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सी. एम. एस {चूत मार सर्विस }

सावित्री की बात सुन कर वागले की मुस्कान गहरी हो गई। उसने गर्दन घुमा कर सावित्री की चूत की तरफ देखा। ब्लैक कलर की पेंटी में उसकी चूत दिख तो नहीं रही थी किन्तु पेंटी के किनारों से चूत के बाल ज़रूर झलक रहे थे। ये देख कर वागले के ज़हन में फ़ौरन ही विक्रम सिंह की डायरी वाली माया का ख़याल उभर आया। विक्रम सिंह ने अपनी डायरी में लिखा था कि माया कोमल और तबस्सुम तीनों की चूतें एकदम चिकनी थीं और उन पर कहीं कोई दाग़ नहीं था बल्कि हल्की गुलाबी रंगत लिए चमक रहीं थी।

वागले ने सावित्री की पेंटी को दोनों हाथों से पकड़ कर नीचे खींचा तो सावित्री ने झट से उसका हाथ पकड़ लिया, किन्तु वागले भला कहां मानने वाला था? उसने ज़ोर दे कर सावित्री की पेंटी को खींचते हुए उसकी टांगों से निकाल कर एक तरफ फेंक दिया। सावित्री को पता था कि इस वक़्त वो एकदम से बेपर्दा हो चुकी है इस लिए वो अपनी चूत को छुपाने के लिए कसमसा रही थी किन्तु वागले को जैसे पहले से पता था कि सावित्री ऐसा करेगी इस लिए उसने सावित्री को अच्छे से पकड़ लिया था। इससे पहले कभी भी सेक्स करते समय सावित्री इस तरह नंगी नहीं हुई थी, बल्कि हमेशा कपड़ों में ही सेक्स हुआ था। वागले का अगर बहुत मन होता था तो वो अपना ब्लाउज उतार देती थी बाकी साड़ी और पेटीकोट को एक साथ ऊपर कर के ही वो वागले के लंड को अपनी चूत में डलवा कर सेक्स करती रही थी।

सावित्री की घने बालों से घिरी चूत को देखने के लिए वागले को जैसे थोड़ा ज़ोर लगाना पड़ा क्योंकि वो साफ़ साफ़ दिख ही नहीं रही थी। ये देख कर वागले के ज़हन में ख़याल उभरा कि अगर सावित्री ने अपनी चूत के बालों को साफ़ कर रखा होता तो इस वक़्त वो साफ़ साफ़ देख पाता कि वो बिना बालों के कैसी दिखती है।

कुछ देर सावित्री की चूत और उसके चारो तरफ उगे घनघोर जंगल को देखने के बाद वागले खिसक कर ऊपर आया और आँखें बंद किए पड़ी सावित्री को देखते हुए बोला____"सुनो।"

"ह्म्मम्।" सावित्री ने आँखे बंद किए ही हुंकार भरी।

"तुमने अपने वहां पर इतने बाल क्यों ऊगा रखे हैं?" वागले ने ये कहा ही था कि सावित्री हड़बड़ा कर झट से उठ बैठी।

वागले ने देखा सावित्री उसकी इस बात को सुन कर किसी कुंवारी कन्या की तरह शर्माने लगी थी। उसने अपनी चूत को छुपाने के लिए अपनी दोनों टांगों को मोड़ लिया था। चेहरे पर अजीब से भाव लिए वो कभी वागले को देखती तो कभी उससे नज़रें चुराने लगती। उसकी इस हालत को देख कर वागले के मन में ख़याल उभरा कि उसने नाहक में ही ऐसा कह कर सावित्री को शर्मिंदा कर दिया है।

"क्या हुआ मेरी जान।" फिर उसने सावित्री के सुर्ख पड़े चेहरे को अपनी हथेलियों में लेते हुए कहा_____"तुम इतना शर्मा क्यों रही हो यार? मैंने एक छोटी सी बात ही तो पूछी थी तुमसे, इसमें इतना शर्माने की भला क्या ज़रूरत है?"

"आप ऐसी बात करेंगे तो मुझे शर्म नहीं आएगी क्या?" सावित्री ने उसकी बात सुन कर उसकी तरफ देखते हुए कहा____"आपको मेरे वहां के बाल से मतलब है या उससे जो आप करना चाहते हैं?"

सावित्री की बात सुन कर वागले के होठों पर मुस्कान उभर आई। वैसे नार्मल तरीके से सोचा जाए तो उसने सच ही कहा था किन्तु उसे नहीं पता था कि आज कल उसका पति किस तरह की मनोदशा में है।

"बात तो तुम्हारी ठीक है भाग्यवान।" वागले ने सिर हिलाते हुए कहा____"लेकिन अब से तुम हर जगह की साफ़ सफाई कर के रखोगी। मैं चाहता हूं कि मेरी प्यारी और खूबसूरत बीवी हर जगह से साफ़ और खूबसूरत दिखे। वैसे मैं तो तुम्हें इस बात का ज्ञान दे रहा हूं लेकिन सच तो ये है कि मेरे भी लंड के चारो तरफ तुम्हारी तरह ही घने बालों का जंगल ऊगा हुआ है।"

"हे भगवान! कितने बेशर्म हैं आप।" सावित्री ने अपने माथे पर हाथ मारते हुए कहा____"पता नहीं कहां से आपके मन में ऐसी बातें भर ग‌ईं हैं?"

"ये सब छोड़ो।" वागले ने कहा____"मैं ये कह रहा हूं कि कल हम दोनों ही अपने अपने बाल साफ़ कर लेंगे। उसके बाद ही तसल्ली से काम क्रीड़ा करेंगे। चलो अब सो जाते हैं, क्योंकि रात भी काफी हो गई है।"

वागले की इस बात को सुन कर सावित्री ने गहरी सांस ली। उसके चेहरे पर राहत के भाव उभर आए थे। शायद वो यही चाहती थी कि वागले ये सब बंद कर के सोने की बात कह दे और क्योंकि वागले ने उसके मन की बात कह दी थी इस लिए उसने फ़ौरन ही अपने कपड़े पहने और बेड के एक तरफ लेट गई। वागले के अंदर की गर्मी कदाचित शांत पड़ ग‌ई थी या शायद सावित्री की चूत के बालों को देख कर उसका मन ये सब करने से उचट गया था। ख़ैर वागले ने भी अपना पजामा कुर्ता पहना और बेड पर लेट कर सोने की कोशिश करने लगा।

दूसरे दिन वागले अपने निर्धारित वक़्त पर जेल के अपने केबिन में पहुंचा। ब्रीफ़केस को टेबल पर रखने के बाद वो कुछ देर फाइल्स को देखते हुए अपना काम करता रहा उसके बाद वो जेल का चक्कर लगाने के लिए निकल गया। क़रीब डेढ़ घंटे बाद वो वापस अपने केबिन में आया । कुछ देर जाने वो क्या सोचता रहा उसके बाद उसने अपने ब्रीफ़केस से विक्रम सिंह की डायरी निकाली और उसे खोल कर आगे की कहानी पढ़ने लगा।

☆☆☆
 
काफी देर बाद जब अंदर का और साँसों का तूफ़ान थमा तो मैंने आँखें खोली और बेड पर एक तरफ लेटी माया की तरफ देखा। उसे बेड पर न पा कर मैं चौंका। तभी मेरी नज़र कमरे में ही एक तरफ रखे सोफे पर पड़ी। माया सोफे पर बैठी सिगरेट फूंक रही थी। उसका जिस्म अभी भी बेपर्दा ही था। मैं सोचने लगा कि क्या उसे ज़रा भी शर्म न आती होगी?

"स्वारी।" जैसे ही उसने मेरी तरफ देखा तो मैंने उसकी तरफ देखते हुए धीमें स्वर में कहा।

"स्वारी फॉर व्हाट?" उसके माथे पर सलवटें उभरीं।

"मेरी वजह से तुम्हें तक़लीफ हुई।" मैंने मासूमियत से उसकी तरफ देखा।

"भूल जाओ उस बात को।" उसने छोटे से स्टूल पर रखी ऐशट्रे में सिगरेट के बचे हुए टुकड़े को मसल कर बुझाया और मेरी तरफ देखते हुए कहा____"और ये बताओ कि अभी और करने का इरादा है या आज के लिए इतना काफी समझते हो तुम?"

"सच कहूं तो मेरा अभी और करने का मन है।" मैंने नज़रें झुका कर और हल्की मुस्कान होठों पर सजाते हुए कहा____"मेरा तो मन करता है कि तुम्हारे साथ ये सब करता ही रहूं।"

"मुझे पता था तुम यही कहोगे।" माया ने मुस्कुरा कर कहा____"सेक्स चीज़ ही ऐसी है कि इससे किसी का मन नहीं भरता, ख़ास कर तब जब किसी को पहली बार करने को मिला हो। ख़ैर चलो फिर शुरू करते हैं, लेकिन इस बार तुम्हें अपने मन का नहीं करना है बल्कि एक औरत के मन का करना होगा। यानी जैसा मैं कहूंगी वैसा ही तुम्हें करना होगा।"

माया की बात सुन कर मैंने हाँ में सिर हिला दिया। सच तो ये था कि दुबारा सेक्स करने की बात से ही मेरा मन ख़ुशी से झूम उठा था। ख़ैर माया सोफे से उठ कर मेरे पास आई। उसके बेपर्दा जिस्म पर मेरी नज़रें जैसे जम सी गईं थी। उसकी बड़ी बड़ी छातियां उसके चलने से जब हिलीं थी तो उसका असर ये हुआ कि मेरा मुरझाया हुआ लंड फ़ौरन ही सिर उठाने लगा था। माया बेड पर आ कर सीधा लेट गई। मैं उसी को देख रहा था। जैसे ही वो सीधा लेटी तो मेरी नज़र उसके गोरे सफ्फाक बदन के हर हिस्से पर दौड़ने लगी। उसकी चिकनी और फूली हुई चूत को देखते ही मेरा हलक मुझे सूझता हुआ सा प्रतीत होने लगा था।

"ऐसे क्या देख रहा है भड़वे?" माया एकदम से किसी शेरनी की तरफ गुर्राई तो मैं जैसे सहम गया, जबकि उसने उसी गुर्राहट में आगे कहा____"चल कुत्ते की तरह मेरी चूत चाट।"

माया का बदला हुआ रूप देख कर मेरी सिट्टी-पिट्टी ही गुम हो गई थी। मैं समझ नहीं पाया कि माया को अचानक से क्या हो गया है? उसके चेहरे पर हाहाकारी भाव थे और आँखों में गुस्सा झलक रहा था।

"सुनाई नहीं दिया क्या तुझे?" माया इस बार ज़ोर से चिल्लाई तो मैं एकदम से हड़बड़ा गया और फिर बोला____"ये...ये सब क्या है? ये तुम किस लहजे में बात कर रही हो?"

"अबे गांडू कहीं के।" माया झटके से उठी और गुर्राई____"लहजे को अपनी गांड में डाल ले समझे। अभी जल्दी से कुत्ते की तरह मेरी चूत चाट वरना गांड में इतने डंडे बरसाऊंगी कि हगते नहीं बनेगा तुझसे।"

मुझे माया से ऐसे बर्ताव की सपने में भी उम्मीद नहीं थी। कहां इसके पहले मैं दुबारा सेक्स करने की बात से मन ही मन खुशियां मना रहा था और कहां अब माया के इस खतरनाक रवैए से मेरी हालत ही पतली हो गई थी। ख़ैर मरता क्या न करता वाली हालत में आ कर मैंने माया के हुकुम का पालन किया। वैसे एक सच्चाई ये भी थी कि माया के इस बर्ताव से मेरा दिल बुरी तरह दुःख गया था।

माया फिर से सीधा लेट गई थी और इस बार उसने अपनी दोनों टांगों को फैला दिया था जिससे उसकी चूत खुल कर मुझे दिखने लगी थी। बल्ब की तेज़ रौशनी में मैं माया की चूत को साफ़ देख सकता था। एकदम चिकनी चूत की दोनों फांकें उसकी टाँगें फैली होने से हल्की खुल ग‌ईं थी जिससे उसके अंदर का गुलाबी हिस्सा मुझे साफ़ नज़र आ रहा था। मैंने अपने सूखे गले को थूक निगल कर तर किया और आगे बढ़ते हुए माया की टांगों के बीच आ गया।

मैंने माया की तरफ इस उम्मीद से देखा कि शायद वो मुझ पर दया कर दे लेकिन उसके चेहरे के भावों में कोई परिवर्तन नहीं आया, बल्कि उसने फ़ौरन ही मुझे उसकी चूत चाटने का शख़्ती से इशारा किया।

कोई नार्मल सिचुएशन होती तो मैं पूरे जोश में आ कर माया के ऊपर सवार हो गया होता किन्तु वक़्त और हालात जैसे एकदम से बदल गए थे। ख़ैर मैंने खुद को एडजस्ट किया और फिर माया की चूत पर झुकता चला गया। चूत के क़रीब जैसे ही मेरा मुँह पहुंचा तो मेरी नाक में इसके चूत के कामरस की खुशबू समाने लगी। जाने क्यों इस बार मुझे वो खुशबू बड़ी बेकार सी लगी। ऐसा शायद इस लिए कि माया के बर्ताव से मेरा मन अब इस सबसे उचट गया था, किन्तु मजबूरी थी इस लिए मैंने झुक कर उसकी चूत पर हल्के से पहले अपना मुँह रखा और फिर जीभ निकाल कर उसे चाटा। एक अजीब सा स्वाद मेरी जीभ में पड़ा तो मेरे जिस्म का रोयां रोयां झनझना गया।

"अब साले डर डर के क्या छू रहा है।" माया की तीखी आवाज़ मेरे कानों में पड़ी____"मैंने कहा न कि कुत्ते की तरह मेरी चूत चाट। अब जल्दी से चाट वरना गांड में हंटर बजाऊंगी।"

"मैं ये नहीं कर सकता।" मैंने हिम्मत करके ये कहा और एक तरफ हट गया। इस वक़्त मेरी धड़कनें धाड़ धाड़ करके बज रहीं थी। किन्तु मैंने भी अब ठान लिया था कि मैं माया के इस बर्ताव पर उसके किसी भी हुकुम को नहीं मानूंगा।

"क्या हुआ?" माया झट से उठ ग‌ई____"इतने में ही डर गए? अरे! वहशीपना वाला सेक्स करना है तो ये सब भी सुनना पड़ेगा। मान लो अगर किसी औरत को इसी तरह से सेक्स करना पसंद हुआ तब तुम कैसे उसे खुश कर पाओगे?"

"इसका मतलब।" मैं जैसे आसमान से धरती पर गिरा____"तुम सच मुच का मुझ पर गुस्सा नहीं हो??"

"अरे! यार, तुम पर भला मैं क्यों गुस्सा होऊंगी?" माया ने कहा____"मेरा तो काम ही यही है कि मैं तुम्हें हर तरह से सेक्स करने की ट्रेनिंग दूं।"

माया की बात सुन कर जैसे मेरी जान में जान आई और मेरे होंठों पर मुस्कान उभरी। उधर माया ने मुझे समझाया कि अब मैं वैसा ही करूं जैसा वो कहे। मैं ये समझूं कि वो एक ऐसी औरत है जिसे सेक्स करते समय अपने मेल पार्टनर को गाली देना पसंद है और वो भी चाहती है कि उसका पार्टनर उसे गाली दे और साथ ही ये भी कि सेक्स करते समय उसका पार्टनर उसे बुरी तरह से चोदे। मैं माया की बात समझ गया था इस लिए अब मैं उसके अनुसार सब कुछ करने के लिए खुद को तैयार करने लगा था। माया ने इशारा किया और वो फिर से लेट गई।
 
"चल कुत्ते चाट मेरी चूत को।" माया ने लेटने के साथ ही ये कहा तो मैं पहले तो मुस्कुराया और फिर मैं भी उसकी तरह बर्ताव करते हुए आगे बढ़ा।

"अगर मैं तेरा कुत्ता हूं तो तू भी मेरी कुतिया है साली।" मैंने हिम्मत करके कहा____"अब देख मैं कैसे तेरी चूत को चाटता हूं और फिर तेरी चूत को अपने मोटे लंड से चोद चोद कर फाड़ता हूं।"

"तो फाड़ न गांडू साले।" माया ने कहने के साथ ही अपनी टांग चला दी जो सीधा मेरी कमर में लगी। मुझे दर्द तो हुआ किन्तु मैंने सहन कर लिया और फिर तो जैसा मेरे अंदर का मर्द भी जाग गया।

"साली कुतिया।" मैंने कहते हुए अपने दोनों हाथों से उसकी टांगों को पकड़ कर फैलाया और झुक कर उसकी चिकनी चूत में अपना मुँह रख दिया।

मेरे अंदर एक अजीब सा जोश भर गया था। अब मुझे उसके चूत की खुशबू से कोई परेशानी नहीं हो रही थी, बल्कि मैंने उसकी चूत की फांकों को मुँह में भर कर ज़ोर से खींचा तो माया की सिसकी निकल गई। उसने दोनों हाथों से मेरे सिर को पकड़ा और अपनी चूत पर ज़ोर से दबाया।

मैं सच में किसी कुत्ते की तरह माया की चूत को लपर लपर चाटने लगा था। मैं कभी जीभ से उसकी चूत को चाटता तो कभी उसकी चूत को मुँह में भर कर ज़ोर ज़ोर खींचने लगता। कमरे में माया की आहें और सिसकारियां गूजने लगीं थी और उसका जिस्म छटपटाने लगा था। कुछ ही देर में आलम ये हो गया कि मैं पागलों की तरह उसकी चूत को चाटते हुए उसकी दोनों चूचियों को भी बुरी तरह मसलने लगा। माया की सिसकियों में दर्द भी शामिल हो गया। वो बार बार मुझे कोई न कोई गाली देती तो जवाब में मैं भी उसकी चूत से अपना चेहरा उठा कर उसे गाली देता और उसके निप्पल को ज़ोर से खींच लेता।

माया की चूत कामरस बहा रही थी और मेरा चेहरा उसके कामरस से भींग गया था लेकिन मैं इसके बावजूद लगा ही रहा। माया बुरी तरह मेरे बालों को खींच रही थी जिससे मुझे दर्द भी हो रहा था। बदले में मैं भी उसकी चूत को दांतों से काट लेता था जिससे माया उछल पड़ती थी और गन्दी गन्दी गालियां देने लगती थी।

"आह्ह कुत्ते कमीने मेरी चूचियों को भी ऐसे ही काट साले।" माया सीसियाते हुए बोली और मेरे सिर के बालों को पकड़ कर अपनी छातियों की तरफ खींचने लगी।

"साली कुतिया।" मैं उसकी छाती की तरफ बढ़ता हुआ बोला____"तेरी इन खरबूजे जैसी चूचियों को तो मैं मिर्च मसाला लगा के खाऊंगा।"

"हां तो खा न बहनचोद।" माया मेरे सिर को अपनी छातियों पर दबाते हुए बोली तो मैंने उसके एक निप्पल को मुँह में भर कर ज़ोर से काटा तो वो चिल्ला ही पड़ी।

"आह्ह्ह्ह और ज़ोर से काट गांडू।" माया ने दर्द से चीखते हुए कहा तो मैं मन ही मन ये सोच कर थोड़ा हैरान हुआ कि वो दर्द के बावजूद अभी और ज़ोर से काटने को कह रही थी।

"ऐसा क्या।" मैंने सिर उठा कर कहा____"ठीक है फिर, अब तो मैं ऐसा काटूंगा साली कि तू अगर रहम की भीख भी मांगेगी तो नहीं छोड़ूंगा।"

मैंने कहने के साथ ही माया की चूची के मांस को मुँह में भरा और इस बार थोड़ा ज़ोर से काटा तो माया बुरी तरह बिलबिला उठी और उसने अपनी चूची से मुझे हटाने के लिए मेरे सिर को ज़ोर से हटाना चाहा लेकिन मैं किसी जोंक की तरह उसकी चूची पर चिपक गया था। माया दर्द से सिसयाते हुए पूरा ज़ोर लगा रही थी मगर मैं उसकी चूची के हर हिस्से पर बारी बारी से काट ले रहा था। उसके बाद मैं लपक कर उसकी दूसरी चूची को भी काटने लगा। माया का बुरा हाल हो गया था। वो दर्द और गुस्से में मुझे और भी ज़्यादा गालियां देने लगी थी।

काफी देर तक मैं माया की चूचियों को ऐसे ही काटता रहा और वो ऐसे ही दर्द से बिलबिलाती रही। फिर जब मुझे लगा कि कहीं वो रोने ही न लगे तो मैंने सिर उठा कर उसकी तरफ देखा। माया का बुरा हाल था। उसकी आँखों के किनारों से आंसू के कतरे बहे हुए दिख रहे थे। मुझे ये सोच कर उस पर तरस आ गया कि यही वो लड़की है जिसने मुझे पहली बार जीवन का असली मज़ा दिया है। मैं झट से आगे को खिसका और उसके होठों को मुँह में भर कर चूसने लगा माया ने फ़ौरन ही मेरे सिर को पकड़ा और खुद भी मेरे होठों को चूसने लगी। अचानक ही मेरा हाथ सरक कर उसकी एक चूची को मुठियाया तो वो मचल उठी। शायद काटने से उसकी चूचियों पर गहरे घाव हो गए थे जिससे मेरा हाथ लगते ही उसे दर्द हुआ था।

कुछ देर माया के होठों को चूसने के बाद मैंने अपना चेहरा उससे दूर किया और उसके बालों को मुट्ठी में पकड़ कर उसे उठाया। इससे पहले की वो कुछ समझ पाती मैंने फ़ौरन ही खड़े हो कर अपने भन्नाए हुए लंड को उसके मुँह के पास ला कर उसके मुँह में ठूंसने की कोशिश करने लगा।
 
"चल कुतिया अब तू मेरा लंड चूस।" मैंने एक हाथ से अपने लंड को पकड़ कर उसके मुँह में मारते हुए कहा तो उसने फ़ौरन ही अपना मुँह खोल दिया। जैसे ही उसने मुँह खोला मैंने उसके मुँह में अपना लंड घप्प से डाल दिया। मुझ में इतना जोश चढ़ गया था कि मैंने उसके सिर को पकड़ कर ज़ोर से झटका दिया, जिससे मेरा लंड सनसनाते हुए उसके गले तक पहुंच गया। वो बुरी तरह छटपटाई लेकिन मैंने उसे छोड़ा नहीं। हालांकि जब मैंने उसके मुँह में एक झटके में लंड घुसाया था तो उसके दाँत मेरे लंड पर भी गड़े थे और मेरे मुँह से दर्द मिश्रित आह निकल गई थी।

मैं माया के सिर को दोनों हाथों से पकड़े उसके मुख को चोद रहा था। उसके मुख से उसकी लार बहने लगी थी और उसका चेहरा लाल सुर्ख पड़ गया था। मेरे धक्के देने से नीचे उसकी चूचियां बुरी तरह हिल रहीं थी। इधर मैं मज़े के सातवें आसमान में था।

"चूस साली और चूस।" मैं इसके सिर को पकड़े और धक्के लगाते हुए बोल रहा था____"अच्छे से चूस कुतिया वरना गले के नीचे उतार दूंगा लंड को।"

मैंने ज़ोर से धक्का लगाया तो माया के जिस्म को झटके लगने लगे। उसने पूरी ताकत से मुझे पीछे की तरफ धक्का दिया, जिससे मेरा लंड उसके मुख से निकल गया। लंड के निकलते ही वो बुरी तरह खांसने लगी थी। उसकी साँसें उखड़ी हु‌ईं थी।

"साले हरामी।" वो खांसते हुए कह रही थी____"मार ही डालने का इरादा था क्या तेरा?"

"लंड चूसने कोई नहीं मरता कुतिया।" मैंने उसे धक्का दिया तो वो बेड पर सीधा हो कर गिरी। उसके गिरते ही मैंने उसकी दोनों टाँगें फैलाई और उसकी दहकती चूत में अपना लंड एक ही झटके में डाल दिया।

"आह्हहह कुत्ते फाड़ दी मेरी चूत।" माया दर्द से चीखी।

"तेरी तो पहले से ही फटी हुई है साली।" मैंने फिर से ज़ोर का धक्का दिया।

"अब ज़ोर ज़ोर से चोद मुझे।" माया ने चिल्ला कर कहा_____"साले कुत्ते दम नहीं है क्या तुझमें?"

माया की बात सुन कर मैं पूरे जोश में तेज़ तेज़ धक्के लगाने लगा। मैं पूरी तरह भूल चुका था कि आज से पहले मैं क्या था। इस वक़्त मैं किसी प्रोफेशनल की तरह माया को चोदे जा रहा था। मेरा मोटा तगड़ा लंड माया की चूत में सटासट अंदर बाहर हो रहा था। उसकी चूत इतनी गीली थी कि फच्च फच्च की आवाज़ आ रही थी। ज़िन्दगी में पहली बार मैं स्वर्ग में था। मेरी नज़र माया की हिलती चूचियों पर पड़ी तो मैंने हाथ आगे बढ़ा कर ज़ोर से उसकी एक चूची पर थप्पड़ मारा जिससे उसके मुख से दर्द भरी कराह निकल गई और साथ ही उसने मुझे गाली दी।

क़रीब दस मिनट बाद ही माया झटके लेते हुए झड़ गई। झड़ने के बाद वो बेजान लाश की तरह शांत पड़ ग‌ई थी लेकिन मैं रुका नहीं बल्कि धक्के लगाता ही रहा। मुझे इतना मज़ा आ रहा था कि मैं रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था। कुछ देर में जब माया को फिर से जोश चढ़ा तो मैंने उसकी चूत से लंड निकाल कर उसे घोड़ी बना दिया और उसके गोरे गोरे चूतड़ में ज़ोर ज़ोर से थप्पड़ मारते हुए अपने लंड को उसकी चूत में डाल दिया।

क़रीब दस मिनट बाद माया फिर से चिल्लाने लगी। वो झड़ने की कगार पर आ गई थी और यही हाल मेरा भी था। मैं ट्रेन की स्पीड से धक्के लगाने लगा और फिर जैसे मज़े की चरम सीमा के अंत होने का वक़्त आ गया। माया झटके खाते हुए झड़ी तो उसका गर्म गर्म पानी मेरे लंड महसूस हुआ और फिर मैं भी अपने आपको रोक नहीं पाया। मेरा जिस्म अकड़ गया और मैं माया की चूत में ही झड़ता चला गया। पता नहीं कब तक मुझे झटके लगते रहे और फिर मैं उसके ऊपर ही जैसे बेहोश सा हो गया। सेक्स का तूफ़ान थम चुका था। कमरे में शान्ति छा गई थी। सिर्फ हम दोनों की उखड़ी हुई साँसों की ही आवाज़ें गूँज रहीं थी।

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अब तक,,,,,

क़रीब दस मिनट बाद माया फिर से चिल्लाने लगी। वो झड़ने की कगार पर आ गई थी और यही हाल मेरा भी था। मैं ट्रेन की स्पीड से धक्के लगाने लगा और फिर जैसे मज़े की चरम सीमा के अंत होने का वक़्त आ गया। माया झटके खाते हुए झड़ी तो उसका गर्म गर्म पानी मेरे लंड महसूस हुआ और फिर मैं भी अपने आपको रोक नहीं पाया। मेरा जिस्म अकड़ गया और मैं माया की चूत में ही झड़ता चला गया। पता नहीं कब तक मुझे झटके लगते रहे और फिर मैं उसके ऊपर ही जैसे बेहोश सा हो गया। सेक्स का तूफ़ान थम चुका था। कमरे में शान्ति छा गई थी। सिर्फ हम दोनों की उखड़ी हुई साँसों की ही आवाज़ें गूँज रहीं थी।

अब आगे,,,,,,

"क्या हुआ?" करीब पंद्रह मिनट बाद माया ने उस वक़्त मुझसे पूछा जब मैं बेड पर एक किनारे कुछ सोचते हुए बैठा था____"अब क्या सोच रहे हो? क्या फिर से करने का इरादा है?"

मैंने माया की तरफ देखा। वो बेड पर उठ कर बैठ गई थी। हम दोनों अभी भी पूरे नंगे ही थे। माया के चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी किन्तु मैं थोड़ा उदास सा था और मुझे अंदर से बिल्कुल भी अच्छा नहीं लग रहा था। शायद इसी वजह से माया ने मुझसे ये पूछा था।

"नहीं, अब मेरा करने का कोई इरादा नहीं है।" मैंने पहले की ही तरह थोड़े उदास भाव से कहा।

"तो फिर तुम इस तरह सैड टाइप क्यों दिख रहे हो?" माया ने कहा____"क्या तुम्हें मेरे साथ सेक्स करने में मज़ा नहीं आया?"

"बात मज़ा आने की नहीं है।" मैंने उसकी तरफ देखते हुए कहा____"बल्कि बात ये है कि मैंने बहुत बुरी तरह से तुम्हें काटा था जिसकी वजह से तुम्हारी छातियों में ज़ख्म बन गए हैं। उस वक़्त तो जोश जोश में मैं वो सब कर गया लेकिन अब मुझे ऐसा लग रहा है कि मैंने तुम्हारे साथ बिल्कुल भी अच्छा नहीं किया।"

"ओह! डियर।" माया ने मुस्कुरा कर मेरा चेहरा सहलाते हुए कहा____"तो तुम इस वजह से सैड हो के बैठे हो? कमाल के हो तुम। सिर्फ इतनी सी बात के लिए बुरा फील कर रहे हो। वैसे मुझे अच्छा लगा कि तुम मेरे लिए ऐसा फील कर रहे हो लेकिन यकीन मानो डियर, मुझे तुम्हारे ऐसा करने से तुमसे कोई शिकायत नहीं है। तुमने वही किया जो करने के लिए मैंने कहा और तुम्हें उकसाया भी। इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है और सबसे बड़ी बात ये है कि ये सब तुम्हारी ट्रेनिंग का एक हिस्सा है। रही बात मेरे ज़ख्म और तक़लीफ की तो ये सब चलता ही रहता है। इस तरह का काम करने से पहले हमें खुल कर बताया गया था कि इस काम में हमें कितनी तक़लीफ मिलेगी। हमने इस तक़लीफ को ख़ुशी से चुना है डियर, इस लिए तुम इसके लिए सैड फील मत करो।"

"तो क्या तुम सच में मुझसे नाराज़ नहीं हो?" मैंने मासूमियत से उससे पूछा तो उसने मुस्कुराते हुए कहा____"बिल्कुल नहीं डियर, बल्कि मैं तो खुश हूं कि तुमने पहली बार में बहुत अच्छा करने की कोशिश की। सबसे बड़ी बात ये कि अब तुम्हारे अंदर शर्म और झिझक नहीं रही।"

"हां मुझे भी अब ऐसा ही लग रहा है कि अब मुझे पहले की तरह शर्म महसूस नहीं होती।" मैंने कहा____"हालाँकि तुम्हारे अलावा भी अगर किसी और के साथ मुझे शर्म नहीं महसूस होगी तो फिर मैं पूरी तरह समझ जाऊंगा कि अब मेरे अंदर से पूरी तरह शर्म और झिझक चली गई है।"

"अगर ऐसा है।" माया ने कहा____"तो जल्द ही तुम्हें मेरे अलावा दूसरी लड़की के साथ इस बात को आजमाने का मौका मिल जाएगा।"

"वो कैसे?" मैंने न समझने वाले भाव से पूछा।

"तुम कोमल और तबस्सुम को भूल गए क्या?" माया ने कहा___"अभी तो तुम्हें उन दोनों के साथ भी यही सब करना है।"

"ओह! हां।" मुझे जैसे याद आया।

"वो दोनों एक साथ ही रहती हैं।" माया ने कहा____"इस लिए तुम्हें एक साथ ही उन दोनों के साथ ये सब करना पड़ेगा। अगर तुमने इन दोनों को खुश कर दिया तो समझो तुम्हारी ट्रेनिंग पूरी हो गई।"

माया की इस बात से मैं मन ही मन ये सोच कर थोड़ा घबराया कि उन दोनों ने अगर मेरा बुरा हाल कर दिया तो?? ख़ैर उसके बाद मैं और माया दोनों ने अपने अपने कपडे पहने। माया के कहने पर मैं उसके साथ ही कमरे से बाहर आ गया।

उस दिन का कोटा माया के साथ पूरा हो गया था इस लिए बाकी का सारा दिन और रात कुछ नहीं हुआ। बल्कि दोपहर का लंच करने के बाद मैं एक अलग कमरे में चला गया था। माया के साथ सेक्स कर के मैं बुरी तरह थक गया था इस लिए बेड पर लेटते ही मैं गहरी नींद में चला गया था।

शाम को मेरी आँख कोमल के जगाने पर ही खुली। उसने मुझे फ्रेश हो कर आने को कहा तो मैं फ्रेश होने के लिए बाथरूम में चला गया। उसके बाद मैंने कोमल तबस्सुम और माया के साथ ही डिनर किया। डिनर के दौरान कोमल और तबस्सुम अपनी तरह तरह की बातों से मेरे और माया के साथ मज़ाक करती रहीं। मैं चुप चाप डिनर कर रहा था और साथ ही ये भी सोचता जा रहा था कि माया के बाद अब मुझे कोमल और तबस्सुम के साथ सेक्स करना है। माया ने कहा था कि मुझे उन दोनों के साथ ही सेक्स की ट्रेनिंग लेनी होगी। इस बात को सोच सोच कर ही मेरे अंदर एक अलग ही तरह की उत्सुकता बढ़ती जा रही थी।

रात में भी कुछ नहीं हुआ, बल्कि मैं डिनर करने के बाद एक अलग कमरे में सो गया था। दूसरे दिन मैं उठा और फ्रेश होने के बाद उन तीनों के साथ नास्ता वग़ैरा किया। माया ने बताया कि नास्ता करने के एक घंटे बाद मुझे कोमल और तबस्सुम के साथ जाना है। मैं कोमल और तबस्सुम को कनखियों से देख लेता था। कई बार मेरी उनसे नज़रें भी चार हो ग‌ईं थी। वो दोनों बस हल्के से मुस्कुरा देती थीं। मैं अंदर ही अंदर ये सोच रहा था कि उन दोनों के साथ मैं किस तरह से खुद को एडजस्ट कर पाऊंगा?

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वागले ने गहरी सांस लेते हुए डायरी को बंद कर दिया। वो सोचने लगा कि विक्रम सिंह उस समय कितने मज़े में था। माया कोमल और तबस्सुम जैसी खूबसूरत लड़कियों के साथ उसने जी भर कर के सेक्स का मज़ा लिया था। उसके बाद भी उसने अलग अलग लड़कियों या औरतों के साथ इसी तरह मज़े किए होंगे। एकाएक वागले के ज़हन में ख़याल उभरा कि इस सबके बीच आख़िर ऐसा क्या हुआ होगा जिसकी वजह से विक्रम सिंह को अपने ही माता पिता की हत्या करनी पड़ी होगी? वागले ने इस बारे में बहुत सोचा लेकिन उसे कुछ समझ नहीं आया। ख़ैर उसने केबिन के चारो तरफ नज़रें घुमाई और फिर हैंड वाच में टाइम देखा। लंच का टाइम हो गया था। जेल का ही एक सिपाही जिसका नाम श्याम था उसने उसके घर से खाने के लिए टिफिन ला दिया था। वागले ने लंच किया और जेल का चक्कर लगाने के लिए निकल गया।

जेल का चक्कर लगा कर वागले जब वापस अपने केबिन की तरफ आया तो गलियारे में उसे श्याम मिल गया। उसने उसे बताया कि एक आदमी उसके इंतज़ार में काफी देर से बैठा है। वागले उसकी बात सुन कर कुछ पल सोचा और फिर उसे बोला कि वो उस आदमी को उसके केबिन में भेज दे। वागले अपने केबिन में पहुंचा तो दो मिनट के अंदर ही एक आदमी उसके केबिन में दाखिल हुआ। वागले ने उस आदमी को गौर से देखा और फिर उसे अपने सामने टेबल के उस पार रखी कुर्सी पर बैठने का इशारा किया।

"शुक्रिया।" वो आदमी ये कहते हुए कुर्सी पर बैठ गया।

"कहिए कौन हैं आप?" उसके बैठते ही वागले ने उससे कहा____"और हमसे क्यों मिलना चाहते थे?"

"जी मैं इंटेलिजेंस विभाग से हूं।"उस आदमी ने अपनी आवाज़ को प्रभावशाली बनाते हुए कहा_____"और एक केस के सिलसिले में आपसे कुछ गुफ्तगू करने आया हूं।"

"ओह! आई सी।" वागले मन ही मन चौंकते हुए कहा____"जी कहिए किस केस के सिलसिले में आप हमसे गुफ्तगू करना चाहते हैं?"

"असल में मैं सीक्रेट रूप से केस पर छानबीन कर रहा हूं।" उस आदमी ने ख़ास भाव से कहा____"इस लिए आपको केस के बारे में डिटेल में कोई जानकारी नहीं दे सकता।"

"तो फिर आप हमसे क्या चाहते हैं?" वागले ने न समझने वाले भाव से पूछा।

"आपकी जेल में विक्रम सिंह का नाम कैदी था।" उस आदमी ने कहा____"जिसे उम्र कैद की सज़ा हुई थी किन्तु फिर उसके अच्छे बर्ताव की वजह से अदालत ने उसकी बाकी की सज़ा को माफ़ कर के रिहा कर दिया है। मैं ये जानना चाहता हूं कि उससे सम्बंधित आपके पास क्या क्या जानकारी है?"

"कमाल की बात है जनाब।" वागले उसके मुख से विक्रम सिंह का नाम सुन कर मन ही मन बुरी तरह चौंका था, किन्तु फिर अपने चेहरे के भावों को शख़्ती से दबाते हुए प्रत्यक्ष में कहा____"विक्रम सिंह नाम का कैदी इस जेल से रिहा हो कर क्या गया उसके तो कई सारे चाहने वाले नज़र आने लगे।"

"क्या मतलब।" उस आदमी के चेहरे पर सिलवटें उभरीं____"मैं कुछ समझा नहीं, आप कहना क्या चाहते हैं?"

"क्या आप मुझे अपना आई कार्ड दिखाएंगे?" वागले ने जाने क्या सोच कर ये कहा तो उस आदमी ने कुछ पलों तक वागले की तरफ देखा उसके बाद उसने अपनी कोट की जेब से अपना आई कार्ड निकाल कर वागले के सामने टेबल पर रख दिया।
 
"ओह! माफ़ कीजिएगा।" आई कार्ड देखने के बाद वागले ने उसका आई कार्ड वापस उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा____"असल में आपका आई कार्ड देखने के पीछे दो वजहें थीं। एक तो फॉर्मेलिटी के तौर पर दूसरे अपनी एक शंका को दूर करने के लिए। कुछ दिनों पहले हमसे मिलने एक आदमी आया था। उसने खुद को विक्रम सिंह का दोस्त बताया था जो कि हाल ही में विदेश से आया था। वो यहाँ पर हमसे अपने दोस्त विक्रम सिंह के बारे में जानने आया था और आज जब आप आए तो हम ये सोचने पर मजबूर से हो गए कि बीस सालों बाद जबकि विक्रम सिंह यहाँ से रिहा हो कर जा चुका है तो उसके चाहने वाले कहां से आ गए? अगर उसके इतने ही चाहने वाले थे तो वो इन बीस सालों कभी उससे मिलने क्यों नहीं आए? उसके यहाँ से रिहा होने के बाद जब इस तरह से कोई उसके बारे में जानने यहाँ आया तो अब हमें यही लग रहा है कि जैसे विक्रम सिंह के चाहने वाले उसके रिहा होने का ही इंतज़ार कर रहे थे। हालांकि सवाल तो कई सारे हैं किन्तु जवाब किसी का भी नहीं है। ख़ैर आप बताइए आप हमसे विक्रम सिंह के बारे में क्या जानना चाहते हैं?"

"सबसे पहले तो मैं ये कहना चाहूंगा कि मुझे ये जान कर बेहद आश्चर्य हुआ कि विक्रम सिंह के बारे में जानने के लिए उसका कोई दोस्त यहाँ आया था।" उस आदमी ने लम्बी सांस लेते हुए कहा____"जबकि मेरी जानकारी में उसके जितने भी दोस्त थे वो बहुत पहले ही उससे सम्बन्ध तोड़ चुके थे। कहने का मतलब ये कि विक्रम सिंह का ऐसा कोई गहरा दोस्त बचा ही नहीं था जो उसके लिए जानने को इस क़दर उत्सुक हो। ख़ैर मैं यहाँ आपसे ये जानने आया हूं कि विक्रम सिंह ने अपने बारे में आपको क्या बताया है?"

"आप ये कैसे कह सकते हैं जनाब कि विक्रम सिंह ने हमें अपने बारे में कुछ बताया है?" वागले ने उस आदमी की तरफ अपलक देखते हुए कहा।

"हमारे डिपार्टमेंट के कुछ लोग कई बार इस जेल की गतिविधियों पर नज़र रख चुके हैं।" उस आदमी ने कहा____"उन्हीं से हमें पता चला है कि इस जेल में विक्रम सिंह से आपका गहरा सम्बन्ध रहता था। बस इसी वजह से मुझे लगता है कि विक्रम सिंह ने अपने बारे में आपसे ज़रूर कुछ न कुछ बताया होगा।"

"फिर तो आपके जो डिपार्टमेंट वाले यहाँ की गतिविधियों पर नज़र रख रहे थे।" वागले ने मुस्कुराते हुए कहा____"उन्होंने ठीक तरह से नज़र नहीं रखी वरना उन्हें ये भी पता चल जाता कि विक्रम सिंह से भले ही हमारा गहरा ताल्लुक रहता था लेकिन हमारी लाख कोशिशों के बाद भी उसने अपने बारे में हमें कभी कुछ नहीं बताया।"

"बडे आश्चर्य की बात है।" उस आदमी ने सोचने वाले अंदाज़ से कहा____"ये विक्रम सिंह तो सच में बड़ा ही शख़्तजान आदमी लगता है। कहने का मतलब ये कि उसने न तो पहले कभी पुलिस या कानून को अपने बारे में कुछ बताया और ना ही यहाँ आपसे कुछ बताया।"

"वैसे क्या मैं जान सकता हूं कि विक्रम सिंह के मामले में इंटेलिजेंस विभाग वाले क्यों इन्वॉल्व हुए?" वागले ने कहा____"और अगर हुए भी तो इतने सालों बाद क्यों? विक्रम सिंह के मामले को दो दशक गुज़र चुके हैं किन्तु इन दो दशकों में कभी इंटेलिजेंस का उसके इस मामले में इन्वॉल्वमेंट नहीं हुआ। तो अब आख़िर ऐसा क्या हो गया है जिसके लिए इंटेलिजेंस वाले बीस साल बाद विक्रम सिंह के मामले पर इतनी दिलचस्पी दिखा रहे हैं?"

"जैसा कि मैं शुरू में ही आपसे बता चुका हूं कि हमारा ये केस सीक्रेट है।" उस आदमी ने कहा____"इस लिए डिटेल में मैं आपको कुछ नहीं बता सकता किन्तु हां, इतना ज़रूर बता सकता हूं कि इसके पहले कई सालों तक ये मामला पुलिस के हाथ में ही था किन्तु जब कोई पुख़्ता सबूत या सुराग़ नहीं मिला तो पुलिस ने फाइल को क्लोज कर दिया और इस मामले को जैसे भुला ही दिया। अभी कुछ समय पहले ये मामला फिर से उभरा और इस तरह से उभरा कि इस मामले को डायरेक्ट इंटेलिजेंस विभाग को सौंप दिया गया और इसकी छानबीन को सीक्रेट रूप से करने को कहा गया।"

"काफी दिलचस्प बात है।" वागले ने कुछ सोचते हुए कहा____"अब आप तो कुछ बता नहीं सकते क्योंकि आपके अनुसार ये सीक्रेट मामला है लेकिन सोचने वाली बात है ही कि आख़िर ऐसा क्या हुआ होगा जिसकी वजह से बीस साल हो चुके मामले में बीस सालो बाद इंटेलिजेंस विभाग इसमें इन्वॉल्व हुआ। हमारा ख़याल है कि ज़रूर इसमें किसी बड़ी हस्ती का भी नाम आया होगा और कुछ इस तरह से आया होगा कि उसने मामले की छानबीन के लिए डायरेक्ट इंटेलिजेंस विभाग को इन्वॉल्व कर दिया।"

"ख़ैर अब जो है सो है।" उस आदमी ने गहरी सांस ली____"लेकिन एक बात अच्छी नहीं हुई और वो ये कि मेरा यहाँ आना फायदेमंद नहीं हुआ। चलिए कोई बात नहीं। वैसे आपको क्या लगता है, विक्रम सिंह यहाँ से रिहा हो कर कहां गया होगा?"

"भगवान ही जाने।" वागले ने सिर हिलाते हुए कहा____"मैंने अपनी ज़िन्दगी में उसके जैसा अजीब इंसान नहीं देखा। वो हमसे थोड़ा बहुत बातें तो कर लेता था लेकिन जब हम उससे उसके बारे में कुछ भी पूछते थे तो वो अपने होठों को शख़्ती से भींच लेता था। जैसे ग़लती से भी वो ये न चाहता हो कि उसके होठों से कोई ऐसा शब्द निकल जाए जिसके तहत हमें उसके बारे में ज़रा सा भी कुछ पता चल जाए।"

आगन्तुक का नाम जयराज पाटिल था। वागले ने उसके आई कार्ड में यही नाम पढ़ा था। कुछ देर और इधर उधर की बातें करने के बाद वो वागले से विदा ले कर चला गया था। उसके जाने के बाद वागले काफी देर तक उसके और विक्रम सिंह के बारे में सोचता रहा था। उसके लिए अब ये सोचने वाली बात थी कि ऐसा क्या हुआ है जिसकी वजह से देश का इंटेलिजेंस विभाग विक्रम सिंह के बारे में छानबीन करने उसके पास पहुंच गया है? वागले के ज़हन में एकदम से ये ख़याल उभरा कि विक्रम सिंह का मामला यकीनन एक ऐसा मामला है जो मामूली नहीं हो सकता। इंटेलिजेंस विभाग के उस आदमी के आने के बाद वागले को पहली बार महसूस हुआ कि मामला गंभीर है किन्तु उसकी समस्या ये थी कि वो खुद कुछ कर नहीं सकता था, क्योंकि उसके पास सच में विक्रम सिंह के सम्बन्ध में कोई जानकारी नहीं थी और ना ही वो ये जानता था कि विक्रम सिंह उसकी जेल से रिहा हो कर कहां गया होगा?

अगर उसे पहले से इस मामले की गंभीरता का पता होता तो वो यकीनन विक्रम सिंह के पीछे अपने जेल के किसी पुलिस वाले को लगा देता, ताकि पता चल सके कि विक्रम सिंह कहां जाने का इरादा रखे हुए था? वागले ने एक सिगरेट जलाई और उसके लम्बे लम्बे कश लेते हुए सोचने लगा। एकाएक ही वो चौंका। उसके ज़हन में अचानक से विक्रम सिंह की डायरी का ख़याल उभर आया। विक्रम सिंह की डायरी में तो उसके बारे में लगभग सब कुछ ही लिखा हुआ था। यानी डायरी के आधार पर शायद वो पता लगा सकता था कि विक्रम सिंह कहां गया होगा। उसने अपनी डायरी में कहीं तो किसी प्रकार का सुराग़ छोड़ा होगा। वागले ने सोचा कि अगर वो विक्रम सिंह की डायरी को जयराज पाटिल के हवाले कर देता तो मुमकिन है कि वो उस डायरी के आधार पर उसके बारे में जान लेते और उसका पता भी कर लेते, लेकिन तभी वागले के ज़हन में ख़याल उभरा कि विक्रम सिंह ने वो डायरी सिर्फ उसके लिए लिखी थी और उस पर विस्वास कर के ही उसको दी थी। ऐसे में इस डायरी को किसी और के हवाले कर के क्या वो विक्रम सिंह से विश्वासघात नहीं कर बैठेगा? वागले ने गहरी सांस ली और मन ही मन सोचा कि अच्छा हुआ कि उसने जयराज से विक्रम सिंह की डायरी का ज़िक्र नहीं किया।

वागले को इंटेलिजेंस विभाग के उस आदमी यानि जयराज पाटिल की बात याद आई जब उसने उससे कहा था कि विक्रम सिंह के सभी दोस्तों ने उससे अपने संबंध तोड़ लिए थे। अगर जयराज पाटिल की ये बात सच है तो फिर वो शख़्स कौन था जो उस दिन उससे मिलने आया था और खुद को विक्रम सिंह का दोस्त कह रहा था? उसके अनुसार जब विक्रम सिंह ने अपने माता-पिता की हत्या की थी तब वो भारत देश में ही नहीं था। वागले के ज़हन में सवाल उभरा कि कहीं वो शख़्स कोई ऐसा व्यक्ति तो नहीं था जो झूठ मूठ का विक्रम सिंह को अपना दोस्त कह रहा था और किसी खास मकसद के तहत वो उससे विक्रम सिंह के बारे में जानकारी प्राप्त करना चाहता था?

वागले सोचने लगा कि आख़िर वो कौन रहा होगा और किस मकसद से विक्रम सिंह के बारे में उससे जानकारी प्राप्त करना चाहता था? वागले ने इस बारे में बहुत सोचा लेकिन उसको इससे संबंधित कुछ भी खास बात समझ में न आई। थक हार कर वागले ने इन सारी बातों को अपने दिमाग़ से झटका और ब्रीफ़केस से विक्रम सिंह की डायरी निकाल कर आगे की कहानी पढ़ना शुरू कर दिया।

☆☆☆
 
अब तक...

वागले सोचने लगा कि आख़िर वो कौन रहा होगा और किस मकसद से विक्रम सिंह के बारे में उससे जानकारी प्राप्त करना चाहता था? वागले ने इस बारे में बहुत सोचा लेकिन उसको इससे संबंधित कुछ भी खास बात समझ में न आई। थक हार कर वागले ने इन सारी बातों को अपने दिमाग़ से झटका और ब्रीफ़केस से विक्रम सिंह की डायरी निकाल कर आगे की कहानी पढ़ना शुरू कर दिया।

अब आगे....

नास्ता करने के बाद मैं अपने एक अलग कमरे में आराम कर रहा था कि तभी मेरे कमरे पर किसी ने दस्तक दी। मैं बेड पर लेटा हुआ था और अपनी बदली हुई ज़िन्दगी के बारे में ही सोच रहा था। ख़ैर दस्तक हुई तो मैं उठा और जा कर दरवाज़ा खोला। दरवाज़े के बाहर कोमल और तबस्सुम खड़ी हुईं थी। उन दोनों को देखते ही मेरे दिल की धड़कनें बढ़ चलीं, जबकि मुझ पर नज़र पड़ते ही वो दोनों बड़ी अदा से मुस्कुराईं और कमरे के अंदर दाखिल हो ग‌ईं। मैं जानता था कि वो दोनों मेरे पास किस लिए आईं थी इस लिए मैंने ख़ामोशी से दरवाज़ा बंद किया और पलट कर उनकी तरफ देखा। वो दोनों बेड पर जा कर बैठ चुकीं थी।

"तो तुम तैयार हो न हमारे साथ मज़े के सागर में डूबने के लिए?" कोमल ने मेरी तरफ देखते हुए मुस्कुरा कर मुझसे पूछा।

"और किस लिए आया हूं मैं यहाँ?" मैंने बड़ी हिम्मत से और बड़े कॉन्फिडेंस के साथ कहा तो दोनों के होठों पर मुस्कान उभर आई।

"बहुत खूब।" तबस्सुम ने उसी मुस्कान के साथ कहा____"माया के साथ वक़्त गुज़ारने के बाद काफी बदलाव दिख रहा है तुम में। ख़ैर ये तो अच्छी बात हुई, क्योंकि हम तो ये सोच रहे थे कि तुम मारे शर्म और झिझक के हम दोनों के साथ खुल कर मज़े कैसे कर पाओगे?"

"कोशिश कर रहा हूं कि मेरे अंदर से शर्म और झिझक जितना जल्दी हो सके पूरी तरह निकल जाए।" मैंने आगे बढ़ते हुए कहा____"बाकि तुम दोनों तो हो ही मेरी शर्म और झिझक को दूर करने के लिए।"

"वो तो हम हैं ही।" कोमल ने कहा____"लेकिन शर्म और झिझक तो इंसान के स्वभाव में होती है जिसे इंसान को खुद ही दूर करनी पड़ती है। तुम जिस लाइन में जाने वाले हो उसमें इसके लिए कोई जगह नहीं है। अपने अंदर से शर्म और झिझक को दूर करने का बस एक ही तरीका है कि जब भी किसी औरत के पास सेक्स के लिए जाओ तो अपने ज़हन में ये विचार बिलकुल भी पैदा न होने दो कि वो औरत तुम्हारे बारे में क्या सोचेगी अथवा तुम उसे खुश कर पाओगे कि नहीं, बल्कि सिर्फ ये सोच रखो कि तुम एक हलब्बी लंड के मालिक हो जिसके बलबूते पर तुम दुनियां की किसी भी औरत को मस्त कर सकते हो।"

"अपने आप पर यकीन होना बहुत ज़रूरी है डियर।" तबस्सुम ने कहा____"अगर खुद पर यकीन नहीं होगा तो हलब्बी लंड के होते हुए भी तुम किसी औरत को खुश नहीं कर पाओगे। इस लिए अपने आप पर और अपनी काबिलियत पर यकीन होना चाहिए। उसके बाद जब किसी के साथ सेक्स की शुरुआत हो जाती है तो सब कुछ अपने आप ही होता चला जाता है। उस समय हमारा ज़हन अपने आप ही अलग अलग तरह की चीज़ों की कल्पना करते हुए कार्य करने लगता है।"

"तुम्हारे लिए सबसे अच्छी बात ये है डियर कि तुम्हें सब कुछ बड़े पैमाने पर पहले से ही कुदरत ने दे दिया है।" कोमल ने कहा____"अब ज़रूरत है उसका सही तरह से उपयोग करने की। हर दिन और हर किसी के साथ एक अलग ही अनुभव मिलेगा तुम्हें जो कि तुम्हारी कला को और तुम्हारी क्षमता को भी बढ़ाता रहेगा। ख़ैर अब छोड़ो ये सब और शुरू हो जाओ। तुम इस वक़्त ये समझो कि तुम हमारे पास अपनी ड्यूटी पूरी करने आए हो। इस लिए अपनी ड्यूटी निभाते हुए तुम्हें हम दोनों को खुश करना है।"

मैं दोनों की बातें बड़े गौर से सुन रहा था और सच तो ये था कि मेरा मन तरह तरह के विचारों से भरता जा रहा था। मैं निर्णय नहीं कर पा रहा था कि अब मैं किस तरह आगे बढ़ूं और उन दोनों के साथ वो सब करूं जिसके लिए इस वक़्त वो दोनों मेरे कमरे में आईं थी? कुछ देर सोचने के बाद मैंने एक गहरी सांस ली और फिर ये सोच कर आगे बढ़ा कि अब जो होगा देखा जाएगा।

कोमल और तबस्सुम दोनों ने इस वक़्त टाइट फिटिंग के कपड़े पहन रखे थे जिसमें उनकी गुदाज टांगों पर टाइट जीन्स था और ऊपर ऐसी टी शर्ट जिसमें उन दोनों की बड़ी बड़ी छातियां साफ़ तौर पर अपना आकार दिखा रहीं थी। मैं अपनी बढ़ चली धड़कनों को काबू करते हुए बेड पर उनके पास आया और बैठ गया। वो दोनों मुझे ही अपलक देखे जा रहीं थी। उनके सुर्ख होठों पर मनमोहक मुस्कान थी जिसकी वजह से मुझे मेरा आत्मविश्वास डगमगाता सा प्रतीत हो रहा था।

माया के साथ मैं पूरी तरह खुल चुका था और उसके साथ अब मुझे शर्म या झिझक नहीं महसूस होती थी लेकिन कोमल और तबस्सुम मेरे लिए अभी इस क्षेत्र में न‌ई थीं। ख़ैर मैंने आँखें बंद कर के एक लम्बी सांस ली और फिर आँखें खोल कर तबस्सुम की तरफ बढ़ा। मैंने आगे बढ़ कर अपनी दोनों हथेलियों के बीच उसका खूबसूरत सा चेहरा लिया और फिर उसकी आँखों में देखने के बाद मैं उसके सुर्ख और रसीले होठों की तरफ झुकने लगा। कमरे में इस वक़्त ब्लेड की धार की मानिन्द सन्नाटा छाया हुआ था। कुछ ही पलों में मैंने अपने होठ तबस्सुम के रसीले होठों पर रख दिए। जैसे ही मेरे होठ उसके होठों से छुए तो मेरे जिस्म में झुरझुरी सी हुई। बस उसके बाद मैंने अपने ज़हन से सब कुछ निकाल दिया।

आंखें बंद किए मैं बड़े ही आहिस्ता से तबस्सुम के लजीज़ होठों को चूम रहा था। उसके होठों को चूमने में मुझे बड़ा ही मज़ा आ रहा था। मेरी रंगों में दौड़ता हुआ लहू एकदम से तेज़ होने लगा था और इसके साथ ही मैं तबस्सुम के होठों को मुँह में भर कर चूसना शुरू कर दिया। अभी मैं उसके होठों को चूसने ही लगा था कि तभी मेरी पीठ पर किसी का हाथ आया और ऐसे अंदाज़ से मेरी पीठ पर घूमने लगा कि मुझे गुदगुदी सी होने लगी। मैंने तबस्सुम के होठों से अपने होठ अलग कर के एक बार पलट कर देखा तो कोमल को अपने पीछे अपने आप से सटा हुआ पाया। वो मेरी पीठ को सहलाए जा रही थी। मुझे अपनी तरफ देखता देख उसके होठों पर मुस्कान उभर आई थी।

मैंने कोमल से नज़र हटा कर अपनी गर्दन सीधी की और फिर से तबस्सुम के होठों को मुँह में भर कर चूसने लगा। उसके होठों को चूसते हुए मैंने अपने दाहिने हाथ से उसकी दाहिनी छाती को पकड़ा और टी शर्ट के ऊपर से ही उसे अपनी मुट्ठी में भर कर मसलने लगा। मेरे ऐसा करते ही तबस्सुम का जिस्म मचलने लगा और उसने अपने हाथों से मेरे सिर को थाम कर होठ चूसने में मेरा साथ देने लगी। इधर मेरे पीछे से कोमल अभी भी मेरे जिस्म को सहलाए जा रही थी और मेरे शर्ट के बटनों को वो पीछे से ही हाथ बढ़ा कर खोलने लगी थी।

मैंने कुछ देर तबस्सुम के होठों को चूसा और जब हम दोनों की साँसें काबू से बाहर होने लगीं तो मैंने उसके होठों को आज़ाद कर दिया। आँखें खुलते ही हमारी नज़रें मिली तो मैंने देखा तबस्सुम की आँखों में सुर्खी छा गई थी। मैंने एक झटके में उसकी टी शर्ट को पकड़ कर ऊपर खींचा और उसके सिर से निकाल दिया। टी शर्ट के निकलते ही ब्रा में कैद उसकी बड़ी बड़ी छातियां उछल कर मेरे सामने आ ग‌ईं। मैंने झट से एक को अपने हाथ में लिया और मसलते हुए झुक कर तबस्सुम के गले के हर हिस्से पर चूमने लगा। तबस्सुम ने मेरे सिर को फिर से थाम लिया था। उधर कोमल ने मेरी शर्ट के सारे बटन खोल दिए थे और अब वो मेरे जिस्म से मेरी शर्ट निकाल रही थी। मैंने अपने दोनों हाथों को पीछे किया तो कोमल ने शर्ट मेरे जिस्म से निकाल कर बेड पर ही एक तरफ उछाल दिया। शर्ट के अंदर मैंने बनियान नहीं पहन रखी थी इस लिए अब मैं ऊपर से नंगा ही हो गया था।

उधर तबस्सुम को चूमते हुए मैंने उसे बेड पर सीधा लेटा दिया और उसके ऊपर आ कर मैं इस बार उसके सीने पर चूमने लगा। उसकी छातियों की घाटी को चूमते हुए मैं उसकी छाती को भी मसल रहा था। तभी मैंने महसूस किया कि पीछे से कोमल मेरी नंगी पीठ पर चूमने लगी थी। मुझसे रहा न गया तो मैं एकदम से सीधा हुआ और उसे पकड़ कर उसे भी बेड पर तबस्सुम के बगल से लेटा दिया और झुक कर उसके होठों पर अपने होठ रख दिए।

एक साथ दो दो लड़कियां बेड पर लेटी हुईं थी। एक ऊपर से सिर्फ ब्रा में थी तो दूसरी के जिस्म में अभी भी टी शर्ट थी। मैंने कुछ देर कोमल को रसीले होठों को चूसा और फिर उसकी टी शर्ट को भी उसके जिस्म से निकाल दिया था। वो दोनों ऊपर से ब्रा में थी। दोनों बेहद ही खूबसूरत थीं और दोनों के ही जिस्म मक्कन की तरह चिकने और मुलायम थे। मेरा जी कर रहा था कि मैं दोनों के जिस्मों को चाटते हुए खा ही जाऊं। कभी मैं कोमल को तो कभी तबस्सुम के साथ मज़े ले रहा था। मेरा लंड तो बुरी तरह अकड़ गया था, लेकिन मेरा ध्यान अभी सिर्फ उन दोनों को चूमने चाटने और मसलने में ही लगा हुआ था।

कोमल के नंगे सपाट पेट को चूमते हुए मैं तबस्सुम की छाती को मसल रहा था। मैंने बारी बारी से दोनों के पेट को चूमा चाटा और फिर उन दोनों के जीन्स को खोल कर उनकी टांगों से अलग कर दिया। मक्कन की तरह चिकनी टांगों को देख कर मेरा मन मचल उठा और मैं बारी बारी से झुक कर दोनों की टांगों पर अपनी जीभ चलाने लगा। टांगों के बीच पतली सी पेंटी थी जिसमें दोनों की फूली हुई चूत का उभार साफ नज़र आ रहा था। मैंने सीधा हो कर बारी बारी से दोनों को देखा और फिर झुक कर तबस्सुम की नाभि पर अपनी जीभ की नोक को घुसा दिया। मेरे ऐसा करते ही वो मचल उठी और मेरे सिर को अपने पेट पर दबाने लगी। मेरा एक हाथ कोमल के पेट को सहलाते हुए उसकी चूत पर पहुंच गया था। मैं एक हाथ से उसकी चूत सहला रहा था और दूसरे हाथ से तबस्सुम के पेट को पकड़े मैं उसकी नाभि में अपनी जीभ को कुरेद रहा था। कुछ देर उसकी नाभि पर अपनी जीभ कुरेदने के बाद मैं नीचे आया और उसकी गुदाज़ जाँघों को चूमते हुए उसकी चूत पर आ गया।

मैंने पेंटी के ऊपर से ही तबस्सुम की चूत को दो तीन बार चूमा और फिर एकदम से मैंने उसकी चूत को मुँह में भर कर हल्के से काटा तो तबस्सुम के जिस्म को झटका लगा और उसके मुख से ज़ोरदार सिसकी निकल गई। मैं फौरन ही सीधा बैठा और बारी बारी से दोनों की ब्रा पेंटी को उनके जिस्म से अलग कर दिया। अब वो दोनों मेरे सामने पूरी तरह नंगी लेटी हुईं थी। बल्ब की रौशनी में दोनों का गोरा जिस्म चमक रहा था। मुझे समझ न आया कि पहले किसको चखूं। मैंने नज़र ऊपर कर के दोनों की तरफ देखा तो दोनों को अपनी तरफ देखता हुआ ही पाया। नज़र मिलते ही दोनों मुस्कुराईं। मेरी नज़र उनके चेहरों से फिसल कर उनकी छातियों पर पड़ी तो मैंने झट से झुक कर कोमल की छाती के एक निप्पल को मुँह में भर लिया और ज़ोर ज़ोर से चुभलाने लगा।
 
जीवन में पहली बार मैं ऐसे काम कर रहा था और वो भी दो दो लड़कियों के साथ। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं किसके साथ आगे बढ़ूं और किसको पहले खुश करने की कोशिश करूं? मैं अपनी समझ में वही करता जा रहा था जो करने का मेरा मन करता जा रहा था। काफी देर तक मैं दोनों की छातियों को ऐसे ही मुँह में भर कर चूमता चूसता रहा। जब मेरा मन भर गया तो मैं नीचे आया और तबस्सुम की चिकनी चूत को अपनी जीभ से चाटने लगा। उसकी चूत बुरी तरह धधक रही थी और उसका कामरस रिसने लगा था जो मेरी जीभ पर प्रतिपल लगता जा रहा था। मैं पागलों की तरह तबस्सुम की चूत पर अपनी जीभ चला रहा था और उसका जिस्म बिना पानी के मछली की तरह मचल रहा था। इस बीच कोमल उठ गई थी और वो मेरा पैंट खोलने लगी थी। थोड़ी ही देर में उसने मेरा पैंट निकाल दिया। उसके बाद वो मेरे कच्छे के ऊपर से ही मेरे लंड को सहलाने लगी। उसके ऐसा करते ही मरे जिस्म में मज़े की तरंगें उठने लगीं थी और मैं दुगुने जोश में तबस्सुम की चूत को मुँह में भर कर चूसने लगा था।

तबस्सुम दोनों हाथों से मेरे सिर को पकड़े अपनी चूत पर दबाए जा रही थी और साथ ही आँखें बंद किए मज़े में सिसकारियां भर रही थी। उसकी चूत से रिस रहा कामरस मेरे मुँह में जा रहा था जिसका नशा प्रतिपल मुझ पर चढ़ता जा रहा था। कोमल की तरफ से मेरा ध्यान ही हट गया था, हालांकि वो अभी भी मेरे लंड को कच्छे के ऊपर से सहलाए जा रही थी।

मैंने एकदम से अपने हाथ की दो ऊँगली तबस्सुम की चूत में घुसा दी और ज़ोर ज़ोर से अंदर बाहर करते हुए उसकी चूत को जीभ से चाटने लगा। मेरे ऐसा करते ही तबस्सुम के जिस्म को झटके लगने लगे। वो अपनी कमर को उठा उठा कर बेड पर पटकने लगी थी। शायद वो मज़े के चरम पर थी और कुछ ही पलों में मुझे इसका सबूत भी मिल गया। तबस्सुम की कमर कमान की तरह हवा में तन गई और उसने बुरी तरह मेरे सिर को अपनी चूत पर दबा लिया। उसके बाद झटके खाते हुए वो झड़ने लगी। उसकी चूत से निकला गरम गरम कामरस मेरे चेहरे को भिगोता चला गया। कुछ देर में वो एकदम से शांत पड़ गई जिससे उसकी पकड़ ढीली हो गई।

मैने फ़ौरन ही उसकी चूत से अपना चेहरा उठाया और पलटते हुए कोमल को पकड़ लिया। मैंने कोमल को अपनी तरफ खींचा और तबस्सुम के कामरस से भीगा चेहरा लिए मैं उसके होठों को मुँह में भर कर चूसने लगा। एक हाथ से मैं उसकी छाती को बुरी तरह भींचने लगा था।

कोमल खुद भी मेरे होठों को चूसने लगी थी। एकाएक उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया और मेरे अकड़े हुए लंड को पकड़ कर ज़ोर से भीचा तो मेरे मुँह से सिसकी निकल गई। मैं फ़ौरन ही कोमल से अलग हुआ और तेज़ी से अपना कच्छा उतार कर तथा उसे धक्का दे कर लेटा दिया। उसके बाद मैंने पहले उसकी दोनों छातियों को मुँह में भर कर चूसा और फिर सरक कर नीचे उसकी चूत पर आ गया। उसकी चूत पानी छोड़ रही थी, मैंने जीभ निकाल कर उसकी फांकों पर चलाना शुरू कर दिया और एक हाथ की ऊँगली भी उसकी चूत में डाल दी। कुछ ही देर में कोमल का भी तबस्सुम की तरह बुरा हाल होने लगा। वो दोनों हाथों से मेरे सिर को पकड़े अपनी चूत में दबाए जा रही थी।

क़रीब पांच मिनट की चूत चुसाई के बाद ही कोमल का जिस्म अकड़ने लगा और वो आहें भरते हुए भरभरा कर झड़ने लगी। एक बार फिर से मेरा चेहरा चूत से निकले कामरस से सराबोर होता चला गया था। कोमल जब शांत पड़ गई तो मैंने तबस्सुम की तरफ रुख किया। तबस्सुम अपने एक हाथ से कोमल की छाती को सहला रही थी।

मैं आगे बढ़ा और तबस्सुम के होठों पर टूट पड़ा। कुछ देर उसके होठों को चूसने के बाद मैं उसकी छातियों को मसलते हुए चूसने लगा। मेरा लंड अब बुरी तरह अकड़ कर दर्द करने लगा था। इस लिए मैं उठा और तबस्सुम के चेहरे के पास सरक उसकी तरफ अपना लंड किया तो उसने मेरी तरफ देखा और मेरे लंड को पकड़ लिया।

कुछ देर वो मेरे लंड को सहलाती रही और फिर उठ कर बैठते हुए उसने मेरे लंड को मुँह में भर लिया। उसके गरम मुख में जैसे ही मेरा लंड गया तो मज़े से सिसकी लेते हुए मैंने अपनी आँखें बंद कर ली और साथ ही उसके सिर को दोनों हाथों से पकड़ कर अपने लंड की तरफ खींचने लगा।

तबस्सुम बड़े मज़े से मेरा लंड चूस रही थी और मैं मज़े के अथाह सागर में गोते लगाने लगा था। तबस्सुम के सिर को पकड़े मैं अपनी कमर को हिला हिला कर उसके मुख को चोद रहा था। तभी मेरी नज़र कोमल पर पड़ी। वो तबस्सुम के मुँह में मेरे लंड को अंदर बाहर होता देख रही थी। मैंने एक झटके से अपना लंड तबस्सुम के मुँह से निकाला और आगे बढ़ कर कोमल की तरफ कर दिया। तबस्सुम के थूक और लार से नहाए हुए मेरे लंड को देख कर कोमल ने पहले मेरी तरफ देखा और फिर अपने एक हाथ से मेरे लंड को पकड़ कर उसने गप्प से मेरा लंड अपने मुँह में भर लिया। ये देख कर तबस्सुम भी कोमल के पास सरक आई और एक हाथ से मेरे टट्टों को सहलाते हुए वो कोमल के सिर पर हाथ फेरने लगी।

मेरी आँखों के सामने अचानक ही गन्दी किताब में बने चित्र घूम गए और मैंने फ़ौरन ही उन चित्रों का अनुसरण किया। कोमल के मुँह से लंड निकाल कर मैंने तबस्सुम के मुँह की तरफ बढ़ाया तो वो अपना मुँह खोल कर जल्दी ही मेरे लंड को मुँह में भर कर चूसने लगी। मैं जैसे स्वर्ग में था। दो खूबसूरत लड़कियां बारी बारी से मेरा लंड चूस रहीं थी और मैं मज़े के सातवें आसमान में गोते लगा रहा था।

मैंने एक झटके में तबस्सुम के मुँह से अपना लंड निकाला और उसे धक्का दे कर बेड पर सीधा लेटा दिया। उसके बाद उसकी दोनों टांगों को पकड़ कर फैलाते हुए उसकी चूत में अपना लंड घुसेड़ दिया।

"आहहह एक ही झटके में अपने इस हलब्बी लंड को मेरी चूत में डाल दो डियर।" तबस्सुम ने सिसियाते हुए कहा____"मैं देखना चाहती हूं कि तुम्हारा ये मोटा लंड जब एक झटके में मेरी चूत में जाएगा तो मेरी चीख कितनी तेज़ निकलती है।"

तबस्सुम की बात सुन कर मैंने ऐसा ही किया। उसकी चूत के छेंद पर अपने टोपे को घुसा कर मैंने पूरी ताकत से धक्का मारा तो मेरा लंड उसकी चूत की दीवारों को चीरता हुआ अंदर की तरफ समाता चला गया। मेरे इस धक्के से तबस्सुम हलक फाड़़ कर चिल्लाई। इधर मेरे मुँह से भी दर्द में डूबी कराह निकल गई। तबस्सुम की चूत मेरे लंड के लिए संकरी थी और जब मैंने पूरी ताकत से धक्का मारा तो मेरे लंड की चमड़ी भी तेज़ी से पीछे होती चली गई थी जिससे मुझे दर्द हुआ था। कुछ पल रुकने के बाद मैंने धक्के लगाने शुरू कर दिए। उधर कोमल उठ कर तबस्सुम के मुँह पर बैठ गई थी जिससे उसकी चूत उसके मुँह पर छूने लगी थी। तबस्सुम ने अपने मुँह पर कोमल की चूत को महसूस किया तो उसने फ़ौरन ही जीभ निकाल कर उसे चाटना शुरू कर दिया।
 
मैं कोमल को तबस्सुम के मुँह में अपनी चूत टिकाए धीरे धीरे हिलते देख कर पहले तो चकित हुआ फिर जब मेरी नज़र कोमल की नज़र से मिली तो वो मुझे देखते हुए पहले मुस्कुराई फिर अपनी तरफ आने का इशारा किया तो मैं उसकी तरफ खुद को एडजस्ट करते हुए झुका। कुछ ही पलों में मेरे होठ कोमल के होठों से जा मिले। हम तीनों की पोजीशन अब कमाल की बन गई थी। तबस्सुम बेड पर सीधा लेटी हुई थी जिसकी दोनों टाँगें फैलाए मैं उसकी चूत में अपना लंड डाले धक्के लगा रहा था और कोमल अपनी चूत को तबस्सुम के मुँह पर रखे हल्के हल्के हिल रही थी जिससे नीचे से तबस्सुम उसकी चूत पर अपनी ज़ुबान चला रही थी और इधर मैं और कोमल एक दूसरे की तरफ झुके एक दूसरे के होठों को चूम रहे थे। मैं पलक झपकते ही मज़े की तरंग में पहुंच गया था और साथ ही ये सब देख कर बेहद रोमांचित भी हो उठा था।

मैंने कोमल के होठों से अपने होठ छुड़ाए और तेज़ तेज़ अपनी कमर को चलाते हुए तबस्सुम को चोदने लगा। मेरे हर धक्के पर वो आगे की तरफ उछल जाती थी जिससे उसकी चूचियां उछल पड़तीं थी और साथ ही उसके मुख से कोमल की चूत हट जाती थी। कोमल कुछ पलों तक उसके मुँह में अपनी चूत को घिसती रही उसके बाद वो उसके ऊपर से उतर कर उसकी एक चूची के निप्पल को चुभलाने लगी। इस पोजीशन में कोमल की गांड जो कि मेरी तरफ घूमी हुई थी वो उठ गई थी। मेरी नज़र उसकी गांड के गुलाबी छेंद पर पड़ी और फिर उसके नीचे पनियाई हुई चूत पर। ये देख कर मैंने ज़ोर से एक थप्पड़ उसकी गांड पर मारा तो वो एकदम से उछल पड़ी और साथ ही पीछे मुड़ कर मेरी तरफ देखा।

मैंने उसे उसी पोजीशन में तबस्सुम के ऊपर आने को कहा तो वो वैसे ही अपने घुटने को इस तरफ कर के तबस्सुम के ऊपर आ गई। एक तरह से वो तबस्सुम के ऊपर घोड़ी बनी हुई थी और उसकी उठी हुई गांड मेरी आँखों के सामने थी। मैंने तबस्सुम की टांगों को छोड़ा और कोमल के गोरे गोरे लेकिन भारी चूतड़ों को अपनी मुट्ठियों में भीचते हुए उसकी गांड के छेंद को उभारने लगा। कोमल की गांड का गुलाबी छेंद और उसके थोड़ा सा ही नीचे लिसलिसी चूत को देख कर मेरा मन जैसे मचल उठा तो मैं जल्दी से झुका और उसकी भारी गांड के मांस को मुँह में भर कर ज़ोर से काटा जिससे कोमल की दर्द भरी कराह निकल गई। मैंने इतने पर ही बस नहीं किया बल्कि दो तीन बार और काटा और फिर अपना मुँह पीछे से उसकी चूत पर लगा कर अपनी जीभ से उसकी रस बहाती चूत को चाटने लगा। खटमिट्ठा स्वाद मेरी जीभ पर पड़ा तो मैं और ज़ोर ज़ोर से चाटने लगा। इस क्रिया की वजह से मेरे धक्के बहुत ही धीमे हो गए थे, इस लिए नीचे से तबस्सुम खुद ही अपनी गांड उठा उठा कर मेरे लंड को अपनी चूत पर लेने लगी थी।

मेरी आँखों के सामने गन्दी किताब का एक चित्र फिर से घूम गया तो मैंने झट से अपना लंड तबस्सुम की चूत से निकाला और थोड़ा ऊपर हो कर पीछे से कोमल की चूत में एक झटके से डाल दिया। कोमल को मेरे द्वारा ऐसा किए जाने की उम्मीद नहीं थी इस लिए जैसे ही मैंने ज़ोर का धक्का मारा तो वो एकदम से तबस्सुम के ऊपर पसर गई थी और उसके मुख से आह निकल गई थी। मैं कोमल की कमर को पकड़े तेज़ तेज़ धक्के लगाने लगा था। दो दो खूबसूरत लड़कियों को मैं एक दूसरे के ऊपर लेटाए चोद रहा था। इस वक़्त मैं बेहद खुश था और इसी ख़ुशी के जोश में मैं ताबड़तोड़ धक्के लगाए जा रहा था। उधर नीचे पड़ी तबस्सुम कोमल के होठों को मुँह में भरे चूस रही थी और साथ ही उसकी चूचियों को भी मसले जा रही थी। पूरे कमरे में सेक्स का घमासान मचा हुआ था।

मैं काफी देर से उसी पोजीशन में धक्के लगा रहा था इस लिए अब मैं बुरी तरह हांफने लगा था और साथ ही मेरी कमर भी दुखने लगी थी। इस लिए मैंने कोमल की चूत अपना लंड निकाल लिया। मेरी आँखों के सामने गन्दी किताब का एक और चित्र घूम गया था और अब मैं उसी चित्र की तरह पोजीशन लेना चाह रहा था। मैंने जब लंड निकाल लिया तो कोमल ने गर्दन घुमा कर मेरी तरफ देखा तो मैंने उसे बताया कि मुझे पोजीशन चेंज करनी है।

मेरी बात सुन कर दोनों बेड से उठ ग‌ईं। उनके उठते ही मैं सीधा लेट गया। मेरा तना हुआ लंड कोमल और तबस्सुम के कामरस से चमक रहा था और बुरी तरह हवा में झटके मार रहा था। दोनों की नज़र उस पर पड़ी तो वो दोनों भूखी शेरनी की तरह उस पर झपटीं और मुँह में ले कर उसे चूसने लगीं। बारी बारी से दोनों ने उसे मुँह में भर कर चूसा, उसके बाद तबस्सुम उठी और मेरे ऊपर आ कर मेरे लंड को अपनी चूत में डाल लिया। तबस्सुम की गरम गरम चूत में जैसे ही मेरा लंड गया तो मज़े से मेरी सिसकी निकल गई। मैंने तबस्सुम की एक चूची को पकड़ अपनी तरफ खींचा और उसे मुँह में भर कर चूसने लगा। कुछ देर उसकी चूची को चूसने के बाद मैंने उसे छोड़ दिया। उधर जैसे ही मैंने उसकी चूची को छोड़ा तो कोमल मेरे मुँह पर अपनी चूत रख कर बैठ गई। मैं कोमल की चिपचिपी चूत पर अपनी ज़ुबान को लपलपाने लगा और उधर तबस्सुम मेरे लंड पर ज़ोर ज़ोर से अपनी गांड को पटकने लगी थी। एक बार फिर से चुदाई का माहौल गरम हो उठा था। मैं कोमल की चूत को चाटता भी जा रहा था और उस पर ऊँगली भी करता जा रहा था जिससे वो मज़े में सिसकारियां भर रही थी।

तबस्सुम काफी देर तक मेरे लंड पर अपनी गांड को पटकती रही। उसके बाद जब वो थक गई तो उसने अपनी गांड को पटकना बंद कर दिया। मैंने नीचे से अपनी गांड उठा उठा कर धक्के लगाने की कोशिश की लेकिन मुझसे बराबर धक्का नहीं लगाया गया इस लिए मैंने उन्हें अपने ऊपर से हटने को कहा तो वो दोनों मेरे ऊपर से हट ग‌ईं। मैंने तबस्सुम को फिर से सीधा लेटाया और उसकी चूत में अपना लंड डाल कर ज़ोर ज़ोर से उसे चोदने लगा। तबस्सुम बुरी तरह सिसिया रही थी और अपने हाथ से ही अपनी चूचियों को मसले जा रही थी। कुछ ही देर में उसकी चूत की पकड़ मेरे लंड पर कसती हुई महसूस हुई और फिर वो एकदम से अकड़ने लगी। तबस्सुम को झटके लगने लगे थे और वो बुरी तरह चीखते हुए झड़ने लगी थी। वो झड़ रही थी और मैं धक्के लगाए जा रहा था। जब वो झड़ कर शांत पड़ गई तो कोमल मुझे इशारा करते हुए फ़ौरन ही लेट गई।

कोमल अपनी टाँगें फैला कर लेटी तो मैंने उसकी चूत में अपना लंड डाल दिया और ज़ोर ज़ोर से उसे चोदने लगा। असल में अब मुझे इतना मज़ा आ रहा था कि मैं रुकना नहीं चाहता था। मैंने दोनों हाथ बढ़ा कर कोमल की बड़ी बड़ी चूचियों को पकड़ा और पूरी ताकत से धक्के लगाने लगा। कुछ ही देर में कोमल की आहें तेज़ हो ग‌ईं। इधर मेरे जिस्म में भी अब हलचल होने लगी थी। मेरे अंडकोषों में बड़ी तेज़ी से झुरझुरी होने लगी थी और मैं मज़े के सातवें आसमान की तरफ बढ़ता चला जा रहा था। जैसे जैसे मैं अपनी चरम सीमा की तरफ पहुंच रहा था वैसे वैसे मेरे धक्कों की स्पीड भी तेज़ होती जा रही थी। उधर कोमल मुख से अजीब अजीब सी आवाज़ें निकालते हुए जाने क्या क्या बड़बड़ाने लगी थी। करीब पांच मिनट बाद ही कोमल का जिस्म ऐंठा और वो झड़ने लगी। उसकी चूत से निकला गरम गरम पानी जैसे ही मेरे लंड को भिगोया तो मैं उसका ताप सहन न कर सका और मैं भी आहें भरते हुए झड़ने लगा।

झड़ने के बाद मैं बेहोश सा हो कर कोमल के ऊपर ही ढेर हो गया। कमरे में उखड़ी हुई साँसों का तूफ़ान गर्म था। मैं उन दोनों खूबसूरत हसीनाओ के साथ एकदम पस्त सा पड़ा था। जाने कितनी ही देर तक हम तीनो यूं ही बेहोश से पड़े रहे उसके बाद सबसे पहले तबस्सुम उठी। उसने बड़े प्यार से मेरे सिर पर हाथ फेरा और बाथरूम की तरफ चली गई। कुछ देर बाद हम दोनों भी उठे। सेक्स की गर्मी शांत हुई और जब मैंने कोमल की तरफ देखा तो उससे नज़र मिलते ही मेरे होठों पर मुस्कान उभर आई और साथ ही हल्की शर्म भी। कोमल मेरे चेहरे पर आई हल्की शर्म को देख कर मुस्कुरा पड़ी। ख़ैर तबस्सुम के आने के बाद हम दोनों भी बारी बारी से बाथरूम गए और खुद को साफ़ किया।
 
झड़ने के बाद मैं बेहोश सा हो कर कोमल के ऊपर ही ढेर हो गया। कमरे में उखड़ी हुई साँसों का तूफ़ान गर्म था। मैं उन दोनों खूबसूरत हसीनाओ के साथ एकदम पस्त सा पड़ा था। जाने कितनी ही देर तक हम तीनो यूं ही बेहोश से पड़े रहे उसके बाद सबसे पहले तबस्सुम उठी। उसने बड़े प्यार से मेरे सिर पर हाथ फेरा और बाथरूम की तरफ चली गई। कुछ देर बाद हम दोनों भी उठे। सेक्स की गर्मी शांत हुई और जब मैंने कोमल की तरफ देखा तो उससे नज़र मिलते ही मेरे होठों पर मुस्कान उभर आई और साथ ही हल्की शर्म भी। कोमल मेरे चेहरे पर आई हल्की शर्म को देख कर मुस्कुरा पड़ी। ख़ैर तबस्सुम के आने के बाद हम दोनों भी बारी बारी से बाथरूम गए और खुद को साफ़ किया।

"तुमने तो कमाल कर दिया डियर।" तबस्सुम ने मुस्कुराते हुए कहा____"मुझे ज़रा भी उम्मीद नहीं थी कि पहली बार में तुम्हारा परफॉरमेंस इतना अच्छा होगा। तुम्हें सच में खुदा ने ख़ास बना कर भेजा है।"

"सही कहा तुमने।" कोमल ने कहा____"ऐसा पहला मर्द देखा है मैंने जो पहली बार में दो दो लड़कियों को झाड़ने के बाद खुद झड़ा हो। जब कि ऐसा होना लगभग असंभव सा होता है। ख़ैर मुझे भी लगता है कि तुम्हें ऊपर वाले ने कुछ ज़्यादा ही ख़ास बना कर भेजा है।"

"तुम दोनों की बातों से तो लगता है।" मैंने दोनों को बारी बारी से देखते हुए कहा_____"कि मैं तुम दोनों की परीक्षा में पास हो गया हूं।"

"बिल्कुल पास हो गए हो डियर।" कोमल ने कहा____"बल्कि अगर ये कहूं तो ज़्यादा बेहतर होगा कि तुमने पहली बार में इतना अच्छा परफॉरमेंस दे कर हम दोनों को हैरान कर दिया है।"

कोमल और तबस्सुम की ये बातें सुन कर मैं अंदर ही अंदर बेहद खुश हो गया था और अपने आप पर प्राउड सा फील करने लगा था जिसकी वजह से मैं एकदम से तन कर बैठ गया था। दोनों की बातों ने मेरे मनोबल को बढ़ा दिया था जिसकी वजह से मेरे अंदर एक अलग ही तरह का एहसास होने लगा था। मुझे ऐसा लगने लगा था जैसे अब मैं मुकम्मल मर्द बन गया हूं और अब मैं किसी भी औरत को खुश कर सकता हूं।

कुछ देर हम तीनों इसी बारे में बातें करते रहे उसके बाद वो दोनों मुझे आराम करने का बोल कर कमरे से चली ग‌ईं। दुबारा करने के लिए न उन्होंने कहा और ना ही मेरा मन था। क्योंकि दोनों को पेलने के बाद मैं बुरी तरह थक गया था। ख़ैर दोपहर को लंच करने के बाद मैं अपने एक अलग कमरे में सोने चला गया।

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