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लाड़ला देवर ( देवर भाभी का रोमांस) पार्ट -2

तुम्हें अपने साथ ले जाने के लिए मुझे किसी की पर्मिशन या और कोई समस्या नही है.., लेकिन जिस काम के लिए मे घर से निकला हूँ.., वो मुझे पता नही कब हो पाएगा… और कहाँ..? या हो पाएगा भी या नही…?

और जबतक मेरा वो काम ख़तम नही होता तबतक मे अपने घर वापस नही जा सकता…!

ये कहते वक़्त मेरे चेहरे पर असीम पीड़ा के भाव थे.., जिन्हें कुच्छ कुच्छ साझते हुए ललित बोला – छोटा मूह बड़ी बात.. साब जी, आप मुझे किसी बात को लेकर चिंतित दिखाई दे रहे हैं.., अगर आपको कोई एतराज ना हो तो मे आपसे उसकी वजह पूछ सकता हूँ..?

ना जाने क्यों इश्स आधे घंटे में मुझे वो लड़का ललित अपना सा लगने लगा था.., या यौं कहो की इस विकट परिस्थिति में उससे बात करके मेरे अंदर का गुबार कुच्छ कम हुआ था…!

मेने उसका बाजू पकड़कर उसी चारपाई पर अपने बगल में बिठाया और कहा – मेरी भतीजी किडनप हो गयी है.., किसी की शिनाख्त ने मुझे अपने शहर से इतनी दूर इस वीरान रात में यहाँ पहुँचा दिया है…!

मुझे नही पता वो लोग उसे किधर और कहाँ ले गये होंगे.., यहाँ तक तो पता नही मे ऐसे ही चला आया लेकिन अब मुझे कहाँ और किस तरफ जाना है ये भी नही पता…???

ललित – उस गाड़ी के बारे में आप कुच्छ बता सकते हैं…?

मे – वो काले रंग की महिंद्रा स्कॉर्पियो थी जिसमें वो लोग उसे किडनप करके ले गये हैं.., और...और... उसकी….

साइड में चमकीली पत्तियाँ थी…है ना.. मेरे वाक्य पूरा करने से पहले ही ललित ने वो शिनाख्त पूरी कर दी…!

मेने बड़े उतावले पन से कहा..हां..हां…तुम्हें कैसे पता.. क्या तुमने वो गाड़ी देखी है..?

ललित – हां साब देखी थी.., ये कोई 7:30 का समय था.., दिन छिपा ही था.., ज़्यादा अंधेरा नही हुआ था.., यहीं इस तरफ मुड़ने के बाद वो गाड़ी खड़ी हुई.. उसमें से एक स्याह कपड़ों में एक आदमी उतरा..,

पल-भर के लिए पीछे का दरवाजा खुला.., मेरी नज़र उधर ही थी.., उसी वक़्त मुझे उसमें एक लड़की दिखाई दी.., जिसके मूह पर एक कपड़े की पट्टी बँधी हुई थी…, और शायद वो बेहोश थी..

क्योंकि उसके शरीर में कोई हलचल नही हो रही थी.., बस ऐसे ही दूसरे आदमी के सहारे टिकी हुई थी…!

उस आदमी ने बाजू वाली देसी शराब की दुकान से कुच्छ शराब की बोतलें ली.., गाड़ी में बैठा और फिर वो गाड़ी इसी रोड पर तेज़ी से चली गयी…!

मे अवाक ललित के चेहरे की तरफ देखते हुए सारी बात सुन रहा था.., उसके चुप होते ही मेने कहा – ये..ईए…रोड तो दूसरे स्टेट को जाता है ना…!

ललित – हां साब और बीच में चंबल का बहुत ही ख़तरनाक जंगल भी है.., हो ना हो वो लोग उसी जंगल में आपकी भतीजी को ले गये होंगे…!

मेने प्यार से उसके सिर पर अपना हाथ फेरा.., और चारपाई से उठते हुए बोला – थॅंक यू ललित.., तुमने मेरी बहुत बड़ी मुश्किल आसान कर दी.., वरना मुझे पता ही नही चल पाता कि मेरी आगे की तलाश किस दिशा में होगी…?

तुम चिंता मत करो.., मे यहीं होकर लौटूँगा तुम तैयार रहना मे तुम्हें अपने साथ ज़रूर ले जाउन्गा.., अपना ख्याल रखना मे चलता हूँ…!
 
तुम चिंता मत करो.., मे यहीं होकर लौटूँगा तुम तैयार रहना मे तुम्हें अपने साथ ज़रूर ले जाउन्गा.., अपना ख्याल रखना मे चलता हूँ…!

जैसे ही मे जाने को हुआ.., उसने मेरा हाथ थाम लिया.., मेने मुड़कर उसकी तरफ देखा तो वो बोला – शायद आपको पता नही है साब.., जिधर आप जा रहे हो वो इलाक़ा कैसा है..? वरना आधी रात को अकेले जाने की कभी नही सोचते…!

और फिर इस अंधेरी रात में उस वीराने जंगल में आप कहाँ खोजते फिरेंगे उन दरिंदों के ठिकाने को.., मेरी बात मानिए रात यहीं किसी चारपाई पर सो जाइए.., सुबह पौ फटते ही हम दोनो साथ साथ निकल पड़ेंगे…!

मे- तुम..?? नही नही.., मे तुम्हें किसी ख़तरे में नही डाल सकता..!

ललित – क्या साब.., अभी तो आप मुझे अपने साथ अपने घर ले जाने की बात कर रहे थे.., क्यों..? क्या लगता हूँ मे आपका…?

और भी तमाम लोग यहाँ खाना खाने आते हैं.., कोई प्यार के दो बोल तक नही बोलता फिर आपने ही क्यों…?

इतना कहते कहते उसकी आँखें नम हो गयी.., मेने लपक कर उसे अपने सीने से लगाते हुए कहा – मुझे तुम्हारे अंदर अपने छोटे भाई का अक्स नज़र आया.

ललित – तो फिर अपने छोटे भाई पर भरोसा रखिए.., परिस्थितियों से लड़ते लड़ते मे अपनी उमर से ज़्यादा मजबूत और परिपक्व हो गया हूँ.., और फिर इस इलाक़े में रहते रहते यहाँ के लोगों की मानसिकता भी समझने लगा हूँ…!

एक से भले दो.., विश्वास रखिए.., मेरे साथ रहने से आपको बल ही मिलेगा.., मेरी वजह से आपका कोई काम खराब नही होगा ये मेरा वादा है आपसे…!

ललित की बातें मुझे व्यावहारिक लगी.., और मेने उसकी बात मान ली.., उसने एक चारपाई एक साइड में डाल दी और में मार्च के गुलाबी मौसम में बिना बिस्तर के ही उस चारपाई पर लेट गया…, अपनी आँखें बंद करके आगे के बारे में सोचने लगा..,

जहाँ मुझे बस अंधेरा ही अंधेरा नज़र आ रहा था…!

रात के 12 तो वैसे ही बज गये थे.., रोड साइड के ढाबो पर 1-2 बजे तक ट्रक वालों की आवा-जाहि लगी ही रहती है.., मुझे भी कहाँ नींद आनी थी…!

2 बजे के बाद सब तरफ शांति फैल गयी.., ढाबे वाले भी सब सो चुके थे.., लेकिन मेरी आँखों में नींद कहाँ…?

पड़े पड़े सोचता रहा..आँख बंद करते ही रूचि का मासूम सा चेहरा सामने आ जाता…, फिर पता नही कब मेरी आँख लग गयी और नींद ने मुझे धर दबोचा…!!

 
अभी कोई एक घंटा ही सो पाया था कि ललित ने मुझे झकझोर कर जगा दिया.. साब जी उठिए पौ फटने वाली है.., मेरा सेठ जाग गया तो पचास सवाल करेगा…!

मे जल्दी से उठा.., नींद कच्ची ही थी इसलिए आँखों पर बोझ जैसा महसूस हो रहा था.., दिमाग़ में भी भारीपन जैसा था.., लेकिन उतना तो था ही…!

ललित ने एक जग में पानी लाकर दिया.., मेने अपने मूह पर पानी मारा जिससे मेरी आँखों की खुमारी कुच्छ कम हुई…,

रुमाल से मूह पोंच्छ कर ललित को गाड़ी में बिठाया और वहाँ से भगवान का नाम लेकर चंबल की तरफ जाने वाले रास्ते पर गाड़ी दौड़ा दी….!!

वातावरण में अभी तक काफ़ी अंधेरा था.., चाँद पश्चिम की तरफ उतार रहा था चाँदनी में आस पास के लाह लाहते खेत नहाए हुए थे..,

गेंहू (वीट) की फसल पकने को थी इस वजह से धरती माँ चाँद की सुनहरी चाँदनी में और ज़्यादा चमक रही थी.., मानो सोने के आभूषण पहने दुल्हन बनी हो…!

रोड एकदम खाली था.., हमें केवल गाड़ी के एंजिन की घरघराहट सुनाई दे रही थी.., या कभी कभार किसी स्यार के बोलने की आवाज़ें कानों में पद जाती.

और कोई वक़्त होता तो मे सुबह के इस मनमोहक वातावरण का खुलकर मज़ा लेता लेकिन इस वक़्त भी मेरे दिमाग़ में विचारों का बवांडर मचा हुआ था…!

बगल की सीट पर बैठा ललित ऊंघ रहा था.., मेने हल्के हल्के शीशे गिरा रखे थे जिससे सुबह की ठंडी ठंडी हवा लग रही थी.., इस वजह से उसकी आँखें बंद हो गयी..,

पता नही ये मासूम रात भर सोया होगा या नही.., उसके मासूम चेहरे को देखकर मेरे अंदर से दया का सागर उमड़ पड़ा और मेरा एक हाथ उसके सिर पर चला गया और मे उसके बाल सहलाने लगा…!

अपने सिर पर हाथ का स्पर्श पाकर उसने अपनी आँखें खोल दी.., और मेरी तरफ देखकर मुस्करा उठा.., मेने कहा – लगता है साहबजादे रात भर सोए नही..?

ललित - हुउम्मन्न…ज़्यादा नही बस एक बार झपकी ली.., रात भर यही सोचता रहा कि यहाँ से कैसे निकल पाउन्गा.., तभी मेने सोच लिया कि हम सेठ के जागने से पहले ही निकल लेंगे इसलिए फिर मे सोया ही नही…!

मे – कोई बात नही अब आराम से सो जाओ..!!

ललित ने फिरसे अपनी आँखें बंद कर ली और गाड़ी ड्राइव करते हुए मे फिरसे अपने विचारों में गुम हो गया…!!!

पौ फटने लगी थी.., विंड्स्क्रीन पर सरसों के कीड़ों की बाढ़ सी आकर टकराने लगी.., वो मर-कर काँच पर चिपक जाते इस वजह से मुझे बार बार वाइपर चलाने पड़ते..

यहाँ तक की कुच्छ ही देर में वाइपर का पानी ख़तम हो गया.., सामने रोड भी कोई ज़्यादा अच्छा नही था.., विंड्स्क्रीन पर उन मच्छर जैसे कीड़ों के चिपकने से आगे रोड पर देखना मुश्किल होता जा रहा था..,

पानी की तलाश में मेरी नज़रें इधर उधर भटकने लगी जिससे में विंड्स्क्रीन के ग्लास को सॉफ कर सकूँ.., अंधेरा काफ़ी कम हो गया था इस वजह से काफ़ी दूर दूर तक अब मेरी नज़र पहुँच रही थी..,

तभी मेरे कानों में बगुलों की आवाज़ें सुनाई पड़ी.., ज़रूर यहाँ कहीं आस पास पानी होना ही चाहिए.., मेने रोड के साइड में गाड़ी खड़ी कर दी, पीछे की सीट पर खाली बॉटल पड़ी थी उसे लेकर जिधर से उन पक्षियों की आवाज़ें आ रही थी उधर को चल पड़ा…!

दो खेत रोड से अंदर जाने के बाद मुझे खेतों के बीच में एक छोटा सा तालाब नज़र आया.., सुबह के नित्य कर्मों का भी समय था सो मेने फारिग होने का सोचा और वहीं तालाब से थोड़ा पहले ही एक गेंहू के खेत की मेड (खेत की बाउंड्री) पर अपना पॅंट और अंडरवेर जांघों तक सरका कर हगने के लिए बैठ गया…!

अभी मेरा मूत और लेट्रिन निकलना शुरू ही हुआ था कि मुझे खेत के दूसरी ओर से किसी के चलने की आवाज़ सुनाई दी.., अब मे अपनी लेट्रिन और मूत को बीच में रोक कर खड़ा होकर देख तो नही सकता था…,

जब तक मेरा माल मूत्र निकलना थमा तब तक वो पद चाप मेरे काफ़ी करीब तक आ चुकी थी.., मेने जैसे ही थोड़ा उचक कर देखने की कोशिश की, तब तक तो वो पैरों की चलने की आवाज़ मेरे सामने से आती सुनाई पड़ने लगी…!

जैसे ही मेने अपने सामने देखा.., मेने शर्म से अपनी मुन्डी नीचे कर ली.., मेरे ठीक सामने एक औसत कद काठी की इकहरे बदन की औरत जो शायद वो भी तालाब के पास फारिग होने आई होगी खड़ी दिखाई दी…!

 
मेरे लटकते हुए मूसल पर जो अभी अपनी नॉर्मल कंडीशन में ही था उसे देखकर उसने अपने मूह पर हाथ रखा और थोड़े धीमे स्वर में उसके मूह से निकल गया… हाए राम..ये क्या है…?

यहाँ मे अपने रीडर्स को याद दिला दूं.., मेरे साथ हुए किडनप वाले हादसे के बाद और श्वेता द्वारा कंटिन्युवस दिए गये सेक्स डोज़स के बाद से मेरे नॉर्मल लंड की लंबाई और मोटाई.., किसी नॉर्मल आदमी के खड़े लंड से भी कहीं ज़्यादा ही लगती थी..!

पेशाब जोरों की लगी थी सो कुच्छ तो डिसचार्ज के बाद भी एरेक्षन में ही था कुच्छ मेरा लंड बड़ा है ही.., सो उसे वो दूर से ही दिखाई दे रहा था, नीचे के बाल में कभी रहने नही देता, ये मेरी शुरू से ही आदत रही है जबसे मुझे चुदाई का चस्का लगा है…!

मेने मारे शर्म के अपनी मुन्डी नीचे कर ली.., उठ तो सकता नही था.., क्योंकि कंटिन्युवस प्रेशर आ ही रहा था.., मुझे नही पता वो कितनी देर तक मेरे सामने खड़ी मेरे लंड के दर्शन करती रही…?

मे जल्दी जल्दी में फारिग होकर एक हाथ से खाली बॉटल उठाई और दूसरे हाथ में अपने पॅंट को लटका कर अपनी जगह से उठ गया.., अब हगी गान्ड तो ढक नही सकता था, लेकिन मेने आगे से अपने समान को तो मेने ढक ही लिया था..!

क्योंकि पता नही वो भी यहीं कहीं आस-पास ही ना जमी बैठी हो अपनी गान्ड खोले…!

ओ-तेरे की ! ये क्या यहीं कहीं क्या, वो साली इतनी बेशर्म निकली कि अभी भी वहीं मेरे सामने ही अपनी चूत खोल के बैठ गयी और मेरे लौडे को देख देखकर हगते हुए अपनी चूत सहला रही थी…!

मेने जैसे ही खड़े होकर सामने नज़र डाली… मेरी तरफ देख कर हँसते हुए उसने अपनी नज़र तो झुका ली लेकिन छूट मसलना बंद नही किया..!

मुझे अपनी गान्ड धोने तालाब में जाना भी वहीं होकर ही था जहाँ वो बैठी थी..,

मन ही मन उसे गालियाँ देते हुए…(क्या भेन की लॉडी बेशरम औरत.., सुबह ही सुबह चूत के दर्शन करा दिए) बुदबुदाते हुए मेने उससे हटकर एक लंबा सा चक्कर काटकर तालाब की तरफ बढ़ गया…!

मेने तालाब के किनारे बैठकर अपनी गान्ड सॉफ की.., ठंडा पानी गान्ड पर लगते ही गान्ड के अंदर तक सिहरन सी दौड़ गयी.., उस औरत की झान्टो से भरी चूत की एक झलक मेने देखी ली थी..जो अब गान्ड धोते हुए मेरे दिमाग़ में घूम गयी….!

सोचते ही मेरे लौडे ने एक झटका लगाया.., मेने जैसे तैसे अपने दिमाग़ को उससे अलग किया और फटाफट अपनी गान्ड धोकर बिना पॅंट चढ़ाए ही गाड़ी का ग्लास साफ करने के लिए बैठकर बॉटल में पानी लिया..,

बॉटल भरने तक वोही विचार फिर एक बार मेरे दिमाग़ में कोंध गये और मेरा लटका हुआ लॉडा झट देकर फिर खड़ा हो गया…!

बोतल भरके साइड में रखी और जैसे ही खड़ा हुआ.., मेरा पॅंट सरक कर घुटनों के नीचे तक पहुँच गया…!

उसे उठाकर जैसे ही मे पलटा कि अपनी कॉटन की सिकुड़ी सिमटी सी साड़ी को घुटनों तक चढ़ाए हुई वो औरत फिर एक बार मेरे सामने खड़ी थी…, मेरा तना हुआ लॉडा अब उसके रूबरू था.., जिसे देख कर उसकी आँखें मारे अचंभे के फटी की फटी रह गयी….!

मेने झटपट अपना पॅंट उपर किया.., बेल्ट लगाई और बॉटल उठाकर वहाँ से खिसकने की तैयारी कर ही रहा था कि मेरे पॅंट के उभार पर नज़र गढ़ाए वो बोल पड़ी – बाबू शहर से आए हो..?

मेने बिना कुच्छ बोले अपनी सिर्फ़ मंडी हां में हिला दी और वहाँ से चलने लगा.., वो मुझे देखकर खूब ज़ोर्से हँस पड़ी.., और मेरे करीब आकर बोली – अरे बाबू तुम तो ऐसे डर रहे हो जैसे मे कोई भूतनी हूँ..? इधर कैसे आ गये…, आस-पास किसी गाँव में आए हो..?

उस औरत की बेशर्मी ने मेरी बोलती पर पहले ही ढक्कन लगा दिया था.., वैसे भी उसे क्या बताउ जब मुझे खुद ही नही पता कि मुझे जाना कहाँ है..?

 
मुझे मौन देखकर वो मेरे और करीब आगयि.., इतनी करीब कि अगर हाथ आगे बढ़ाए तो मेरे खड़े लौडे को आराम से पकड़ ले..,

मेरी अभी भी उससे नज़र मिलाने की हिम्मत नही हो रही थी.., और ये सब इसलिए हो रहा था कि मुझे गाँव छोड़े हुए काफ़ी अरसा बीत गया था.., वरना खुले में शौच करना गाँव में तो आम बात थी.., उपर से उसकी बेशरमाई…!

वो – क्या बात है बाबू.., तुमने मेरी बात का जबाब नही दिया..? यहाँ आस-पास का कोई काम है तो मुझे बताओ.., हो सकता है मे तुम्हारे कुच्छ काम आ सकूँ..?

उसके ये शब्द सुनकर मुझे लगा कि औरत इतनी बुरी या स्वार्थी भी नही है और पहली बार मेने उसकी तरफ ध्यान से देखा.., वो एक मध्यम कद काठी की 5’2” लंबी..23-25 साल की उमर, गेंहूआ रंग दुबली ज़्यादा नही लेकिन उसका पेट और कमर बहुत ही कम यही कोई 23-24 की होगी…

गोल-गोल चुचियाँ.., बिना ब्रा के भी पूरी तरह सुडौल उठी हुई यही कोई 32 की एक पुराने से घिसे हुए कपड़े के ब्लाउस से उसके काले-काले जामुन जैसे निपल और उसके उनके आस-पास का गोल घेरा सॉफ दिख रहे थे,

कमर के नीचे का भाग माने कूल्हे भी 30-32 से ज़्यादा नही रहे होंगे.., मेहनती बदन.., हाथों की उभरी हुई नसें बता रही थी कि वो काफ़ी मेहनत करती होगी……!

एक भरपूर नज़र उसपर डालकर मेने उस’से पुछा – यहाँ आस-पास कोई गाँव तो दिखाई दे नही रहा फिर तुम यहाँ जंगल में सुबह सुबह कहाँ से पैदा हो गयी..?

मेरी इस बात पर वो खिल-खिलाकर हँसते हुए बोली – ओह..हो.. तो तुम वाकाई में मुझे कोई भूत चुड़ैल ही समझ रहे हो.., वो देखो उधर.. उसने एक तरफ हाथ का इशारा किया जहाँ करीब चार खेत दूर पेड़ों के बीच एक झोंपड़ी नुमा मकान दिख रहा था…!

वो है मेरा घर.., गाँव दूर होने की वजह से हमने यहीं खेतों पर ही रहने के लिए कच्चा घर झोंपड़ी डालकर बना लिया है.., थोड़ी जगह जानवरों के लिए भी छोड़ी हुई है…!

मे, मेरा आदमी और मेरी अधेड़ सास यहीं पड़े रहते हैं.., एक दो साल का छोटा बच्चा भी है मेरा…, खेतों का काम धाम और उनकी देख रेख भी होती रहती है.., अब तुम बताओ.. यहाँ कैसे आना हुआ..?

मे अब भी असमंजस में था की उसको क्या बोलूं..? सो मेने उससे आगे भी सवाल ही कर दिया – यहाँ आस-पास कितने गाँव हैं.., और क्या तुम सभी को जानती हो..?

वो – गाँव काफ़ी दूर दूर हैं, आस-पास के दो-चार गाँव के लोगों को तो मे जानती हूँ.., तुम्हें किस गाँव के बारे में जानना है..?

मे – यहाँ आस-पास कोई ऐसा भी आदमी है जो ग़लत धंधों में शामिल रहता हो..?

मेरे इस सवाल पर उसने बड़ी गहरी नज़रों से मेरी तरफ देखा.. फिर कुच्छ सोच कर बोली – तुम कोई पोलीस वॉलिस वाले हो क्या..?

मे – नही मे कोई पोलीस वाला नही हूँ.., दरअसल मुझे किसी ऐसे आदमी की तलाश है जो उल्टे सीधे काम धंधे करता हो.., मुझे भी ऐसा ही एक काम करवाना था…!

वो – उल्टे सीधे मतालाव किस तरह के..? चोरी चकोरी, डकैती या फिर किसी को सीधे उपर पहुँचवाना है..?

मे – नही ये सब नही.., किसी को किडनप करवाना है…!

वो – तुम तो बड़े ख़तरनाक आदमी निकले शहरी बाबू.., लेकिन यहाँ इतना ख़तरनाक काम करने वाला तो नही मिलेगा.., हाँ चोर उचक्के ज़रूर मिल; जाएँगे, इतना बड़ा काम करने वाले आपको चंबल पार ही मिल सकते हैं…!

मेने उससे पीछा छुड़ाने की गाराज़ से कहा – चलो फिर ठीक है वैसे भी मे उधर ही जा रहा था.., गाड़ी का शीशा धोने के लिए पानी की तलाश में निकला था.., ये तालाब देखकर सोचा फारिग ही हो लेता हूँ..,

फिर कुच्छ रुक कर मेने कहा - मेरा एक काम करोगी..? हो सके तो ये बात किसी को बताना मत..वरना मेरा काम होने से पहले ही बिगड़ जाएगा…!

इतना कह कर मे वहाँ से जैसे ही चलने को हुआ तभी उसने वो किया जिसकी मेने इस समय कल्पना भी नही की थी….!

तभी उसने एक कदम आगे बढ़कर पॅंट के अंदर ढीले पड़ते जा रहे मेरे लौडे के उपर अपना हाथ रखते हुए कहा -

हर काम की कीमत होती है बाबू.., ये कहकर उसने पॅंट के उपर से ही मेरा लॉडा अपने हाथ में पकड़कर ज़ोर्से मसल दिया.., अगर चाहते हो की मे अपना मूह बंद रखूं तो मुझे थोड़ा इसकी सेवा करने का मौका देना पड़ेगा…,

बड़ा मस्त लंड है तुम्हारा…, इतना बड़ा लंड मेने आज तक कभी नही लिया… अपने अंदर…, सुना है बड़े लंड से चुदने का मज़ा ही अलग आता है…!

 
मेने एक कदम पीछे हट’ते हुए कहा – अरे ये क्या हिमाकत है..? शर्म लिहाज कुच्छ है की नही तुम्हें..? जान ना पहचान यू ही किसी का पकड़ लेना ये एक अच्छी औरत को शोभा देता है क्या..?

वो मेरी तरफ अपना कदम बढ़ाते हुए बोली – मे कोई रंडी या छिनाल नही हूँ बाबू.. लेकिन तुम्हारा लॉडा देख कर तो कोई सती-सावित्री भी तुम्हारे आगे अपनी गान्ड खोल देगी…!

बस थोड़ी देर ही तो लगेगी.., चलो ना 5 मिनिट के लिए गेंहू के खेत में.., बस एक बार करदो.., वो मिन्नतें सी करते हुए बोली…!

उसकी लालसा देख कर मेने उसकी एक गोल सुडौल चुचि पर अपना हाथ रख दिया…, आहह क्या कड़क चुचि थी.., एकदम स्थिर.., ज़रा भी ढीलापन नही था उसमें.., लेकिन मक्खन जैसी मुलायम मानो मेने किसी स्पंज के गोले को अपने हाथ में ले लिया हो…!

उसे हल्के से अपने हाथ से दबाकर मेने कहा – देखो.., मेरा 5 मिनिट में कुच्छ नही होता.., यहाँ खेत में उबड़ खाबड़ ज़मीन पर तुम परेशान हो जाओगी..,

रोड पर मेरी गाड़ी खड़ी है, उसमें एक लड़का भी है मेरे साथ, ज़्यादा देर हो गयी तो वो मुझे ढूँढते हुए इधर भी आ सकता है.., वैसे तुम्हारा नाम क्या है..?

मंजरी… उसने अपने खुश्क होठों पर जीभ फिराते हुए कहा…

मे – देखो मंजरी..! तुम एक अच्छी औरत हो, मे तुमसे कोई वादा तो नही करता.., लेकिन मेरा काम हो गया तो लौटने पर मे तुम्हें अपने लौडे का स्वाद चखाने की पूरी कोशिश ज़रूर करूँगा.., अभी मुझे जाने दो.., तुम्हारे घरवाले भी राह देख रहे होंगे…!

मंजरी – चलो कोई बात नही लेकिन लौटते वक़्त भूल मत जाना, मे तुम्हारी राह देखूँगी !

मेने आगे बढ़कर उसके गोल-गोल उभरे हुए सुडौल नितंबों को अपने हाथों में कस लिया…,

उसके पतले पतले होठों पर एक प्यार भरा चुंबन देकर उसकी गोल-मटोल बॉल जैसी गान्ड के शिखरों को दबाते हुए और अपने लंड का दबाब उसकी चूत के उपर डालकर मेने कहा – मे पूरी कोशिश करूँगा तुम्हारे पास दोबारा आने की.., अब मे चलता हूँ.., ओके…!

वो मुझे प्यासी आँखों से बस देखती रह गयी और मे वहाँ से बॉटल उठाकर अपनी गाड़ी की तरफ चल दिया…!

दूर से ही मुझे ललित गाड़ी के बाहर खड़ा दिखाई दे गया.., जो बड़ी बैचैनि से इधर उधर देख रहा था.., फिर जैसे ही मुझ पर उसकी नज़र पड़ी.., लगभग दौड़ते हुए वो मेरी ओर लपका…!

मेने उसके पास पहुँच कर कहा – नींद खुल गयी तुम्हारी…?

ललित – वो तो कब की खुल गयी.., आप इतनी देर तक कहाँ चले गये थे.., पता है मेने थोड़ी देर पहले वो गाड़ी उधर हाइवे की तरफ जाते हुए देखी है…!

मे – क्या..? हे भगवान…ये मुझसे इतनी बड़ी भूल कैसे हो गयी.., मे पानी लेने गया था ग्लास सॉफ करने के लिए.., फिर सोचा फारिग भी हो लेता हूँ.. इसलिए समय लग गया.., वैसे कितने लोग थे उसमें और मेरी बिटिया….?

ललित – नही वो नही थी.., ड्राइवर के साथ बस एक आदमी और था.., शायद किसी और काम के लिए गये होंगे.., क्यों ना कुच्छ देर यहीं इंतेज़ार करें तब तक मे भी फारिग हो लेता हूँ…!

मे – हां ये ठीक रहेगा.., तुम जाओ, वहाँ दो खेतों के बाद एक छोटा सा तालाब है..,

रूको मे पहले ग्लास साफ कर लेता हूँ.., शायद और पानी लगे…!

ललित ने मेरे हाथ से पानी की बॉटल लेते हुए कहा.., आप गाड़ी में कोई पेपर पड़ा हो तो वो मुझे देदो.., ग्लास मे साफ कर देता हूँ.., ये मेरे रोज़ का काम है..,

इतना कहकर उसने बॉटल से विंड्स्क्रीन के ग्लास पर पानी डाला.., पहले हाथ से ही सारे दाग धोए.., तबतक मेने गाड़ी में पड़े पुराने न्यूज़ पेपर से एक पेज निकाल कर उसे पकड़ा दिया…!

ललित ने उसी पानी से ग्लास एकदम चमका दिया.., फिर भी खाली बॉटल लेकर वो तालाब की तरफ बढ़ गया.., और मेने गाड़ी में बैठकर प्लेयर पर भजन चला दिए…!

पूरव में अब लालिमा फैलने लगी थी.., 6 बजने वाले थे.., कुच्छ ही देर में धूप खिलते ही वातावरण में गर्मी फैलने वाली थी.., गाड़ी से बाहर आकर मे रोड पर हाइवे की तरफ आँखें बिच्छाए उस काली स्कॉर्पियो के लौटने का इंतेज़ार करने लगा…!

 
10-15 मिनिट में ललित वापस आगया.., लेकिन उस गाड़ी का कहीं नामो-निशान नही था…, आते ही उसने पुचछा – गाड़ी अभी तक नही आई..? मेने निराशा से अपनी गर्दन ना में हिला दी…!

उसने मेरा बाजू पकड़कर मुझे हौसला देते हुए कहा – आप चिंता मत करो भैईयाज़ी.., भगवान अच्छे लोगों की परीक्षा ज़रूर लेता है लेकिन ज़्यादा देर तक निराश नही होने देता…!

चलो गाड़ी में बैठते हैं.., यहाँ ज़्यादा देर तक खड़े रहना अच्छा नही.., ये इलाक़ा थोड़ा बदनाम है.., आते-जाते पोलीस की गाड़ी निकली तो खम्खा शक करेंगे..,

या हो सकता है.., कुच्छ बदमाश लोग ही आ जायें और हमें खम्खा परेशान करने लगें…!

वैसे भी वो गाड़ी मुझे काफ़ी दूर से आती लगी…., जहाँ तक रोड पर आगे नज़र गयी उसकी रफ़्तार वोही थी.., चलो गाड़ी आगे बढ़ाओ.., धीरे-धीरे आगे बढ़ते हैं.., शायद इतने में वो पीछे से आजाए…!

ललित की समझदारी भरी बातों ने मुझे उसकी बात मानने पर विवश कर दिया और गाड़ी स्टार्ट करके स्लो स्पीड में चंबल की तरफ चल दिए…!

मे बहुत स्लो गाड़ी चला रहा था.., सूरज निकल आया था.., उस जगह से हम काफ़ी दूर निकल आए लेकिन वो गाड़ी नही लौटी.., यहाँ तक कि अब हमारे सामने चंबल का लंबा सा ब्रिड्ज दिखने लगा था…!

मेने ललित से कहा – ये तो चंबल भी आगयि.., लेकिन अभी तक वो गाड़ी नही आई.., अब क्या करें..?

ललित – नदी क्रॉस कर लेते हैं.., और कोई सुरक्षित सी जगह पर गाड़ी खड़ी करके कुच्छ देर इंतेज़ार करेंगे.., ये पक्का है कि वो गेंग है चबल के उस पार का ही…!

मंजरी ने भी यही कहा था सो मेने चंबल का पुल पार करने का तय कर लिया.., हम दो मिनिट में चंबल के उस पार थे.., सामने ही पोलीस चेक पोस्ट था.., मेने उस चोकी पर ही कुच्छ देर रुकने का फ़ैसला किया…!

चेक पोस्ट पर साइड में गाड़ी लगाकर ललित को वहीं गाड़ी में बैठे रहने का बोलकर मे वहाँ बने छोटे से पोलीस कॅबिन की तरफ बढ़ गया.., जहाँ एक सी और एक कॉन्स्टेबल बैठा हुआ था..,

मेने अपना परिचय दिया.., मेरा प्रोफेशनल जानकार पोलीस वाले थोड़े इंप्रेस से दिखे जिसका फ़ायदा उठाकर मेने इधर उधर की बातें शुरू कर दी..,

बातों बातों में मेने उस गाड़ी का जीकर च्छेद दिया – इनस्पेक्टर साब ये कुच्छ देर पहले यूपी की तरफ जो काली स्कॉर्पियो गयी है.., इसके बारे में आप कुच्छ बता सकते हैं..?

मेरी बात सुनकर वो दोनो पोलीस वाले एक साथ चोंक गये.., बड़ी गहरी नज़रों से मुझे देखते हुए सी बोला – क्यों ! उस गाड़ी के बारे में आप क्यों पूछ रहे हैं..?

मे – अरे यार बड़े बदतमीज़ लोग थे साले.., हम रोड साइड में गाड़ी खड़ी करके हल्के हो रहे थे.., की एक ने गालियाँ बकते हुए पीछे से मेरे पिच्छवाड़े पर एक खाली बॉटल फेंक कर मारी…!

एसआइ मेरी बात सुनकर हँसते हुए बोला – तो इसमें आपकी ही ग़लती है ना वकील साब.., स्वच्छ भारत अभियान के खिलाफ काम करोगे तो कोई भी बोलेगा ही.., उन्होने भी वोही किया…!

खैर उसमें बैठे हुए दोनो लोगों में से एक तो उस गाड़ी का ड्राइवर था.., दूसरा कोई बाहर का था.., शायद उसकी जान पहचान वाला होगा…!

मे – और वो गाड़ी…? वो गाड़ी किसकी है…?

सी – वो गाड़ी…, लेकिन उस गाड़ी के मालिक से आपको क्या लेना देना…!

मे – नही बस ऐसे ही पूछ लिया.., आप नही बताना चाहते तो कोई बात नही वैसे मे कोई क्लेम व्लैम करने वाला नही हूँ.., खैर छोड़िए.. जाने दीजिए…!

एसआइ – नही.. नही ऐसी कोई बात नही है.., दरअसल वो गाड़ी यहाँ के….कहते कहते एक बार वो फिर रुका लेकिन कुच्छ सोच कर उसने उस गाड़ी के मालिक के बारे में सब कुच्छ बता दिया जिसे सुनकर मेरी आँखें सोचने के अंदाज में सिकुडती चली गयी……..!!!!!

चंबल से 15-20 किमी पर एक बड़ा सा कस्बा है, उस एसआई ने स्कॉर्पियो के मालिक का जो नाम पता बताया था वो इस कस्बे का खास मुअज्जिद आदमी है, जिसकी पहुँच यहाँ के बड़े बड़े सरकारी ऑफिसर्स और नेताओं तक है…!

यहाँ तक कि वो खुद भी एक बहुत बड़ा ज़मींदार है.., इस कस्बे में उसके अपने मार्केट हैं जिन्हें वो किराए पर चलता है..,

कुल मिलाकर चंबल से लेकर कस्बे तक उसका एक छत्र राज्या चलता है.., वैसे तो अधिकांस लोगों को पता ही होगा कि चंबल की घाटी कितनी ख़तरनाक मानी जाती है.., देश के बड़े बड़े नामी गिरामी डाकू इसी घाटी में पैदा हुए और इसी में मर खप गये…!

माना जाता है, अगर कोई बदमाश या डाकू इस घाटी में एक बार प्रवेश कर गया तो बड़ी बड़ी फोर्स की ताक़त नही कि उसे वहाँ से पकड़ पाए.., 20 मीटर की दूरी पर आदमी को ढूँढना मुश्किल हो जाता है…!

ऊँचे ऊँचे मिट्टी के टीले.., जिनके बीच में सेकड़ों फीट गहरे संकरे दर्रे.., जंगल जानवरों का ख़तरा.., कुल मिलकर जुर्म के लिए बेहद माकूल और आमजन के बेहद खौफनाक इलाक़ा माना जाता है ये..,

इलाक़े के ज़्यादातर दबंग लोग यहाँ के ठाकुर ही हैं…, और पॉल्टिकल ताक़तवर भी…, अब मुझे डर इस बात का सता रहा था कि अगर उन बदमाशों ने रूचि को किडनप करके इस इलाक़े में रखा है तो….,

 
इलाक़े के ज़्यादातर दबंग लोग यहाँ के ठाकुर ही हैं…, और पॉल्टिकल ताक़तवर भी…, अब मुझे डर इस बात का सता रहा था कि अगर उन बदमाशों ने रूचि को किडनप करके इस इलाक़े में रखा है तो….,

कैसे ढूँढ पाउन्गा मे उस बेचारी मासूम को.., सोचकर ही मेरी रूह फ़ना हो गयी…, ना कोई इलाक़े की जानकारी ना कोई सुराग.., भूसे से सुई ढूँढने जैसा लग रहा था मुझे ये काम…!

जिस आदमी का नाम मेरे सामने आया भी है वो कोई ऐरा ग़ैरा नत्थू खेरा नही है.., सीधे सीधे उससे जाकर पूच्छने में भी ख़तरा था.., अगर वो इस मामले में इन्वॉल्व हुआ तो फिर रूचि की जान को भी ख़तरा हो सकता है…!

चंबल की चौकी से निकलकर यही सब सोचते हुए मे गाड़ी ड्राइव करते हुए उस कस्बे की तरफ बढ़ा चला जा रहा था.., तभी ललित ने मुझे टोका…!

भैईयाज़ी…

हुउंम्म.. मेने अपनी सोचों को विराम देते हुए बस इतना ही कहा..

ललित - कुच्छ पता चला उस गाड़ी के बारे में…?

मे – हां…, कुच्छ खास नही.., वो यहाँ के ज़मींदार ठाकुर शेरसिंघ की गाड़ी है.., पर लगता नही कि वो इस बारे में हमारी कोई मदद करेगा..?

ललित – क्यों ? जब उनकी गाड़ी है तो उन्हें पता तो होगा ही ना, कल और आज उनकी गाड़ी किस काम में यूज़ हो रही है….!

मेने अपनी संभावना उसके साथ शेर करते हुए कहा - अब्बल तो वो इस इलाक़े का बहुत बड़ा आदमी है.., एक तरह से वो यहाँ का राजा है.., हो सकता है इतने बड़े कारोबार में उसकी एक गाड़ी कहाँ और किस काम में लगी हुई है यही पता ना हो और उसका ड्राइवर ही किसी और के लिए इस तरह के काम कर रहा हो…?

ललित – मुझे नही लगता कि इतने बड़े दबंग आदमी का अदना सा ड्राइवर इस तरह का कोई जोखिम लेगा.., अगर उसे बिना बताए वो इस तरह के गैर क़ानूनी काम करेगा और किसी तरह उसके मालिक को पता चला या गाड़ी कहीं पकड़ में आगयि तो वो ये भी जानता होगा कि उसका अंजाम क्या हो सकता है…!

मे भी यही सोच रहा हूँ.., मेने ललित के तर्क का जबाब देते हुए कहा – दूसरी सूरत में मान लो शेरसिंघ ही ऐसे काम करवाता है तो उससे सीधे सीधे पुच्छने पर वो हाँ तो कहेगा नही और रूचि को इतनी आसानी से हमारे हवाले कर नही देगा…!

उल्टा ये होगा कि जब उसे पता चलेगा कि हम रूचि को ढूँढते हुए यहाँ तक आ पहुँचे हैं तो आतिशीघ्र या तो वो उसे कहीं दूसरी जगह शिफ्ट करवा देगा या …. ये सोच कर ही मेरी रूह काँप जाती है…, उसके लिए ख़तरा ना पैदा कर्दे कहीं…!

ललित – आप सही कह रहे हैं.., पर क्या आपका इस शेरसिंघ से कोई पुराना बैर है…???

मे - मेने तो उसका नाम ही आज पहली बार सुना है उस एसआई के मूह से…,

अब सोचने वाली बात ये है कि फिर उसने रूचि को इतनी दूर जाकर दूसरे स्टेट से किडनप क्यों कराया होगा..? कहीं इसके संबंध उस हरामखोर विक्रम राठी से तो नही…?

ये दिमाग़ में आते ही मेने कृष्णा भैया को फोन करने का सोचा.., शायद उन्होने उन बाप बेटे को उठा लिया हो.., ये सोचकर मेने अपना मोबाइल निकाला और जैसे ही उसे अनलॉक करना चाहा…,

ऊहह…शितत.. भेन्चोद इसकी बेतटरी को भी अभी ख़तम होना था…, साला जल्दी जल्दी में चारजर लाना भी भूल गया…, अब क्या करें.., तभी सामने कस्बा दिखाई देने लगा और 5 मिनिट में हम कस्बे के अंदर थे…!

 
कस्बे के बाहर गाड़ी रोक कर गाड़ी के अंदर बैठे हुए ही मे ललित के साथ आगे की प्लॅनिंग करने लगा.., फिर जाकर एक छोटे से रेस्टोरेंट में चाय नास्टा किया.., उसके बाद मेने ललित को शेरसिंघ के बारे में ख़ुफ़िया तरह से ज़्यादा से ज़्यादा खबर निकालने के लिए कस्बे में छोड़ दिया..!

मे भी अपनी तरह से पुच्छ ताच्छ में लग गया…, ललित चूँकि ढाबे पर काम कर चुका था..,

उसका तरह तरह के लोगों से किस किस तरह से इन्फर्मेशन मिल सकती है उसे ये सब अच्छे से पता था.., उपर से वो कम उम्र भी था तो लोगों को उसके उपर ज़्यादा शक़ भी नही होना था…!

ललित का मेरे साथ आना एक तरह से सार्थक सिद्ध हो रहा था.., लगभग दो घंटा बाद हम फिरसे उसी रेस्टोरेंट में मिले…!

ललित ने बताया.., वैसे तो शेरसिंघ के इस इल्लाके में बहुत से ठिकाने हैं.., जो लगभग सभी लोगों को पता है..,

लेकिन एक ठिकाना ऐसा भी है जो एकदम चंबल की घाटी के अंदर है.., जहाँ पोलीस या अन्य किसी प्रशासनिक अधिकारियों की नज़र नही पड़ती, यहाँ तक कि यहाँ के किसी आम आदमी को भी शायद ही पता हो उसके उस ठिकाने का…!

ये बात उसे एक भांगड़ी से पता चली जो खुद भी चोरी चकोरी जैसे छोटे मोटे ग़लत काम करता रहता है.., उस भांगड़ी के मुताबिक शेरसिंघ बहुत ही ख़तरनाक किस्म का व्यक्ति है..,

बताते हैं उसके पिता चंबल के मश-हूर दशु सम्राट मालखान सिंग के गिरोह में हुआ करते थे..,

मालखन सिंग के सरेंडर करने के वक़्त वो उनके साथ नही थे.., गिरोह के साथ गद्दारी करके लूट का बहुत सारा माल हड़प कर गये..,

आज उसी की बजह से ये इतना पॉवेरफ़ुल्ल हो गया है, आज इसके संबंध अंडरवर्ल्ड से भी बताए जाते हैं…!

यहाँ की जनता उससे बेहद ख़ौफ़ खाती है इसलिए कोई भी उसके खिलाफ कुच्छ भी बोलने की हिम्मत नही जुटा पाता…!

हमने एक बार घाटी में उतरने का ही फ़ैसला लिया.., दोपहर के खाने का समय हो रहा था, लाख मुशिबत सही पेट तो भरना ही था, पता नही अब घाटी से कब तक लौटना हो…!

इसलिए कस्बे के हिसाब से एक ठीक टाक से होटेल में बैठकर अच्छे से खाना खाया.., उसके बाद हमने अपनी गाड़ी चंबल की तरफ डाल दी.., जैसे ही घाटियों का एरिया शुरू हुआ मेने अपनी गाड़ी रोड से नीचे उतार दी…!

गाड़ी ज़्यादा अंदर तक नही जा सकती थी, मेरी सूडान मॉडेल रेनो कार वैसे भी बहुत नीची थी.., ज़रा ज़रा सी बमपर पर उसका चसिस टिक जाता है..,

अतः रोड से उतारकर कुच्छ घने से पेड़ों की छाया में कुच्छ इस तरह से खड़ी कर दी कि वो एक नज़र में रोड से किसी को नज़र ना आए और हम दोनो पैदल ही घाटी के खर्रों की खाक छानने निकल पड़े बिना किसी डाइरेक्षन और निशान देहि के…!

ललित के हिसाब से शेरसिंघ का घाटी में स्थित फार्म हाउस नुमा अड्डा रोड से करीब एक या धेड़ किमी अंदर होना चाहिए था.., खर्रों में 1 किमी की स्ट्रेट दूरी तय करना मतलब 3-4 किमी का रास्ता होता है…!

दर्रे की सतह रेतीली थी.., जिसमें पैर जमाकर तेज़ी से चलना भी मुश्किल होता है.., उपर से मार्च की गर्मी.., पसीने से बुरा हाल था.., वो तो अच्छा था कि कस्बे से चलते समय दो बॉटल पानी की ले ली थी.., जो अब इस गर्मी में काम आ रही थी.

लगभग 4-4:30 बजे हमें घने पेड़ों के बीच एक टूटा फूटा सा खंडरनुमा मकान मिला जिसे फार्म हाउस कहना तो बिल्कुल ही ग़लत होगा.., लेकिन इसके अलावा दूर दूर तक भी और कुच्छ दिख भी नही रहा था…!

हमने कुच्छ देर वहीं पेड़ों के नीचे उस मकान से कुच्छ दूर हटकर बैठने का सोचा और कुच्छ देर यहीं सुस्ता कर इधर उधर से उस मकान की टोह लेने का फ़ैसला किया……!!!!

सूखी सी घास और कठोरे ज़मीन पर बैठकर मेने कुच्छ देर अपनी आँखें बंद कर ली.., ललित थोड़ा सा एक खाई की तरफ जाकर पेशाब करने चला गया..!

 
मोबाइल की बेटरी ख़तम होने के कारण मे घर पर क्या हो रहा होगा ये पता भी नही कर पा रहा था.., पता नही ये खबर सुनकर भाभी और वाकी के घरवालों ने कैसा रिक्ट किया होगा…?

मोहिनी भाभी की लड़ली बेटी कैसी होगी कहाँ होगी.., यही सब सोच सोचकर उनके दिल पर क्या बीत रही होगी..?

अभी ललित को गये दो मिनिट ही हुए होंगे कि कानों में किसी गाड़ी के एंजिन की घरघराने की आवाज़ सुनाई दी…!

मे उसे ध्यान देकर सुन’ने की कोशिश कर ही रहा था कि तभी ललित दौड़ते हुए आया और मेरी बाजू पकड़ कर उठाते हुए बोला – भैईयाज़ी देखिए वही काली गाड़ी…!

मेने हड़बड़ा कर उठाते हुए कहा – कहाँ है.., किधर है..?

उसने एक टीले की आड़ से एक दिशा में उंगली उठाकर बताया.., वहाँ सच में वही काली स्कॉर्पियो आकर खड़ी हुई.., मे सोच में पड़ गया आख़िर जंगल में इतने अंदर तक ये गाड़ी आई कहाँ से होगी.., कोई रास्ता तो दिखा नही था हमें…!

हमने आनन फानन में तय किया कि इसमें आने वाले लोगों का पीछा करेंगे.., और कोशिश करेंगे इनके ज़रिए उस जगह तक पहुँचने की जहाँ इन्होने रूचि को रखा होगा…!

ये वोही दो लोग थे जो सुबह ललित ने इस गाड़ी में जाते हुए देखा था.., उन्हें उसने दूर से ही पहचान लिया था.., वो दोनो गाड़ी से उतरकर उसी मकान नुमा खंडहर की तरफ जा रहे थे..,

दोनो के हाथों में भारी भारी बाग थे.., जिनमें कुच्छ समान रहा होगा…!

वो दोनो लोग मकान के नज़दीक पहुँचने वाले थे.., दबे पाँव हम दोनो भी उनके पीच्चे पहुँच गये और झाड़ियों की आड़ लेते हुए एक निश्चित दूरी रख कर उनका पीछा करने लगे…!

ये मकान एक पुराने से परकोटे के अंदर बना हुआ था जिसकी उँचाई 5 फीट से ज़्यादा नही होगी.., करीब 5 एकर के अंदर एक साइड में 7-8 कमरे जैसे बने हुए थे खाली एंटों के जिनपर आज तक सेमेंट भी नही हुआ था..,

एन्टें भी झड झड कर दीवारों में झरोखे से बन चुके थे.., वो दोनो जैसे ही परकोटे के अंदर दाखिल हुए हमने पीछे की तरफ से परकोटे को लाँघ कर अंदर जाने का सोचा..,

हो सकता है सामने से हमें कोई देख ले.., सो जैसे ही वो परकोटे के सामने से अंदर दाखिल हुए हम भी दौड़कर पीछे गये और एक साथ ही बौंड्री लाँघकर अंदर पहुँच गये..,

यहाँ मेने ललित की फुर्ती को भी परखा.., वो भी एक ही जंप में अंदर आ गया था…!

मेने मुस्कुराकर उसकी पीठ पर हाथ रखा.., वो भी जबाब में बस मुस्करा दिया..!

फिर हमने उन दीवारों में बने झरोखों से अंदर झाँक कर देखने का विचार बनाया.., और सामने से दूसरे कमरे की दीवार के सहारे हम पहुँच गये…!

हमने अंदर झाँक कर देखा वो दोनो उन भारी बॅग्स को लादे मकान के दरवाजे से अंदर आए और एक तरफ को बनी गॅलरी की तरफ बढ़ गये.., करीब दो कमरों के बाद ही वो उस गॅलरी के एक मोड़ पर मूड गये और हमारी आँखों से ओझल हो गये…!

अब हमारे पास अंदर जाने के अलावा और कोई चारा नही था…!

 
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