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वह साँवली लड़की

सब कुछ निबटा, अपने को बेहद अकेला पाया था। मम्मी के जीते, उनसे सामंजस्य नहीं बैठा सका, पर उनके बाद, उनकी कमी बेहद खलने लगी थी। शुरू से अपने को किताबों में डुबोए रखता था, मम्मी के बाद उन्हीं ने साथ निभाया। खालीपन भरने को ढेर सारी डिग्रियाँ ले डालीं। वही डिग्रियाँ काम बढ़ाने में सहायक बनीं। जिस सम्पत्ति को कभी हाथ भी न लगाने की सोची थी, वही मेरे गले पड़ गई।

मातमपुसीं में आए लोग मेरी अक्षमता का अंदाज लगाना चाहते थे। उनकी वही बात मेरी चुनौती बन गई। सम्पत्ति का मोह न रहते भी उसे किसी अन्य को न देने की जिद आ गई और आज इस मुकाम पर पहुंच सका हूँ।

यह सच है लाख भुलाना चाहकर भी मोनिका से मिला अपमान हर पल जीता रहा हूँ मैं। शायद इसीलिए हर लड़की में उसी का प्रतिरूप देखता रहा। किसी अभिन्न से न पहचाने जाने का दंश आप नहीं समझ सकेंगी ,मालती दी। इसी बात पर एक दिन अंजलि जी से भी लड़ बैठा था-खैर उसे जाने दीजिए, शायद हमेशा गलती मैं ही करता रहा हूँ।

अब तो माफ करेंगी न?

-जय

उन इबारतों में डुबी अंजू को पूनम भाभी की आवाज ने जगाया-

”अंजू, चलना नहीं है क्या, कहाँ रह गई हो भई?“

”अभी आई, भाभी……….।“

उन पृष्ठों को अंजू फाड़ नहीं सकी थी, जल्दी से ड्राअर में डाल तेजी से अंजू बाहर चली आई।

दो दिन बाद मालती सिन्हा का लम्बा-सा पत्र आया था। घर की ढेर सारी बातें लिख भेजी थीं। अन्त में लिखा था- ”कुछ दिन तेरे साथ रहने के बाद लगता है अपने अतीत से उबर आई हूँ। अपनी बेटी में भी अब अपनी परछाई पाती हूँ ,अंजू। मेरी मान, पिछला भूल एक अच्छा-सा जीवन-साथी चुन ले। सुजय से बात करूँ? नाराज मत होना।“

-तेरी

मालती दी

छिः ये मालती दी भी…..बस। अंजू चिढ़ गई। पूरी दुनिया में उसके हिस्से विनीत और सुजय ही आएँगे? दोनों बेहद कमजोर, परिस्थिति के आगे हथियार डाल देने वाले डरपोक।

अम्मा को अंजू का कुंवारा डोलना नहीं भाता था।

”तू ही समझा ,बहू। वो तो अपना घर बसा मजे उड़ा रहा है और ये उसके नाम की माला लिए जोगन बनी बैठी है।“

”कौन जोगन बना है अम्मा? अगर तुम मेरे ज्यादा पीछे पड़ोगी, मैं अपना ट्रान्सफर कहीं और करा लूंगी।“ अंजू नाराज हो उठती।

”अब हमारा बोलना भी बुरा लगता है। इतना पढ़ा-लिखाकर दिमाग खराब कर गए। खुद तो चले गए, हमारे सिर पर बोझ छोड़ गए।“ अम्मा बिसूरने लगतीं।

”अम्मा, पापा को कुछ मत कहा करो। आज उन्हीं की बदौलत अंजू बन सकी हूँ।“

पापा ने जो चाहा अंजू ने पा लिया, पर पापा के सामने उनके ऑफिस कहाँ जा पाई थी अंजू? पापा की साध मन में ही रह गई। इतने महत्वाकांक्षी पापा क्या पा सके? पापा हमेशा कहते-

‘काश अंजू मेरी बेटा होती…………।’

‘क्यों बेटी कुछ नहीं कर सकती ,पापा?’ अंजू ठुनकती।

‘तू सब कुछ कर सकती है ,अंजू। तू ही तो मेरा बेटा है।’

हार्ट-अटैक का कष्ट झेलते पापा ने कितनी मुश्किल से हाथ उठाकर अंजू के सिर पर रखा था। आँख की कोर से एक आँसू ढलका और पापा ने संसार से विदा ले ली थी।

अम्मा को पापा से हमेशा यही शिकायत रहती कि उन्होंने अंजू को सिर चढ़ाकर उसका दिमाग खराब कर दिया था। वही अम्माँ पापा के न रहने पर अंजू को सीने से चिपटा कितना रोई थीं।

”तुझे पापा के सपने सच करने हैं बिटिया। वे तुझे बड़ा आफिसर बना देखना चाहते थे, तू बनकर दिखएगी न ,अंजू?“

पापा की मृत्यु के बाद अम्मा में गजब का परिवर्तन आ गया। अंजू उनके हर काम की केन्द्र-बिन्दु बन गई थी। अंजू ने शादी करने की साफ़ मनाही कर दी थी, उस जगह अम्मा उससे सहमत नहीं थीं, पर अंजू की दृढ़ता के आगे हार गई थीं।

”जैसी तेरी मर्जी, तू जान, पर एक बात याद रखना, उम्र के पड़ाव पर एक वक्त ऐसा आता है जब हर एक को किसी सहारे की जरूरत जरूर पड़ती है,अंजू। जब तक माँ-बाप जीते हैं ठीक रहता है, बाद ………में।“

अंजू ने अम्मा को उनकी आगे वाली बात कभी पूरी नहीं करने दी थी।

”अम्मा ,तुम चिन्ता मत किया करो, मुझे भइया-भाभी कितना प्यार करते हैं, तुम देखती हो फिर भी।“

”भगवान करे उनका साया हमेशा तुझ पर बना रहे, पर जब अपने बाल-बच्चे हो जाते हैं तो बात दूसरी हो जाती है, यही दुनिया का कायदा हैं ,बेटी।”

“अम्मा, प्लीज ऐसी बातें मत किया करो। भाभी सुन लें तो क्या सोचेंगी? “

पपा की दृष्टि में अति सामान्य बुद्धि वाले भइया की पत्नी-रूप में पूनम भाभी आदर्श थीं। सामान्य रंग-रूप वाली भाभी की तीक्ष्ण मेधा पापा की दृष्टि से छिपी ही रह गई थीं। मध्यमवर्गीय परिवार की बेटी पूनम भाभी बी0ए0 तक शिक्षा के बाद ब्याह दी गई थीं। भइया के लिए पूनम वरदान सिद्ध हुई थीं। पूनम भाभी के आते ही उनकी सर्विस स्थायी हो गई। भाभी के आने के बाद से भइया का चेहरा आत्मविश्वासपूर्ण होता चला गया था।

घर के काम निबटाती पूनम ने कब इतिहास विषय में एम0ए0 कर लिया किसी को पता भी न चला। विवाह के दो-तीन वर्षो बाद भी अम्मा दादी न बन सकीं। नीची नजर किए पूनम भाभी अम्मा के उलाहने सुनती काम करती जाती थीं।

”आजकल जमाना ही बदल गया है। बड़ी उम्र में शादी करो फिर भी बच्चों के बिना घर सूना पड़ा रहे।“

पापा के बाद भइया घर के सर्वेसर्वा भले ही बन गए थे, पर अम्मा की किसी बात का प्रतिवाद उन्होंने कभी नहीं किया। कभी-कभी तो अम्मा की अन्यायपूर्ण बातों पर अंजू ही उनसे उलझ पड़ती थी।

त्रिवेन्द्रम से लौटने के करीब पन्द्रह दिन बाद पूनम भाभी रात में अंजू के पास आ बैठी थीं।

”क्या बात है भाभी, अम्मा ने कुछ कहा है?“

”आज तक कभी उसके लिए मुझे कुछ कहने की जरूरत पड़ी है, मेरी ढाल तो तुम हो न ,अंजू?“

”फिर क्या बात है?“

”महिला कॉलेज में मेरी नियुक्ति हो गई है, तुम्हें अम्माजी को मनाना होगा ,अंजू।“

”अरे वाह, इतनी बड़ी खबर अब सुनाई जा रही है। तुमने तो कमाल कर दिया ,भाभी।“

”कमाल तो तुम्हारे भइया का है, अंजू। देर रात तक मेरे साथ बैठ-बैठकर मुझे इस योग्य बनाया है……वर्ना मैं किस लायक थी।“

”चलो हमारा भइया का कोई तो गुण्ग्राही मिला, इण्टरव्यू कब दिया, भाभी?“ भइया के प्रति पूनम भाभी के विश्वास ने ही भइया की काया पलट कर दी थी।

”जब तुम त्रिवेन्द्रम गई थीं, तभी इण्टरव्यू- कॉल आई थी।“

”जब सब कुछ अपने-आप कर लिया तो अम्मा को समझाना भी तुम्हें ही होगा ,भाभी।“

”ये काम तो तुम्हें ही करना होगा, अंजू। तुम तो जानती हो अम्मा जी मेरी नौकरी की बात कभी पसंद नहीं करेंगी।“

”अम्मा ने मेरी नौकरी ही कब पसंद की ,भाभी? अब अपना मोर्चा तुम्हें खुद सॅंभालना है। यूँ डर-डर कर कब तक चलेगा?“

”अम्मा जी सह सकेंगी?“

”अगर बेटी की नौकरी सह सकती हैं तो बहू की भी सहनी ही होगी“ फिर भी न माने तो भइया को बात करनी पडे़गी।“

”ये अम्मा जी के सामने मुँह खोलेंगे“

”नहीं खोलेंगे तो पछताएँगे।“

”तुम कुछ नहीं करोगी?“

”मेरी जरूरत ही नहीं पडे़गी, तुम अकेली ही काफ़ी हो। मेरा विश्वास करो भाभी, कुछ नहीं होगा।“

घर में अम्मा दो-चार दिन बड़बड़ाती रहीं, भइया और भाभी निःशब्द उनका बड़बड़ाना सुनते रहे। आठ जुलाई को सूती कलिफ़दार साड़ी पहन पूनम भाभी कॉलेज जाने को तैयार थीं। जाते समय अम्मा के पावों पर झुकती पूनम भाभी को अम्मा का आशीर्वाद मिला या नहीं, अंजू ने जोरदार शब्दों में घोषणा की-

”आते समय मिठाई लाना मत भूलना भाभी, और हाँ तुम्हारी फ़र्स्ट- सैलरी में मेरी साड़ी पक्की है न?“

”पहले वेतन पर तो अम्मा जी और तुम्हारा ही अधिकार होगा ,अंजू।“

अम्मा ने आँखों की कोर जबरन आँचल से पोंछ डाली थीं। स्कूटर पर भइया के पीछे बैठ भाभी चली गई थीं। अंजू का मन संतोष से भर गया था- भइया को उनका प्राप्य मिल गया। काश, पापा उन्हें इस रूप में देख पाते। जिस बेटे से उन्होंने कभी कोई उम्मीद नहीं रखी, वही आज पूनम भाभी के व्यक्तित्व का निर्माता है।
 
सात

ऑफिस में पहुँचते ही अंजू को कम्पनी चेयरमैन के आने का मैसेज मिला। उनके साथ कुछ कम्पनीज के चेयरमैन और डाइरेक्टर भी आ रहे थे। अंजू तैयारी में जुट गई। कुछ बड़ी कम्पनियों के आर्डर की चेकिंग के लिए पत्र आए हुए थे। पूरे विभाग के लिए मार्च का महीना व्यस्ततम समय होता था। उन दिनों देर से घर पहुँचने पर अंजू को अम्मा की फटकार सुननी पड़ती थी।

”यह भी कोई घर आने का समय है। इतना खराब जमाना है, कहीं कोई ऊंच-नीच हो जाए तो जिन्दगी-भर का रोना लिए बैठी रहो।“

”अम्मा, तुम बेकार ही परेशान होती हो, देर होने पर कोई पैदल तो नहीं आती। कम्पनी की गाड़ी में आती हूँ।“

”यही तो मैं भी समझा रहा था। वह तो कहो तुम आ गई, वर्ना अम्मा मुझे दौड़ा रही थीं।“ मितभाषी भइया अम्मा के साथ अंजू की प्रतीक्षा करते रहते थे।

घर में पूनम अंजू की उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रही थी।

”कैसा रहा, कॉलेज का पहला दिन?“

”बहुत मजा आया। आओ पहले मुंह तो मीठा कर लो।“

”यह हुई न बात, अब बताओ रैगिंग कैसे झेल पाई।“

”रैगिंग………? मेरी?“

”क्यों, नई लेक्चरार की रैगिंग नहीं की जाती? बड़े सीधे स्टूडेंट्स हैं तुम्हारे?“

”कोशिश तो की थी, पर मैंने अच्छी तरह हैंडल कर लिया। पिछले कुछ दिनों से अतुल मुझे ट्रेनिंग दे रहे थे, इसीलिए प्रोब्लेम नहीं आई।“

”वाह, भइया की असली चेली बन गई हो ,भाभी।“ अंजू हॅंस पड़ी।

”काश, तुझे भी कोई गुरू मिल जाता ,अंजू तो जीवन सार्थक हो जाता।“

”नो चांस, अब इस उम्र में किसी की चेली बनना पॉसिबिल नहीं भाभी।“

”कौन-सी ज्यादा उम्र हो गई है, आजकल छब्बीस-सत्ताइस के पहले भला शादियाँ होती हैं? पद ऊंचा पा जाने से उम्र तो नहीं बढ़ जाती ,अंजू?“

”ओ के , ठीक है बाबा, मैं अभी बच्ची ही सही, जी भर के मिठाई खाने दोगी या नहीं?“

”क्यों, आज ही पूरा कोटा खत्म कर डालेगी ,अंजू? अपनी भाभी को यूँ सस्ते में छोड़ देगी?“ कमरे में प्रवेश करते अतुल ने परिहास किया था।

”आज तो भइया, सच्चे मन से तुम्हें प्रणाम करने की चाह रहा है। क्या व्यक्तित्व निखारा है हमारी भाभी का!“

”मैंने क्या किया? सच तो यह है अंजू, पूनम ने ही मुझसे मेरी पहचान कराई है। मैं उसका आभारी हूँ।“

”अच्छा-अच्छा, अब यह प्रशंसा- पुराण बन्द, तुम दोनों सुखी रहो यही मेरी कामना है। अम्मा ने मिठाई खाई?“

”अम्मा जी तो शाम से ही सरला चाची के घर जा बैठी थीं अंजू, मेरी हिम्मत नहीं हुई……….।“

”परेशान होने की जरूरत नहीं है, दो-एक दिन में स्वयं एडजस्ट कर लेंगी।“

दूसरे दिन कार्यालय में चेयरमैन के आने का हल्ला-गुल्ला था। एक दिन में ही ऑफिस की कायापलट हो गई थी। सब कुछ नया-चमचमाता-सा लग रहा था। डाइरेक्टर ने दो-तीन बार स्वंय निरीक्षण कर लिया था। अंजू को बुलाकर पूछा-

”मिस मेहरोत्रा, आपकी सब फाइलं ठीक हैं न? चेयरमैन के साथ कुछ बड़ी कम्पनीज के चेयरमैन और डाइरेक्टर भी होंगे। सब पेपर्स ठीक रहने चाहिए। यह बहुत महत्वपूर्ण मीटिंग है।“

”आप चिन्ता न करें सर, मैंने सब तैयार कर रखा है।“

”ओ के । मीटिंग में आपको भी रहना है, कम्पनी अकाउंट्स पर भी बात हो सकती है।“

”ठीक है, सर।“

दस बजे से मीटिंग शुरू होनी थी, अंजू पौने दस बजे काँन्फ्रेंस हाल में पहुँच गई थी। चेयरमैन के साथ पाँच बड़ी कम्पनियो के चेयरमैन और मैनेजिंग डाइरेक्टर आ रहे थे। सम्मान में खड़ी अंजू चेयरमैन के पीछे प्रवेश कर रहे व्यक्ति को देख चौंक गई। सुजय कुमार की इस मीटिंग में उपस्थिति की तो अंजू ने कल्पना भी नहीं की थी।

अतिथियों का परिचय चेयरमैन ने कराया, डाइरेक्टर ने कार्यालय अधिकारियों का परिचय दिया था। अंजू से दृष्टि मिलने पर भी सुजय की आँखों में कहीं कोई परिचय का भाव नहीं कौंधा। गम्भीर मुख सुजय अंजू को निहायत अपरिचित लगा था।

मीटिंग बहुत सफल रही। अंजू से पूछे गए हर सवाल का उत्तर संतोषजनक था। कम्पनी का कार्यक्षेत्र बढ़ाने की दिशा में सभी अतिथियों ने हर तरह के सहयोग का आश्वासन दिया। चेयरमैन की प्रसन्नता स्वाभाविक ही थी। लंच के लिए अंजू भी आमंत्रित थी, पर उसने डाइरेक्टर से घर जाने की अनुमति माँगी।

”यह कैसे हो सकता है, बाहर से अतिथि आए हुए हैं, आपका रहना जरूरी है। मान लीजिए चेयरमैन कुछ पूछना ही चाहें, तो मैं क्या जवाब दूँगा?“

मन मार अंजू को लंच में रहना पड़ा। प्लेट में सलाद ले एक अंजू कोने मे जा बैठी थी। मन न जाने क्यों रोने-रोने का कर रहा था। त्रिवेन्द्रम में सुजय ने ही कहा था-

”न पहचाने जाने की तकलीफ़ आप नहीं समझ सकतीं।“ विनीत को न पहचानने पर सुजय अंजू पर किस तरह नाराज हुआ था और आज……? पर अगर सुजय ने उसे नहीं पहचाना तो उसमें उदास होने की की क्या ज़रूरत है, अंजू ने सुजय से कोई ऐसी अपेक्षा तो नही रखी थी, फिर …….“

सलाद के टुकड़े मुँह में धरती अंजू को बार-बार लग रहा था, शायद सुजय आकर कहे-

‘आप इतनी एफीशियेंट आफिसर हैं, आज ही पता लगा। पूरी मीटिंग में छा गई थीं आप।’

अंजू के पास उसका सहकर्मी घोष आकर बैठ गया था।

”यह क्या मैडम, सलाद से ही पेट भरेंगी? नो स्ट्रेंज, इसीलिए आप अपनी फिगर मेंटेन कर सकी हैं।“

”थैंक्स फ़ॉर दि कांम्प्लिमेंट“, प्लेट नीचे रख अंजू उठ खड़ी हुई। मजाक करने के लिए घोष प्रसिद्ध था, पर इस समय उसकी बात अंजू को जरा नहीं भाई थी।

”सर, अब मैं जा सकती हूँ?“

”ठीक है, यू हैव डन ए गुड जॉब।“

”थैंक्यू, सर।“

अपने कमरे में पहुँच अंजू ने सहज होने की कोशिश की थी। एक ग्लास ठंडा पानी पी, अंजू ने फाइल खोल ली थी, पर फाइल के पृष्ठों पर त्रिवेन्द्रम के दृश्य उभरते देख, अंजू अपने से नाराज़ हो उठी।

सुजय ने होटल काउंटर पर स्लिप छोड़ी थी, ”अब हम कभी नहीं मिलेंगे, पर जितना मिले हमेशा याद रहेगा……………“

झूठ, वह फिर मिला पर पहले की पहचान झाड़-पोंछ कर। न जाने क्यों अंजू हर फोन कॉल पर बेहद सतर्क होती जा रही थी। जिसने सामने देखकर ‘हेलो’ तक नहीं कहा, वह उसे फोन करेगा, आशा ही व्यर्थ थी।

शाम को अंजू बेहद थकी-सी घर पहुंची थी।

”क्या हुआ अंजू, आज बड़ी थकी दिख रही है? सब ठीक-ठाक है न?“ अतुल भइया कंसर्न दिख रहे थे।

”कुछ नहीं भइया, सुबह से टेंशन में थी न, इसीलिए ऐसा लग रहा है। मीटिंग काफी अच्छी रही। हमारी कम्पनी को बहुत फ़ायदे की उम्मीद है।“

”चल अच्छा है, कम्पनी के फ़ायदे के साथ तेरा भी फ़ायदा होगा। अब एक शुभ समाचार दूँ।“

”क्या, जल्दी बताओ न?“ अंजू का रोम-रोम जैसे कान बन गया।

”मुझे 26 मई को स्टेट्स जाना है। आज ही वहाँ से लेटर आया है।“

”ओह भइया, कांग्रेच्युलेशन्स। अब तुमसे मिठाई खानी है।“

”आज हम सब बाहर ही डिनर लेंगे, ठीक है न?“ अतुल ने पहले ही प्रोग्राम तय कर रखा था।

”वो तो ठीक है पर भाभी से अलग डिनर लूँगी। क्यों भाभी, दोगी न?“

”पहले एक डिनर तो हो जाने दो।“

”देखो भइया, भाभी कितनी कंजूस हैं? अरे अगर मेरे हसबैंड को ऐसा चांस मिलता तो…..“ अपनी बात पूरी करने के पहले ही अंजू ने दाँत से जीभ काट ली।

”क्या ……..सुना तुमने हमारी अंजू ने क्या कहा? मतलब अब अंजू रानी अपने पतिदेव के बारे में सोचने लगी है।“ पूनम का चेहरा चमक रहा था।

”छिः भाभी, वह तो मैंने उदाहरण भर देना चाहा।“

हॅंसी-खुशी सब डिनर के लिए होटल गए। अंजू और पूनम की जिद पर अम्मा को भी जाना पड़ा था। होटल में बैठी अम्मा संकुचित हो रही थीं-

”तुम लोगों की जिद पर आना पड़ा, वर्ना यह जगह क्या हम बूढ़ो के लिए है।“

”तुम बूढ़ी कहाँ हो अम्मा? रंगीन साड़ी पहनो तो मेरी बड़ी बहन दिखोगी।“ अंजू हॅंस पड़ी।
 
अचानक अंजू की हॅंसी को जैसे ब्रेक लग गया। सामने से एक अत्याधुनिक युवती के साथ सुजय रेस्ट्राँ में आ रहा था। अंजू का मुँह रेस्ट्राँ के द्वार की ओर ही था। दृष्टि मिलते ही सुजय उन्हीं की ओर बढ़ आया-

”हलो ,मिस मेहरोत्रा।“

”नमस्ते……..।“ अंजू हड़बड़ा गई।

”रोमा, आप अंजलि मेहरोत्रा। इन्हीं की कम्पनी में काम से आया था…………चीफ फाइनैंस एक्जीक्यूटिव हैं मिस मेहरोत्रा।“

”हलो, मैं अंजलि का भाई अतुल। आइए, हैव डिनर विद अस।“ अतुल ने सुजय को आमंत्रित किया।

”थैंक्स, ग्लैड टु मीट यू, मिस्टर मेहरोत्रा। आज का यह निमंत्रण फिर कभी के लिए उधार रहा, आज माफ़ करें। कम ऑन ,रोमा।“ सुजय अपने लिए रिजर्वड टेबिल की ओर बढ़ गया।

”कौन थे ये महाशय?“ अतुल से अंजू ने सुजय का परिचय भी नहीं कराया।

”जय इंडस्ट्रीज के चेयरमैन सुजय कुमार……….।“ न जाने क्यों अंजू का मूड बेहद खराब हो गया।

”इतने बड़े आदमी को तू जानती है ,अंजू? यह तो बिजनेस की दुनिया का राजा है!“ भइया ताज्जुब में पड़ गए।

”आज ऑफिस में ही परिचय कराया गया था……….।“

”फिर भी इतने बड़े आदमी ने यहाँ परिचय दिखाया, यह कम बात तो नहीं है।“

”उसके साथ वह लड़की कौन थी, अंजू?“ पूनम की उत्सुकता बढ़ चली थी।

”मुझे क्या पता भाभी, न जाने किन-किन के साथ घूमते हैं ये अमीर लोग। मैंने उनका ठेका थोड़ी ले रखा है।“

”छोड़ो बेकार की बातें, आज अंजू की पसंद का मेनू रहेगा। क्या मॅंगवाया जाए?“ भइया ने बात टाल दी थी।

”जो सब लें, वही मॅंगा लो।“

”वाह, शोर मचाकर तू लाई है और अब जो चाहो मॅंगा लो कह रही है।“ अतुल सचमुच बहुत प्रसन्न था।

”मुझे तो टमाटर का सूप और ब्रेड मॅंगा दो।“

”वाह, यही खाना था तो घर में बना देते। आज ज़रूर कोई बात है वर्ना अंजू होटल में आ, टोमेटो सूप न पीती। क्या बात है अंजू, कहीं अभी जो महाशय आए थे उनसे तो कोई चक्कर नहीं चल रहा है?“ अंतिम वाक्य पूनम ने अंजू के कानों के पास धीमे से पूछा।

अन्ततः अम्मा की पसंद का खाना खा, सब घर लौटे थे।

सबके सो जाने के बाद भी अंजू को नींद नहीं आई। टेबल लैम्प जला, अंजू मालती दी को खत लिखने बैठ गईः

प्रिय मालती दी,

तुमने जिन सुजय कुमार का अपने नाम लिखा पत्र बड़ी सहानुभूतिपूर्वक मुझे पढ़ने को दिया था, उनकी असलियत आज देख ली। ऑफिस की मीटिंग में मुझे नहीं पहचाना तो कोई बात नहीं, पर होटल में जिस लड़की के साथ वह खाना खा रहे थे, वह किसी भी स्थिति में शरीफ़ घर की लड़की नहीं दिख रही थी। मैंने पहले ही कहा था, सब पुरूष एक-से होते हैं………..।

-अंजू

दूसरे दिन से सब अतुल के स्टेट्स जाने की तैयारी में लग गए थे। अम्मा की आँखें बार-बार भर आती थीं। भइया का बिछोह सह पाना उन्हें कठिन लग रहा था। पूनम भाभी भी जबरन अपनी उदासी छिपा मुस्कराने का प्रयास कर रही थीं। अंजू ही भइया के सामान की लिस्ट बनाती फिर सामान खरीदने, रखने में पूनम की सहायता कर रही थी।

व्यवस्तता के बीच मालती दी का पत्र आया था।

तेरा लिखा पत्र मिल गया। सुजय कैसी भी लड़कियों के साथ रहे-घूमे, उसमें तुझे फ़र्क नहीं पड़ना चाहिए, आखिर तेरा उससे नाता ही क्या है? किसी गैर को लेकर यूँ परेशान होना ठीक नहीं। अपना ख्याल रख।

-मालती

मालती दी का खत पढ़कर अंजू खिसिया आई। बेकार ही उन्हें पत्र डाला। न जाने क्या सोचती होंगी।

भइया को दिल्ली तक पहुंचा आने को पूनम और अंजू की बहुत इच्छा थी, पर अतुल ने सबको मना कर दिया।

”इस बचपने की जरूरत नहीं है। दो-चार घंटे और साथ रहने के लिए व्यर्थ ही हजारों रूपये नष्ट हो जाएँगे।“

अतुल भइया के जाने के बाद घर में सन्नाटा-सा छा गया। तीन स्त्रियों की गृहस्थी जैसे सूनी हो उठी थी। अम्मा हर समय बेटे को याद करती रहतीं-

”एक आदमी से घर में कैसी रौनक रहती थी। न जाने अतुल कैसा होगा।“

”तुम तो बेकार ही परेशान होती हो, अम्मा। अमेरिका जैसा समृद्ध देश दूसरा नहीं, वहाँ जो मिलेगा, तुम सोच भी नहीं सकतीं।“

भइया की अनुपस्थिति में अंजू घर की गार्जियन-सी बन गई थी। अपनी बातों से अंजू पूनम का खालीपन भरती रहती।

ऑफिस में अपनी मेज पर रखे लिफाफे को अंजू ने उलट-पुलट कर देखा। भइया का पत्र अभी पहुंचने की उम्मीद नहीं थी। उत्सुकता से खोले गए पत्र में मात्र चंद पंक्तियाँ ही थीं-

”मालती दी का डाँट-भरा खत मिला है, ऐसा क्या लिख दिया था आपने? मेरे साथ की लड़की शरीफ़ नहीं, ऐसा अनुमान कैसे लगा लिया? अपने जीवन को जैसे भी जीऊं, किसी को दखलंदाजी का अधिकार नहीं दिया है मैंने। एनी हाउ थैंक्स फ़ॉर दिस कंसर्न।“

-सुजय

अंजू का मुँह तमतमा आया। ये मालती दी भी कमाल करती हैं, मुझे कुछ लिखा और मेरे ही विरूद्ध उसे भड़का डाला। अपमान और क्रोध से अंजू का मन कसैला हो उठा। काम से तबीयत उचाट हो गई, तभी डाइरेक्टर का चपरासी उसे बुलाने आ गया।

”साहब याद कर रहे है।“

”मे आई कम इन, सर?“

”कम इन, आइए बैठिए।“

”चेयरमैन का लेटर आया है। आपको बधाई दी है। उम्मीद है जल्दी ही हेडक्वार्टर से आपका बुलावा आएगा।“

”थैंक्यू सर, यह तो आपकी गाइडेंस से ही संभव हो सका है।“

”आपका भविष्य बहुत उज्ज्वल है, मिस मेहरोत्रा। आपके पिता की उम्र का हूँ इसलिए कह रहा हूँ, आपको विवाह कर लेना चाहिए। कहें तो मैं मदद करूँ?“

”थैंक्यू सर, जब जरूरत होगी आपके पास आऊंगी। मुझे बेटी मानते हैं तो आगे से मुझे ‘आप’ कभी न कहें ,सर।“

”ओ के पर तुम भी मुझे ‘सर’ न कहकर अंकल पुकारोगी।“

”जी सर…………..अंकल।“

दोनों हॅंस पड़े। कुछ देर पहले का अवसाद अंजू के मन से कुछ हद तक छंट गया।

उस रात अंजू ने मालती जी को लम्बा-सा खत लिख डाला, पर उसका खत उन तक पहुंचने के पहले ही उनका पत्र अंजू तक आ पहुंचा।

मेरी अंजू,

पिछले खत में शायद कुछ उल्टा-सीधा लिख गई थी, असल में उस दिन बहुत बेचैन थी। बुरी खबर मिली थी- आशीष नहीं रहे। अपने अन्तिम दिनों का बनाया चित्र मुझे भेजने को कह गए थे। नैन्सी ने पोस्ट से भेजा। चित्र में त्रिवेन्द्रम का परिचित सागर-तट था, पर बर्फ से जमा, स्थिर-निर्जीव। नीचे शीर्षक दिया था ‘मैं’।

समझ सकती है, मुझ पर क्या बीती होगी। सिन्हा साहब ने कुछ नहीं पूछा पर मैंने ही बता दिया। वे ऊपर से शांत हैं पर जानती हूँ उनके अन्दर कैसा द्वन्द्व चल रहा है।

सुजय के पागलपन की क्या कहूँ मोनिका के ‘क्लास’ की नफरत वह भुला नहीं सका है। उस दिन उसके साथ रोमा थी। आज सुजय के पास जो सब है, उसकी वजह से मोनिका भी दस बार उसके सामने शीश झुकाए, रोमा की तो बात ही क्या, पर वह किसी पर नजर डाले भी तब न? कल तक सबकी दृष्टि से अपने को छिपाता, अपने-आप में सिमटा ‘लल्लू’ बना सुजय आज आत्मविश्वास से परिपूर्ण, सबकी दृष्टि में इतना ऊंचा उठ चुका है। कितनों की हिम्मत होगी उससे निगाह मिलाने की? उसकी बुद्धि और प्रतिभा के सभी कायल हैं, उससे विवाह किसी भी लड़की का सपना होगा।………. सब कुछ प्राप्य है उसे, पता नहीं कौन लड़की उसके अन्दर के बर्फ को पिघला सकेगी।

-मालती दी

मालती जी के पत्र ने अंजू को व्यथित किया था। शान्त चल रहे घर में सिन्हा साहब के मन की आँधी न जाने क्या करे? पर मालती दी ने कहा था- जब तक उन्हें यह सब पता लगेगा, वह मुझ पर बहुत विश्वास कर सकेंगे-भगवान उनकी यह बात सच करे, पर इतने दुःख में भी सुजय के लिए परेशान होना क्या ठीक है? वह कोई दूध-पीता बच्चा तो नहीं जिसे समझाया जाए? अंजू समझ नहीं पा रही थी मालती दी को सांत्वना का पत्र लिखना चाहिए या नहीं। अन्ततः उन्हें पत्र न लिखने का निर्णय ले अंजू ऑफिस चली गई।

ऑफिस पहुँचते ही डाइरेक्टर ने बुलवाया था।
 


”अंजू, तुम्हें हेडक्वार्टर जाना होगा। जय इंडस्ट्रीज के साथ हमें कांट्रैक्ट मिल रहा है। इट्स ए बिग अचीवमेंट। तुम्हारी प्रेजेंस जरूरी है, शायद पाँच-छह दिन लग जाएँ। तैयारी कर लो।“

”जी ……..। क्या मेरी जगह मिस्टर गुप्ता को नहीं भेजा जा सकता?“

”क्या कह रही हो, अंजू? ऐसे अवसरों की लोग प्रतीक्षा करते हैं और तुम हाथ आया मौका गॅंवाना चाहती हो! एनी प्रोब्लेम?“

”नहीं अंकल, वैसी कोई बात नहीं है, ठीक है मैं तैयारी कर लेती हूँ। कब जाना है?“

”परसों की फ्लाइट से चली जाओ, एक दिन पहले पहुँचना ठीक रहेगा। चेयरमैन से भी बात कर लोगी, शायद वे कुछ कहना चाहें।“

”ओ के, सर।“

दिल्ली जाने का उत्साह जय इंण्डस्ट्रीज के नाम ने खत्म कर दिया था। साथ के लोग उसकी किस्मत पर रश्क कर रहे थे, पर वह परेशान दिख रही थी।

”क्या बात है, मिस मेहरोत्रा, घर में कोई समस्या है, आप कुछ परेशान हैं?“

”नहीं, बस मेरी ही तबियत कुछ डाउन थी।“

जरूरी कागजातों की फाइल बनाने में अंजू जुट गई। काम के बीच अंजू को ध्यान आता रहा उसकी नियति में सुजय से बार-बार की भेंट क्यों लिखी है? पिछली बार उसके पत्र की अपमानजनक पंक्तियाँ भुला पाना आसान तो नहीं था, कैसे उसे फ़ेस कर पाएगी?

दिल्ली एयरपोर्ट पर कम्पनी की कार उसे लेने पहुँच गई थी। गेस्ट हाउस में फ्रेश होने के बाद वह हेड ऑफिस पहुँची। संक्षेप में कल की कार्रवाई के बारे में जानकारी दे, चेयरमैन दूसरी मीटिंग मे चले गए।

“मिस मेहरोत्रा, आप भाग्यशाली हैं, चेयर्मैन की निगाहों में चढ़ गई हैं, वर्ना उनकी कृपा-दृष्टि में आ पाना क्या संभव है?“ मिस्टर जयराज के शब्दों में उसके प्रति प्रशंसा थी या व्यंग्य समझ पाना कठिन था।

सुबह ठीक साढ़े दस बजे कांट्रैक्ट साइन करने के लिए मीटिंग थी। चेयरमैन के साथ सुजय और दो अन्य अधिकारियों ने प्रवेश किया था। सम्मान में खड़ी अंजू की ओर सुजय ने दृष्टि भी न डाली।

वार्ता के बाद चेयरमैन और ‘जय इंडस्ट्रीज’ के अध्यक्ष सह- प्रबंध निदेशक के रूप में सुजय ने समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। फोटोग्राफर ने हस्ताक्षर की प्रक्रिया को कैमरे में कैद कर लिया। चेयरमैन बहुत अच्छे मूड में थे, फोटोग्राफर को रूकने का संकेत दे अंजू को पुकारा।

”मिस मेहरोत्रा और आप सब यहाँ आ जाइए, आज के दिन की याद में एक ग्रुप फोटो हो जाए, क्यों मिस्टर कुमार?“

”जैसी आपकी मर्जी।“

ग्रुप में सबके खड़े होने की जगह बनाते हुए अंजू के लिए सुजय के साथ जगह बनाई गई।

”मिस मेहरोत्रा, आप आज के हमारे मुख्य अतिथि के साथ खड़ी हों, आज के इस कांट्रैक्ट में आपकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है, ठीक कहा न, मिस्टर कुमार?“ सदा के गम्भीर चेयरमैन नारायण आज मुक्तकंठ हॅंस रहे थे।

न चाहते हुए भी अंजू को सुजय के बायीं ओर खड़ा होना पड़ा था। सुजय के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कराहट भी नहीं थी। अपने को बेहद विवश मानते हुए अंजू खड़ी हो गई।

‘स्माइल प्लीज’ के साथ कम्पनी फोटोग्राफर ने कैमरे का बटन दबा दिया। अंजू के चेहरे पर मुस्कराहट की जगह जैसे मातम छाया रहा था।

रात्रि-भोज पर अंजू विशेष रूप् से आमंत्रित थी, पर सिर-दर्द के बहाने के साथ अंजू गेस्ट हाउस में ही रूक गई।

रात करीब ग्यारह-साढ़े ग्यारह बजे फोन की घंटी घनघनाई।

”मिस मेहरोत्रा, आपका टेलीफोन, सॉरी फ़ॉर दि इनकन्वीनियेंस, पर आपके लिए कोई अर्जेण्ट मैसेज है।“

अंजू घबराकर उठ बैठी, न जाने घर से कोई खबर है या…….

”हेलो………. मैं अंजू बोल रही हूँ।“

”देखिए मेरी आवाज सुनते ही फ़ोन नीचे मत रख दीजिएगा। पहचान गई न?“

सुजय की आवाज पहचानना कठिन तो नहीं था।

”आपको अपने लिए इतना कंसर्न देखकर मैंने शादी करने का निर्णय लिया है।“

”टु हेल विद योर निर्णय, मिस्टर सुजय कुमार, इतनी रात गए मुझे डिस्टर्ब करना जरूरी था क्या?“

”आप आज डिनर में क्यों नहीं आई?“

”आपको देखना नहीं चाहती थी बस इसलिए। एनी ऑब्जेक्शन? वैसे भी अपनी जिन्दगी मैं अपने तरीके से जीना चाहती हूँ, मिस्टर कुमार। अपने लिए प्रयुक्त सुजय के शब्द अंजू के दिमाग में झनझना उठे थे।“

”ओह…… शायद मेरी बातें बेहद गम्भीरता से लेती हैं आप वर्ना आज तक यह बात क्यों याद रखतीं?“

”बड़ा गुमान हैं आपको अपने-आप पर? एक बात बता दूँ, मेरे लिए आप के पैसों का जरा भी मोह नहीं है, जिन्हें पैसे से प्यार हो, उन्हीं से फ्लर्ट कीजिए, मिस्टर कुमार। मेरी जिन्दगी में आप जैसों के लिए कोई जगह नहीं, समझे।“

”पैसों से नहीं, मुझसे तो मोह है, अंजू?“

”क्या……. आप होश में तो हैं?“

”तुमसे मिलना चाहता हूँ, अभी इसी वक्त……….।“

”इम्पॉसिबिल।“ फोन अंजू ने लगभग पटक-सा दिया। दिल की धड़कन जोरों से कानों में बज रही थी। यह कैसा पागलपन है। विनीत और सुजय एक तस्वीर के दो पहलू……… एक ने अपने स्वार्थवश उसका परित्याग कर दिया और दूसरा अपने अहं की तुष्टि के लिए उसके पीछे पड़ा है। एक लड़की से अपमानित होने के बाद वह अन्य लड़कियों को अपमानित करना चाहता रहा है। अंजू भी क्या उन्हीं में से एक नहीं? उसकी चाहना कर, सुजय क्या चाहता है?

कमरे के बन्द दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी थी। अंजू को पसीना आ गया। उठकर दरवाजा खोलने की हिम्मत नहीं हुई थी।
 


दरवाजे पर फिर जोर की दस्तक के साथ आवाज आई-

”मैडम, प्लीज दरवाजा खोलिए। मैं होटल-मैनेजर बोल रहा हूँ। बहुत जरूरी बात है।“

कुछ पल शंकित खड़ी अंजू ने अन्ततः दरवाजा खोल दिया।

”मैडम, मिस्टर सुजय कुमार जिस होटल में ठहरे थे वहाँ बम- विस्फोट हुआ है। मिस्टर कुमार ने कुछ देर पहले आपको फ़ोन किया था, होटल- एक्सचेंज से आपका नाम-पता ले, ये इंस्पेक्टर साहब आए हैं।“

”सॉरी मैडम, इस समय आपको तकलीफ़ दी, पर मिस्टर कुमार के बारे में आपसे कुछ जानकारी चाहते हैं। अभी वे अनकांशस हैं। आप उनकी परिचित हैं? उनके घर में किसे खबर दी जानी है, बता सकेंगी?“

”ओह माई गॉड। कैसे हैं वे?“ अंजू के स्वर में बेहद घबराहट थी।

”परेशान न हों, उन्हें हॉस्पिटल भेजा जा चुका है। मिस्टर कुमार आपके रिलेटिव हैं?“

”जी नहीं, उनसे मेरा कोई रिश्ता नहीं।“

”उनकी डायरी में आपका नाम-पता मिला है। होटल की फ़ोन- ऑपरेटर ने बताया- जिस समय विस्फोट हुआ, उससे कुछ क्षण पहले वे फोन पर आपसे बातें कर रहे थे।“

”कल उनका हमारी कम्पनी के साथ एक कांट्रैक्ट हुआ है, वहीं परिचय हुआ था।“ अपनी ही बात अंजू के अपने कानों में खटकने लगी।

”ओह, बस कल-भर की पहचान है, तब तो हमने बेकार आपको परेशान किया।“ इंस्पेक्टर के स्वर में व्यंग्य का पुट था।

”आप मेरी कम्पनी के चेयरमैन मिस्टर नारायण से फ़ोन पर सम्पर्क करें। वे आपको पूरी जानकारी दे सकेंगे।“

”ओ के, मैडम। सॉरी फार दि ट्रबल। गुड नाइट।“ इंस्पेक्टर मुड़कर चला गया था।

इंस्पेक्टर के चले जाने के बाद अंजू कुर्सी पर जा बैठी। मन में भयानक उथल-पुथल हो रही थी। घबराहट में इंस्पेक्टर से यह भी नहीं पूछा वह किस हॉस्पिटल में एडमिट है? न जाने किस हाल में होगा।

”हे भगवान, उसे बचा लेना। अपने वंश का वही एकमात्र वारिस है, उसकी रक्षा करना।“

अनजाने ही अंजू के हाथ जुड़ गए थे। फ़ोन की घंटी ने फिर उसे चैतन्य किया।

”मिस मेहरोत्रा, मिस्टर कुमार होटल में एक बम- ब्लास्ट में घायल हो गए हैं, क्या आप रात हॉस्पिटल में आ सकती हैं? मैं गाड़ी भेज रहा हूँ।“ फ़ोन मिस्टर नारायण का था।

”सर, मिस्टर कुमार की कंडीशन क्या ज्यादा सीरियस है?“

”कुछ कहा नहीं जा सकता, प्लीज आप आ जाएँ, वहीं बात करेंगे।“ अंजू को कुछ और कहने-सुनने का मौका दिए बिना उन्होने फ़ोन रख दिया था।

अंजू का दिल घबरा रहा था, न जाने क्या होने वाला था-किस घड़ी में उसने दिल्ली की यात्रा की थी! ज्ल्दी में सामने पड़ा सलवार-सूट पहन अंजू नीचे रिसेप्शन पर उतर आई। रिसेप्शनिस्ट उसे खोजी निगाहों से ताक रहा था। कुछ देर पहले इंस्पेक्टर द्वारा की गई खोजबीन का उसने न जाने क्या अर्थ निकाला होगा। अपनी घबराहट छिपा अंजू बेहद संयत दिखने का नाटक कर रही थी। कुछ ही देर में उसे गाड़ी पहुँचने की खबर दी गई।

गाड़ी का द्वार खोल, उसके बैठ जाने पर संतरी ने सलाम ठोका था, उसे क्या पता अंजू किस परेशानी में थी।

गनीमत थी रात के उस पहर भी दिल्ली में उतना सन्नाटा नहीं था। कम्पनी की गाड़ी में जाने से किसी तरह का डर न होने पर भी अंजू को पसीना आ रहा था। करीब आधे घंटे बाद, कार हॉस्पिटल के पोर्टिको में जा पहुँची थी। तत्परता से उतरे ड्राइवर ने अंजू के लिए दरवाजा खोला। चेयरमैन के 0पी0एस0 खड़े अंजू की प्रतीक्षा कर रहे थे।

”आइए, मैडम।“

”कैसे हैं मिस्टर कुमार?“ साथ चल रहे मिस्टर जयराज से अंजू ने सवाल किया।

”अभी अनकांशस हैं, कुछ कह पाना कठिन है।“

इंटेसिव केयर यूनिट के सामने गम्भीर मुख चेयरमैन खड़े थे। उस परेशानी में उन्हें अभिवादन करने की भी अंजू को याद नहीं रही। अंजू के परेशान चेहरे पर एक क्षण दृष्टि डाल, उन्होंने सांत्वना-सी दी-

”आई एम सॉरी इस वक्त आपको परेशान करना पड़ा, असल में मिस्टर कुमार की डायरी में आपका नाम व पता था…….इसीलिए ……. आप तो जानती ही हैं, ये पुलिस वाले………….“

”जी सर, होटल में इंस्पेक्टर से बात हो चुकी है।“ अंजू के चेहरे का रंग बदल-सा गया।

”ओह, आई सी। वैसे आप दोनों पहले से परिचित थे?“

”त्रिवेन्द्रम में एक कॉन्फ्रेंस हुई थी, वहीं जान-पहचान हुई थी।“

चेयरमैन की उत्सुकता में डाक्टर ने बाधा डाली- ”मिस्टर कुमार को होश आ गया है। अब चिन्ता की कोई बात नहीं है।“

”थैंक्स गॉड। क्या हम उनसे मिल सकते है।?“

”अच्छा हो सुबह मिल लें, हाँ अंजू कौन हैं? कुछ देर पहले मि0 कुमार उन्हें याद कर रहे थे।“

”अंजू…… ओह शायद मिस मेहरोत्रा यह आपका ही नाम है?“ चेयरमैन ने अंजू की ओर देखा।

”जी… घर में सब अंजू ही पुकारते हैं।“

”मिस्टर कुमार शायद आपसे मिलना चाहें। आप यहाँ विजिटर्स रूम में प्रतीक्षा कर सकती हैं?“ सदय डाक्टर के स्वर में सहानुभूति थी।

”जी ……….कब तक रूकना होगा?“

”आपको तकलीफ तो होगी, पर शायद सुबह हो ही जाए।“

”आप परेशान न हों मिस मेहरोत्रा, मेरी पत्नी आपके साथ रह सकती है। मैं अभी उन्हें गाड़ी भेजकर बुलवा लेता हूँ।“ मिस्टर नारायण अपना फ़र्ज़ निभाने को तत्पर थे।

”नहीं सर, आप उन्हें तकलीफ़ न दें, आप भी घर जाकर थोड़ा रेस्ट लें, मैं यहाँ प्रतीक्षा करूँगी।“

”पर आप यहाँ अकेले मैनेज कर लेंगी?“

”मैनेज करने को हैं ही क्या, सर? डाक्टर और भगवान, दोनों पर भरोसा करना ही इन्सान की नियति है।“

”ठीक है, मैं थोड़ा घर हो आता हूँ। मेरी वाइफ़ हाई ब्लड प्रेशर की पेशेण्ट है। थोड़ी-सी देर में नर्वस हो जाती है। आपके पास नर्मदा को भेज दूँगा। हमारे घर की केयर-टेकर है, बहुत होशियार लड़की है।“

”आप बेकार परेशान हो रहे हैं सर, यहाँ पूरा हॉस्पिटल- स्टाफ़ है, ज़रूरत पड़ने पर आपको फ़ोन कर लूँगी।“

”ओ के मिस मेहरोत्रा, मैंने एस0पी0 से बात कर ली है, अब वे लोग आपको परेशान नहीं करेंगे।“

”थैंक्यू, सर!“ न जाने क्यों अंजू का गला भर-सा आया।

हॉस्पिटल के माहौल से अंजू हमेशा घबराती थी। जब से पापा की मौत अस्पताल में हुई, अंजू को हॉस्पिटल के नाम से दहशत-सी होने लगी थी।

सुजय उसका कोई नहीं, पर यहाँ वह उसकी अपनी बनी बैठी थी। सुजय ने उसे ही पुकारा था। क्यों? मालती दी सुजय को अभागा कहती हैं……….बेचारे के पास सब कुछ होते हुए भी कुछ नही है। उसका दुख-दर्द बाँटने वाला कौन है, अंजू?

”मिसेज मेहरोत्रा……….अंजू जी……“ न जाने कैसे उस टेंशन में भी अंजू को झपकी आ गई थी। आँखें खोलते ही नर्स को देखा था।

”आप शायद सो गई थी। आपके पेशेंट अब पूरी तरह होश में है। आप उनके पास जा सकती हैं, पर उनसे बहुत बात मत कीजिएगा!“

”मेरा जाना क्या ज़रूरी है?“ अचानक अंजू पूछ बैठी।

”आप नहीं तो और कौन जाएगा? आप उनकी वाइफ़ हैं न? वह बार-बार आपको बुलाता था। डरने की कोई बात नहीं है, वह एकदम ठीक है। थोड़ा-सा शॉक था बस…………..। प्रौढ़ा नर्स ने बच्चों की तरह अंजू को सांत्वना दी।“
 
केबिन में सफ़ेद बेड पर सुजय लेटा था। खिड़की से भोर की उजास अन्दर उतर आने को व्याकुल थी। सुजय के क्लान्त मुख पर दृष्टि डालती अंजू ठिठक गई। ढेर-सी ममता उमड़ आई थी………….. कितना अकेला, निस्सहाय शिशु-सा लगा था सुजय।

खिड़की से आए हवा के झोंके ने अंजू का आँचल सुजय के माथे पर लहरा-सा दिया था। मुंदी पलकें आंचल के स्पर्श से हौले खुलीं………….

”तुम………….आप……।“ क्षीण स्वर में सुजय ने कुछ कहना चाहा।

”अब तबियत कैसी है?“

”आपको देखना था सो बच गया।“ हल्की-सी मुस्कराहट बिखरी थी।

”बुरा मान गई ,अंजू?“ अंजू का मौन देख सुजय ने पूछा।

”आपको किसी के अच्छा-बुरा मानने की चिन्ता है?“ नर्स का निर्देश भुला अंजू पूछ बैठी।

”किसी की न सही, तुम्हारी ज़रूर है।“

”इसीलिए मना करने के बावजूद उतनी रात में कार- ड्राइव कर मेरे पास आने को तैयार थे न?“

”उस समय मैं अपने आपे में नहीं रह गया था, अंजू।“

”ऐसी कौन-सी बात हो गई थी, मिस्टर कुमार।“

”मिस्टर कुमार नहीं, सिर्फ जय। उस वक्त इतना अकेला महसूस कर रहा था कि लगा किसी तरह तुम्हारे पास पहुंच जाऊं, वर्ना मेरा दम घुट जाएगा।“

”आपके पास अकेलापन काटने के लिए तो बहुत से उपाय हैं, मिस्टर कुमार।“

”प्लीज अंजू….. मैं बस सुजय बना रहना चाहता हूँ। तुमने कभी अकेलेपन की गूंज सुनी है, अंजू?“

”अकेलेपन में सन्नाटा होता है, गूंज नहीं।“

”नहीं अंजू, तुम नहीं जानतीं। किसी गुम्बद के नीचे खड़ी होकर आवाज दो, वह आवाज तुम तक वापिस आ जाती है न? बस, बिल्कुल उसी तरह मेरे अतीत की गूंजे दुगने ……….. चौगुने शोर के साथ मेरे मानस से इस तरह टकराने लगती हैं कि उन्हें सह पाना कठिन हो जाता है। उस वक्त मुझे एहसास होता है मैं कितना अकेला छूट गया हूँ………। कैसे मुक्ति पाऊं इन आवाजों के शोर से- कैसे…………..?“

”अभी आप आराम कीजिए। डॉक्टर ने आपको बातें करने के लिए मना किया है।“

”मैंने बात अभी की ही कहाँ हैं, अंजू? मन में बातों के इतने बड़े हिमालय खड़े हो गए हैं, आज बोलने दो, अंजू।“

”हिमालय को एक ही दिन में ढहा देना चाहते हैं, पर इतना जान लीजिए, मैं उसके बोझ तले दब तो नहीं जाऊंगी?“ न चाहते भी अंजू ने परिहास कर डाला।

”तुम्हें जरा-सी खरोंच भी लगे, मैं सह नहीं पाऊंगा, यह बात जानती हो, अंजू?“ अनुत्तरित अंजू को पूरी दृष्टि से देखता सुजय गम्भीर हो उठा था।

”तुम्हें बहुत चाहता हूँ, अंजू……..जानना चाहोगी क्यों?“

”मुझे कुछ नहीं जानना है………..आपको आराम करना चाहिए।“

”बहुत दिनों बाद आज अच्छा महसूस कर रहा हूँ।“

”तब तो आपको रोज ऐसे हादसे झेलने चाहिए।“ अंजू हॅंस पड़ी।

”उसके लिए तैयार हूँ, बशर्ते पलंग के पास तुम इसी तरह हॅंसती बैठी रहो।“

”मेरे पास फ़ालतू समय नहीं है, मिस्टर…………“

”सुजय कहना इतना कठिन लगता है, अंजू?“ सुजय जैसे आहत हो गया था।

”बहुत आसान तो नहीं लगता, अन्ततः हम इतने नज़दीक तो नहीं हैं न?“

”तुम मेरे इतनी नजदीक हो अंजू, कि मैं तुमसे दूर रहकर, जी नहीं सकता। मेरे ऊसर मन में ठंडे पानी की बौछार की तरह तुम मेरे जीवन में आई हो, अंजू। मालती दी ने मेरे बारे में सब बताया होगा, पर उन्हें भी जो नहीं बता पाया उस बात को जानती हो?“

”कौन-सी बात?“ अचानक अंजू के मुँह से प्रश्न छलक गया।

”यही कि तुम विनीत से इस कदर आहत होकर भी बेहद संयमित रहीं। मन के झंझावात को अपने ऊपर कभी हावी नहीं होने दिया, जबकि मैंने अपने अपमान को अपने से प्रतिशोध का माध्यम बना लिया। अपमानित होकर अपमान करते जाना मेरी गलती थी। इस सत्य को तुमसे ही जान पाया, अंजू।“

”नारी और पुरूष में अन्तर होता ही है, सुजय- उसके लिए मुझे इतनी इम्पॉर्टेन्स देने वाली कोई बात नहीं है।“ अनायास ही अंजू उसे ‘सुजय’ कह गई थी।

”तुम बहुत मॉडेस्ट हो अंजू, इसीलिए तो तुम मेरी प्रेरणा………….“

”मेरी कमजोरियों को नहीं जानते वर्ना………….“

”तुम्हारी दृढ़ता को अच्छी तरह जाँच-परख चुका हूँ, अंजू। विनीत को भी तुमने जीने का मंत्र दिया है, वर्ना वह आत्महीनता के कॉम्प्लेक्स से कभी न उबर पाता। आज अपनी मेहनत से वह एक बड़े कारोबार का स्वामी बन सका है।“

”आपको कैसे पता?“

”त्रिवेन्द्रम के बाद विनीत से कई बार मिलना हुआ, काम के सिलसिले में हम दोनों अच्छे मित्र बन चुके हैं, अंजू।“

”उसने मेरे बारे में क्या कहा, सुजय?“

”तुम्हारे बारे में कुछ कहने की ज़रूरत नहीं है, अंजू, तुम्हारी तो प्रेजेन्स महसूस की जाती है। पहली बार तुम्हें देखते ही लगा था तुम ओस की बूंद हो।“

“ओस की बूंद मै,वाह क्या उपमा दी है। अंजू हंस पड़ी।

“जानती हो अंजू,बचपन मे मै ओस की बूंदों का दीवाना हुआ करता था। पापा सुबह जल्दी उठा दिया करते थे। उनके साथ गार्डेन मे फूलों पर पड़ी ओस की बूंदें एकदम मोती सी लगा करती थीं और मै उन मोतियों को बटोरता फिरता था।

”ओस की बूंदों को बटोरने की कल्पना ही यूनीक है, सुजय हाथ में न आने पर रोते होंगे न?“

”जीवन-भर जो पाना चाहता था- पा गया……। तुम मिल गई।“

”अपने बारे में इकतरफा निर्णय लेने का अधिकार मैंने किसी को नहीं दिया है, सुजय……….।“ अंजू को सुजय की लिखी पंक्ति याद आ गई थी……. अपने जीवन में दखलअंदाजी का अधिकार मैंने किसी को नहीं दिया है।

”तुम मुझे बहुत चाहती हो ,अंजू, यह बात मैं दावे के साथ कह सकता हूँ।“

”जिससे ठीक से परिचय भी नहीं, उसे मैं चाहने लगूँगी………यह कोई फ़िल्मी कहानी नहीं है, सुजय।“

”तुम इस वक्त मेरे पास हो, क्या यह सच नहीं?“

”यह मेरी मज़बूरी थी………….।“

”तुम इसे टाल सकती थीं।“

”मानवता के नाते क्या वह ठीक होता?“

”नहीं अंजू, अपने को झूठलाने की कोशिश मत करो। उस दिन होटल में मेरे साथ उस लड़की को देख तुम क्या सामान्य रह पाई थीं? सच तो मैं उसी दिन जान गया था………. फिर जब मालती दी का खत मिला तो कन्फ़र्म हो गया।“

”आप अपने निर्णय लेने को स्वतंत्र हैं और मैं अपने निर्णय के लिए स्वतंत्र हूँ। नदी के किनारों में से क्या चाहकर भी एक किनारा दूसरे तक पहुंच सकता हैं?“

”किनारे साथ-साथ चल तो सकते हैं – क्या जीने के लिए इतना ही काफ़ी नहीं? तुमसे बहुत-सा नही, पर थोड़ा-सा प्यार ज़रूर चाहूँगा, अंजू, मिलेगा न?“ एक जोड़ी मुग्ध आँखें अपने ऊपर गड़ी पा, अंजू संकुचित हो उठी।

”जीवन में न जाने कितनों का साथ चाहे-अनचाहे मिल जाता है। अब आप ठीक हैं, मुझे चलना चाहिए।“

सुजय की ओर दृष्टि डाले बिना अंजू उठ खड़ी हुई थी। सामने खड़ी टैक्सी ले, अंजू गेस्ट हाउस पहुंच गई थी। जल्दी-जल्दी सामान समेट चेयरमैन को फ़ोन मिलाया-

”सर, मिस्टर कुमार अब ठीक हैं, घर से फोन आया है, मुझे फौरन लौटना होगा।“

”एनीथिंग सीरियस, मिस मेहरोत्रा?“

”नहीं सर, माँ की तबीयत खराब हैं, घर में भाभी अकेली है, इसीलिए जाना ज़रूरी है।“

”ठीक हैं, मैं गाड़ी भेज रहा हूँ। फ्लाइट टिकट की बुकिंग है?“

”मैं एयरपोर्ट पर ही ट्राई कर लूँगी सर, लखनऊ के लिए ज्यादा रश नहीं होता………..।“

”मैं दयाल से कह देता हूँ वह टिकट अरेंज कर देगा। टेक केयर ऑफ योरसेल्फ़ एण्ड थैंक्स फ़ॉर एवरीथिंग यू डिड फ़ॉर दि ऑफिस।“

”थैंक्स सर, वह तो मेरी ड्यूटी है।“

एयरपोर्ट पर मिस्टर दयाल उसके टिकट के साथ खड़े मिले थे। प्लेन में बोर्ड करने के बाद अचानक अंजू को लगा वह बहुत थक गई है। पिछले दो दिन ऑफिस की कड़ी ड्यूटी, फिर कल की पूरी रात जिस टेंशन में गुजरी उसने अंजू को पूरी तरह थका दिया था। आँखें बंद कर अंजू ने सिर पीछे टिका दिया।

आज सुबह की सुजय की बातें फिर जी उठी थीं। अंजू की किस्मत में क्या ऐसे ही पुरूष हैं जो किसी से टूट उसके आँचल में सिर छिपाना चाहते है? विनीत ने उसे चाहा, फिर स्वयं ही छोड़ दिया, पत्नी के व्यवहार से उसके अहं को चोट लगी तो फिर उसकी ओर मुड़ना चाहा। सुजय उससे पहले मिला होता तो क्या उसे पसंद करती? मालती दी का कहना है क्या नहीं है उसके पास, पर फिर भी बेहद अकेला हैं, उदास है। वैसे नापसंद करने लायक तो सुजय में सचमुच कुछ नहीं है, पर मोनिका उसकी प्रथम चाहत थी, यह बात अंजू के गले से नीचे नहीं उतरती। नहीं, वह किसी का विकल्प नहीं बन सकती। शायद उसकी किस्मत में विवाह का योग ही नहीं है। वर्ना विनीत क्यों उसके जीवन से जाता?
 
आठ

घर पहुँचने पर भी अंजू बेचैन-सी थी। न जाने कौन-सी अशांति उसे घेरे हुए थी। अम्मा, भाभी दोनों ठीक थीं, पर अम्मा उसका उतरा मुँह देख आश्वस्त नहीं हो पा रही थीं।

”क्या बात है अंजू, ऐसा चेहरा क्यों उतरा हुआ है तेरा? हजार बार कहा, इतनी मेहनत न किया कर। तू किसी की सुने तब न?“

”अच्छी-भली हूँ अम्मा, तुम्हें तो हमेशा कमजोर ही दिखती हूँ। भइया की चिट्ठी आई है?“

”तेरे जाने वाले दिन ही तो आई थी………उतनी दूर से क्या रोज-रोज चिट्ठी आती है? भगवान उसे अच्छा रखे।“ अम्मा ने उसाँस ली।

शाम को पूनम ने उसे पकड़ा-

”सच कह अंजू, क्या बात है? इस तरह बुझी हुई तू कभी नहीं थी।“

”कोई बात नहीं है, भाभी……………..“

”हम दोनों एक-दूसरे का बहुत अच्छी तरह जानते हैं न, अंजू, मैं गलती नहीं कर रही हूँ, तू कुछ परेशान ज़रूर है।“

”तुम्हीं बताओं भाभी, क्या मेरी नियति में केवल किसी का विकल्प बनना ही लिखा है? क्या कोई सिर्फ मुझे नहीं चाह सकता? क्या जरूरी है किसी की तुलना में मैं जब भारी पड़ूं तभी दूसरों को मेरे गुण दिखाई पड़े?“

”किसकी बात कर रही है, अंजू? साफ़-साफ़ बताए बिना न्याय कर पाना कठिन है।“

पूरी बात बताते अंजू कहीं अटकी नहीं थी। पूनम के साथ उसका रिश्ता भाभी और ननद का नहीं, दो सहेलियों का था। बात सुनने के बाद पूनम गम्भीर हो आई।

”एक बात बता अंजू, तू जैसा सोच रही है, कोई दूसरा क्या वैसा ही नहीं सोच सकता?“

”मतलब?“

”यही कि तू भी तो पहले विनीत से कहीं गहराई से जुड़ी रह चुकी है……..“

”ठीक कहती हो भाभी, पर वह बात तो तब होती न, जब मैं विनीत की तुलना में सुजय को ज्यादा पसंद करती? मेरे साथ तो वैसी बात नहीं है, शायद आज भी विनीत को पूरी तरह नहीं भुला सकी हूँ ,भाभी।“

”मतलब तुम आज भी विनीत को ही पसंद करती हो।“

”मैंने ऐसा तो नहीं कहा।“

”तुम्हारा और क्या मतलब था?“ सीधी-सी बात है, मन को जब कोई इतना अच्छा लगने लगे कि उसके सिवा और कुछ चाहना ही शेष न रहे तो बस उसे ही स्वीकार करना चाहिए। इसमें तर्क-वितर्क का स्थान नहीं रहता, अंजू।“

”जिस दिन मुझे ऐसा लगेगा, जरूर बताऊंगी।“

”वह दिन दूर नहीं अंजू, यह मेरा अनुभव कह रहा है।“ पूनम का चेहरा दमक उठा।

”ओह बहुत एक्सपीरिएंस्ड हो गई है न? यह तो बताओं भइया के क्या हाल हैं, कहीं किसी अमेरिकन लड़की के प्रेम-वेम में तो नहीं फंस गए हैं? “ अंजू के चेहरे पर शरारत छा गई।

”धत्त, प्रेम में शक नहीं किया जाता, विश्वास होता है और इसी विश्वास के सहारे इतनी दूर रहकर भी हम इतने पास हैं।“

पास रखे फोन की घंटी बज उठी। अंजू ने फोन उठाया।

”हलो……….।“

”कैसी हो, अंजू? बहुत याद आ रही हो। जी नहीं माना इसलिए कॉल कर लिया, होप यू डोन्ट माइन्ड इट।“

”इट्स ओ के । कोई खास बात?“

”इससे खास बात और क्या होगी कि तुम्हें अपने बेहद पास पा रहा हूँ। अब तो हर पल तुम्हारी याद मेरे साथ रहती है, अंजू।“

”थैंक्स।“ अंजू ने फोन पटक-सा दिया। माथे पर पसीना चमक उठा।

”किसका फोन था, अंजू?“

”ऑफिस से…………..।“

”इस वक्त वहाँ कौन बैठा होगा?“ पूनम के स्वर में शंका थी।

”ऑफिस वालों के घर में भी तो फोन हो सकता है, भाभी।“

”हाँ, यह बात तो भूल ही गई थी, घर में रहते लोगों को काम की बातें ज्यादा याद आती है।“ पूनम ने हल्के से मजाक कर डाला।

”चलती हूँ भाभी, जोरों की नींद आ रही है।“

”वैसे इस फोन के बाद सो पाओगी, इसमें मुझे शक है, अंजू रानी।“

”शक की दवा तो हकीम लुकमान के पास नहीं है, भाभी।“

सचमुच बिस्तर पर लेटी अंजू से नींद कोसों दूर थी। सुजय की बातें बार-बार याद आ रही थीं। क्या वह भी सुजय को चाहने लगी है? इस वक्त सुजय क्या कर रहा होगा? शायद अकेलेपन के एहसास ने उससे वह फ़ोन करा दिया। वैसे उसका और सुजय का क्या नाता था? न जाने क्यों उससे मिलना हो गया? वह सुजय से क्यों चिढ़ती है, क्या सिर्फ़ इसलिए कि उसने कभी मोनिका को चाहा था ………विनीत की चाहना अंजू ने भी तो की थी फिर……? फिर विनीत…… सचमुच अंजू हद करती है, विनीत आज भी उसे याद है।

उधेड़बुन में न जाने कब आँख लगी थी। सुबह अम्मा ने आवाज देकर उठाया-

”आज ऑफिस नहीं जाना है अंजू, क्या जी अच्छा नहीं है, बिटिया?“

”नहीं अम्मा, रात देर तक जागती रही, सुबह आँख लग गई थी।“

जल्दी-जल्दी तैयार हो अंजू बाहर निकली, पूनम का फ़र्स्ट पीरियड था, वह पहले ही निकल गई थी। ऑफिस पहुँचने में पन्द्रह मिनट लग जाते थे। कई बार सोचा, कार खरीद ले, ऑफिस से एडवांस भी मिल सकता था, पर भइया के पास कार नहीं, स्कूटर था, इसीलिए अंजू हमेशा कार खरीदने की बात टालती आई है। इस बार स्टेट्स से लौटने पर शायद भइया कार खरीद सकें, उसके बाद ही अंजू अपनी कार की बात सोचेगी। ऑटो या बस से जाने पर कुछ लोग पीठ पीछे उसे कंजूस की संज्ञा देते हैं, इस तथ्य से अंजू अनभिज्ञ नहीं थी।

‘कंजूस’ की संज्ञा सोच, अंजू के होंठों पर हल्की-सी मुस्कान आ गई।

”क्या बात है मिस मेहरोत्रा, आप अकारण ही तो नहीं मुस्करातीं। कोई अच्छी खबर?“ पास बैठे मिस्टर गुप्ता ने परिहास किया।

”कभी-कभी किसी की मूर्खता की बात सोचकर भी तो मुस्कराया जा सकता है, गुप्ता जी।“ अंजू अब हॅंस रही थी।

”मेरी मूर्खता पर तो आप नहीं हॅंस रही हैं, मिस मेहरोत्रा।“

”मिस मेहरोत्रा को जो कहना था कह दिया, बाकी बात अपनी-अपनी समझ की है, गुप्ता जी।“ मुँहफट मिसेज मीरचंदानी ने गुप्ता को निरूत्तर कर दिया।

”चलिए कारण जो भी रहा हो मिस मेहरोत्रा की ओर से आज चाय के साथ गर्मागर्म पकौड़ियाँ हो जाएँ।“ नितीश रंजन ने सुझाव दिया।

”वाह, यह जुर्माना मेरे ही सिर क्यों?“

”क्योंकि आज न जाने कितने दिनों बाद आपके चेहरे पर हॅंसी जो आई है, मैडम।“ नितीश हमेशा अंजू से बेधड़क बातें कर लिया करता था। उम्र में अंजू से दो-चार साल छोटा वह लड़का अंजू को कभी मैडम, कभी दीदी पुकार, उसका काफ़ी अपना-सा बन गया था। नितीश की बात पर अंजू जोरों से हॅंस पड़ी।

”ठीक है आज बिना किसी कारण चाय-पकौड़ी का जुर्माना मैं ही भर देती हूँ।“

हॅंसी-मजाक के बीच सब कुछ बेहद सहज व सामान्य-सा लग रहा था। अम्मा और भीभी के साथ शॉपिंग का मूड बनाती अंजू बहुत खुश घर लौटी थी। पर पहुंचते ही अम्मा ने कोरियर से भेजा खत थमा दिया । पत्र की लिखाई मालती दी जैसी लग रही थी। पत्र पढ़ती अंजू के चेहरे का बदलता रंग देख अम्माँ शंकित हो उठी।

”किसका खत है, अंजू? कोई बुरी खबर तो नही…… कहाँ से आया है यह खत?“ जब से भइया अमेरिका गए थे, अम्मा हर पत्र को लेकर डरी ही रहती थीं।

”कोई खास बात नहीं है अम्मा, मालती दी का पत्र है, अपने हालचाल लिखे हैं। और हाँ, आज सिर बहुत दर्द कर रहा है, थोड़ा सोऊंगी। मुझे खाने के लिए मत जगाना ऑफिस में पार्टी थी, भरपेट खाकर आई हूँ।“

”कोई दवा ले ले अंजू, यह रोज-रोज की बीमारी अच्छी नहीं…….“

”थोड़ा सोने से ही ठीक हो जाएगा, तुम परेशान मत हो अम्मा।“

अम्मा को और अधिक बात करने का अवसर न दे, अंजू ने कमरे का दरवाजा अन्दर से बन्द कर लिया।

दिल्ली से मालती दी ने लिखा था-

“अचानक सुजय के सेक्रेटरी का फोन पाकर सिन्हा साहब के साथ दिल्ली भागी आई हूँ। सुजय को माइल्ड स्ट्रोक पड़ा है। अपनो में उसका है ही कौन, सो मुझे ही याद किया था।

अब वह ठीक है खतरा तो टल गया, पर छह हफ्ते अस्पताल में रहना पड़ेगा। मेरे ख्याल में उसकी इस हालत के लिए उसका अकेलापन ही जिम्मेदार है। कल सुजय से हॅंसी में कहा, ”अंजू को भी बुला लेते हैं, उसके साथ कम्पनी बढ़िया हो जाएगी तो जैसे वह परेशान-सा हो उठा। कहने लगा-

”नहीं-नहीं, मिस मेहरोत्रा को पहले ही कई रातें जगा चुका हूं, अब उनको और तकलीफ़ देना अन्याय होगा। उन्हें कतई यह खबर मत दीजिएगा, मालती दी।“

”उसकी आवाज में न जाने कैसा दर्द था अंजू, मैं समझ नहीं सकी। तुम दोनों के बीच क्या घटा- क्या हुआ जानने का हक मुझे नहीं, पर सुजय तुझे बेहद चाहता है, यह बात मेरी अनुभवी आँखों ने पकड़ ली है। तुझे यह खबर न देना मुझे अपनी गलती लगती, इसलिए लिख रही हूँ, पर यहाँ आने न आने का निर्णय तेरा अपना होगा।“

मैं यहाँ एक सप्ताह और रूकूंगी, मीनू को उसकी दादी के पास छोड़ आई हूँ अतः सिन्हा साहब कल जा रहे हैं। एक बात बताऊं अंजू, लगता है आशीष की बात अब इन्हें परेशान नहीं करती। उनकी इस उदारता ने मुझे उनके बहुत नज़दीक कर दिया है, अंजू। मेरा अतीत मुझे नहीं सताता। हम दोनों खुश हैं।

प्यार सहित,

तेरी

मालती दी

हॉस्पिटल में पड़े सुजय का क्लान्त चेहरा अंजू को व्याकुल किए दे रहा था। अन्ततः अकेलेपन की गूंज सुजय पर हावी हो गई थी।
 


उस रात इतने बड़े हादसे के बाद भी बातें करता सुजय कितना सहज लग रहा था। दुर्घटना से बच निकलने पर भी उसका सदमा काफी देर तक छाया रहता है, पर सुजय के चेहरे पर उसका नामोनिशान भी नहीं था। अंजू से परिहास करता सुजय अंजू के साथ अकेला नहीं था। मालती दी क्या उसका अकेलापन बाँट पाएँगी? त्रिवेन्द्रम से लौटने के बाद शायद सुजय उनसे अक्सर मिलता रहा है, तभी तो उन पर इतना अधिकार मानता है वह। मालती दी ने निर्णय उस पर छोड़ दिया है, क्या वह जा सकेगी? बेहद बेचैनी में पूरी रात काट अंजू बहुत सुबह उठ गई थी।

चाय पीती पूनम उसके गम्भीर चेहरे को देख्चौं गई।

”क्या बात है, अंजू? तबियत खराब है क्या?“

अंजू ने मालती दी का पत्र पूनम को थमा दिया। खत पूरा पढ़ पूनम ने अंजू को देख पूछा-

”क्या सोच रही हो अंजू? कहो तो मैं भी साथ चलूँ?“

”किसलिए?“

”क्योंकि उसे तुम्हारी जरूरत है।“

”नहीं भाभी, अगर इस समय पहुंची तो यह प्यार नहीं, सहानुभूति समझी जाएगी। सुजय मेरी सहानुभूति या दया का पात्र नहीं है, उसे यह अकेले ही झेलना होगा।“

”अगर न झेल सका तो?“

”तो जो झेलना होगा, मैं झेलूंगी। मुझे कायर पुरूष कभी अच्छे नहीं लगे, भाभी। मुझे खुशी है इस ज़रूरत के समय उसने मुझे नहीं बुलाया।“

”तेरी तो फ़िलासफी ही समझ में नहीं आती। ज़रूरत के वक्त आदमी अपनों को ही तो याद करता है, बुलाता है।“

नहीं भाभी, अगर इस वक्त मुझे बुलाता तो मैं दबाव में जाती, ठीक से सोचने-समझने की शक्ति नहीं रहती। उसने इसके लिए मुझे समय दिया है भाभी, मैं सोचकर निर्णय ले सकूं।“

”तेरी बातें तू ही जाने। आज तेरे भइया को पत्र लिख रही हूँ, सुजय के बारे में लिख दूँ।“

”प्लीज भाभी, यह गलती मत करना। सुजय को लेकर कोई सपने मत बुनना…………. भइया को कुछ नहीं लिखना वर्ना……….।“

”ठीक है भई जब तुम आज्ञा दोगी तभी लिखूँगी, पर एक बीमार को जल्दी अच्छे होने की कामना के साथ कार्ड तो भेजा जा सकता है या उसमें भी कोई बाधा है?“

”बाधा तो कहीं कोई नहीं है, देखूँगी।“

ऑफिस जाने के पहले अंजू ने एक सुन्दर-सा कार्ड सुजय के नाम पोस्ट किया था। अन्त में एक पंक्ति जोड़ी थी-

”मृत्युंजय बनकर सदैव जय पाएं। – अंजू“

पूरे मन से अंजू सुजय के लिए प्रार्थना करती रही थी। अम्मा ने अपने कमरे में जब भगवान की प्रतिमा स्थापित की थी, उस समय अंजू ने उनकी कितनी हॅंसी उड़ाई थी-

”वाह, यह खूब रही। अम्मा ने भगवान को अपने कमरे में कैद कर लिया, अब हम बाकी लोगों की पुकार उन तक कैसे पहुंचेगी।“

”छिः, जो मुंह में आया बोल देती है। भगवान तो अन्तर्यामी हैं, हर जगह रहते हैं तभी तो हर भक्त की पुकार आसानी से सुन पाते हैं।“

अम्मा के सामने अंजू ने कभी उनके भगवान के आगे सिर नहीं नवाया था। सुजय की बीमारी की बात जान, अम्मा की आँख बचा, अंजू रोज भगवान के सामने शीश नवाती, सुजय की लम्बी उम्र की प्रार्थना कर आती। सुबह सबके सोकर उठने के पहले बगीचे से सबसे ताजा गुलाब तोड़ भगवान को अर्पित करती थी। अम्मा ने कहा भी-

”लगता है आजकल पूनम बहुत जल्दी उठ जाती है। रोज भगवान की पूजा-अर्चना करती है। मेरा अतुल जल्दी आ जाए, भगवान दोनों को सुखी रखें।“

एक सप्ताह बाद एक नीला लिफाफा आया था-

”तुम्हारी एक पंक्ति ने जो कमाल कर दिखाया उससे डॉक्टर भी ताज्जुब में पड़ गए हैं। इतना हल्का, इतना पूर्ण अपने को कभी नहीं पाया। कब मिल रही हो, बहुत इंतजार है-सुजय।“

अंजू पत्र पढ़ मुस्करा उठी थी। नहीं, वह नहीं जाएगी, अब तो सुजय को ही आना होगा। पूनम भाभी सब सुन गम्भीर हो उठी थीं-

”दिल के मरीज से शादी करने का तेरा निर्णय क्या ठीक है, अंजू?“

”अगर शादी के बाद ऐसा होता तो?“

”वो बात और होती…………“

”मेरे लिए अब कोई बात बाधा नहीं बन सकती, भाभी। इन पिछले कुछ दिनों में अपने मन को अच्छी तरह जान गई हूँ। सुजय को मेरी ज़रूरत है………“

”और तुझे?“

”मैं भी शायद उसके साथ पूर्ण हो सकूं।“

”कोई निर्णय लेने के पहले अपने भइया की राय ले लेती अंजू, तो अच्छा होता।“

”भइया मेरे निर्णय को जरूर स्वीकार करेंगे भाभी, तुम चाहो तो उन्हें लिख देना…………“

अंजू दिल्ली नहीं गई, पर सुजय को लिख दिया था, पूर्ण स्वस्थ होने पर उसे लखनऊ जल्दी आना होगा।

”क्या इस दिल के दौरे के बाद उसका सफ़र करना कठिन होगा, अंजू?“ पूनम ने शंका प्रकट की।

”सुजय ने आज तक अपना जीवन किसी न किसी कांप्लेक्स के साथ काटा है, मैं नहीं चाहती अब यह बीमारी उस पर हावी हो जाए, भाभी।“

”पर शारीरिक कष्ट की उपेक्षा करना क्या ठीक होगा?“

”मैं चाहती हूँ वह अपने आत्मविश्वास को न खोए, मैं उसकी सहधर्मिणी बनना चाहूँगी, उसकी अभिभाविका नहीं, इसलिए जरूरी है वह अपने-आप में समर्थ, पूर्ण पुरूष बने। वही मैंने लिख दिया है।“

”वाह, क्या बात है, लगता है तेरे तर्को के आगे मेडिकल साइंस भी परास्त हो जाएगी।“

”मुझे विश्वास है………।“ बस इतना ही कहा था अंजू ने।

अतुल को बीस फ़रवरी को वापिस आना था। पूरे घर में उत्साह की लहर दौड़ गई थी। पूनम का चेहरा जगमगा रहा था। अम्मा ने भइया के मन के पकवान बनाने शुरू कर दिए थे। अंजू अम्माँ को चिढ़ाती-

”अम्माँ, ये पकवान किसके लिए बन रहे हैं? इतने दिन अमेरिका में रहने के बाद भइया को तुम्हारे ये देशी व्यंजन पचेंगे? पेट खराब हो जाएगा बेचारे का।“

”तू चुप रह, क्या अपनी माटी से इतनी जल्दी नाता टूट जाता है?“

पूनम को प्रतीक्षा की घड़ियाँ काटनी कठिन लग रही थीं।

”अब ये दो रातें कैसे कटेंगी भाभी? ऐसा करो कल की फ्लाइट से दिल्ली चली जाओ। अकेले में कुछ समय तो पा सकोगी वर्ना यहाँ अम्मा ने पूरे मोहल्ले को दावत दे रखी है। कल दोनों दीदियाँ भी तो सपरिवार आ रही हैं।“ अंजू ने पूनम को चिढ़ाया।

”टिकट मॅंगा दो, जरूर चली जाऊंगी।“

शाम को अंजू ने पूनम के हाथ में जब प्लेन का टिकट रखा तो वह चौंक गई-

”यह क्या? मैंने तो मजाक किया था, इसे लौटा दो।“

”लौटाने के लिए इतनी परेशानी थोड़ी झेलती। जानती हो इस टिकट के लिए निशीथ को रिश्वत देनी पड़ी, तब जाकर ओ के टिकट मिल सका है। अब तो तुम्हें जाना ही है, सुजय तुम्हें रिसीव करने का इंतजाम कर देगा।“

”अम्मा जी क्या कहेंगी, ऐसी भी क्या बेताबी, मैं नहीं जाऊंगी।“ पूनम नवोढ़ा-सी लजा उठी थी।

”वाह, अच्छी कही, मेरा पैसा यूँ ही पानी में जाएगा। अम्मा की तुम मुझ पर छोड़ो और जल्दी से भइया की पसंद की साडियाँ पैक कर डालो, समझीं।“

”अंजू…..तुम कितनी अच्छी हो, थैंक्स अंजू।“ भावातिरेक के कारण पूनम की आँखें छलछला आई।

”तुम वापिस लौटने की जल्दी मत करना भाभी, अम्मा को मैं सॅंभाल लूँगी।“

”अम्मा जी बेटे के लिए कितनी व्यग्र हैं, अंजू, इस समय देर करना मुझे संभव नहीं होगा।“

अम्मा की समझ में नहीं आ रहा था दो दिन बाद बेटा स्वंय आ रहा है, फिर बहू को जाने की क्या ज़रूरत थी? अंजू ने समझाया-

”अगर भइया साथ में अमेरिकन बहू लाएँगे तो भाभी ही तो उसे वापिस भेज पाएगी ,अम्मा। तुम्हें तो उसकी गिटर-पिटर समझ में आने से रही।“

”धत्त, कैसी अपशकुनी बातें करती है अंजू, मेरा बेटा वैसा नहीं है।“

”तुम्हारा बेटा कैसा है वो तो उसके वापिस आने पर ही पता लगेगा।“

रात में दिल्ली से पूनम का फ़ोन आया-

”अंजू, तू सचमुच बहुत खुशकिस्मत है। बाप रे यह घर है या महल और तेरे सुजय तो एकदम ग्रीक देवता हैं। मुझे लेने खुद एयरपोर्ट पहुँचे थे। इत्ती खातिर कर रहे हैं कि बस पूछ मत।“

”केवल धन-सम्पत्ति ही सौभाग्य नहीं बनाते, भाभी। तुम्हें भइया जितना चाहते हैं उसके आगे धन क्या ठहर सकता है।“

”अच्छा जी, बस आपके भइया ही हमें चाहते हैं, हम उन्हें कम चाहते हैं क्या?“

”नहीं भाभी, तुमने भइया के लिए जो किया है, उसके लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं। इस वक्त क्या कर रही हो?“

”सुजय जी के साथ बातें कर रहे थे, उन्हीं का सुझाव था तुम्हें फ़ोन करूँ। लो उनसे बातें कर लो।“

अंजू के प्रतिवाद के पहले ही फोन सुजय को थमा दिया गया था।

”कैसी हो, अंजू?“

उस परिचित स्वर को सुन अंजू जैसे खो गई थी।

”अंजू, मुझे सुन पा रही हो न?“

”जी… आप कैसे हैं?“

”‘तुम’ से मैं ‘आप’ कैसे हो गया?“

”पूनम भाभी ज्यादा तंग तो नहीं कर रही हैं, जय?“

”पूनम किसी को तंग कर सकती हैं, यह सोचना भी गलत है, अंजू। बहुत भाग्यशाली हैं तुम्हारे भइया।“

”ओह, मैं ही खराब हूँ न?“ हल्की-सी ईर्षा स्वर में बज उठी थी।

”तुम क्या हो, मिलने पर बताऊंगा। तुम क्यों नहीं आई, अंजू?“

”कैसे आती, तुमने बुलाया ही नहीं।“

”जब बुलाऊंगा, आओगी, अंजू?“

”बुलाकर देख लो, जय।“

”मेरा रोम-रोम हर पल तुम्हें बुलाता है, सुन पाती हो अंजू!“

”पता नहीं…….।“ अपने ऊपर अंजू नियत्रंण खोती जा रही थी। सुजय की बाणी उसे अवश बनाए दे रही थी। विनीत के साथ उसने अपने को कभी ऐसा अवश महसूस नहीं किया।

”अब तुम्हारे बिना रहना संभव नहीं, कल भइया के आने पर सब तय कर लूंगा। अब सो जाओ, पर एक शर्त है, तुम्हारे सपनों में मुझे ही आना चाहिए। मंजूर है न?“

”मंजूर करती हूँ बशर्ते आपके सपनों में मेरे अलावा कोई मोना-सोना, लीना-टीना न आए।“

”बस, इतने ही नाम याद हैं, जानतीं नहीं कितना बदनाम रहा हूँ।“

”इसमें क्या शक, मैं खुद साक्षी हूँ……….।“

”अब जय जी को सोने दोगी या पूरी रातें बातें की जाएँगी। भई कुछ आगे के लिए भी तो छोड़ दो।“ पूनम का परिहास से खनकता स्वर सुनाई दिया।

”क्या बात है भाभी, कुछ ही देर में तुम्हारी तो आवाज ही बदल गई है। खराब कम्पनी का इतनी जल्दी असर होते आज ही देखा है। एकदम वैम्प बन गई हो।“

”अब आगे-आगे देखिए होता है क्या। जलन हो रही है क्या?“

”छिः, फिर उल्टी-सीधी बातें कर रही हो। आने दो भइया को कह दूंगी सॅंभाल के रखें, बहुत पर निकल आए हैं हमारी भाभीजान के।“

”देखना है कौन किसके पर कतरता है।“ पूनम खिलखिला के हॅंस पड़ी।

अम्मा को भइया की एक दिन ज्यादा प्रतीक्षा करना भारी पड़ रहा था।

”ऐसा क्या काम पड़ गया अतुल को जो आज नहीं आ रहा है। बहू को तो सोचना था हम सब इंतजार कर रहे हैं।“

”अम्मा, जहाँ इतने दिन इंतजार किया दो-एक दिन और सही समझ लो उन्हें कल ही आना था।“
 


अंजू समझती थी घर आने पर अम्मा के लिहाज में उसके संकोची भइया भाभी से बात करने में भी कतराएँगे। इतने दिनों की न जाने कितनी बातें इकट्ठी हो गई होंगी। अच्छा हुआ अंजू ने पूनम को जबरन दिल्ली भेज दिया।

दोनों बहिनें बच्चों सहित आ गई थीं। अतुल भइया के लाए उपहारों पर उनका भी तो अधिकार था। कम-से-कम पूनम भाभी की चीजें तो अब उनके हिस्से में आएँगी वर्ना दोनों बड़ी बहिनें अच्छी चीजें सबसे पहले हथिया लेतीं। उन सबके आ जाने से अम्मा व्यस्त हो उठी थीं। अंजू मौसी को घेरे बच्चे अपनी-अपनी फ़र्माइशें करते जा रहे थे।

”अम्मा, अब तो अंजू की शादी कर दो वर्ना यूँ ही बुढ़ा जाएगी।“ रेवा दीदी ने अंजू की ओर प्यार-भरी दृष्टि डालते हुए कहा।

”मेरी सुने तब न? इसके पापा ने इसे सिर चढ़ा ऐसा बिगाड़ दिया कि अपने सामने किसी को कुछ समझती ही नहीं।“

”अगर अब शादी न की तो पछताएगी। दो-चार साल बाद कोई नहीं पूछेगा।“ माला दीदी ने हाँ में हाँ मिलाई।

रेवा दीदी का बड़ा बेटा गौतम बाहर से हाँफता दौड़ा आया-

”मम्मी, जरा बाहर आकर तो देखो, कित्ती बड़ी मोटर कार आई है।“

”अरे कौन आया है, कहीं अतुल ही तो नहीं आ गया।“ अम्मा के पीछे दोनों बहिनें और अंजू बाहर आ गई।

सफ़ेद कार से उतरा विनीत ऊपर आने के लिए सीढ़ियाँ चढ़ रहा था। हल्के ग्रे सूट में उसका गोरा रंग और भी उजला दिख रहा था। उस व्यक्तित्व में अम्मा विनीत को नहीं पहचान सकी थीं। दोनों बड़ी बहिनें मुग्ध दृष्टि से आगन्तुक को ताक रही थीं।

”अम्मा जी, प्रणाम, मुझे नहीं पहचाना?“

अम्मा की चरण- धूलि ले विनीत ने अंजू की ओर देखा।

”चेहरा तो कुछ पहचाना-सा लग रहा है पर अब याददाश्त धोखा दे गई है, कौन हो बेटा? अन्दर आओ।“

सबके साथ विनीत ड्राइंग रूम में आ गया। अंजू के चेहरे के भाव पढ़ पाना मुश्किल था।

”अम्मा जी, आपका अपराधी हूँ मैं, क्षमा माँगने का भी साहस नहीं, पर आपकी माफ़ी नहीं मिली तो मैं शांति न पा सकूंगा।“

”कौन हो बेटा….. मेरी माफ़ी……..मैं कुछ समझ नहीं पा रही हूँ।“

”मैं विनीत हूँ अम्मा जी।“

”विनीत………..मेहता साहब के बेटे हो न?“ कुछ देर पहले अम्मा के चेहरे पर जो वात्सल्य छाया हुआ था, अचानक रूखाई में बदल गया।

”जी…….वही विनीत हूँ।“

”माफ़ी की याद कैसे आ गई, विनीत? तुम्हारे कारण हमने कितने दुख झेले, बता नहीं सकती। अंजू के पापा को तो वही ग़म खा गया।“ अम्मा ने आँचल से आँसू पोंछ डाले।

”अब उन बातों का कोई प्रयोजन नहीं रहा, कृपया उस विषय में बात न करें।“ अंजू ने दृढ़ता से कहा।

”जानता हूँ मैंने अक्षम्य अपराध किया है, पर गलती इन्सान से होती है अंजलि, मैं अपने अपराध का दण्ड भुगतने को तैयार हूँ।“

”आपकी इन बातों से हमें ज्यादा तकलीफ़ हो रही है, मिस्टर खन्ना।“

”विनीत खन्ना को हमेशा के लिए छोड़ चुका हूँ, अंजलि। अब मैं विनीत मेहता हूं।“

”विनीत खन्ना से विनीत मेहता बनने के लिए बधाई दे सकती हूँ, पर इस परिवर्तन से हमें कोई फ़र्क नहीं पड़ने वाला, मिस्टर मेहता।“

”अब चुप भी कर अंजलि, इतनी दूर से ये अम्मा के पास आए हैं, तेरे पास नहीं समझी। माला, चाय तू लाएगी या मैं जाऊं?“ रेवा दीदी ने अपना बड़प्पन झाड़ा।

”तुम बैठो दीदी, चाय मैं ही लाती हूँ।“ तेजी से मुड़कर अंजू किचेन में चली गई।

किचेन में उसका हृदय जोर-जोर से धड़क रहा था। सुजय ने कहा था मैंने विनीत को जीने का मंत्र दिया है…………कैसे ………. क्यों आया है विनीत? अपने को प्रकृतिस्थ कर अंजू ट्रे में चाय और बिस्किट के साथ ड्राइंग रूम में पहुँची। रेवा और माला दीदी के चेहरे खुशी से चमक रहे थे। इतनी ही देर में घर के बच्चे विनीत के साथ घुल-मिल गए थे।

”अंकल, यह कार आपकी है?“ माला दीदी के बेटे अमर ने पूछा।

”जी हाँ, आप इसमें घूमना चाहेंगे?“ विनीत ने प्यार से पूछा।

”आप घुमाएँगे?“ प्रसन्नता से अमर की आँखें चमक उठीं।

”अभी लीजिए, जाइए ड्राइवर से कहिए आप जहाँ तक जाना चाहें आपको घुमा लाएगा।“

”सच…मम्मी, हम लोग जाएँ?“ गौतम का चेहरा चकम रहा था।

”अरे क्यों बेकार अंकल को तंग कर रहे हो………।“ माला दीदी ने रोकना चाहा।

”इसमें तंग करने की क्या बात है, वैसे भी ड्राइवर खाली बैठा बोर ही हो रहा है, वह भी यह शहर देख लेगा। जाइए अब देर मत कीजिए।“

बच्चों की मम्मी, नानी विनीत की उस बात पर चुप रह गई थीं; शोर मचाते बच्चे बाहर भाग गए। बच्चों के बाहर जाते ड्राइंग रूम में सन्नाटा-सा पसर गया था। माला दीदी ने अम्मा को याद दिलाया-

”अम्मा, लड्डू बाँध लो, वर्ना बाद में नहीं बॅंधेगे।“

”चलो मैं भी बॅंधवा दूँ।“ अम्मा के साथ माला और रेवा दीदी, निष्प्रयोजन ही नहीं गई थीं। अंजू को विनीत के साथ अकेले छोड़ने में उनका कोई विशेष प्रयोजन सर्वथा स्पष्ट था।

”अंजू, असल में मैं तुम्हारे पास ही आया हूँ। तुमने मेरे आत्मविश्वास को जगाया है। बहुत आभारी हूँ तुम्हारा। तुम……….“

”मुझे खुशी है आज तुम वो सब पा चुके, जिसकी कभी कामना की थी- बधाई। मिसेज खन्ना कैसी हैं?“

”आजकल अपने पापा के साथ वर्ल्ड टूर पर हैं……।“

”तुम नहीं गए?“

”किस रिश्ते से जाता?“

”कमाल है, अपनी पत्नी के साथ जाने के लिए रिश्ता खोजना पडे़गा?“

”पिछले एक वर्ष से हम अलग रह रहे हैं, इस वर्ष डाइवोर्स मिल जाएगा।“

”यह तुम्हारा निजी मामला है……. मेरी इसमें दिलचस्पी नहीं।“

”डाइवोर्स के बाद मैं फ्री हो जाऊंगा, तुम्हें यही बताने आया हूँ………उसके बाद हम विवाह कर सकते हैं।“ विनीत ने रूक-रूक कर अपनी बात कही।

”यही बताने इतनी दूर से भागे आए? क्या सोचा था कि अंजू आज भी आपके लिए आँखें बिछाए बैठी है कि कब विनीत खन्ना वापिस आएँगे?“

”मैं विनीत खन्ना नहीं, विनीत मेहता हूँ, अंजू। आज तक तुमने विवाह नहीं किया, क्या यह अकारण ही था? त्रिवेन्द्रम में भी अपनी दो पंक्तियों में क्या तुम्हें संकेत नहीं दिया था कि मुझे विनीत खन्ना का कवच छोड़, विनीत मेहता बनना है? मैंने वही किया, आज तुम्हारे सामने वही विनीत मेहता आया है, अंजू।“

”कितना गलत इंटरप्रिटेशन था आपका, मिस्टर विनीत मेहता! किसी दूसरे के पति में मेरा क्या इंटरेस्ट हो सकता है? और हाँ, एक बात और – विनीत खन्ना से विनीत मेहता बनने के लिए पत्नी का परित्याग ज़रूरी नहीं है। यह मेरी योजना थी, कहकर और अपमानित मत करो, विनीत।“ अंजू का स्वर बेहद आहत था।

”अपनी सारी गलतियाँ स्वीकार करता हूँ अंजू, पर आज मुझे खाली हाथ मत लौटाना। मैं टूट जाऊंगा- विखर जाऊंगा।“

”नहीं विनीत, अब हमारा कोई और सम्बन्ध संभव नहीं। अच्छे मित्र बने रहने के लिए निजी स्वार्थो का परित्याग जरूरी है – पर तुम तो उसकी जगह पत्नी का परित्याग करने चले हो। पहली सगाई तोड़, मेरा अपमान ही क्या कम था जो अब अपनी पत्नी का…………।“

”मैं एक पूर्ण जीवन जीना चाहता हूँ अंजू, जो सिर्फ तुम्हारे साथ ही संभव है।“

”कुछ दिन बाद महसूस करोगे, तुम सविता के साथ ज्यादा सुखी थे। सच तो यह है तुम्हें आज भी अपने पर विश्वास नहीं है। विनीत, तुम हमेशा कोई सहारा खोजते रहे हो-खोजते रहोगे।“

”मैं अपना अतीत धो-पोंछकर तुम्हारे पास आया हूँ अंजू, तुम्हारे साथ में…………।“
 


”मैं अपना अतीत पूरी तरह जलाकर राख कर चुकी हूँ ,विनीत। ठंडी राख में अतीत की कोई छोटी-सी चिंगारी भी शेष नहीं। बंद द्वार पर बार-बार दस्तक देकर अपना अपमान मत कराओ।“

”यह झूठ है, तुम मुझे भुला नहीं सकतीं। तुमसे जो प्यार मिला, उसका अंश मात्र भी सविता से नहीं पा सका। सविता कभी मेरी पत्नी नहीं बन सकी।“

”इसमें क्या सारा दोष सविता का ही था, विनीत? पुरूष हमेशा यह क्यों सोचता आया है कि प्यार-त्याग स्त्री को ही देते जाना है। स्त्री के प्यार को ग्रहण कर पुरूष उसको कृतार्थ करता है। देने की पहल पुरूष भी तो कर सकता है, पर शायद वह सिर्फ लेना ही जानता है………….।“

”पर मैं तो तुम्हें अपना सब कुछ देने ही आया हूँ, अंजू।“

”जिसके पास कुछ शेष ही नहीं, वह भी दाता का ढोंग रचे, है न हास्यास्पद? पत्नी से प्राप्य न पा, तुम यहाँ आ गए हो। अंजू आज भी अविवाहित बैठी तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही है- वाह, क्या सुखद कल्पना है! मुझे सब कुछ दे, तुम्हारा अहं कितना गर्वित होगा- ठीक कहा न, मिस्टर विनीत मेहता?“ अंजू का स्वर तीखा हो गया था।

”ठीक कहा, तुम्हारे प्यार से अपनी खाली झोली ही भरने आया हूँ, अंजू। और यह विनीत मेहता कहना क्या जरूरी है, सिर्फ विनीत काफी नहीं है क्या?“

”दूसरे की अमानत से अपनी झोली भरना क्या संभव है, विनीत? क्या यह कृत्य किसी सभ्य पुरूष को सोहेगा?“

”क्या मतलब, मैं समझा नहीं?“ विनीत अचकचा गया।

”मैं विवाह कर रही हूँ………..।“

”किससे? कौन है वह?“

”समय आने पर जान जाओगे।“

”मेरी शुभकामनाएँ, अंजू।“ विनीत का स्वर बुझा-सा था।

”इस खबर से खुशी नहीं हुई?“

”नहीं, पर कुछ देर पहले तुमने कहा था- अच्छे मित्र बने रहने के लिए निजी स्वार्थ छोड़ने पड़ते हैं, उसी की कोशिश करूँगा।“

”सच्चे मन से कह रहे हो, विनीत?“

”कोशिश ज़रूर करूँगा। एक मित्र के रूप में भी तुम्हें पा सका तो मेरी उपलब्धि होगी।“

”यह हुई न बात। अब बताओ मुझे क्या उपहार दोगे?“

”जो माँगो………….।“

”एक हितैषी बंधु की तरह हमेशा तुम्हारा स्नेह पाती रहूँ। सविता भाभी के साथ विवाह में आना होगा, आ सकोगे?“

”कोशिश करूँगा, वादा नहीं कर सकता।“

”एक और बात मानोगे?“

”कहो।“ विनीत के नयन अंजू के चेहरे पर निबद्ध थे।

”अपनी प्रतिभा-मेहनत से तुमने आज बहुत कुछ पाया है, इस सुख-ऐश्वर्य पर तुम्हारी पत्नी का अधिकार है। तुम्हें एक आत्मविश्वासयुक्त पति के रूप में देखने की उसकी भी तो चाहत रही होगी। तुम नहीं जानते एक स्वाभिमानी पत्नी, अपने पति को एक पूर्ण पुरूष के रूप में ही स्वीकार करना चाहती है।“

”मैंने तो उसे सब कुछ देना चाहा था अंजू, पर……………“

”वो सब कुछ जो उसके पिता से तुम्हें मिला था? उसमें तुम्हारा अपना क्या था? उसका मूल्य सविता की दृष्टि में तुच्छ नहीं रहा होगा? आज स्थिति भिन्न है। मुझे विश्वास है अब तुम दोनों का अहं नहीं टकराएगा।“

”कितना अलग सोच है तुम्हारा। शायद तुम ठीक कह रही हो, इस दृष्टि से मैं कभी नहीं सोच सका। एक बात माननी होगी।“

”क्या?“

”कुछ दिन सविता को अपनी ट्रेनिंग में रखना होगा। अपनी समझदारी का अंश उसे भी देना होगा।“

”ट्रेनिंग देने के लिए तुम ही काफी हो, विनीत।“ विनीत की मुग्ध दृष्टि पर अंजू संकुचित हो उठी थी।

”अंजू, दिल्ली से अतुल का फोन है।“ रेवा दीदी ने अन्दर से आवाज लगाई।

”एक्सक्यूज मी, भइया का फ़ोन है, अभी आई।“

”मेरी भी उन्हें नमस्ते कहना, अंजू।“

फ़ोन पर अतुल की उत्साहित आवाज सुनाई पड़ी थी-

”इतने अच्छे जीवन-साथी के चयन के लिए मेरी बधाई अंजू। हीरा खोज निकाला है तूने।“

”लगता है ‘हीरे’ ने तुम्हें भी अपने साँचे में ढाल लिया है। कब आ रहे हो भइया-यहाँ सब तुम्हारे लिए बेचैन हैं।“

”कल पहुंच रहे हैं। सुजय को भी लाना चाहता हूँ, मान नहीं रहा है। तू कह देख, शायद आ जाए।“

”तुम्हारे कहने से ज्यादा क्या मेरा कहना है, भइया? नहीं आते तो न आएँ। मैं तो बुलाने से रही।“

”सच्चे दिल से कह रही है, अंजू? कह दूँ सुजय से तू उन्हें नहीं बुलाएगी?“ अतुल से फोन ले, पूनम ने उसे छेड़ा था।

”अब और कैसे कहूँ, झूठ बोलने का तो मेरा स्वभाव नहीं। जो चाहे कह दो।“ अंजू ने मान दिखाया।

”ला मुझे भी तो बात करने दे, किसके बुलाने की बातें हो रही हैं?“ माला दीदी ने अंजू के हाथ से फ़ोन छीन-सा लिया।

”यह लो, हमने बात करनी चाही तो लाइन ही कट गई।“ बुरा-सा मुँह बना माला दीदी ने फ़ोन पटक-सा दिया।

”किसे लाने की बात कर रहा था, अतुल“ अम्मा ने पूछा।

”अम्मा, भइया कल सुबह की फ्लाइट से आ रहे हैं। पूरी तैयारी कर डालो, कोई कसर न बचे।“ अंजू ने सुजय की बात टाल दी थी। भइया ही उसकी बात अम्मा से करें तो ठीक है।

”हे भगवान, हम इतनी देर से यहाँ हैं और वहाँ बेचारा विनीत अकेला है। अंजू, माला, तुम लोग उसके पास चलो, मैं लड्डू लेकर आती हूँ।“ अम्मा को अचानक विनीत पर बहुत प्यार उमड़ आया।

ड्राइंग रूम खाली पड़ा था, विनीत जा चुका था। बाहर से आते बच्चों के हाथों में टाफियाँ और आइसक्रीम देख माला दीदी ने गौतम से पूछा- ”अरे वह तेरे अंकल कहाँ गए, गौतम?“

”वो तो अभी-अभी अपनी गाड़ी में चले गए-तुमने नहीं देखा?“

”मौसी, देखो न उन्होंने हमें ये फूल दिए हैं, कित्ते अच्छे हैं न?“ श्वेता ने सफेद रजनीगन्धा की टहनी ऊपर उठा, फूलों से अपने गालों को सहलाया था।

”ये फूल तो उन्होंने अंजू मौसी को देने को कहा था, तुझे तो वो गुलाब दिए हैं। ये लो ,मौसी।“ गौतम ने श्वेता से रजनी गंधा छीन, अंजू को थमा दिए।

इन रजनीगंधा के फूलों ने अंजू को कोई भूली बात याद दिला दी – एक बार विनीत उसे बिना बताए मित्रों के साथ शिकार को चला गया था। नाराज़ अंजू ने उसके लौटने पर बात न करने का निर्णय ले डाला था।
 
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