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लाड़ला देवर ( देवर भाभी का रोमांस) complete

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आपके यहाँ से जाते ही उसने आपके और अपने बारे में सब कुछ बता दिया था…

वो रोज़ आपके बारे में ही बातें करती रहती है… उसकी बातें सुन सुन कर आपसे मिलने की मेरी जिग्यसा बढ़ती गयी…

और देखिए आज आप मेरे पास बैठे हैं… सच में निशा ने मुझे आपके बारे में कम ही बताया था… आप तो उससे कही बढ़कर ही निकले…

मेने मुस्कराते हुए कहा – किस बात में… ?

वो – मुझे ये उम्मीद नही थी कि आप इतने हॅंडसम होंगे… सच कहूँ तो मुझे निशा से जलन हो रही है… कि काश उसकी जगह में होती…?

मे – अरे साली जी ! क्यों आप मुझे चने के झाड़ पर चढ़ा रही हो… मे इतना भी हॅंडसम नही हूँ…!

वो – आप मेरी जगह होते तब पता चलता आपको की आप क्या हैं.. सच में निशा कितनी भाग्यशाली है.. की आप जैसा हॅंडसम उसका लवर है… और इसमें कोई गुंजाइश भी नही है.. की एक दिन आप दोनो एक भी हो जाओगे…!

मेने उसे ब्लश करते हुए कहा – वैसे आप भी कम नही हो… जब भी घर से निकलती होगी.. लड़कों की लाइन लग जाती होगी…!

वो कुछ बुझे-बुझे से स्वर में बोली – अपनी ऐसी किस्मत कहाँ… मे कितनी मोटी हूँ.. !

जब भी हम दोनो सहेलियाँ बाहर निकलती हैं… तो लड़के उसको ही देखते रहते हैं.. और में कुढती रहती हूँ…

मे – ये तो अपनी – 2 नज़र का ख़याल है… वैसे आपके जैसे कूर्वी फिगर वाली लड़कियाँ ही ज़्यादा हॉट लगती हैं..

वो – आप मज़ाक कर रहे हैं… मे और हॉट…?

मे – हां ! कम से कम मेरी नज़र में तो आप हॉट ही हो… दूसरों का मे कह नही सकता… मेने उसका मन रखने के लिहाज़ से कहा…

वो मेरी तरफ और खिसक आई, और मेरे शरीर से अपना बदन सटाती हुई बोली – क्या में सच में हॉट लगती हूँ आपको..?

मे अब सोच में पड़ गया… मेरा उसको ब्लश करना मुझे अब भारी पड़ता नज़र आने लगा…

अब अगर मे इसका दिल दुखाता हूँ… तो बेचारी का दिल टूट जाएगा.. सो अपनी बात पर कायम रहते हुए बोला…

देखो… हर आदमी की अपनी-अपनी चाय्स होती है… कोई तो इकहरे बदन की लड़की पसंद करता है… तो वहीं बहुत से लोग कूर्वी फिगर के दीवाने होते हैं…!

आपको कैसा फिगर अच्छा लगता है…वो मुझसे और चिपकते हुए बोली… उसके बदन की गर्मी मुझे पिघलाने लगी थी…

और मे उसके मादक कूर्वी फिगर की तारीफ़ कर बैठा…

सच कहूँ तो मुझे तुम्हारे जैसी फिगर वाली लड़कियाँ ज़्यादा अच्छी लगती है…

मेरा इतना ही कहना था कि उसने मेरे गले में अपनी मांसल बाहें डाल दी…, और अपने कलमी आमों को मेरे सीने से सटाते हुए बोली –

ओह ! जीजू आप सच में बहुत अच्छे हैं.. आइ लव यू… ये कह कर उसने मेरे गाल पर किस कर दिया…

मेने उसके कंधे पकड़ कर अपने से अलग करते हुए कहा – लेकिन मे तुम्हारी बेस्ट फ्रेंड से बहुत प्यार करता हूँ..

वो मेरी आँखों में झाँकते हुए बोली – तो मेने कब कहा है कि आप उससे प्यार मत करो… बस उसमें से थोड़ा सा… बस इत्तु सा (अपनी उंगली के पोर पर अंगूठे से निशान बना कर बोली) मुझे भी दे दीजिए…

मे – ये तुम क्या कह रही हो मालती..? मे अपने प्यार से बेवफ़ाई नही कर सकता …

वो – ओह…जीजू.. आप भी क्या दकियानूसी बातें करने लगे.. मे अपनी सहेली के प्यार को बाँटने की बात थोड़ी ना कर रही हूँ… मे तो बस थोड़ा सा आपका प्यार माँग रही हूँ..

ये वादा है मेरा, कि इस बात का किसी को भी, कभी भी पता नही चलेगा…ये कहते हुए वो मेरे बदन से लिपट गई…

मे – प्लीज़ मालती… समझने की कोशिश करो… मे ये तुम्हारे साथ नही कर सकता….

वो – प्लीज़ अंकुसजी…! मे आपसे विनती कर रही हूँ.. प्लीज़ बस एक बार… फिर जीवन में कभी आपसे नही कहूँगी…

मे उसकी गुहार सुनकर पिघलने लगा और स्वतः ही मेरा हाथ उसकी पीठ पर सरक गया…

वो दीवानवार मेरे चेहरे को चूमने लगी… उसकी मादक चुचियाँ.. मुझे उत्तेजित कर रही थी… ना जाने कब हम दोनो के कपड़े एक दूसरे के बदन से जुदा हो गये…

वो जल्दी से जल्दी मुझ में समा जाना चाहती थी…उसकी हरकतों से ही मुझे लगाने लगा कि वो ये सब पहले भी कर चुकी है…

मुझे क्या फरक पड़ने वाला था… एक और नाम लिस्ट में जुड़ जाना चाहता है तो वो भी सही.. सो जोड़ लिया…,

वो मेरा लंड लेने के लिए उतावली हुई जा रही थी, देखते देखते उसने हम दोनो के बदन से कपड़े नोच डाले..

मेने उसके बड़े बड़े आमों को चूस्ते हुए…अपना लॉडा जैसे ही उसकी रसभरी मुनिया के मुँह पर रखा…

कामांध मालती ने झटके से अपनी गान्ड ऊपर को उचका दी, गीली चूत में मेरा आधा तक मूसल सरक गया……

उसके मुँह से मादक कराह फुट पड़ी…. आआहह…. जीजू… धीरे…हाए… बहुत मोटा है आपका…

मेने उसके कलमी आमों को मसल्ते हुए कहा – मेने तो कुछ भी नही किया साली साहिबा… तुम्हें ही उतावली हो रही थी इसे लेने की…

मेरी बात सुन कर शर्म से उसने अपना सर मेरे सीने में छुपा लिया, फिर अपना हाथ नीचे ले जाकर उसने मेरे लंड को टटोला…

वो समझ रही थी, कि पूरा लंड अंदर चला गया होगा.. सो बाहर बची हुई लंबाई नाप कर बोली –

हाए राम… ये तो अभी भी इतना सारा वाकी है..? मेरे अंदर तक तो पूरा भरा-भरा सा लग रहा है… अब ये कैसे जाएगा पूरा…?

मेने उसके माल पुआ जैसे गाल पर अपने दाँत गढ़ाते हुए कहा – ये अब मेरा काम है रानी, तुम बस देखती जाओ..

आआययययीीई…जीजू प्लीज़ दाँत मत गढ़ाओ, निशान बन जाएँगे…

मेने अपने दाँतों के निशान पर जीभ से उसके गालों को चाटते हुए एक करारा सा धक्का और जड़ दिया…

मालती ने दर्द के मारे मेरे कंधे पर अपने दाँत गढ़ा दिए… और मेरे नीचे दबी हुई मचलने लगी…

दर्द से मेरी कराह निकल गयी… मेने उसके चुचे मसलते हुए कहा – साली कटखनी बिल्ली…

कुछ देर ठहरकर मेने उसे चोदना शुरू किया… वो जैसे ही दोबारा मज़े में आई… बस फिर तो पुछो ही मत…

वो घमासान लड़ाई हुई पलंग के मैदान पर.. कि मैदान भी चूं-छाँ करने लगा…

सारी रात मेने उसकी चूत की वो धुनाई की, कि अब वो कुछ दिनो तक इसे याद रखने वाली थी…उलट-पलट कर खूब जम कर चोदा मेने मालती को उस रात…

जब उसकी टंकी रीति हो गयी.. तो अपने कपड़े समेट कर लड़खड़ाती हुई सोने चली गयी और मे अपने बिस्तर में तान रज़ाई गहरी नीद में डूबता चला गया…!

सुबह उसके जगाने से ही मेरी नींद खुली… वो मुस्कराती हुई चाय का प्याला हाथ में लिए मेरे पलग के पास खड़ी थी…

गुड मॉर्निंग स्वीटहार्ट… उसने मुझे मॉर्निंग विश किया तो मेने भी हॅस्कर उसे विश किया और चाय का कप उसके हाथ से लेते हुए बोला…!

अबसे हमारा वही रिश्ता रहे तो ज़्यादा उचित रहेगा…

वो – ओह्ह..जीजू… मेने तो अकेले में आपको बोला… ठीक है, प्रॉमिस .. अब कभी नही कहूँगी… सॉरी जीजू….

मेने चाइ पी और उसके घर में ही फ्रेश होकर भाभी के घर चला आया…

आज बारात लेकर लड़की वालों के यहाँ जाना था… तो सभी उसी तैयारियों में लगे पड़े थे… निशा से एक फौरी तौर पर ही-हेलो हो पाई…

धूम धाम से शादी संपन्न हो गयी…

निशा की भाभी एक पढ़ी लिखी मध्यम घराने की सुंदर और शुशील लड़की थी…

शादी के दूसरे दिन हम सभी उनसे विदा होकर अपने घर लौट आए… भाभी को और कुछ दिन वहाँ रहना पड़ा था..

कुछ दिनो बाद मेरे फर्स्ट एअर के एग्ज़ॅम थे… सो घर लौट कर मेने अपनी पढ़ाई पर ध्यान लगा दिया…

कुछ दिनो बाद भाभी भी आ गयी, उनका भाई उन्हें छोड़ गया था…

मेने मन लगा कर अपने एग्ज़ॅम दिए और एक साल की पढ़ाई ख़तम हुई… मेरे साथ ही रामा दीदी ने भी अपने फाइनल के पेपर दिए.. अब वो ग्रॅजुयेट कंप्लीट करने वाली थी…

तो बाबूजी ने उनके लिए लड़का तलाश करना शुरू कर दिया.. उधर आशा दीदी की भी शादी तय कर दी थी...

रिज़ल्ट के बाद दोनो बहनों की बारी-बारी से शादियाँ हो गयीं… और वो दोनो अपनी नयी दुनिया बसाने अपने-2 घर चली गयी..

रामा दीदी की शादी हमारे कॉलेज के प्रिन्सिपल के लड़के लोकेश के साथ कर दी थी.. वो देल्ही में इंजिनियर है…

खुद प्रिन्सिपल साब ही दीदी का हाथ माँगने आए थे हमारे यहाँ…

 
बहुत बहुत थॅंक्स मित्रो आपके सपोर्ट के लिए
 
इधर कॉलेज में एक और क्लास बढ़ गयी थी… और कॉलेज की फर्स्ट एअर की पर्फॉर्मेन्स देखते हुए फाइनल तक की स्पेशल पर्मिशन ग्रांट हो गयी..

कुछ कोशिशों के बाद बड़े भैया प्रमोशन के साथ हमारे कॉलेज में ही आ गये, और वो अब वहाँ वाइज़ प्रिन्सिपल थे.

उधर मनझले भैया ने भी अपने शहर में ही ट्रान्स्फर ले लिया था…. सब कुछ एक दम सही से सेट हो चुका था… हमारी फॅमिली एक हॅपी वाली फॅमिली कहीं जा सकती थी…

मौका देख कर मे पंडितानी की बहू से भी मुलाकात कर लेता था.. जो अब कुछ महीनों में ही एक बच्चे को जन्म देने वाली थी…

निशा से फोन पर ही बातें हो पाती थी… वैसे उसके ग्रॅजुयेशन तक कोई प्राब्लम नही थी फिर भी भाभी ने अपने माँ और पिताजी के कानों में ये बात डाल दी थी..

कि उनके बिना पुच्छे वो निशा की शादी ना करदें..

रूचि अब बड़ी हो रही थी.. और वो अब गाँव के स्कूल में पढ़ने जाने लगी थी…

छोटी चाची – चाचा अपने बच्चे के साथ खुशी – 2 जीवन जी रहे थे…मेरे पास अब ज़्यादा ऑप्षन नही बचे थे अपने लंड को शांत करने के…

बस चाची और कभी -2 भाभी के साथ मौका मिल जाता था…या फिर अपनी वर्षा रानी…अरे वहीी…पंडिताइन…

समय अपनी मन्थर गति से गुज़रता रहा, देखते – 2 दो साल और निकल गये, धीरे – 2 हमारे फाइनल के एग्ज़ॅम का समय नज़दीक आ रहा था, की तभी एक दिन हम सभी फाइनल एअर स्टूडेंट्स एक साथ कॉलेज ग्राउंड में बैठे बातें कर रहे थे, तभी मेरे एक दोस्त रवि ने कहा…

रवि – दोस्तो ! हम सब लोग पिच्छले 3 सालों से एक साथ रहे हैं, हम लोग एक तरह से इस कॉलेज की नींव कहे जा सकते हैं…

कुछ दिनो बाद हम सभी एक दूसरे से बिछड़ने वाले हैं, फिर पता नही कॉन कब, कहाँ क्या करेगा.. फिरसे हम एक दूसरे से मिल भी पाएँगे या नही…

मे – हां यार ! सही कह रहे हो तुम, भले ही हम लोगों के बीच पिच्छले लगभग 3 सालों में कुछ भी हुआ हो, कैसे भी हालत पैदा हुए हों, लेकिन हम रहे तो एक साथ ही हैं…!

तो क्यों ना कुछ ऐसा किया जाए, जिससे एक दूसरे से बिछड़ने के बाद भी आने वाले कुछ दिनों तक हम एक दूसरे को याद रख सकें…!

आशु – आइडिया अच्छा है यार, लेकिन ऐसा क्या करें जिसकी यादें ताज़ा बनी रहें ?

मे – क्यों ना कुछ सांगीतीक कार्यक्रम रखा जाए कॉलेज में, सभी मिलकर धमाल करेंगे एक रात…

करण – क्या यार नचनियों वाले आइडिया देता रहता है, कुछ ऐसा करो जिसमें 2-4 दिन तक हम सब एक साथ ही रहें… सब कुछ मिल-जुलकर जो जी में आए वो एक साथ ही करें…!

तभी रागिनी बोल पड़ी – अगर पसंद हो तो एक आइडिया है मेरे पास…?

रवि – बिल्कुल दो ! यहाँ सभी के आइडिया से ही डिसाइड होगा, की हमें क्या करना चाहिए…

रागिनी – क्यों ना हम सब किसी लंबे पिक्निक तौर पर चलें, जहाँ कुछ एतिहासिक चीज़ें भी देखने को मिलें और जहाँ थोड़े बहुत जंगल भी देखने को हों…

4-6 दिन तक सब कुछ अपना हो, अपने तरीक़े का हो, और अपनी तरह से रहें…

उसकी बात सुनकर लगभग आधे से भी ज़्यादा लोग एक साथ बोल पड़े… सही आइडिया है, मज़ा आएगा… यही करते हैं…

मे – आइडिया बुरा नही है, लेकिन इसके लिए सबसे पहले हमें कॉलेज प्रशासन की मंज़ूरी लेनी होगी, उसके अलावा खर्चा बहुत होने वाला है, जो शायद हम में से कुछ लोग उसे अफोर्ड भी ना कर पाएँ…

कॉलेज अगर कुछ हेल्प करे तो संभव हो सकता है…!

रागिनी – उसमें क्या बड़ी बात है, कॉलेज हमारी बात क्यों नही मानेगा, और रही बात फंड की, तो वो एस्टिमेट कर के देखते हैं…

मे – ठीक है, तो चलो पहले प्रिन्सिपल साब से बात करते हैं, उसके बाद ही कुछ फ़ैसला लेना होगा…

फिर हम 8-10 स्टूडेंट्स मिलकर प्रिन्सिपल से मिलने चल दिए, उनके ऑफीस में राम भैया भी मौजूद थे…

इतने सारे स्टूडेंट्स को एक साथ देख कर वो दोनो चोंक पड़े, और हमसे पूछा –

क्या बात है बच्चो, यूँ एक साथ..? कोई समस्या है क्या…?

भैया को देखकर मे थोड़ा पीछे की तरफ जाकर खड़ा हो गया, उनके सवाल करने पर सभी मेरी ओर देखने लगे…,

जब कुछ देर मेने कुछ नही कहा तो करण आगे आकर बोला…

सर ! हम सभी फाइनल एअर स्टूडेंट्स चाहते हैं, कि एग्ज़ॅम से पहले कुछ ऐसा करें जिससे, वो हम सब के लिए एक यादगार मोमेंट हो…

तो हम सबने ये तय किया है, कि कहीं ऐसी जगह का पिक्निक टूर बनाएँ जहाँ हिस्टॉरिकल मॉन्युमेंट भी हों, और जंगल सफ़ारी भी हो जाए…

उसकी बात सुनकर प्रिन्सिपल साब ने भैया की तरफ देखा और बोले – बात तो सही कह रहे हैं ये बच्चे, आप क्या कहते हो राम मोहन बाबू…!

भैया – मे भी आपसे सहमत हूँ सर, क्योंकि ये वो बच्चे हैं, जिन्होने इस कॉलेज की नींव रखने में अपना सहयोग दिया है, तो हमें भी इनकी इच्छा का सम्मान करना चाहिए…

लेकिन मेरा सुझाव ये है, कि इनको जंगलों में जाने की इज़ाज़त नही होनी चाहिए, इन सबका ये फाइनल साल है, किसी के साथ कुछ ऐसा वैसा हुआ, तो उसके भविष्य के लिए ठीक नही होगा…और कॉलेज का भी नाम खराब होगा…!

प्रिन्सिपल – आपकी बात सही है, फिर वो हम लोगों की तरफ मुखातिब होकर बोले – वैसे आप लोगों ने कुछ तो सोचा होगा, कहाँ जाना चाहते हो…?

रागिनी तपाक से बोल पड़ी – सर एंपी भ्रमण कैसा रहेगा, वहाँ हिस्टॉरिकल प्लेसस भी हैं, और नॅचुरल ब्यूटी भी देखने को मिलेगी…

प्रिन्सिपल – देखो बच्चो… अब आप लोगों के फाइनल्स में ज़्यादा समय भी नही है, और ज़्यादा लंबे टूर के लिए कॉलेज फंड भी मुहैया नही कर पाएगा,

तो उस हिसाब से आप लोग प्लान कर के हमें बता दो, फिर देखते हैं कि आगे का क्या कर सकते हैं..

हम सब उनकी बात सुनकर बाहर चले आए, और एक बार फिर ग्राउंड में बैठकर डिस्कशन करने लगे…

रागिनी की इच्छा थी खजुराहो घूमने की, साथ ही साथ उसके आस-पास के हिस्टॉरिकल प्लेसस और छोटे-2 जंगलों में सफ़ारी भी की जाए…

इसमें और भी स्टूडेंट्स सहमत थे, लेकिन क्या कॉलेज इतना लंबा टूर करने के लिए सहमत होगा…

फिर बात आई एस्टिमेशन की… सब कुछ मिलाकर 6 दिन के टूर के लिए सबसे पहले एक टूरिस्ट बस की ज़रूरत होगी…

कुल मिलकर हम 45-50 स्टूडेंट्स तो थे जो टूर पर जाना चाहते थे.., एक टूरिस्ट बस की बात चली तो रागिनी ने उसकी ज़िम्मेदारी अपने ऊपर ले ली, और कहा-

वो अपने पापा से कहकर अपनी खुद की बस ले जाएगी…

ये तो सबसे बड़ा काम हो गया, फिर तो बचना ही क्या था, खाना-पीना और रहना..

फिर डिसाइड हुआ कि रहने के लिए वो सब खुले मैदान में टेंट लगाएँगे, लेकिन इतना सारा समान जाएगा कैसे… तो उसके लिए भी उसने एक टेंपो अपने ट्रॅवेल्ज़ का ले जाने के लिए बोला..

वाकी का खर्चा कॉलेज ने अपने सर ले लिया.. और हमने दो दिन बाद का टूर डिसाइड कर लिया..

हमारे साथ दो जेंट्स टीचर और एक लेडी टीचर जाने वाले थे…

 
कुल मिलाकर 50 लोगों का टूर बना, जिसमें एक लेडी टीचर को मिलकर 20 फीमेल और वाकई के मेल स्टूडेंट्स & दो टीचर्स थे.

दूसरे दिन रागिनी ने आकर कन्फर्म भी कर दिया, कि उसके पापा एक लग्षुरी बस और टेंपो के लिए मान गये हैं, लेकिन उनका आधा भाड़ा हमें पे करना पड़ेगा…

जिसे हम सभी स्टूडेंट्स कंट्रिब्यूट कर के पे कर सकते हैं..

सभी अपने नये टूर को लेकर बहुत ही एक्शिटेड थे, क्योंकि जीवन में पहली बार कुछ समय के लिए हम सब अपनी तरह से जीने वाले थे…

घर पर भैया और भाभी ने खुशी-खुशी मुझे टूर पर जाने की पर्मिशन दे दी, साथ ही भाभी पूरे दिन मेरे लिए कुछ ना कुछ खाने की चीज़ें बनती रही…!

मेरे लाख मना करने के बावजूद भी वो नही मानी, और ना जाने क्या-क्या बनाती रही, इस तरह से उन्होने 3-4 डब्बे खाने का समान पॅक कर के रख दिया…

उनके इस तरह मेरे लिए परवाह करते देख, मेरी आँखें नम हो गयी, जिन्हें देखकर उन्होने मुझे अपने सीने से लगा लिया और बोली…

क्या हुआ मेरे लाड़ले को, क्यों रो रहे हो..?

मेने रुँधे गले से कहा – मेरी इतनी परवाह क्यों करती हो भाभी ? इतना तो कोई सग़ी माँ भी नही करती होगी अपने बेटे के लिए…!

मेरी बात सुनकर उनकी आँखों में भी आँसू छलक पड़े, मुझे अपने आप से और ज़ोर से कसते हुए बोली –

मे भी नही जानती लल्ला कि मे क्यों तुम्हारी इतनी परवाह करती हूँ, शायद हमारे पूर्व जनम का कोई नाता रहा हो, और ऊपरवाले ने सोच समझकर फिरसे हम दोनो को एक साथ रहने के लिए भेजा दिया हो…

वरना मेरे इस घर में कदम रखते ही, माजी को क्यों बुला लेता वो अपने पास….

हम दोनो का ये रिस्ता मेरी भी समझ से परे है, कभी-कभी जब सोचती हूँ इस बारे में, तो उलझकर रह जाती हूँ, पर कोई जबाब नही मिलता…

फिर उन्होने मेरा माथा चूमकर कहा – लो ये पैसे रखो, तुम्हारे काम आएँगे, ये कहकर उन्होने मुझे एक 500/- के नोटों की गॅडी पकड़ा दी..

मेने कहा – इतने सारे पैसे..? इनका मे क्या करूँगा भाभी…?

वो – कहीं ज़रूरत लगे तो दिल खोलकर खर्च करना अपने दोस्तों के साथ…लो रखलो..तुम्हारे ही हैं…अब ज़्यादा सोचो मत, और अपनी जाने की तैयारी कर्लो..

भाभी का प्यार देखकर एक बार फिर में उनके वक्षों में सर देकर लिपट गया..

आज शाम 4 बजे कस्बे से बस निकलने वाली थी, मेने अपना समान पॅक किया और बाबूजी और भाभी का आशीर्वाद लेकर अपनी बुलेट उठाई, और कॉलेज के लिए निकाल लिया…

बस रेडी खड़ी थी, एक-एक कर के सभी आते जा रहे थे, मे थोड़ा लेट हो गया था…

अपनी बुलेट कॉलेज की पार्किंग में लगाई, और बॅग लेकर बस में चढ़ गया…

अंदर नज़र डाली तो लगभग सारी सीटें भर चुकी थी, सो लास्ट वाली सीट पर जाकर अपना डेरा डाल लिया…

वैसे, लास्ट वाली सीट पर सारे रास्ते जंप ज़्यादा लगने वाले थे, लेकिन इट’स ओके, जब और कहीं जगह नही थी तो अब कर भी क्या सकते थे…

कुछ देर बाद जब सभी बैठ गये तो पीछे की सीट पर ही हमारे एक टीचर और मेडम आकर मेरे पास बैठ गयी…

एक टीचर ड्राइवर के पास बैठे थे, मेरे बगल में मेडम और उनके बाजू वाली सीट पर हमारे स्पोर्ट्स टीचर बैठ गये…!

सबने मिलकर एक जैयकारा लगाया… शेरॉँवली की जय, ….. और इसके साथ ही बस वहाँ से रवाना हुई…!

बस के चलते ही सब मस्ती में आ गये, एक दूसरे के साथ ग्रूप बनाकर मस्ती करने लगे…

कुछ देर बाद स्पोर्ट्स टीचर भी अपने साथी टीचर के साथ गप्पें लगाने चले गये…

मेने विंडो सीट मेडम को दे दी, एसी बस में वैसे तो विंडो खोलने का तो कोई मतलव नही था, लेकिन फिर भी उन्हें बाहर के नज़ारे देखने का शौक रहा होगा शायद…

ये हिस्टरी की मेडम थी, उम्र कोई 35 की, शरीर थोड़ा चौड़ा गया था.. बड़ी-2 चुचियाँ शायद 38 की रही होगी, मोटी गान्ड 38-40 की… पेट थोड़ा बाहर को निकला हुआ…

इतने सबके बाद भी गोरा रंग, नाक-नक्श ठीक तक ही थे…वो इस समय एक हल्के कपड़े की साड़ी में थी…

डीप गले का टाइट ब्लाउज से उनकी दूध जैसी गोरी और मोटी चुचियाँ ऊपर से किन्हीं दो आपस में जुड़ी हुई चोटियों जैसी दिख रही थी…

मेरा इससे पहले उनसे कोई ज़्यादा वास्ता नही रहा था, बस कॉलेज में टीचर स्टूडेंट वाला हाई-हेलो, क्योंकि मे साइन्स स्टूडेंट था और वो हिस्टरी की टीचर…

लास्ट की सीट थी तो थोड़ी बड़ी… सो मे उनसे टोड़ा दूरी बनाए ही बैठा था… लेकिन हिचकोले भी लास्ट में ही ज़्यादा लगते हैं, तो कभी-2 हम दोनो के शरीर टच हो ही जाते थे..

उन्होने मेरे साथ बात-चीत करना शुरू कर दिया… उन्हें पता तो था ही, कि मे राम मोहन का भाई हूँ, तो घर-परिवार के बारे में कोई ज़्यादा बात-चीत नही हुई…!

अपने बारे में उन्होने बताया, कि उनके पति एक शॉप चलाते हैं, दो बच्चे हैं, जो अभी स्कूल शुरू किए हैं…

 
कुछ देर में ही मेने नोटीस किया की बस के हिचकॉलों के बहाने मेडम कुछ ज़्यादा ही हिल-डुलकर मुझसे टच होने की कोशिश कर रही हैं, तो मे थोड़ा और उनसे दूर सरक कर बैठ गया…

मुझे सरकते देख मेडम बोली – अरे अंकुश ! आराम से बैठो, इतना दूर क्यों बैठे हो… कोई प्राब्लम है क्या…?

मे – नही वो आपको कोई प्राब्लम ना हो इसलिए इधर को आ गया, अब आप आराम से बैठ सकती हैं..

वो – अरे मुझे कोई प्राब्लम नही है, आओ मेरे पास बैठो,

वो क्या है, कि कभी-2 बस के झटके लगते हैं, वैसे कोई बात नही, आ जाओ…ये कहकर उन्होने मेरा हाथ पकड़कर अपने पास ही कर लिया…

मेने सोचा, मेडम भी मज़े लेना चाहती हैं, लेने दो, अपने को क्या… कुछ ज़्यादा लिमिट क्रॉस होती दिखेगी तब देखा जाएगा…

कुछ देर तो वो ठीक ठाक रही, मेने अपनी आँखें बंद करली, और मेडम अपनी तरह से मेरे शरीर के साथ मज़े लेती रही…

ग्वालियर निकालकर हमने एक रोड साइड होटेल में खाना खाया..और कुछ देर रुक कर बस फिर चल पड़ी…

खाने के बाद कुछ देर में ही ज़्यादातर लोगों के खर्राटे गूंजने लगे…

इस बार मेडम ने मुझे खिड़की की तरफ बैठने को कहा…हमारे ऑपोसिट सीट पर स्पोर्ट टीचर अकेले बैठे थे…

मुझे भी झपकी सी आने लगी थी, सो मे बस की बॉडी का सहारा लेकर उंघने लगा..

कुछ देर शांति से गुज़री, लेकिन जल्दी ही मुझे लगा की मेडम की भारी-भारी चुचियाँ मेरे बाजू पर लदी पड़ी हैं…

मेने कोई प्रतिक्रिया नही दी, और चुप चाप सोने का बहाना करता रहा…

अभी मे उनके शरीर की गर्मी को सहन करने लायक भी नही हो पाया था कि उनका एक हाथ रेंगता हुआ मेरे लौडे पर आ गया, और वो उसे पॅंट के ऊपर से ही सहलाने लगी…

बस की पिच्छली सीट के अनएक्सपेक्टेड झटके मेडम के बूब्स को मेरे साइड से रगड़ रहे थे…

लंड का आकर भाँपते हुए मेडम पर खुमारी चढ़ने लगी, और उन्होने मेरा एक हाथ पकड़ कर अपनी मोटी पपीते जैसी चुचि पर रख लिया और ऊपर से अपने हाथ का सपोर्ट देकर उसे अपने पपीते पर दबाने लगी.

मेडम को अब कुछ बड़ा चाहिए था, लेकिन मेरी तरफ से कोई रेस्पॉन्स ना मिलने से वो मन ही मन कसमसा रही थी, अपनी साड़ी ऊपर कर के आगे से उन्होने अपनी चूत में अपनी उंगलियाँ पेल दी…

दूसरे हाथ की उंगलियाँ मेरे पैंट की चैन से खेलने में लगी हुई थी, और वो उसे नीचे करने का प्रयास करने लगी, लेकिन टाइट जीन्स ऊपर से लंड खड़ा, पॅंट और ज़्यादा टाइट हो गया था, तो वो खुल ही नही पा रही थी…

उन्होने अपना दूसरा हाथ भी अपनी चूत से निकाला और दोनो हाथों के सहारे से वो चैन खोलने लगी…

इससे पहले कि वो मेरी चैन को नीचे कर पाती, कि उन्हें अपने कंधे पर किसी के हाथ का अहसास हुआ,

चोंक कर उन्होने झट से अपने हाथ मेरे पॅंट से हटाए और उधर को देखा…

स्पोर्ट्स टीचर जो अब तक का मेडम का सारा खेल देखकर गरम हो चुके थे, इशारे से उन्हें अपनी सीट पर बुला लिया…

मेडम के मना करने का तो अब कोई चान्स ही नही था, उनकी चोरी जो पकड़ी गयी थी, सो वो उनके बगल में जाकर बैठ गयी,

मेने चैन की साँस ली, और अपनी आँखें बंद कर ली…

लेकिन साला मन तो उधर को ही लगा था, तो नीद आने का कोई मतलव ही नही था अब… सो 5-10 मिनिट के बाद आँखों की झिर्री से नज़र डाल ही ली…

वाह ! क्या नज़ारा था, मेडम की साड़ी कमर तक चढ़ि हुई थी, और वो अपने 25-25 किलो के गान्ड के पाटों को लेकर सर की 4” की लुल्ली को अपनी चूत में लेकर उनकी गोद में बैठी कूद रही थी…

सर के हाथ उनकी चुचियों पर थे, और वो उन्हें आटे की तरह गूँथ रहे थे….

कुछ मेडम कूदने का प्रयास कर रही थी, कुछ बस के झटके सहयोग कर रहे थे… सो कुछ ही देर में वो अपना-अपना पानी छोड़कर शांत पड़ गये…

सुबह होते-2 हम ओरछा पहुँच गये, जहाँ की पहाड़ी नदी के किनारे बस खड़ी कर के सब लोग नित्य क्रिया में लग गये…

सबने जंगल में ही शौन्च इतायादि की, और नदी के निर्मल जल में नहा धोकर वहाँ के मंदिरों में दर्शन किए…

 
आपको अगर पता हो तो यहाँ एक ओर्छा का महल है, जिसके पास ही राम राजा का भव्य मंदिर है…

कहावत है, कि भगवान राम, दिन निकलते ही, अयोध्या छोड़कर यहाँ आ जाते थे… और यहाँ की प्रजा की देखभाल करते थे…

ओरछा झाँसी से कोई 20-25 किमी दूर साउत ईस्ट में पड़ता है….!

आस-पास के यहाँ के हिस्टॉरिकल जगह और राम राजा के दर्शन कर के हमने अपना कारवाँ फिर आगे बढ़ा दिया…!

शाम से पहले हम खजुराहो के पास पहुँच गये…, हाइवे से हटकर थोड़े से जुंगली इलाक़े में हमने अपनी बस रोकी,

पीछे – 2 समान से लड़ा टेंपो भी आ गया, जिसमें चार आदमी काम करने के लिए साथ आए थे, वहीं हम सबका खाना भी बनाने वाले थे..

छोटी-छोटी पहाड़ियों के बीच एक छोटे से मैदान में हमने अपने टेंट लगाने का सोचा…

दो-दो मेंबर के हिसाब से आनन-फानन में टेंट खड़े होने लगे, सारे स्टूडेंट्स भी इस काम में हाथ बाँटने लगे…

एक घंटे के अंदर अंदर सारे टेंट लग चुके थे… मेरे साथ रवि था.

एक एक्सट्रा टेंट थोड़ा सा बड़े आकार में रसोई के सामान के लिए रखा गया…

उसके बाद रसोई का बनाना शुरू हुआ, कुछ इंटेसटेड लोग उन चारों की मदद करने लगे, वाकी के इधर-उधर के एरिया में घूम-फिर कर वहाँ का जायज़ा ले रहे थे…

अंधेरा होते ही, वहाँ पेट्रोमक्ष जला दिए गये… 9 बजे तक खाना तैयार हो गया, और सबको इत्तला करदी..

सब अपना अपना खाना प्लेट्स में लेकर जिसको जहाँ अच्छा लगा वहाँ बैठकर खाने लगे…इस तरह का अनुभव बड़ा ही भा रहा था सबको…

मे, रवि, करण और आशु, एक साथ बैठे खाना खा रहे थे, कि तभी वहाँ रागिनी और रीना, जो एक ही टेंट में थी, अपनी प्लेट लेकर आ गयी,

रागिनी ने पूछा – अगर तुम लोगों को कोई प्राब्लम ना हो तो हम भी साथ बैठकर खाले..

करण – आओ बैठो, हमें क्यों प्राब्लम होगी…, तो हम 6 लोग एक गोलाई बनाकर बैठ गये और खाना खाने लगे,

कोई इधर उधर से कुछ ख़तम हो जाता तो एक दूसरे की प्लेट से ले लेता.. बड़ा ही रोमांचकारी अनुभव था ये हम सबके लिए…

बातों के बीच खाना खाते हुए, अजीब सी सुखद अनुभूति हो रही थी सबको, एक अपनापन सा लग रहा था…..

सबने खाना ख़तम किया, कुछ देर बैठकर बातें की, फिर दोनो लड़कियाँ हम सबकी प्लेट उठाकर ले गयी धोने के लिए…

हमें बड़ा आश्चर्य हुआ, कि रागिनी जैसी बड़े घर की लड़की हमारी झूठी प्लेट धोने के लिए ले गयी… शायद ये ग्रूप में होने की वजह से हो…

कुछ देर हम चारों बैठे बातें करते रहे फिर मुझे नींद के झटके लगने लगे तो उठ कर अपने अपने टेंट में चले गये……!

लेटते ही में गहरी नींद में डूब गया…!

 
पता नही रात का कॉन्सा प्रहर था, की सोते-सोते मेरी साँसें रुकती सी महसूस होने लगी, सीने में एक गोले सा अटकने लगा, बैचैनि इतनी बढ़ गई…की मे हड़बड़ा कर उठ बैठा…

बॉटल से पानी पिया, लेकिन ज़्यादा राहत नही मिली…तो उठ कर टेंट से बाहर आया, और बाहर आकर टहलने लगा…

चारों तरफ सन्नाटा पसरा हुआ था, सभी गहरी नींद में डूबे हुए थे… मोबाइल में समय देखा तो 1 बजने को था…

मे थोड़ा टेंट एरिया से निकल कर थोड़ी दूरी पर हरियाली से घिरी एक छोटी सी चट्टान पर आकर बैठ गया…

आसमान में चाँद की रोशनी के बीच तारे टिम-तिमा रहे थे…ठंडी-ठंडी हवा मेरे गालों को सहलकर मेरे बैचैन मन को राहत दे रही थी…

कभी कोई जीव, किसी झाड़ी से निकल कर भागता, तो एक अजीब सा डर का अनुभव भी होता, और मेरे रोंगटे खड़े हो जाते…

इस तन्हाई में घिरे मेरे मन में निशा के साथ बिताए लम्हे याद आते ही मेरे चेहरे पर एक मीठी सी मुस्कान तैर गयी…

मे अपना सर आसमान की तरफ उठाकर चाँद के आस पास के झिलमिलाते तारों में ना जाने क्या तलाश करने लगा…

मे अपने ख्यालों में डूबा हुआ था, कि तभी मुझे अपने पीछे किसी के आने की आहट महसूस हुई, और मेने मुड़कर उधर को देखा…

कुछ दूरी पर मुझे एक मानव आकृति सी दिखाई दी, जो धीरे-2 मेरी तरफ ही बढ़ती चली आ रही थी…..!

चन्द कदमों में वो मेरे इतने पास आ चुकी थी, अब में उसे देख पाने में समर्थ था, और जैसे ही मेने उसे पहचाना…

चोंक कर मे अपनी जगह से खड़ा हो गया और उससे कहा – तुउउंम….इस वक़्त … यहानं..?

ये रागिनी थी, जो अपने शरीर को एक चादर में लपेटे हुए मेरे सामने खड़ी थी, इस समय उसका सिर्फ़ चेहरा ही दिखाई दे रहा था…

मेने उसे देखते ही कहा – रागिनी तुम यहाँ इस वक़्त क्या कर रही हो…?

वो मेरे एकदम पास आकर बोली – यही सवाल में तुमसे करूँ तो…?

वैसे मे टाय्लेट के लिए बाहर निकली थी, तुम्हें अकेले इधर आते देखा तो देखने चली आई, कि यहाँ अकेले क्यों आए हो…?

मे – मन अचानक से बैचैन हो रहा था, तो खुली हवा में चला आया…, तुम जाओ, जाकर सो जाओ, मे थोड़ी देर और बैठकर आता हूँ…!

मेरी बात अनसुनी सी करते हुए वो मेरे पास आई, और हाथ पकड़ कर मुझे उसी पहाड़ी पर बिठाते हुए बोली – आओ थोड़ी देर मे भी तुम्हारे साथ बैठती हूँ, फिर साथ साथ चलेंगे सोने.

रागिनी बात करने के क्रम को आगे बढ़ाते हुए बोली – वैसे जंगल की रात के मौसम की बात ही अलग है, कितना सुहाना मौसम है, नही…

मे – हां, सही कह रही हो तुम, घर की चारदीवारी के अंदर की सारी सुख सुविधाओं के बबजूद इतना सुकून नही मिलता, जितना यहाँ के शांत वातावरण में है…

वैसे तुम्हारा आइडिया सही रहा, वरना ये सब देखने का मौका कहाँ मिलता.. थॅंक्स.

लेकिन रागिनी, यहाँ तो इतनी ठंडक भी नही है, फिर तुमने ये चादर क्यों डाल रखी है अपने ऊपर…

रागिनी – वो तो बस ऐसे ही, नाइट ड्रेस में थी, तो सोचा किसी ने देख लिया तो क्या सोचेगा बस इसलिए….

ये कहकर उसने अपने बदन से चादर हटा कर एक तरफ उछाल दी…लो अब ठीक है..

मेरी जैसे ही नज़र उसके तरफ गयी… तो… उसे देखते ही मेरा मुँह खुला का खुला रह गया…

वो इस समय एक पारदर्शी मिनी गाउन में थी, जो बस उसकी कमर से थोड़ा सा ही नीचे तक था, उसका वो गाउन उसके सीने पर इतना टाइट था, मानो उसकी चुचियाँ उसमें जबर्जस्ती से ठूँसी गयी हों.

 
उसके पारदर्शी कपड़े से उसकी ब्रा में कसे हुए उसके 34 साइज़ के बूब्स चाँद की चाँदनी में साफ-साफ दिखाई दे रहे थे…

वो मेरी जाँघ सहलाते हुए बोली – वैसे थॅंक्स तो मुझे कहना चाहिए, कि तुमने मेरे प्रपोज़ल पर अपनी हामी भर दी,

वरना तुम्हारे बिना कोई तैयार नही होता यहाँ आने को…और शायद कॉलेज से भी पर्मिशन नही मिलती.

उसका हाथ लगते ही मेरे बदन में एक अजीब सी हलचल होने लगी, जहाँ कुछ देर पहले एक अजीब सी बैचैनि थी, वहीं अब उत्तेजना पैदा होने लगी…

मेरा सर थोड़ा भारी सा होने लगा, मानो उसको कोई पकड़े हुए हो, साँस भी रुकने लगी थी…

लेकिन इस सब के बबजूद मेरे लंड में अजीब सी हलचल पैदा हो रही थी, वो शॉर्ट के अंदर अपना आकर बढ़ाता ही जा रहा था…

जांघें सहलाते हुए रागिनी ने अपनी उंगलियाँ मेरे कोबरा से टच करा दी, जिससे वो और भड़क गया…

उसकी हलचल वो अपनी उंगलियों पर अच्छे से फील कर रही थी, मेरी आँखों में देखते हुए बोली –

सच कहूँ तो मेरी ये फेंटसी रही है, कि रात के इस सुहाने से मौसम में खुले आसमान के नीचे तारों की छान्व तले, किसी जंगल में एक साथी के साथ बैठकर बातें करूँ..

मे उसकी बातों में खोता जा रहा था, की तभी रागिनी ने मेरे नाग का फन अपनी मुट्ठी में दबा लिया, और उसे धीरे-2 सहलाने लगी…

मे उसे ये सब करने से रोकना चाहता था, लेकिन पता नही क्यों उसे रोक नही पा रहा था…

कुछ देर शॉर्ट के ऊपर से ही सहलाने के बाद रागिनी अपना हाथ मेरे शॉर्ट के अंदर डालने लगी…

इससे पहले की वो मेरे हथियार को पकड़ पाती, मेने उसका हाथ पकड़कर झटक दिया, और अपनी जगह से खड़ा होकेर कुछ दूर जाकर उसकी तरफ पीठ कर के खड़ा हो गया…!

दूसरी तरफ मुँह किए हुए ही मेने उसे कहा – तुम यहाँ से जाओ रागिनी, प्लीज़ मुझे अकेला छोड़ दो…!

अभी मे खड़ा उसके जाने की आहट सुनने की कोशिश कर ही रहा था, कि तभी

उसने पीछे से आकर मुझे अपनी बाहों में भर लिया, उसके कठोर लेकिन मखमली उभार मेरी पीठ से दबे होने का अहसास दे रहे थे…

वो मेरी गर्दन चूमते हुए बोली – इतना क्यों दूर भागते हो मुझसे… क्या मेरे शरीर में काँटे हैं, जो तुम्हें चुभते हैं…!

मे तो सिर्फ़ तुमसे तुम्हारे कुछ पल चाहती हूँ, फिर क्यों मुझे बार-बार जॅलील कर के दूर चले जाते हो…

उसके इस तरह लिपटने से मेरी उत्तेजना में और इज़ाफा हो रहा था, मेने बिना कुछ किए उससे कहा – देखो रागिनी ! हम दोनो परिवारों के संबंध किसी तरह से सुधरे हैं…

मे नही चाहता कि फिरसे उसमें कोई दरार पैदा हो, सो प्लीज़ मुझसे दूर ही रहो तो ये हम दोनो के लिए अच्छा होगा…!

मेरी बात सुनकर उसने मुझे अपनी बाहों से आज़ाद किया और मेरा बाजू पकड़ कर अपनी ओर घूमाकर थोड़ी दबे लेकिन सख़्त लहजे में बोली…

किस दरार की बात कर रहे हो..? ये होगा भी कैसे..? यहाँ वीराने में हम दोनो को देखने वाला कॉन है, कि हम क्या कर रहे हैं… तो उन्हें कैसे पता लगेगा..?

सीधे – 2 क्यों नही कहते कि तुम मुझे जान बूझकर अवाय्ड करना चाहते हो…क्या मे इतनी बुरी हूँ..? तुम्हारा दो पल का प्यार ही तो माँग रही हूँ..

वादा करती हूँ, इसके बाद मे कभी तुम्हारे रास्ते में नही आउन्गि….!

 
मेरे दूर होते ही रागिनी ने अपने गाउन के बटन खोल लिए थे, जब मेरी नगर उसके आधे से अधिक उसकी कसी हुई ब्रा से झाँकते उसके दूधिया उरोजो पर पड़ी…

मेरी उत्तेजना मेरे दिमाग़ पर हावी होने लगी, ऐसा मेरे साथ आज से पहले कभी नही हुआ था कि इन मामलों में मेने अपने दिमाग़ का कंट्रोल खोया हो…!

मेरे दिमाग़ का कंट्रोल मेरे ऊपर से पूरी तरह ख़तम हो चुका था, मेने लपक कर रागिनी के बाजुओं को पकड़ा और अपने दहक्ते होंठ, उसकी रसीली गुलाब की पंखुड़ियों जैसे होंठों से चिपका दिए…!

रागिनी को तो जैसे मुँह माँगी मुराद मिल गयी हो… आँखें बंद किए वो भी किस करने में मेरा सहयोग करने लगी, उसकी मरमरी बाहें मेरी पीठ पर कसने लगी…

बहुत देर तक हम एक दूसरे के होंठों का रस पान करते रहे, साँसें उखड़ने लगी, मुँह से गून..गून की आवाज़ें पैदा हो रही थी, लेकिन दोनो में से कोई भी किस तोड़ने को तैयार नही था…

वासना से आँखें लाल हो चुकी थी, दोनो के बदन दहकने लगे थे,

मेरे हाथों ने हरकत करते हुए, उसके गाउन को उसके कंधों से नीचे सरका दिया, वो सर्सराकर उसके पैरों में जा गिरा…

रागिनी के हाथ भी कुछ कम नही थे, वो मेरे अप्पर में घुसकर बदन पर सरसारा रहे थे…

इन सबके बीच हमारी किस्सिंग बदस्तूर जारी थी, फिर उसने मेरे शॉर्ट को नीचे सरका कर मेरे मूसल को अपने हाथ में पकड़ लिया, और उसे मुठियाने लगी…

मेने उसकी ब्रा के हुक भी खोल दिए, और उसके नंगे उरोजो को मसल्ने लगा…

अब हमें ये सीन चेंज करने की ज़रूरत महसूस होने लगी थी, सो रागिनी किस तोड़कर अपने पंजों पर बैठ गयी, और मेरे कड़क मूसल को अपने हाथ में लेकर बोली…

आअहह…..अंकुश क्या जानदार लंड है तुम्हारा… 3 साल लग गये इसे पाने में… आज मे इसका रस निकाल कर ही रहूंगी…ये कहकर उसने उसे चूम लिया…

मेने उसके निपल को उमेठते हुए कहा – चुसले रानी मेरा जूस, देख क्या रही है मदर्चोद…. जल्दी कार्रररर…

अपने मुँह से इस तरह की गाली सुनकर मे खुद हैरान रह गया… लेकिन कोई कंट्रोल नही था अपने आप पर…

रागिनी ने भी कोई रिक्षन नही दिया, और मेरे टमाटर जैसे सुपाडे को अपने होंठों में क़ैद कर लिया…!

अनायास ही मेरा हाथ उसके सर पर चला गया, और उसे दबाकर मेने अपनी कमर को एक करारा सा झटका दिया…

सरसराकर मेरा मूसल जैसा लंड उसके मुँह में चला गया, और जाकर उसके गले में बुरी तरह से फँस गया…..

रागिनी की साँस अटक गयी, और वो उसे बाहर निकालने के लिए ज़ोर लगाने लगी…जब वो कुछ देर अपने प्रयास में असफल रही, तो उसने फटी-फटी आँखों से मेरी तरफ देखा…

मुझे लगा जैसे वो मुझसे अपना लंड निकालने के लिए फरियाद कर रही हो…मेरे दिमाग़ को एक झटका सा लगा… और मेने अपना लंड उसके मुँह से खींच लिया….!

रागिनी ने राहत की साँस ली और अपनी साँसों को नियंत्रित करते हुए कतर नज़रों से मेरी तरफ देखते हुए बोली ….

बहुत बेरहम हो… जान लेना चाहते थे मेरी… ऐसे भी कोई करता है भला…

मेने अपने कानों को हाथ लगाते हुए कहा – सॉरी डार्लिंग, पता नही आज -मुझे क्या होता जा रहा है, बार-बार अपने आप से कंट्रोल खो रहा हूँ…

वो मन ही मन मुस्करा उठी, लेकिन प्रत्यक्ष में कहा – कोई बात नही डार्लिंग, लेकिन आगे ध्यान रखना प्लीज़…

ये कहकर उसने उसे फिरसे अपने मुँह में ले लिया और पूरी लगान से मन लगाकर उसे चूसने लगी….!

मेरा लंड उसकी जीभ की मालिश और मुँह की गरम-गरम साँसों से और ज़्यादा फूल के कुप्पा हो गया था…

बीच बीच में रागिनी मेरे सुपाडे पर दाँत गढ़ाकर रगड़ देती, जिससे मेरे लंड में और ज़्यादा सुरसूराहट होने लगती…

आयईयी…मदर्चूद्द्द….ऐसा मत कर साली कुतियाअ…, वरना पछ्तायेगी फिरसे…,

ये सुनकर वो मेरी आँखों में देखते हुए मुस्कराने लगी, साथ ही अपने होंठों का दबाब और बढ़ा दिया…

मज़े की वजह से मेरी आँखें मुन्दने लगी, मुँह से स्वतः ही सिसकियाँ निकलने लगी…

कुछ देर लंड चूसने के बाद उसका मुँह दुखने लगा…, तो वो चूसना बंद कर के खड़ी हो गयी, और अपनी नाम मात्र की पेंटी नीचे करते हुए बोली..

बड़ी ही सख़्त जान है तेरा ये मूसल, मेरा मुँह दुखने लगा, लेकिन इस भोसड़ी वाले पर कोई असर ही नही हुआ, और ज़्यादा फूलता जा रहा है…कहते हुए एक थप्पड़ मेरे लंड पर मार दिया उसने…

उसका थप्पड़ खाकर वो फुफ्कार उठा, और चटक से मेरे पेट पर आकर लगा…

उसका ये रूप देखकर रागिनी जैसे फिदा ही हो गयी उसपर…और उसको पकड़कर अपनी चूत के मुँह पर रगड़ने लगी…

आअहह… राजा…अब जल्दी से इसे मेरी चूत में डालकर मेरी खुजली मिटा दे यार… अब नही रहा जा रहा मुझसे, ये कहकर उसने एक बार फिर मेरे होंठ चूस लिए…

फिर उसने अपनी चादर एक साफ सी जगह पर बिच्छा दी और अपनी टाँगें चौड़ी कर के लेट गयी…

मे भी उसकी टाँगों के बीच घुटने टेक कर बैठ गया, वो अपनी चूत को थप-थपाकर बोली… डाल अब इसमें जल्दी से… और फाड़ दे मेरी चूत को अपने मूसल से…

आहह.. क्या मस्त कड़क लंड है तेरा… फिर उसने अपने हाथ से उसे पकड़कर अपनी गीली चूत के मुँह पर रखकर अपनी टाँगों को मेरी गान्ड पर लपेट लिया…

उसका उतबलापन देख कर मे मन ही मन मुस्करा उठा… और उसकी आँखों में देखते हुए उसकी चुचियों को लगाम की तरह पकड़ लिया..

फिर उसकी टाँग चौड़ी कर के एक करारा सा धक्का उसकी चूत में मार दिया…..

आआयययययययययीीईईईईईईईईईईई…………….मुम्मिईीईईईई….मररर्ररर….गाइिईई…रीइ…

रागिनी के मुँह से चीख उबल पड़ी…. मेने उसके मुँह को दबा कर कहा…

भोसड़ी की चिल्लती क्यों है कुतिया साली… तबसे तो इसे लेने के लिए इतनी उतावली हो रही थी, अब क्यों गान्ड फट गयी तेरी…

वो कराहते हुए बोली… आअहह…भेन्चोद साले….इतनी बेदर्दी से कोई पेलता है क्या…? आराम से चोद, फिर देखती हूँ, कितना दम है तेरी गान्ड में…

वैसे इतना कड़क डंडे जैसा लंड है तेरा…. मेरी चूत अंदर तक चीर दी इसने…उफफफफ्फ़… अब आराम आराम से करना… मेरे… रजाअ..जीिीइ…

मेने धीरे-धीरे अपना लंड अंदर बाहर करना शुरू कर दिया… रागिनी सिसकियाँ भरती हुई, चुदाई का मज़ा लूटने लगी…

अब उसको भी मज़ा आने लगा था शायद, सो अपनी गान्ड उठा उठाकर मेरे मूसल जैसे लंड को जड़ तक लेने लगी…

10 मिनिट की धुआधार चुदाई के बाद वो चीख मारकर झड़ने लगी…और फिर सुस्त पड़ गयी…

मेरे धक्के बदस्तूर जारी थे… वो कराहते हुए बोली – थोड़ा रुक ना यार, चूत सूख गयी है मेरी… जलन होने लगी है…

मेने अपने धक्कों को विराम देकर उसकी गान्ड थप-थपाकर उसे घुटनों के बल कर के घोड़ी बना दिया, और पीछे से उसकी गान्ड में मुँह डालकर अपने थूक से उसकी चूत को गीला करने लगा…

थोड़ी देर में ही वो अपनी गान्ड मटकाने लगी और मज़े में आ गयी… तो मेने अपना मूसल फिर से उसकी चूत में पेल दिया…

 
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