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वारदात complete novel

बिकास नगर ।। विशालगढ़ का व्यस्ततम इलाका और इसी इलाके के व्यस्तम पुलिस स्टेशन में आज हलचल मची हुई थी । पुलिस स्टेशन का चार्ज सम्भालने आज दिल्ली से नया इन्समेक्टर आ रहा था ।। जिसके बारे में वहां सबको मालूम ही हो चुका था कि वह बहुत ही सख्त मिजाज का इन्सपेक्टर है । इसलिए हर कोई घबराया हुआ-सा उसके स्वागत की तैयारियों में व्यस्त था I

वह और कोई नहीँ इन्सपेक्टर सूरजभान था ।

चन्द्रप्रकाश दिवाकर ने पुलिस कमिश्नर राममूर्ति को कहकर इन्सपेक्टर सूरजभान का ट्रांसफ़र तो करवा दिया था । कहा था सूरजभान की ट्रांसफर दिल्ली से बाहर कहीं भी कर दें, परन्तु वह यह कहना भूल गया था कि पूरे हिन्दुस्तान में विशालगढ़ में न करें, जहां कि उसने अपने फरार बेटे और उसके दोस्तों को छिपा रखा था ।

बहुत ही अजीब और खतरनाक इत्तफाक था कि बिशालगढ़ में बिकास नगर धनाढ्य इलाके कै थाने में थाना इच्चार्ज की जरूरत थी और कमिश्नर राममूर्ति ने इन्सपेक्टर सूरजभान का ट्रांसफर वहीँ कर दिया था ।।

अगर यह बात चन्द्रप्रकाश दिवाकर को मालूम हो जाती कि सूरजभान को विशालगढ़ भेजा जा रहा है तो वह बौखला उठता I हर हाल में उसका ट्रांसफ़र रुकवाकर रहता परन्तु उसे मालूम नहीं हो सका था । बस वह इतना ही जान पाया था कि इन्सपेक्टर सूरजभान क्रो दिल्ली से बाहर ट्रांसफर कर दिया गया ।

इन्सपेक्टर सूरजभान दिवाकर, हेगड़े और खेड़ा को तलाश करना चाहता था । उसे यह ट्रांसफर पसन्द नहीं आया था, परन्तु वह कुछ कर भी नहीं सकता था । आँफिसर का ऑर्डर था और वह भी ऐसे आँफिसर का आँर्डरं जो चन्द्रप्रकाश दिवाकर जेसे खरबोंपति इन्सान के हाथों कठपुतली बना हुआ है । सूरजभान

खामोशी से इस ट्रांसफर क्रो स्वीकार करके विशालगढ़, नए थाने का चार्ज सम्भालने रवाना हो गया था I

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फीनिश

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नकाबर्पोश ने टीं०र्वी०-वी०सी०आर बन्द किया और सिगरेट सुलगाकर सामने सोफे पर राजीव को देखा जो कि बन्द हो जाने पर अभी तक टीं०वी० को देखे जा रहा था ।

दोनों विशालगढ़ के खूबसूरत सजे सजाए फ्लैट में पिछले दो दिनों से थे । राजीव अभी तक नकाबपोश के चेहरें की एक झलक भी न देख पाया था ।

दो दिनों से नकाबपोश, राजीव को रंजीत श्रीवास्तव की और उसकी पहचान'वालों की वीडियो फिल्में दिखा रहा था । राजीव रंजीत श्रीवास्तव से सम्बन्धित ही बात को अपने दिमाग में सुरक्षित रखता जा रहा था । उसे यह देखकर तो जहान-भर की हैरानी हुई कि रंजीत श्रीवास्तव हू-ब-हू उसकी ही काॅपी है ।

उनके चेहरों में समानता ही नहीं बल्कि दोनों के चेहरे एकसमान थे । उसे तो यही लगा जैसे टी वी स्कीन पर वह घूम-फिर रहा है ।

नकाबपोश ने धुआं उगला और राजीव पर निगाहें टिकाकर बोला ।

"पिछले दो दिनों से तुमने टी०वी० पर क्या देखा राजीव?" राजीव ने टी०दी० से निगाहें हटाकर नकाबपोश पर टिका दीं ।

उसे खामोश देखकर नकाबपोश ने सिगरेट का एक कश लिया और गम्भीर स्वर में बोला।

"राजीव मल्होत्रा पिछले दो दिनों से तुम वी०सी०आर० पर ~ रंजीत श्रीवास्तव जैसे अरबों खरबो पति व्यक्ति के बारे में जानकारी , प्राप्त कर रहे हो । तुमने रंजीत श्रीवास्तव और उसकी हर पहचान वाले को वी०सी०आर०-टीं०वी० में देखा । नौकर से लेकर उसकी कम्पनियों के व्यक्तियों को देखा ही नहीं, उनके नाम और घर बार कै बारे में भी जाना । रंजीत श्रीवास्तव की मंगेतर रजनी शाह के बारे में उसकी पहचान वालों के बारे में जाना । यानी कि तुम अब हर उस बात के बारे मेँ जान चुके हो जो रंजीत श्रीवास्तव से तालुक रखती हैं ।'"

राजीव ने पहलू बदला । मुंह से फिर भी कुछ नहीं बोला । नकाबपोश ने अपने लबादे से सिगरेट का विदेशी पैकट और लाईटर निकाला । जिन्हें कि राजीव के सामने टेबल पर रखकर बोला----- "रंजीत श्रीवास्तव यह सिगरेट पीता है और यह लाईटर सोने का है । ऐसे उसके पास बीसियों लाईंटर हैं । सिगरेट सुलगाओं ।"

"मैँ सिगरेट नहीँ पीता ।'" राजीव कें हौंठे खुले ।

"सिगरेट नहीं पीते?" नाकाबपोश हंसा---" फिर तो शराब भी नहीं पीते होगे?"

"नहीं I”

" यानीकिं सुफी आदमी हो ।" वह पुनः हँसा ।

"तुम तो इस प्रकार हंस रहे हो, जैसे सूफी होना पाप हैं I" राजीव कड़वे स्वर में कहा ।

"नहीँ! पाप नहीं बल्कि अच्छी आदत है I लेकिन ...... I" नकाबपोश ने उंगलियों में र्फसी सिगरेट का कश लिया…“अब तुम खुद को राजीव समझना छोड दो । तुम रंजीत श्रीवास्तव हो । विशालगढ़ कै अरबोंपति. व्यक्ति I 'बहुत-बडी हस्ती I इसलिए वही करो जो रंजीत श्रीवास्तव करता है । वह सिगरेट पीता हे । शराब पीता है I औरतों को टांगों पर बिठाना और उन्हे उतार देना आम बात है उसके लिए । दुनिया का कोई भी बुरा काम नहीं जो उसने न किया हो । अपनी दौलत का खूब फायदा उठाया हे उसने । तुम्हें भी अब वहीँ करना है जो रंजीत श्रीवास्तव करता है । अब `तुम-तुम नहीं रंजीत श्रीवास्तव हो I”

“परन्तु .....!" राजीव ने व्याकुल स्वर में कहा-"मैं यह सब नहीं ' कर सकता । तमाम जिन्दगी बहुत ही सादे और शरीफाना ढंग से बिताई है । यह बातें करना मेरे लिए कठिन है I”

"छः महीने के लिए । समझें छ: महीने के लिए तुम्हें वह सब करना है जो रंजीत श्रीवास्तव करता है । तुम्हारा मकसद उसकी दौलत को मेरी तरफ सरकाना है, न कि वहां जाकर ऐश करना । यह सब बातें तुम मात्र दिखावे के लिए भी कर सकते हो I या फिर तुम्हारी रजनी शाह से मंगनी हो गई है, इसलिए अब तुम औरतों की संगत से दूर हो जाना चाहते. हो । यानी कि वहां पहुचकर ऐसा कोई भी ड्रामा कर सकते हैं I ।"

राजीव सिर हिलाकर रह गया . . . . . ।।

"एक बात याद रखना I" एकाएक नकावपोश का स्वर . हिंसक हो उठा-"इस काम में किसी प्रकार की लापरवाही नहीं होनी चाहिए I मैं हर हाल में रंजीत श्रीवास्तव की दौलत हथिया कर अरबपति बनना चाहता हूं। तुम तो अब इस ड्रामे में आए हो ।। मैं कई बरसों से इस काम के लिए मेहनत कर रहा हूं।"

"तुम्हारी बात हर हाल में पूरी हो, इस बात का मेंने ठेका नहीँ लिया l" राजीव कह उठा ।

"क्या मतलब?” नकाबपोश की सुर्खं आंखें सिंकुड़ती चली गई ।

"तुमने मुझे जो काम करने के लिए कहा है, वह मैँ कर रहा हू। काम कब और कितना पूरा होता है । में तुम्हारी आशाओं पर कितना खरा उतरता हू यह बाद की बात है । यह बात अलग है कि मैँ अपनी तरफ से किसी भी तरह की कमी नहीं छोडूंगा ।" राजीव ने उसकी लाल सुर्ख आंखों में झांका ।

"तुम अपनी तरफ़ से किसी भी तरह की कमी नहीं छोड्रोगे ।"

"नहीं छोड़ूंगा I”

“बस फिर चिन्ता की कोई बात नहीं, बाकी सबकुछ ठीक हो जाएगा ।" नकाबपोश ने सिर हिलाया । कश लेकर स्थिर लहजे में राजीव से कहा… “सिगरेट पियो ।" अनमने मन से राजीव ने सिगरेट का नया पैकेट खोला और सिगरेट सुलमाकर उल्टे सीधे ढंग से कश लेने लगा । पहली बार उसने सिगरेट पी थी ।

" सिगरेट इस तरह पीने की आदत डालो कि देखने वाले को लगे जैसे तुम लम्बे समय से यह काम करते आ रहे हो, अनाड्रियों की तरह मत पियो । खुद को सिगरेट कै आदी दिखाने कै लिए ज्यादा से ज्यादां सिगरेट पियो ताकि तुम्हारी मूवमेंट सामान्य लगे । "

कश लेने के पश्चात् राजीव बोला ।

" तुम कुछ मेरी बातों का भी ज़वाब दे दो ।"

" पूछो !"

"तुम मुझे रंजीत श्रीवास्तव बनाने जा रहे हो?” राजीव ने कहा ।

"हा । "

"तो कम से कम यह तो बता दो कि मुझे इस अरबपति व्यक्ति की जगह पर कैसे बिठाओगे? यह काम इतना आसान तो होगा नहीं, राजीव श्रीवास्तव कोई मामूली हस्ती तो हे नहीं I"

"ठीक कहते हो । यह काम आसान नहीं है । बहुत कठिन है । हर किसी के बस का भी नहीं है । शायद कोई भी इस काम को नहीं कर सकता । परन्तु मैं पलक झपकते ही कर सकता हू I”

"वही तो मैं पूछ रहा हूं कैसे?" राजीव ने उसकी नकाब से झांकती आंखों में झांका ।

"इस सारे काम को देवराज चौहान करेगा ।" "देवराज चौहान । कौन देवराज चौहान?" राजीव ने चौक्रक्तरु देखा उसे ।

" तुम नहीँ जानते देवराज चौहान को । बहुत खतरनाक आदमी है वह । जो कर जाये समझो वही कम । वह ऐसा तूफान हे, जिसे कोई रोक नहीं सकता । ऐसा पहाड है जिसे कोई काट नहीं सकता ।"

"मैं अभी भी कुछ नहीँ समझा ।” राजीव कै स्वर में असमंजसता कै भाव थे ।

" तुम कुछ नहीं समझोगे । उस शैतानी शख्यियत को सामने पाकर भी तुम कुछ नहीँ समझ सकते ।” नकाबपोश कश लेते हुए कह उठा---“ उसे समझ पाना बहुत कठिन है । उसे पार करना भी वहुत मुश्किल काम हे । आगे का सारा काम वही करेगा । अबं मैं नहीं तुम्हारे पास देवराज चौहान आएगा । छ: महीनों के लिए वहीँ तुम्हारा मालिक होगा । वह जो कहेगा, वहीँ तुम्हें करना होगा । इस ब्रीच शायद ही मैँ तुमसे मिलूं। एक तरह से तुम यहीं समझकर चलना कि मैं ही देवराज चौहान हूं । यानी कि जो देवराज चौहान कहेगा वह तुम्हें हर हाल में मानना पड़ेगा ।”

राजीव ने अजीब-सी निगाहों से नकाबपोश को देखा ।

"तुम तो ऐसे बात कर रहे हो जैसे वह देवराज चौहान ना होकर......!"

"मैंने कहा ना, तुम क्या कोई भी उसे जितना समझे । समझो कम समझा । जब उससे मिलोगे तो घीरे-धीरे समझ जाओगे। देवराज चौहान को समझ पाना किसी कै बस का भी नहीं है । वह यारों का यार और दुश्मनों के लिए खूंखार भेडिया हे । शिकारी चीता है । मौत का फ़रमान हे ।" नकाबपोश स्थिर लहजे में कह रहा था ।

"बस-बस, अब वस भी करो ।” राजीव हाथ उठाकर कह उठा-----" मुझे लगता है, तुम जैसे देवराज चौहान के बारे में ही बताते रहोगे मैंने तुम्हें टोका नहीं तो! जितना बता दिया, उतना ही बहुत । बाकी खुद उस से जान लूंगा ।"

नकाब मे छिपे नकाबपोश के होंठ मुस्कराहट कै रूप में फैलते चले गए ।

" देवराज चौहान मुझे रंजीत श्रीबास्तव कैसे बनायेगा? और .......फिर रंजीत श्रीवास्तव का क्या होगा, जब मैँ रंजीत श्रीवास्तव बन जाऊंगा? यह बस बातें मुझे मालूम होनी चाहिए I" राजीव ने अपनी बात को जारी रखा I
 
"अब इस बारे में तुमसे कोई बात नहीँ करूगा l” नकाबपोश ने कहा----“तुमने जो बात करनी हो देवराज चौहान से करना I बस, मेरा काम यहीं तक था । अब इतना बता दो कि तुमने वी०सी० आर०-टी०बी० पर जिन लोगों को देखा जिनके नाम मैंनें तुम्हें बताए वह तुम्हें याद रहेंगे कि नहीं? भूल तो नहीं जाओगे ।”

"'सबकुछ याद रहेगा I”

"जो मैंने बताया हे, उसे याद रखना भी जरूरी है I नहीं तो किसी भी मौके पर गड़बड़ हो सकती है । क्योंकि कभी ऐसा हो सकता है कितु तुम्हारा खास आदमी तुम्हारे सामने आये और -तुम उसे पहचान भी ना सको ।"

राजीव सिर हिलाकर रह गया I

"कुछ और पूछना चाहते हो या फिर में चलू?" नकाबपोश ने कहा I

“एक बात I"

" क्या ?"

“देवराज चौहान का रंजीत श्रीवास्तव से क्या वास्ता है?”

"वास्ता ?" नकाबपोश हंसा-"बहुत्त गहरा वास्ता है I देवराज चौहान ने छ: महीने पहले रंजीत श्रीवास्तव के यहां किसी प्रकार ड्राइवर की नौकरी हासिल की थी I तब नौकरी लगवाने वाले को देवराज चौहान ने पचास हजार रुपया दिया था I तुम इसी से समझ सकते हो कि रंजीत श्रीवास्तव की जगह पर घुस पाना कितना कठिन हे । वहां का हर मुलाजिम बरसों पुराना है I किसी नये मुलाजिम को रखना गंवारा नहीं किया जाता है I"

"तुम देवराज चौहान के बारे में बता रहे थे ।" राजीव ने कहा।

"हां I छः महीने पहले बतौर ड्राइवर वह रंजीत श्रीवास्तव कै नौकरों कै ग्रुप में दाखिल हुआ और आज वह रंजीत श्रीवास्तव की आंख का तारा बना हुआ डै । रंजीत श्रीवास्तव का राइट हेड I वह जहा भी जाता है, देवराज चौहान कै साथ जाता है वह जो भी करता हे देवराज चौहान की जानाकारी में करता है I रंजीत श्रीवास्तव को बेशक ना पता हो कि आने वाले पल में उसने क्या करना है, परन्तु देवराज चौहान क्रो मालूम होता हे कि रंजीत श्रीवास्तव अब वया करेगा I यानी कि देवराज चौहान रंजीत श्रीवास्तव के दिलोदिमाग में पूरी -तरह छाया हुआ है I”

राजीव ने समझने वाले भाव में सिर हिलाया ।

"ऐसे में..... ।" नकाबपोश पुन: बोला-“अगर देवराज चौहान रजीत श्रीवास्तव को अदला बदली करना चाहे तो बेहद आसानी के साथ कर सकता हे । कहीँ कोई शक हो जाने की भी गुंजाइश -नहीं I"

“ठीक कह रहे हो तुम ।"

नकाबपोश ने अपने कपडों में से एक छोटी सी फाइल निकाली l

"देवराज चौहान जल्दी ही तुम्हारे पास आयेगा । जब तक वह नहीं आता, इस फ्लैट में बन्द रहकर तुम इस फाइल में मोजूद रंजीत श्रीवास्तव कैं हस्ताक्षरों का अभ्यास करो । नकाबपोश ने कहा I

राजीव ने फाइल थामी और बोला ।।

“एक बात और बता दो I”

" वह भी पूछो l”

“तुम देवराज चौहान कै इशारे पर काम कर रहे हो या देवराज चौहान तुम्हारे इशारे पर काम कर रहा है?"

“इस बात का जवाब तुम्हें कभी नहीं मिल सकेगा । खामखाह की बातों की तरफ़ ध्यान मत दो I"

राजीव ने इस बारे में फिर कुछ नहीँ पूछा l

"देवराज चौहान कदम-कदम पर तुम्हारी सहायता करेगा !"

उसकी रंजीत श्रीवास्तव के यहां चलती है । तुम्हें हर हाल में कामयाब होना है । नाकामयाबी तुम्हारे लिए खतरनाक सिद्ध होंगी I”

"धमकी दे रहे हो ।"

"समझा रहा हू।" नकाबपोश की आवाज में सख्ती आ गई-"मैंने तुम पर वहुत मेहनत की हैं । तुम मर चुके थे, मैंने तुम्हें… जिन्दा कराया तो सिर्फ इसलिए कि तुम हमारा यह काम करो I उस तांत्रिक ने तुम्हें किसी भी कीमत पर जिन्दा नहीं करना था I यह तो मैं ही जानता हू कि उसे इस काम कै लिए तैयार करने कै लिए मुझें कितनी मेहनत करनी पडी I इस पर भी अगर तुम हमारा अहसान नहीँ मानते हो तो वहुत दुख की बात होगी !"

"अहसान मानता हूं मैं । तभी तो तुम लोगों का साथ दे रहा हूं । मेरी पूरी कोशिश होगी कि जिस काम में मैँ हाथ डालने जा रहा हूं उसमेँ हर तरह से सफ़लता प्राप्त करके ही रहूं ।" राजीव ने दृढ शब्दों में कहा ।।

"गुड ।" नकाबपोश ने तसल्ली भरे अन्दाज में सिर हिलाया।

"मुझे भी पूरा भरोसा हे कि तुम कामयाब होकर रहोगे, क्योंकि तुमने वापस जाकर अंजना से शादी करनी है। अपने दोस्तों से अपनी मौत का बदला लेना है । बहुत कुछ करना हे तुम्हें अभी । जो रकम तुम देवराज चौहान के हवाले करते रहोगे । जिसके बारे में हम सोच रहे हैं कि एक अरब तक वह रकम पहुच जानी चाहिए, उसमें भी तुम्हारा कुछ ना कुछ हिस्सा होगा । यानी के मोटा हिस्सा और अन्य काम तुम तभी कर सकोगे जब तुम कामयाब रहोगे । मैं जा रहा हूं । तुम रंजीत श्रीवास्तव कै हस्ताक्षरों को हू-ब-हू कागजों पर उतारने का अभ्यास करो यह काम बहुत ज़रूरी हे । खाने-पीने का सामान फ्लैट में भरा पड़ा है l यहां से बाहर जाने की गलती मत कर बैठना । क्योंकि तुम्हारा चेहरा रंजीत श्रीवास्तव से मिलता है और वह इस शहर की सबसे बडी हस्ती हैं । खेल खराब हो सकता हे तुम्हारे बाहर जाने से ।"

राजीव'ने समझने वाले भाव में सिर हिलाया ।

“ देवराज चौहान बहुत जल्द तुमसे मिलने आयेगा I बाकी बात वही करेगा ।" कहने के साथ ही नकाबपोश बाहर निकल गया । राजीव ने उठकर दरवाजा भीतर से बन्द कर लिया ।

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फीनिश

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उसके बाल बिखरे हुए थे । शेव के बाल कांटों की तरह बढे हुए थे । बदन पर पड़े कपडे तो जैसे चीथड़े चीथड़े होकर झूल रहे थे । बहुत खस्ता हालत थी उसकी । वह पागल की तरह लग रहा था l कमरे में सिवाय उसके और कुछ भी नहीं था । फर्नीचर तक नहीं था । दस बाई बारह के खाली कमरे-में वह भूखे शेर की भाँति घूमने लगता और जब थक जाता तो दीवार के सहारे बैठकर गहरी गहरी सांस लेने लगता । उसके चेहरे के भाव तो बढी हुई शेव के पीछे छिपे हुए थे अलबत्ता लाल घधकती आंखे स्पष्ट नजर आ रही थीं ।

उसके बाल बिखरे हुए थे । शेव के बाल कांटों की तरह बढे हुए थे । बदन पर पड़े कपडे तो जैसे चीथड़े चीथड़े होकर झूल रहे थे । बहुत खस्ता हालत थी उसकी । वह पागल की तरह लग रहा था l कमरे में सिवाय उसके और कुछ भी नहीं था । फर्नीचर तक नहीं था । दस बाई बारह के खाली कमरे-में वह भूखे शेर की भाँति घूमने लगता और जब थक जाता तो दीवार के सहारे बैठकर गहरी गहरी सांस लेने लगता । उसके चेहरे के भाव तो बढी हुई शेव के पीछे छिपे हुए थे अलबत्ता लाल घधकती आंखे स्पष्ट नजर आ रही थीं ।

तभी दरवाजा खुलने की आवाज आई । उसकी लाल आंखे वन्द दरवाजे पर जा टिकीं। , ,

दरवाजा खुला । दो दादा टाईप व्यक्तियों ने भीतर प्रवेश किया । उस दाढी वाले कैदी के प्रति वह दोनों बेहद सावधान नजर आ रहे थे ।

उनके पीछे मरियल से नजर जाने वाले व्यक्ति ने भीतर प्रवेश किया जिसने हाथों में खाने की ट्रे थाम रखी थी । आगे बढकर उसने खाने की ट्रे कैदी के सामने रख दी ।

कैदी ने दोनों बदमाशों और खाना लाने वाले पर निगाह मारी उसको सुर्ख निगाहे' खाने की ट्रे पर जा टिकीं । ट्रे को उसने अपने करीब खींचा और खाना खाने में व्यस्त हो गया ।

"तुम जाओ ।" दादा टाईप व्यक्ति ने खाना लाने वाले से कहा----"खाली बर्तन हम ले आयेंगे !"

वह मरियल व्यक्ति बाहर निकल गया !!

खाना खाते-खाते एकाएक कैदी ठिठका और दोनों को देखकर गुर्राया ।

"वह कुत्ता कहां है । कई दिनों से नजर नहीं आया ।"

दोनों में से कोई भी कुछ नहीं बोला ।। जेसे उसका यह कहना साधारण बात हो ।

वह पुन: खाने मे व्यस्त हो गया । तव तंक वहां खामोशी छाई रही जब तक कि खाने की ट्रे में रखा सारा खाना उसने खाकर ट्रे को एक तरफ सरका नहीं दिया । फिर उसने दोनों की

तरफ देखा ।

"कम से कम सिगरेट तो पिला दो ।"

ठीकं उसी… समय दरबाजे से हवा में उडता हुआ विदेशी सिगरेट का पैकेट उसके पास आकर गिरा । साथ में सोने का लांइंटर भी ।

सिगरेट के उस ब्रांड को देखते ही दाढी वाला उछलकर खड़ा हो गया ।

निगाहें दरवाजे की तरफ उठ गई। जहां पर कि रंजीर्त श्रीवास्तव अपने खुबसुरत व्यक्तित्व के साथ खडा था ।।

“तुम ।" दाढी वाले के होठों से निकला । चेहरे पर कठोरता की परत बिछती चली गई थी ।

"हां मैँ ।" रंजीत श्रीवास्तव ने भीतर प्रवेश करते हुए सिर हिलाया-“सोचा मुलाकात कर ही आऊं । -बहुत देर हो गई तुमसे मिले । शायद महीना-भर तो हो ही गया होगा क्यों मैंने गलत तो नही कहा ?"

फिर वह वहां खडे दोनों दादा टाईप व्यक्तियों से बोला-"बाहर जाकर खड़े हो जाओं ।"

उन्होंने खाने की ट्रे उठाई और वाहरं निकल गये।

कैदी ने पैकेट में से सिगरेट सुलगाई और कश लेकर लापरवाही से भरे स्वर में कह उठा ।

"कुछ देर पहले मैँ पूछ ही रहा था कि कुत्ता कहाँ हे । आया नहीं वहुत दिनों से I”
 
रंजीत श्रीवास्तव कै होंठों पर मुस्कान की रेखा उभरी । बोला कुछ मी नहीं ।

"मेरी दी हुई गाली भी तुम्हें फूल की तरह लगती होगी । कैदी ने जहर मरे स्वर में कहा ।

" ठीक कहा तुमने I” रंजीत श्रीवास्तव हंसा-"तुम्हारे मुंह से निकली हर बात मैँ हंसकर सह सकता हूं । क्योकि मेरा सब कुछ तुम्हारा दिया हुआ ही तो है । तुमसे मेरी क्या नाराजगी है । ”

"मानना पडेगा, बहुत वडे कुत्ते हो तुम ।" कैदी ने दांत पीसकर कहा I

"चलो, जो भी कह लो । तुम्हारी खुशी भें ही मेरी खुशी हे ।"

"मेरी खुशी?” कैदी का लहजा खतरनाक हो उठा-“मेरी खुशी तो तुम्हारे शरीर कै टुकडे करने में है I”

"वह कभी भी पूरी नहीं होगी ।"

"शायद हो जाये।"

रंजीत श्रीवास्तव कंघे उचकाकर रह गया ।

"दो साल हो गए मुझे यहां कैद हुए ।” कैदी ने खूंखार लहजे - मे कहा ।

" जव तक तुम जिन्दा रहोगे तब तक कैदी ही रहोगे बेशंक , इस बात को बीस साल ही क्यों ना बीत जायें।" रंजीत श्रीवास्तव ने सामान्य लहजे में 'कहा-“इसलिए साल गिनना छोड दो ।”

"तुम मुझे मार क्यों नहीं देते ?" कैदी कै होठों से गुर्राहट निकली l

“मेरे लिए तुम्हारा जिन्दा रहना जरुरी है l मैं तुम्हें नहीं मार सकता । तुम्हारी जान नहीं ले सकता । अगर तुम मरना ही चाहते हो तो खुद आत्महत्या कर लो । जव तुम्हारे पास कोई नहीं होता तब अपनी जान दे सकते हो । रोकने वाला कोई नहीं होगा I”

रंजीत श्रीवास्तव ने लापरवाही से कहा ।

"मैं कभी भी आत्महत्या नहीं करूंगा ।"

" क्यों? " रंजीत श्रीवास्तव हंसा----“मरने से डर लगता है ना?"

"दो साल मुझे तुम्हारी कैद में हो गए । अब मौत और जिन्दगी एक जैसी ही लगती है l" कैदी ने गुर्राहृट भरे लहजे में कहा-"मर गया तो तुम्हारे सिर से बहुत बडा खतरा टल जायेगा,जिन्दा रहा तो शायद कभी तुझ कुत्ते को किए की सजा देने का मौका मिल जाये मुझे I"

"उम्मीद पर तो दुनिया कायम हे !" रंजीत श्रीवास्तव हंसा---" आखिरकार तुम इसी आशा में ही मरोगे ।”

“आजकल तो ऐश कर रहे होगे । " कैदी ने कड़वे स्वर में कहा ।

"आजकल क्या, मै तो तव से ऐश कर रहा हूं जब से तुम्हें कैद मेँ डाला हे । और मुझें आशा ही नहीं पूरा यकीन है किन्तु जब तक जिन्दा रहूंगा ऐश ही करता रहूगा, तुम्हारी मेहरबानी से ।"

कैदी दांत पीसकर आग सें भरी निगाहों से रंजीत श्री वास्तव को देखता रह गया ।

"वेसे चाहो तो इस नर्क से भरी जिंदगी से छूटकारा पाकर मेरी ही तरह ऐश कर सकते हो ।"

" उसका पता बताकर ?"

"हा । कहा रखा है उसे तुमने? मैँ अपनी राह के कटि को हमेशा-हमेशा कै लिए… I"

" तेरे जैसे कुत्ते का भरोसा करना आत्महत्या करने के बराबर हे । तूने मेरे साथ जो सलूक किया वह सामने ही है। ना तो त्तेरे से छिपा है और ना ही मेरे से । सही बात तो यह हे कि में जिन्दा इसी वजह से हू कि तुझे उसका पता नहीं बता रहा । उसका पता मेरे मुंह से निकलने कीं देर हे कि दूसरे घण्टे शहर के किसी हिस्से मे मेरी लाश पडी होगी । वास्तव में तुझुसे वडा जलील इन्सान मैँने आज तक नहीं देखा ।"

"वहम में पड़ रहे हो । उसका पता बताकर अपना ही भला. करोगे i तुम्हारी सारी तकलीफें मैं दूर कर दूंगा । इस जगह से हटकर किसी इच्छी जगह पर ....!"

"जुबान बन्द ऱख अपनी !" कैदी ने गुर्राकर कहा तो रंजीत श्रीवास्तव कन्धों को झटका देकर रह गया ।

"ठीक हैं, मर्जी तुम्हारी I मैं चलता हूं।” कहने के साथ ही रंजीत श्रीवास्तव पलटा।

तभी कैदी का शरीर उछला और रंजीत श्रीवास्तव से जा टकराया I रंजीत श्रीवास्तव के होंठों से कराह निकली I

वह नीचे जा गिरां और उसकै ऊपर कैदी l पलक झपकते ही दांत किटकिटाकरं कैदी ने रंजीत श्रीवास्तव की पैंट की जेब से रिवॉल्वर निकाली और उसकी कमर से सटा दी I ”

"अब बोल कुत्ते !" रंजीत श्रीवास्तव हक्का बक्का रह गया I "

यह क्या कर रहा हे तू?" रंजीत श्रीवास्तव कै होंठों से ठगा-सा स्वर निकला I

“तेरी मौत का सामान इकट्ठा कर लिया है मैंने । अब बोल' कितनी गोलियां खायेगा ?”

" बेवकूफी मत कर I पीछे हट जा I रिवॉल्वर मुझे दे दे I"

" दो साल के बाद आज़ पहली बार तो आजादी का मौका मिला है I ” कैदी ने खतरनाक लहजे में कहा-"अब इस मौके को कैसे गंवा सकता हू । पैं चाहूं तो सिर्फ एक गोली तेरी खोपडी में उतारकर तेरा खेल हमेशा हमेशा के लिए खत्म कर दू । लेकिन मैँ ऐसा नहीं करूंगा I इसलिऐ नहीं करूगा कि जेसा खेल तूने खेला' था, कुछ वैसा ही अब में खेलूँगा । अब देखूंगा रंजीत श्रीवास्तव साहब कैसे चैन की नींद सोते हैं । कैसे करोडों अरबों की दौलत के ढेर पर बैठते हैं I"

"तू यहां से जिन्दा बाहर नहीं जा सकता-में… ।”

"बकबक मत कर । शब्दों के जाल में मुझे र्फसाने की चेष्टा बेकार हे । मैं यहां से `सुरक्षित निकल जाऊंगा । 'अब मुझें कोई ताकत नहीँ रोक सकती । खड़ा हो जा I”

रंजीत श्रीवास्तव खड़ा हो गया । कैदी ने रिबॉंल्वर की नाल उसकी कमर से लगा रखी थी I

वह बेहद सावधान था । फरारी का खूबसूरत मौका अपने हाथ से नहीं निकलने देना चाहता था ।

“अब बाहर खड़े अपने-दोनों हरामी कुतों को भीतर बुला I"

रंजीत श्रीवास्तव मजबूर था , रिवॉल्वर के सामने i उसने आवाज देकर बाहर ख़ड़े दोनों ख़तरनाक व्यक्तियों को भीतर बुलाया I

भीत्तर का दृष्य देखते ही वह चौंके I परन्तु कुछ कर नहीं सकते थे I कैदी ने रंजीत श्रीवास्तव को कवर कर रखा था I वह कुछ भी करने की चेष्टा करते तो रंजीत श्रीवास्तव की जान को खतरा पैदा हो सकता था I

"तुम दोनों दीवार के साथ लगकर खड़े हो जाओं । किसी भी तरह की चालाकी करने की चेष्टा मत करना, वरना तुम्हारा मालिक कुत्ते की मौत मरेगा।”

दोनों ने कैदी की बात मानी और शराफत से दीवार के साथ जा खड़े हुए ।

"अभी भी वक्त है रुक जाओ ।" रंजीत श्रीवास्तव का स्वर खोखला था ।

"चुप ।" कैदी दहाड़ उठा।

रंजीत श्रीवास्तव ने दांत भींच लिए ।

कैदी उसे साथ लिए आगे बढा । उन दोनों खतरनाक व्यक्तियों की तरफ से वह सावधान था । रंजीत श्रीवास्तव को साथ लिए वह कमरे से बाहर निकला और अगले ही पल उसने रंजीत श्रीवास्तव को वापस कमरे में धकेल दिया और पलक झपकते ही दरवाजा बन्द कर दिया ।

भीतर से दरवाजा खटख़टाये जाने का तेज स्वर आने लगा

उन आवाजों को सुनकर खाना लाने चाला मरियल-सा व्यक्ति वहा पहुंचा ।

लेकिन कैदी को बाहर और अन्यौ को भीतर पाकर वह ठगा सा खडा रह गया ।

"यहां और कितने लोग हैँ ?" कैदी ने उसकी तरफ रिवॉल्वर तानकर गुरर्टेहट भरे लहजे में पूछा

“क.....कोई नहीं ।" उस व्यक्ति ने घबराहटभरे स्वर मे कहा ।

“मुझे कोई कमीज-पेंट पहनने को दो-ज़ल्दी! फौरन ।।"

.

दो मिनट में ही कैदी कै वदन पर नई कमीज-पैंट थी । रिवॉल्वर की नाल उस मरियथ के सिर पर मारी तो वह बेहोश होकर नीचे गिर पड़ा । कैदी ने रिवॉत्वऱ जेब में डाली और बाहर आ गया । यह सस्ता घटिया-सा मकान था । गली के मोड पर ही उसे रंजीत श्रीवास्तव की विदेशी चमचमाती कार नजर आई । जिस पर खूबसूरती के साथ श्रीवास्तव लिखा था । कैदी ने कार की बॉडी पर ठोकर मारी और जहरंभरे स्वर मे बुदबुदा उठा ।

"रंजीत श्रीवास्तव r"

इसके साथ ही वह तेजी से आगे बढ गया ।

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फीनिश

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कैदी ने एक घर का वन्द दरवाजा खटखटाया । दो-तीन बार खटखटाने पर दरवाजा खुला I दरवाजा खोलने वाला पच्चीस छब्बीस वर्ष का युवक था I

उसने कैदी क्रो देखा I

"किससे मिलना है आपको?" उसने शालीन स्वर में पूछा ।

कैदी ने उसकै पेट पर हाथ रखकर उसे पीछे किया और भीतर प्रवेश कर गया ।

"यह क्या कर रहे हैं आप? भीतर क्यों आ गए?" युवक सकपकाकर कह उठा ।

"तुमने शायद मुझे पहचाना नहीं I” कैदी की आवाज मे नर्मी और बिश्वास का पुट था ।

"नं......नहीँ पहचाना ।" युवक ने असमंजसता से उसे देखा......"कौन हैँ आप?"

"ध्यान से देखो मुझे! शायद तुम्हें इस प्रश्न की आवश्यकता ही न रहे ।" कैदी मुस्कराया ।

युवक ने पहचानने वाली निगाहों से कैदी को देखा I काफी देर तक देखता ही रहा I फिर उसकी आंखों में अजीब सी चमक भरती चली गई [ होंठों से अजीब-से लहजे में आवाज निकली ।

"ड......डॉक्टर बैनर्जी?"

"हां I” कैदी जोकि डॉक्टर बैनर्जी ही था हंस पड़ा-"सही पहचाना तुमने । मैं बैनर्जी ही हू।" युवक स्तब्ध सा अपलक डॉक्टर बैनर्जी को देखता ही रह गया ।

आंखों में अविश्वास कै गहरे भाव छा गए थे । होंठ हिल रहे थे परन्तु कोई शब्द नहीं निकल रहा था ।

उसे इस तरह खामोश पाकर डॉक्टर बैनर्जी ने मुस्कराकर कहा ।

"अरे भई ! पानी वगैरह पिलाओ । इस तरह क्या देखे जा रहे हो मुझे?”

“य.....यह आपने अपनी क्या हालत बना रखी है? दो सालों से आप कहां थे ?"

"लम्बी कहानी हे । आराम से बैठकर बताऊंगा । पहले चाय…पानी का वन्दोवस्त करो और तव तक मुझे सोच लेने दो I सिगरेट होगी तुम्हारे पास ।।" डॉक्टर बैनर्जी ने युवक क्रो प्रश्नमरी निगाहों से देखा I

"नहीं I मैं तो सिगरेट पीता नहीं I आपको ला देता हूं ।" युवक ने गहरी सांस लेकर कहा और बाहर निकल गया ।

डॉक्टर बैनर्जी ने खुद ही फ्रिज से पानी निकालकर पिया । जल्दी ही युवक सिगरेट ले आया । डॉक्टर बैनर्जी ने सिगरेट सुलगाई और कश लेने लगा । वह किचन में चाय वगेरह तैयार करने लगा I इस बीच उनमें बात नहीं हुई ।
 
दस मिनट बाद हीँ डॉक्टर बैनर्जी और वह युवक आमने सामने बैठे चाय पी रहे थे । “इसमें कोई शक नहीं कि मैँ तुम्हारा गुनहगार हू ।" डॉक्टर बैनर्जी ने इन शब्दों के साथ खामोशी तोडी ।

"अगर आप मेरे गुनहगार हैँ तो मुझे बचाने वाले भी आप ही हैं I" युवक ने गम्भीर स्वर में कहा-" दो साल पहले अगर आपने समझदारी से काम नहीँ लिया होता तो आज'शायद मै जिन्दा भी नहीं होता I”

डॉक्टर बैनर्जी ने सहमति भरी मुद्रा में सिर हिलाया फिर पूछा I

"आजकल क्या कर रहे हो?”

"नौकरी, दो हजार रुपया माहवार लेकर गुजारा कर रहा हू । वक्त कट रहा है I”

डॉक्टर बैनर्जी कै होंठों पर अजीब सी मुस्कान फैल ग्ई ।

"रंजीत श्रीवास्तव दो हजार रुपये महीने की नौकरी कर रहा है । कोई मानेगा इस बात को?

"और कोई माने या ना माने?" रंजीत श्रीवास्तव स्वयं खुद मानता हे । युवक जो कि रंजीत श्रीवास्तव ही था, एकाएक मुस्कराकर कह उठा…"और में खुश हू' इस शांत जिन्दगी से I"

"तुम खुश हो !” बैनर्जी ने सिर हिलाया-“हो सक्रत्ता है तुम ठीक कह रहे हो,लेकिन मुझे तसल्ली नहीं। मैँ खुश नहीँ मेरे सीने में आग जल रही है । जानते हो मैं दो साल कहां रहा , उसी कुत्ते की कैद में । नर्क जैसी जिन्दगी बिताई हे मैंने वहां । मैँ उसका जीना हराम कर दूंगा l उसकी करतूत की सजा उसे देकर ही रहूंगा I मेरे कारण तुम यहां पहुंचे l अपने वजूद को भूल बैठे । ओर मेरे ही कारण अशोक रंजीत श्रीवास्तव बनकर ऐश करने लगा I अब वह मेरे ही कारण वहुत बुरी सजा भुगतेगा, वहुत जल्दी चन्द ही दिनों मेँ I" बैनर्जी की आबाज में गुर्राहट भर आईं थी ।

"लेकिन आपके साथ हुआ क्या था डॉक्टर बैनर्जी आप तो मुझे यहा' छोडकर यह कहकर गए थे कि दो घण्टों में वापस आ रहा हूं । और वापस लौटे आज दो सालों के बाद । अशोक ने क्यों कैद कर लिया था आपको ?"

“बताऊंगा ।" बैनर्जी ने सिर हिलाकर कहा-“लेकिन अभी मैं थका हुआ हूं। कुछ देर मुझे आराम कर लेने दो । थोडी सी नींद लेने दो । फिर तुम्हें सबकुछ बताऊगा । इस समय आराम करना मेरे लिए बहुत जरूरी हे I"

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फीनिश

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डॉक्टर बैनर्जी को आखों में नींद का नामोनिशान नहीं था । बीता वक्त बार-वार उनकी आखों कै सामने आ रहा था । फिर घीरे धीरे वह दो साल पहले कै वक्त में डूबते चल गए।

रंजीत श्रीवास्तव जवान था, खूबसूरत था ।

स्वयं खुद उनका फेमिली डॉक्टर था वह । रंजीत श्रीवास्तव के माता-पिता का देहान्त चार बरस पहले ही कार एक्सीडेंट में हो चुका था । सप्ताह मे एक-दौ बार वह रंजीत श्रीवास्तव कै यहां जाता ही रहता था ।

परिवार कै नाम पर अब रंजीत श्रीबास्तव का चचेरा भाई अशोक श्रीवास्तव ही था I, जोकि बचपन से ही उनके साथ रहता था । इतनी दौलत, इतना सव कुछ होने के वावजूद मी रंजीत श्रीवास्तव को कोई बुरी आदत नहीं थी I वह शांत प्रिय जीवन बिताने वाला इन्सान था ।

जबकि अशोक श्रीवास्तव महाअय्याश, एक नम्बर का हरामी था । दोनों हमउम्र ही थे I अशोक की निगाह शुरू से ही रंजीत श्रीवास्तव की अथाह दौलत पर थी।

हालांकि रंजीत श्रीवास्तव ने उसे कभी भी दौलत कै लिए मना नहीं किया था, जितना चाहता उसे मिल जाता । करोडों कै बिजनेस भी अशोक सम्भालता था । दौलत की तो उसे कोई दिक्कत नहीं थी और न ही कमी होनी थी । परन्तु वह रंजीत की सारी दौलत का मालिक बनना चाहता था जोकि नामुमकिन था । परंन्तु आशोक ने मुमकिन बनाने की सोच रखी थी I

एक दिन अशोक की डॉक्टर बैनर्जी से मुलाकात हुई तो अशोक हंसकर बोला ।

" क्या बात है डॉक्टर साहबा आप कुछ सोंच में डूबे लग रहे है ?"

चालीस वर्षीय बैनर्जी ने अशोक को देखा फिर सिर हिलाया I

"हाँ । इन दिनों कुछ परेशानी से गुजर रहा हूं।"

"कैसी परेशानी ?" अशोक बोला-"हम लोगों कै होते हुए आपकी परेशान होने की आवश्यकता नहीं । मुझे बताइये, रंजीत से कहिये! कैसी परेशानी है आपको , हम दूर कर देते हैं ।"

डॉक्टर बैनर्जी हिचकिचाया पर गहरी सांस लेकर बोला ।

"छा महीँने पहले मैं जापान से प्लास्टिक सर्जरी का क्रोर्स करके लोटा हूं । अपनी जिन्दगी की लगभग सारी जमा पूंजी मैने इस कोर्स की फीस चुकाने में लगा दी । आखिरी समय में मेरे पास फीस कै पैसे कम पड गये । कोर्सं तो पूरा कर लिया परन्तु अभी तक कोर्स पूरा करने की डिग्री नहीं मिली । क्योंकि मेरी फीस बकाया है । अगर डिग्री न मिली तो मेरा कोर्स फिजूल रहेगा ।"

"यह तो वहुत मामूली सी बात है । कितनी फीस और देनी है?” अशोक बोला ।

"आने-जाने का खर्चा मिलाकर पन्द्रह लाख रुपैया बनता हैं ? "

“आप आज ही मेरे आफिस में आकर पन्द्रह लाख रुपया ले लीजियेगा !”

"लेकिन.... लेकिन मैँ वापस कैंसे चुका पाऊंगा । मेरे पास तो कुछ भी नहीँ है ...।"

"चिन्ता मत कीजिये !" अशोक ने बैनर्जी कै कंघे पर हाथ ~ रखकर हंसते हुए कहा-"आप जापान जाकर अपनी डिग्री ले आएं I वक्त आने पर मैं खुद दिया पैसा वसूल कर लूंगा । अशोक से पैसा लेकर डॉक्टर बैनर्जी जापान गया और अपनी डिग्री ले आया । बैनर्जी अशोक के एहसान तले दव गया ।

आगे का सिलसिला फिर सामान्य तौर पर चलने लगा । डॉक्टर ने छोटे-से क्लीनिक कै ऊपर ही रहने कै लिए कमरा बना रखा था । वहीं पर वह रहता था । यूं कुछ दूरी पर उसका छोटा सा पुश्तेनी मकान भी था, जिसके बारे मैँ शायद ही कोई जानता हो ।

एक दिन शाम कै समय डॉक्टर बैनर्जी अपने क्लीनिक में बैठा था कि अशोक वहाँ जा पहुचां I अशोक जैसे इंसान को अपने क्लीनिक में देखकर बैनर्जी खुश हुआ और बोला ।

" अंशोक साहव, आप यहाँ । फोन कर दिया होता, में फौरन हाजिर हो जाता l”

"नहीं ऐसी कोई बात नहीं । यहां से गुजर रहा था, सोचा आपकी चाय पीता चलू।"

" हां ...हां क्यों नहीं I" बैनर्जी उठता हुआ बोला-"आइए ऊपर चलकर बैठते हैं I”

दोनों ऊपर पहुंचे ।

बैनर्जी ने खुद चाय बनाई I वह अकेला ही रहता था I उसने शादी नहीं की थी I इधर-उघर की बातों के पश्चात् चाय के दौरान एकाएक अशोक बोला ।

"आप प्लास्टिक सर्जरी की प्रैक्टिस नहीं कर रहे?"

" बस कुछ ही दिनों में मैं शुरू करने वाला हूँ। इन्स्टीटूयूट वाले तो बुला रहे हैँ । दस-पन्द्रह दिन तक जाऊंगा । इसकै साथ ही मुझे डॉक्टरी की प्रैक्टिस भी छोड़नी पडेगी, कई तरफ सोचना पडता हे I"

"सो तो हे I”

"मैं जल्दी ही आपका पैसा आपको लौटा दूगा… I”

"सिर पर बोझ मत रखिए डॉक्टर बैनर्जी I आप तो जानते ही हैँ कि जो रकम मैंने आपकी दी है वह मामूली सी हे । मुझे कोई फर्क नहीँ पडता । बहरहाल एक मामूली काम के सिलसिले मेँ में आपके पास आया हूं।"

"कहिए I "

"आप प्लास्टिक सर्जरी करके एक चेहरा दूसरे चेहरे जैसा बना सकते हैं I”

"हू-ब-हू ! बिल्कुल! यही कमाल तो मैंने जापान से सीखा है । इसी के सीखने के लिए तो मैंने अपनी जिन्दगी-भर की कमाई लगा दो। जापान मे हमेँ प्रैक्टिस भी दी जाती है । इस काम मे मैँ मास्टर हो चुका हू।”

अशोक मुस्कराया फिर सिगरेट सुलगाकरं कश लेते हुए बोला ।

"यही काम मैँ आपसे करवाना चाहता हू ।"

"कैसा काम ।"

“अपने चेहरे पर मैं किसी दूसरे का चेहरा प्लास्टिक सर्जरी करवाकर चढना चाहता हू I इससे एक तो आपका इन्तिहान भी हो जाएगा दूसरे मेरी जरूरत भी पूरी हो जाएगी I”

"ले-लेकिन ऐसा क्यों?”

'डॉक्टर बैनर्जी I मैं रंजीत को हैरान कर देना चाहता हू' I” अशोक ने हंसकर कहा I
 
"रंजीत साहब को?" बैनर्जी चौंका ।

“हां ,मैं चाहता हू आप प्लास्टिक सर्जरी करके मेरे चेहरे कौ बिल्कुल रंजीत जैसा वना दीजिए। ऐसा कि मुझे भी ऐसा लगे जैसे में अशोक नहीं रंजीत हूं , रंजीत तक इतना धोखा खा जाए कि उसे बिश्वास करना मुश्किल हो जाए कि वह…वह है या सामने बाला वह हैं?"

डॉक्टर बैनर्जी के चेहरे पर गम्भीरता और व्याकुलता के भाव उभर आए ।

"यह सव आप रंजीत साहब को हैरान करने के लिए करना चाहते हैं?"

"हां l’

"अशोक साहबा" बैनर्जी ने पूर्ववत लहजे में कहा-"मेरी बात का बुरा मत मानिएगा, परंन्तु यह इच्छा आपकी बिल्कुल बचकानी है , आप कुछ और करके रंजीत साहब को हैरान कर दीजिए !*

"नहीँ, रंजीत को हैरानी में डालने का एकमात्र यहीँ रास्ता ~ है । मैँ चाहता हू आप प्लास्टिक सर्जरी ऐसी करें कि फिर कभी आसानी से न उतरे I तभी उतरे, जब आप चाहें I" अशोक ने दृढ़ शब्दों में कहा-"कहीं ऐसा न हो कि राह चलते या यूं ही कही सर्जरी उतरने लगे I” डॉक्टर बैनर्जी ने सिगरेट सुलगाई और व्याकुंलता से कह उठा ।।…

"हैरान कर देने वाला सिलसिला घटे डेढ में शुरू होकर, दो-चार घटों में समाप्त हो जाए तो ठीक रहता हे, शायद आप नहीं जानते अशोक साहब कि चेहेरां बदलने कै लिए मुझे कम से कम पन्द्रह दिन-रात एक करने पड़ेगे । बीस दिन भी लग सकते हैं । क्योंकि आप एकदम ठोस काम चाहते हैं और बदले में आप रंजीत साहब को एक घटा हैरान कर लेगे या एक दिन बस ।"

"आप कहना क्या चाहते हैं डॉक्टर बैनर्जी?" अशोक ने सामान्य लहजे में पूछा l

"यही कि आप रंजीत साहब को हैरान करने का कोई और रास्ता तलाश कर लीजिए, वह.....!"

"डॉक्टर बैनर्जी l” उसकी बात काटकर अशोक ने हंसकर कहा---- "आपने मेरा कितना पैसा देना है?"

" पन्द्रह लाख !" बैनर्जी की प्रश्नभरी निगाह अशोक के चेहरे पर जा टिकी ।

"आप यू समझिये कि उस पन्द्रह लाख कै बदले में आपसे यह काम ले रहा हू । जिस तरह से मैंने रंजीत क्रो हैरान कर देने कै लिए सोचा हैं, वैसे करके ही रहूँगा । पैसा मेरे लिए कोई अहमियत नहीं रखता ।" कहने कै साथ ही उसने जेब से रंजीत की बीस-पच्चीस तस्वीर निकालकर टेबल पर रख दीं ।

"रंजीत के चेहरे की हर एगित से ली गई तस्वर्रि हैं । इन तस्वीरों कै दम पर ही आप मेरा चेहरा बदलकर; रंजीत जैसा वनायेंगे ,ऐसा कि देखने वाले को लगे मैं ही रंजीत श्रीवास्तव हूं I इस काम की एवज में जो पन्द्रह लाख मैंने लेना है, वह नहीं लूगा । हम दोनों का हिसाब बराबर ।"

“लेकिन रंजीत साहव यह जानकर नाराज न हों कि मैंने उनका चेहर....'" ।"

"रंजीत नहीं नाराज होगा . उसकी यह बात मुझ पर छोड दीजिये; वल्कि खुश होगा कि आपके हाथ में कितना बडा आर्ट है । एक तरह से आपका आर्ट ही तो मैँ उसे दिखाना चाहता

हू'। कम आन । आप अपना काम कीजिए। मैं चाहता हूं , इस काम को आप जल्दी से कर दीजिए !"

इन्कार की गुंजाइश नहीं थी । नं चाहते हुए भी, बैनर्जी को इस काम के लिए तैयार होना पडा और बैनर्जी ने यह काम किया ।

बीस दिन की अथाह मेहनत के पश्चात् अशोक के चेहरे को रंजीत श्रीवास्तव का चेहरा बनाया ।

बिल्कुल रंजीत का चेहरा वना दिया । अशोक की कद-काठी तो वैसे ही रंजीत से मिलती ही थी I एक बारगी तो बैनर्जी को खुद धोखा होने लगा कि उसके सामने रंजीत खड़ा है या अशोक जिसे कि उसने रंजीत बनाया हैं ।

इन बीस दिनों में अशोक दिन-रात बैनर्जी कै यहाँ ही रहा था i रंजीत से तो वह कह आया था कि किसी खास काम कै लिए शहर से बाहर जा रहा है । पन्द्रह-बीस दिन बाद वापस लौटेगा । l

"अब तो आप खुश हैं न मिस्टर अशोक?" डाँक्टर बैनर्जी ने मुस्कराकर उसके बदले चेहरे को देखा ।

"हां, खुश तो तुम्हे भी खुश होना चाहिये कि तुम्हारे सिर से पन्द्रह लाख का उधार उतर गया । तुमने मेरा काम कर दिया और मैँने तुम्हारा ।" अशोक ने ठहाका लगाया ।

अशोक का बदला लहजा डॉक्टर बैनर्जी समझ न पाया ।

अशोक ने सिगरेट सुलगायी और कश लेते हुए बैनर्जी से कह उठा ।

" डॉक्टर बैनर्जी हाथी तो अब निकल गया, क्यों न अब पूंछ की बात का ली जाये ।"

"मै समझा नहीँ ।"

"दरअसल मैं रंजीत को हैरान नहीं करना चाहता । इतने दिन की मेहनत मैंने और आपने इसलिए नहीँ की कि घण्टे-भर के लिए रंजीत को हैरान कर दिया जाये !" कहकर अशोक होले से हंसा ।

"म-मैँ अभी भी नहीं समझा ।" बैनर्जी वास्तव में हैरान हो~उठा था ।।

"डॉक्टर बैनर्जी दरअसल मैं अब रंजीत श्रीवास्तव वनने जा रहा हूँ' ।"

"'क…या ???" बैनर्जी जोरों से चौका ।

. "हाँ! मैँ रंजीत श्रीवास्तव बनने जा रहा हू I और इस बात को सिर्फ आप जानते हैं कि मैँ रजीत नहीं वल्कि उसका चचेरा भाई अशोक हूं। सवाल अब यह पैदा होता है कि क्या आप इस सम्बन्ध में अपना मुह वन्द रखेंगे, या फिर मैँ ही आपका मुंह सदा के लिए बन्द कर दूं?"

डॉक्टर बैनर्जी का दिमाग तेजी से चल रहा था ।

"अगर मैंने अपना मुंह बन्द कर लिया तो रंजीत तो खामोश नहीं बैठेगा I"

"रंजीत को तो अव गया ही समझो । वह जायेगा, तभी तो मै रंजीत श्रीवास्तव बन सकूगा ।"

"ओह ।" बैनर्जी मन ही मन चौंका-“इत्तका मतलब आप उसकी जान ले लेंगे ।"

"मजबूरी है । लेनी ही पडेगी ।" अशोक ने गहरी सांस ली-“मैं रंजीत को हर चीज का मालिक बनना चाहता हूं। और यह काम उसकी जान लिये बिना तो पूरा हो ही नहीं सकता ।"

डॉक्टर बैनर्जी के होंठों से कोई शब्द न निकला ।

" डाँक्टर ।" अशोक कश लेकर कहे जा रहा था-"खामोश रहना आपके लिये बुरा नहीं होगा । हर महीने एक लाख रुपया आपको मुंह वन्द रखने का मिलता रहेगा । इतना पैसा तो आप ---- जिन्दगी-भर नहीं इक्ट्ठा नही कर पायेंगे । मेरे ख्याल में आपको हंसकर खुशी से मेरी बात मानकर मेरा राजदार बन जाना चाहिये I"

डॉक्टर बैनर्जी अब जाकर समझा था कि अशोक क्रित्तना खतरनाक है । किस खूबसूरती के साथ उसे बेवकूफ बनाकर अपना … काम निकाल लिया था I और अब मीठे मीठे बोल यह बोल रहा है, इसके पीछे भी कितना जहर हे । वह सब समझ रहा था । जाहिर था कि अगर वह अशोक की बात नहीं मानेगा तो अपनी जान से हाथ धोना ही पडेगा I यह तो बात का शुरूआती दौर था । प्यार से समझाये जाने कां दौर । इसके बाद शुरू होगा मौत की धमकी का दोर । फिर खून-खराबे का सिलसिला ।

डाँक्टर ब्रैनर्जी ने फौऱन ही जवाब देने का फैसला कर लिया ।

"मैँ आपके साथ ही हूं अशोक साहब । एक लाख रुपया महीना कोई कम तो होता नहीँ । आप जो कहेंगे, मैँ वहीँ करूंगा । दौलत हथियाने के मौके तो जिन्दगी मे कभी कभी मिलते हैं I"

"वेरी गुड ।" अशोक ने प्रसन्न स्वर में कहा-"आप वास्तव में समझदार हैं I मुझे आपसे ऐसी ही उम्मीद थीं… I"

जवाब में बैनर्जी मुस्कराकर रह गया ।

"आप निश्चित रहे अशोक साहब ! में-हर कदम पर आपके साथ हू।"

"गुड । गुड-बैरी गुड ।" आशोक जीत की खुशी मे ठहाका मार उठा-“अब तो मामूली काम रह गया हैं, रंजीत को रास्ते से हटाना , यह काम तो रात तक हो जायेगा । शाम हो ही चुकी है I"

कहने के साथ ही सामने पड़े फोन तक पहुंचा और रिसीवर उठाकर नम्बर डायल करने लगा ।

चन्द ही पलों में लाईन मिली तो वह कह उठा ।

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फिनिश

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"दिलावर । रंजीत कहां है इस समय?"

"मालिक, कुछ देर पहले ही रंजीत साहब, नाईट क्लब गए हैं I" दूसरी तरफ से कहा गया ।

"हू। गोर से मेरी बात सुनो, रंजीत को चाहे जैसे भी हो क्लब से निकालो और उठाकर अपने ठिकाने पर ले जाओ । यह बहुत जरुरी है और दो घाटे में काम हो जाना चाहिए l”

"ओ० के० मालिक ।"

अशोक रिसीवर उठाकर पलटा और बैनर्जी को देखकर मुस्कराया ।

"रंजीत कै बारे में अब फिक्र करने की कोई आवश्यकता नहीं I मेरे आदमी नाईट क्लब से उसे किसी-न-किसो प्रकार पकड ही लेंगे । आज उसकी जिन्दगी की आखिरी रात है । ओ०के० डॉक्टर बैनर्जी! अब मैं चलता हूं I सुबह तक मैँ तुम्हें फोन पर खबर दूंगा कि रंजीत को रास्ते से हटा दिया हे । अशोक हूं रंजीत नहीं, इस बात कै राजदार सिर्फ दो आदमी रहेंगे । एक तुम और एक अन्य मेरा आदमी । मैं खून खराबा पसन्द आदमी नहीं हूं। होता तो पहले अपने राजदारों को खत्म करता । लेकिन मै दोस्ती में यकीन रखता हूं। क्यों डॉक्टर, मैंने गलत तो नहीँ कहा ?"

"सही कहा हे आपने I" डॉक्टर ने मुस्कराकर जवाब दिया।

उसके बाद अशोक बिदा लेकर वहां से चला गया ।
 
अशोक कै जाते ही बैनर्जी बिजली की तरह फोन पर झपटा ओर नाईट क्लब के नम्बर मिलाने लगा । हालांकि क्लब काफी बड़ा था । परन्तु अथाह चेष्टा के पश्चात् रंजीत श्रीवास्तव से उसका सम्पर्क बन ही गया ।

डॉक्टर बैनर्जी ने चेन की लम्बी सांस ली ।

"रंजीत साहब ! आप फौरन नाईट क्लब से निकल जाइए ।" बैनर्जी ने एक ही सांस में कह डाला-"आपकी जान को खतरा हे । दूसरी बात, मैं फोरन आपसे अभी मिलना चाहता हूं।"

" लेकिन बात क्या है? आप इतने घबराए हुए क्यूँ हैं?"

"इतना वक्त नहीं हे कि फोन पर मैं आपकी सब कुछ बता सकूं। आप क्लब से फौरन दूर हो जाइए l”

“लेकिन डॉक्टर, कुछ तो मालूम हो कि.....!"

"रंजीत साहबा आप मेरे क्लीनिक पर आ सकते हैं I" बैनर्जी ने व्याक्लाता से कहा ।

"क्लीनिक पर?"

"हां । आपको क्लब से तो निकलना ही है । मेरे ख्याल में इस समय आपके लिए सबसे सुरक्षित जगह मेरा क्लीनिक ही होगा । आपकी जान को खतरा । कुछ लोग क्लव में, आपकी जान लेने आ रहे हैं । आप फौरन मेरे क्लीनिक में आ जाइए । भैं आपका इन्तजार कर रहा हूं। जव आप यहां आयेंगे तो सब कुछ बताऊंगा । आप आ रहे हैं कि नहीं? सोचकर जवाब दीजिएगा, आपकी जिन्दमी ओर मौत का सवाल है I”

दो पल कीं चुप्पी के पश्चात् बैनर्जी को रंजीत श्रीवास्तव की आवाज सुनाई दी I

“मैं आ रहा हूं I”

" थैंक गाॅड ।" बैनर्जी के होंठों से निकला I

पौन घण्टे के पश्चात् रंजीत श्रीवास्तव, डॉक्टर बैनर्जी के क्लीनिक के ऊपर वाले कमरे में बैनर्जी के सामने बैठा बैनर्जी की कही हर बात क्रो वेहद गम्भीरता से सुन रहा था ।

डॉक्टर बैनर्जी कै बढते शब्दों कै साथ ही रंजीत श्रीवास्तव ही आंखें हैरानी से फैलेती जा रही थी । उसकी व्याकुलता बढ़ती जा रही थी ।

"मुझे तो विश्वास नहीं आता कि अशोक ऐसा भी हो सकता हे I” सारी बात सुनने कै बाद अवाक् से रंजीत श्रीवास्तव के होंठों से बेचैनी भरा स्वर निकला ।

“अब इतना वक्त नहीं है कि आप विश्वास और अविश्वास के फेर में पडें I" बैनर्जी ने खुश्क गले से टकराकर अपना शब्दों कै साथ कहा-"अब सवाल यह पैदा होता है कि आपने क्या करना है?"

रंजीत श्रीवास्तव ने पहलू बदला । कहा कुछ भी नहीं । वह अथाह दौलतं का मालिक तो अवश्य था, परन्तु जड से वह बेहद शरीफ और मार-पीट, खून-खराबे से दूर रहने वाला इन्सान था ।

अपनी जिंदगी में उसने कभी किसी को चांटा नहीं मारा था | अगर उसे डरपोक कहा जाए तो गलत नहीं होगा I ऐसे इन्सान के सामने ऐसे हालात आ जायेँ तो वह सिर से लेकर पांव तक कांप उठेगा !!

“मेने तो अशोक क्रो कमी पैसा खर्चंने से मना नहीं किया I मेंने उससे कभी हिसाब नहीं लिया I इसके बाद भी वह मुझें मारकर मेरा सबकुछ ले लेना चाहता हे तो, तो.....?”

“पैं फिर कह रहा हू रंजीत साहब, यह वक्त इन बातों का नहीं है l" बैनर्जी ने समझाने वाले स्वर में कहा-“ओर आपका I मेरे यहां रुकना भी ठीक नहीं । किसी काम की खातिर अशोक यहां वापस भी -लौट सकता हे । अगर ऐसा हो गया तो फिर आपको कोई नहीं बचा सकेगा I”

“फिर ....फिर मैं कहां जाऊं?"

"अभी आप मेरे साथ चलिये। करीब ही मेरा छोटा-सा पुराना मकान है, वहां पर आप सुरक्षित रह सकते हैं । उसकै बारे में कोई नहीं जानता । उसके बाद ही सार्चेगे कि क्या करना है?"

अब रंजीत क्या कहता, वह तो अशोक की हरकत पर हैरान था। अशोक क्रो उसने हमेशा अपना भाई ही माना था, अब उसे क्या मालूम था कि वह नाग बनकर उसे ही डंसेगा ।

डॉक्टर बैनर्जी उसे दुसरे मकान पर लेकर पहुंचा ।

"आप यहीं रहिए। मै वापस जा रहा हुँ। अशोक वापस आ सकता है । मैँ नहीँ चाहता कि मुझे वहां न पाकर वह किसी शक-मेँ पड़े । सारे हालात जानकर, मैँ कल दिन में आऊंगा ।"'

मन में डर लिए, रंजीत श्रीवास्तव सिर हिलाकर रह गया ।

डॉक्टर बैनर्जी चला गया I

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फीनिश

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सुबह चार बजे अशोक सांप की तरह फुफंकारता हुआ डॉक्टर बैनर्जी के यहां पहुंचा ।

डॉक्टर बैनर्जी गहरी नींद में सोया हुआ था, वह हड़बड़ाकर उठ बैठा I अशोक को क्रोधित देखकर वह मन ही मन थोड़ा-सा घबराया ।

" क्या बात है अशोक साहब आप यहां?"

"'वह हरामी अभी तक हाथ नहीं आया ।" अशोक दांत किटकिटाकर रह गया ।

"कौन रंजीत साहब?"

"हां, मैँ उसी हरामी क्री बात कर रहा हू। रात को मेरे आदमियों कै क्लब पहुंचने से पहले वह वहां से खिसक गया, रात बंगले पर भी' नहीं पहुंचा । कहां है, किसी को भी उसकी खबर नहीं ।“ अशोक ने होंठ भिंचकंरु कहा ।।

बैनर्जी वे सिगरेट सुलगाकर कश लिया । अपने'चेहरे के भावों से वह यहीँ दर्शा रहा था कि जेसे उसे भी रंजीत कै ना मिलने के कारणं बहुत चिन्ता हो रही हो । उसने प्लास्टिक सर्जरी से अशोक का चेहरा नहीँ बदला होता तो वह भी सो प्रतिशत धोखा खा जाता कि वह रंजीत श्रीवास्तव ही है ।

" उसे दूंढने की कोशिश तो की जा रही होगी?" बैनर्जी ने धीमे स्वर में कहा ।

" कोशिश में तो जमीन आसमान एक कऱ रखा है I” अशोक ने जवाब दिया ---” वह ज्यादा देर कहों भी छिपा नहीं रह सकता । मेरे आदमी उसे दूंढने ही निकलेंगे । उसका जिन्दा रहना मेरे लिए बहुत खतरनाक हे । वास्तव में तुमने कमाल की प्लास्टिक सर्जरी करके मेरा चेहरा बदल डाला है । तुम्हारे हाथ में बहुत बढिया आर्ट है I "

जवाब में बैनर्जी ने कुछ नहीं कहा ।

"सावधान रहना । वह तुम्हारे पास भी आ सकता हे, अगर ऐसा हुआ तो मुझे फौरन खबर करना ।"

"आप निश्चित रहिए । मैँ हर कदम पर आपके साथ हू'।"

बैनर्जी ने उसे विश्वास दिलाया ।

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फीनिश

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"वह रंजीत श्रीवास्तव बना आपको हर जगह ढूंढ रहा है । उसके आदमी आपकी हत्या करने के लिए आपको जगह-जगह तलाश कर रहे हैं । अब आप ही सोचिए कि ऐसे मौकै पर आप क्या करना चाहते हैं? सीघे घर जाकर अशोक को सबक सिखाना चाहते हैं या पुलिस कै पास जाकर सबकुछ कहना चाहते हैं I क्या करना चाहते हें आप । सारे हालात आपकें समाने है I आप क्या कदम उठाना चाहते हैं?"

रंजीत श्रीवास्तव का चेहरा फक्क था घबराहट से भरा पड़ा था ।

"मैं-मैँ क्या करूं, मुझे तो समझ मेँ नहीं आता I" रंजीत ने घबराये स्वर में कहा ।

“ऐसा कहने से काम नहीं चलेगा I कुछ न कुछ तो फैसला आपको लेना ही होगा ।"

"डॉक्टर, आप तो अच्छी तरह जानते हैं कि मैं दिल का मरीज़ हू' इस उप्र में भी । ज्यादा टैंशन लेना मेरे जिए ठीक नहीँ और फिर बदमाश लोगों का मुकाबला करना मेरे बस का नहीं हे । मेरे में इतना हौसला नहीं है कि...!"

“तो क्या आप अपना सब कुछ अशोक के हवाले कर देंगे ? ”

"आप मेरे साथ हैँ तो जुदा बात है । नहीं तो मैँ अशोक से नहीं टकरा सकता । टेशन मै-तनाव मे, अगर मुझें हार्ट-अटैक हो गया तो शायद मै बचुं न । मैंने चैन से जिदगी बितानी है ।"

डॉक्टर बैनर्जी गहरी में डूब गया ।

वह रंजीत का डॉक्टर था । अच्छी तरह जानता था कि रंजीत की दिली हालत क्या हे I उसने खुद ही रंजीत कौ किसी प्रकार की टैंशन लेने से मना कर दिया था ।।।

वह जानता था कि रंजीत को किसी प्रकार का शाक लगना, उसके लिए घातक सिद्ध हो सकता है ।

"डॉक्टर !" एकाएक रंजीत ने कहा-"आप अशोक से बात कीजिए, मैं उसे आधी दौलत देने को तैयार हूं। इसलिए कि मैं कमजोर हूं । गन्दे लोगों से टकराने की हिम्मत नहीं रखता । अगर उसे कुछ न दिया तो कल को वह फिर मेरी जान को खतरा पैदा कर सकता हे । नोटों से उसका मुंह हमेशा के लिए बन्द कर देना ही ठीक है ।"

"यह तो वह बात हो गई कि कुत्ता भौकै तो उसके आगे मांस फेंक दिया जाए और जब मांस नहीं फेंकेंगे तो कुत्ता पुन: भौंकना शुरू कर देगा । आखिर यह सिलसिला कब तक चलेगा I"

"फिलहाल तो मैं इस खूनी सिलसिले को वन्द करके अपनी जान बचाना चाहता हू। इस समय वह मेरी जान का दुश्मन बना हुआ हे । यह वक्त मैं ठीक से पास कर लेना चाहता हू I उसके बाद उसका कोई इन्तजाम तो करूगा ही ।"
 
"इस तरह अशोक के सामने हथियार डाल देना ठीक नहीं है । आपको पुलिस क्रो खबर करनी चाहिए ।"

"अभी मैं बिना शोर शराबे कै मामला निपटाने के पक्ष में हूं l”

"तो इस बारे में अशोक से बात कौन करेगा?"

"आप करेंगे I"

“मैं ?"

“हां । अब आपके सिवाय और कौन है जो इस मामले में आएगा । आप ही अशोक से बात करेंगे डॉक्टर I”

चन्द पलों की खामोशी के उपरांत डॉक्टर बैनर्जी ने सिर हिलाकर कहा ।

"ठीक है । मैं ही इस बारे मेँ, अशौक से बात करूंगा?"

"आप उससे आज ही बात कीजिए !"

"ठीक है । आज़ ही बात करूंगा । लेकिन उससे पहले मैं आपकी सुरक्षा का इन्तजाम कर देना चाहता हूं।"

"कैसा इन्तजाम?"

"आशोक के आदमी शिकारी कुत्तो की तरह आपकी हत्या के लिए आपको तलाश कर रहे हैँ । मैं नहीं चाहता कि वह आपको पहचान लें । आखिर कव तक आप यहा बैठे रहेंगे I” बैनर्जी न कहा ।

"मैं समझा नहीं ।" रंजीत ने असमंजतता भरी निगाहों से बैनर्जी को देखा ।

"मैं हल्की प्लास्टिक सर्जरी करके, आपका थोड़ा-सा चेहरा बदल देता हूं ताकि अशोक का कोई आदमी देखे तो आपको पहचान न सके । उसके बाद मैं अशोक से बात करके आऊगा I"

“मेरा चेहरा तो आप अशोक से बात करके भी बदल सकते हैं ।" रंजीत बोता ।

"रंजीत साहब, आप समझ रहे हैँ कि अशोक आपकी बात मान जाएगा, जबकि मैं उसे देख चुका हूं। आपके चेहरे में वह शैतान घूम रहा है । वह सारी दौलत को अपनी बनाना चाहता है । हो सकता हो ,मामला तबाह हो जाए, जो कि मेरे ख्याल में होगा ही । इसलिए-सबसे पहले मैं आपकै चेहरे में थोड़ा-सा बदलाव ला देना चाहता हू ताकि आपको जान का खतरा न रहे I अगर अशोक आपकी बात मान गया तो आपका चेहरा फिर ठीक कर दूंगा ।"

"जैसी आपकी इच्छा डॉक्टर ।"

"अगर अशोक नहीँ माना ।" डॉक्टर बैनर्जी ने एकाएक सख्त स्वर में कहा-"तो मजबूरन फिर मैं पुलिस का सहारा लूंगा । आपका हक मैं आपको दिलाकर ही रहूंगा ।"

"जैसा तुम ठीक समझना वहीं करना डाक्टर I जो कुछ करना हि तुमने ही करना है । मैं तनाव में इसलिए नहीं पडूंगा .कि पैं नहीं चाहता दोबारा मुझे हार्टअटैक हो और दौलत के चक्कर में अपनी जान गंवा बैठूं ।

उसके बाद दो दिन की मेहनत से डॉक्टर बैनर्जी ने रंजीत के चेहरे पर थोडी प्लास्टिक सर्जरी कर दी । जिससे कि रंजीत रंजीत श्रीवास्तव ना लगकर नया चेहरा लगने लगा ।

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फीनिश

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"डॉक्टर रंजीत की तरफ से उसकी आधी दौलत का सौदा मुझसे करने आये हो कि मैं उसकी हत्या का ख्याल छोड दू। इससे साफ जाहिर है कि तुमने ही उसे छिपा रखा है” । अशोक के होंठों से गुर्राहट भरा स्वर निकला I

"तुम ठीक कह रहे हो i" बैनर्जी ने सिर हिलाया ।

"'इसका मतलब तुमने मुझसे धोखेबाजी कीं । इधर मुझे कहाकि तुम मैरा साथ दोगे और उधर रजीत की जान बचाने के लिए गये । खुद को बहुत चालाक समझते हो ।" अशोक भिंचे दांतों से बोला ।

“कुछ भी कह लो । मैँ सिर्फ सच्चाई का साथ दे रहा हू इस समय I"

"और सच्चाई यही है कि वाजी इस वक्त मेरे हाथ में है I”

अशोक ने एक-एक शब्द चबाकर कहा ।

"बहुत गलत सोच रहे हो तुम ।"

"क्या मतलब?"

"तुम्हारे हाथ बाजी का जरा-सा हिस्सा भी नहीं है I तुम यूं ही नाचे जा रहे हो I यह रजीत साहव की कमजोरी है कि वह तुम्हें आधी दौलत देने की तैयार हैं I कोई और होता तो तुम्हें तारे दिखा चुका होता ।"

“यह तुम कह रहे हो?"

“हां। रंजीत साहब ने सब कुछ मेरे ऊपर छोड़ दिया है कि इस बारे में मैं जो करूंगा ठीक करूंगा । यानी कि अब तुम्हारी-मेरी जो बात फाईनल होगी । यह बात कान -खोलकर सुन लो कि अगर मेरी बात मानकर रंजीत साहब की जान का पीछा ना छोड़ा तुम्हारे हक में बुरा होगा । मैं यहां से सीधा पुलिस स्टेशन जाऊगा । तुम्हारी पोल खोल दूंगा । असली और प्लास्टिक सर्जरी किए हुए चेहरे में फर्क तो होता ही है I पुलिस वालों के सामने मैं तुम्हारे चेहरे से प्लास्टिक सर्जरी हटाऊगा । I उसके बाद खुद ही सोच सकते होकि तुम्हारी क्या हालत होगी। चार सौ बीसी का जुर्म और रंजीत -हत्या करने की चेष्टा, इन दोनों जुर्मों की एवज में तुम्हें कम से कम सात साल की सजा तो होगी ही ।"

अशोक कै चेहरे पर मौत से भरे जंहरीले भाव फैलते चले गए ।

"तो तुम सब-कुछ सोचकर आए हो । कोई कमी नहीं रख छोडी तुमने ।"

" तुम जैसों के बारे में तो सब कुछ सोचकर ही आना पढ़ता हे । बोलो, रंजीत साहब की यह शर्त मानने को तैयार हो कि अगर उसकी हत्या की चेष्टा ना करो तो वह तुम्हें अपनी आधी दौलत दे सकते हैं?"

“आॅफर बुरी नहीं है ।" अशोक कहर से हंसा-"लेकिन जब मैं उसकी सरी दौलत का मालिक वन सकता हू तो आधी क्यों ? सॉरी डॉक्टर मुझे यह आॅफर कतई मृजूर नहीं I”

“इसका मतलब कि मुझे पुलिस स्टेशन जाकर तुम्हारी पोल खोलनी ही पडेगी I"

“पोल तो तभी खोलोगे जब पुलिस स्टेशन पहुचोगे ।"

अशोक जहरीला ठहाका लगा उठा ।

"क्या.......क्या मतलब?"

" तुम अभी से । इसी वक्त से आज से खुद को मेरी कैद में समझो । जब तक तुम मुझे रंजीत के बारे मे नहीँ बताओगे तब्र तक तुम मेरी कैद आजाद नहीं हो सकोगे डाॅक्टर बेनर्जी!"

डॉक्टर बैनर्जी ने गहरी सांस लेकर करवट ली और उठ बैठा । अशोक ने वास्तव में उसी समय उसे कैद कर लिया था ।

वह दो घंटे के लिए गया था और वापस लौटा दो साल बाद I

वह भी कैद से फरार होकर I वरना अशोक ने तो उसे ना छोडने की कसम खा रखी थी ।

हरदम वह रंजीत श्रीवास्तव का पता पूछता रहा कि वह कहां है I इस बात का उत्तर वह भला अशोक को कैसे दे सकता था । रंजीत का पता बताने का मतलब या अशोक द्धारा फौरन रंजीत की हत्या हो जाना I गहरी सांस लेकर बैनर्जी ने सिगरेट सुलगाई ।

तभी रंजीत न कमरे में प्रवेश किया ।

“आप सोए नहीं अभी तक?”

"नींद नहीं आई ।।।" बैनर्जी ने गम्भीरता से सिर हिलाया----" आओं अब मैं तुम्हें अपने बीते दो साल के बारे में बता दूं कि मेरे साथ क्या क्या गुजरी I”

डॉक्टर बैनर्जी रंजीत श्रीवास्तव को सारी बात, सारे हालात बताए ।

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फीनिश

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"मेरी तो जिन्दगी ही बदल गई है I" सारी बात सुनने के बाद रंजीत श्रीवास्तव ने कहा-"दो हजार रुपए की सादी -सी नौकरी करके मैँ अपना वक्त गुजार रहा हू। सच पूछो डॉक्टर, तो यह जिन्दगी मुझे ज्यादा पसन्द हे । ना कोई आडम्बर ना नोकर खाने-पीने सोने का कोई समय नहीं । होटल, क्लब नहीं हर तरफ़ शांति ही शांति हे I सडक पर निकलता हूं तो आम आदमी की तरह

रंजीत श्रीवास्तव समझकर लोग दुआ-सलाम, नमस्कार, हेलो कहकर मुझे तग नहीं करते । यह सब मुझे अच्छा लगता हे I इसलिए मैने आज तक इस बात का तकाजा नहीं किया कि मैं ही रंजीत श्रीवास्तव नाम का करोडों आबोपति हूं I”

बरबस ही डॉक्टर बैनर्जी के होंठों पर मुस्कान की रेखा फैलती चली गई I

"आपं अवश्य ठीक कह रहे होंगे रंजीत साहब । लेकिन अपना हक छोडा भी नहीं जा सकता । खासतौर से अशोक जैसे कमीने आदमी को तो किसी भी हाल में वख्शा नहीं जा सकता ।"

“लेकिन मैँ कर भी क्या सकता हूं I जो किस्मत में हे, वहीँ तो मिलेगा ।"

"हर बात किस्मत के सहारे नहीं छोडी जा सकती I अगर मेरे भी आपकी ही तरह के विचार होते तो मैँ अब तक उस कुत्ते की कैद में ही होता I" डॉक्टर बैनर्जी ने कठीर स्वर में कहा-----" अब तो मैँने उससे दो साल की कैद का बदला भी लेना है I आसानी से मैं उसे नहीं छोड़ने बाला l"

"तो क्या करेंगे आप? ?"

“पुलिस के पास जाने का तो मेरा अभी कोई विचार नहीं ।" डाक्टर बैनर्जी ने होंठ भीचकर कहा----"पहले तो मैँ जो भी करूंगा खुद ही करूंगा I खुद ही उसे मजा देने की करूगा I यह पोल तो मैँ बाद में खोलूंगा कि, वह रंजीत श्रीवास्तव नहीं बल्कि बहुत बड़ा फॉड अशोक श्रीवास्तव है I”

“जो मर्जी करों डॉक्टरा मैँने तो सबकुछ भगवान के भरोसे छोड रखा है ।" रंजीत ने गहरी सांस लेकर भारी स्वर में कहा--- “पापी क्रो देर-सवेर उसके किए की सजा तो मिलती ही हे । यह विधि का विधान है, कोई भी गलत काम करने वाला सजा पाये बिना संसार से जा नहीं सका ।"

डॉक्टर बैनर्जी देवता स्वरुप इन्सान रंजीत श्रीवास्तव का चेहरा देखता रह गया I

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फीनिश

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देवराज चौहान !!

पैंतीस बरस का खुबसूरत, गोरा-चिट्टा युवक I चौडे कंघे I बडा सीना । व्यत्तित्व ऐसा कि जो भी देखै उसकी तरफ आकर्षित हो जाए । छ: फीट कद ।

इसके बारे में कोई भी नहीं जानता था कि वह कानून की निगाहों में वांटेड हैं । कई खतरनाक

डकैतियों के सिलसिले में पुलिस को उसकी तलाश थी । परन्तु देवराज चौहान अपनी चलाकी की वजह के कारण कभी कानून . कै साये मेँ भी नहीँ आया था।

" छ: महीने पहले रंजीत श्रीवास्तव अपने आदमियों कै साथ जा रहा था कि, उसकी कार की टक्कर जगमोहन की कार से हो गयी । दौलत के नशे में चूर उसने अपने आदमियों से जगमोहन क्रो पीटने को कह दिया । सब एकदम उसपर टूट पड़े । जगमोहन को मौका न मिला कि वह खुद को बचा सके । और जव देवराज चौहान को यह सब पता चला तो जगमोहन को मुम्बई भेजकर, खुद रंजीत श्रीवास्तव के पीछे लग गया । जगमोहन की ठुकाई के बदले उसने रंजीत श्रीवास्तव को कंगाल बनाने को सोची और प्लान बनाकर रंजीत श्रीवास्तव के बेड़े में रिश्वत देकर बतौर कार ड्राइवर प्रविष्ट हुआ और अपनी चालाकी ओर समझदारी से वह रंजीत श्रीवास्तव जैसे अरबोंपति व्यक्ति का खासमखास आदमी बन बैठा । इस समय वह रंजीत श्रीवास्तव की आंख का तारा वना हुआ था । जबकि उसकी निगाह अरबों की दौलत पर थी कि कब मौका मिले और हाथ साफ करे । लेकिन अब उसका प्लान लगभग पूरा हो चुका था । उसे पूरा विघवास था कि आने वाले चन्द ही महीनों में वह रंजीत श्रीवास्तव की सारी दौलत हतियाकर उसे कंगाल बना देगा । अपनी तरफ सरकाने में पूरी तरह कामयाब हो जाएगा। राजीव मल्होत्रा कै रूप में वह अपनी बिसात बिछाने जा रहा था ।।

इस समय देवराज चौहान ऐसे क्लव में मौजूद था, जहां हर तरह का काम होता था l

ब्रीफकेस थामे देवराज चौहान केबिन से निकलकर कई रास्तों से गुजरकर क्लब के मुख्य हाल में पहुँचा ।

वहां पहुंचकर उसने दाएं-बाएं देखा तो उसे महादेव नजर आया ।

महादेव इस क्लब में अक्सर आने वाला ग्राहक था, देवराज चौहान की यहीं पर ही महादेव से थोडी-बहुत दोस्ती हुई थी ।

महादेव उसे देखते ही उसकी तरफ लपका ।
 
"ओह देवराज चौहान साहब ।" करीब आकर महादेव देवराज चौहान का हाथ पकडकर हिलाता हुआ बोला-“कहां थे, चार-पांच दिन हो गए हुजूर कै दर्शन ही नहीँ हुए । कहां गुम हो गए ये साहव?"

"आप तो जानते ही हैं महादेव जो कि मैं रजीत श्रीवास्तव जैसे इन्सान के यहां नौकरी करता हूं। अब मालिकों का क्या है, कभी भी आर्डर ठोंक दिया । वहां जाओ यह काम करके आओ ।"

"हां । यह बात तो है ही ।" महादेव ने फौरन सिर को ऊपर नीचे हिलाया-"यह ब्रीफकेस कैसा?" ,

“यह ... I” देवराज चौहान ने हाथ में पकडे ब्रीफकेस को देखा-" मालिको का माल भरा पड़ा है इसमें । चार दिन बाद काम से वापस लौटा हू । सोचा जाते ही फिर बिजी हो जाऊगा । मालिक के पास पहुचने से पहले थोड्री स्री तफरीह कर लूं। इसलिए सीधा यहा चला आया ।"

"तफरीह की?” महादेव की आंखों में चमक उभर आई l

"वस आकर खडा ही हुआ हू। तुम सुनाओ, खाली-खाली , क्यों घूम रहे हो?” ,

"बुरी किस्मत । आज बीस हजार हार गया । साला पत्तेबाज मुझे ठग गया ।"

" कौंन ??"

"है साला, नया आया है । मुझे पूरा विश्वास है वह पत्ते वाला लगाता है , वरना इतनी आसानी से नहीं हार सकता था । चालाक इतना है कि पत्ते लगाते मैँ उसे नहीं पकड सका ।" महादेव ने गहरी सास ली-" अकेला था, कहां तक ध्यान लगाता , अपनी गेम भी तो मुझे देखनी थी ।"

देवराज चौहान की आखें सिकुड गई । ब्रीफकेस नीचे रखकर उसुने सिगरेट सुलगाई ।

"देखें उसे?"

"क्या करोगे?”

"मैं खेलूँ ।। तुम उसे पत्ते लगाते पकडना, अगर वह पत्तेवाज है तो .....!"

महादेव की आंखों में चमक आई ।

"गुड आइडिया! बैरी गुड ।। साले को पते लगाते पकड़ लिया । तो अपना बीस भी वसूल का लुगा हरामी से । लेकिन.... लेकिन तुम तो कहते थे कि ब्रीफकेस मे मालिकों का माल हे?"

"तुम इस चक्कर में ना पडो । यह मेरा जाती मामला है । हार गया तो देखा जाएगा l” देवराज चौहान ने होले से हंसकर कहा

" वेसे हारना मेरे नसीब में कम ही हे । जीत मेरी जिन्दगो का हिस्सा बन चुकी है।" . . .

"यह बात तो मैं कई बार आजमा चुका हूं।" महादेव हंसा I

फिर दोनों क्लब कै गुप्त रास्ते और पहरों कै बीच में से गुजरकर जुए के हॉल में जा पहुंचे I

वहां पर बड़े पैमाने पर जुआ जोऱ-शोर कै साथ चल रहा था ।

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फीनिश

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" शो !" देवराज चौहान ने टेबल पर नोटों की तीन गड्डियां डालीं और सामने बैठे खेलने वाले को देखा ।

अन्य बाकी के दो पहले ही पैक हो चुके थे । गेम बडी हो जाने की वजह के कारण आसपास चंद लोग भी आ खड़े हुए थे-खड़े लोगों में महादेव भी था, जिसकी पेनी निगाह देवराज चौहान के सामने डटे खिलाडी पर थी कि वह हेरा फेरी कब कहां और कैसे करता है ।

उसके शो मांगते ही सामने बैठे खिलाडी ने देवराज चौहान की आंखों मेँ झांका ।

देवराज चौहान ने लापरवाही-भरे अन्दाज में सिगरेट सुलगाई । इससे पहले के वह तीन गेम हार चुका था और उसे मन ही मन हैरानी थी ऐसा कैसे होरहा है जबकि हर बार उसके पास पत्ते अच्छे पड़े थे । परन्तु सामने वाले के पास हर बार उससे जरा सेबंड़े पत्ते होते ।

इसी बात से ही देवराज चौहान को पूरा बिश्वास हो गया था कि सामने वाला खिलाडी पत्ते लगा रहा है I और वह भी इस बात को नहीं पकड सका था कि वह भत्ते किस अन्दाज से लगा रहा है । इस बात कीं तरफ से वह निश्चित था क्योकि महादेव इसी काम फे लिए तो वहां खडा था ।

अब तक देवराज चौहान दो-ढाई लाख रुपया हार चुका था । जोकि उसके लिए सरासर अविश्सनीय बात थी I

उसने देवराज चौहान के शो मांगने पर अपने पत्ते खोल दिए । पत्तों को देखते ही देवराज चौहान की आंखें सिकुंड कर छोटी हो गई । फिर वहीँ गड़बड़ ।

उसके पास दो तीन-चार की स्रीकवैस थी और सामने खुले पत्तों में तीन-चार-पांच की सीकबैंस ।

बेहद शांत मुद्रा में देवराज चौहान ने अपने पत्ते खोल दिए । उसके पत्ते देखते ही सामने बेठे खिलाडी के होंठों पर मुस्कान की रेखा उभरी और टेबल पर पडे नोटों कै ढेर को अपनी तरफ सरका लिया ।

इस गेम मा वह करीब चालीस हजार ले गया था । महादेव सिर से पांव तक बेचैन हो गया I वह भी इससे इसी प्रकार हारता रहा था ।

" शो !" देवराज चौहान ने टेबल पर नोटों की तीन गड्डियां डालीं और सामने बैठे खेलने वाले को देखा ।

अन्य बाकी के दो पहले ही पैक हो चुके थे । गेम बडी हो जाने की वजह के कारण आसपास चंद लोग भी आ खड़े हुए थे-खड़े लोगों में महादेव भी था, जिसकी पेनी निगाह देवराज चौहान के सामने डटे खिलाडी पर थी कि वह हेरा फेरी कब कहां और कैसे करता है ।

उसके शो मांगते ही सामने बैठे खिलाडी ने देवराज चौहान की आंखों मेँ झांका ।

देवराज चौहान ने लापरवाही-भरे अन्दाज में सिगरेट सुलगाई । इससे पहले के वह तीन गेम हार चुका था और उसे मन ही मन हैरानी थी ऐसा कैसे होरहा है जबकि हर बार उसके पास पत्ते अच्छे पड़े थे । परन्तु सामने वाले के पास हर बार उससे जरा सेबंड़े पत्ते होते ।

इसी बात से ही देवराज चौहान को पूरा बिश्वास हो गया था कि सामने वाला खिलाडी पत्ते लगा रहा है I और वह भी इस बात को नहीं पकड सका था कि वह भत्ते किस अन्दाज से लगा रहा है । इस बात कीं तरफ से वह निश्चित था क्योकि महादेव इसी काम फे लिए तो वहां खडा था ।

अब तक देवराज चौहान दो-ढाई लाख रुपया हार चुका था । जोकि उसके लिए सरासर अविश्सनीय बात थी I

उसने देवराज चौहान के शो मांगने पर अपने पत्ते खोल दिए । पत्तों को देखते ही देवराज चौहान की आंखें सिकुंड कर छोटी हो गई । फिर वहीँ गड़बड़ ।

उसके पास दो तीन-चार की स्रीकवैस थी और सामने खुले पत्तों में तीन-चार-पांच की सीकबैंस ।

बेहद शांत मुद्रा में देवराज चौहान ने अपने पत्ते खोल दिए । उसके पत्ते देखते ही सामने बेठे खिलाडी के होंठों पर मुस्कान की रेखा उभरी और टेबल पर पडे नोटों कै ढेर को अपनी तरफ सरका लिया ।

इस गेम में वह करीब चालीस हजार ले गया था । महादेव सिर से पांव तक बेचैन हो गया I वह भी इससे इसी प्रकार हारता रहा था ।

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पत्तों के छोटे-वड़े होने में सिर्फ उन्नीस बीस का ही फ़र्क होता था । वह देख चुका था कि देवराज चौहान चार गेमों में काफी हजार रुपया हार चुका है और वह अभी तक उसका हेरा-फेरी करने वाला अन्दाज नहीं पकड पाया था ।

"पत्ते बांटूं या बन्द कर दूं?" उसने देवराज चौहान से पूछा l

“तब तक बाटते रहो जब तक इंकार ना कर दूं?" देवराज चौहान ने शांव्र स्वर में कहा

"जो थोडा-बहुत्त बचा हे, वह भी हार जाओगे !" उसने चेतावनी-भरे लहजे मे कहा ।

“हमदर्दी की जरूरत नही I मैं हमेशा जीतकर ही गेम समाप्त करता हू ।" देवराज चौहान ने उसकी आखो मे झांका ।

"मर्जी तुम्हारी l" कहने के साथ ही उतने गड्डी उठाई और पत्ते मिलाने लगा । देवराज चौहान को मूरा विश्वास हो चुका था कि अन्य दो खेलने वाले भी उसके ही साथी है , क्योंकि हर बार वह दो तीनन चाल चलने के पश्चात् पैक हो जाते थे, यानी कि उनका मकसद सिर्फ उन दोनों को भिड़ाना होता था ।

पत्ते बांटे गये । गेम पुन: आरम्भ हो गया । हर बार की तरह अन्य दो खेलने वालों से एक ने तीन बार चाल चली, दूसरे ने पांच बार । दोनों पैक हो गए l अब फिर देवराज चौहान और खेलने वाला सामने था । दोनों धोरे-घीरे चालें चलने लगे । देवराज चौहान ब्रीफकेस में से नोटो कौ. गड्रिडयां निकाल रहा था , टेबल पर नोटों का ढेर बढने लगा । और फिर एकाएक देवराज चौहान ने चाल चलनी बन्द कर दी । उसकी आखों में मौत के भाव विद्यमान होते चले गये ।

"तुम्हारी कमीज कै कफ के भीतर क्या हे?” देवराज चौहान सर्द लहजे में कह उठा ।

“क्या है?" वह एकदम सीधा होकर बैठ गया ।

“तुम्हें अच्छी तरह मालूम है कि उसनें क्या है । बाहर निकालो उन्हें देवराज चौहान गुर्राया ।

"कुछ नहीं है तुम सीधी तरह गेम खेलो I” उसका लहजां भी सख्त हो उठा था ।

खड़े लोग भी एकाएक बिगडे मामले को हैरानी से समझने की चेष्टा करने लगे ।

देवराज चौहान झटके कै सार्थ उठा और घूमकर उनके पास पहुचा । इससे पहंले. कि वह समझ पाता, देवराज चौहान ने उसकी

बांह पकडी और कमीज कै बंद कफ में छिपे तीन पत्ते निकालकर टेबल पर मौजूद नोटों कै ढेर पर फेंकें । वह गुलाम -वेगम, बादशाह थे , एक ही कलर के ।

अपनी हेराफेरी पकड़े जाते देखकर पल-मर के लिए वह हढ़बड़ा उठा ।

"तो इस तरह तुम हर गेम जीत रहे थे I” देवराज चौहान ने उसके सिर कै बाल पकडकर उसे उठाया और जोरदार घूंसा उसके गाल पर मारा, वह कराहकर नीचे लुढकता चला गया ।
 
जुए के हाल में बैठे कई लोगों का ध्यान उनकी तरफ आकर्षित हो गया था I

देवराज चौहान एडियों कै बल घूमा और महादेव से बोला ।

"तुम इससे कितना हारे थे ?"

"बीस हजार I”

"उठा लो ।” महादेव ने फौरन सौ-सौ कै नोटों की दो गड्रियां उठाकर अपनी जेब में ठूंस लीं ।

बाकी टेबल पर पड़े नोटों के देर में से गड्डियां उठाकर देवराज चौहान अपने ब्रीफकेस मे ठूसने लगा । ब्रीफकेस भर गया तो उसे बन्द करके बाकी कै नोटोंको अपनी जेबों मे भरते हुए महादेव से बोला ---- "यह सारे मेरी जेब में नहीं आयेंगे । तुम भी अपनी जेवों में भर लो I एक पैसा यहा नहीं छोडना I"

महादेव तेजी से अपने काम में जुट गया ।

"तुम लोग यहां से एक पैसा मी नहीं ले जा सकतें ।" देवराज चौहान ने पलटकर देखा, वह चाकू थामे खतरनाक मुद्रा में खड़ा था I

अन्य खडे लोग यह दृश्य देखकर सहमते हुए पीछे हट गये ।

“जाओ अपना काम करो । " देवराज चौहान भिचे होंठों से बोला I साथ ही वंह नोट जेबों में ठूंसता रहा ।

नोटों को जेवों में ठूंसने का कार्य करते महादेव कै हाथ भी ना रुके थे ।

उसी पल देवराज चौहान एड्रियों कें बल घूमा और उसके हाथ में थमा चाकू जोकि उसकी कपम में धंसने जा रहा था, एक हाथ से उसने कलाई पकडी और दूसरे हाथ का घूसा उसके चेहरे पऱ दे मारा । इसके साथ ही देवराज चौहान ने उसकी कलाई छोड दी थी । वह तेज चीख के साथ नीचे जा गिरा और अगले ही पल उछलकर खड़ा हो गया । अब उसके चेहरे पर द्ररिन्दगी बरस रही थी ।

देवराज चौहान शांत मुद्रा में नोटों को जेब दो हवाले का रहा था ।।

"तुम यह नोट नहीं ते जा सकते । यह मेरा पैसा हे । " वह चीखा ।

"यह तुम्हारा नहीं, पते लगाकर हेराफेरी करके जीता हुआ लोंगों का पैसा है ।‘"

"तुम इस पैसे को लेकर यहां से जिन्दा बाहर नहीं जा सकते ।" वह पुन चीखा।

देवराज चौहान ने पलटकर मौत्त से निगाहों से उसकी आंखों में झांका ।

" तुम -तुम मेरी जान लोगे?"

“वह तो लेनी ही पडेगी अगर तुमने मेरा पैसा वापस टेबल पर ना रखा तो I”

देवराज चौहान का र्चेहरा क्रोध से स्याह पड़ गया। वह खतरनाक अन्दाज में उसकी तरफ बढा ।

"काट दो साले को l" वह चीखा ।

उसकी चीख की एवज में अब दो खेलने बालों ने जोकि सरासर उसी कं साथी थे, जेबों से चाकू निकाल लिए । देवराज चौहान क्षण-भर कै लिए ठिठका । सर्द निगाहों से उन दोनों को देखा l

“सारा पैसा वापस टेबल पऱ रख दो I” वह पुन् गला फाड़क्रर दडाड़ उठा I

'महादेव चाकुओं को देखकर कुछ घबरा उठा था । अब तक जुआघर में मौजूद सबकी निगाहें उन पर ठहर चुकी थी । ज्यादातर माजरा समझ चुके थे ।

उसी पंल देवराज चौहान का शरीर हवा में उछला और उसके दोनों जूतों की एडियां चाकू निकाले खडे ताश खेलने वाले उसके दोनों साथियों के माथे से वेग से जा टकरायीं ।

ठक ठक I

तीव्र आवाज हुई I उनके हलक से चीख भी ना निकली । अगले ही पल उनका माथा और सिर फट गया था ।

उनके शरीर लहराये और नीचे जा गिरे I माथे और सिर से तेजी से खून बहने लगा था I अब उनकें शरीरों में हरकत बिल्कुल नहीं थी I

देवराज चौहान तो उन पर वार करते ही फौरन सीधा खडा हो गया था । उनके नीचे गिरते ही वह पलटा और पुन: चाकू वाले खिलाडी की तरफ बढने लगा

"यह सब क्या हो रहा है?”

तभी ऊंची आबाज ने उसके कदम रूकवा दिए I

देवराज चौहान ने पलटकर देखा । क्लब का मेनेजर दो मुस्टण्डों के साथ वहां आ पहुंचा था I

"यह सब क्या हैं?" मैनेजर ने सख्त स्वर में कहा-" तुम लोगों को यहा पर खून-खराबा करने को किसने कहा?"

“यह पत्ते लगाकर हमसे जीत रहा था और हमने इसकी हेराफेरी पक्रड़ ली I" महादेव बोला।

“तो हमसे कहते I हम मामले का निपटारा कर देते । इस तरह कै झगड़े से हमारे क्लब की रैपुटेशन पर बुरा असर पडता हे ।" मैनेजर ने सख्त स्वर में कहा-"झगड़ा क्यों शुरू हुआ?"

देवराज चौहान ने सिगरेट सुलगाई और शांत स्वर मे कब उठा ।

"मैनेजरा पत्ते लगाकर हेराफेरी करके इसे खेलने का जुर्माना दे रहे हैँ । सादा-सा जुर्माना है, जो माल टेबल पर पड़ा वह सब हम ले रहे हैं यह अपने दो साथियों कै साथ चाकू निकालकर हमें माल ले जाने क्रो मना कर रहा हे I"

मैनेजर ने चाक्रू वाले खिलाडी क्रो देखा जोकि अब चाकू अपनी जेब में स्ख चुका था I तुमने पत्ते लगाये?"

"’नहीं I यह बोलता है I” उसने चीखकर तेज स्वर में कहा----"मेरा सारा ले जाना चाहता है ।"

"इसकी हेराफेरी की बात तो यहां खड़े लोगों से भी जानी जा सकती है।" महादेव कह उठा।

मैनेजर ने लोगों से बात की I आखों देखै गवाहों ने सच्चाई बयान की ।

"तुम अपनी दौलत जितनी हारे थे, वह वापस ले लो और उसंर्के बाद टेबल पर मौजूद बाकी की आधी दौलत ले लो । पत्तेबाजों के लिए इतना जुर्माना ही बहुत है ।" मेनेजर ने देवराज. चौहान से कहा ।
 
& मैनेजर साहबा अगर आप पहले आ जाते और यह चाकू से मेरी जान लेने की चेष्टा ना करता तो शायद मै ऐसा ही करता…जैसा कि आप कह रहे हैं !" देवराज चौहान ने सर्द स्वर . में कहा-“लेकिन अब आपकी बात नहीं मानी जा सकती, क्योंकि दौलत जेब मे डालने के पश्चात् उसे मैँ बाहर निकालना पसन्द नहीं करता!"

"तुम्हें मेरी बात माननी होगी I” मेनेजर ने सख्त स्वर में… कहा ।।

“यहां जुआ खेलने वाले कई लोग खड़े हैँ । उनसे पूछ लीजिए ।” देवराज चौहान ने एक-एक शब्द चबाकर कहा-“पत्ते लगाकर खेलने वाले के साथ वही सलूक करना चाहिए जो मैं कर रहा हूं। अगर यह लोग आधे पैसे को रखने के लि…ए कहते हैं तो मै सारा ही रख दूंगा ।"

“यह साहव ठीक कह रहे हैं। हेराफेरी करने वालों को ऐसी ही सजा मिलनी चाहिए ।" ‘

इसी प्रकार की मिलती जुलती कई आवाजें आईं

"सुना मैनेजर ।" देवराज ने शांत लहजे में कहा-फिर महादेव से बोला-"चलो ।"

महादेव जोकि टेबल के फुटकंर सारे नोट जेब मेँ डाल चुका था, देवराज चौहान कै साथ हो गया ।

देवराज -चौहान ने एक हाथ में ब्रीफकेस थाम लिया था । किसी ने उन दोनों को नहीं रोका ।

वह बाहर जाने वाले रास्ते की तरफ बढे तो पीछे से जुआरी का तेज स्वर उन्हें सुनाई दिया ।

"इन्हें रोक्रो, यह मेरा सारा पैसा ले जा रहे हैं l"

परन्तु मैनेजर ने उन्हें नहीं रोका ।

जुआ खेलने वाले अन्य लोग इस बात से सहमत थे कि हेराफेरी करने वाले को एक पैसा भी नहीं मिलना चाहिए । ऐसे में अगर मेनेजर उन्हें जाने से रोकता तो क्लब की रैपुटेशन पर बुरा असर पड़ता । शायद यह भी सोचा जाता कि मैनेजर भी इन चीटरों से मिला हुआ है। *

"जाने दो उन्हें I” मैनेजर ने शांत स्वर मे अपने निकट खडे मुस्टण्डो से कहा ।

फिर हेराफेरी करने वाले जुआरी को देखकर सख्त स्वर में बोला-"आज के बाद तुम कभी इस क्लव मे कदम नहीं रखोगे । यहां उन लोगों कै. लिए जगह नहीं है जो फ्ते लगाकर गेम खेलते हैं I" मैनेजर कै शब्द सुनते ही वह तेजी से बाहर निकल गया।

"इन दोनों को।" मेनेजर ने नीचे बेहोश पड़े दोनों की तरफ इशारा करते कहा -“उठाकर क्लव कै बाहर फेंके दो I" वह नीचे अभी तक बेहोश पड़े थे ।जूते की एडी माथे पर लगने के कारण उनका सास चेहरा. खून से नहाया पड़ा था ।

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फीनिश

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“बचो महादेव ।"

देवरार्ज चौहान एकाएक गला फाड़कर चीखा I क्लब से बाहर आकर देवराज चौहान पार्किग में खडी अपनी कार में बैठा और स्टार्ट कर ली l महादेव आगे का दरवाजा खोलकर देवराज चौहान की बगल में बैठने जा रहा था कि पीछे से जुआरी का अक्स दिखाई पडा, जिसने चाकू वाला हाथ सिर से ऊपर उठा रखा था और कार में बैठते महादेव की पीठ में भौंकने जा रहा था ।

यह सब देखते ही देवराज चौहान चीखा था और इसके साथ है… ही एक हाथ से महादेव को जोर से धक्क्रा दिया । हड़बड़ाया-सा महादेव कुछ ना समझ सका और. नीचे जा गिरा I उसके नीचे गिरते ही पीछे से आते जुआरी के पांव उससे टकराये और वह औंधे मुह नीचे जा गिरा । आधा कार कै खुले दरवाजे के बाहर और आधा भीतर । हाथ `में खुला चाकू सीट का फोम फाड़ता हुआ सीट में जा धंसा।

इससे पहले कि वह सम्भल पाता, देवराज चौहान का पंजा उसकी गर्दन पर जा टिका । वह गुर्र-गुर्र करकै रह गया I देवराज चौहान ने दूसरा हाथ स्टेयरिंग से हटाया और उसके हाथ से चाकू छीनकर उसे बन्द करके अपने कपडों में डाल लिया I देबृराज चौहान का चेहरा मौत र्क भावों से भर उठा था । तब तक महादेव सम्भल कर खड़ा हो चुका था और सारा मामला समझ चुका था ।

"इस हरामी को दबाकर बैठ जा I” देवराज चौहान भिंचे दांतों से बोला I

महादेव ने सारा मामला समझने के पश्चात देर नहीं की I

वह आगे बढा I जुआरी की बाहर की तरफ लटक रही टांगों को मोढ़कर कार कै भीतर किया और एक ही छलांग में उसके ऊपर बैठते हुए दरवाजा वन्द कर लिया । नीचे दबे जुआरी ने तड़पकर उठने की चेष्टा की तो महादेव ने जोरदार चांटा औंधे पड़े उसके सिर में दे मारा । बैसे दो और चटि खाने के पश्चात् वह कुछ ~ ठण्डा पडा I

"उल्लू के पटूठे! यू ही जमा रह ।" महादेव गुर्राया I तब तक देवराज कार आगे बढा चुका था I क्लब से निकलकर कार सडक पर दौडने लगी थी ।

शाम का धुंधलका फैलना आरम्भ हो चुका था I

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फीनिश

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आधे घण्टे के बाद देवराज चौहान ने कार को नेशनल हाईवे पर ले जाकर रोका । उसका चेहरा चट्टान की भांति सख्त हुआ पड़ा था । महादेव अभी तक जुआरी को नीचे दबाए बैठा था और वह अब पीड़ा से बराबर कराहे जा रहा था I

"महादेवा निकलो और इसे भी बाहर निकालो ।" कहने के साथ ही देवराज चौहान ड्राइविंग डोर खोलकर नीचे उतरा और सिगरेट लगाकर आसपास देखने लगा I

हाईवे पर पूरी तरह शान्ति थी । कही भी कोई आता-जाता न दिखाई दे रहा था I कभी-कभार अस्सी या सौं की रफ्तार से कोई वाहन, कार वगेरह जाते थे l अन्यथा वहा तगड्री सुनसानी ही व्याप्त थी । देवराज ने निगाहो को घुमाकर महादेव को देखा, जो कि जुआरी को लिए कार से बाहर आ गया था ।

महादेव ने उसे कमीज कै कॉलर से पकडा हुआ था और वह गहरी-गहरी सांसें ले रहा था । आधा घंटा महादेव उस पर बैठा रहा था । इसी से उसके कसबल निकल गये थे I

"देवराज चौहान साहब ।" महादेव बीला -“इस साले की ऐसी गत बनानी चाहिए किं जिन्दगी में फिर यह ताश नं खेले l खेले तो तीन पत्तों बाली गेम तो सपने में भी न खेले I हरामंजादा हमें मारने चला था ।"

देवराज चौहान ने कोई जवाब नहीं दिया ।

“ मुझे माफ कर दीजिए। फिर से मैं कभी ऐसा कुछ नहीँ करूगां मै

"चुप !" महादेव ने उसके सिर पर जोर से हाथ मारा तो उसने होंठ बन्द कर लिये ।

"इसे मेरे पास ले आओ ।" देवराज चौहान शांत लहजे मे बोला । महादेब ने जुआरी को गर्दन से पकड़ा और देवराज चौहान के पास आया ।

देवराज चौहान की निगाहें दायें-बायेँ घूम रही थीं । … “क्या देख रहे हो ? इसका कुछ इन्तजाम करो । हमें चलना भी है। अंधेरा फेलने वाला है।"

देवराज चौहान ने महादेव की बात का कोई जवाब नहीं दिया ।

तभी उसके होंठ एकाएक भिचते चले गए। आंखों में जहान-भर की कठोरता सिमट आई । उसे सामने से आता ट्रक दिखाई दिया था, जिसकी स्पीड हर हाल में सौ से ज्यादा ही थी । वह गोली की सी रफ्तार से आ रहा था ।

देवराज चौहान उसी मुद्रा में खडा रहा । देखते ही देखते वह काफी समीप आ गया ।

ट्रक को उनके सामने से गुजरने में चंद ही सैकेण्ड शेष बचे थे कि देवराज चौहान का शरीर तेजी से हरकत में आया, उसने जुआरी की बांह थामी ।

इससे पहले कोई कुछ समझ पाता, देवराज चौहान ने उसे तीव्र झटका दिया । जुआरी फेंकें हुए पत्थर की तरह सडक पर लुढ़क्रता चला गया । ठीक उसी पल, रफ्तार से आता ट्रक उसके ऊपर से गुजरता चला गया l

वह चीख भी न सका और उसका शरीर कुचल चुका था ।

खून के छींटे आसपास तक बिखरते चले गए थे । क्षण भर के लिए ट्रक की गति धीमी हुई और दूसरे ही पल, ट्रक पहले से भी तेज रफ्तार से भागता हुआ निगाहों से ओझल हो गया । द्रक ड्राइवर रुककर खामखाह की मुसीबत मोल नही लेना चाहता था । जो भी हो, मरने वाला तो उसी कै ट्रक के पहिए कै नीचे आकर कुचला गया था ।

देवराज चौहान ने जो कुछ किया, उसे देखकर महादेव सकपकाकर खड़ा-का-खड़ा रह गया ।

"यह तुमने क्या किया ?" महादेव सूखे स्वर में बोला ।

निगाहें सडक कै बीचों-बी पडे, जुआरी के कुचले ओर न पहचाने जाने वाले शरीर पर टिकी थीं । ट्रक ने उसे बुरी तरह कुचल डाला था ।
 
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