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वह साँवली लड़की
एक
सूटकेस में कपड़े रखती अंजू को देख पूनम पास आ खड़ी हुई थी।
”कहीं बाहर जा रही है, अंजू?“
”ऑल इंडिया काँन्फ्रेंस के लिए मुझे नॉमिनेट किया है, भाभी।“
”कहाँ जाना है, सो तो बताया ही नहीं?“
”त्रिवेन्द्रम…..।“
”त्रिवेन्द्रम……..शायद वहीं तो विनीत……………“
बात अधूरी छोड़, पूनम सब कुछ कह गई थी।
निरूत्तरित अंजू कपड़े रखने-सहेजने में व्यस्त बनी रही।
”सुना है त्रिवेन्द्रम का कोवलम ‘सी-बीच’ बड़ी रोमांटिक जगह है, कहीं खो न जाना।“ पूनम के चेहरे पर शरारती मुस्कराहट थी।
”मेरी इतनी ही चिन्ता है तो साथ चली चलो भाभी,मां भी निश्चिंत रहेगी।
तो चिंता करने वाला खोज क्यों नहीं लेती अंजू? कब तक उसके नाम की माला जपती रहेगी।“
”भाभी, प्लीज। तुम जानती हो, मुझे इन बातों से सख्त नफ़रत है।“
”जिससे नफ़रत करनी चाहिए, उससे तो कर नहीं पाती………… भगवान तुझे सदबुद्धि दे। ला मैं कपड़े रखती हूँ, तू जाकर चाय पी ले, कैसा तो मुँह सूख रहा है।“
”थैंक्स भाभी। सच, तुमने मेरी आदत खराब कर दी है, तुम्हारी पैकिंग भी तो कितनी अच्छी होती है, कोशिश करके भी मैं तुम्हारी जैसी पैकिंग नहीं कर पाती।“
”अच्छा-अच्छा, अब ज्यादा कुछ कहने की जरूरत नहीं, पर देख, अम्मा जी को मत बताना कि तू त्रिवेन्द्रम जा रही है, वर्ना वह बेकार शोर मचाएँगी।“
”पर झूठ बोलना तो सम्भव नहीं है, भाभी।“
”अच्छा तू जा, वो सब मैं सम्हाल लूँगी।“ अंजू को जबरन उठा, पूनम उसके सूटकेस में कपड़े सजाने लगी।
अपनी इस छोटी ननद के प्रति पूनम के मन में बहुत प्यार था। दोनों बड़ी ननदें जब भी घर आती, पूनम असहज हो उठती। घर के काम निबटाती, ननदों की फर्माइशों पर दौड़ती पूनम, पागल हो उठती थी।
रेवा दीदी मायके आते ही बीमार हो जातीं और माला दीदी अपनी ससुराल की थकान उतारने ही मायके आतीं।
”वहां तो सुबह पाँच बजे से रात के बारह बजे तक एक पाँव पर खड़े, सबके हुक्म बजाने पड़ते हैं। एक पल का आराम नहीं आता, इसीलिए यहाँ काम में मदद नहीं दे पाती।“ माला दीदी भोला-सा मुँह बना, विवशता जतातीं।
”अरे चार दिन को मायके आई है, कम-से-कम चार दिन तो आराम कर ले। अरे बहू, आज रात जरा माला के सिर में तेल डाल देना, न जाने कब से तेल नहीं डाल पाई है बेचारी।“
बेटी का दुलार करती अम्मा भूल जातीं कि दिन-रात मशीन की तरह काम में जुटी पूनम को भी दो घड़ी आराम की जरूरत पड़ सकती है।
ऐसे समय पूनम का हाथ बॅंटाती अंजू अम्मा को समझाती- ”माला दीदी के सिर में तेल मैं डाल दूँगी। पूनम भाभी पर तो पहले ही काम का इतना बोझ है।“
”हाँ-हाँ, हम लोग तो बोझ हैं, बड़ी आई भाभी की हिमायत करने वाली। हमसे जैसे इसका कोई नाता ही नहीं है।“
दोनों बहिनें रूआँसी हो आतीं। अंजू की ओर से क्षमा माँगती पूनम उनसे मनुहार करती-
”अंजू अभी छोटी है दीदी, बात समझ नहीं पाती। आप भला बोझ है? आप तो हमारे सिर-आँखों रहें दीदी। इसे क्षमा कर दें।“
पूनम से अंजू का अतिशय स्नेह दोनों बहिनों को नहीं सुहाता था।
”अम्मा ने इसे सिर चढ़ा रखा है, हम पर ही सारे अंकुश लगाते थे। जो जी में आया बक देती है।“
इसी अंजू से जब विनीत ने दो वर्षो की लगी सगाई तोड़ दी तो पूनम ने ही उसे सम्हाला था।
भावनात्मक स्तर पर अंजू विनीत के साथ किस गहराई से जुड़ चुकी थी, यह तो सगाई टूटने के बाद ही पूनम जान सकी। विनीत पर पूनम को बहुत गुस्सा आया था, जब जनाब को अपने दिलो-दिमाग पर भरोसा नहीं था तो निर्णय ही क्यों लिया? अंजू से बार-बार मिलने या पाँच-पाँच पेज लमबे प्रेम-पत्र लिखने की क्या जरूरत थी? उतनी आसानी से सगाई तोड़, मुँह छिपाने सिंगापुर भाग जाना क्या ठीक था? विनीत त्रिवेन्द्रम में है, क्या वहाँ अंजू सहज रह पाएगी? विनीत के साथ बिताए सारे पल जीवित हो उठेंगे, कैसे झेल पाएगी अंजू?
अंजू को एयरपोर्ट छोड़ने पति के साथ पूनम भी गई थी। काश, अंजू के इस व्यक्तित्व को विनीत देख पाता। अंजू-सी सलोनी पत्नी क्या वह पा सका होगा? कम्पनी की मुख्य वित्त अधिकारी अंजू किससे कम है! चार्टर्ड अकाउंटैंसी कितनी लड़कियों को कर पाना सम्भव होता है। अपने पाँवों पर झुकती अंजू को पूनम ने सीने से लगा लिया था। धीमे से फुसफसाती पूनम ने कहा था- ”देख अंजू, यह दुनिया जितनी ही बड़ी है, उतनी ही छोटी भी- अगर वहाँ कहीं विनीत मिल गया तो झेल सकेगी?“
”तुम निश्चिन्त रहो भाभी, अब तुम्हारी अंजू बदल चुकी है।“
”हाँ, पहले से ज्यादा निखर आई है हमारी अंजू, नजर न लग जाए।“
एक
सूटकेस में कपड़े रखती अंजू को देख पूनम पास आ खड़ी हुई थी।
”कहीं बाहर जा रही है, अंजू?“
”ऑल इंडिया काँन्फ्रेंस के लिए मुझे नॉमिनेट किया है, भाभी।“
”कहाँ जाना है, सो तो बताया ही नहीं?“
”त्रिवेन्द्रम…..।“
”त्रिवेन्द्रम……..शायद वहीं तो विनीत……………“
बात अधूरी छोड़, पूनम सब कुछ कह गई थी।
निरूत्तरित अंजू कपड़े रखने-सहेजने में व्यस्त बनी रही।
”सुना है त्रिवेन्द्रम का कोवलम ‘सी-बीच’ बड़ी रोमांटिक जगह है, कहीं खो न जाना।“ पूनम के चेहरे पर शरारती मुस्कराहट थी।
”मेरी इतनी ही चिन्ता है तो साथ चली चलो भाभी,मां भी निश्चिंत रहेगी।
तो चिंता करने वाला खोज क्यों नहीं लेती अंजू? कब तक उसके नाम की माला जपती रहेगी।“
”भाभी, प्लीज। तुम जानती हो, मुझे इन बातों से सख्त नफ़रत है।“
”जिससे नफ़रत करनी चाहिए, उससे तो कर नहीं पाती………… भगवान तुझे सदबुद्धि दे। ला मैं कपड़े रखती हूँ, तू जाकर चाय पी ले, कैसा तो मुँह सूख रहा है।“
”थैंक्स भाभी। सच, तुमने मेरी आदत खराब कर दी है, तुम्हारी पैकिंग भी तो कितनी अच्छी होती है, कोशिश करके भी मैं तुम्हारी जैसी पैकिंग नहीं कर पाती।“
”अच्छा-अच्छा, अब ज्यादा कुछ कहने की जरूरत नहीं, पर देख, अम्मा जी को मत बताना कि तू त्रिवेन्द्रम जा रही है, वर्ना वह बेकार शोर मचाएँगी।“
”पर झूठ बोलना तो सम्भव नहीं है, भाभी।“
”अच्छा तू जा, वो सब मैं सम्हाल लूँगी।“ अंजू को जबरन उठा, पूनम उसके सूटकेस में कपड़े सजाने लगी।
अपनी इस छोटी ननद के प्रति पूनम के मन में बहुत प्यार था। दोनों बड़ी ननदें जब भी घर आती, पूनम असहज हो उठती। घर के काम निबटाती, ननदों की फर्माइशों पर दौड़ती पूनम, पागल हो उठती थी।
रेवा दीदी मायके आते ही बीमार हो जातीं और माला दीदी अपनी ससुराल की थकान उतारने ही मायके आतीं।
”वहां तो सुबह पाँच बजे से रात के बारह बजे तक एक पाँव पर खड़े, सबके हुक्म बजाने पड़ते हैं। एक पल का आराम नहीं आता, इसीलिए यहाँ काम में मदद नहीं दे पाती।“ माला दीदी भोला-सा मुँह बना, विवशता जतातीं।
”अरे चार दिन को मायके आई है, कम-से-कम चार दिन तो आराम कर ले। अरे बहू, आज रात जरा माला के सिर में तेल डाल देना, न जाने कब से तेल नहीं डाल पाई है बेचारी।“
बेटी का दुलार करती अम्मा भूल जातीं कि दिन-रात मशीन की तरह काम में जुटी पूनम को भी दो घड़ी आराम की जरूरत पड़ सकती है।
ऐसे समय पूनम का हाथ बॅंटाती अंजू अम्मा को समझाती- ”माला दीदी के सिर में तेल मैं डाल दूँगी। पूनम भाभी पर तो पहले ही काम का इतना बोझ है।“
”हाँ-हाँ, हम लोग तो बोझ हैं, बड़ी आई भाभी की हिमायत करने वाली। हमसे जैसे इसका कोई नाता ही नहीं है।“
दोनों बहिनें रूआँसी हो आतीं। अंजू की ओर से क्षमा माँगती पूनम उनसे मनुहार करती-
”अंजू अभी छोटी है दीदी, बात समझ नहीं पाती। आप भला बोझ है? आप तो हमारे सिर-आँखों रहें दीदी। इसे क्षमा कर दें।“
पूनम से अंजू का अतिशय स्नेह दोनों बहिनों को नहीं सुहाता था।
”अम्मा ने इसे सिर चढ़ा रखा है, हम पर ही सारे अंकुश लगाते थे। जो जी में आया बक देती है।“
इसी अंजू से जब विनीत ने दो वर्षो की लगी सगाई तोड़ दी तो पूनम ने ही उसे सम्हाला था।
भावनात्मक स्तर पर अंजू विनीत के साथ किस गहराई से जुड़ चुकी थी, यह तो सगाई टूटने के बाद ही पूनम जान सकी। विनीत पर पूनम को बहुत गुस्सा आया था, जब जनाब को अपने दिलो-दिमाग पर भरोसा नहीं था तो निर्णय ही क्यों लिया? अंजू से बार-बार मिलने या पाँच-पाँच पेज लमबे प्रेम-पत्र लिखने की क्या जरूरत थी? उतनी आसानी से सगाई तोड़, मुँह छिपाने सिंगापुर भाग जाना क्या ठीक था? विनीत त्रिवेन्द्रम में है, क्या वहाँ अंजू सहज रह पाएगी? विनीत के साथ बिताए सारे पल जीवित हो उठेंगे, कैसे झेल पाएगी अंजू?
अंजू को एयरपोर्ट छोड़ने पति के साथ पूनम भी गई थी। काश, अंजू के इस व्यक्तित्व को विनीत देख पाता। अंजू-सी सलोनी पत्नी क्या वह पा सका होगा? कम्पनी की मुख्य वित्त अधिकारी अंजू किससे कम है! चार्टर्ड अकाउंटैंसी कितनी लड़कियों को कर पाना सम्भव होता है। अपने पाँवों पर झुकती अंजू को पूनम ने सीने से लगा लिया था। धीमे से फुसफसाती पूनम ने कहा था- ”देख अंजू, यह दुनिया जितनी ही बड़ी है, उतनी ही छोटी भी- अगर वहाँ कहीं विनीत मिल गया तो झेल सकेगी?“
”तुम निश्चिन्त रहो भाभी, अब तुम्हारी अंजू बदल चुकी है।“
”हाँ, पहले से ज्यादा निखर आई है हमारी अंजू, नजर न लग जाए।“