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वह साँवली लड़की

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वह साँवली लड़की

एक

सूटकेस में कपड़े रखती अंजू को देख पूनम पास आ खड़ी हुई थी।

”कहीं बाहर जा रही है, अंजू?“

”ऑल इंडिया काँन्फ्रेंस के लिए मुझे नॉमिनेट किया है, भाभी।“

”कहाँ जाना है, सो तो बताया ही नहीं?“

”त्रिवेन्द्रम…..।“

”त्रिवेन्द्रम……..शायद वहीं तो विनीत……………“

बात अधूरी छोड़, पूनम सब कुछ कह गई थी।

निरूत्तरित अंजू कपड़े रखने-सहेजने में व्यस्त बनी रही।

”सुना है त्रिवेन्द्रम का कोवलम ‘सी-बीच’ बड़ी रोमांटिक जगह है, कहीं खो न जाना।“ पूनम के चेहरे पर शरारती मुस्कराहट थी।

”मेरी इतनी ही चिन्ता है तो साथ चली चलो भाभी,मां भी निश्चिंत रहेगी।

तो चिंता करने वाला खोज क्यों नहीं लेती अंजू? कब तक उसके नाम की माला जपती रहेगी।“

”भाभी, प्लीज। तुम जानती हो, मुझे इन बातों से सख्त नफ़रत है।“

”जिससे नफ़रत करनी चाहिए, उससे तो कर नहीं पाती………… भगवान तुझे सदबुद्धि दे। ला मैं कपड़े रखती हूँ, तू जाकर चाय पी ले, कैसा तो मुँह सूख रहा है।“

”थैंक्स भाभी। सच, तुमने मेरी आदत खराब कर दी है, तुम्हारी पैकिंग भी तो कितनी अच्छी होती है, कोशिश करके भी मैं तुम्हारी जैसी पैकिंग नहीं कर पाती।“

”अच्छा-अच्छा, अब ज्यादा कुछ कहने की जरूरत नहीं, पर देख, अम्मा जी को मत बताना कि तू त्रिवेन्द्रम जा रही है, वर्ना वह बेकार शोर मचाएँगी।“

”पर झूठ बोलना तो सम्भव नहीं है, भाभी।“

”अच्छा तू जा, वो सब मैं सम्हाल लूँगी।“ अंजू को जबरन उठा, पूनम उसके सूटकेस में कपड़े सजाने लगी।

अपनी इस छोटी ननद के प्रति पूनम के मन में बहुत प्यार था। दोनों बड़ी ननदें जब भी घर आती, पूनम असहज हो उठती। घर के काम निबटाती, ननदों की फर्माइशों पर दौड़ती पूनम, पागल हो उठती थी।

रेवा दीदी मायके आते ही बीमार हो जातीं और माला दीदी अपनी ससुराल की थकान उतारने ही मायके आतीं।

”वहां तो सुबह पाँच बजे से रात के बारह बजे तक एक पाँव पर खड़े, सबके हुक्म बजाने पड़ते हैं। एक पल का आराम नहीं आता, इसीलिए यहाँ काम में मदद नहीं दे पाती।“ माला दीदी भोला-सा मुँह बना, विवशता जतातीं।

”अरे चार दिन को मायके आई है, कम-से-कम चार दिन तो आराम कर ले। अरे बहू, आज रात जरा माला के सिर में तेल डाल देना, न जाने कब से तेल नहीं डाल पाई है बेचारी।“

बेटी का दुलार करती अम्मा भूल जातीं कि दिन-रात मशीन की तरह काम में जुटी पूनम को भी दो घड़ी आराम की जरूरत पड़ सकती है।

ऐसे समय पूनम का हाथ बॅंटाती अंजू अम्मा को समझाती- ”माला दीदी के सिर में तेल मैं डाल दूँगी। पूनम भाभी पर तो पहले ही काम का इतना बोझ है।“

”हाँ-हाँ, हम लोग तो बोझ हैं, बड़ी आई भाभी की हिमायत करने वाली। हमसे जैसे इसका कोई नाता ही नहीं है।“

दोनों बहिनें रूआँसी हो आतीं। अंजू की ओर से क्षमा माँगती पूनम उनसे मनुहार करती-

”अंजू अभी छोटी है दीदी, बात समझ नहीं पाती। आप भला बोझ है? आप तो हमारे सिर-आँखों रहें दीदी। इसे क्षमा कर दें।“

पूनम से अंजू का अतिशय स्नेह दोनों बहिनों को नहीं सुहाता था।

”अम्मा ने इसे सिर चढ़ा रखा है, हम पर ही सारे अंकुश लगाते थे। जो जी में आया बक देती है।“

इसी अंजू से जब विनीत ने दो वर्षो की लगी सगाई तोड़ दी तो पूनम ने ही उसे सम्हाला था।

भावनात्मक स्तर पर अंजू विनीत के साथ किस गहराई से जुड़ चुकी थी, यह तो सगाई टूटने के बाद ही पूनम जान सकी। विनीत पर पूनम को बहुत गुस्सा आया था, जब जनाब को अपने दिलो-दिमाग पर भरोसा नहीं था तो निर्णय ही क्यों लिया? अंजू से बार-बार मिलने या पाँच-पाँच पेज लमबे प्रेम-पत्र लिखने की क्या जरूरत थी? उतनी आसानी से सगाई तोड़, मुँह छिपाने सिंगापुर भाग जाना क्या ठीक था? विनीत त्रिवेन्द्रम में है, क्या वहाँ अंजू सहज रह पाएगी? विनीत के साथ बिताए सारे पल जीवित हो उठेंगे, कैसे झेल पाएगी अंजू?

अंजू को एयरपोर्ट छोड़ने पति के साथ पूनम भी गई थी। काश, अंजू के इस व्यक्तित्व को विनीत देख पाता। अंजू-सी सलोनी पत्नी क्या वह पा सका होगा? कम्पनी की मुख्य वित्त अधिकारी अंजू किससे कम है! चार्टर्ड अकाउंटैंसी कितनी लड़कियों को कर पाना सम्भव होता है। अपने पाँवों पर झुकती अंजू को पूनम ने सीने से लगा लिया था। धीमे से फुसफसाती पूनम ने कहा था- ”देख अंजू, यह दुनिया जितनी ही बड़ी है, उतनी ही छोटी भी- अगर वहाँ कहीं विनीत मिल गया तो झेल सकेगी?“

”तुम निश्चिन्त रहो भाभी, अब तुम्हारी अंजू बदल चुकी है।“

”हाँ, पहले से ज्यादा निखर आई है हमारी अंजू, नजर न लग जाए।“
 


कहने को पूनम हॅंस पड़ी थी, पर मन पाँच वर्ष पूर्व की बेहद टूटी उदास अंजू की तस्वीर याद कर रहा था। विनीत के पापा का संक्षिप्त पत्र अचानक मिला था………. ”विवाह सम्भव नहीं, क्षमा करें,“ यद्यपि पत्र में उन्होंने कोई कारण नहीं लिखा था, पर बाद में खबर मिली थी, सिंगापुर में बसे रबर-व्यापारी ने विनीत को खरीद लिया था। अन्ततः उसकी मध्य-वर्गीय मानसिकता ही जीत गई थी। अचानक बहुत अमीर बन जाने का मोह विनीत छोड़ नहीं सका था।

किसी ने तसल्ली देते कहा था- ”चलो अच्छा हुआ, पहले ही सब खत्म हो गया, शादी के बाद अगर यह सब होता तो?“

अंजू तो जैसे अपने होश ही खो बैठी थीं दो दिन-दो रात, पलंग पर लेटी छत को ताकती रही थी। नींद का इंजेक्शन देकर डाक्टर ने सुलाया था। होश आने पर पूनम के कंधे पर सिर धर कितना रोई थी अंजू। कितना मुश्किल था उसे समझा पाना। उस समय पूनम ही थी, जिसने उसे सम्हाला था।

”यह क्या बचपना है! लोग दुनिया छोड़ चले जाते हैं, तब बर्दाश्त करना होता है या नहीं? समझ ले वह तेरे लिए मर गया है अंजू………….।“

”नहीं…….ऐसा मत कहो भाभी।“ अंजू ने पूनम के होंठों पर अपनी हथेली धर दी थी।

”वाह, कया किस्मत पाई है विनीत ने, हम उसे कुछ कह भी नहीं सकते।“

धीमे-धीमे अंजू चैतन्य हो आई थी। चार्टर्ड अकाउंटैंसी का कठिन कोर्स दुख भुलाने का बहाना बन गया था। उसकी मेहनत रंग लाई थी। परीक्षा में प्रथम स्थान पा अंजू गौरव से भर उठी थी। तब से आज तक उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा है।

”चलूँ ,भाभी?“ अंजू की आवाज ने पूनम की विचार-तन्द्रा तोड़ी थी।

”जाते ही फ़ोन करना। दस-पन्द्रह दिन बाहर रहेगी, पत्र लिखती रहना, वर्ना हम परेशान रहेंगे।“ छिपे शब्दों में पूनम ने अपनी शंका प्रकट कर ही दी थी।

”ओके, बाय भइया, बाय भाभी।“ कंधे पर बैग टाँग अंजू चल दी।

प्लेन में कुछ ही पलों में त्रिवेन्द्रम पहुँचने की घोषणा की जा रही थी। नीचे दृष्टि डालती अंजू मुग्ध हो उठी । इतना गहरा हरा रंग………. मानो हरा सागर मौन पड़ा सुस्ता रहा हो ,इसी हरियाली में सुख-एश्वर्य के बीच अपनी पत्नी के साथ कहीं विनीत भी होगा। हमेशा चाहे-अनचाहे विनीत उसके ख्यालों में क्यों आ जाता है? सिर झटक कर अंजू ने विनीत को जैसे अपनी सोच से बाहर निकालने की कोशिश की थी।

‘मिस अंजलि मेहरोत्रा’ के नाम का प्लेकार्ड लिए व्यक्ति ने बाहर आती अंजू को देखते ही पहचान लिया था। ”मिस मेहरोत्रा?“

”जी………..“

”आपके लिए कार आई है, आइए।“

पूरे रास्ते नारियल से लदे वृक्षो का मनोहारी दृश्य निहारती अंजू, विनीत और घर को भूल-सी गई थी। अक्टूबर के महीने में भी कजरारे बादल घिर आए थे। आलीशान होटल के सामने कार जा रूकी थी। साथ आए व्यक्ति ने शालीनतापूर्वक अंजू के लिए कार का द्वार खोला था-

”कल सुबह साढ़े आठ बजे कार आपके लिए पहुँच जाएगी। आज शाम कहीं जाना चाहेंगी?“

”नहीं, आज तो बस रेस्ट चाहूँगी।“

”वैसे यहाँ से थोड़ी ही दूरी पर, एक अच्छा ‘सी-बीच’ है, आप चाहें तो……।“ साथ आए व्यक्ति ने सूचना देनी चाही थी।

”मैं देख लूँगी, थैक्स।“

होटल के उस कमरे में पहुँचते ही अंजू को जैसे अकेलेपन ने डरा दिया दिया था। पोर्टर को टिप थमा, अंजू पलंग पर पड़ गई थी। आँखें मूँदते ही विनीत का चेहरा सामने आ गया था। इसी शहर में विनीत है, उसके यहाँ रहते भी अकेलेपन का सन्नाटा उसे डस रहा था। अगर उसकी शादी विनीत से हो गई होती तो?

पहली मुलाकात में ही विनीत उसे भा गया था। पापा के रिटायरमेंट पर उनके सहकर्मी मिस्टर मेहता ने पापा को सपरिवार डिनर के लिए आमंत्रित किया था। उस दिन अम्मा को अंजू पर बड़ा लाड़ हो आया था।

‘अंजू, आज मेरी गुलाबी साड़ी पहन ले, तुझ पर खूब खिलेगी।’

इसी गुलाबी साड़ी को जब उसने कालेज की फेयरवेल पार्टी में पहनना चाहा था तो अम्मा ने कितनी जोर से डाँट लगाई थी- ‘साड़ी पहनने की तमीज़ नहीं, इतनी कीमती साड़ी बर्बाद करनी है!’

अन्ततः पूनम भाभी की फीरोजी साड़ी बेमन से पहननी पड़ी थी, इसीलिए अम्मा के उस दुलार पर अंजू चौंक गई थी।

‘हमें नहीं पहननी आपकी साड़ी, हम सलवार-सूट ही पहनेंगे।’

‘जिद नहीं करते बेटी…। तुम्हीं इसे सम्हालो बहू। मेरी तो बात ही नहीं मानती, जो कहो उसका ठीक उल्टा करेगी।’ अम्मा झुझला उठी थीं।

पूनम भाभी ने प्यार से उसे समझाया

‘देखो अंजू रानी, वहाँ बहुत सारे लोग आएँगे। सलवार-सूट में भला कोई मानेगा कि यह नन्ही-सी लड़की चार्टर्ड अकाउंटैंसी जैसे कठिन विषय की स्टूडेंट हैं? लोग तो यही कहेंगे हाईस्कूल में पढ़ने वाली लड़की है।’

‘लोग क्या कहेंगे इससे मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता।’

‘पर एक कोई क्या कहेगा, उससे तो फ़र्क पड़ेगा ,अंजू रानी?’

‘मुझ पर किसी के कुछ कहने का फर्क नहीं पड़ने वाला है, भाभी- जान। मैं साड़ी नहीं पहनूंगी, नहीं पहनूंगी, बस……….।’

‘ओ.के. बाद में जब पछताओ तो मेरे पास रोने मत आना।’ कभी हार न मानने वाली पूनम भाभी ने हथियार डाल दिए थे।

सचमुच विनीत से परिचय कराती पूनम भाभी ने जब अंजू की तारीफों के पुल बाँधने शुरू कर दिए तो अपनी जिद पर अंजू को कितना पछतावा हुआ था-‘काश, बह अम्माँ की गुलाबी सितारों वाली साड़ी पहन आती……….’

‘क्या यह चार्टर्ड अकाउंटैंसी कर रही है? स्ट्रेंज! लड़कियाँ आज कहाँ पहुँच गई हैं, पर इन्हें देखकर तो लगता है अभी डिग्री वन की स्टूडेंट हैं।’ विनीत उसे देखता मुस्करा रहा था। शर्म से अंजू की साँवली रंगत और भी सलोनी हो उठी थी।

अपनी सम्पूर्ण आभा के साथ अंजू में साँवले रंग का आकर्षण साकार था। गहरी काली बड़ी-बड़ी आँखें, तीखी नाक के साथ प्रखर बुद्धि के प्रकाश से आलोकित चेहरा, अनायास ही सबको आकृष्ट कर लेता था। इस सबके बावजूद अम्मा हमेशा परेशान ही रहतीं-

‘न जाने इस लड़की का बेड़ा कैसे पार लगेगा? आजकल तो लड़के गोरी मेम चाहते हैं। सब कुछ देकर भगवान ने रंग में कंजूसी कर डाली।’

‘रंग ही सब कुछ नहीं होता कमला, हमारी बेटी जैसा दिमाग कितनों ने पाया होगा? तुम्हें इसके विवाह की चिन्ता नहीं करनी है, इसके लिए घर बैठे लड़का मिलेगा।’
 


पापा ने अंजू को सदैव सबसे ऊपर रखा था। पापा न होते तो अम्मा की बातें उसे न जाने किस कुंठा में जकड़ लेतीं।

बी.एस.सी. में जब अंजू के मैथ्स में सर्वोच्च अंक आए तो पापा का सीना गर्व से फूल उठा था, ‘मेरी अंजू ही मेरा सपना पूरा करेगी। इसे मैं चार्टर्ड अकाउंटैंसी करने के लिए भेजूंगा।’

‘हाँ-हाँ, अब यही कमी रह गई है, लड़की की कमाई पर घर चलेगा।’

‘तुम्हें समझा पाना कठिन है, कमला। अंजू हमारी साधारण लड़की नहीं है।’

कभी-कभी अम्मा की बातों पर पापा उदास हो उठते थे। अतुल भइया पढ़ाई में साधारण ही रहे। पापा की तीक्ष्ण बुद्धि का अंश अंजू ने ही पाया था। वित्त विभाग में अकाउंटैंट पापा के लिए चार्टर्ड अकाउंटैंट आदर्श व्यक्ति था। उनकी दृष्टि में सी.ए. से अधिक अच्छा कोई प्रोफेशन नहीं था। साधारण बुद्धि वाली अम्माँ पापा की सोच तक शायद ही कभी पहुँच पाई थीं। फिर भी पापा ने अम्माँ के साथ जीवन खुशी से बिता लिया था।

सोच में डूबी अंजू अचानक द्वार की दस्तक से जग गई-”कम इन……………।“

हाथ में ट्रे लिए वेटर कमरे में प्रविष्ट हुआ। करीने से चाय की ट्रे साइड- टेबिल पर रख, केटली से चाय ढालते वेटर ने पूछा-

”शुगर मेम?“

”वन स्पून।“

कप थामती अंजू से वेटर ने पूछा, ”मैडम, ऑफिस- वर्क से आया है…..?“

”हूँ।“

”इसीलिए अकेला है।“

वेटर का प्रश्न अंजू को जैसे चिढ़ा-सा गया। क्या उसकी नौकरी एक विवशता है? विनीत क्या उसे नौकरी करने देता? ऊंह! फिर विनीत……. अंजू अपने पर झुंझला उठी थी।

डिनर की उस शाम कॉफी थमाते विनीत ने कहा था- ‘जानती हैं आपकी कम्पनी कॉफ़ी-सी ताज़गी देती है। बेहद नमकीन हैं, आप।’

‘थैंक्स……..’

छिः, भला यह भी कोई बात हुई, कॉफ़ी के साथ नमकीन चीज, जैसे लड़की न हुई, कोई परोसी जाने वाली डिश थी अंजू। फिर भी वह उपमा अच्छी लगी थी उसे।

वापिस घर पहुंची अंजू का मन उमगा पड़ रहा था। एक अजीब उत्तेजना उसे अवश बनाए दे रही थी। विनीत का आकर्षक व्यक्तित्व, उसकी बातें अंजू के मन-मस्तिष्क पर छा गई थीं।

आई.आई.टी. से इंजीनियरिंग करने के बाद विनीत ने अहमदाबाद से एम0बी0ए0 की डिग्री ली थी। आकाश की ऊंचाइयाँ छूने को व्याकुल विनीत की आँखों में ढेर सारे सपने थे। उन सपनों की चमक अंजू के अन्दर तक उतर आई थी।

पूनम भाभी खोद-खोद कर पूछे जा रही थीं- ‘क्या बातें हो रही थीं अंजू रानी, बड़ी छन रही थी दोनों में, हमें नहीं बताओगी?’

‘तुम्हारी यही बातें हमें अच्छी नहीं लगती भाभी, हमेशा बेपर की उड़ाती हो। हम नहीं बोलते तुमसे।’

‘हाँ-हाँ, अब हमसे बोलने की क्या जरूरत है, अब बातें करने वाला जो मिल गया है।’ पूनम ने छेड़ा था।

‘ओह भाभी, तुम भी कमाल करती हो, बातें जानने की ऐसी ही बेचैनी थी तो हमारे साथ क्यों नहीं बैठी थीं?’ उस समय तो भइया से चिपकी बैठी थीं और अब बातें बना रही हो।’

‘हाय राम, हम इनके साथ कब थे, हम तो किचन में पूड़ियाँ छान रहे थे।’ पूनम भाभी मुख रक्ताभ हो आया था। दो वर्षो की परिणीता पूनम भाभी भइया के नाम पर यूँ ही लजा जाती थीं।

दो दिन बाद पापा ने मेहता परिवार को अपने घर चाय पर आमंत्रित किया था। सुबह से घर में तैयारियाँ चल रही थी। पापा और अतुल भइया बाहर की तैयारी में व्यस्त थे। माला दीदी की ससुराल पास में ही थी, भइया की उन्हें बुलाने की बात पर, अम्मा चिहुँक उठी थीं-

‘क्या बात करता है अतुल, अरे माला के सामने तो अंजू काली दिखेगी – धूप-सा उजला रंग है माला का। उसे इस समय बुलाना ठीक नहीं।’

‘तुम भी कभी-कभी हद कर देती हो, क्या कमी है हमारी अंजू में? देख-सुनकर ही विनीत ‘हाँ’ कहेगा।’ पापा का स्वर विश्वासपूर्ण था।

अम्माँ की गुलाबी साड़ी पहन अंजू ने जब कमरे में प्रवेश किया था तो सबकी निगाहें उस पर जमी रह गई थीं।

‘मेहरोत्रा साहब, आज से आपकी बेटी हमारी हुई।’

पापा ने मेहता साहब को गले लगा लिया था।

‘ऑफिस में हम दोनों मित्र थे, आज से सम्बन्धी हो गए।’ पापा गदगद थे।

विनीत की माँ का चेहरा पढ़ पाना जरूर मुश्किल लगा था।

‘अंजू बेटी, रात में चेहरे पर मलाई लगा लिया करो, मलाई से रंग निखरता है।’

उनकी बात सुन अंजू का मन कसैला हो आया था। अम्मा ने बात सम्हाली थी-

‘अरे बहिन जी, शादी-ब्याह के बाद लड़कियों का रंग-रूप अपने-आप निखर आता है। अभी तो पढ़ाई का बोझ ही मारे डालता है।’

‘हमारे विनीत का रंग तो देखा ही है आपने। उसे गोरे रंग की वीकनेस थी पर आपकी बेटी पर न जाने कैसे रीझ गया……….’

‘जरूर पूर्वजन्म के संस्कार हैं बहिन जी, तभी तो कहा जाता है शादी-ब्याह पहले से तय होते है।’ अम्मा दयनीय हो आई थीं।
 


उस बात पर कोई तीखा उत्तर देने को अंजू बेचैन हो उठी थी, पर पास बैठी पूनम भाभी ने हाथ दबा चुप रहने को विवश कर दिया था।

हॅंसी-खुशी मेहता परिवार की विदा के बाद, अम्माँ ने लम्बी साँस ली थीः

‘हे भगवान, लड़की की नैया पार कर दे! विनीत की माँ ने जब अंजू के रंग की बात उठाई तो मेरा तो कलेजा धड़क उठा था।’

‘पागल हो तुम कमला। मिसेज मेहता तो जाहि्ल औरत हैं। अंजू नहीं, उन्हें हीरा मिल रहा है। बाद में यह बात समझेंगी, देख लेना।’ पापा नाराज हो उठे थे।

कभी विनीत ने कहा था-‘देखना अंजू, मैं बहुत जल्दी अपना बिजनेस शुरू करूँगा और तुम मेरी फाइनैंस कंट्रोलर होगी। इसीलिए तो तुम्हें लाइफ-पार्टनर चुना है।’

‘अच्छा, बस इसीलिए तुम्हें मेरी जरूरत है विनीत?’ अंजू की कजरारी आँखें और कजरारी हो उठतीं।

‘अरे नहीं यार, तुम्हें तो दिलो-जान से चाहा है ,मेरी जान! ऐसी नमकीन चीज भला कोई छोड़ सकता है?’

‘ऐ विनीत, तुम हमें यह नमकीन-समकीन मत कहा करो, ऐसा लगता है जैसे कोई खाने की चीज हूँ।’ अंजू ने रोष दिखाया था।

‘सच, पूरी की पूरी निगल जाने को जी चाहता है।’ विनीत ने शरारत की थी।

‘धत्त ……….हम नहीं बोलते तुमसे।’

फोन की घंटी पूरी कर्कशता के साथ बज उठी।

”हलो………….?“

”मेम, डिनर इज रेडी, वुड यू लाइक टू कम डाउन टु अवर रेस्ट्राँ ऑर शुड वी सर्व दि डिनर इन योर रूम प्लीज?“

”आज डिनर नहीं चाहिए। सेंड मी ए कप ऑफ कॉफ़ी ओनली।“

विनीत ने कहा था- ‘तुम्हारा कॉफ़ी- कलर ही तुम्हारी सबसे बड़ी ब्यूटी है। इस शाइनिंग काफी कलर पर तो अमेरिकन्स भी मर मिटेंगे अंजू।’

‘ऊह’ फिर वही विनीत …… भाभी कहती हैं, ‘इतने वर्षो के बाद भी अंजू विनीत-फोबिया से मुक्त नहीं हो सकी है।’

बाथरूम में ठंडे पानी के छींटे मुँह पर डाल अंजू बाहर आ गई। सागर की ओर से आ रही ठंडी हवा का स्पर्श, बाल्कनी में खड़ी अंजू को बड़ा भला लगा था। वहीं कुर्सी पर बैठ काफी पीती अंजू बहुत देर तक जागती रही।
 
दो

सुबह पौने आठ बजे तैयार हो अंजू नीचे रेस्ट्राँ में उतर आई। मेनू कार्ड सामने रख वेटर आर्डर की प्रतीक्षा में खड़ा हो गया था।

”टोस्ट और चाय।“

”थैंक्यू मैम।“ मेनू कार्ड उठा वेटर तत्परता से चला गया

अंजू के ठीक सामने वाली टेबल पर बैठा सुदर्शन युवक भी शायद उत्तर भारत से आया प्रतीत होता था। अंजू के साथ ही उसका भी आर्डर सर्व किया गया।

ब्रेकफ़ास्ट खत्म कर अंजू बाहर गार्डेन में आ गई। द्वार पर खड़े संतरी को बता दिया था, वह गार्डेन में है, कार आते ही उसे बुला लिया जाए।

सवा आठ बज चुके थे। समय की पाबंद अंजू बेचैन होने लगी। नौ बजे मीटिंग शुरू हो जानी थी, उसका लेट पहुँचना ठीक नहीं। काउंटर पर इन्क्वायरी कर रही अंजू को रिसेप्शनिस्ट ने सुझाया –

”मैडम, आप मिस्टर कुमार के साथ उनकी कार में चली जाइए, वह भी इसी सेमिनार में जा रहे हैं।“

”पर मैं मिस्टर कुमार को नहीं जानती, क्या उनके साथ जाना ठीक होगा? अच्छा हो आप मुझे टैक्सी बुलवा दें। आई एम गेटिंग लेट…..“

”वन मिनट मैम, प्लीज वेट करें।“ तत्परता से अपना स्थान छोड़ सामने से आ रहे युवक की ओर रिसेप्शनिस्ट बढ़ गया।

दृष्टि घुमाते ही अंजू ने उसी युवक को देखा जो कुछ देर पहले उसके ठीक सामने वाली मेज पर बैठा था। रिसेप्शनिस्ट ने शायद अंजू को साथ ले जाने की रिक्वेस्ट की थी क्योंकि उस युवक ने अंजू की ओर निगाह उठाई थी।

कुछ ही पलों में वह युवक तेजी से बाहर चला गया, रिसेप्शनिस्ट लगभग भागता हुआ आया- ”आइए मैम, आप उनके साथ जा सकती हैं, मैंने बात कर ली है।“

रिसेप्शनिस्ट के साथ अंजू होटल के पोर्टिको में पहुँची। एक लम्बी विदेशी कार अंजू की प्रतीक्षा कर रही थी। अंजू के पहुँचते ही वर्दीधारी ड्राईवर ने गाड़ी का पिछला द्वार खोला था। अपनी आँखों के सामने न्यूज-पेपर लगा, कार-स्वामी ने अंजू की उपस्थिति को सर्वथा नकार दिया।

”थैंक्स।“ रिसेप्शनिस्ट को धन्यवाद देती अंजू कार में बैठ गई । घमंडी कहीं का ! अहंकार की भी सीमा होती है! शायद सोच रहा है टैक्सी के पैसे बचाने के लिए ही उसने लिफ्ट ली है। रिसेप्शनिस्ट पर भी गुस्सा आ रहा था, जबरन ही ऐसे आदमी के सिर मढ़ गया। बाहर का मनोहारी दृश्य भी अंजू का मूड नहीं बदल सका ।

करीब बीस मिनट बाद कार गंतव्य स्थल पर पहुंची थी। बड़े-बड़े बैनर, बैज लगाए वालंटियर दूर से ही किसी बड़े समारोह की सूचना दे रहे थे। उनकी कार के पहुँचते ही दो-चार वालंटियर्स कार के पास आ पहुँचे। ड्राइवर ने तत्परता से अंजू के लिए द्वार खोला। साथ का व्यक्ति स्वयं उतर आया था।

”काँन्फ्रेंस में आपका स्वागत है,मैम“।

”अंजलि मेहरोत्रा ,फ़्रॉम लखनऊ।“

”सुजय कुमार, दिल्ली से।“

”ओह डॉ कुमार, स्वागत है।“ दूर खड़े आयोजक सुजय कुमार के स्वागत के लिए लगभग दौड़ते-से आए थे।

”कार में इतनी देर मुझे टॉलरेट करने के लिए थैंक्स। अफ़सोस है आपके एकान्त में बाधा दी।“

सुजय के उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना अंजू धड़धड़ाते हुए स्वागत-कक्ष की ओर बढ़ गई

”अंजलि मेहरोत्रा……….।“

”हाय, अंजू! तू यहाँ?“

चौंक कर अंजू ने देखा, रिसेप्शन काउण्टर पर शाहीन खड़ी थी।

”अरे ,शाहीन? व्हाट ए वंडरफुल सरप्राइज!“

”सच, तू यहाँ इस तरह मिल जाएगी, यह तो सोचा ही नहीं था। लगता है अभी तक तूने शादी नहीं की है। क्या इरादे है?“

”सब यहीं पूछ डालेगी या बाद के लिए भी कुछ छोड़ेगी? तेरे और गेस्ट्स इन्तजार कर रहे हैं।“

”ओ के , चल तेरी ही बात सही, इन्हें निबटा लूँ फिर तुझसे मिलती हूँ, यहाँ दो वीक्स का प्रोग्राम है न?“

”हाँ कॉन्फ्रेंस के बाद एक ट्रेनिंग प्रोग्राम है, करीब दस-बारह दिन चलेगी।“

”चल, तब तो कम-से-कम पन्द्रह दिन का साथ रहेगा। सुन, आज लंच साथ ही करेंगे….“

”पर डेलीगेट्स के लिए तो लंच अलग है…..।“

ओह् हो ! बड़ी डेलीगेट बनकर आई हैं, चाय तो चलेगी न? ठीक ग्यारह बजे इधर ही आ जाना। बढ़िया चाय पिलाऊंगी, यहाँ की सीनियर रिसेप्शनिस्ट ठहरी।“ शाहीन जोर से हॅंस पड़ी थी।

काँन्फ्रेंस का उद्घाटन- सत्र बहुत ही शानदार था। विशिष्ट व्यक्तियों के साथ बैठी अंजू उन पलों को जी रही थी। अगर विनीत से उसका विवाह हो गया होता तो क्या वह आज इस काँन्फ्रेंस में डेलीगेट बन उपस्थित हो पाती? न चाहते भी, उसके मन में विनीत को एक बार देख पाने की चाहत जरूर थीं। पूनम भाभी को भी भय था कहीं विनीत न मिल जाए-पर अगर वह मिल भी जाए तो क्या अन्तर आने वाला था?

चाय के लिए लोग हाल के पीछे लगी मेजों की ओर बढ़ रहे थे। अंजू बाहर रिसेप्शन पर पहुँच गई। उसे देखते ही शाहीन ने आवाज लगाई,

”नारायण, मेरे रूम में दो कप चाय और स्नैक्स भेज देना। रमेश, तुम कुछ देर मेरी जगह ड्यूटी कर लोगे? यह मेरी पुरानी फ्रेंड अंजू काँन्फ्रेंस में आई है।“

”ओह, श्योर मैम! इन्ज्वाय योर टाइम।“

”थैंक्स! आ, अंजू।“
 


अंजू का हाथ पकड़े शाहीन कुछ ही देर में होटल के पीछे बने अपने क्वार्टर में पहुंच गई। सुरूचिपूर्ण ढंग से सजा छोटा-सा घर शाहीन की कलात्मक अभिरूचि का परिचायक था।

”वाह, घर तो बड़ा सुन्दर बसा लिया है, पर हमारे सलीम भाईजान कहाँ हैं?“

”उन्हें क्या पता था उनकी चार्मिग सिस्टर इन-ला मिस अंजलि मेहरोत्रा उर्फ अंजू आ रही है, वर्ना क्या वे घर छोड़ते! चार-पाँच दिनों को मद्रास गए हैं- कुछ ऑफीशियल काम था। अपनी सुना, कैसी कट रही है?“

”बस यूँ ही …… नया कुछ नहीं जो सुनाऊं।“

”वाह, नया कुछ क्यों नही? विनीत कैसे हैं? कहाँ है जनाब, तुम लोगों ने शादी क्यों टाल दी, अंजू!“

”टाली नहीं, बात ही ख़त्म हो गई ,शाहीन।“

”क्या कह रही है ,अंजू? मुझे तो ब्याहकर अम्मी ने ऐसी जल्दी रूख़सत कर दिया कि तुम लोगों से बाद में मिल भी न सकी। किसी का हाल पता नहीं।“

”अच्छा ही तो किया, तेरे चेहरे पर ,खुशी का नूर टपक रहा हैं, लगता है भाई जान बेहद चाहते हैं।“

”इसमें तो कोई शक नहीं, पर मेरी शादी के पहले तेरी सगाई भी हो गई थी फिर क्या हुआ?“

”वो सब छोड़ ,शानी, तेरे शहर में आई हूँ, बता क्या खातिर करेगी,“

”सबसे पहले तो वह अपना होटल छोड़ यहाँ आ जा। सलीम को वापस आ जाने दे। फिर हम लोग तुझे घुमाने का प्रोग्राम बनाएँगे।“

”न बाबा, होटल छोड़ना तो पॉसिबिल नहीं, यहाँ तुम्हारे बेडरूम में अगर मैं सो गई तो सलीम भाई की गालियाँ खाऊंगी।“

”धत्त! बड़ी बातें बनाने लगी है। उनकी मजाल जो तुझे गालियाँ दें। तलाक न दे दूँगी।“

”इसीलिए तो यही ठीक है मैं वहीं रहूँ, वैसे भी घूमने का समय तो बस शाम को ही मिल सकेगा। पूरे दिन तो बिजी रहूँगी न!“

”सच अंजू, तूने तो कमाल कर दिया। यह कॉन्फ्रेंस तो चीफ एक्जीक्यूटिव्स के लिए है, तू क्या इतनी बड़ी ऑफिसर बन गई है ,अंजू?“

”बड़ी तो नहीं हूँ-हाँ, नाम जरूर चीफ़ फाइनैंस ऑफिसर कर दिया गया है।“

”एक बात पूछूँ, कहीं तेरी इस नौकरी की वजह से ही तो विनीत अलग नहीं हो गया? तू नहीं जानती पुरूष का इगो, जो न करे थोड़ा है।“

”उस सबका मौका ही नहीं आया। बड़े आसामी की बेटी के सहारे ऊपर उठना विनीत को ज्यादा आसान लगा- शायद इसीलिए। मिडिल क्लास मानसिकता की यह भी एक कमजोरी होती है न-कैसे जल्दी से आकाश छू ले………….।“

”मार गोली विनीत को। अभागा था, वर्ना तुझ पर तो हजारों न्योछावर हो जाएँ।“

वेटर चाय के साथ स्नैक्स ले आया था। अंजू को चाय थमाती शाहीन फिर पूछ बैठी थी-

”अम्माँ-पापा के लिए तो बहुत बड़ा धक्का रहा होगा?“

”महीनों पूरे घर में अवसाद की काली छाया मॅंड़राती रही। अम्माँ तो बार-बार पापा से विनीत के पापा के पास जाने को कहती रहीं, पर पापा को तो तू जानती ही है-टूट जाएँगे पर झुकेंगे नहीं। अम्माँ को डाँट दिया था, ‘हमारी अंजू को जो अस्वीकार करे वह स्वयं अभागा है। मैं उसके यहाँ गिड़गिड़ाने नहीं जाऊंगा। पछताएगा, देख लेना।’“

”मैंने भी पापा का साथ दिया था। अपने को सहेज, पढ़ाई पूरी करने में जुट गई थी। किसी के सामने पापा को हाथ फैलाते देखना मुझे किसी कीमत पर स्वीकार नहीं है, शानी।“

”ठीक किया तूने। सच, लड़की की जिन्दगी भी क्या है-शादी टूटे या सगाई, दोष हमेशा लड़की को ही दिया जाएगा। उसमें नुक्स ढूँढ़े जाएँगे, भले ही लड़का ऊपर से नीचे तक अवगुणों का भंडार हो, पर उसे हमेशा लड़का होने का एडवांटेज मिलेगा।“

”ओ माई गॉड, देख तेरे साथ बातों में टाइम का अंदाज ही नहीं हुआ, वहाँ सेशन शुरू हो जाएगा।“ चाय का कप धर अंजू उठ खड़ी हुई थी।

”क्या प्रोग्राम रहेगा यहाँ?“

”लंच तक पेपर-प्रोग्राम चलेंगे। बाद में विचार-विमर्श के लिए ओपन सेशन होंगे। एक तरह से यह हमारा ट्रेनिंग प्रोग्राम है।“

”देख अंजू, तू चाहे कितनी भी बिजी रहे, रोज चाय मेरे साथ ही पीनी होगी, समझ गई न।“

”हाँ बाबा, तुझे क्या जानती नहीं? अगर ‘हाँ’ न कही तो क्या आसानी से बख्शने वाली है! सच शानी, यहाँ तुझे पाकर कितना अच्छा लग रहा है, तू समझ नहीं सकती।“ दोनों हॅंस पड़ी थीं।

लंच के समय अंजू के आसपास विभिन्न कार्यालयों के लोग घिर आए थे।

”मिस मेहरोत्रा, आप पहले कभी साउथ आई थीं?“

”जी नहीं, यह पहला चांस है।“

”कोवलम सी-बीच मिस मत कीजिएगा। मेरे ख्याल से तो लास्ट टू-थ्री डेज आप वहीं शिफ्ट कर जाएँ। वहाँ रहना भी एक अनुभव है।“ मिस्टर तनेजा ने सजेस्ट किया था।

”सच, वहाँ रहते लगता ही नहीं हम भारत में है। रात में झिलमिल करती लाइट्स और वेस्टर्न म्यूजिक-अजीब समाँ बाँध देते हैं।“ मिस्टर पांडे सपनों में खो गए थे।

”अगर आप चाहें आज ही आपको वहाँ शिफ्ट करा दूँ, मैं तो वहीं सी-बीच के हॉलीडे होम में ठहरा हूँ।“ तनेजा अत्सुक हो उठे।

”नो, थैंक्स, मैं जहाँ हूँ बहुत अच्छी जगह है। प्योरली इंडियन एटमॉसफियर और मैं यही चाहती हूँ। एक्सक्यूज मी, मैं सेकेंड सर्विस के लिए जा रही हूँ।“

सबको वहीं छोड़ अंजू डाइनिंग टेबिल की ओर बढ़ गई थी। खीरे के टुकड़े उठाती अंजू को पास की आवाज ने चौंका दिया।

”तो आप विशुद्ध भारतीय वातावरण पसन्द करती हैं, आश्चर्य है।“

अंजू ने मुड़कर देखा, सुजय कुमार प्लेट में पुलाव ले रहे थे।

”आपको तो आश्चर्य होना ही चाहिए। शायद आपको भारतीय संस्कृति की ज्यादा जानकारी नहीं, जहाँ घर आया शत्रु भी आदर पाता है………….।“

”ओह! शायद आप मेरी किसी गलती की ओर इशारा कर रही हैं, पर मिस मेहरोत्रा, एक बात जान लीजिए लड़कियों को लिफ्ट देना मेरी आदत नहीं।“ धीमे टोन में सुजय ने जानकारी दी थी।

”लिफ्ट मैंने नहीं माँगी थी। रिसेप्शनिस्ट ने आपको एक सज्जन पुरूष मानकर यह गलती कर दी थी। अब आप समझ गए न मिस्टर …………।“ अंजू का स्वर शायद तीखा पड़ गया था।

आसपास के लोग उन्हें उत्सुकता से देख रहे थे। अंजू वहाँ से हटकर एकान्त में चली गई।

खाने का स्वाद ही जैसे पूरा कड़वा हो उठा था। बिन खाए खाने की प्लेट अंजू ने टेबिल के नीचे सरका पानी का ग्लास उठा लिया। दूर खड़ी मालती सिन्हा अंजू के पास खिसक आई।

”क्या बात है मिस मेहरोत्रा, आपने कुछ खाया ही नहीं?“

”नहीं, ऐसी बात नहीं है, काफ़ी खा लिया……….. बाहर का खाना ज्यादा न खाना ही ठीक है।“ अंजू ने मुस्कराने की चेष्टा की।

”हाँ-हाँ – तभी तो यह छरहरी काया मेनटेन कर सकी हो पर भाई, अपन से यह कंट्रोल नहीं होता।“ अपनी स्थूल काया को देखती मालती जी, मुक्त रूप से हॅंस पड़ीं।

”आप ऐसे ही अच्छी लगती हैं।“ अंजू ने सादगी से उत्तर दिया।

”चलो इस हाल में भी कोई तो अच्छा कहने वाला मिला। कहाँ ठहरी हो ,अंजलि? माफ करना, यह मिस मेहरोत्रा बड़ा लम्बा-सा नाम है न?“

”गोदावरी में हूँ, आप कहाँ ठहरी है?“

”भई मुझे तो शुरू से एकान्त में सागर का संगीत सुनना अच्छा लगता है। कोवलम बीच के लाइट हाउस के ठीक नीचे वाले गेस्ट हाउस में ठहरी हूँ। एक्सलेंट प्लेस फ़ॉर राइटर्स एंड पेंटर्स ……. दूर-दूर तक फैला निस्सीम सागर, बस…… और कुछ नहीं।“

”लगता है आप भी कलाकार है………..।“

”कलाकार तो नहीं पर विधाता की बनाई सुन्दर पेटिंग्स अभिभूत जरूर करती हैं। तुम्हीं सोचो अंजलि, यह ऊपर वाला कितना बड़ा कलाकार है…..“

”दर्शनशास्त्र में भी आपकी रूचि है, मिसेज सिन्हा?“

”मिसेज सिन्हा न कहकर दीदी कहतीं तो अच्छा लगता, उम्र ओर अनुभव दोनों में बड़ी हूँ न तुमसे?“
 


”ठीक है, आगे से ऐसी गलती नहीं होगी, दीदी ही पुकारूँगी आपको, पर आप भी मुझे बस अंजू पुकारें।“ अंजू मुस्करा दी थी।

”चलो त्रिवेन्द्रम आने का एक फायदा तो हुआ एक छोटी बहिन मिल गई।“ मालती सिन्हा कुछ भावुक हो आई थीं।

”चलें मालती दी, सेशन शुरू होने वाला है, दूसरे नम्बर पर मेरा ही प्रेजेण्टेशन होना है“।

”क्या टॉपिक है पेपर का?“

”टैक्सेशन ऑन एम्प्लॉइज़ सैलरी।“

”वाह, इसमें तो लोगों की खूब रूचि होगी। मेरे साथ प्रॉबलेम है लिख सकती हूँ ,पर पेपर प्रेजेण्ट करते सयम न जाने क्यों नर्वस हो जाती हूँ।“

”यह भी अपना-अपना स्वभाव होता है, मैं भी पता नहीं क्या करूँगी।“

”आल दि बेस्ट, तू जो करेगी अच्छा ही होगा।“ मालती जी ने शुभकामनाएँ देते हुए कहा।

अंजलि का प्रेजेण्टेशन बहुत प्रभावशाली रहा। स्पष्ट, श्रंखलाबद्ध विचारों के साथ सधी आवाज में उसकी प्रस्तुति सराहनीय थी। इतने लोगों की दृष्टियाँ अपने ऊपर गड़ी होने का अहसास शुरू में अंजू को डरा रहा था, पर बोलना शुरू करने के बाद उसका भय न जाने कहाँ भाग गया। तालियों की गड़गड़ाहट के बीच अपने स्थान पर वापस जाती अंजू हल्की मुस्कान के साथ बधाइयाँ स्वीकार करती जा रही थी।

संध्या चाय के दौरान वित्त विशेषज्ञ प्रो0 रामनाथन ने अंजू के पास आकर बधाई दी,

”आपके नये सुझाव नोट किए गए हैं, उम्मीद है इनसे सबको फ़ायदा होगा।“

”थैंक्यू सर!“ अंजू का मुख प्रसन्नता से खिल उठा।

पापा अगर उसका यह सम्मान देख पाते तो कितने खुश होते।

मालती सिन्हा तो बार-बार सबसे उसकी तारीफ़ कर रही थीं।

”इतनी छोटी उम्र में अंजलि को इतनी नॉलेज है, कितना सुन्दर प्रस्तुतीकरण था।“

”तो आज का दिन मिस अंजलि मेहरोत्रा के नाम रहा, क्यों मिस मेहरोत्रा?“ सुजय के शब्दों में व्यंग्य था या प्रशंसा, पहचान पाना बहुत कठिन था।

”नो कमेंट्स।“ कह अंजू चुप लगा गई।

”फाइनैंस जैसे नीरस विषय में आपकी रूचि की कोई खास वजह?“

”मिस्टर कुमार, कुछ देर पहले आपने जो जानकारी दी थी, उससे आपका यह व्यवहार कतई मेल नही खाता। देख रही हूँ लड़कियों की रूचि-अरूचि में भी आप बेहद इण्टरेस्टेड हैं।“

”लड़कियाँ किस तरह लोगों को मूर्ख बना सकती हैं, मैं अच्छी तरह जानता हूँ। आपका आज का प्रेजेण्टेशन भी उसी का एक अंग था या नहीं? लड़कियों को समझ सकना इम्पॉसिबल होता है। वे बाहर से जैसी होती हैं अन्दर से ठीक उसकी उल्टी………….।“

”अच्छा हो आप अपने इसी निष्कर्ष पर दृढ़ बने रहें। फिर भी पुरूषों की अपेक्षा लड़कियों की कम्पनी आपको ज्यादा पसन्द है, ठीक कहा न ,मिस्टर कुमार?“

”शायद आपने नोट नहीं किया, मेरे चाहने वाले पुरूषों की संख्या गिन पाना आसान नहीं।“

सुजय ने ठीक कहा था, अंजू ने नोट किया, वह जहाँ भी बैठता, लोग उसे घेर लेते थे।

दूसरे दिन शाहीन के साथ चाय पीती अंजू कुछ खिन्न-सी थी।

”क्या बात है अंजू, आज तेरे तेवर ही दूसरे हैं ,किसी से झगड़ा हुआ क्या ?

तू तो जानती है शानी अपनी आदत झगड़ा करने की नहीं है, पर हर बात की सीमा होती है। एक हैं कोई सुजय कुमार, हर समय लड़कियों पर तानाकशी करते रहते हैं।“

”क्या कहा सुजय कुमार? अरे, वह तो निहायत शरीफ़ इंसान हैं, अंजू। जाड़ों में हमेशा त्रिवेन्द्रम आते हैं, इसी होटल में तो ठहरते हैं। वह हमारे रेगुलर कस्टमर हैं। इस बार यहाँ सेमिनार की भीड़ की वजह से गोदावरी में ठहरे हैं। उनके बारे में तूने ऐसी राय कैसे कायम कर ली ,अंजू? ही इज़ ए परफ़ेक्ट एलिजिबिल बैचलर……….. कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं है?“

”बलिहारी है तेरी शरीफ़ इंसान की इंसानियत पर। हर समय ऐसे-ऐसे टॉंट कसते हैं कि सारा मूड खराब हो जाता है।“

”ताज्जुब है, चल तेरी ओर से मैं लड़ आती हूँ। क्या वजह है जो हमारी भोली-भाली अंजू रानी का मूड खराब कर डाला है।“

”रहने दे, निबटने के लिए मैं अकेली ही काफ़ी हूँ। सलीम भाईजान कब आ रहे हैं, लगता है तेरी मोहब्बत में कमी आ रही है शानी, वर्ना………।“

”खुदा तेरा बेड़ा गर्क करे, बड़ी आई बातें बनाने वाली। हम दोनों एक जान दो बदन हैं, समझी। अरे हाँ, तुझे बताना ही भूल गई, सलीम का आज ही फोन आया है, उसे मद्रास चार दिन और रूकना है, मुझे भी बुलाया है। सोचती हूँ चली जाऊं,पर तुझे छोड़ने का जी नहीं चाहता।

”अब बातें मत बना, सलीम भाई की जगह भला मैं ले सकती हूँ?“

”आज रात यहीं क्यों नहीं ठहर जाती? फिर तो चार दिन बाद ही मिल पाएँगे।“

”आज तो मालती जी के साथ उनके ऐतिहासिक गेस्ट-हाउस में जा रही हूं। रात में सागर कैसा लगता है, देखना है।“
 
”पागल है, भला मालती जी की कम्पनी में सागर-तट का मजा आएगा? अरे हनीमून के लिए कोवलम पर अपने मियाँ के साथ आना, मजा आ जाएगा।“

”फिर वही रट, इसके अलावा जैसे कोई और बात तू जानती ही नहीं है? पिछले तीन-चार दिनों में मालती जी इतना स्नेह देने लगी हैं कि लगता है ,पूर्व जन्म में मेरी बहिन ही थी।“

”ओ के बाबा, कान पकड़े फिर जो कभी इस साधुनी से मजाक करूँ, फिर लौटकर मिलती हूँ तुझसे।“

”ओ के , ऑल दि बेस्ट।“
 
तीन

प्रोग्राम खत्म होने पर अंजलि मालती सिन्हा के साथ उनके गेस्ट-हाउस चली गई। दूसरे दिन इतवार था। सबको अपने ढंग से छुट्टी मनाने की स्वतंत्रता थी। अंजू के साथ होने के कारण मालती सिन्हा बेहद उत्साहित थीं।

”आज रात कोवलम का नजारा देखना अंजू। आशीष इसे सपनों का तट कहते थे।“

”आशीष…….यानी मिस्टर सिन्हा?“

”नहीं री, आशीष दत्त, मिस्टर सिन्हा कैसे हो जाते?“

”कौन हैं आशीष दत्त?“

”कितना अजीब सवाल है……सब कुछ होते हुए भी अगर रिश्ते का कोई नाम न दिया जाए तो वह कुछ नहीं होता,अंजू।

”आई एम सॉरी दीदी, मैं समझ गई। अब कहाँ हैं आशीष जी?“

”कभी हम दोनों ने इसी गेस्ट हाउस में हनीमून मनाने का सपना देखा था ,अंजू।

”सपना पूरा क्यों नहीं हुआ ,दीदी?

”जीवन की अंतिम कहानी इसी जगह तो लिखी गई थी,अंजू।“

”कहानी तो अधूरी ही रह गई, पूरी कहाँ हो पाई, मालती दी?“

”जरूरी तो नहीं जो अन्त चाहा जाए वही मिले, आशीष इसी गेस्ट-हाउस में रहते हुए अपने कैनवस पर कोवलम के विविध रूप उतारा करते थे तभी उनकी मुलाकात नैन्सी से हुई थी। नैन्सी स्वीडन से आई थी, वह आशीष के चित्रों पर ही नहीं, आशीष पर भी मर मिटी थी।“

”क्या आशीष जी ने भी आपको भुला दिया ?“

”न जाने कौन किसे भुला पाता है? नैन्सी तो जबरन आशीष को स्वीडन ले गई, वहाँ से उनका पत्र आया था। क्षमा माँगते हुए एक अच्छा जीवन-साथी खोज लेने की सलाह दी थी।“

”सिन्हा साहब यह कहानी जानते हैं, दीदी?“

”नहीं, ,मैंने उनके अहं को ठेस नहीं पहुँचाई, अंजू। उन्होंने मुझे साफ़ स्लेट के रूप में स्वीकार किया है, जिस पर बस उन्हीं का नाम अंकित है, फिर भला मैं उन्हें क्यों दंडित करूँ? अपनी पराजय का दंड उन्हें देना क्या ठीक है ,अंजू?“

”पता नहीं दीदी, परन्तु अगर कभी उन्हें यह बात पता लगी तो?“

”तब तक मुझे पूरी तरह पहचान कर क्षमा कर सकना, उन्हें बहुत आसान हो जाएगा, अंजू।“

”कैसा लगता है उन यादों के साथ इस गेस्ट-हाउस में जीना, दीदी?“

”सच कहूँ अंजू तो लाख चाहने पर भी हर पल आशीष को अपने पास पाती हूँ। यह पाप है, पर क्या करूँ, इस जगह मैं अपने को बेहद विवश पाती हूँ।“

”बीते क्षणों को दोहराना शायद बहुत सुखद होता है, इसीलिए न चाहकर भी हम उन्हें दोहराते हैं। पापा कहते थे, आज का महत्व हम कल समझ पाते हैं। आपने कोई पाप नहीं किया है, दीदी।“

”तुझसे बातें करके कितना अच्छा लगता है ,अंजू। लगता है तू मेरे दुख की सहभागिनी है। चल आज नीचे किसी रेस्ट्राँ में ही डिनर लिया जाए।“

दोनों पैदल चलकर सागर-तट पर पहुँचीं। तट पर बने रेस्ट्राँज की झिलमिलाती रोशनी की झालरें, पाश्चात्य संगीत की धुन सुनते विदेशी जोडे़, अदभुत समाँ उपस्थित कर रहे थे।

”यहाँ आकर तो लगता ही नहीं यह सी-बीच इंडिया का पार्ट है। इसे तो विदेश कहना ही ठीक होगा। एक भी इंडियन दिख रहा है दीदी?“

”यह लो तुमने कहा और वो देखो सामने की टेबिल पर अपने मिस्टर कुमार बैठे हैं।“

अंजू के कुछ कहते न कहते, मालती सिन्हा सुजय के पास पहुंच गई थीं।

”हलो मिस्टर कुमार। अभी हम लोग किसी भारतीय को खोज ही रहे थे कि आप दिख गए। कहिए कहाँ ठहरें हैं?“

”थिंक ऑफ डेबिल एण्ड दि डेबिल इज़ देयर।“ अंजू बुदबुदाई ।

”ओह, वेलकम मिसेज सिन्हा, हलो मिस मेहरोत्रा। आइए।“ सुजय उठ खड़ा हुआ।

”नहीं-नहीं, हम आपकी प्राइवेसी में बाधा नहीं डालना चाहते, हम उधर चलेंगे ,दीदी।“ अंजू ने मालती जी को जबरन खींचना चाहा।

”मिस मेहरोत्रा, अभी आपका अनुभव बहुत कम है, एक उम्र पर पहुँचकर महसूस करेंगी, सबके बीच भी आदमी अपनी प्राइवेसी बनाए रख सकता है। भीड़ में अकेले आदमी के अहसास जैसा……“

”वाह ! अंजू तो मुझे ही दार्शनिक कहती है, आप तो पक्के दार्शनिक निकले। आ अंजू, हम यहीं बैठते हैं, कुमार साहिब की बातें सुनने का फिर न जाने कब मौका मिले।“ अंजू का हाथ पकड़ मालती जी ने उसे जबरन कुर्सी पर बैठा लिया।

”कहिए मालती दीदी, आप क्या लेंगी, मिस मेहरोत्रा तो कोल्ड ड्रिंक प्रिफ़र करेंगी।“

”अब दीदी का रिश्ता जोड़ा है तो मैं तुम्हें जय ही कहूँगी। मेरे लिए तो हॉट कॉफ़ी मॅंगाना।“

”मुझे कुछ भी नहीं चाहिए। जबरदस्ती की मेहमानदारी मुझे स्वीकार नहीं।“

”तो आप मेहमाननवाजी का फ़र्ज़ निभाएँ ,मिस मेहरोत्रा, मैं बिन बुलाया मेहमान बनने का तैयार हूँ।“ हॅंसकर सुजय ने कहा।

”मेहमान का चुनाव करने का अधिकार मेरा होना चाहिए, आप तो मेरे मेहमान कभी हो ही नहीं सकते।“

मालती सिन्हा ने चौंक कर अंजलि और सुजय का चेहरा देखा ।

”ठीक है जय, आज रहने दो, फिर कभी तुम्हारा आतिथ्य ज़रूर स्वीकार करूँगी।“ मालती सिन्हा गम्भीर मुख उठ खड़ी हुई। सुजय मौन ही रह गया था।

थोड़ी दूर बने रेस्ट्राँ के सामने पड़ी कुर्सियों में से एक खींच मालती सिन्हा बैठ गई थीं। अंजलि उनके मौन से संकुचित हो उठी।
 


”मुझे माफ़ कर दें ,दीदी- असल में मिस्टर कुमार ने ऐसे-ऐसे कटाक्ष किए हैं कि उन्हें सहन कर पाना कठिन लगता है।“

”जानती है, मिस्टर कुमार से ज्यादा वेल-बिहेव्ड आदमी मिलना कठिन है। इतना बड़ा उद्योगपति पर अभिमान जरा-सा भी नहीं है। अमेरिका से फाइनैंस मैनेजमेंट की डिग्री लेकर आया है। हजारों लड़कियाँ मर मिटें, पर मज़ाल है किसी की ओर दृष्टि उठाकर भी देखा हो…… पर तेरे साथ वह क्यों इतना रूखा है, समझ में नहीं आता।“

”मेरे साथ ही क्यों, वे तो हर लड़की को एक्सपोज़ करने की तमन्ना रखते हैं।“ कुछ रोष से अंजू ने कहा।

”तब ज़रूर उसके जीवन में कुछ ऐसा घटा है जिसकी वजह से वह लड़कियों से चिढ़ता है। अंजू, क्या तू पता कर सकती है?“ मालती सिन्हा की उत्सुक दृष्टि अंजू के मुख पर गड़ गई।

”सॉरी, यह काम करना मेरे वश का नहीं। अब कुछ खिलाएँगी भी या बस सुजय-पुराण ही सुनना पडे़गा?“

”ओह, मैं तो सचमुच भूल ही गई थी। बोल वेज, नान-वेज क्या लेगी? जानती है, यहाँ दस रूपयों में इतनी ढेर सारी सब्जी मिलती है कि पूरा घर खा ले। अगर फ़िश पसन्द है तो वही मॅंगाती हूँ, बीस रूपयों में हम दोनों का पूरा हो जाएगा।“

”कोई वेज-डिश ही मॅंगा लें, आज फ़िश का मन नहीं कर रहा है।“

खाना खाकर गेस्ट हाउस की ओर जाती अंजू भी कोवलम के सौन्दर्य का लोहा मान चुकी थी।

आते समय पूनम भाभी ने गलत नही कहा था, ‘यहाँ कोई भी खो सकता है। जी चाहता है यहाँ से कभी न जाऊं।

”आशीष हर साल जाड़ों में एक महीना इसी सागर-तट, पर बिताते थे। कहा करते थे मुक्त सागर का सौन्दर्य अनोखा होता है, उसे चित्र में समेट लेना आसान नहीं है। अब वहाँ बर्फ जमे सागर-तट, इस तट की याद नहीं दिलाते होंगे?“

”सिर्फ सागर-तट ही क्यों, ठंडे देश की नैन्सी क्या हमारी जीवन्त मालती दीदी की बराबरी कर पाती होंगी? जरूर पछताते होंगे, आशीष जी।“

”अब पछताने न पछताने का कोई अर्थ नहीं रह गया है ,अंजू। सिन्हा साहब शायद आशीष की तुलना में सामान्य ठहरें, पर उनसे जो सम्मान पाया है वही मेरी निधि है।“

दूसरी सुबह उत्साहित मालती जी ने अंजू को बहुत जल्दी उठा दिया –

”देख अंजू, इस समय सागर कितना सुन्दर लग रहा है। चल आज सागर-स्नान का मजा लेंगे।“

”पर हमारे पास स्वीमिंग कॉस्ट्यूम कहाँ है?“

”अरे छोड़ अपनी कॉस्ट्यूम को, सलवार कुर्ता पहने हैं, इसी के साथ नहा लेंगे…..।“

मालती जी के उत्साह से अंजू भी उत्साहित हो उठी, रात का अवसाद न जाने कहाँ तिरोहित हो गया। पूरी रात अपराध-बोध ने अंजू को सोने नहीं दिया था। किसी का अपमान करना उसने कभी जाना ही नहीं था, पर कल अनजाने ही वह सुजय का अपमान कर गई थी। अपने व्यवहार को वह किसी तरह भी जस्टीफ़ाई नहीं कर पाई थी।

ऊपर खिड़की से झाँकती अंजू को नीचे लहराता सागर आमंत्रित करता-सा लगा। एक कप चाय पी दोनों नीचे उतर आईं। अपने स्थूल शरीर के बावजूद मालती सिन्हा आसानी से नीचे उतर आई थीं।

”सागर तल को नीचा दिखाती, दूर ऊंची खड़ी गर्वित पहाड़ियों के शिखर चूर-चूर कर ,सागर ने इनका अभिमान तोड़ दिया है न, अंजू?“

”आपके साथ रह आपके और कितने गुणों से परिचित होना पडे़गा मालती दी? अभी तक दार्शनिक ही थीं, अब कवयित्री के गुण भी दिख रहे हैं।

”तेरे साथ तो कोई भी कवि बन जाए, पर एक बात बता अंजू, सुजय से तू इतना क्यों चिढ़ती है।?“

”अब आज तो मूड ठीक ही रहने दें शायद हम दोनो के ग्रह नहीं मिलते बस।“

”कहे तो ग्रह मिलवा दूँ, अच्छी ज्योतिषी भी हूँ।“ मालती जी हौले से मुस्कराई थीं।

”छिः, आप तो बस……..।“

पाँव तले ठंडे पानी का स्पर्श होते ही अंजू पुलक उठी।

”वाह, मजा आ गया, मैं तो सोचती हूँ ‘गोदावरी’ छोड़ यहीं आ जाऊं।“

”ठीक है, कल ही तेरा सामान उठा लाएँगे। तू नहीं जानती अंजू, तेरे साथ मैं अपने सारे दुख भूल जाती हूँ, पर तू कभी-कभी बेहद खो जाती है, अंजू……… क्या वे बातें मुझे नहीं बताएगी?“

”टूटी चीज बार-बार देखने से क्या फ़ायदा, मालती दी। दोहराने से दुख ही तो बढ़ता है।“

”किसी से कहकर दुख हल्का भी तो हो जाता है।“

”फिर कभी ,मालती दी।“
 
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