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Guest
अंदर जाकर मेने एक नज़र इधर उधर दीवारों पर डाली.., कहीं कोई ख़ुफ़िया कमरे बगैरह तो नही है.., और फिर हम भी उस गॅलरी की तरफ बढ़ गये..!
अंदर आते ही मुझे बड़ा अजीब लगा.., कहीं से कोई आवाज़ ही नही सुनाई दी.., चारों तरफ सन्नाटा पसरा हुआ था.., ऐसा कोई लक्षण भी नज़र नही आया जिससे ये लगे की यहाँ कोई रहता होगा या आता जाता भी होगा…!
गॅलरी समेत मकान के अंदर का फर्श भी उबड़-खाबड़ जैसा ही था, कोई भी ऐसा निशान नही था जो ये गवाही दे सके कि यहाँ कोई आता जाता भी होगा…!
बहरहाल हमारे पास आगे बढ़ने के अलावा और कोई चारा भी नही था.., सो दबे पाँव हम भी उस गॅलरी की तरफ बढ़ गये.., करीब 20 गज चलकर वो गॅलरी बाईं तरफ को मूड गयी..,
जैसे ही हम उस गॅलरी के मोड़ पर जाकर मुड़े.., सामने लगभग 10 गाज की दूरी पर ही उस गॅलरी का अंत हो गया.., सामने एक सपाट सीमेंट के प्लास्टर की दीवार थी..,
गॅलरी के दोनो तरफ ना कोई गाते और ना कोई ऐसा लक्षण जिससे लगे कि यहाँ कोई गुप्त दरवाजा भी हो सकता है…!!!
उन दो लोगों को ज़मीन निगल गयी.., आसमान खा गया.., हम दोनो ही एक दूसरे का मूह ताक रहे थे.., कुच्छ समझ नही आ रहा था की आख़िर वो गये तो कहाँ गये.., जबकि हमने उन्हें इस मोड़ से मुड़ते हुए भी देखा था…!
मेने दीवारों को टटोल टटोल कर तलाश करने की खूब कोशिश की कहीं कोई ऐसा सुराग मिले जिससे यहाँ किसी गुप्त दरवाजे के होने की निशानदेही पता चले…!
ललित के तो सब कुच्छ समझ से परे की बात थी.., वो तो कभी सपने में भी नही सोच सकता था कि इस तरह के कोई गुप्त रास्ते भी होते होंगे…?
मेने गॅलरी के अंतिम छोर से लेकर मुख्य दरवाजे तक अपनी तरह से अच्छे से चेक करने की पूरी कोशिश की हमें कोई तो सुराग मिले लेकिन कुच्छ हाथ नही लगा..,
आख़िरकार तक हारकर हम वापस उस मकान से बाहर आगये और पागलों की तरह उसके आस-पास चक्कर लगाने लगे इस आस में कि शायद कहीं से कुच्छ सुराग तो हाथ लगे…!
शाम घिरने लगी थी.., अब मेरे मन में चिंताओं के बादल उमड़-घूमड़ रहे थे.., सारा दिन गुजर गया.., मे अभी तक रूचि तक पहुँचने की बात तो दूर.., ये तक पता नही कर पाया था कि आख़िर वो है कहाँ…?
शाम का अंधेरा घिरने के साथ साथ ललित के चेहरे पर घबराहट साफ दिखाई दे रही थी.., वो बेचारा मेरे द्वारा थोड़ी सी सहानुभूति दिखाने पर ही मेरे साथ साथ खुद भी इस मुशिबत में फँस गया था…!
मेने उसके कंधे पर हाथ रख कर कहा – मुझे लगता है तुम्हें फिलहाल कस्बे में लौट जाना चाहिए.., वहाँ सोने का कुच्छ ना कुच्छ ठिकाना ज़रूर मिल जाएगा…!
और मे तो कहूँगा कि हो सके तो बस बगैरह पकड़कर अभी अपने पुराने ढाबे पर चले जाओ.., मे जब भी लौटूँगा तुम्हें साथ ज़रूर ले चलूँगा ये मेरा वादा रहा…, कहो तो सड़क तक मे तुम्हारे साथ चलूं…?
ललित – और आप यहाँ क्या करेंगे..? हमें तो सारे दिन में ये तक पता नही चला कि आपकी भतीजी कहाँ और किस हॉल में होगी.? मुझे नही लगता कि रात इस खौफनाक जगह पर बिताई जाए…और कोई लाभ हमें मिले…?
रूचि को याद करके मेरे दिल के अंदर से एक हुक सी उठी.., बोलते हुए मेरी आवाज़ भर्रा उठी.., रुँधे गले से मेने कहा – नही मेरे बच्चे.. जबतक में अपनी प्यारी गुड़िया को खोज नही लेता.., एक कदम पीछे रखने से बेहतर मरना पसंद करूँगा…!
अंदर आते ही मुझे बड़ा अजीब लगा.., कहीं से कोई आवाज़ ही नही सुनाई दी.., चारों तरफ सन्नाटा पसरा हुआ था.., ऐसा कोई लक्षण भी नज़र नही आया जिससे ये लगे की यहाँ कोई रहता होगा या आता जाता भी होगा…!
गॅलरी समेत मकान के अंदर का फर्श भी उबड़-खाबड़ जैसा ही था, कोई भी ऐसा निशान नही था जो ये गवाही दे सके कि यहाँ कोई आता जाता भी होगा…!
बहरहाल हमारे पास आगे बढ़ने के अलावा और कोई चारा भी नही था.., सो दबे पाँव हम भी उस गॅलरी की तरफ बढ़ गये.., करीब 20 गज चलकर वो गॅलरी बाईं तरफ को मूड गयी..,
जैसे ही हम उस गॅलरी के मोड़ पर जाकर मुड़े.., सामने लगभग 10 गाज की दूरी पर ही उस गॅलरी का अंत हो गया.., सामने एक सपाट सीमेंट के प्लास्टर की दीवार थी..,
गॅलरी के दोनो तरफ ना कोई गाते और ना कोई ऐसा लक्षण जिससे लगे कि यहाँ कोई गुप्त दरवाजा भी हो सकता है…!!!
उन दो लोगों को ज़मीन निगल गयी.., आसमान खा गया.., हम दोनो ही एक दूसरे का मूह ताक रहे थे.., कुच्छ समझ नही आ रहा था की आख़िर वो गये तो कहाँ गये.., जबकि हमने उन्हें इस मोड़ से मुड़ते हुए भी देखा था…!
मेने दीवारों को टटोल टटोल कर तलाश करने की खूब कोशिश की कहीं कोई ऐसा सुराग मिले जिससे यहाँ किसी गुप्त दरवाजे के होने की निशानदेही पता चले…!
ललित के तो सब कुच्छ समझ से परे की बात थी.., वो तो कभी सपने में भी नही सोच सकता था कि इस तरह के कोई गुप्त रास्ते भी होते होंगे…?
मेने गॅलरी के अंतिम छोर से लेकर मुख्य दरवाजे तक अपनी तरह से अच्छे से चेक करने की पूरी कोशिश की हमें कोई तो सुराग मिले लेकिन कुच्छ हाथ नही लगा..,
आख़िरकार तक हारकर हम वापस उस मकान से बाहर आगये और पागलों की तरह उसके आस-पास चक्कर लगाने लगे इस आस में कि शायद कहीं से कुच्छ सुराग तो हाथ लगे…!
शाम घिरने लगी थी.., अब मेरे मन में चिंताओं के बादल उमड़-घूमड़ रहे थे.., सारा दिन गुजर गया.., मे अभी तक रूचि तक पहुँचने की बात तो दूर.., ये तक पता नही कर पाया था कि आख़िर वो है कहाँ…?
शाम का अंधेरा घिरने के साथ साथ ललित के चेहरे पर घबराहट साफ दिखाई दे रही थी.., वो बेचारा मेरे द्वारा थोड़ी सी सहानुभूति दिखाने पर ही मेरे साथ साथ खुद भी इस मुशिबत में फँस गया था…!
मेने उसके कंधे पर हाथ रख कर कहा – मुझे लगता है तुम्हें फिलहाल कस्बे में लौट जाना चाहिए.., वहाँ सोने का कुच्छ ना कुच्छ ठिकाना ज़रूर मिल जाएगा…!
और मे तो कहूँगा कि हो सके तो बस बगैरह पकड़कर अभी अपने पुराने ढाबे पर चले जाओ.., मे जब भी लौटूँगा तुम्हें साथ ज़रूर ले चलूँगा ये मेरा वादा रहा…, कहो तो सड़क तक मे तुम्हारे साथ चलूं…?
ललित – और आप यहाँ क्या करेंगे..? हमें तो सारे दिन में ये तक पता नही चला कि आपकी भतीजी कहाँ और किस हॉल में होगी.? मुझे नही लगता कि रात इस खौफनाक जगह पर बिताई जाए…और कोई लाभ हमें मिले…?
रूचि को याद करके मेरे दिल के अंदर से एक हुक सी उठी.., बोलते हुए मेरी आवाज़ भर्रा उठी.., रुँधे गले से मेने कहा – नही मेरे बच्चे.. जबतक में अपनी प्यारी गुड़िया को खोज नही लेता.., एक कदम पीछे रखने से बेहतर मरना पसंद करूँगा…!