आपको देने के लिए कुछ नहीं है।”

उसकी आँखों में आँसु थे और मेरे मुँह से शब्द नहीं निकल रहे थे, मैं आगे बढ़ा और गौरी का चेहरा अपने चेहरे के पास लाकर बोला “गौरी, मुझे माफ़ कर दो, मैं तुम्हारे लिये कुछ भी कर सकता हुँ ……… तुम्हें प्यार देने के लिये मैं यह शरीर भी छोड़ दूँगा, फिर हम हमेशा साथ रहेंगे”।

“नहीं बाबूजी! प्रेम का मतलब सिर्फ़ मिलन नहीं बल्कि दूसरे की खुशी होती है, …….. आप खुश रहें यही मेरे लिये काफ़ी है” गौरी की बातों ने मेरी बोलती बंद कर दी थी। ...……. थोड़ी देर तक उसे रोते देखकर मैंने कहा “गौरी! ……” वो मुझे देखने लगी, मैंने पूछा “क्या तुम्हें मुक्ति मिली?”

वो हँसी और बोली “हाँ बाबूजी! ……. आज मुझे मुक्ति मिल गई” इतना कहते ही उसकी रूह जगमगाने लगी, थोड़ी देर में रोशनी मेरी बर्दाश्त से बाहर हो गई और मैंने आँखें बंद कर ली।

“बाबूजी!.......” उसकी आवाज़ मेरे कानों में पड़ी, मैंने जवाब दिया “हाँ गौरी…..”,

“कुछ माँगू तो देंगे? ….” वो गंभीर स्वर में बोली।

“जरूर ….” मैंने जवाब दिया।

“देविका को अपना लीजिए! …..” मैं चुप था, वो फिर बोली “डंकिनी बनकर उसने जो किया उसके लिये उसे माफ़ कर दीजिये….. वो आपसे बहुत प्यार करती है” उसकी बातों का कोई जवाब नहीं था मेरे पास, मैं बोला “लेकिन गौरी, …….” इससे पहले मैं कुछ बोल पाता वो बोली “कुछ मत कहिये बाबूजी! ……… मैं जानती हुँ आप भी उसे पसंद करने लगे है, ……… जो उसने मेरे लिये किया वो तो कोई बहन भी नहीं करती …….. बचपन से मेरी इच्छा थी कि मेरी भी कोई छोटी बहन हो ……… उसके रूप में मुझे वो भी मिल गई”।

“पर गौरी, मैंने उसके साथ बहुत बुरा व्यवहार किया, गोली तक चलाई मैंने उस पर ………. क्या वो मुझे…..” मैं पूरी बात करता इससे पहले ही वो बोली “उसे अपना लीजिए, ……. बचपन से वो मेरी तरह प्यार के लिये तरसी है …….. जो प्यार आप मुझे करते हैं वैसा ही प्यार आप देविका से करेंगे ………. वादा कीज़िए”।

“मैं वादा करता हुँ ……..” मेरे बोलने के साथ ही पूरे कमरे में तेज रोशनी बढ़ने लगी जैसे कई सूरज उस कमरे में आ गए हों, बंद आँखों से भी मुझे अहसास हो रहा था कि कमरे में कितनी तेज रोशनी थी।

“गौरी! …….” मैंने आवाज़ दी

“जी बाबूजी!....” उसने उत्तर दिया

“क्या मैं तुम्हें दोबारा देख पाऊँगा?....” मैंने सवाल किया

“हाँ बाबूजी …….. मैं वापस आऊँगी आपके घर …….. आपकी बेटी बनकर”।

पता नहीं मैं कितनी देर तक आँखें बंद किये था, अचानक दरवाजे पर तेज आवाज़ हुई, …….. कोई जोर से दरवाजा खटखटा रहा था। मैंने आँखें खोली और दरवाजा खोला …….. सामने देविका आँखों में आँसु लिये खड़ी थी और साथ में विवेक, सुनील, नितिन सभी लोग मुझे हैरानी से देख रहे थे।

“तुम ठीक तो हो?....” विवेक ने पूछा।

“क्या हुआ?....” मैंने पूछा

“मैंने तुम्हें इस कमरे में जाते देखा फिर थोड़ी देर में पूरे पंडाल की लाईट चली गई, हर तरफ़ अंधेरा था सिवाय इस कमरे के जिसकी तेज रोशनी दरवाजे के कोनों से आ रही थी, रोशनी बहुत तेज़ थी” सुनील हाँफ़ते हुए बोला।

मैंने देखा देविका आँखें रो रोकर सूज गई थी, मैं उठा और देविका के पास पहुँचकर बोला “क्यों इतनी फ़िक्र करती हो मेरी?”, वो कुछ ना बोली।

मैंने आगे कहा “हमारी मुलाकात एक लड़ाई से हुई, ………. हम लड़ते रहे अपने फ़र्ज के लिये, लेकिन अब ये लड़ाई खत्म हो रही है और मुझे अब लड़ने की आदत हो गई है ……… इसलिए देविका! …… क्या हम सारी जिन्दगी यूँ ही लड़ सकते हैं? …………. मैंने तुम्हें बहुत दुख दिया है……… मैं तुम्हारे लायक तो नहीं हूँ लेकिन मैं पूरी कोशिश करूंगा तुम्हें हर खुशी देने की।”

मैंने अपनी जेब से अंगूठी निकाली और झुककर देविका का हाथ पकड़ लिया, इससे पहले वो कुछ बोल पाता मैंने अंगूठी उसकी अंगुली में पहनाकर कहा “क्या तुम मुझसे जिन्दगी भर लड़ोगी? ….. लड़ाई के साथ हम थोड़ा प्यार भी कर लेंगे ……… अगर तुम मुझे अपने लायक समझती हो तो क्या तुम मुझसे शादी करेगी?”.....

--------- एक सप्ताह बाद ---------

“तो आखिरकार डंकिनी को उसका डाकू मिल ही गया ….” विवेक मुस्कुराते हुए बोला और मेरे हाथ में कुछ थमा दिया। “ये क्या है? …..” मैं पूछा तो विवेक बोला “ये सिंगापूर की टिकट हैं तुम्हारे हनीमून के लिये”। मैंने हँसते हुए कहा “शुक्रिया विवेक लेकिन मैं हनीमून के लिये कहीं और जा रहा हुँ …..” विवेक ने आश्चर्य से पूछा “कहाँ? ……”

मैंने जवाब दिया “मौत का हाइवे!”

हमारी कहानी उस रात से शुरू हुई और अब हमारी नई जिन्दगी की शुरूआत भी वहीं से होने वाली थी। ये रात भी वही थी …… बारिश भी वही ……… बस बदला था तो हमारा रिश्ता। मैंने देविका से कहा “एक काम है जो हमने अधूरा छोड़ दिया था ……. उसे पूरा करें?”

देविका के चेहरे पर शर्म की लाली छा गई। बारिश में हम दोनों भीग रहे थे और चाँद आज हमें एकटक देखे जा रहा था। डंकिनी के बदन से आपकी खुशबू मुझे मदहोश कर रही थी, …….. मेरे हाथ उसकी तरफ़ बढ़े और उसकी चोली उसके बदन को अलविदा कह गई, चाँदनी रात में उसके निर्वस्त्र स्तन मुझे आमंत्रण दे रहे थे। उसने अपना घाघरा उतारकर फेंक दिया, डंकिनी के बारिश में भीगे बदन पर मेरे हाथ फिसल रहे थे, मैंने उसके स्तनों को जोर से मसलना शरू किया फिर अचानक मुझे कुुछ याद आया और मैं झटके से दूर जाकर खड़ा हो गया।

देविका कुछ ना समझी पर डंकिनी समझ गई, वो नंगे बदन शिला पर लेट गई, अपने हाँथों से दोनों स्तनों को उठाकर उसने बारिश में भीगती अपनी माँसल जाँघे पूरी फैलाकर अपनी योनि दिखाई और बोली “आजा भोग करले! ………. संभोग करले!”

 
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