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"चिड़िया कहीं नहीं गई है! ..... ठीक से ढूँढो" उनके लीडर ने कहा, आज गौरी की किस्मत इस बेरहम मौसम के ऊपर है, तूफानी मौसम के अँधेरे और बेतहाशा होती बारिश की वजह से लाख ढूँढने के बाद भी गौरी उन शैतानो को नहीं दिखी। आज ये तूफानी मौसम गौरी को अच्छा लग रहा था क्यों की यही उसे छुपने में मदद कर रहा था, ..... शायद गौरी की किस्मत उसका साथ दे रही थी। ....... शायद वह मासूम लड़की उन बेरहम दरिंदों के चंगुल में पड़ने से बच जायेगी यह सोचकर उसके मन में उम्मीद की किरण जाग उठी।
"बस और नहीं! .... हम ज्यादा वक्त बर्बाद नहीं कर सकते उस लड़की के लिए, उसे छोड़ो और निकलते हैं यहाँ से! ....." लीडर की ये बातें सुनकर गौरी की जान में जान आई। लीडर चट्टान के ऊपर खड़ा था और उसी के नीचे वह लड़की छुपी थी पर घुप्प अँधेरे ने उसे छुपा रखा था। जैसे ही लीडर वापस जाने को मुड़ा, ..... एक जोरदार बिजली कड़की जिससे पूरा जंगल पलभर के लिए रोशनी से नाहा गया और ये एक पल गौरी की सभी उम्मीदों के दीयों को बुझाकर चला गया।
उन दरिंदों ने उसे ढूंढ लिया, गौरी की इज्जत बचाने वाला अब कोई नहीं था। उन पाँचों हैवानो ने गौरी के जिस्म के साथ खेलना शुरू किया, गौरी का बदन उन पाँचो के बीच पीसा जा रह था, कभी इस हाथ तो कभी इस हाथ। उन सबके हाथ गौरी के हर अंग को बेदर्दी से मसल रहे थे तभी लीडर का हाथ गौरी की चोली की तरफ बढ़ा, ………..गौरी ने भागने की कोशिश की पर सब बेकार था। उसकी सिसकियों से पूरा जहाँ गूँज रहा था, लीडर के हाथ गौरी की चोली के अंदर यहाँ-वहाँ घूम रहे थे की तभी उसने लड़की की चोली फाड़ दी। ........ खट, खट, खट करके उसकी चोली के सारे बटन इधर-उधर टूट के बिखर गए। वो सब गौरी के निर्वस्त्र स्तनों को बेदर्दी से मसल रहे थे जिसके दर्द से गौरी की चीखें आसमान को फाड़ने को बेताब थॆ।
थोड़ी ही देर में गौरी का घाघरा भी उसके बदन से जुड़ा हो गया और उस तूफानी रात में बारिश में भीगती निर्वस्त्र लड़की को खा जाने को बेताब थे वो कमीने। “रोती क्यों है मेरी रानी ………. तेरा चीर हरण तो हमने कर ही दिया है …….. एक बार हमें खुश कर दे, तुझे रानी बनी कर रखेंगे …..” लीड़र लार टपकाते हुए बोला, तभी दूसरे आदमी ने उसकी हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा “हाँ! ……. तू हमारी द्रौपदी है और हम तेरे पाँच पति! ……”।
“मैं तुम्हारे पैर पड़ती हुँ, मुझे जाने दीजिये ……” गौरी ने आखिरी बार विनती की पर शैतानों पर विनती का असर हुआ है कभी जो अब होता? “....... साली! … तुझे एक बार में बात समझ नहीं आती! ……. अब हम तुझे अपनी रखैल बनाकर रखेंगे!” लीड़र तमतमाते हुए बोला। “तुझे हमारे बच्चों की माँ बनाएँगे ….. “ दूसरा बोला इतनें में लीड़र बोला “नहीं! ……. उससे भी बुरा होगा तेरे साथ! …… अगर हमारी बात चुपचाप मान लेती तो हम तुझे छोड़ देते और बहुत पैसा भी देते लेकिन अब नहीं! ……… अब हम नहीं पूरा शहर तुझ पर पैसा लुटाएगा ………. अब तू हर मर्द का बिस्तर गर्म करेगी …………. रोज रात को तू एक नए मर्द के साथ होगी और वो तेरे साथ वही करेगा जो हम करने वाले हैं”।
लीड़र का इशारा पाते ही दो ने उसके हाथ पकड़कर जमीन हर फैला दिये, उधर दो ने गौरी की माँसल टाँगे फैला दी, ……….. लीड़र ने अपनी पैंट उतारकर दो हजार रुपए निकाले अपनी अडरवियर निकालने के बाद लीड़र गौरी के निर्वस्त्र बदन पर पैसे फेंकते हुए बोला “...... शहर की सबसे बड़ी रंडी बनेगी तू! …….. रंडी!! …… और इसकी शुरूआत होती है आज से ………. आज के बाद तु हमारी सूरत कभी नहीं भूलेगी!.....”।
दिसम्बर की वो सर्द तूफानी रात उस इंसानियत को शर्मिंदा करने वाले उस अपराध की गवाही बन गई। सारी रात वो उसकी अस्मत को लूटते रहे, उसके बदन को कुत्तों कि तरह नोंचते, खसोसटते, काटते और वो बेचारी अपनी किस्मत को रोती रही।
“बचाओ!!! …….. ब ……. चा!........” अंतिम साँस तक वो पुकारती रही कि शायद कोई उसे बचाने आ जाए। जिस हैवानियत के साथ एक कुँवारी लड़की का उन पाँचों ने बलात्कार किया था उससे तो कुदरत भी जैसे क्रोध में आ गई थी। बारिश और तूफ़ान की उस मनहूस रात की सुबह नहीं हुई।
उस प्राईवेट वार्ड में सब चुप थे, ….. मेरी आँखें जल रही थी और जैसे ही मैंने आँखें बंद की तो आँसुओं की एक बूँद उनसे टपक पड़ी।
थोड़ी देर में मैं संयत होते हुए बोला “उस लड़की के साथ बहुत ही अन्याय हुआ है ……… डंकिनी! तुमने हमारी मदद की है, …….. तुम सच बोल रही हो ………..” इतना सुनते ही डंकिनी के गालों पर पर खुशी की लाली छा गई, “मेरी बात पूरी नहीं हुई है! ……...….” मैंने डंकिनी को बीच में रोकते हुए कहा “..........तुम सच बोल रही हो ये मानने का मेरा मन कर रहा है …….. पर तुम झूठ बोल रही हो”। “क्या बात कर रहा है यार! ……… मुझे लगता है ये सच बोल रही है” नितिन के सवाल से सबकी नजर मुझपर आ टिकी।
“अभी पता चल जाएगा कि ये सच बोल रही है या नहीं! …….. डंकिनी, तुम्हारी कहानी ने कई सवाल खड़े कर दिये हैं और उनका जवाब दिये बगैर तुम्हारी किसी भी बात पर भरोसा करना असंभव है” मेरी बातों से डंकिनी के चेहरे पर दर्द साफ़ झलक रहा था तभी विवेक ने स्थिति संभालने की कोशिश करते हुए कहा “कमअॉन यार! …….. वो झूठ क्यों बोलेगी?” तभी डंकिनी ने अपने आँसु पोछते हुए कहा “रहने दो विवेक! ……….. मैं जानती थी कि तुम्हारे दोस्त आसानी से मेरी बातों का भरोसा नहीं करेंगे” मेरी तरफ़ मुँह करते हुए वह बोली “पूछो नरेन्द्र जो तुम्हें पूछना है, मैं तुम्हारे हर सवाल का जवाब देने को तैयार हुँ”।
मेरे होठों पर मुस्कान थी …… वो तैयार थी और मेरे सवाल भी।
------- सवाल नं १ ------
“तुम्हारे हिसाब से यह दुर्घटना ४० सालों पहले घटी थी लेकिन तुम इस घटना को इतनी बारीकी से कैसे जानती हो? ४० साल पहले हममे से कोई भी पैदा नहीं हुआ था और अगर तुम कोई चुड़ैल नहीं हो तो तुम्हारा जन्म भी इस घटना के कई सालों बाद हुआ होगा। एैसा तो तभी हो सकता है जब या तो तुम्हारे पास गौरी की पर्सनल डायरी हो ………. गौरी पढी-लिखी भी थी कि नहीं ये भी पता नहीं है ……… और एक पल को ये मान भी लें की गौरी अपने जीवन से जुड़ी हर बात लिखती हो तब भी गौरी की डायरी में इस घटना का कोई जिक्र नहीं हो सकता क्योंकि……..” सबकी नजरें मेरी तरफ़ थी, “....... क्योंकि मुर्दे डायरी नहीं लिखते! ……… गौरी तो उसी रात मर गई थी और ये राज उसके साथ ही दफन हो गया होगा, फिर भी तुम्हें इस घटना के बारे में इतनी पता है जैसे तुमने खुद ये मंज़र देखा हो जो संभव नहीं है…… इसका एक ही मतलब है कि ये कहानी तुम्हारे शैतानी दिमाग की उपज है”।
“तुम सही हो, ….!” सबकी नजर गौरी पर आ टिकी, वो आगे बोली “ये घटना ४० साल पहले हुई थी और उस समय मैं तो पैदा भी नहीं हुई थी………. तुम सही कह रहे हो, गौरी कोई डायरी नहीं लिखती थी पर एक डायरी थी जो मेरे दादाजी लिखते थे। वो एक जाने-माने तांत्रिक और ज्योतिषी थे, …...…. जिस जगह गौरी की अस्मत लूटी गई वो गुफ़ा मेरे दादाजी का साधना स्थल थी। उस दिन मेरे दादाजी नोएड़ा में एक गाँव के सरपंच के घर गए थे, उनकी बहु को कोई ऊपरी बाधा थी। वहाँ से जब दादाजी लौटे तो उन्हें गुफ़ा के आस-पास अजीब सी उर्जा का अहसास हुआ। थोड़ी ही देर में वो समझ गए कि क्या हुआ था। उस दिन के बाद से दादाजी बीमार रहने लगें ……. दादाजी गौरी की मदद करना चाहते थे पर उनकी यह विद्या उनके साथ ही लुप्त होने वाली थी, उन्हें किसी शिष्य की जरूरत थी जो उनके अधूरे काम को कर सके। करीब १५ सालों तक दादाजी इस राज को लेकर मन ही मन कुढ़ते रहे फिर मेरा जन्म हुआ। उम्र बढ़ने की वजह से उनकी साधना में मैं मदद करने लगी और मुझे दादाजी की क्रियॉओं में दिलचस्पी होने लगी।
धीरे-धीरे मैंने दादाजी की सभी विद्याओं में महारत हासिल कर ली पर दादाजी की उदासी और बीमारी की वजह के बारे में मुझे कुुछ भी पता नहीं था ………. शायद दादाजी फ़ैसला नहीं कर पा रहे थे कि मुझे उस खतरनाक राज़ के बारे में बताएँ या नहीं। एक रात दादाजी ने मुझे पास हिलाया ……… उस दिन उनकी तबीयत कुछ ज्यादा ही खराब थी ………. मेरे माता-पिता किसी शादी में गए हुए थे और रात को नहीं आने वाले थे …… “क्या हुआ दादाजी?......” मैंने पूछा पर दादाजी कुछ बुदबुदा रहे थे, शायद कोई मंत्र पढ़ रहे थे। उनके चेहरे पर दर्द साफ़ झलक रहा था।
“बेटी! ……..”, “हाँ दादाजी ……..” मेरी चिंता बढ़ रही थी। “जाने का वक्त आ गया बेटी” दादाजी बोल ही रहे थे कि मैंने उनकी बात काटते हुए कहा “एैसा मत कहिये दादाजी! …….. आपको कुछ नहीं होगा”।
“मुझे पर एक अहसान करेगी? दादाजी की आँखों में आँसु थे। “आज्ञा दीजिये दादाजी! ….. आपने मुझे ये सब सिखाया है” मेरी आँखों में भी आँसु आ गए।
“ये मेलोडी इतनी चॉकलेटी क्यों है?.....” दादाजी बोले।
पलभर के लिए तो मैं भी स्तब्ध रह गई फिर ठठाकर जोर से हँस पड़ी। दादाजी इस स्थिति में भी मजाक कर लेते हैं और इसी वजह से मेरी और दादाजी की खूब बनती थी। फिर वो गंभीर होकर बोले "बेटी! ....", "हाँ दादाजी! .... आप कुछ कहना चाहते हैं मुझसे। ...... प्लीज बताइये ना!" मैं बेचैन होते हुए बोली। दादाजी थोड़े हिचके फिर बोले "बेटी! मैंने तुम्हे मेरी सारी विद्या सिखाई। ...... अगर बदले में कुछ माँगू तो देगी?" मैं थोड़े अचरज से बोली "हाँ दादाजी! ...... बोलिये ना मैं आपके लिए क्या कर सकती हूँ"।