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लाड़ला देवर ( देवर भाभी का रोमांस) पार्ट -2

अंदर जाकर मेने एक नज़र इधर उधर दीवारों पर डाली.., कहीं कोई ख़ुफ़िया कमरे बगैरह तो नही है.., और फिर हम भी उस गॅलरी की तरफ बढ़ गये..!

अंदर आते ही मुझे बड़ा अजीब लगा.., कहीं से कोई आवाज़ ही नही सुनाई दी.., चारों तरफ सन्नाटा पसरा हुआ था.., ऐसा कोई लक्षण भी नज़र नही आया जिससे ये लगे की यहाँ कोई रहता होगा या आता जाता भी होगा…!

गॅलरी समेत मकान के अंदर का फर्श भी उबड़-खाबड़ जैसा ही था, कोई भी ऐसा निशान नही था जो ये गवाही दे सके कि यहाँ कोई आता जाता भी होगा…!

बहरहाल हमारे पास आगे बढ़ने के अलावा और कोई चारा भी नही था.., सो दबे पाँव हम भी उस गॅलरी की तरफ बढ़ गये.., करीब 20 गज चलकर वो गॅलरी बाईं तरफ को मूड गयी..,

जैसे ही हम उस गॅलरी के मोड़ पर जाकर मुड़े.., सामने लगभग 10 गाज की दूरी पर ही उस गॅलरी का अंत हो गया.., सामने एक सपाट सीमेंट के प्लास्टर की दीवार थी..,

गॅलरी के दोनो तरफ ना कोई गाते और ना कोई ऐसा लक्षण जिससे लगे कि यहाँ कोई गुप्त दरवाजा भी हो सकता है…!!!

उन दो लोगों को ज़मीन निगल गयी.., आसमान खा गया.., हम दोनो ही एक दूसरे का मूह ताक रहे थे.., कुच्छ समझ नही आ रहा था की आख़िर वो गये तो कहाँ गये.., जबकि हमने उन्हें इस मोड़ से मुड़ते हुए भी देखा था…!

मेने दीवारों को टटोल टटोल कर तलाश करने की खूब कोशिश की कहीं कोई ऐसा सुराग मिले जिससे यहाँ किसी गुप्त दरवाजे के होने की निशानदेही पता चले…!

ललित के तो सब कुच्छ समझ से परे की बात थी.., वो तो कभी सपने में भी नही सोच सकता था कि इस तरह के कोई गुप्त रास्ते भी होते होंगे…?

मेने गॅलरी के अंतिम छोर से लेकर मुख्य दरवाजे तक अपनी तरह से अच्छे से चेक करने की पूरी कोशिश की हमें कोई तो सुराग मिले लेकिन कुच्छ हाथ नही लगा..,

आख़िरकार तक हारकर हम वापस उस मकान से बाहर आगये और पागलों की तरह उसके आस-पास चक्कर लगाने लगे इस आस में कि शायद कहीं से कुच्छ सुराग तो हाथ लगे…!

शाम घिरने लगी थी.., अब मेरे मन में चिंताओं के बादल उमड़-घूमड़ रहे थे.., सारा दिन गुजर गया.., मे अभी तक रूचि तक पहुँचने की बात तो दूर.., ये तक पता नही कर पाया था कि आख़िर वो है कहाँ…?

शाम का अंधेरा घिरने के साथ साथ ललित के चेहरे पर घबराहट साफ दिखाई दे रही थी.., वो बेचारा मेरे द्वारा थोड़ी सी सहानुभूति दिखाने पर ही मेरे साथ साथ खुद भी इस मुशिबत में फँस गया था…!

मेने उसके कंधे पर हाथ रख कर कहा – मुझे लगता है तुम्हें फिलहाल कस्बे में लौट जाना चाहिए.., वहाँ सोने का कुच्छ ना कुच्छ ठिकाना ज़रूर मिल जाएगा…!

और मे तो कहूँगा कि हो सके तो बस बगैरह पकड़कर अभी अपने पुराने ढाबे पर चले जाओ.., मे जब भी लौटूँगा तुम्हें साथ ज़रूर ले चलूँगा ये मेरा वादा रहा…, कहो तो सड़क तक मे तुम्हारे साथ चलूं…?

ललित – और आप यहाँ क्या करेंगे..? हमें तो सारे दिन में ये तक पता नही चला कि आपकी भतीजी कहाँ और किस हॉल में होगी.? मुझे नही लगता कि रात इस खौफनाक जगह पर बिताई जाए…और कोई लाभ हमें मिले…?

रूचि को याद करके मेरे दिल के अंदर से एक हुक सी उठी.., बोलते हुए मेरी आवाज़ भर्रा उठी.., रुँधे गले से मेने कहा – नही मेरे बच्चे.. जबतक में अपनी प्यारी गुड़िया को खोज नही लेता.., एक कदम पीछे रखने से बेहतर मरना पसंद करूँगा…!

 
चलो मे तुम्हें कस्बे तक ही छोड़ दूँगा.., वहाँ तुम्हें रात बिताने के लिए कोई माकूल जगह ज़रूर मिल जाएगी.., कोई धर्मशाला या मंदिर तो मिल ही जाएगा…!

ललित मेरा बाजू थामते हुए बोला – आप जैसे दयालु और नेक दिल इंशान जो सबका भला सोचकर चलता हो, जिसके सिर पर इतने सारे लोगों की ज़िम्मेदारी हो जब वो इतना बड़ा फ़ैसला ले सकता है.., तो मेरे आगे पीछे तो कोई भी नही है…!

अब मे भी आपके हर समय साथ ही रहूँगा.., चाहे इस काम में मुझे मौत ही क्यों ना नसीब हो., मेने फ़ौरन उसके मूह पर हाथ रख दिया.., उसको अपने अंक से लिपटाते हुए उसके बालों में हाथ फेर्कर कहा –

ऐसी अशुभ बातें नही बोलते पगले.., मे तो चाहता था कि तुम मेरी बजह से किसी मुशिबत में ना फन्सो.., अब तुम भी मेरे साथ ही रहना चाहते हो तो आओ अब यहाँ से चलते हैं…!

ललित – कहाँ..?

मे – अब यहाँ भटकते रहने से कोई लाभ नही होने वाला.., अंधेरा बढ़ता जा रहा है.., नदी के दर्रों के बीच कहीं सेफ सी जगह पर चलते हैं.., जब चाँद निकल आएगा तब इधर आकर एक दो चक्कर लगा देंगे…!

और फिर हम दोनो दुखी मन से धीरे धीरे चंबल के दर्रों से होते हुए नदी के किनारे की तरफ चल दिए….!!

करीब आधे घंटे में दर्रों को पार करके चंबल के किनारे तक हम जा पहुँचे., पूर्व में चाँद के निकलने से पहले की लालिमा फैलने लगी थी.., चंबल की कल कल करती लहरें कानों में पड़ने लगी थी..!

कोई और समय रहा होता तो नदी के किनारे के स्वच्छ और शांत वातावरण को एंजाय करते लेकिन इस समय ये शांत वातावरण भी किसी राक्षस के फैले मूह जैसा प्रतीत हो रहा था..!

हमने नदी के सॉफ पानी से अपने चेहरे से पूरे दिन की पसीने की चिपचिपाहट को धोया… और कुछ देर वहीं नदी के किनारे की ठंडी ठंडी रेत पर ही लेट गये…!

ललित रात भर सो नही पाया था.., सो पड़ते ही भूखे पेट होते हुए भी उसके खर्राटे गूंजने लगे.., लेकिन मेरी आँखों में नींद नही थी.., बस आँखें बंद किए अब तक के घण्तक्रम पर विचार करने लगा…!

रूचि का मासूम सा चेहरा उसका मेरे साथ चुहलबाज़ी करना ये सब सोच सोचकर मेरा मन खिन्न हो उठा.., जिंदगी में इतना मजबूर मेने अपने आपको कभी महसूस नही किया था जितना इस समय कर रहा था…!

कुच्छ देर बाद ही बंद आखों से मेने अनुभव किया कि वातावरण में अंधेरा कम होने लगा है.., मतलव चाँद निकल आया था…!

करने को कुच्छ था ही नही, ना जाने कितनी देर तक मे सोचों में गुम योन्हि पड़ा रहा, रात गहराती जा रही थी और साथ ही मेरे अंदर की खीज भी बढ़ती जा रही थी..,

अपनी बेबसी पर मेरा दिल खून के आँसू रो उठा और मेरी बंद आखों की कोरों से अपने आप ही मेरे गरम आँसू निकलने लगे…!

 
मेरे अंदर एक अजीब सी बैचानी का सैलाब सा उमड़ रहा था, किसी अनिष्ट की आशंका में दिल बुरी तरह घबरा रहा था..,

अपनी बैचैनि और घबराहट से निजात पाने के लिए मे उठकर बैठ गया, खड़े होकर नदी के किनारे किनारे इधर से उधर टहलने लगा…!

अभी मे थोड़ी दूर जाकर वापस आने के लिए मुड़ा ही था कि हवा का एक तेज झोंका मेरे शरीर को स्पर्श करता हुआ मेरे पास ही नदी के रेत में बवांडर का रूप अख्तियार करने लगा…!

चाँदनी पूरी तरह वातावरण में खिली हुई थी.., मे उस अप्रत्याशित घटनाक्रम को अपनी आँखों के सामने एकदम साफ साफ घटित होते देख पा रहा था.., वो बवांडर अब मेरे से दूर और दूर मिट्टी के उँचे उँचे टीलों की तरफ बढ़ने लगा…!

मे किसी सम्मोहन सी स्थिति में बँधा बस उस बवांडर को ही देखे जा रहा था.., कुच्छ देर बाद वो हवा और रेत का बवांडर दो टीलों के बीच के दर्रे में समा गया…!

अभी मे उस दिशा से अपनी नज़र हटाने ही वाला था कि उन दो टीलों के बीच एक तेज रोशनी सी चमकी मानो आसमानो से ज़मीन पर आकर बिजली तडकी हो.., क्षण मात्र के लिए उस जगह पर एक चाँदी जैसी सफेद और बहुत ही तेज रोशनी का प्रकाश फैल गया और शीघ्र ही विलुप्त भी हो गया…!

इस अप्रत्याशित घटित हुई घटना ने मेरे शरीर के रोंगटे खड़े कर दिए थे.., स्वतः ही मेरे शरीर ने एक तेज झूर-झूरी सी ली…, हालाँकि अब सब कुच्छ सामान्य हो चुका था..,

रेत में बने बवंडर को भी में पानी की तेज लहरों से बने हल्के से साइक्लोन का हिस्सा ही मान रहा था.., लेकिन उस तेज दूधिया रोशनी ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया…!

क्या ये मेरे लिए प्रकृति की तरफ से कोई शुभ या अशुभ का संकेत है..? क्या मुझे इस जगह से जल्दी से जल्दी चला जाना चाहिए…? शायद हां, कुच्छ तो है जो मेरी समझ से परे है…!

आख़िर में मेने वहाँ से अतिशीघ्र निकलने का ही फ़ैसला लिया.., दौड़कर मे ललित के पास गया.., झकझोर कर उसे उठाया और आधे जागे अवस्था में ही मेने उसका हाथ थामा और वहाँ से चल दिया…!

मेने तय किया कि हम उस रोशनी वाली जगह से विपरीत दिशा में जाएँगे लेकिन अनायास ही मेरे पैर उसी दिशा में चल पड़े जिधर वो बिजली जैसी रोशनी चमकी थी..,

मे समझ नही पा रहा था कि आख़िर मेरे कदम उसी दिशा में क्यों बढ़े चले जा रहे हैं…!

मेरे साथ घिसटता सा ललित मेरे पीछे था.., थोड़ी देर में ही उसकी नींद पूरी तरह से खुल चुकी थी.., उसने पूछा भी.. भैईयाज़ी क्या हुआ…? अब हम कहाँ जा रहे हैं….?

लेकिन मेरे पास उसके सवालों का कोई जबाब नही था.., मे जैसे किसी सम्मोहन में बँधा उस दिशा में बढ़ा चला जा रहा था…, हां अब मेने उसकी कलाई छोड़ दी थी…!

कुच्छ ही देर में हम उस जगह के बेहद करीब थे जहाँ वो रोशनी चमकी थी.., हम उन दो टीलों के बीच के रेतीले दर्रे में प्रवेश कर चुके थे..,

टीला गोलाकार था.., उसी के साथ रेत का वो दर्रा भी गोलाई लिए हुए था.., कुच्छ कदम आगे बढ़ते ही दर्रे की रेत दो दिशा में चली गयी.., माने दोनो टीलों के अंतिम सिरे पर जाकर वो उनकी गोलाई के साथ ही दो दिशा में मूड गयी थी…!

मे अपने ही आवेश में बायें तरफ के रेतीले रास्ते पर मूड गया.., तभी मेरे पीछे आ रहे ललित ने कहा – भैईयाज़ी.. वो देखिए.., वहाँ कोई है..? उसने मेरे विपरीत दिशा में जा रहे रास्ते की तरफ इशारा करते हुए कहा !

 
उसकी आवाज़ सुनकर मे वहीं ठिठक गया..और जिधर उसने इशारा किया था उस दिशा में देखने लगा.., चाँद की रोशनी में साफ दिख रहा था कि हमारे से करीब 15-20 कदम की दूरी पर कोई मानव आकृति लेटी हुई है…,

मेने कहा – शायद कोई घायल या बेहोश आदमी पड़ा है.., चलो चलकर देखते हैं.., शायद हम उसकी कोई मदद कर सकें…!

ललित – भैईयाज़ी ये चंबल की घाटी है.., कदम कदम पर ख़तरों का जाल बिच्छा होता है यहाँ.., चलो चुप चाप निकल चलते हैं यहाँ से.., खम्खा किसी और मुशिबत में फँस गये तो…?

एक बार को मुझे भी उसकी बात सही लगी.., लेकिन कुच्छ देर पहले घटित हुए चमत्कारिक घटनाक्रम ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया.., कि आख़िर ना चाहते हुए मे इस तरफ कैसे आगया.., ज़रूर इस व्यक्ति की सहायता के लिए ही प्रकृति ने मुझे कोई संकेत दिया होगा…!

ये सोचकर मेने कहा – जो भी हो.., अब इससे बड़ी और क्या मुशिबत आएगी जिससे हम गुजर रहे हैं.., क्या पता इसकी मदद करने से हमारी भी मुश्किल का कोई हल निकल आए..,

ये कहकर मे मन ही मन भगवान का स्मरण करके, हनुमान चालीसा को मन ही मन दोहराते हुए उस दिशा में बढ़ गया…!

कुच्छ फासला तय करते ही मेने अंदाज़ा लगा लिया कि सामने कोई लड़की बेहोश अवस्था में पड़ी हुई है.., उसे देखते ही मेरे दिल की धड़कनें अचानक से तेज हो गयी..,

मेरे कदम जैसे जैसे उस बेहोश जिस्म की तरफ बढ़ रहे थे.., दिल की धड़कन भी उसी अनुपात में बढ़ती जा रही थी…!

वो एक कमसिन उम्र लड़की ही थी.., जो औंधे मूह रेत पर पड़ी थी.., उसके कपड़े धूल मिट्टी से बेहद गंदे और जगह जगह से फटे हुए थे.., जहाँ से उसका गोरा बदन झाँक रहा था…!

उसके पास बैठकर मेने अपने तूफ़ानी रफ़्तार से धड़क रहे दिल से उस लड़की के कंधे पर हाथ रखा और थोड़ा सा ज़ोर देकर उसे सीधा किया…!

उसके सीधे होते ही मेरे मूह से एक चीख निकल गयी और मेने उसके बेहोश जिस्म को अपनी बाहों में भरकर अपने कलेजे से लगा लिया……!!!!

रूचि मेरी बच्ची…क्या हुआ तुझे..? उसके बेहोश जिस्म को कलेजे से लगाए हुए मे फुट फुट कर रो पड़ा.., मेरी फूल जैसी गुड़िया पता नही उसके साथ उन दरिंदों ने क्या किया होगा..? उसके फटे हुए कपड़े देख देख कर मुझे रोना आ रहा था..,

वो बेसूध मेरी छाती से लगी हुई थी..और मे रोए जेया रहा था, तभी मेरे कंधे पर ललित ने हाथ रखकर मेरी तंद्रा को भंग किया…!

यहाँ ज़्यादा देर ठहरना ठीक नही है भैईयाज़ी.., वो लोग इन्हें ढूँढते हुए कभी भी यहाँ पहुँच सकते हैं..!

मे उन हराम जादो का खून पी जाउन्गा.., आने दो मादरचोदो को.., एक-एक को चीर फाड़कर ना सूखा दिया तो मेरा नाम अंकुश नही… मेने भभक्ते हुए स्वर में कहा…!

मेरे इस रूप को देखकर एकबारगी को तो ललित भी डर गया.., लेकिन उसने हिम्मत करके मुझे समझाते हुए कहा –

मौके की नज़ाकत को समझिए साब जी.., मेरे गुस्से को देखकर ललित सहम सा गया और डर के मारे उसने मुझे इस बार भैईयाज़ी नही कहा.., वो आगे बोला – हमें अपनी चिंता नही.., लेकिन ज़रा सोचिए..,

ये दीदी बेहोश हैं.., इनके रहते हुए हम उनसे भिड़ भी नही सकते.., और फिर ना जाने वो कितने लोग हमारे सामने आ जायें क्या पता…?

आप तो पढ़े लिखे समझदार हैं.., ज़रा सोचिए.. बदला लेने के लिए हमें आगे भी बहुत वक़्त मिलेगा.., लेकिन पहले इन्हें सुरक्षित जगह पर पहुँचना बहुत ज़रूरी है…!

 
मे शायद रूचि की ये हालत देखकर गुस्से में अपना आपा खो बैठा था.., ललित ने वाकाई में बाजीब बात कही थी.., ये समय उन गुण्डों से भिड़ने का नही था.., किसी तरह से रूचि को सेफ्ली घर तक पहुँचाना बहुत ज़रूरी था…!

मेने मुड़कर अपने आँसुओं से भरी आँखों से ललित की तरफ देखा.., थॅंक यू ललित.., मेरे बच्चे तूने समय पर मेरी आँखें खोल दी.., वरना गुस्से में मे अँधा हो गया था..!

शायद भगवान ने ही तुझे मेरी मदद के लिए मेरे साथ भेजा है…!

ललित – ऐसा मत कहिए सहाब जी.., मे तो बस…ऐसे ही… मुझे जो सही लगा वो मेने आपको बोल दिया…!

मे – नही तुमने बिल्कुल सही कहा ! हमें जितनी जल्दी हो सके यहाँ से रूचि को लेकर निकल जाना चाहिए.., और ये.. तुम फिरसे मुझे सहाब जी क्यों कहने लगे..?

ललित झेन्पते हुए बोला – सॉरी..साब…भैईयाज़ी.., अब इन्हें गोद में उठा लीजिए… किसी तरह जल्द से जल्द हमें गाड़ी तक पहुँचना है वरना हम फँस भी सकते हैं…!

मे – हां ठीक है…चलो.., ये कहकर मेने रूचि को अपनी गोद में उठा लिया और अंदाज़े से सड़क की तरफ चल दिए…!

भले ही चाँदनी रात थी.., लेकिन इस बियावान जंगल में रास्ते का हमें कोई अनुमान नही लग रहा था बस दिशा का अनुमान लगाकर हम यूँ ही घनी झाड़ियों को चीरते हुए आगे बढ़ रहे थे…!

कभी समतल जगह तो कभी चढ़ाई., कभी काँटे तो कभी घनी झाड़ियाँ, जंगल पार करते हुए हम काफ़ी दूर निकल आए थे..,

काँटों और झाड़ियों में उलझ उलझ कर हमारे कपड़े भी जगह जगह से फट चुके थे.., लेकिन ये सब की परवाह करने का हमारे पास वक़्त नही था…!

इस सबके बावजूद भी हमने ये ज़रूर ध्यान में रखा कि उस मकाननुमा खंडहर से दूरी रख कर ही आगे बढ़ा जाए…!

चलते चलते हमें करीब दो घंटे हो गये.., लेकिन सड़क का कहीं नामो निशान नही दिख रहा था.., शायद हम रास्ता भटक गये थे.., मे तो बस रूचि को गोद में लिए हुए ललित के पीछे पीछे बढ़ा चला जा रहा था…!

जब एक पोज़िशन में थक जाता तो उसे अपने कंधे की तरफ कर लेता.., जब काफ़ी देर चलने के बाद भी हमें सड़क नही दिखी तो ललित ने ठिठक कर कहा –

लगता है हम रास्ता भटक गये हैं भैईयाज़ी.., आते वक़्त इतना समय तो नही लगा था हमें..,

दो ढाई घंटे से ज़्यादा हो गया हमें चलते चलते.., अभी तक सड़क का कोई नामो-निशान भी नही दिख रहा…!

मेने खड़े होकर रूचि की पोज़िशन चेंज करते हुए कहा – अब ये तुम जानो.., मे तो तुम्हारे कदमों पर ही चल रहा हूँ..,

एक काम करते हैं, कहीं समतल सी जगह देख कर कुच्छ देर सुस्ता लेते हैं.., मे भी इसके बेहोश जिस्म को लादे लादे थक गया हूँ..!

 
ललित – आप कहें तो दीदी को मे अपने कंधे पर उठा लूँ..?

मे – अरे नही.., तुम अभी बच्चे हो.., इतना वेट लेकर नही चल सकोगे..!

ललित – क्या बात कर रहे हैं आप.., मेने इनके बजन से भी ज़्यादा बजन उठाया हुआ है.., खैर कुच्छ देर यहीं कहीं रुक लेते हैं..,

वैसे अब इतना ख़तरा भी नही रहा.., उपर से रात के इस पहर में जंगल जानवर भी बाहर नही निकलते.. इन्सानो की तो बात ही छोड़ो…!

एक समतल सी जगह देख कर मेने रूचि को ज़मीन पर लिटा दिया.., मे अपने आप से विचार करने लगा - पता नही उस बेचारी के साथ ऐसा क्या हुआ होगा जो वो अभी तक बेहोश है..? कहीं इससे ड्रग्स बगैरह का ज़्यादा डोस तो नही दे दिया…?

नही..नही… ऐसा लगता तो नही.., ज़रूर कोई तगड़ा सदमा पहुँचा होगा या लड़ते लड़ते या भागते भागते बेचारी ज़्यादा थकान की वजह से बेहोश हो गयी होगी..,

मे अपने विचारों को इस बात से दूर ही रखना चाहता था कि उसके साथ कुच्छ ग़लत हुआ होगा.., पर असल में क्या हुआ है वो तो अब ये होश में आने के बाद ही बता सकती थी…!

मे मन ही मन भगवान से प्रार्थना कर रहा था.., हे भगवान मेरी बच्ची के साथ कुच्छ ऐसा वैसा ना हुआ हो..,

तभी ललित की आवाज़ ने मेरी सोचों को विराम दे दिया.., भैईयाज़ी वो देखिए.., किसी वहाँ की हेड लाइट दिख रही है.., शायद हम सड़क से ज़्यादा दूर नही है.., उसकी खुशी से भरी आवाज़ सुनकर मेरी तंद्रा भंग हुई…!

मेने खुशी के मारे ललित को खींचकर अपनी छाती से लिपटाते हुए कहा – हां ललित.., भगवान का शुक्र है हम सही रास्ते पर हैं.., पर शायद घूमकर आने की वजह से समय ज़्यादा लग गया है..,

चलो अब अपनी गाड़ी को ढूढ़ते हैं.., ये कहकर मेने रूचि को फिरसे अपनी गोद में उठा लिया.., ललित मेरे आगे चलने लगा और मे फिर एक बार उसके कदमों का अनुसरण करते हुए चलने लगा…!

गाड़ी की लोकेशन ढूँढने में भी हमें काफ़ी मशक्कत करनी पड़ी.., सीधे सीधे हम जंगल के रास्ते से उस तक नही पहुँच पाए..,

पहले हमें सड़क पर आना ही पड़ा..! फिर सड़क से हमने उस जगह को तलाश किया जहाँ से हमने उसे नीचे उतारा था.., इस तरह बहुत मुश्किल से हमने अपनी गाड़ी को खोज निकाला, शुक्र था वो वहीं सही सलामत खड़ी मिली…!

मेने रूचि को पीछे की सीट पर लिटाया, वो सीट से लुढ़क ना जाए इसलिए ललित को भी मेने उसके पास पीछे बिठा दिया..,

उसने उसके सिर को अपनी गोद में रख लिया.., मे गाड़ी बॅक करके जैसे तैसे सड़क तक लाया और फिर गाड़ी हाइवे की तरफ दौड़ा दी…!

चंबल का ब्रिड्ज पार करते करते रात के ढाई बज रहे थे.., शुक्र था चौकी पर मौजूद पोलीस वाले अंदर ही थे..,

चोकी के अंदर से बस एक टॉर्च का फोकस हमारी चलती गाड़ी पर पड़ा, मेने चंबल का ब्रिड्ज पार करके अपने राज्य की सीमा में आकर राहत की साँस ली…!

लेकिन शायद मुशिबत हमारा इतनी जल्दी पीछा छोड़ने वाली नही थी.., नदी के पुल से अभी हम कुच्छ ही दूर आए थे कि गाड़ी दो-चार झटके खाकर बंद हो गयी..,

मेने फ्युयेल मीटर पर नज़र डाली और अपना माथा ठनका.., ये साला डीजल को भी अभी ख़तम होना था…!

झटका लगते ही पीछे की सीट पर बैठकर ओंघ रहे ललित की भी आँखें खुल गयी.. और उसने अलसाए स्वर मे पुछा – क्या हुआ भैईयाज़ी..? गाड़ी क्यों रोक दी आपने..?

मेने झुँझलाकर स्टेआरिंग पर हाथ मारते हुए कहा – साला डीजल ख़तम हो गया यार.., अब यहाँ हाइवे से पहले तो शायद कोई पेट्रोल पंप भी नही देखा था मेने.., इतनी रात को कोई ट्रक वग़ैरह वाला भी डीजल नही देगा हमें…!

ललित ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा – अब क्या होगा..? सुबह तक गाड़ी को यौं सड़क पर खड़ा रखना भी ठीक नही है.., मान लो वो बदमाश ही दीदी को खोजते खोजते इधर आ निकले और उन्होने गाड़ी की तलाशी ली तो..?

 
मे भी वही सोच रहा हूँ मेरे भाई.., मेने बेचैनी भरे स्वर में कहा…, फिर कुच्छ देर बाद मे बोला.., अरे हां याद आया.., तुम्हें याद है, कल सुबह हम यहीं कहीं फारिग हुए थे..!

ललित - हां तो उससे क्या लेना देना… ?

मे – वो छोड़ो.., क्या तुम अंदाज़ा लगा सकते हो, कोई ऐसी पहचान जिससे ये पता लग सके कि हम उस जगह से कितने आगे या पीछे हैं..?

ललित कुच्छ देर अपने दिमाग़ पर ज़ोर डालकर सोचने लगा लेकिन कोई भी ऐसा क्लू उसको भी याद नही आरहा था जिससे उस जगह की कोई निशान देहि हो सके…!

फिर कुच्छ सोचकर उसने रूचि का सिर बड़े एहतियात से अपनी गोद से उठाकर गाड़ी की सीट पर रखा और गेट खोलकर बाहर सड़क पर आकर उसने अपने हाथ उपर करके एक अंगड़ाई ली..!

हाथ उपर किए अंगड़ाई लेते हुए ही उसने अपने सिर को इधर उधर घुमाया और फिर अचानक से वो खुशी से उच्छल पड़ा……!!!!

अरे हाँ भैईयाज़ी…याद आया.., वो देखिए हमारे पीछे सड़क से करीब एक फरलॉंग दूर वो भट्टे की चिमनी दिख रही है आपको…?

मेने उधर देखते हुए कहा – हां दिख तो रही है लेकिन उससे तुम्हारा क्या मतलब है..?

ललित – मुझे गाड़ी में सोता छोड़कर जब आप फारिग होने चले गये थे.., उसके कुच्छ देर बाद ही किसी गाड़ी के हॉर्न की आवाज़ से मेरी नींद खुल गयी थी…!

अभी मेने अपनी आखों को मींजकर सामने देखा ही था कि मुझे दूर से ही वो काली स्कॉर्पियो गाड़ी दिखी थी.., उसे देखते समय ही मेने इधर उधर भी देखा और मुझे वो चिमनी दिखी थी.., इसका मतलब हम उस जगह से बमुश्किल आधा किमी भी दूर नही हैं…!

मेने ललित की समझ बूझ और उसकी याददास्त की दाद देते हुए उसे फिर एक बार अपने सीने से लगा लिया.., वाह बेटे आज तुमने मेरा कितना साथ निभाया है.., तुम्हारी जितनी तारीफ़ की जाए कम है…,

आज तूने मुझे बिन मोल खरीद लिया मेरे बच्चे..!

ललित भी किसी अबोध बच्चे की तरह मेरे अंकपाश में लिपट’ते हुए बोला – मुझ अनाथ को सहारा देकर अपना लिया है आपने उसके आगे तो ये कुच्छ भी नही है भैईयाज़ी.., अब तो आप ही मेरे भगवान हो…!

मेरी आँखों से दो बूँद खारे पानी की टपक कर ललित के घने बालों में गुम हो गयी.., मेने उसे और ज़ोर से कसते हुए भर्राये स्वर में कहा – मुझे इतने ऊँचे पद पर मत बिठा पगले…,

अभी तो मे तेरे लिए कुच्छ कर भी नही पाया हूँ, उससे पहले ही तूने मुझे अपने एहसानो के बोझ तले दबा दिया…!

मेरी बात सुनकर ललित भी फफक कर रो पड़ा – ऐसा मत कहिए भैईयाज़ी.., मे तो अपने भगवान के पीछे पीछे इसलिए चल पड़ा था कि कहीं वो अपने भक्त को भूल ना जायें, चाहें तो इससे मेरा स्वार्थ भी कह सकते हैं…!

मे - इस उमर में इतनी गहरी बातें.., ज़रूर तेरे माता पिता महान रहे होंगे.., जिन्होने तुझे ऐसे संस्कार दिए है..,

रो मत मेरे बच्चे.., मे वादा करता हूँ, तूने अपने जीवन में जो भी तमन्नाएँ की होंगी मे उन सबको पूरा करने की पूरी कोशिश करूँगा…!

अब चल तूही बता हमें किधर चलना है.., लेकिन हन उससे पहले इस गाड़ी को किसी तरह सड़क के किनारे लगाना होगा, वरना कोई एडा गाड़ी वाला नशे या नींद के झोंके में इसे उड़ाकर चला गया तो हमारे लिए और बड़ी मुशिबत खड़ी हो जाएगी…!

फिर हम दोनो ने मिलकर किसी तरह से अपनी कार को सड़क के किनारे लगाया.., मेने रूचि के अचेत शरीर को कंधे पर डाला और ललित के पीछे पीछे चल पड़ा…!

आज सच में ये 15-16 साल का लड़का मेरे लिए भगवान का वरदान साबित हुआ था.., इसने अपनी समझ बूझ से कदम कदम पर मेरा साथ ही नही दिया था.., बल्कि मेरा उचित मार्गदर्शन भी किया था…!

कुच्छ देर में ही हम उस तालाब के पास में थे जहाँ से मंजरी का वो झोंपड़ी नुमा मकान दिखाई दे रहा था.., मेने इशारा करके ललित को बोला – देख हमें उस झोंपड़ी तक जाना है…!

वो बिना कोई सवाल किए उस तरफ चल दिया.., दो-तीन खेतों को पार करके हम उस झोंपड़ी नुमा मकान के सामने थे.., सुबह के साढ़े तीन - चार बजने वाले थे जब हमने उसके घेर जैसे लकड़ी के डंडों से घिरे परकोटे में कदम रखा…!

 
हमारे कदमों की आहट पाकर वहाँ सो रहा एक कुत्ता भोंकने लगा.., घेर में बँधे जानवर भी उठकर खड़े होने लगे.., तभी हमें एक अलग थलग सी झोंपड़ी से किसी महिला की आवाज़ सुनाई दी…!

अरे इतनी रात को काहे भोंक रहा है रे शेरू…, कॉन्सा छविराम दिखाई दे गया मुए को..?

तभी शायद वो महिला ने जोकि मंजरी की सास थी हमारे कदमों की आहट भी सुन ली होगी और उसने पुकारा.., कॉन.. ?? कॉन है बाहर…? अरे रामुआ… मंजरी…, देख तो कॉन है बाहर.., कहीं कोई चोर उचक्का तो नही घुस आया…?

कुत्ता शेरू लगातार हमारे उपर भोंके जा रहा था.., ललित ने उसे पूचकार कर चुप कराने की कोशिश की लेकिन अंजान लोगों को देख कर उसके स्वर और तेज हो गये.., इतने में ही दूसरी झोंपड़ी से एक मर्द की आवाज़ आई…!

अरे कॉन है भाई.., आवाज़ दो वरना कुत्ता काट लेगा.., ये कहते हुए वो आदमी जिसे उसकी माँ ने रामुआ कहकर बुलाया था.. अपनी झोंपड़ी से बाहर आया.., और हमें देखते ही कड़क आवाज़ में बोला –

कॉन हो तुम.., इतनी रात को यहाँ क्या कर रहे हो.., और ये तुम्हारे कंधे पर कॉन है..?

अपने मालिक को हमसे बात करते देख उसका कुत्ता थोड़ा शांत हुआ और रामुआ के पास जाकर अपनी पूंच्छ हिलाने लगा …!

अभी मे कुच्छ बोलने ही वाला था कि तभी मंजरी भी बाहर आगयि.., चाँदनी रात में उसने मुझे फ़ौरन पहचान लिया और आगे आकर बोली – अरे बाबूजी आप.., और ये आपके कंधे पर कॉन है…??

कहीं ये वो ही तो नही जिसे किसी दूसरे आदमी से उठवाने की बात कर रहे थे..?

मेने मंजरी को इशारे से अपने पास बुलाया और धीरे से उससे कहा – यहाँ बाहर खड़े होकर ज़्यादा देर बातें करने से अच्छा रहेगा इस बच्ची को पहले कहीं लिटा दें, ये बेचारी बेहोश है…!

मंजरी – हां..हां.. आइए.. अंदर ले आइए इसे, तभी रामुआ ने फुसफुसा कर उससे कुच्छ कहना चाहा तो उसने इशारे से उसे चुप रहने के लिए कहा..,

वो शायद बीवी का गुलाम था.., अपनी बीवी के इशारा करते ही मानो उसने अपने मूह पर अलीगढ़ का मोटा सा ताला लटका लिया..!

मेने झोंपड़ी के अंदर जाकर रूचि को उसी बिस्तेर पर लिटा दिया जिसपर कुच्छ देर पहले मजरी और उसका पति सो रहे थे.., उनका दो साल का बच्चा अभी भी वहाँ सो रहा था…!

मंजरी ने लालटेन जलाकर झोंपड़ी में लाइट का प्रबंध कर दिया.., तभी वहाँ एक 45-46 साल की महिला ने प्रवेश किया और आते ही वो मंजरी से बोली – कॉन है रामुआ की बहू..?

ये शहरी बाबू हैं.., मुझे कल सड़क पर मिले थे.., कुच्छ पता ठिकाना पूछ रहे थे.., सो जान पहचान हो गयी.., अब आगे इनके साथ क्या हुआ है ये तो यही बताएँगे…!

मेने एक बार मन ही मन विचार किया.., इन लोगों को सच बताउ या नही.., आख़िर मेने सच बताने का ही फ़ैसला किया जिससे इन लोगों को विश्वास में लिया जा सके…!

मेने मंजरी की सास को संबोधित करते हुए कहा – ये मेरी भतीजी है माजी.., इसको कुच्छ लोगों ने अगवा कर लिया था…, और यहाँ चंबल पार ले आए…!

मेने किसी तरह से सुराग लगाकर यहाँ तक उनका पीछा किया.., इसी दौरान कल सुबह सड़क के पास वाले तालाब के पास मेरी मंजरी जी से जान पहचान हो गयी थी…!

ईश्वर की कृपा से मेरी बच्ची तो मुझे वहाँ के जंगलों में मिल गयी.., लेकिन बेहोश हालत में.., पता नही इसके साथ ऐसा क्या हुआ है कि ये अभी तक बेहोश है…!

 
मंजरी की सास मेरी बातों को बड़े ध्यान से सुन रही थी.., उसके चेहरे के भाव बता रहे थे कि उसे मेरी बातों पर विश्वास हो रहा है.., और उसकी संवेदना रूचि के साथ दिखाई दे रही थी…!

वो लालटेन अपने हाथ में पकड़ कर रूचि के पास आकर बैठ गयी.., उसने लालटेन की रोशनी उसके चेहरे पर डाली और बड़े ध्यान से उसके चेहरे को देखने लगी…!

उसके चेहरे को ध्यान पूर्वक देखने के बाद वो मेरी तरफ मुखातिब होते हुए बोली – बच्ची किसी बहुत बड़े सदमे का शिकार हुई है बेटा.., इसका जल्द से जल्द होश में आना ज़रूरी है…!

ज़रा इधर आओ.., और ध्यान से देखो.., इसके चेहरे पर अभी भी किसी डर की परच्छाई साफ-साफ देखने को मिल जाएगी तुम्हें..,

मेने भी अभी पहली बार रूचि के चेहरे को ध्यान पूर्वक देखा था.., चाँदनी रात में अभी तक मे उसे ठीक से देख भी नही पाया था.., उस महिला की बात सही थी.., रूचि के चेहरे पर अभी तक डर के भाव विद्यमान थे…!

मेने उससे कहा – आप ठीक कह रही हैं.., ना जाने ये कितनी देर से बेहोश है.., शहर तक पहुँचने में तो और ना जाने कितना वक़्त लगेगा.., यहाँ आस पास तो कोई डॉक्टर भी नही मिलेगा…!

मंजरी की सास मुझे दिलासा देते हुए बोली – फिकर मत करो बेटा…, भगवान ने चाहा तो बच्ची जल्दी ही होश में आ जाएगी….!!!

मे जानता था कि रूचि की बेहोशी लंबी है, ना जाने कब्से वो बेहोश है ऐसे मे मंजरी की सास खाली झूठी दिलासा देकर मेरे मन को बहलाने का प्रयास भर कर रही है…!

बाहर सुबह का ढुँधलका छाने लगा था.., पौ फट रही थी.., मंजरी की सास मुझे एक सुलझी हुई समझदार महिला लगी लेकिन वो इस मामले में हमारी कोई मदद कर पाएगी ये मुझे लग नही रहा था…!

मे बाहर खुले में आकर जानवरों के चारा खाने वाली एक कच्ची नाली जैसी लाढामनी पर आकर बैठ गया.., ललित भी मेरी बगल में ही बैठा था, मंजरी का पति जानवरों को चारा बगैरह डालने में व्यस्त हो गया…!

तभी मंजरी की सास लालटेन लेकर उस झोंपड़ी से बाहर आई.., और पास ही की सब्जियों की क्यारियों में से कुच्छ पत्तियाँ सी तोड़ने लगी…!

एक मुट्ठी भर हरी पत्तियाँ जैसी लेकर वो अपने सोने वाली झोंपड़ी में गयी.., वहाँ उसने पता नही उसमें और क्या क्या मिक्स किया और कुच्छ देर बाद उसकी झोंपड़ी से कुच्छ कूटने जैसी आवाज़ें आने लगी…!

कोई आधे घंटे बाद वो एक कटोरी में कुच्छ रस जैसा निकाल कर लाई.., तबतक मंजरी ने मिट्टी के चूल्‍हे पर थोड़ा सा पानी गरम कर दिया और अब वो रूचि के चेहरे और बालों को एक साफ से कपड़े से पोंच्छ रही थी…!

उत्सुकता बस मे भी उसके पीछे पीछे झोंपड़ी के अंदर चला गया..!

पहले मंजरी और उसकी सास ने गाय के शुद्ध घी से रूचि के माथे और पैर के तलवों की मालिश की.., फिर थोड़ा सा घी उस रस वाली कटोरी में डालकर मिक्स कर दिया…!

अब वो बूँद बूँद करके उस रस को रूचि की नाक में डालने लगी.., साथ साथ में मंजरी उसके पैर के तलवे और हाथों को भी घी लगाकर मलते जा रही थी…!

कभी कभी नाक से साँस के द्वारा जोकि बहुत ही हल्की हल्की सी चल रही थी.., उस रस के बुलबुले से वापस वहर आ जाते थे.., इसी कोशिश में लगभग 20-25 मिनिट निकल गये.., लेकिन अब रूचि की साँसें कुच्छ तेज होने लगी थी..,

जिन्हें देखकर उस गुणी महिला के चेहरे पर आत्मा विश्वास के भाव गहराते जा रहे थे.., ये देखकर अब मुझे भी कुच्छ उम्मीद सी नज़र आने लगी थी.., उस रस का प्रभाव उसके अवचेतन दिमाग़ पर पड़ना शुरू हो रहा था…!

जब रूचि की साँसें तेज हो गयी तो उस महिला ने एक बार रस डालकर उसकी नाक को अपनी उंगलियों से दबा लिया…, कोई 15-20 सेकेंड में ही रूचि का दम घुटने लगा और वो उठकर बैठ गयी.., उस महिला ने फ़ौरन उसकी नाक छोड़ दी.., रूचि अब ज़ोर ज़ोर से खांस रही थी…!

मंजरी की सास उसकी पीठ पर हल्के हाथ से धौल मारने लगी.., कुच्छ ही पलों में रूचि पूरी तरह होश में आ गयी.., मुझे अपने सामने देखकर वो मेरे गले से लिपटे हुए एक साथ रोते हुए चीख पड़ी…!

चाचू… संजू मामा…, संजू मामा को बचा लो चाचू…., इतना कहकर वो मेरे गले से लिपटकर फुट फुट कर रोने लगी.., मेने भी उसे अपने से चिपटा कर उसकी पीठ सहलाने लगा.., लेकिन दो मिनिट बाद वो फिरसे एक दम से शांत पड़ गयी…!

 
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