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बिकास नगर ।। विशालगढ़ का व्यस्ततम इलाका और इसी इलाके के व्यस्तम पुलिस स्टेशन में आज हलचल मची हुई थी । पुलिस स्टेशन का चार्ज सम्भालने आज दिल्ली से नया इन्समेक्टर आ रहा था ।। जिसके बारे में वहां सबको मालूम ही हो चुका था कि वह बहुत ही सख्त मिजाज का इन्सपेक्टर है । इसलिए हर कोई घबराया हुआ-सा उसके स्वागत की तैयारियों में व्यस्त था I
वह और कोई नहीँ इन्सपेक्टर सूरजभान था ।
चन्द्रप्रकाश दिवाकर ने पुलिस कमिश्नर राममूर्ति को कहकर इन्सपेक्टर सूरजभान का ट्रांसफ़र तो करवा दिया था । कहा था सूरजभान की ट्रांसफर दिल्ली से बाहर कहीं भी कर दें, परन्तु वह यह कहना भूल गया था कि पूरे हिन्दुस्तान में विशालगढ़ में न करें, जहां कि उसने अपने फरार बेटे और उसके दोस्तों को छिपा रखा था ।
बहुत ही अजीब और खतरनाक इत्तफाक था कि बिशालगढ़ में बिकास नगर धनाढ्य इलाके कै थाने में थाना इच्चार्ज की जरूरत थी और कमिश्नर राममूर्ति ने इन्सपेक्टर सूरजभान का ट्रांसफर वहीँ कर दिया था ।।
अगर यह बात चन्द्रप्रकाश दिवाकर को मालूम हो जाती कि सूरजभान को विशालगढ़ भेजा जा रहा है तो वह बौखला उठता I हर हाल में उसका ट्रांसफ़र रुकवाकर रहता परन्तु उसे मालूम नहीं हो सका था । बस वह इतना ही जान पाया था कि इन्सपेक्टर सूरजभान क्रो दिल्ली से बाहर ट्रांसफर कर दिया गया ।
इन्सपेक्टर सूरजभान दिवाकर, हेगड़े और खेड़ा को तलाश करना चाहता था । उसे यह ट्रांसफर पसन्द नहीं आया था, परन्तु वह कुछ कर भी नहीं सकता था । आँफिसर का ऑर्डर था और वह भी ऐसे आँफिसर का आँर्डरं जो चन्द्रप्रकाश दिवाकर जेसे खरबोंपति इन्सान के हाथों कठपुतली बना हुआ है । सूरजभान
खामोशी से इस ट्रांसफर क्रो स्वीकार करके विशालगढ़, नए थाने का चार्ज सम्भालने रवाना हो गया था I
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फीनिश
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नकाबर्पोश ने टीं०र्वी०-वी०सी०आर बन्द किया और सिगरेट सुलगाकर सामने सोफे पर राजीव को देखा जो कि बन्द हो जाने पर अभी तक टीं०वी० को देखे जा रहा था ।
दोनों विशालगढ़ के खूबसूरत सजे सजाए फ्लैट में पिछले दो दिनों से थे । राजीव अभी तक नकाबपोश के चेहरें की एक झलक भी न देख पाया था ।
दो दिनों से नकाबपोश, राजीव को रंजीत श्रीवास्तव की और उसकी पहचान'वालों की वीडियो फिल्में दिखा रहा था । राजीव रंजीत श्रीवास्तव से सम्बन्धित ही बात को अपने दिमाग में सुरक्षित रखता जा रहा था । उसे यह देखकर तो जहान-भर की हैरानी हुई कि रंजीत श्रीवास्तव हू-ब-हू उसकी ही काॅपी है ।
उनके चेहरों में समानता ही नहीं बल्कि दोनों के चेहरे एकसमान थे । उसे तो यही लगा जैसे टी वी स्कीन पर वह घूम-फिर रहा है ।
नकाबपोश ने धुआं उगला और राजीव पर निगाहें टिकाकर बोला ।
"पिछले दो दिनों से तुमने टी०वी० पर क्या देखा राजीव?" राजीव ने टी०दी० से निगाहें हटाकर नकाबपोश पर टिका दीं ।
उसे खामोश देखकर नकाबपोश ने सिगरेट का एक कश लिया और गम्भीर स्वर में बोला।
"राजीव मल्होत्रा पिछले दो दिनों से तुम वी०सी०आर० पर ~ रंजीत श्रीवास्तव जैसे अरबों खरबो पति व्यक्ति के बारे में जानकारी , प्राप्त कर रहे हो । तुमने रंजीत श्रीवास्तव और उसकी हर पहचान वाले को वी०सी०आर०-टीं०वी० में देखा । नौकर से लेकर उसकी कम्पनियों के व्यक्तियों को देखा ही नहीं, उनके नाम और घर बार कै बारे में भी जाना । रंजीत श्रीवास्तव की मंगेतर रजनी शाह के बारे में उसकी पहचान वालों के बारे में जाना । यानी कि तुम अब हर उस बात के बारे मेँ जान चुके हो जो रंजीत श्रीवास्तव से तालुक रखती हैं ।'"
राजीव ने पहलू बदला । मुंह से फिर भी कुछ नहीं बोला । नकाबपोश ने अपने लबादे से सिगरेट का विदेशी पैकट और लाईटर निकाला । जिन्हें कि राजीव के सामने टेबल पर रखकर बोला----- "रंजीत श्रीवास्तव यह सिगरेट पीता है और यह लाईटर सोने का है । ऐसे उसके पास बीसियों लाईंटर हैं । सिगरेट सुलगाओं ।"
"मैँ सिगरेट नहीँ पीता ।'" राजीव कें हौंठे खुले ।
"सिगरेट नहीं पीते?" नाकाबपोश हंसा---" फिर तो शराब भी नहीं पीते होगे?"
"नहीं I”
" यानीकिं सुफी आदमी हो ।" वह पुनः हँसा ।
"तुम तो इस प्रकार हंस रहे हो, जैसे सूफी होना पाप हैं I" राजीव कड़वे स्वर में कहा ।
"नहीँ! पाप नहीं बल्कि अच्छी आदत है I लेकिन ...... I" नकाबपोश ने उंगलियों में र्फसी सिगरेट का कश लिया…“अब तुम खुद को राजीव समझना छोड दो । तुम रंजीत श्रीवास्तव हो । विशालगढ़ कै अरबोंपति. व्यक्ति I 'बहुत-बडी हस्ती I इसलिए वही करो जो रंजीत श्रीवास्तव करता है । वह सिगरेट पीता हे । शराब पीता है I औरतों को टांगों पर बिठाना और उन्हे उतार देना आम बात है उसके लिए । दुनिया का कोई भी बुरा काम नहीं जो उसने न किया हो । अपनी दौलत का खूब फायदा उठाया हे उसने । तुम्हें भी अब वहीँ करना है जो रंजीत श्रीवास्तव करता है । अब `तुम-तुम नहीं रंजीत श्रीवास्तव हो I”
“परन्तु .....!" राजीव ने व्याकुल स्वर में कहा-"मैं यह सब नहीं ' कर सकता । तमाम जिन्दगी बहुत ही सादे और शरीफाना ढंग से बिताई है । यह बातें करना मेरे लिए कठिन है I”
"छः महीने के लिए । समझें छ: महीने के लिए तुम्हें वह सब करना है जो रंजीत श्रीवास्तव करता है । तुम्हारा मकसद उसकी दौलत को मेरी तरफ सरकाना है, न कि वहां जाकर ऐश करना । यह सब बातें तुम मात्र दिखावे के लिए भी कर सकते हो I या फिर तुम्हारी रजनी शाह से मंगनी हो गई है, इसलिए अब तुम औरतों की संगत से दूर हो जाना चाहते. हो । यानी कि वहां पहुचकर ऐसा कोई भी ड्रामा कर सकते हैं I ।"
राजीव सिर हिलाकर रह गया . . . . . ।।
"एक बात याद रखना I" एकाएक नकावपोश का स्वर . हिंसक हो उठा-"इस काम में किसी प्रकार की लापरवाही नहीं होनी चाहिए I मैं हर हाल में रंजीत श्रीवास्तव की दौलत हथिया कर अरबपति बनना चाहता हूं। तुम तो अब इस ड्रामे में आए हो ।। मैं कई बरसों से इस काम के लिए मेहनत कर रहा हूं।"
"तुम्हारी बात हर हाल में पूरी हो, इस बात का मेंने ठेका नहीँ लिया l" राजीव कह उठा ।
"क्या मतलब?” नकाबपोश की सुर्खं आंखें सिंकुड़ती चली गई ।
"तुमने मुझे जो काम करने के लिए कहा है, वह मैँ कर रहा हू। काम कब और कितना पूरा होता है । में तुम्हारी आशाओं पर कितना खरा उतरता हू यह बाद की बात है । यह बात अलग है कि मैँ अपनी तरफ से किसी भी तरह की कमी नहीं छोडूंगा ।" राजीव ने उसकी लाल सुर्ख आंखों में झांका ।
"तुम अपनी तरफ़ से किसी भी तरह की कमी नहीं छोड्रोगे ।"
"नहीं छोड़ूंगा I”
“बस फिर चिन्ता की कोई बात नहीं, बाकी सबकुछ ठीक हो जाएगा ।" नकाबपोश ने सिर हिलाया । कश लेकर स्थिर लहजे में राजीव से कहा… “सिगरेट पियो ।" अनमने मन से राजीव ने सिगरेट का नया पैकेट खोला और सिगरेट सुलमाकर उल्टे सीधे ढंग से कश लेने लगा । पहली बार उसने सिगरेट पी थी ।
" सिगरेट इस तरह पीने की आदत डालो कि देखने वाले को लगे जैसे तुम लम्बे समय से यह काम करते आ रहे हो, अनाड्रियों की तरह मत पियो । खुद को सिगरेट कै आदी दिखाने कै लिए ज्यादा से ज्यादां सिगरेट पियो ताकि तुम्हारी मूवमेंट सामान्य लगे । "
कश लेने के पश्चात् राजीव बोला ।
" तुम कुछ मेरी बातों का भी ज़वाब दे दो ।"
" पूछो !"
"तुम मुझे रंजीत श्रीवास्तव बनाने जा रहे हो?” राजीव ने कहा ।
"हा । "
"तो कम से कम यह तो बता दो कि मुझे इस अरबपति व्यक्ति की जगह पर कैसे बिठाओगे? यह काम इतना आसान तो होगा नहीं, राजीव श्रीवास्तव कोई मामूली हस्ती तो हे नहीं I"
"ठीक कहते हो । यह काम आसान नहीं है । बहुत कठिन है । हर किसी के बस का भी नहीं है । शायद कोई भी इस काम को नहीं कर सकता । परन्तु मैं पलक झपकते ही कर सकता हू I”
"वही तो मैं पूछ रहा हूं कैसे?" राजीव ने उसकी नकाब से झांकती आंखों में झांका ।
"इस सारे काम को देवराज चौहान करेगा ।" "देवराज चौहान । कौन देवराज चौहान?" राजीव ने चौक्रक्तरु देखा उसे ।
" तुम नहीँ जानते देवराज चौहान को । बहुत खतरनाक आदमी है वह । जो कर जाये समझो वही कम । वह ऐसा तूफान हे, जिसे कोई रोक नहीं सकता । ऐसा पहाड है जिसे कोई काट नहीं सकता ।"
"मैं अभी भी कुछ नहीँ समझा ।” राजीव कै स्वर में असमंजसता कै भाव थे ।
" तुम कुछ नहीं समझोगे । उस शैतानी शख्यियत को सामने पाकर भी तुम कुछ नहीँ समझ सकते ।” नकाबपोश कश लेते हुए कह उठा---“ उसे समझ पाना बहुत कठिन है । उसे पार करना भी वहुत मुश्किल काम हे । आगे का सारा काम वही करेगा । अबं मैं नहीं तुम्हारे पास देवराज चौहान आएगा । छ: महीनों के लिए वहीँ तुम्हारा मालिक होगा । वह जो कहेगा, वहीँ तुम्हें करना होगा । इस ब्रीच शायद ही मैँ तुमसे मिलूं। एक तरह से तुम यहीं समझकर चलना कि मैं ही देवराज चौहान हूं । यानी कि जो देवराज चौहान कहेगा वह तुम्हें हर हाल में मानना पड़ेगा ।”
राजीव ने अजीब-सी निगाहों से नकाबपोश को देखा ।
"तुम तो ऐसे बात कर रहे हो जैसे वह देवराज चौहान ना होकर......!"
"मैंने कहा ना, तुम क्या कोई भी उसे जितना समझे । समझो कम समझा । जब उससे मिलोगे तो घीरे-धीरे समझ जाओगे। देवराज चौहान को समझ पाना किसी कै बस का भी नहीं है । वह यारों का यार और दुश्मनों के लिए खूंखार भेडिया हे । शिकारी चीता है । मौत का फ़रमान हे ।" नकाबपोश स्थिर लहजे में कह रहा था ।
"बस-बस, अब वस भी करो ।” राजीव हाथ उठाकर कह उठा-----" मुझे लगता है, तुम जैसे देवराज चौहान के बारे में ही बताते रहोगे मैंने तुम्हें टोका नहीं तो! जितना बता दिया, उतना ही बहुत । बाकी खुद उस से जान लूंगा ।"
नकाब मे छिपे नकाबपोश के होंठ मुस्कराहट कै रूप में फैलते चले गए ।
" देवराज चौहान मुझे रंजीत श्रीबास्तव कैसे बनायेगा? और .......फिर रंजीत श्रीवास्तव का क्या होगा, जब मैँ रंजीत श्रीवास्तव बन जाऊंगा? यह बस बातें मुझे मालूम होनी चाहिए I" राजीव ने अपनी बात को जारी रखा I
वह और कोई नहीँ इन्सपेक्टर सूरजभान था ।
चन्द्रप्रकाश दिवाकर ने पुलिस कमिश्नर राममूर्ति को कहकर इन्सपेक्टर सूरजभान का ट्रांसफ़र तो करवा दिया था । कहा था सूरजभान की ट्रांसफर दिल्ली से बाहर कहीं भी कर दें, परन्तु वह यह कहना भूल गया था कि पूरे हिन्दुस्तान में विशालगढ़ में न करें, जहां कि उसने अपने फरार बेटे और उसके दोस्तों को छिपा रखा था ।
बहुत ही अजीब और खतरनाक इत्तफाक था कि बिशालगढ़ में बिकास नगर धनाढ्य इलाके कै थाने में थाना इच्चार्ज की जरूरत थी और कमिश्नर राममूर्ति ने इन्सपेक्टर सूरजभान का ट्रांसफर वहीँ कर दिया था ।।
अगर यह बात चन्द्रप्रकाश दिवाकर को मालूम हो जाती कि सूरजभान को विशालगढ़ भेजा जा रहा है तो वह बौखला उठता I हर हाल में उसका ट्रांसफ़र रुकवाकर रहता परन्तु उसे मालूम नहीं हो सका था । बस वह इतना ही जान पाया था कि इन्सपेक्टर सूरजभान क्रो दिल्ली से बाहर ट्रांसफर कर दिया गया ।
इन्सपेक्टर सूरजभान दिवाकर, हेगड़े और खेड़ा को तलाश करना चाहता था । उसे यह ट्रांसफर पसन्द नहीं आया था, परन्तु वह कुछ कर भी नहीं सकता था । आँफिसर का ऑर्डर था और वह भी ऐसे आँफिसर का आँर्डरं जो चन्द्रप्रकाश दिवाकर जेसे खरबोंपति इन्सान के हाथों कठपुतली बना हुआ है । सूरजभान
खामोशी से इस ट्रांसफर क्रो स्वीकार करके विशालगढ़, नए थाने का चार्ज सम्भालने रवाना हो गया था I
@@@@@
फीनिश
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नकाबर्पोश ने टीं०र्वी०-वी०सी०आर बन्द किया और सिगरेट सुलगाकर सामने सोफे पर राजीव को देखा जो कि बन्द हो जाने पर अभी तक टीं०वी० को देखे जा रहा था ।
दोनों विशालगढ़ के खूबसूरत सजे सजाए फ्लैट में पिछले दो दिनों से थे । राजीव अभी तक नकाबपोश के चेहरें की एक झलक भी न देख पाया था ।
दो दिनों से नकाबपोश, राजीव को रंजीत श्रीवास्तव की और उसकी पहचान'वालों की वीडियो फिल्में दिखा रहा था । राजीव रंजीत श्रीवास्तव से सम्बन्धित ही बात को अपने दिमाग में सुरक्षित रखता जा रहा था । उसे यह देखकर तो जहान-भर की हैरानी हुई कि रंजीत श्रीवास्तव हू-ब-हू उसकी ही काॅपी है ।
उनके चेहरों में समानता ही नहीं बल्कि दोनों के चेहरे एकसमान थे । उसे तो यही लगा जैसे टी वी स्कीन पर वह घूम-फिर रहा है ।
नकाबपोश ने धुआं उगला और राजीव पर निगाहें टिकाकर बोला ।
"पिछले दो दिनों से तुमने टी०वी० पर क्या देखा राजीव?" राजीव ने टी०दी० से निगाहें हटाकर नकाबपोश पर टिका दीं ।
उसे खामोश देखकर नकाबपोश ने सिगरेट का एक कश लिया और गम्भीर स्वर में बोला।
"राजीव मल्होत्रा पिछले दो दिनों से तुम वी०सी०आर० पर ~ रंजीत श्रीवास्तव जैसे अरबों खरबो पति व्यक्ति के बारे में जानकारी , प्राप्त कर रहे हो । तुमने रंजीत श्रीवास्तव और उसकी हर पहचान वाले को वी०सी०आर०-टीं०वी० में देखा । नौकर से लेकर उसकी कम्पनियों के व्यक्तियों को देखा ही नहीं, उनके नाम और घर बार कै बारे में भी जाना । रंजीत श्रीवास्तव की मंगेतर रजनी शाह के बारे में उसकी पहचान वालों के बारे में जाना । यानी कि तुम अब हर उस बात के बारे मेँ जान चुके हो जो रंजीत श्रीवास्तव से तालुक रखती हैं ।'"
राजीव ने पहलू बदला । मुंह से फिर भी कुछ नहीं बोला । नकाबपोश ने अपने लबादे से सिगरेट का विदेशी पैकट और लाईटर निकाला । जिन्हें कि राजीव के सामने टेबल पर रखकर बोला----- "रंजीत श्रीवास्तव यह सिगरेट पीता है और यह लाईटर सोने का है । ऐसे उसके पास बीसियों लाईंटर हैं । सिगरेट सुलगाओं ।"
"मैँ सिगरेट नहीँ पीता ।'" राजीव कें हौंठे खुले ।
"सिगरेट नहीं पीते?" नाकाबपोश हंसा---" फिर तो शराब भी नहीं पीते होगे?"
"नहीं I”
" यानीकिं सुफी आदमी हो ।" वह पुनः हँसा ।
"तुम तो इस प्रकार हंस रहे हो, जैसे सूफी होना पाप हैं I" राजीव कड़वे स्वर में कहा ।
"नहीँ! पाप नहीं बल्कि अच्छी आदत है I लेकिन ...... I" नकाबपोश ने उंगलियों में र्फसी सिगरेट का कश लिया…“अब तुम खुद को राजीव समझना छोड दो । तुम रंजीत श्रीवास्तव हो । विशालगढ़ कै अरबोंपति. व्यक्ति I 'बहुत-बडी हस्ती I इसलिए वही करो जो रंजीत श्रीवास्तव करता है । वह सिगरेट पीता हे । शराब पीता है I औरतों को टांगों पर बिठाना और उन्हे उतार देना आम बात है उसके लिए । दुनिया का कोई भी बुरा काम नहीं जो उसने न किया हो । अपनी दौलत का खूब फायदा उठाया हे उसने । तुम्हें भी अब वहीँ करना है जो रंजीत श्रीवास्तव करता है । अब `तुम-तुम नहीं रंजीत श्रीवास्तव हो I”
“परन्तु .....!" राजीव ने व्याकुल स्वर में कहा-"मैं यह सब नहीं ' कर सकता । तमाम जिन्दगी बहुत ही सादे और शरीफाना ढंग से बिताई है । यह बातें करना मेरे लिए कठिन है I”
"छः महीने के लिए । समझें छ: महीने के लिए तुम्हें वह सब करना है जो रंजीत श्रीवास्तव करता है । तुम्हारा मकसद उसकी दौलत को मेरी तरफ सरकाना है, न कि वहां जाकर ऐश करना । यह सब बातें तुम मात्र दिखावे के लिए भी कर सकते हो I या फिर तुम्हारी रजनी शाह से मंगनी हो गई है, इसलिए अब तुम औरतों की संगत से दूर हो जाना चाहते. हो । यानी कि वहां पहुचकर ऐसा कोई भी ड्रामा कर सकते हैं I ।"
राजीव सिर हिलाकर रह गया . . . . . ।।
"एक बात याद रखना I" एकाएक नकावपोश का स्वर . हिंसक हो उठा-"इस काम में किसी प्रकार की लापरवाही नहीं होनी चाहिए I मैं हर हाल में रंजीत श्रीवास्तव की दौलत हथिया कर अरबपति बनना चाहता हूं। तुम तो अब इस ड्रामे में आए हो ।। मैं कई बरसों से इस काम के लिए मेहनत कर रहा हूं।"
"तुम्हारी बात हर हाल में पूरी हो, इस बात का मेंने ठेका नहीँ लिया l" राजीव कह उठा ।
"क्या मतलब?” नकाबपोश की सुर्खं आंखें सिंकुड़ती चली गई ।
"तुमने मुझे जो काम करने के लिए कहा है, वह मैँ कर रहा हू। काम कब और कितना पूरा होता है । में तुम्हारी आशाओं पर कितना खरा उतरता हू यह बाद की बात है । यह बात अलग है कि मैँ अपनी तरफ से किसी भी तरह की कमी नहीं छोडूंगा ।" राजीव ने उसकी लाल सुर्ख आंखों में झांका ।
"तुम अपनी तरफ़ से किसी भी तरह की कमी नहीं छोड्रोगे ।"
"नहीं छोड़ूंगा I”
“बस फिर चिन्ता की कोई बात नहीं, बाकी सबकुछ ठीक हो जाएगा ।" नकाबपोश ने सिर हिलाया । कश लेकर स्थिर लहजे में राजीव से कहा… “सिगरेट पियो ।" अनमने मन से राजीव ने सिगरेट का नया पैकेट खोला और सिगरेट सुलमाकर उल्टे सीधे ढंग से कश लेने लगा । पहली बार उसने सिगरेट पी थी ।
" सिगरेट इस तरह पीने की आदत डालो कि देखने वाले को लगे जैसे तुम लम्बे समय से यह काम करते आ रहे हो, अनाड्रियों की तरह मत पियो । खुद को सिगरेट कै आदी दिखाने कै लिए ज्यादा से ज्यादां सिगरेट पियो ताकि तुम्हारी मूवमेंट सामान्य लगे । "
कश लेने के पश्चात् राजीव बोला ।
" तुम कुछ मेरी बातों का भी ज़वाब दे दो ।"
" पूछो !"
"तुम मुझे रंजीत श्रीवास्तव बनाने जा रहे हो?” राजीव ने कहा ।
"हा । "
"तो कम से कम यह तो बता दो कि मुझे इस अरबपति व्यक्ति की जगह पर कैसे बिठाओगे? यह काम इतना आसान तो होगा नहीं, राजीव श्रीवास्तव कोई मामूली हस्ती तो हे नहीं I"
"ठीक कहते हो । यह काम आसान नहीं है । बहुत कठिन है । हर किसी के बस का भी नहीं है । शायद कोई भी इस काम को नहीं कर सकता । परन्तु मैं पलक झपकते ही कर सकता हू I”
"वही तो मैं पूछ रहा हूं कैसे?" राजीव ने उसकी नकाब से झांकती आंखों में झांका ।
"इस सारे काम को देवराज चौहान करेगा ।" "देवराज चौहान । कौन देवराज चौहान?" राजीव ने चौक्रक्तरु देखा उसे ।
" तुम नहीँ जानते देवराज चौहान को । बहुत खतरनाक आदमी है वह । जो कर जाये समझो वही कम । वह ऐसा तूफान हे, जिसे कोई रोक नहीं सकता । ऐसा पहाड है जिसे कोई काट नहीं सकता ।"
"मैं अभी भी कुछ नहीँ समझा ।” राजीव कै स्वर में असमंजसता कै भाव थे ।
" तुम कुछ नहीं समझोगे । उस शैतानी शख्यियत को सामने पाकर भी तुम कुछ नहीँ समझ सकते ।” नकाबपोश कश लेते हुए कह उठा---“ उसे समझ पाना बहुत कठिन है । उसे पार करना भी वहुत मुश्किल काम हे । आगे का सारा काम वही करेगा । अबं मैं नहीं तुम्हारे पास देवराज चौहान आएगा । छ: महीनों के लिए वहीँ तुम्हारा मालिक होगा । वह जो कहेगा, वहीँ तुम्हें करना होगा । इस ब्रीच शायद ही मैँ तुमसे मिलूं। एक तरह से तुम यहीं समझकर चलना कि मैं ही देवराज चौहान हूं । यानी कि जो देवराज चौहान कहेगा वह तुम्हें हर हाल में मानना पड़ेगा ।”
राजीव ने अजीब-सी निगाहों से नकाबपोश को देखा ।
"तुम तो ऐसे बात कर रहे हो जैसे वह देवराज चौहान ना होकर......!"
"मैंने कहा ना, तुम क्या कोई भी उसे जितना समझे । समझो कम समझा । जब उससे मिलोगे तो घीरे-धीरे समझ जाओगे। देवराज चौहान को समझ पाना किसी कै बस का भी नहीं है । वह यारों का यार और दुश्मनों के लिए खूंखार भेडिया हे । शिकारी चीता है । मौत का फ़रमान हे ।" नकाबपोश स्थिर लहजे में कह रहा था ।
"बस-बस, अब वस भी करो ।” राजीव हाथ उठाकर कह उठा-----" मुझे लगता है, तुम जैसे देवराज चौहान के बारे में ही बताते रहोगे मैंने तुम्हें टोका नहीं तो! जितना बता दिया, उतना ही बहुत । बाकी खुद उस से जान लूंगा ।"
नकाब मे छिपे नकाबपोश के होंठ मुस्कराहट कै रूप में फैलते चले गए ।
" देवराज चौहान मुझे रंजीत श्रीबास्तव कैसे बनायेगा? और .......फिर रंजीत श्रीवास्तव का क्या होगा, जब मैँ रंजीत श्रीवास्तव बन जाऊंगा? यह बस बातें मुझे मालूम होनी चाहिए I" राजीव ने अपनी बात को जारी रखा I