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सब कुछ निबटा, अपने को बेहद अकेला पाया था। मम्मी के जीते, उनसे सामंजस्य नहीं बैठा सका, पर उनके बाद, उनकी कमी बेहद खलने लगी थी। शुरू से अपने को किताबों में डुबोए रखता था, मम्मी के बाद उन्हीं ने साथ निभाया। खालीपन भरने को ढेर सारी डिग्रियाँ ले डालीं। वही डिग्रियाँ काम बढ़ाने में सहायक बनीं। जिस सम्पत्ति को कभी हाथ भी न लगाने की सोची थी, वही मेरे गले पड़ गई।
मातमपुसीं में आए लोग मेरी अक्षमता का अंदाज लगाना चाहते थे। उनकी वही बात मेरी चुनौती बन गई। सम्पत्ति का मोह न रहते भी उसे किसी अन्य को न देने की जिद आ गई और आज इस मुकाम पर पहुंच सका हूँ।
यह सच है लाख भुलाना चाहकर भी मोनिका से मिला अपमान हर पल जीता रहा हूँ मैं। शायद इसीलिए हर लड़की में उसी का प्रतिरूप देखता रहा। किसी अभिन्न से न पहचाने जाने का दंश आप नहीं समझ सकेंगी ,मालती दी। इसी बात पर एक दिन अंजलि जी से भी लड़ बैठा था-खैर उसे जाने दीजिए, शायद हमेशा गलती मैं ही करता रहा हूँ।
अब तो माफ करेंगी न?
-जय
उन इबारतों में डुबी अंजू को पूनम भाभी की आवाज ने जगाया-
”अंजू, चलना नहीं है क्या, कहाँ रह गई हो भई?“
”अभी आई, भाभी……….।“
उन पृष्ठों को अंजू फाड़ नहीं सकी थी, जल्दी से ड्राअर में डाल तेजी से अंजू बाहर चली आई।
दो दिन बाद मालती सिन्हा का लम्बा-सा पत्र आया था। घर की ढेर सारी बातें लिख भेजी थीं। अन्त में लिखा था- ”कुछ दिन तेरे साथ रहने के बाद लगता है अपने अतीत से उबर आई हूँ। अपनी बेटी में भी अब अपनी परछाई पाती हूँ ,अंजू। मेरी मान, पिछला भूल एक अच्छा-सा जीवन-साथी चुन ले। सुजय से बात करूँ? नाराज मत होना।“
-तेरी
मालती दी
छिः ये मालती दी भी…..बस। अंजू चिढ़ गई। पूरी दुनिया में उसके हिस्से विनीत और सुजय ही आएँगे? दोनों बेहद कमजोर, परिस्थिति के आगे हथियार डाल देने वाले डरपोक।
अम्मा को अंजू का कुंवारा डोलना नहीं भाता था।
”तू ही समझा ,बहू। वो तो अपना घर बसा मजे उड़ा रहा है और ये उसके नाम की माला लिए जोगन बनी बैठी है।“
”कौन जोगन बना है अम्मा? अगर तुम मेरे ज्यादा पीछे पड़ोगी, मैं अपना ट्रान्सफर कहीं और करा लूंगी।“ अंजू नाराज हो उठती।
”अब हमारा बोलना भी बुरा लगता है। इतना पढ़ा-लिखाकर दिमाग खराब कर गए। खुद तो चले गए, हमारे सिर पर बोझ छोड़ गए।“ अम्मा बिसूरने लगतीं।
”अम्मा, पापा को कुछ मत कहा करो। आज उन्हीं की बदौलत अंजू बन सकी हूँ।“
पापा ने जो चाहा अंजू ने पा लिया, पर पापा के सामने उनके ऑफिस कहाँ जा पाई थी अंजू? पापा की साध मन में ही रह गई। इतने महत्वाकांक्षी पापा क्या पा सके? पापा हमेशा कहते-
‘काश अंजू मेरी बेटा होती…………।’
‘क्यों बेटी कुछ नहीं कर सकती ,पापा?’ अंजू ठुनकती।
‘तू सब कुछ कर सकती है ,अंजू। तू ही तो मेरा बेटा है।’
हार्ट-अटैक का कष्ट झेलते पापा ने कितनी मुश्किल से हाथ उठाकर अंजू के सिर पर रखा था। आँख की कोर से एक आँसू ढलका और पापा ने संसार से विदा ले ली थी।
अम्मा को पापा से हमेशा यही शिकायत रहती कि उन्होंने अंजू को सिर चढ़ाकर उसका दिमाग खराब कर दिया था। वही अम्माँ पापा के न रहने पर अंजू को सीने से चिपटा कितना रोई थीं।
”तुझे पापा के सपने सच करने हैं बिटिया। वे तुझे बड़ा आफिसर बना देखना चाहते थे, तू बनकर दिखएगी न ,अंजू?“
पापा की मृत्यु के बाद अम्मा में गजब का परिवर्तन आ गया। अंजू उनके हर काम की केन्द्र-बिन्दु बन गई थी। अंजू ने शादी करने की साफ़ मनाही कर दी थी, उस जगह अम्मा उससे सहमत नहीं थीं, पर अंजू की दृढ़ता के आगे हार गई थीं।
”जैसी तेरी मर्जी, तू जान, पर एक बात याद रखना, उम्र के पड़ाव पर एक वक्त ऐसा आता है जब हर एक को किसी सहारे की जरूरत जरूर पड़ती है,अंजू। जब तक माँ-बाप जीते हैं ठीक रहता है, बाद ………में।“
अंजू ने अम्मा को उनकी आगे वाली बात कभी पूरी नहीं करने दी थी।
”अम्मा ,तुम चिन्ता मत किया करो, मुझे भइया-भाभी कितना प्यार करते हैं, तुम देखती हो फिर भी।“
”भगवान करे उनका साया हमेशा तुझ पर बना रहे, पर जब अपने बाल-बच्चे हो जाते हैं तो बात दूसरी हो जाती है, यही दुनिया का कायदा हैं ,बेटी।”
“अम्मा, प्लीज ऐसी बातें मत किया करो। भाभी सुन लें तो क्या सोचेंगी? “
पपा की दृष्टि में अति सामान्य बुद्धि वाले भइया की पत्नी-रूप में पूनम भाभी आदर्श थीं। सामान्य रंग-रूप वाली भाभी की तीक्ष्ण मेधा पापा की दृष्टि से छिपी ही रह गई थीं। मध्यमवर्गीय परिवार की बेटी पूनम भाभी बी0ए0 तक शिक्षा के बाद ब्याह दी गई थीं। भइया के लिए पूनम वरदान सिद्ध हुई थीं। पूनम भाभी के आते ही उनकी सर्विस स्थायी हो गई। भाभी के आने के बाद से भइया का चेहरा आत्मविश्वासपूर्ण होता चला गया था।
घर के काम निबटाती पूनम ने कब इतिहास विषय में एम0ए0 कर लिया किसी को पता भी न चला। विवाह के दो-तीन वर्षो बाद भी अम्मा दादी न बन सकीं। नीची नजर किए पूनम भाभी अम्मा के उलाहने सुनती काम करती जाती थीं।
”आजकल जमाना ही बदल गया है। बड़ी उम्र में शादी करो फिर भी बच्चों के बिना घर सूना पड़ा रहे।“
पापा के बाद भइया घर के सर्वेसर्वा भले ही बन गए थे, पर अम्मा की किसी बात का प्रतिवाद उन्होंने कभी नहीं किया। कभी-कभी तो अम्मा की अन्यायपूर्ण बातों पर अंजू ही उनसे उलझ पड़ती थी।
त्रिवेन्द्रम से लौटने के करीब पन्द्रह दिन बाद पूनम भाभी रात में अंजू के पास आ बैठी थीं।
”क्या बात है भाभी, अम्मा ने कुछ कहा है?“
”आज तक कभी उसके लिए मुझे कुछ कहने की जरूरत पड़ी है, मेरी ढाल तो तुम हो न ,अंजू?“
”फिर क्या बात है?“
”महिला कॉलेज में मेरी नियुक्ति हो गई है, तुम्हें अम्माजी को मनाना होगा ,अंजू।“
”अरे वाह, इतनी बड़ी खबर अब सुनाई जा रही है। तुमने तो कमाल कर दिया ,भाभी।“
”कमाल तो तुम्हारे भइया का है, अंजू। देर रात तक मेरे साथ बैठ-बैठकर मुझे इस योग्य बनाया है……वर्ना मैं किस लायक थी।“
”चलो हमारा भइया का कोई तो गुण्ग्राही मिला, इण्टरव्यू कब दिया, भाभी?“ भइया के प्रति पूनम भाभी के विश्वास ने ही भइया की काया पलट कर दी थी।
”जब तुम त्रिवेन्द्रम गई थीं, तभी इण्टरव्यू- कॉल आई थी।“
”जब सब कुछ अपने-आप कर लिया तो अम्मा को समझाना भी तुम्हें ही होगा ,भाभी।“
”ये काम तो तुम्हें ही करना होगा, अंजू। तुम तो जानती हो अम्मा जी मेरी नौकरी की बात कभी पसंद नहीं करेंगी।“
”अम्मा ने मेरी नौकरी ही कब पसंद की ,भाभी? अब अपना मोर्चा तुम्हें खुद सॅंभालना है। यूँ डर-डर कर कब तक चलेगा?“
”अम्मा जी सह सकेंगी?“
”अगर बेटी की नौकरी सह सकती हैं तो बहू की भी सहनी ही होगी“ फिर भी न माने तो भइया को बात करनी पडे़गी।“
”ये अम्मा जी के सामने मुँह खोलेंगे“
”नहीं खोलेंगे तो पछताएँगे।“
”तुम कुछ नहीं करोगी?“
”मेरी जरूरत ही नहीं पडे़गी, तुम अकेली ही काफ़ी हो। मेरा विश्वास करो भाभी, कुछ नहीं होगा।“
घर में अम्मा दो-चार दिन बड़बड़ाती रहीं, भइया और भाभी निःशब्द उनका बड़बड़ाना सुनते रहे। आठ जुलाई को सूती कलिफ़दार साड़ी पहन पूनम भाभी कॉलेज जाने को तैयार थीं। जाते समय अम्मा के पावों पर झुकती पूनम भाभी को अम्मा का आशीर्वाद मिला या नहीं, अंजू ने जोरदार शब्दों में घोषणा की-
”आते समय मिठाई लाना मत भूलना भाभी, और हाँ तुम्हारी फ़र्स्ट- सैलरी में मेरी साड़ी पक्की है न?“
”पहले वेतन पर तो अम्मा जी और तुम्हारा ही अधिकार होगा ,अंजू।“
अम्मा ने आँखों की कोर जबरन आँचल से पोंछ डाली थीं। स्कूटर पर भइया के पीछे बैठ भाभी चली गई थीं। अंजू का मन संतोष से भर गया था- भइया को उनका प्राप्य मिल गया। काश, पापा उन्हें इस रूप में देख पाते। जिस बेटे से उन्होंने कभी कोई उम्मीद नहीं रखी, वही आज पूनम भाभी के व्यक्तित्व का निर्माता है।
मातमपुसीं में आए लोग मेरी अक्षमता का अंदाज लगाना चाहते थे। उनकी वही बात मेरी चुनौती बन गई। सम्पत्ति का मोह न रहते भी उसे किसी अन्य को न देने की जिद आ गई और आज इस मुकाम पर पहुंच सका हूँ।
यह सच है लाख भुलाना चाहकर भी मोनिका से मिला अपमान हर पल जीता रहा हूँ मैं। शायद इसीलिए हर लड़की में उसी का प्रतिरूप देखता रहा। किसी अभिन्न से न पहचाने जाने का दंश आप नहीं समझ सकेंगी ,मालती दी। इसी बात पर एक दिन अंजलि जी से भी लड़ बैठा था-खैर उसे जाने दीजिए, शायद हमेशा गलती मैं ही करता रहा हूँ।
अब तो माफ करेंगी न?
-जय
उन इबारतों में डुबी अंजू को पूनम भाभी की आवाज ने जगाया-
”अंजू, चलना नहीं है क्या, कहाँ रह गई हो भई?“
”अभी आई, भाभी……….।“
उन पृष्ठों को अंजू फाड़ नहीं सकी थी, जल्दी से ड्राअर में डाल तेजी से अंजू बाहर चली आई।
दो दिन बाद मालती सिन्हा का लम्बा-सा पत्र आया था। घर की ढेर सारी बातें लिख भेजी थीं। अन्त में लिखा था- ”कुछ दिन तेरे साथ रहने के बाद लगता है अपने अतीत से उबर आई हूँ। अपनी बेटी में भी अब अपनी परछाई पाती हूँ ,अंजू। मेरी मान, पिछला भूल एक अच्छा-सा जीवन-साथी चुन ले। सुजय से बात करूँ? नाराज मत होना।“
-तेरी
मालती दी
छिः ये मालती दी भी…..बस। अंजू चिढ़ गई। पूरी दुनिया में उसके हिस्से विनीत और सुजय ही आएँगे? दोनों बेहद कमजोर, परिस्थिति के आगे हथियार डाल देने वाले डरपोक।
अम्मा को अंजू का कुंवारा डोलना नहीं भाता था।
”तू ही समझा ,बहू। वो तो अपना घर बसा मजे उड़ा रहा है और ये उसके नाम की माला लिए जोगन बनी बैठी है।“
”कौन जोगन बना है अम्मा? अगर तुम मेरे ज्यादा पीछे पड़ोगी, मैं अपना ट्रान्सफर कहीं और करा लूंगी।“ अंजू नाराज हो उठती।
”अब हमारा बोलना भी बुरा लगता है। इतना पढ़ा-लिखाकर दिमाग खराब कर गए। खुद तो चले गए, हमारे सिर पर बोझ छोड़ गए।“ अम्मा बिसूरने लगतीं।
”अम्मा, पापा को कुछ मत कहा करो। आज उन्हीं की बदौलत अंजू बन सकी हूँ।“
पापा ने जो चाहा अंजू ने पा लिया, पर पापा के सामने उनके ऑफिस कहाँ जा पाई थी अंजू? पापा की साध मन में ही रह गई। इतने महत्वाकांक्षी पापा क्या पा सके? पापा हमेशा कहते-
‘काश अंजू मेरी बेटा होती…………।’
‘क्यों बेटी कुछ नहीं कर सकती ,पापा?’ अंजू ठुनकती।
‘तू सब कुछ कर सकती है ,अंजू। तू ही तो मेरा बेटा है।’
हार्ट-अटैक का कष्ट झेलते पापा ने कितनी मुश्किल से हाथ उठाकर अंजू के सिर पर रखा था। आँख की कोर से एक आँसू ढलका और पापा ने संसार से विदा ले ली थी।
अम्मा को पापा से हमेशा यही शिकायत रहती कि उन्होंने अंजू को सिर चढ़ाकर उसका दिमाग खराब कर दिया था। वही अम्माँ पापा के न रहने पर अंजू को सीने से चिपटा कितना रोई थीं।
”तुझे पापा के सपने सच करने हैं बिटिया। वे तुझे बड़ा आफिसर बना देखना चाहते थे, तू बनकर दिखएगी न ,अंजू?“
पापा की मृत्यु के बाद अम्मा में गजब का परिवर्तन आ गया। अंजू उनके हर काम की केन्द्र-बिन्दु बन गई थी। अंजू ने शादी करने की साफ़ मनाही कर दी थी, उस जगह अम्मा उससे सहमत नहीं थीं, पर अंजू की दृढ़ता के आगे हार गई थीं।
”जैसी तेरी मर्जी, तू जान, पर एक बात याद रखना, उम्र के पड़ाव पर एक वक्त ऐसा आता है जब हर एक को किसी सहारे की जरूरत जरूर पड़ती है,अंजू। जब तक माँ-बाप जीते हैं ठीक रहता है, बाद ………में।“
अंजू ने अम्मा को उनकी आगे वाली बात कभी पूरी नहीं करने दी थी।
”अम्मा ,तुम चिन्ता मत किया करो, मुझे भइया-भाभी कितना प्यार करते हैं, तुम देखती हो फिर भी।“
”भगवान करे उनका साया हमेशा तुझ पर बना रहे, पर जब अपने बाल-बच्चे हो जाते हैं तो बात दूसरी हो जाती है, यही दुनिया का कायदा हैं ,बेटी।”
“अम्मा, प्लीज ऐसी बातें मत किया करो। भाभी सुन लें तो क्या सोचेंगी? “
पपा की दृष्टि में अति सामान्य बुद्धि वाले भइया की पत्नी-रूप में पूनम भाभी आदर्श थीं। सामान्य रंग-रूप वाली भाभी की तीक्ष्ण मेधा पापा की दृष्टि से छिपी ही रह गई थीं। मध्यमवर्गीय परिवार की बेटी पूनम भाभी बी0ए0 तक शिक्षा के बाद ब्याह दी गई थीं। भइया के लिए पूनम वरदान सिद्ध हुई थीं। पूनम भाभी के आते ही उनकी सर्विस स्थायी हो गई। भाभी के आने के बाद से भइया का चेहरा आत्मविश्वासपूर्ण होता चला गया था।
घर के काम निबटाती पूनम ने कब इतिहास विषय में एम0ए0 कर लिया किसी को पता भी न चला। विवाह के दो-तीन वर्षो बाद भी अम्मा दादी न बन सकीं। नीची नजर किए पूनम भाभी अम्मा के उलाहने सुनती काम करती जाती थीं।
”आजकल जमाना ही बदल गया है। बड़ी उम्र में शादी करो फिर भी बच्चों के बिना घर सूना पड़ा रहे।“
पापा के बाद भइया घर के सर्वेसर्वा भले ही बन गए थे, पर अम्मा की किसी बात का प्रतिवाद उन्होंने कभी नहीं किया। कभी-कभी तो अम्मा की अन्यायपूर्ण बातों पर अंजू ही उनसे उलझ पड़ती थी।
त्रिवेन्द्रम से लौटने के करीब पन्द्रह दिन बाद पूनम भाभी रात में अंजू के पास आ बैठी थीं।
”क्या बात है भाभी, अम्मा ने कुछ कहा है?“
”आज तक कभी उसके लिए मुझे कुछ कहने की जरूरत पड़ी है, मेरी ढाल तो तुम हो न ,अंजू?“
”फिर क्या बात है?“
”महिला कॉलेज में मेरी नियुक्ति हो गई है, तुम्हें अम्माजी को मनाना होगा ,अंजू।“
”अरे वाह, इतनी बड़ी खबर अब सुनाई जा रही है। तुमने तो कमाल कर दिया ,भाभी।“
”कमाल तो तुम्हारे भइया का है, अंजू। देर रात तक मेरे साथ बैठ-बैठकर मुझे इस योग्य बनाया है……वर्ना मैं किस लायक थी।“
”चलो हमारा भइया का कोई तो गुण्ग्राही मिला, इण्टरव्यू कब दिया, भाभी?“ भइया के प्रति पूनम भाभी के विश्वास ने ही भइया की काया पलट कर दी थी।
”जब तुम त्रिवेन्द्रम गई थीं, तभी इण्टरव्यू- कॉल आई थी।“
”जब सब कुछ अपने-आप कर लिया तो अम्मा को समझाना भी तुम्हें ही होगा ,भाभी।“
”ये काम तो तुम्हें ही करना होगा, अंजू। तुम तो जानती हो अम्मा जी मेरी नौकरी की बात कभी पसंद नहीं करेंगी।“
”अम्मा ने मेरी नौकरी ही कब पसंद की ,भाभी? अब अपना मोर्चा तुम्हें खुद सॅंभालना है। यूँ डर-डर कर कब तक चलेगा?“
”अम्मा जी सह सकेंगी?“
”अगर बेटी की नौकरी सह सकती हैं तो बहू की भी सहनी ही होगी“ फिर भी न माने तो भइया को बात करनी पडे़गी।“
”ये अम्मा जी के सामने मुँह खोलेंगे“
”नहीं खोलेंगे तो पछताएँगे।“
”तुम कुछ नहीं करोगी?“
”मेरी जरूरत ही नहीं पडे़गी, तुम अकेली ही काफ़ी हो। मेरा विश्वास करो भाभी, कुछ नहीं होगा।“
घर में अम्मा दो-चार दिन बड़बड़ाती रहीं, भइया और भाभी निःशब्द उनका बड़बड़ाना सुनते रहे। आठ जुलाई को सूती कलिफ़दार साड़ी पहन पूनम भाभी कॉलेज जाने को तैयार थीं। जाते समय अम्मा के पावों पर झुकती पूनम भाभी को अम्मा का आशीर्वाद मिला या नहीं, अंजू ने जोरदार शब्दों में घोषणा की-
”आते समय मिठाई लाना मत भूलना भाभी, और हाँ तुम्हारी फ़र्स्ट- सैलरी में मेरी साड़ी पक्की है न?“
”पहले वेतन पर तो अम्मा जी और तुम्हारा ही अधिकार होगा ,अंजू।“
अम्मा ने आँखों की कोर जबरन आँचल से पोंछ डाली थीं। स्कूटर पर भइया के पीछे बैठ भाभी चली गई थीं। अंजू का मन संतोष से भर गया था- भइया को उनका प्राप्य मिल गया। काश, पापा उन्हें इस रूप में देख पाते। जिस बेटे से उन्होंने कभी कोई उम्मीद नहीं रखी, वही आज पूनम भाभी के व्यक्तित्व का निर्माता है।