• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

वह साँवली लड़की



मालती जी बच्चों-सी उत्साहित थीं। सलवार-कमीज पानी में भीग उनकी काया से चिपक गई थीं, पर वे निश्चिन्त सागर-स्नान का मजा ले रही थी। अंजू बार-बार कपड़े निचोड़ रही थी। मालती जी हॅंस पड़ी थीं-

”अरे यहाँ कोई किसी को नहीं देखता। जानती है दो साल पहले गोआ-तट पर नंगे विदेशियों को फुटबाल खेलते देख मैं तो आँखें भी न उठा सकी थी, दो दिन बाद सब सामान्य-सा लगा था।“

”अब चलें मालती दी, भूख लग आई है।“

”ब्रेकफास्ट में क्या लेगी? यहाँ हर तरह का ब्रेकफास्ट उपलब्ध है। आलू के पराठे खाएगी?“

”आलू के पराठे यहाँ?“

”हाँ, वह सामने इस्माइल का रेस्ट्राँ है न, वह नार्थ इंडियन डिशेज का एक्सपर्ट है। चल वहीं उसके होटेल में कपड़े चेंज भी कर लेंगे।“

मालती सिन्हा को देखते ही इस्माइल आगे बढ़ आया।

”वेलकम, मैडम। आज खाने में क्या स्पेशल चाहिए?“

”पहले तो हमें एक बाथरूम- अटैच्ड रूम दो, हम कपड़े बदल लें, तब आलू के पराठे और अपना इमली वाला मिर्ची का अचार तैयार रखना।“

”ओ के मैडम, हफ़ीज़, मैडम को फिफ्टी टू में ले जा फटाफट।“

रेस्ट्राँ के पीछे बने कमरों में विदेशी टूरिस्टों की भीड़ थी। मालती दी जैसे कोवलम की एक-एक बात से परिचित थीं। बाथरूम में शॉवर के नीचे खड़ी अंजू, ठंडे पानी की बौछार में भीगती रही।

मालती जी ने द्वार पर दस्तक दी – ”ऐ अंजू, क्या सो गई, मुझे भी चेन्ज करना है, जल्दी कर।“

”सॉरी दीदी, अभी निकली।“

तौलिये से भीगे बाल सुखाती अंजू जल्दी ही बाहर आ गई थी। बालों से गिरती छोटी-छोटी बूंदें माथे पर बिखर आई थीं।

”वाह, क्या रूप पाया है। सच कह, ऐसे रूप के साथ तू आज तक कुंवारी कैसे रह गई ,अंजू?“

”आप तो हद कर देती हैं, मालती दी।“ मालती सिन्हा की मुग्ध दृष्टि पर अंजू लजा आई।

आलू के पराठे परोसता इस्माइल मालती दी से चुहल करता था रहा था-

”आशीष साहब तंदूरी चिकन खाता था और दीदी आलू का पराठा। साहब शिकायत करता था-‘इस्माइल, तुम दीदी के पराठे में ज्यादा घी डालता है, दीदी मोटा हो जाएगा तो उन्हें इधर ही छोड़ जाएगा।’ दीदी तो सचमुच मोटा हो गया अब बताओ दीदी, साहब तुमको छोड़ा या नहीं?“

मालती का चेहरा पीला पड़ गया। पराठे का ग्रास जैसे गले में अटक गया था।

”इस्माइल, थोड़ा पानी मिलेगा?“ अंजू ने बात टालनी चाही।

”एक बात बता अंजू, मुझे इस रूप में देख क्या आशीष मुझसे नफरत करेंगे? जानती है उस समय तुझसे भी एक-आध किलो कम वजन रहा होगा मेरा।“ मालती जी जैसे कहीं खो गई।

”छिः मालती दी, आप भी किन ख्यालों में खो गई हैं। प्यार क्या सिर्फ़ शरीर से होता है? प्यार तो आत्माओं का मिलन होता है, वर्ना क्या कोई बिना किसी बात या कारण के सगाई तोड़ सकता है?“

”किसकी बात कर रही है, अंजू? किसने सगाई तोड़ दी है?“

”किसी ने नहीं, मैंने तो एक उदाहरण-भर दिया था ,मालती दी। अब अगर आपकी भूख नहीं रही तो चलते हैं।“

”नहीं-नहीं……… तूने तो आधा पराठा भी नहीं खाया, ये अचार चखा तूने?“

नारियल के पेड़ के नीचे पड़ी केन की कुर्सियों पर बैठी अंजू और मालती जी अपने-अपने ख्यालों में खो गई थीं। सागर-तट पर तैनात सुरक्षा गार्ड, सागर स्नान का मजा ले रहे पर्यटकों को, सीटियाँ बजा सतर्क कर रहे थें जिधर सागर का जल बढ़ रहा था, वहाँ से हटने के लिए सीटियों के साथ-साथ हाथ से भी संकेत कर निर्देश दे रहे थे।

”पहले तो ये गार्ड यहाँ ड्यूटी नहीं देते थे, इस्माइल?“

इस्माइल के हाथ से पाइन ऐपल जूस लेती मालती दी ने पूछा।

”दो बरस पहले एक ट्रेजेडी हो गया था, तभी से ये गार्ड लोग इधर ड्यूटी करता है, दीदी साहेब।“

”कैसी ट्रेजेडी, इस्माइल?“

”वो सामने रॉक देखता है न, दीदी? याद है वहाँ बैठ आशीष साहब ने एक पेटिंग खींचा था……….“

”हाँ इस्माइल, सब याद है……. तब ये पहाड़ी पानी में इतनी डूबी नहीं थी…… पूरे चार दिन आशीष ने वहाँ बिताए थे।“

”दो बरस पहले दिल्ली से एक साहब शादी बनाकर आया था। अपनी वाइफ़ को उस रॉक पर खडे़ होने को बोल, वह फोटो खींच रहा था तभी एक जोर का वेव आया और उसकी वाइफ़ को बहा ले गया…..। बेचारा पानी के साथ उसकी फोटो लेना माँगता था-पानी उसकी वाइफ़ को ही ले गया।“

”ओह माई गॉड, फिर क्या हुआ? उसे बचाया जा सका या नहीं, इस्माइल?“ अंजू डर गई।

”बचाने को उस टाइम कोई नहीं था, फिशरमैन तो मार्निग में इधर रहता है, शाम को वहाँ कौन था? वह साहब चिल्लाता रहा। डेड बॉडी भी नहीं मिला उसका। बस तब से ये सिक्यूरिटी गार्ड की ड्यूटी लगती है और उस रॉक पर जाना एकदम मना है।“

”आज न जाने क्या सुनना पड़े। चल अंजू ,गेस्ट-हाउस ही चलते हैं।“

उदास मन अंजू और मालती जी गेस्ट हाउस चली गई थीं।
 
चार

दूसरे दिन आयोजकों की और से त्रिवेन्द्रम की प्रमुख फ़ैक्टरीज दिखाने का कार्यक्रम बनाया गया था। किन्हीं मिस्टर खन्ना की ओर से डेलीगेट्स के लंच के लिए त्रिवेन्द्रम के नामी होटल में बुकिंग कराई गई थी। मालती सिन्हा प्रसन्न थीं।

”इस बार की कॉन्फ्रेंस सचमुच एन्ज्वॉय की है, पहले तो बस हाल में बैठ, बोरिंग लेक्चर ही सुनने पड़ते थे। मैं तो कहूँगी हर साल कॉन्फ्रेंस यहीं ऑरगेनाइज की जाए।“

”पर मैं तो इसका पक्का विरोध ही करूँगी, बेचारे सिन्हा साहब घर में अकेले रहें और आप यहाँ एन्ज्वॉय करें, मुझे मंजूर नहीं।“

”वाह, यह भली कही, दीदी मैं हूँ और हमदर्दी सिन्हा साहब से। अरे, उन्हें अपनी बेटी इतनी प्यारी है कि उसके रहते उन्हें अकेलेपन का एहसास भी नहीं होता।“

”कितनी बड़ी बिटिया है, दीदी? उसकी जरा भी चिन्ता नहीं है?“

”शुरू से ही वह अपने पापा और दादी की दुलारी है। इस मामले में मैं लक्की रही, वर्ना कई कामकाजी स्त्रियों को बच्चों के कारण जॉब छोड़ना पड़ जाता है।“

”आपसे उसका लगाव कम है, इससे दुख नहीं होता, दीदी?“

”सच कहूँ अंजू, कभी जी चाहता है उसे अपने से लिपटा, अपने को भूल जाऊं, पर ऐसा हो नहीं पाता……….।“

”न जाने क्यों वह मुझे आशीष की याद दिलाती है। उसी की तरह मीनू को भी पेंटिंग का शौक है। आँखों में वैसे ही सपने…… न जाने क्या सिमिलैरिटी है कि उसके पास जो, मैं खो जाती हूं……..।“

”ऐसी बेकार की बातें सोचनी भी नहीं चाहिए, दीदी, जो तुम्हारे अस्तित्व को नकार कर चला गया, उसके प्रति मोह रखना क्या ठीक है?“

”तू क्या अपने मोह-पाश को तोड़ सकी है, अंजू? यह बात इतनी आसान होती तो क्यों मृग-तृष्णा के पीछे कोई भागता?“

”जिस दिन किसी और का वरण कर लूँगी-मोह-पाश को तार-तार कर दूँगी।“ दृढ़ता से अपनी बात कह अंजू ने होंठ भींच लिए थे।

”यह बात तो बाद में पूछूंगी……। शायद तू ऐसा कर सके, अंजू। मैं भी कोशिश तो करती हूँ, पर अनजाने ही आशीष याद आने लग जाते हैं।“

”जो चीज नहीं मिल पातीं उसके प्रति आकर्षण ज्यादा ही होता है, भले ही प्राप्य वस्तु उससे हजार गुना ज्यादा अच्छी हो।“

”तू कितनी समझदार है, अंजू? तू जिसकी जीवन-साथी बनेगी वह बहुत भाग्यवान होगा।“

”सिन्हा साहब भी कम भाग्यवान नहीं हैं, जिन्हें हमारी मालती दी मिली हैं।“

”कल मेरा प्रेजेण्टेशन है, अभी से नर्वस हूँ, और तू मेरे गुण गाए जा रही है।“

”अरे आप बेकार डर रही हैं, देखिएगा आपका प्रेजेण्टेशन ए वन होगा।“

”कल डर इसलिए और लग रहा है क्योंकि कल सुजय स्पेशलिस्ट है। तू नहीं जानती वह कितना बड़ा विद्धान है। कहीं कुछ पूछ बैठा और जवाब न दे पाई तो?“

”आप भी मालती दी, कमाल करती हैं, जवाब क्यों नहीं दे पाएँगी। अपने को अंडर-एस्टीमेट करना तो कोई आपसे सीखे।”

”मैडम, कार वेट कर रही है। लंच के लिए सागर होटल चलना है।“ एक वालंटियर ने आकर नम्रता से उनकी बातों में बाधा डाली।

होटल सागर की भव्य इमारत आकाश छूती लग रही थी। राजसी सोफा-सेट, कार्पेट, शैंडेलियर सभी कुछ भव्य था। पीछे लगे शीशे के पार फ़ाउंटेन चल रहा था। फ़ाउंटेन के नीचे तरह-तरह के पेड़-पौधे अद्भुत दृश्य उपस्थित कर रहे थे। शीतल पेय सर्व किया जा चुका था, पुरूष-वर्ग ठंडी बीयर के ग्लासों के साथ बातों में व्यस्त थे।

मालती सिन्हा, अंजू, नम्रता नागपाल, दीपा गांगुली, अर्चना सब एक जगह सिमट आई थीं।

”आज हमारे लंच का होस्ट कौन है ,मालती दी? इस तरह के प्रोग्राम से सेशन्स का बोरडम दूर हो जाता है न।” नम्रता चहकी।

”पता नहीं आज का होस्ट कौन है, पर उसके लिए ज्यादा उत्सुकता ठीक नहीं, मेरिड है वह ,नम्रता।“

”छिः मिसेज सिन्हा आप तो मजाक की हद कर देती हैं, क्या मैं यहाँ मैच खोजने आई हूँ?“

सब हॅंस पड़े। तभी दीपा गांगुली ने इशारा किया- ”वो देखो, लगता है आज के होस्ट आ गए।“

पीछे मुड़कर देखती अंजू के चेहरे का रंग बदल गया। कीमती सूट में विनीत का व्यक्तित्व और निखर आया था। उसके साथ चल रही युवती क्या विनीत की पत्नी हो सकती थी? इतना गहरा रंग, उस पर मेकअप की पर्ते उसके चहरे को अजीब बना रही थीं। कीमती साड़ी और जेवर भी उसके शरीर पर जैसे अपनी आभा खो बैठे थे।

”हाय राम, प्रिन्स चार्मिग के साथ नज़र का टीका होना क्या ज़रूरी है?“ नम्रता मुस्करा पड़ी।

आयोजक ने आगे बढ़ विनीत का स्वागत किया। सबसे परिचय प्राप्त करते विनीत के चेहरे पर मंद मुस्कान तैर रही थी। उसकी पत्नी को आयोजक दल का एक व्यक्ति महिलाओं की ओर ले आया था।

”मैडम खन्ना …….. हमारी आज की मेजबान हैं। ये हैं मालती सिन्हा…… नम्रता नागपाल…….“

सबके अभिवादन ग्रहण करती मिसेज खन्ना पास पड़े सोफे पर बैठ गई। दूसरी ओर से चलकर विनीत महिलाओं के सामने आ खड़ा हुआ। हाथ में पकड़ा ग्लास कहीं रखने जाने के बहाने, अंजू पीठ फेर आगे चल दी। दिल जोरों से धड़क रहा था। अपनी ओर से काफ़ी देर लगा, वापिस आती अंजू को आयोजक ने घेर लिया।

”वाह मिस मेहरोत्रा, आप तो छूट ही गई। सर, ये हैं मिस अंजलि मेहरोत्रा, परसों इनका प्रेजेण्टेशन था, बहुत बढ़िया रहा। अंजलि जी, आज के हमारे होस्ट मिस्टर विनीत खन्ना…………।“

”हलो अंजू, कब पहुँची? मुझे इन्फ़ार्म कर देतीं, कहाँ ठहरी हो?“

उत्तर में अंजू का मौन बहुत जोरों से गूँज उठा था।

”वाह ! सर आपको जानते हैं, हमें पता ही नहीं था …….. लीजिए आप लोग बातें करें, मैं अभी आया।“

आयोजक के हटने के साथ ही अंजू भी विनीत को अकेला खड़ा छोड़ मालती जी की ओर बढ़ गई।

”मालती दी, मैं वापिस होटल जाना चाहती हूँ……।“

”क्या बात है अंजू, तेरा चेहरा इतना उड़ा हुआ क्यों है? चल मैं भी चलती हूँ।“

”न ……. न……….. आप यहीं रहें, किसी से कुछ कहने की जरूरत नहीं है, नीचे टैक्सी लेकर चली जाऊंगी। प्लीज डोंट मेक अ फ़स आफ इट।“

मालती सिन्हा को और कुछ कहने का मौका दिए बिना, अंजू तेजी से रिसेप्शन की ओर चल दी थी।

”कैन आई गिव यू अ लिफ्ट?“ सुजय शायद अंजू के साथ ही बाहर आ गया था।

”नो, थैंक्स…….।“

”लेकिन मैं तो आपके लिए ही लंच छोड़ आया हूँ।“

”किसने कहा था, आप लंच न लें, प्लीज गो एंड हैव योर लंच एंड थैंक्स फ़ॉर दी सेक्रीफ़ाइस…….।“

”जब तक मेरे सवाल का जवाब नहीं मिलेगा मैं आपको छोड़ने वाला नहीं ,मिस मेहरोत्रा।“

”मुझे आपके किसी सवाल का जवाब नहीं देना है। प्लीज लीव मी अलोन।“ अंजू के तेजी से बढ़ते कदमों के साथ सुजय भी रिसेप्शन से बाहर आ गया था। द्वार पर खड़े संतरी ने शालीनता से द्वार खोल, कार का नम्बर पुकारा।

”टैक्सी प्लीज……।“ अंजू ने संतरी से कहा।

”नहीं, आप मेरे साथ चल रही हैं।“ अंजू के अनुरोध पर दृढ़ता से अपनी बात कहते सुजय ने संजरी को टैक्सी न बुलाने का इशारा कर दिया था।

पल-भर में सुजय की कार होटल-पोर्टिको में आ खड़ी हुई। तत्परता से उतरे वर्दीधारी चालक ने सुजय के लिए कार का पिछला दरवाजा खोला।

”आइए…….।“ सुजय ने अंजू को निमंत्रण दिया।

”नो थैंक्स………।“

”डू यू वांट टू क्रिएट ए सीन, मिस? चलिए देर हो रही है। वैसे मिस्टर खन्ना का लंच लेना है तो आराम से रूक सकती हैं।“

रूकती-रूकती अंजू न जाने क्या सोच कार में बैठ गई थी।

”परिवेश ………..।“

स्वामी का आदेश पाते ही चालक ने कार की गति बढ़ा दी।
 
”आई वांट टु गो टु माई होटेल ओनली………।“

”डोंट वरी, यू विल रीच देयर, बट फ़ॉर दि टाइम बींग कुड यू कीप क्वाइट प्लीज?“

खिसियाई अंजू कार-मिरर के बाहर ताकती रह गई थी। एयर कंडीशण्ड कार में बंद शीशे को खोलने की मूर्खता कर, चालक की दृष्टि में उपहास-पात्री ही बनना था। उस ठंडे वातावरण में भी अंजू का पारा ऊपर ही चढ़ता जा रहा था।

भारतीय कलाकृतियों से अलंकृत ‘परिवेश’ सचमुच दक्षिण भारत का सात्त्विक परिवेश प्रस्तुत कर रहा था। बड़े-बड़े तैल चित्र, केन का फर्नीचर, चटाइयों से सज्जित दीवारें, लैम्पों से निकलती हल्की रोशनी के साथ विशुद्ध भारतीय वाद्यों की धुन पर अंजू मुग्ध हो उठी ।

‘परिवेश’ का सभी स्टाफ सुजय को पहचानता था। एकान्त केबिन में सुजय अंजू के ठीक सामने बैठा था। कुछ ही देर में वेटर दो थम्स- अप रख गया।

” ऑर्डर सर?“

”अपना स्पेशल लंच लाइए।“

”ओ के “, विनीत भाव से सिर झुका वेटर चला गया था।

”आपने मिस्टर खन्ना को क्यों नहीं पहचाना, मिस मेहरोत्रा?“

”इट्स नन ऑफ योर बिजनेस ,सर।“ अंजू के शब्दों में व्यंग्य घुल आया था।

”इट्स वेरी मच माई बिजनेस, जानते-बूझते किसी अपने को न पहचानना कितना तकलीफदेह हो सकता है, पता है आपको?“ सुजय के उस स्वर पर अंजू चौंक गई।

”अगर कहूँ मैंने इसे भोगा है तो?“

”इमपॉसिबिल ……एक बार उस तकलीफ़ को भोग, दुबारा उसे कोई दोहरा ही नहीं सकता……।“

”मैं किसी विनीत खन्ना को नहीं जानती…………..।“

”यह झूठ है….. विनीत खन्ना आपके बहुत क्लोज था।“

”प्लीज मिस्टर कुमार, अपनी निजी जिन्दगी में इंटरफ़ियर करने की मैंने आपको इजाज़त नहीं दी है।“

”आप नहीं जानतीं आपके सिर्फ न पहचानने से उसकी पूरी जिन्दगी बदल सकती है।“

“जो स्वयं पूरा बदल गया,उसकी ज़िंदगी मे अब बदलने को रह ही क्या गया है?

”हो सकता है इसमें गलती आपकी हो वर्ना……….।“

”निश्चय ही पुरूष हैं आप, उसी का तो पक्ष लेंगे।“ अंजू जैसे उदास हो गई थी।

”आई एम सॉरी, आपकी फीलिंग्स हर्ट करने का मेरा कोई इरादा नहीं था, पर आज विनीत खन्ना के आपकी ओर बढ़ते कदम, आपने जैसे रोक दिए………. उसने मुझे कोई पुरानी बात याद दिला दी थी।“

”मैं कभी एक विनीत मेहता को जानती थी, विनीत मेहता विनीत खन्ना कैसे बन सकता है, पर शायद गलत कह रही हूँ, मैंने विनीत मेहता को ही कब जाना था?“ अंजू जैसे अपने-आप से बातें कर रही थी।

लंच सजाकर वेटर चला गया था। निःशब्द सुजय डोंगे उठाकर अंजू को थमाता गया। बिना प्रतिवाद किए अंजू स्वीकार करती गई, पर खाने के नाम पर जैसे दोनों ही की भूख खत्म हो चुकी थी।

”आपके घर में कौन-कौन हैं, मिस मेहरोत्रा?“

”माँ, भाई, भाभी……… पापा को जरूर होना था, पर वह दो वर्ष पूर्व हमें छोड़ गए ….. दो बड़ी बहिने हैं-अपने-अपने घरों में……।“

”फिर विवाह के विषय में नहीं सोचा ,अंजलि जी?“

”नहीं सोचूंगीं, ऐसा आपसे किसने कहा ,मिस्टर कुमार? एक बात जान सकती हूँ, मैंने आपको कौन-सी बात याद दिला दी थी?“ अंजू के उत्सुक नयन सुजय के मुख पर गड़ गए थे।

”जान जाएँगी….।“ संक्षिप्त उत्तर दे सुजय ने भोजन की थाली परे सरका दी ।

वेटर फिर हाजिर हुआ था।

”स्वीट डिश मैडम?“

”क्या लेंगी………..?“

”कुछ नहीं…….।“

”कडुवाहट भुला, हमें मिठास के साथ अलग होना चाहिए न?“ दो टूटी-फ्रूटी……..।“

”मुझे प्लेन स्ट्राबेरी चाहिए, टूटी-फ्रूटी नाम से न जाने क्यों लगता है, सब कुछ टूट गया है।“

अंजू की उस व्याख्या पर सुजय हॅंस पड़ा।

”कभी आप इतनी मैच्योर लगती हैं कि डर लगता है, कभी एकदम बच्ची बन जाती हैं।“

”बच्ची तो किसी तरह नहीं हूँ, पर कुछ शब्द मुझे अजीब-से अहसास कराते है, उनमे से यह एक है। आपके साथ कभी ऐसा नहीं हुआ?”-

“आपको देखकर ऐसा लगा जैसे बहुत पहले से जानता रहा हूं, जबकि सच यह है, हम पहले कभी नहीं मिले।“

”इसके बावजूद जब पहली बार आपके साथ लिफ्ट ली……….।“

”उस बात को जाने दीजिए। समझ लीजिए गलती हो गई। अब तो हम शत्रु नहीं हैं न?“

”इस जीवन में मेरा कोई शत्रु नहीं है, मिस्टर कुमार।“

”विनीत खन्ना भी नही?“

”आप बार-बार विनीत खन्ना का नाम क्यों ला रहे हैं? मैंने कहा न मैं किसी विनीत खन्ना को नहीं जानती, मेरा मूड खराब करके ही शायद आपको आनंद मिले तो लेते रहिए यह नाम……… ऐण्ड थैंक्स, फ़ॉर दि हास्पिटैलिटी।“

आधा खाया अइसक्रीम छोड़ अंजू उठ खड़ी हुई ।

”सॉरी…… न जाने क्यों मैं आपको हर्ट कर जाता हूँ।“ सुजय सोच में पड़ गया।

गोदावरी के पोर्टिको में कार रूकते ही अंजू तेजी से उतर, लिफ्ट की ओर बढ़ गई । पीछे आ रहे सुजय को उसके साथ पहुँचने के लिए काफ़ी तेज कदम बढ़ाने पड़े थे। फोर्थ फ्लोर पर लिफ्ट पहुँच गई । लिफ्ट से उतरते सुजय ने अंजू का हाथ हल्के से पकड़ कर कहा-

”अगर माफ़ कर सकें तो आभारी रहूँगा आपका दिल दुखाने की सोच भी नहीं सकता, शायद मैं गलत था।“

अपना हाथ छुड़ाती अंजू कुछ भी नहीं कह सकी। सुजय फिर रूका नहीं, वापिस मुड़, उतर गया।

कमरे में पहुंच, सीधे शॉवर के नीचे जा खडे़ होने की इच्छा हो आई । तौलिये से भीगे बाल पोंछती अंजू फिर विनीत में खो गई।
 


अच्छा हुआ वह विनीत की पत्नी नहीं बनी। धन-सम्पत्ति के लिए जो अपना नाम भी बेच दे, वह क्या पुरूष कहलाने योग्य है? और उसकी वह पत्नी…… क्या उसे देखते विनीत ने अपनी आँखें बन्द कर ली थीं? और यह सुजय………लगता है कहीं कुछ है जो उसे मथता रहता है। शाहीन उसकी कितनी तारीफ़ करती है।

अचानक अंजू को शाहीन बेतरह याद आने लगी, वह होती तो उसका मन बदल जाता। अभी उसके आने में दो दिन बाकी थे। तभी फोन की घंटी जोरों से धनधना उठी।

”हलो ……हाँ, मैं अंजू बोल रही हूँ…. कौन पूनम भाभी… हाँ-हाँ, मैं बिल्कुल ठीक हूँ, खूब एन्ज्वॉय कर रही हूँ। कल ही लेटर डाला है। अम्मा से कहना परेशान न हों, बिल्कुल ठीक हूँ……।“

”नहीं ….. मेरी किसी से मुलाकात नहीं हुई अच्छा भाभी, कोई डोर-बेल बजा रहा हैं, फिर कॉल करूँगी…. हाँ-हाँ, पूरे हाल लिखे हैं…….ओ के बाय…….।“

रिसीवर क्रेडल पर रख, अंजू ने दरवाजे की लैब खोली थी। सामने खड़े विनीत को देख अंजू चैंक गई थी।

”मैं अन्दर आ सकता हूँ?“

”क्यों आना चाहते हैं?“

”माफी माँगने का अधिकार भी नहीं दोगी, अंजू?“

”आई एम अंजलि मेहरोत्रा………।“

”इतनी कठोर न बनो, अंजू।“

विनीत जैसे गिड़गिड़ा उठा।

”मिस्टर खन्ना, अगर आपको कुछ कहना है तो आइए। विजिटर्स-रूम में चलते हैं।“

”नहीं अंजू, वहाँ जाने की जरूरत नहीं, मैंने जो गलती की उस अपराध का दंड भोग रहा हूँ। मेरी पत्नी मुझे हमेशा हीनता का बोध कराती रहती है। मेरा सब कुछ उसके कारण है, जैसे मैं निरा अकर्मण्य व्यक्ति हूँ। क्या यह दंड मेरे लिए काफी नहीं, अंजू?“

”मिस्टर खन्ना, आपकी व्यक्तिगत जिन्दगी में मेरी जरा सी भी रूचि नहीं है। अच्छा हो आप ये बातें अपने किसी हमदर्द से करें।“

”तुम ठीक कह रही हो अंजू, मैं इसी योग्य हूँ। काश, मैंने तुम्हारे साथ अपना जीवन बाँधा होता!

”मिस्टर खन्ना, आप मेरे लिए एक अपरिचित व्यक्ति हैं, आपके साथ बॅंधने का सवाल ही नहीं उठता। हाँ, अगर कभी आपको ऑफिस अकाउंट की ऑडिट-चेकिंग की जरूरत हो तो मेरे रेट्स पता कर लीजिएगा।“

”तुम, मुझे अपने विनीत को नहीं जानतीं, अंजू?“

”किस विनीत की बात कर रहे हैं, विनीत मेहता या विनीत खन्ना?“ न चाहते भी अंजू के स्वर में व्यंग्य घुल आया।

”फादर-इन-ला का बिजनेस उन्हीं के नाम से चलता है, इसीलिए लोग मुझे भी खन्ना कहने लगे हैं। पापा का कहना हैं मैं उनके बेटे जैसा ही तो हूँ, पर मैं तो आज भी तुम्हारा विनीत मेहता हूँ, अंजू।“

”दिस इज़ लिमिट मिस्टर खन्ना, फ़ॉर हेवन्स सेक, आप वापिस चले जाएँ। मेरी जिन्दगी से विनीत मेहता का नाम कब का मिट चुका है- आपको अपना नया नाम-नया जीवन मुबारक हो मिस्टर खन्ना।“

दरवाजे के बाहर खड़े विनीत के मुँह पर अपने कमरे का द्वार अंजू ने जोरों से बन्द कर दिया।

अंजू का पूरा शरीर थरथरा उठा था। दुस्साहस की भी कोई सीमा होती है। पत्नी को वहाँ छोड़, मेरे पास भागा आया है। आँखें आक्रोश से जल उठीं , अपमान के आँसू छलछला आए। अंजू को ठंडे पानी से आँखें धोने की जरूरत पड़ गई।

एक साँस मे पानी का ग्लास गले से नीचे उतार कर भी जैसे अन्तर में आग लग रही थी। कहाँ जाए अंजू, यहाँ कोई तो अपना नहीं… वक्त का अंदाज किए बिना थोड़ी देर में अंजू रिसेप्शन पर आई थी।

”अगर मुझसे कोई मिलने आए तो पहले मुझसे पूछ लीजिए, बिना मेरी परमीशन किसी को रूम में न भेजें।“

”आई एम सॉरी मैम…. एनी प्रोब्लेम? इन फ़ैक्ट, मैं आपको इन्फ़ॉर्म कर ही रहा था, पर मिस्टर खन्ना को टोकना कठिन है…… यू नो ही इज ए बिग शॉट।“

”आई अंडरस्टैंड, एनी हाओ, फ्यूचर के लिए प्लीज, याद रखें।“

”श्योर मैम।“

”यहाँ से सी-बीच के लिए कैसे जाना होगा?“

”होटल गेट से राइट टर्न ले लें, हार्डली टेन मिनट्स वाक पर सी-बीच है,पर अभी इस टाइम उधर बहुत हॉट होगा। ईवनिंग में……………।“

”थैंक्स ।“

अंजू बाहर आ गई। उसके मन के कोलाहल को सागर ही समझ सकता था।
 
पाँच

अजीब मनोदशा में अंजू होटल से निकल पड़ी थी। सिर पर चमक रहे सूरज का ताप जैसे उसे छू भी न गया था। दस की जगह पन्द्रह मिनट पैदल चलने के बाद अंजू को दूर लहराता सागर नजर आया। किनारे नारियल के हरे-हरे पेड़ आकर्षक दृश्य प्रस्तुत कर रहे थे, पर उस समय कुछ सोचने-समझने की जैसे शक्ति ही शेष नहीं रह गई थी।

थके कदमों से चलती अंजू ने समुद्र के खारे पानी में पाँव डाल दिए। स्कूल में जिस दिन दौड़ हुआ करती, अंजू घर आकर निढाल पड़ जाया करती।

‘अम्मा पाँव में बहुत दर्द हो रहा है।’

‘किसने कहा था तुझसे दौड़ लगाने को? डेढ़ हड्डी का शरीर भला एक मील दौड़ने लायक है? अब जैसा किया है वैसा भुगत।’ अम्मा झुंझला उठतीं। घर के काम भी तो ढेरों हुआ करते थे। नौकर या दाई रखने के लिए अतिरिक्त पैसों की जरूरत होती है, यह बात अंजू काफ़ी देर में समझ पाई थी।

‘उस पर बेकार नाराज क्यों हो रही हो? माला बेटी, थोड़ा नमक डालकर पानी गर्म कर दे, अंजू के पाँवों में दर्द है।’ पापा ने अंजू को हमेशा बेहद दुलार दिया था।

‘पापा तो अंजू को एकदम बिगाड़ कर रख देंगे। अब अम्मा के काम निबटाएँ या इसके लिए पानी गर्म करें।’ माला दीदी भुनभुनाती भगौने में गर्म पानी ला, पटक देती थीं-‘

“ये लो रानी साहिबा, गर्म पानी तैयार है।’

सच, पापा का बताया नुस्खा अक्सीर का काम करता था। दूसरे दिन सोकर उठती अंजू एकदम नॉर्मल होती थीं। खल-कूद में अंजू भले ही आगे न रही हो, पर पढ़ाई में उस-सा घर में कोई नहीं था।

तीन बहिनों में सबसे छोटी अंजू को अम्मा का आक्रोश और पापा का अतिशय दुलार मिला था। एक तो तीसरी बेटी उस पर साँवला रंग, अम्मा हर समय भुनभुनाती ही रहती थीं। दूसरे नम्बर पर जन्मे अतुल भइया अम्माँ और दादी के लाड़ले, आँखों के तारे थे, पर उनकी सामान्य बुद्धि उनके प्रति पापा की उदासीनता का कारण बनी थी। समझदार होने पर अंजू को अतुल भइया के प्रति बहुत सहानुभूति हो आई थी। पापा का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तिरस्कार भइया को मौन और अन्तर्मुखी बना गया था। अंजू को उनका तिरस्कार कभी-कभी बहुत चुभता था। भइया के तिरस्कार पर वह पापा से नाराज हो उठती थी। हर बार भइया का रिजल्ट, उनके अपमान का कारण बन जाता था।

‘पापा, आप तो भइया के पीछे ही पड़े रहते हैं, जरूरी तो नहीं जो फ़र्स्ट आए बस, वही बुद्धिमान है?’

‘तू नहीं समझेगी अंजू, यह तो कूढ़ मगज है, दिमाग में कुछ घुसता ही नहीं। क्या-क्या सपने देखे थे, पर इससे कुछ उम्मीद रखना ही बेकार है।’

अपनी बुद्धिहीनता की बात सुनते भइया बड़े जरूर हो गए, पर मन से पापा को उन्होंने शायद कभी क्षमा नहीं किया था।

‘एक बात बता अंजू, अगर उन्नति के लिए सिर्फ तेज दिमाग ही जरूरी है तो पापा क्यों अकाउण्टैट ही बन पाए?’

सचमुच अपनी तीक्ष्ण बुद्धि के बावजूद पापा को उनका प्राप्य नहीं मिल सका था। ऑफिस में उन्नति के मानदंड कुछ और हुआ करते हैं, वर्ना अति सामान्य बुद्धि वाले नागर अंकल क्या पापा को सुपरसीड कर सकते थे? उस घटना के बाद से ही पापा मानो टूट गए थे। पहला हार्ट-अटैक भी उन्हें तभी पड़ा था। हमेशा अपनी बुद्धि का गुणगान करने वाले पापा अचानक चुप पड़ गए थे। भइया तब तक एम0एस-सी0 कर चुके थे। पापा ने उनकी सर्विस के लिए सहायता की पेशकश की थी, पर भइया की ओर से उत्साह न था। पापा झुंझला उठे थे-‘बिना सिफारिश मामूली सेकेंड क्लास को अच्छी नौकरी तो मिलने से रही। क्लर्की के लिए भी सोर्स चाहिए।”

भइया ने स्थानीय कॉलेज में लेक्चररशिप के लिए आवेदन दिया था। प्रिन्सिपल नगेन्द्र नाथ को उनमें न जाने क्या दिखा कि फ़र्स्ट क्लास उम्मीदवार की जगह भइया को नौकरी मिल गई थी। कुछ ही दिनों में भइया की मेहनत रंग लाई। आत्मविश्वास से उनका चेहरा चमकने लगा। प्राचार्य उनकी सिंसियरिटी से बेहद प्रसन्न थे। प्राचार्य के प्रिय पात्रों में भइया भी एक थे। पापा फिर भी संतुष्ट नहीं थे-

‘मास्टरी करने के लिए एम0एस-सी0 करने की जरूरत थी? सोचा था, एक लड़का है ढंग से लग जाए तो घर बन जाएगा।’

‘पापा, भइया कॉलेज में प्रोफेसर हैं, मास्टर नहीं है। अपने बल पर काँलेज में कितने लोग जॉब ले पाते हैं, कभी सोचा है आपने?’

बारहवीं में पढ़ रही अंजू तब तक भइया का दुख समझने लगी थी। अंजू के परीक्षा-परिणाम सदैव पापा को उत्साहित कर जाते।

‘इस लड़की ने मेरा दिमाग पाया है। देख अंजू, मैं तो घर-गृहस्थी के पचड़ों में कुछ नहीं कर पाया, पर तुझे खूब पढ़-लिखकर बड़ा ऑफीसर बनना है। मैं तो चाहता हूं मेरे ही डिपार्टमेंट में तू बड़ी अधिकारी बनकर आए ताकि सबके सामने सीना तान कर सकूं-देखो यह है मेरी बेटी……….’

पापा की उन बातों से अंजू का उत्साह बढ़ता ही जाता था। कुशाग्र बुद्धि अंजू का प्रिय विषय गणित ही था। जिस दिन उसने चार्टर्ड अकाउंटैंसी में एडमीशन का फ़ार्म भरा उस दिन से पापा अंजू का विशेष ध्यान रखने लगे थे।

‘देखो कमला, अंजू को दूध जरूर मिलना चाहिए। मेरी जगह अंजू को दूध दिया करो।’

‘वाह, भली कही, बेटी के प्यार में ऐसा दीवाना होते किसी को नहीं देखा। बेचारे अतुल पर इतना लाड़ उड़ेला होता तो कुछ फायदा भी था।’ अम्मा भुनभुनातीं।

‘क्या खाक फायदा होता? मैं तो कहता हूँ तुम्हारे ही लाड़ ने उसे निकम्मा बना दिया है।’ पापा झुंझला उठते।

‘अरे वंश तो उसी से चलना है, लाख लड़की पर प्राण न्योछावर करो, आखिर तो पराई ही कहलाएगी।’ तुलसी की माला हाथ में लिए दादी की कड़ी दृष्टि अंजू पर पड़ती।

रात में अम्मा एक कप दूध भइया को दिया करती थीं, बहुत बाद में पता लगा था, अम्मा को अपनी कसम दे, भइया ने अपने हिस्से का दूध, अंजू के नाम कर दिया था।

चार्टर्ड अकाउंटैंसी एडमीशन के सफल प्रत्याशियों में अंजू का नाम देख पापा ने पूरे ऑफिस को मिठाई खिलाई थी। उस दिन पापा का गर्वित चेहरा अंजू का श्रम सार्थक कर गया था।

शाम को एकान्त में भइया ने एक पैकेट थमाते कहा था-

‘तेरी इस सफलता के लिए तो बहुत बड़ा इनाम देना चाहिए था, पर तू तो मेरी औकात जानती ही है, पापा के सपने तू सच कर, यही मेरा आशीर्वाद है।’

‘भइया’ कहती अंजू अतुल के सीने पर सिर रखकर रो पड़ी थी।

”वाह ! क्या यहाँ खड़े-खड़े कोई खास साधना की जा रही है?“

अचानक पीछे से आई आवाज पर अंजू चैंक उठी। सुजय न जाने कहाँ से उसके पीछे आ खड़ा हुआ था।

”ओह……नहीं……बस, यूँ ही पाँव सेंक रही थी।“

”सचमुच तपते सूरज का छत्र लगाए, गर्म पानी में भी कोई यूँ आराम से खड़ा रह सकता है, देखा न होता तो विश्वास कर पाना कठिन था।“

”मेरी तो गर्म पानी में पाँव डाल, घंटों बैठने की आदत है, मिस्टर कुमार, पर आप इस समय यहाँ?“

”क्यों, सागर-तट पर आने के लिए कोई खास समय हुआ करता है? चारों ओर नजर दौड़ाइए, नारियल के पेड़ो के नीचे से लेकर चारों ओर बिखरे लोगों को गिनिए, तो गिन नहीं पाएँगी। समझ लीजिए उन्हीं कुछ लोगों में से मैं और आप भी हैं। काफ़ी है न, ये एक्सप्लेनेशन?“ स्वर में शरारत स्पष्ट थी।

”आपके एक्सप्लेनेशन से मुझे कुछ लेना-देना नहीं है, अपनी स्वतंत्रता में किसी की दखलअंदाजी मुझे पसंद नहीं, बस।“
 


”शायद आपको पता नहीं, पानी में टखनों तक साड़ी उठाए खड़ी आप, कितनी आँखों का आकर्षण बन चुकी है। न जाने कितने कैमरों में आपकी यह अविस्मरणीय छवि कैद हो चुकी है।“

”ओह नो।“ ऊपर कर पकड़ी साड़ी, अनायास ही हाथ से छूट, पानी में गिरते ही गीली हो गई थी। न जाने लोग क्या सोचते होंगे……। अंजू के साथ सुजय ने भी कदम बढ़ाए।

”क्या विनीत खन्ना से झगड़ा किया था या द्वार से खाली हाथ लौटाए व्यक्ति के लिए यहाँ दुख मनाने आई थीं?“

”आपकी व्यर्थ की बातों के लिए मेरे पास कोई जवाब नहीं है, मिस्टर कुमार।“

”तो आइए काम की बात हो जाए। चलिए वहाँ बैठ, ठंडा नारियल का पानी पीते है।“

”मुझे नारियल-पानी कतई पसंद नहीं।“

”तो एक ग्लास समुद्र का खारा पानी ऑफर करूँ……..वैसे तो आपकी आँखों में भी आक्रोश का सागर लहरा रहा है।“

”टु हेल विद यू ,मिस्टर कुमार। किसी इन्सान को शांति से अकेला जीने का अधिकार है या नहीं?“

”अगर अकेलापन शांति दे तो जरूर है, पर कभी अकेलापन खाने को दौड़ता है, उस समय लगता है, कोई होता जिससे अपना सब कुछ बाँट पाता………..।“ सुजय अचानक बेहद गम्भीर हो आया था।

‘वह’ कोई मैं नहीं बन सकती ,मिस्टर कुमार……।

”जानता हूँ वो कमी, कभी कोई पूरी नहीं कर सकता…….।“

”फिर बेकार कोशिश क्यों? भगवान के लिए अब मेरा पीछा न करें।“

तेज कदमों से वापिस लौटी अंजू के लिए मालती सिन्हा वेट कर रही थीं।

”अरे मालती दी, आप यहाँ……….?“

”तू अचानक लंच छोड़ वापिस क्यों चली आई, अंजू? मैं परेशान थी……. क्या हुआ पूछने आ गई।“

”कुछ नहीं, बस अजीब-सी घुटन होने लगी थी…….।“

”तेरे पीछे सुजय भी चले आए थे, कुछ कहासुनी हो गई थी, अंजू?“

”नहीं दीदी, वैसी कोई बात नहीं है। चलो रूम में चलते हैं।“

कोल्ड ड्रिंक सिप करती मालती सिन्हा कुछ गम्भीर हो उठी थीं।

”इतने दिन तेरे साथ बड़े अच्छे बीत गए। चार दिन बाद हम अलग-अलग राहों पर होंगे। फिर न जाने कब मिलें।“

”क्यों आपने प्रॉमिस किया है न सिन्हा साहब और बिटिया के साथ लखनऊ आएँगी?“

”तू जल्दी से शादी कर डाल, हम बस जरूर आएँगे।“

”यानी आपके लखनऊ आगमन के लिए मुझे अपनी बलि देनी होगी?“

”बलि कैसी? माँ बनकर ही नारीत्व सार्थक है, अंजू।“

”तुम अपने नारीत्व को सार्थक कर सकी हो, मालती दी?“

”कुछ भी कह, आशीष के बाद अगर विवाह न करती तो बहुत रीती रह जाती। पति-बेटी के साथ पूर्ण तो हूँ।“

मालती सिन्हा की बात पर अंजू चुप रह गई थी।

दूसरे दिन कॉन्फ्रेंस में आए डेलीगेट्स के लिए स्थानीय पाँच सितारा होटल से डांस कम्पिटीशन के निमन्त्रण आए थे। कम्पिटीशन के बाद डिनर के लिए सभी आमन्त्रित थे।

मालती सिन्हा के साथ-साथ दीपा, नम्रता, अर्चना चहक उठीं।

”वाह मजा आ गया, हमें ये सब देखने की ओपरच्यूनिटी कहाँ मिलती है? चलेंगी न, मालती जी! दीपा विशेष उत्साहित थी।“

”क्यों नहीं, तू भी चलेगी न, अंजू?“

”अभी डिसाइड नहीं किया है।“

”सुजय, तुम तो जरूर चलोगे न? एलिजिबिल बैचलर ठहरे, शायद वहाँ कोई लाइफ-पार्टनर के लिए जंच जाए।“ पास खडे़ सुजय से मालती जी ने परिहास किया था।

”नानसेंस! नंगे जिस्मों की नुमाइश देखने में मुझे कोई इंटरेस्ट नहीं। ऐसी लड़कियाँ…….. किसी धनी व्यक्ति की जेब खाली करना उन्हें खूब आता है, आई सिम्पली हेट सच थिंग्स……।“

आक्रोश के कारण सुजय का चेहरा तमतमा आया।

पास खडे़ लोग चौंककर देखने लगे। मालती सिन्हा का चेहरा स्याह पड़ गया और महिलाएँ धीमे से हट गई थीं।

सुजय तेजी से बाहर चला गया।

”मैंने ऐसी कौन-सी बात कही अंजू, जिससे सुजय इस तरह चिढ़ गया?“

”पता नहीं ,मालती दी। आप बेकार परेशान न हो, इसमें आपकी कहीं कोई गलती नहीं थी।“

उसके बाद मालती जी सहज नहीं रह सकीं। डांस कम्पिटीशन में जाने का उत्साह कपूर-सा उड़ चुका था। शाम को प्रोग्राम खत्म होने के बाद अंजू मालती जी के साथ बाहर आ रही थी कि दूर से शाहीन ने आवाज दी- ”अंजू……….।“

”अरे शानी तू? कब आई। मैं रोज तेरा इंतजार कर रही थी।“

”इसीलिए आज हम पर निगाह भी नहीं डाली?“

”मुझे क्या पता था तू आज आ रही है। सलीम भाई भी आ गए हैं क्या?“

”आने वाले तो कल थे, पर जैसे ही सुना उनकी प्यारी साली यहाँ हैं, सारा काम छोड़ दौडे़ आए हैं।“

”धत्त, शैतान की बच्ची………।“

”अच्छा, अंजू, मैं चलती हूँ।“

”नहीं मालती दी, आज आप डिप्रेस्ड हैं, आप मेरे साथ चलेंगी।“

”नहीं वैसी कोई बात नहीं हैं, आज इतने दिनों बाद शाहीन मिली है, तुझे सुनाने के लिए ढेर-सी बातें होंगी उसके पास। मैं एकदम ठीक हूँ।“

”आर यू श्योर, मालती दी?“

”एकदम श्योर, अब कल-भर का ही तो साथ है, फिर हम कहाँ होंगे।“ मालती सिन्हा चली गई।
 


अंजू शाहीन के साथ उसके घर चली गई थी। अंजू ने सलीम को फोन से बुला लिया। आते ही सलीम ने अंजू को सलाम बजाया-

”अपनी महबूबा की प्यारी दोस्त को बन्दे का आदाब।“

”आदाब, भाईजान। वैसे ये शाहीन की बच्ची आज तक आपकी महबूबा बनी हुई है, जानकर हैरत हुई।“

”अब आप इनकी जगह ले लें तो बेशक यह हमारी महबूबा नहीं रहेंगी।“

”तुम्हारी ऐसी की तैसी, शर्म नहीं आती बीवी के सामने ऐसी बातें करते?“

”आह! यह बात तो मैं भूल ही गया था, बताइए क्या हाजिर करूँ आपकी खिदमत में?“

”होटल की सबसे लाजवाब डिशेज डिनर में और फिलहाल कोल्ड ड्रिंक्स के साथ पनीर पकौड़े ठीक है न ,अंजू?“

”तेरा हुक्म तो मानना ही होगा वर्ना कैसे बचूँगी।“

”आप भी मानती हैं न ये बात। अब सोचिए यह बंदा किस मुश्किल में जिन्दगी काट रहा है।“

”तुम्हारी तो……….।“ शाहीन ने तकिया उठा सलीम पर फेंक मारा।

वह शाम अंजू की बहुत अच्छी कटी। शाहीन और सलीम के साथ वक्त को जैसे पंख लग गया था। बहुत रात हो जाने पर शाहीन अंजू से वहीं रूकने की जिद करती हार गई, पर अंजू नहीं मानी थी। सलीम के साथ स्कूटर पर उसे भेजती शाहीन हिदायतें देती जा रही थी-

”देखो स्कूटर धीमे चलाना, अंजू को इम्प्रेस करने के लिए स्कूटर दौड़ाने की जरूरत नहीं है, समझे?“

”ठीक है भई, समझ गया। ऐतबार न हो साथ ही चली चलो। दोनों को एक साथ बिठाकर उड़ा ले जा सकता हूँ।“

”जानती हूँ, कितने पानी में हो, एक तो झेली नहीं जाती, दो की बातें करते हैं। अच्छा अंजू, कल मिलेंगे। बाय।“

रिसेप्शन काउंटर पर अंजू के लिए एक हल्का नीला लिफाफा और दूसरा पूनम भाभी का पत्र रखा था। दोनों चिट्ठियाँ ले अंजू रूम में आ गई थी।

पूनम भाभी को अंजू के बिना घर अच्छा नहीं लगता। अम्मा भी अंजू को बेहद याद कर रही हैं। पूरे घर के हालचाल लिख अन्त में एक लाइन जोड़ दी थी-विनीत से उसका सामना तो नहीं हुआ? उसके भइया का फ़ॉरेन जाने का चांस करीब पक्का हो गया है……. आदि-आदि………। पत्र रख अंजू सोच में पड़ गई थी। काश, पापा भइया की यह सफलता देख पाते!

”हल्का नीला लिफाफा साइड टेबिल पर धर अंजू ने उस पर से ध्यान हटा लेना चाहा था। बिना खोले उसे पता था नीला रंग विनीत का फेवरिस्ट कलर था। सगाई टूटने के बाद ऐसे नीले लिफाफे पूनम भाभी ने जबरदस्ती उसके सूटकेस से निकलवा लिए थे।

‘इन्हें सहेज कर रखने से फ़ायदा? झूठ में पगे अक्षर दोहराने की कोई जरूरत नहीं, उसकी तरह उसके ये पत्र भी दगा देंगे, अंजू। उसमें जरा भी शराफ़त हुई तो तेरे पत्र भी वापिस भेज देने चाहिए वर्ना ब्लैक-मेल के न जाने कितने किस्से लड़की की जिन्दगी बर्बाद कर गए हैं।’“

‘वे ऐसे नहीं हैं भाभी।’ स्वंय उससे अपमानित होने के बावजूद अंजू के दिल में विनीत के लिए बहुत जगह थी।

‘वह कैसा है, बताने की जरूरत नहीं।’ पूनम भाभी नाराज हो उठीं।

पलंग पर लेटती अंजू की नजर फिर उसी लिफाफे पर पड़ी। दिमाग कहता था बिन पढ़े फाड़कर डस्टबिन में डाल दे अंजू, पर दिल उसके अन्दर बन्द इबारत पढ़ने को बेचैन था। टेबिल से लिफाफा उठा कुछ देर उसे हाथ में लिए रही फिर खोल डाला। विनीत की परिचित लिखाई सामने थी-अंजू……….

‘मेरी अंजू’ लिखने का तो स्वंय अधिकार खो चुका, शिकायत कैसे करूँ? देखो बिना पढ़े खत फाड़कर मत फेंक देना। फाँसी के अपराधी को भी अंतिम इच्छा व्यक्त करने की अनुमति मिलती है, पर मेरा अपराध शायद उससे भी ज्यादा है।

कल तुम्हें देख, बहुत मुश्किल से जो कुछ भुलाना चाहा था, फिर दुगनी तीव्रता से याद आ रहा है। कितने अच्छे थे वे दिन। आज इतने सुख-ऐश्वर्य के बीच करवटें बदलता, कितना अकेला छूट गया हूँ मैं। तुम्हारे साथ कितना पूर्ण पाता था अपने-आप को। तुम्हारी आँखों में उतरते मेरे सपने तुम्हारी आँखों की चमक बढ़ा जाते थे। पत्नी से प्राप्त ऐश्वर्य का स्वाद कितना फीका है, काश, तुम्हें बता पाता! मैने वो सब कुछ पा लिया है, जिसका कभी मैंने स्वप्न देखा था, पर सब कुछ पाकर भी मैंने आत्म-विश्वास, गौरव और सम्मान खो दिया है, अंजू।

सविता मेरी पत्नी कम, स्वामिनी अधिक है, यह स्वीकार करते मैं तुम्हारे प्रति किए अपराध का दंड भोग रहा हूँ, अंजू। कभी जी चाहता है वो दिन फिर वापिस आ जाते -नन्ही गौरैया-सी तुम किस कदर मुझ पर डिपेंड करती थीं। तुम्हारी मुग्ध चमकती आँखें मेरी हर बात कैसे सराहती थीं…… मैं अन्दर से टूट चुका हूँ ,अंजू। विनीत मेहता-वह महत्वाकांक्षी युवक उसी दिन मर गया जिस दिन उसने अपना मूल्य लगाया था……..इकलौती बेटी के पिता, मिस्टर खन्ना ने इतनी ऊंची बोली लगाई थी कि लगा सारे सपने अचानक एक साथ मेरी मुट्ठी में कैद हो गए हैं। आज मेरी मुट्ठी एकदम खाली है-बिल्कुल रीती है, मेरी तरह।

क्या हम आगे मिलते रह सकते हैं, अंजू? तुम्हारी दो पंक्तियाँ मेरा मनोबल बढ़ा, मुझे जीवन दे सकती हैं, अंजू।

विनीत

न चाहते हुए भी अंजू की आँखें भीग आई थीं। विनीत को उसने अपने से अधिक चाहा था, पर आज का यह पत्र क्या उसके जीवन का सत्य है? सगाई टूटने के बाद पूनम भाभी ने कहा था-

‘अंजू, मेरी बात मान, उसे अच्छी तरह समझाते हुए एक खत डाल दे। भला यह कोई गुड्डे-गुड़िया का खेल हुआ, जब जी चाहा सगाई कर ली, जब जी चाहा सगाई तोड़ दी?’

‘न भाभी, यह मैं किसी हालत में नहीं कर सकती। उससे अपने लिए भीख नहीं माँगी जाएगी मुझसे।’ आगे अंजू बोल नहीं सकी थी।

आज वही विनीत उससे दो पंक्तियों की भीख माँग रहा है, क्या करे अंजू? पूरी रात शायद जागते बीत गई थी, पर सुबह तक अंजू निर्णय ले चुकी थी। पुरूष हमेशा स्त्री की कोमल भावनाओं पर प्रहार कर, विजय पाता रहा, अब वह अपने पर विनीत की विजय नहीं होने देगी। वह विनीत का शिकार बनी नहीं रह सकती।

धीमे से चिट्ठी के छोटे-छोटे टुकड़े कर लिफाफे में बन्द कर, एक पंक्ति लिखी थी-

‘अगर यह पत्र आपकी पत्नी को भेज देती तो? अपने को दयनीय दिखाने वाले व्यक्ति को मैं कायर कहती हूँ। कायर पुरूष को किसी भी स्थिति में सम्मान दे पाना या उससे सम्बन्ध बनाना, मुझे सम्भव नहीं। अपनी नियति के निर्माता हम खुद हैं।

विनीत खन्ना के नाम लिफाफा पोस्ट कर, अंजू काफी हल्का महसूस कर रही थी। इतने दिनों से विनीत जिस तरह उस पर हावी था, आज उससे वह अपने को मुक्त महसूस कर, हल्की हो आई थी।

त्रिवेन्द्रम में आज सबका अंतिम दिन था, कल सब अपनी अलग राहों पर होंगे। आज लंच के बाद सेशन समाप्त हो जाना था। कई डेलीगेट्स अंजू को अपने-अपने कार्ड थमा रहे थे।

”आपसे मिलकर बहुत अच्छा लगा ,मिस मेहरोत्रा।“

”कभी हमारी ओर आएँ तो फोन-भर कर दें, आपका स्वागत रहेगा।“

”आप हमारी स्मृति में हमेशा सजीव रहेंगी, मिस मेहरोत्रा। आपका जीवन्त व्यक्तित्व भुलाना आसान नहीं है।“

सबकी बातें सुनती, कार्ड्स पर्स में धरती अंजू हौले-हौले मुस्करा रही थी। मालती सिन्हा सबसे हॅंस-हॅंस कर विदा ले रही थीं। नेहा, नम्रता, दीपा, अंजू सब एक-दूसरे से सम्पर्क बनाए रखने के वादे कर रही थीं। तभी पीछे से मालती सिन्हा ने अंजू की पीठ पर हाथ धर स्नेह से कहा था- ”सबमें मेरा भी नाम है या नहीं?“

”क्या कहती हैं ,मालती दी? आपका नाम ही क्यों, आप तो मेरे दिल में हमेशा-हमेशा बसी रहेंगी।“

”इधर आ, तुझसे कुछ कहना है।“ अंजू का हाथ पकड़ मालती जी एकान्त में ले गई।

”जानती है कल क्या हुआ?“

”क्या हुआ कैसे जानूंगी मालती दी, अन्तर्यामी तो हूँ नहीं।“ अंजू हॅंस पड़ी।

”बहुत डिप्रेस्ड मूड में होटल पहूँची थी। सोचा था बिना खाए-पिए किसी तरह रात काटूंगी। मेरे पहुँचने के तीन-चार घण्टे बाद सुजय आ पहुँचा था। आते ही पाँवों पर झुक गया-

‘मुझे माफ कर दो दीदी, आज अनायास ही आपसे ऊंचे स्वर में उल्टा-सीधा बोल गया।’“ मैं चौंक गई थी, समझाते हुए कहा था-

”ठीक है। हरएक की अपनी कोई मजबूरी होती है। शायद तुम्हारा मूड ठीक नहीं था ,जय।“

”‘मूड तो मेरा हमेशा के लिए बदल चुका है, दीदी। कभी मैं, आज का रूखा सुजय कुमार, एक खुशमिजाज, लापरवाह युवक-भर हुआ करता था। पापा की अपार सम्पत्ति से बेखबर, अपनी धुन में मस्त।“

”ऐसा क्या हो गया ,जय?“

”‘बता पाना सम्भव नहीं, अगर हो सके तो ये चंद पंक्तियाँ लिख लाया हूँ, पढ़ देखना।’“

”‘उन पंक्तियों को पढ़, मैं तो ताज्जुब में पड़ गई ,अंजू। लड़कियां भी इतनी क्रुएल हो सकती हैं, विश्वास नहीं होता। बहुत दुख पाया है बेचारे ने।’“
 


”आप भी मालती दी, इन बातों पर विश्वास करती हैं? स्त्री की वीकनेस ये खूब जानते हैं। आपकी भावनाएँ उभारने के लिए कोई मन-गढ़न्त कहानी लिख डाली होगी और आप पसीज गई।“ अंजू को विनीत के खत का ख्याल हो आया।

”अरे नहीं, मैं क्या कोई बच्ची हूँ जो बहकावे में आ जाऊं, विश्वास नहीं होता तू ही पढ़ देख।“ मालती दी ने चार-पाँच पृष्ठ अंजू की ओर बढ़ाए थे।

”मुझे क्या पड़ी है जो ये सब पढ़ अपना टाइम वेस्ट करूँ?“

”मेरे लिए तू पढ़कर तो देख अंजू, फिर अपना फ़ैसला देना। अभी तेरे पास टाइम नहीं है तो ले, तू ही इसे रख ले।“

मालती जी ने जबरन अंजू के बैग में वो कागज डाल दिए।

विदाई की बेला भावभीनी हो उठी थी। मालती सिन्हा ने अंजू को अपने सीने से चिपटा प्यार किया था।

”देख अंजू, बहिन बनी है तो बड़ी बहिन के घर आना होगा। लखनऊ से झाँसी ज्यादा दूर तो नहीं है।“

”सात समुन्दर पार भी आपसे मिलने पहुँचूँगी ,मालती दी।“ अंजू भावुक हो आई।

बहुत मना करने के बावजूद शाहीन ने एक सलवार-सूट का पैकेट अंजू को थमा दिया-

”उम्र में हम भले ही बराबर हों, पर शादी हो जाने की वजह से मेरा दर्जा तुझसे ऊपर है। छोटी बहिन खाली हाथ विदा नहीं की जाती।“

सलीम को शिकायत थी अंजू कॉन्फ्रेंस में बिजी रही, इसीलिए उन्हे टाइम नहीं दिया। फिर आने का वादा कर, अंजू वापिस होटल आई थी।

दूसरे दिन बहुत सवेरे लखनऊ की फ्लाइट अंजू को पकड़नी थी। सामान पैक कर, पास के सी-बीच तक घूम आने के इरादे से अंजू नीचे उतरी थी। रिसेप्शन पर उसके नाम एक स्लिप छोड़ी गई थी-

भविष्य में हमें कभी नहीं मिलना है, जितना मिले याद रहेगा।

-सुजय

स्लिप पढ़ते ही अंजू का मन उदास-सा हो आया। पिछले कुछ दिनों में जैसे यहाँ एक नया परिवार-सा बन गया था-शाहीन, मालती दी, सलीम और हमेशा उस पा व्यंग्य कसते रहने वाला सुजय, भी उस परिवार का सदस्य बन गया था। आज सब अपनी अलग-अलग राहों में होंगे। कुछ दिन एक-दूसरे से पत्र-व्यवहार चलेगा फिर सब खत्म हो जाएगा। इस सच को जानते हुए भी उन दो पंक्तियों ने अंजू को उदास कर दिया। विनीत के प्रति मोह-भंग पर अंजू को ताज्जुब हो रहा था। जिनसे मात्र कुछेक दिनों का परिचय था, उनसे बिछोह पर मन उदास हो रहा था, पर जिसे प्राणों से भी अधिक चाहा था, जाते समय वह दूर तक कहीं नहीं था। पूनम भाभी भला उसकी इस बात पर विश्वास कर सकेंगी? सी-बीच तक घूम आने का जैसे उत्साह ही खत्म हो गया। कमरे में वापिस लौट अंजू बालकनी में जा बैठी थी।

रेसेप्शन पर वेकअप-काल देने के निर्देश दे अंजू सोने की तैयारी कर ही रही थी कि मालती जी का फोन आ गया था-

”क्या कर रही है ,अंजू? बहुत खाली-खाली महसूस कर रही थी इसीलिए कॉल किया।“

”बहुत अच्छा किया मालती दी, मुझे भी बड़ा सन्नाटा-सा लग रहा है। पैकिंग हो गई?“

”हाँ, सब हो गया, सच कहूँ तो इस वक्त बेटी बेतरह याद आ रही है। लग रहा है पंख लगा उड़ जाऊं।“

”कल तो जा ही रही हैं, पहुँचकर खत लिखना मत भूलिएगा।“

”वह कैसे भूल सकती हूँ ,अंजू। तेरे बारे में तो सिन्हा साहब को ढेर-सी बातें बतानी हैं।“

”तारीफ ही कीजिएगा दीदी, बुराई तो नहीं करेंगी?“

”तेरी तो सभी तारीफ करते हैं। आज शाम सुजय भी तेरी ही बात कर रहा था।“

”मेरी बात?…… सुजय?…….क्या कह रहे थे?“ अंजू ताज्जुब में पड़ गई।

”तेरी बुराई नहीं कर रहा था क्या यह कम नहीं है? वैसे भी उसकी बुराई-तारीफ़ से तुझे तो कुछ लेना-देना है नहीं, ठीक कहा न, अंजू?“

”जी……ई…..। कल कितने बजे निकलना है मालती दी?“ अंजू की आवाज लड़खड़ा गई थी।

”ओह, मैं तो भूल ही गई, तेरी फ्लाइट तो अर्ली मार्निग है, ओ के बाय। फिर मिलेंगे।“

”मेरा यह मतलब तो नहीं था मालती दी……..।“

”नहीं-नहीं, मुझे भी रेस्ट लेना है, ऑल दि बेस्ट।“ मालती जी ने फोन काट दिया।

सुजय मालती जी से मिलने गया, उनसे अंजू के बारे में न जाने क्या बात की, अंजू को वो स्ल्पि देना जरूरी था क्या? उधेड़बुन में पता नहीं कितनी देर अंजू सोई, कितनी देर जागी, हिसाब लगा पाना कठिन था।

सुबह की ताजी हवा ने रात का नैराश्य भुला दिया था। काउंटर पर ताजे लाल गुलाबों का बुके, कार्ड सहित अंजू की प्रतीक्षा कर रहा था।

विनीत ने गुलाब भेजे ये। एक पंक्ति थी-

अपने सबसे अच्छे मित्र को बहुत प्यार सहित……।

-विनीत

बुके हाथ में लिए अंजू मुस्करा उठी थी। विनीत का चेहरा गुलाबों में साकार हो उठा था। प्यार से फूलों को सहलाती अंजू ने घर पहॅचते ही विनीत को पत्र लिखने का निर्णय ले डाला था। कमजोरियों के बावजूद विनीत से अंजू नफरत नहीं कर सकी। मित्र रूप् मे विनीत का स्नेह उसे आहृलादित कर गया था।
 
छह

घर पहुंचते ही अम्मा ने बाँहो में भर लिया।

”पन्द्रह दिनों में तेरी तो शक्ल ही बदल गई है। पहले ही कमजोर थी, अब और भी सूख गई है।“

”तुम्हें तो अम्मा, अपने बच्चे हमेशा ही दुबले नजर आएँगे। मेरे ख्याल में तो अंजू को चेंज सूट किया, चेहरा चमक रहा है।“ अतुल भइया ने स्नेह से उसकी पीठ थपथपाई।

पूनम भाभी एकांत की तलाश में थीं। अकेला पाते ही अंजू पर प्रश्नों की बौछार कर डाली-

”सच कह अंजू, विनीत मिला था न?“

”हाँ………आँ……….।“

”क्या…….? कहाँ मिल गया? क्या तूने इन्फार्म किया था?“

”इतना ही जान पाई हो अपनी अंजू को, मैं उसे इन्फ़ार्म कर सकती हूँ, भाभी?“

”फिर कैसे मिल गया, सच मेरी तो जान सूखी जा रही है।“

”मैं अच्छी-भली तुम्हारे सामने खड़ी हूँ और तुम्हारी जान सूख रही है। अब क्या मैं बीस साल की अंजू हूँ?“

”देखने में तो अब भी कोई फ़र्क नहीं आया है, ज्यादा ही निखर आई हो। पूरी बात नहीं बताई तो देख लूँगी।“

”देख लेना, अब हम दोनों अच्छे दोस्त बन गए हैं, भाभी। सच तो यह है ,वह एक बेहद कमजोर इंसान था। उस समय बचपने में सब कुछ ठीक लगता था, पर इस बार लगा उसका अपना व्यक्तित्व ही नहीं है।“

”तो अब सही व्यक्ति की तलाश शुरू की जाए?“

”तलाशने की क्या जरूरत है भाभी, अब तो मैं भी भगवान की इच्छा-अनिच्छा मानने लगी हूँ। जो होना है सो होगा।“

”अच्छा मेरी पुरखिन दस-पन्द्रह दिनों में ही इतना ज्ञान बटोर लाई है, कोई गुरू मिल गया था क्या?“

”क्यों मुझमें मेरी अपनी अकल नहीं है क्या?“

”अरे उसकी तो बात ही नहीं, तुझ-सा कोई दूसरा है इस घर में?“

”क्यों, भइया क्या किसी से कम हैं? भइया इज ए सेल्फ़-मेड पर्सन, आई एम प्राउड ऑफ हिम।“

पूनम का मुँह चमक उठा।

कुछ दिन घर-ऑफिस की व्यस्तता में बीत गए। रात में अंजू को कभी-कभी सब कुछ बहुत याद आता था। कोवलम-सी- बीच तो स्मृति में बार-बार कौंधता था। मालती सिन्हा को लम्बा-सा खत लिख, अंजू उनके पत्र की प्रतीक्षा करने लगी।

पूनम भाभी के साथ शॉपिंग को जाने को तैयार अंजू ने अपना बैग निकाला। त्रिवेन्द्रम से इसी बैग में अंजू ढेर सारे नारियल भरकर लाई थी। इस बैग की यही खासियत थी फोल्ड करने पर एकदम छोटा हो जाता था और सामान भरने पर खूब बढ़ जाता था। बैग झाड़ते वक्त कागज के कुछ पृष्ठ निकल आए थे। उन कागजों पर अंकित अपरिचित लिखाई ने उत्सुकता जगा दी-

………. जब से होश सम्हाला अपने को अकेला ही पाया। मम्मी के लिए पापा बहुत बड़ी जायदाद और फैक्ट्री छोड़, उन्हें बहुत जल्दी अकेला कर गए थे। मम्मी ने अपना सब कुछ ही नहीं, अपने को भी सागर अंकल को सौंप दिया था- ये बातें बड़े होने पर समझ पाया था। तब से सागर अंकल मेरे प्रतिद्वन्द्धी बन गए थे। मम्मी ने मुझे न जाने क्यों बड़ा हो जाने दिया।

उस रात मम्मी जिद करके क्लब के बाल-डांस में ले गई थीं।

‘हमेशा घर में पड़े किताबें चाटते हो, घर के बाहर भी कोई दुनिया है, तुम्हें जानना चाहिए।’

‘क्यों?’

‘क्यों…….पूछ रहे हो, इतनी बड़ी सम्पत्ति के अकेले वारिस हो, इसलिए अच्छा-बुरा जानना जरूरी है न?’

‘इस सम्पत्ति से मेरा कोई लेना-देना नहीं है, मम्मी”

“दिमाग तो नहीं खराब हो गया तेरा?

‘कुछ भी समझ लो, यह सब कुछ मेरे लिए अस्पर्श्य है।’

‘पर क्यों? तेरे पापा के कारोबार पर और किसका हक है?’

”जिसे तुम यह हक दे चुकी हो, मम्मी……..“

‘पागल हो गया है? किसे हक दिया है मैंने?’

‘कई बार हक अनजाने ही दे दिए जाते है। खैर, उस बात को छोड़ दो। वैसे भी इस सब पर फिर अधिकार पा सकना आसान नहीं होगा।’

‘तेरी बातें मेरी समझ से परे हैं, पर आज मेरी खातिर चला चल, प्लीज, जय बेटे।’

मम्मी ने बहुत कम बार मुझे बेटा कहा होगा, उनकी उस मनुहार पर मैं पसीज गया। मम्मी की जिद के कारण सूट पहन कर जाना पड़ा था।

पूरा क्लब विद्युत झालरों से जगमगा रहा था। ढेर सारी लड़कियाँ, रंग-बिरंगे परिधान, तरह-तरह की परफ्यूम्स की सुगन्ध, उनकी खिलखिलाहटें अजीब समाँ बाँध रही थीं। वहाँ पहुँच ,अपने को अजनबी-सा महसूस करने लगा था। मम्मी न जाने किस-किससे मुझे इंट्रोड्यूस कराती जा रही थीं। न जाने क्यों सारी लड़कियाँ मेरे आस-पास ही मॅंड़रा रही थीं। शायद मेरी अपार सम्पत्ति मेरे प्रति उनके प्रबल आकर्षण का कारण थी।

मेरे सामने वाले सोफे पर बैठी लड़की मेरी ही तरह भौचक दर्शक थी। तभी एक युवक ने उसके पास पहुंच शायद उससे डांस की रिक्वेस्ट की थी। लड़की उसके अनुरोध पर अपने-आप मे और भी सिकुड़ गई थी। युवक ने जैसे उसे जबरन खींच डांस- फ्लोर पर ला खड़ा किया था। मैं स्पष्ट देख पा रहा था कि वह लड़की डांस नहीं जानती थी। शर्म से पानी-पानी हो रही लड़की को युवक ने हल्के से फ्लोर के बाहर कर दिया। डांस कर रहे एक जोड़े से टकराती वह लड़की ठीक मेरी गोद में आ गिरी थी। उसके स्पर्श से मेरा सर्वाग रोमांचित हो उठा था-‘सॉरी………।’ अपने को सॅंभालती लड़की रोने-रोने को हो आई थी।

‘इट्स ओ के ! आइए यहाँ आराम से बैठ जाइए।’

मेरे पास सिमट कर बैठी लड़की भयभीत चिड़िया-सी लगी। पास से गुजर रहे वेटर को कोल्ड ड्रिंक लाने का आर्डर दे, मैंने बातचीत शुरू की-

‘आपका नाम?’

‘मोनिका।’

‘कहाँ रहती हैं?’

‘उदयपुर….. यहाँ मामा के घर आई हूँ।’

‘कौन हैं आपके मामा?’

‘बैरिस्टर विश्वम्भर राय।’

”ओह आप राय अंकल के घर ठहरी हैं?“

‘आप मामा को जानते हैं?’

‘उनके घर तो मम्मी की ब्रिज पार्टी होती है।’

‘आप भी कार्ड खेलते हैं?’ दो भोली आँखें मन की सारी उत्सुकता समेटे मुझ पर निबद्ध थीं।

‘अगर खेलता हूँ तो?’

‘तो मुझे अच्छा नहीं लगेगा, आई हेट कार्ड ऐंड ड्रिंक पार्टीज……….।’

‘मी टू।’

मोनिका के साथ कितना सुकून मिल रहा था। उस भीड़ और घुटन-भरे हाल के कोने में मोनिका खुली हवा के झोंके ले आई थी। इस बीच न जाने कितनी जोड़ी ईष्र्यालु आँखें हमें तरेरती रहीं, पर हम दोनों उनसे उदासीन कोल्ड ड्रिंक्स खत्म कर, आइसक्रीम ले बाहर आ गए।

‘तुम्हारे मामा इतने एडवांस्ड हैं और तुम उनसे इतनी डिफरेंट कैसे हो?’

‘तुम भी तो अपनी मम्मी से कितने अलग हो, फिर वह तो मेरे मामा ठहरे।’

‘क्या तुम जानती हो मुझे?’ मैं चौंक गया।

‘इस पार्टी की कौन लड़की तुम्हें नहीं जानती? मोस्ट एलिजिबिल बैचलर…….पढ़े-लिखे सुन्दर अमीर। मेरी कजिन अनिता तो तुम पर मरती है।’

‘मुझे इस क्लास से नफरत है।’

‘किस क्लास की बात कर रहे हो? मुझे तो अपना क्लास बेहद पसन्द है। मेरी टीचर मुझे मोस्ट रिमार्केबल गर्ल ऑफ दि क्लास कहती हैं।’

मैं बेतहाशा हॅंस पड़ा।

‘तुम्हारे भोलेपन का जवाब नहीं।’

‘मैं भोली हूँ? शायद इसीलिए अनीता मुझे ‘लल्ली’ कहती है।’

‘नो प्रोब्लेम, यहाँ की ज्यादातर लड़कियाँ पीठ पीछे मुझे ‘लल्लू’ पुकारती हैं। जानता हूँ यह बात, लेकिन मुझे इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। मैं अपने को जानता हूँ, वही काफ़ी है।’

मोनिका मुझे खिली पांखुरी पर शरद की ओसबिन्दु-सी मोहक लगी थी।

दूसरे दिन से मम्मी के साथ मैं भी राय अंकल के घर जाने को तैयार था। मम्मी खुश थीं।

‘चलो तुम्हें अक्ल तो आई। चार लोगों में बैठोगे तो एटीकेट्स सीखोगे। सब कहते है, तुम्हारा बेटा कितना घरघुस्सू है।’
 


उस दिन के बाद से मैं हर बार राय अंकल के घर जाता रहा। मेरे पहुँचते ही मोनिका खिल उठती। कोई बहाना बना हम दोनों घंटों बाहर लॉन की घास पर बैठे बातें करते रहते थे। मोनिका के बिना जीवन की कल्पना भी कर पाना कठिन था।

मम्मी मेरे बदलते रूख से बेहद खुश थीं, जाने-अनजाने उनका प्यार मेरे लिए छलकने लगा था।

एक बात के लिए मम्मी का अहसान मानता हूँ- अगर वे चाहतीं तो सागर अंकल से शादी कर लेतीं, पर पापा की डेथ-बेड पर उन्होंने पापा को वचन दिया था, मेरे लिए वह दूसरी शादी नहीं करेंगी। उस समय मैं दो साल का था। पापा की बात रखकर मम्मी ने उन्हें जो मान दिया, उसके लिए मैं हमेशा उनका आभारी रहा। कभी-कभी पापा की सेलफिशनेस पर उन्हें मन-ही-मन दोषी भी ठहराया- क्यों उन्होंने मम्मी को अपने वचन से जकड़ दिया? मम्मी की उस समय उम्र ही क्या थी।

मम्मी के प्रति सदय होते मन पर, कहने वालों ने इतने क्रूर आघात किए थे कि उनकी चोटों से मैं तिलमिला जाता। शादी न करके मम्मी ने सागर अंकल से जो सम्बन्ध रखे उसके लिए मम्मी अपनी अन्तिम साँस तक अक्षम्य रही……। आज सोचता हूँ क्या यह मेरे पुरूष का अहं नहीं था………स्त्री पर जिसका कानूनन अधिकार है, वह उसके साथ कैसा भी व्यवहार करे, स्त्री का धर्म आजीवन उसी खूँटे से बंधकर रहना है। पापा को ऐयाशी का हक था, पर जाते-जाते भी वे मम्मी को अपने वचन की सूली पर चढ़ा गए। मोनिका पर किसी और का अधिकार क्या मैं सह सकता हूँ?

उस दिन पियानो बजाती मोनिका के पीछे मैं मुग्ध खड़ा था। मेरी ताली की आवाज से मोनिका चौंक गई-

‘अरे तुम, कब आए?’

‘मैं गया ही कब था, हमेशा तुम्हारे पास ही तो हूँ न?’

‘ये तो ठीक कहा, कैसा बजाती हूँ पियानो?’

‘तुम्हारे स्वभाव से मेल नहीं खाता।’

‘क्यों?’

‘भारतीय परम्परा के अनुरूप् तो तुम पर वीणा सोहेगी।’

‘तब तो मेरे सामने सिर झुकाकर वीणा वादिनि, वर दे गाना पड़ेगा।’ मोनिका हॅंस रही थी।

‘जो वरदान माँगूँ, मिलेगा न?’

‘माँगकर तो देखो।’

‘आज नहीं, फिर कभी, पर याद रखना वचन दिया है।’

‘ओ के । आज क्या प्रोग्राम है?’

‘आठ-दस दिनों के लिए बांबे जा रहा हूँ। न्यू ईयर पर विश करने और तूमसे वरदान माँगने वापिस पहुंच जाऊंगा।’

‘वादा रहा, बहुत मिस करूँगी तुम्हें।’

मोनिका की हथेली पर हाथ धर मैंने वायदा किया था।

बाम्बे में काम जल्दी खत्म हो गया था, उसी दिन की फ्लाइट ले घर पहुँचा। मोनिका के घर फोन करने पर पता लगा, वह क्लब गई हुई थी। सरप्राइज देने के लिए इससे अच्छा मौका कब मिलता! कार दौड़ा, क्लब पहुंच गया। अपनी फेवरिट जगह मोनिका को न पा, हाल में पहुँचा था। डांसिंग फ्लोर पर युवा जोड़े नृत्य कर रहे थे। मोनिका को वहाँ पाने की आशा व्यर्थ थी, पर शायद उसकी कजिन अनिता उसका पता दे सके, यही सोच, अनिता की खोज में नजरें दौड़ाई थीं, पर जो देखा, उसने चौंका दिया । अत्याधुनिक परिधान में एक सुन्दर युवक के कन्धे पर सिर टिकाए मोनिका, आत्मविस्मृत-सी झूम रही थी। स्तब्ध खड़ा मैं उसे पुकार भी न सका।

धुन समाप्त होते ही युवा जोडे़ अपनी-अपनी जगहों पर जा बैठे थे। युवक का सहारा लिए मोनिका एक कोने में उसी युवक के कन्धे पर सिर टिकाए बैठ गई थी। पेग बना युवक ने मोनिका के होंठों से लगा दिया था। यह सब सहन कर पाना कठिन था, सीधे उनके सामने जा खड़ा हुआ। विश्वास करोगी मालती दी, मोनिका ने मुझे कतई नहीं पहचाना- सुजय को नहीं पहचाना। मैं शायद उत्तेजित था, चीख-सा पड़ा था-

‘मोनिका, यह क्या तमाशा है? कौन है यह ………. आई वांट ऐन एक्सप्लेनेशन………..।’

‘हाउ डेयर यू? हू आर यू? गेट लॉस्ट………। रोहित, मुझे यहाँ से ले चलो प्लीज।’

‘नहीं, तुम यहाँ से ऐसे नहीं जा सकतीं, तुम्हें बताना होगा।’

मेरी आवाज पर काफी लोग घिर आए थे। उनमें अनिता भी थी। मेरा हाथ जबरन खींच एक ओर ले गई।

‘आई एम सॉरी सुजय, ही इज मोनिकाज फियान्सी। अमेरिका में बहुत बड़ा बिजनेस है उसका। परसों दोनों की एंगेजमेंट हुई है। तुम उसे भुला दो, वह एक मजाक था। यू आर नॉट हर च्वाइस…….।’

‘क्या वह एक खेल था……..नानसेंस। वह मुझे प्यार करती थी। हम दोनों……….।’

‘शायद सच्चाई तुम्हें नहीं पता, हम लड़कियों में तुम्हें इम्प्रेस करने की शर्त लगी थी। मोनिका वह शर्त जीत गई। दैट्स ऑल, टेक इट ईजी। मोनिका वह नहीं थी, जिसे तुमने प्यार किया, मोनिका यह है।’

समझ सकती हो मालती दी, उस अपमान-पीड़ा का दंश किस तरह झेला होगा मैंने! माँ से लेकर मोनिका तक का सफर तय करना आसान तो नहीं रहा होगा?

जलते कान और सुलगते मन के साथ मैं कैसे घर पहुंचा, पता नहीं। उस दिन पहली बार पापा की बोतल नीट चढ़ा गया था। पूरी रात न पहचाने जाने की आग में जलता रहा था मैं। उस रात का नशा उतरा भी तो कैसे- सुबह-सुबह दरबान ने जगाया था।

ड्राइंग रूम में पुलिस इंस्पेक्टर उस मनहूस खबर के साथ मेरी प्रतीक्षा कर रहा था। क्लब से सागर अंकल के साथ वापिस आती मम्मी की कार को ट्रक ने सामने से हिट किया था। मम्मी और सागर अंकल ने वहीं दम तोड़ दिया था।
 
Back
Top