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मालती जी बच्चों-सी उत्साहित थीं। सलवार-कमीज पानी में भीग उनकी काया से चिपक गई थीं, पर वे निश्चिन्त सागर-स्नान का मजा ले रही थी। अंजू बार-बार कपड़े निचोड़ रही थी। मालती जी हॅंस पड़ी थीं-
”अरे यहाँ कोई किसी को नहीं देखता। जानती है दो साल पहले गोआ-तट पर नंगे विदेशियों को फुटबाल खेलते देख मैं तो आँखें भी न उठा सकी थी, दो दिन बाद सब सामान्य-सा लगा था।“
”अब चलें मालती दी, भूख लग आई है।“
”ब्रेकफास्ट में क्या लेगी? यहाँ हर तरह का ब्रेकफास्ट उपलब्ध है। आलू के पराठे खाएगी?“
”आलू के पराठे यहाँ?“
”हाँ, वह सामने इस्माइल का रेस्ट्राँ है न, वह नार्थ इंडियन डिशेज का एक्सपर्ट है। चल वहीं उसके होटेल में कपड़े चेंज भी कर लेंगे।“
मालती सिन्हा को देखते ही इस्माइल आगे बढ़ आया।
”वेलकम, मैडम। आज खाने में क्या स्पेशल चाहिए?“
”पहले तो हमें एक बाथरूम- अटैच्ड रूम दो, हम कपड़े बदल लें, तब आलू के पराठे और अपना इमली वाला मिर्ची का अचार तैयार रखना।“
”ओ के मैडम, हफ़ीज़, मैडम को फिफ्टी टू में ले जा फटाफट।“
रेस्ट्राँ के पीछे बने कमरों में विदेशी टूरिस्टों की भीड़ थी। मालती दी जैसे कोवलम की एक-एक बात से परिचित थीं। बाथरूम में शॉवर के नीचे खड़ी अंजू, ठंडे पानी की बौछार में भीगती रही।
मालती जी ने द्वार पर दस्तक दी – ”ऐ अंजू, क्या सो गई, मुझे भी चेन्ज करना है, जल्दी कर।“
”सॉरी दीदी, अभी निकली।“
तौलिये से भीगे बाल सुखाती अंजू जल्दी ही बाहर आ गई थी। बालों से गिरती छोटी-छोटी बूंदें माथे पर बिखर आई थीं।
”वाह, क्या रूप पाया है। सच कह, ऐसे रूप के साथ तू आज तक कुंवारी कैसे रह गई ,अंजू?“
”आप तो हद कर देती हैं, मालती दी।“ मालती सिन्हा की मुग्ध दृष्टि पर अंजू लजा आई।
आलू के पराठे परोसता इस्माइल मालती दी से चुहल करता था रहा था-
”आशीष साहब तंदूरी चिकन खाता था और दीदी आलू का पराठा। साहब शिकायत करता था-‘इस्माइल, तुम दीदी के पराठे में ज्यादा घी डालता है, दीदी मोटा हो जाएगा तो उन्हें इधर ही छोड़ जाएगा।’ दीदी तो सचमुच मोटा हो गया अब बताओ दीदी, साहब तुमको छोड़ा या नहीं?“
मालती का चेहरा पीला पड़ गया। पराठे का ग्रास जैसे गले में अटक गया था।
”इस्माइल, थोड़ा पानी मिलेगा?“ अंजू ने बात टालनी चाही।
”एक बात बता अंजू, मुझे इस रूप में देख क्या आशीष मुझसे नफरत करेंगे? जानती है उस समय तुझसे भी एक-आध किलो कम वजन रहा होगा मेरा।“ मालती जी जैसे कहीं खो गई।
”छिः मालती दी, आप भी किन ख्यालों में खो गई हैं। प्यार क्या सिर्फ़ शरीर से होता है? प्यार तो आत्माओं का मिलन होता है, वर्ना क्या कोई बिना किसी बात या कारण के सगाई तोड़ सकता है?“
”किसकी बात कर रही है, अंजू? किसने सगाई तोड़ दी है?“
”किसी ने नहीं, मैंने तो एक उदाहरण-भर दिया था ,मालती दी। अब अगर आपकी भूख नहीं रही तो चलते हैं।“
”नहीं-नहीं……… तूने तो आधा पराठा भी नहीं खाया, ये अचार चखा तूने?“
नारियल के पेड़ के नीचे पड़ी केन की कुर्सियों पर बैठी अंजू और मालती जी अपने-अपने ख्यालों में खो गई थीं। सागर-तट पर तैनात सुरक्षा गार्ड, सागर स्नान का मजा ले रहे पर्यटकों को, सीटियाँ बजा सतर्क कर रहे थें जिधर सागर का जल बढ़ रहा था, वहाँ से हटने के लिए सीटियों के साथ-साथ हाथ से भी संकेत कर निर्देश दे रहे थे।
”पहले तो ये गार्ड यहाँ ड्यूटी नहीं देते थे, इस्माइल?“
इस्माइल के हाथ से पाइन ऐपल जूस लेती मालती दी ने पूछा।
”दो बरस पहले एक ट्रेजेडी हो गया था, तभी से ये गार्ड लोग इधर ड्यूटी करता है, दीदी साहेब।“
”कैसी ट्रेजेडी, इस्माइल?“
”वो सामने रॉक देखता है न, दीदी? याद है वहाँ बैठ आशीष साहब ने एक पेटिंग खींचा था……….“
”हाँ इस्माइल, सब याद है……. तब ये पहाड़ी पानी में इतनी डूबी नहीं थी…… पूरे चार दिन आशीष ने वहाँ बिताए थे।“
”दो बरस पहले दिल्ली से एक साहब शादी बनाकर आया था। अपनी वाइफ़ को उस रॉक पर खडे़ होने को बोल, वह फोटो खींच रहा था तभी एक जोर का वेव आया और उसकी वाइफ़ को बहा ले गया…..। बेचारा पानी के साथ उसकी फोटो लेना माँगता था-पानी उसकी वाइफ़ को ही ले गया।“
”ओह माई गॉड, फिर क्या हुआ? उसे बचाया जा सका या नहीं, इस्माइल?“ अंजू डर गई।
”बचाने को उस टाइम कोई नहीं था, फिशरमैन तो मार्निग में इधर रहता है, शाम को वहाँ कौन था? वह साहब चिल्लाता रहा। डेड बॉडी भी नहीं मिला उसका। बस तब से ये सिक्यूरिटी गार्ड की ड्यूटी लगती है और उस रॉक पर जाना एकदम मना है।“
”आज न जाने क्या सुनना पड़े। चल अंजू ,गेस्ट-हाउस ही चलते हैं।“
उदास मन अंजू और मालती जी गेस्ट हाउस चली गई थीं।