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सी. एम. एस {चूत मार सर्विस }

अब तक...

कुछ देर हम तीनों इसी बारे में बातें करते रहे उसके बाद वो दोनों मुझे आराम करने का बोल कर कमरे से चली ग‌ईं। दुबारा करने के लिए न उन्होंने कहा और ना ही मेरा मन था। क्योंकि दोनों को पेलने के बाद मैं बुरी तरह थक गया था। ख़ैर दोपहर को लंच करने के बाद मैं अपने एक अलग कमरे में सोने चला गया।

अब आगे...

शाम को वागले अपने घर पहुंचा। उसे थोड़ा गर्मी लग रही थी इस लिए उसने नहाने का सोचा। बाथरूम में नहाते समय उसे याद आया कि कल रात उसने अपनी बीवी से क्या कहा था। इस बात के याद आते ही उसने अपने लंड के बाल साफ़ किए और फिर बच्चों से छुपा कर उसने सावित्री से पूछा कि उसने अपने बाल साफ़ किए हैं कि नहीं? उसकी ये बात सुन कर सावित्री पहले तो हैरान हुई थी फिर उसने नज़रें चुराते हुए कहा था कि उसे इस बारे में याद ही नहीं आया। वागले ने उसे सारे काम छोड़ कर पहले अपनी सफाई करने पर ज़ोर दिया। मजबूरन सावित्री को बाथरूम में अपनी सफाई करने जाना ही पड़ा।

रात में डिनर करने के बाद दोनों पति पत्नी अपने कमरे में लेते हुए थे। वागले बहुत ही ज़्यादा उत्सुक था कि वो अपनी खूबसूरत बीवी के साथ जल्द से जल्द ठीक उसी तरह सम्भोग करेगा जैसे विक्रम सिंह ने अपनी डायरी में लिखा था।

वागले ने जब सावित्री को दूसरी तरफ करवट लिए लेटा हुआ देखा तो वो सरक कर सावित्री के पास पहुंचा और उसे पीछे से पकड़ते हुए कहा कि क्या इरादा है भाग्यवान? सावित्री उसकी बात सुन कर चौंक गई थी। असल में उसके ज़हन में भी यही सब चल रहा था कि आज उसका पति उसके साथ क्या क्या करने वाला है।

वागले जनता था कि सावित्री खुद पहल करने वाली नहीं थी इस लिए उसने खुद ही पहल कर दी थी। उसने सावित्री को अपनी तरफ घुमाया और उसके होठों को मुँह में भर कर चूसने लगा था। एक हाथ से वो उसकी बड़ी बड़ी छातियों को भी मसलने लगा था। सावित्री उसके ऐसा करने से मचलने लगी थी। कुछ देर बाद वागले ने सावित्री के जिस्म से नाइटी निकाल दिया और ब्रा को भी। उसके बाद वो उसकी छातियों को बारी बारी से चूमने चाटने लगा था।

सावित्री के जिस्म में हलचल तो हो रही थी लेकिन वो खुद कुछ नहीं कर रही थी। वागले ने जब ये देखा तो उसने उससे कहा कि उसे भी उसका साथ देना चाहिए और इसमें मज़ा लेना चाहिए। वागले के कहने पर सावित्री ने उसका साथ देना शुरू कर दिया था। वागले पूरी तरह खुद को विक्रम सिंह की जगह पर रखे हुए था और सब कुछ वैसा ही करता जा रहा था जैसा डायरी में विक्रम सिंह ने लिखा था।

सावित्री की पेंटी उतार कर जब वागले ने उसकी चिकनी चूत को देखा तो देखता ही रह गया था। सावित्री की चूत आज बेहद साफ़ और चिकनी थी। अपनी चूत को इस तरह गौर से देखता देख सावित्री बुरी तरह शर्माने लगी थी। इधर वागले झुक कर उसकी चूत को चूमने लगा था। अपनी चूत को इस तरह चूमते देख सावित्री बुरी तरह मचलने लगी थी और साथ ही उसके जिस्म में मज़े की तरंगें उठने लगीं थी। आज से पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था कि वागले ने उसकी चूत को इस तरह चूमा रहा हो। औरत का ये अंग बेहद ही संवेदनशील होता है। जब वागले लगातार उसकी चूत को चूमता चाटता रहा तो सावित्री का कुछ ही देर में बुरा हाल होने लगा। उसके मुख से मज़े में डूबी सिसकारियां उभरने लगीं थी जिसे वो बड़ी मुश्किल से दबाने की कोशिश कर रही थी।

वागले जो अब खुद को विक्रम सिंह ही समझ बैठा था वो पूरे जोश और पागलपन में अपनी बीवी की चूत को चाटे जा रहा था। हैरानी की बात थी कि आज से पहले वागले ने कभी ऐसा करने के बारे में सोचा तक नहीं था और आज वो किसी कुत्ते की तरह अपनी बीवी की चूत को चाटने में लगा हुआ था। यकीनन वो होश में नहीं था वरना अगर ज़रा भी उसे एहसास होता कि वो इस वक़्त क्या कर रहा है तो उसे उल्टियां आने लगतीं। ख़ैर जो भी हो वागले आज एक न‌ए ही रूप में था और उसकी बीवी उसकी इस क्रिया से हैरान परेशान तो थी ही लेकिन जब उसके जिस्म में मज़े की तरंगें उठने लगीं तो उसे भी वागले के ऐसा करने से अब कोई परेशानी नहीं हो रही थी बल्कि वो तो अब यही चाहती थी कि वागले इसी तरह उसकी चूत को चाटता रहे।

"आह्ह्ह्ह ये क्या हो रहा है मुझे?" मज़े में डूबी सावित्री सिसकारियां भरते हुए जैसे बोल पड़ी थी____"आज से पहले मेरे जिस्म में ऐसी आनंद की तरंगें कभी नहीं उठीं थी। आह्ह्ह्ह रूप के पापा ये क्या कर रहे हैं आप?"

सावित्री क्या बोल रही थी ये तो जैसे वागले को अब सुनाई ही नहीं दे रहा था वो तो बस पूरे जोश में उसकी चूत को चाटे जा रहा था। उसका पूरा मुँह सावित्री की चूत से निकले कामरस से लिसलिसा हो गया था। उधर सावित्री कभी बेड पर बिछी चादर को अपनी मुट्ठियों में खींचती तो कभी खुद ही अपने हाथों से अपनी बड़ी बड़ी छातियों को मुट्ठी में भर कर मसलने लगती।

जब सावित्री से बर्दास्त नहीं हुआ तो उसने हाथ बढ़ा कर वागले के बालों को पकड़ कर ज़ोर से खींचा तो वागले दर्द से आह भरते हुए उसकी चूत से हटा और उसकी तरफ इस तरह देखा जैसे भारी नशे में हो।

"क्या हुआ मेरी जान?" वागले जैसे नशे में ही बोला____"मज़ा नहीं आ रहा क्या तुम्हें?"

"आप मज़े की बात करते हैं और यहाँ मेरा बुरा हाल हुआ जा रहा है।" सावित्री अपनी उखड़ी हुई साँसों को किसी तरह काबू करते हुए बोली____"आख़िर क्या हो गया है आपको? आज से पहले तो ऐसा कभी नहीं किया आपने। आप उस जगह को कैसे इस तरह चाट सकते हैं जो जगह इतनी गन्दी होती है?"

"किसने कहा कि वो जगह गन्दी होती है मेरी जान?" वागले ने हाथ नचाते हुए कहा____"अरे! वो जगह तो स्वर्ग का द्वार होती है रानी। पहले मुझे भी इसका एहसास नहीं था लेकिन अब एहसास हो चुका है मुझे। अब मैं समझ गया हूं कि स्वर्ग का असली मज़ा कैसे मिलता है। तुम भी मेरे साथ स्वर्ग के इस मज़े में डूब जाओ डियर।"

"मैं तो ये सोच सोच के ही पागल हुई जा रही हूं कि आप ये सब कहां से सीख के आये हैं?" सावित्री ने कहा____"आज से पहले तो कभी आपने इस तरह से कुछ नहीं किया था।"

"सब कुछ बताऊंगा मेरी जान।" वागले ने उसकी एक चूची को मसलते हुए कहा____"अभी तो फिलहाल तुम इस सबका मज़ा लो। मैं जो करूं वो तुम करने देना और फिर मैं जो कहूं वो तुम करना। फिर देखना कैसे तुम्हें इस सब में मज़ा आएगा।"

वागले की बातें सुन कर सावित्री कुछ न बोली, बल्कि हैरत से उसे देखती रही। उधर वागले इतना कहने के बाद फिर से सावित्री पर टूट पड़ा था। वो हाथों से उसकी बड़ी बड़ी छातियों को मसलते हुए चूसने लगा था और सावित्री एक बार फिर से अपने जिस्म में उठने लगी मज़े की तरंगों में डूबने लगी थी। वागले उसकी चूचियों को चूसते हुए नीचे की तरफ सरका और पेट को चूमते हुए फिर से उसकी चूत पर आ गया। उसने उसकी चूत को फिर से जीभ से चाटना शुरू कर दिया। सावित्री के जिस्म में बड़ी तेज़ी से सनसनी हुई और वो बिना पानी के मछली की तरह मचलने लगी।

वागले ने एक झटके से अपना चेहरा सावित्री की चूत से हटाया और तेज़ी से अपने कपड़े उतारने लगा। जल्दी ही वो पूरी तरह नंगा हो गया। उधर सावित्री अचानक ही रुक गई मज़े की तरंगों की वजह से होश में आ गई थी और वो झटके से आँखें खोल कर अपने पति वागले को देखने लगी थी। वागले को पूरी तरह नंगा होते देख सावित्री की आँखें फैल ग‌ईं। लाइट के तेज़ प्रकाश में उसकी नज़रें वागले के खड़े हुए लंड पर जैसे जम सी गईं थी। वैसे तो उसने न जाने कितनी ही बार वागले के लंड को देखा था लेकिन आज की बात ही अलग थी। आज उसका पति एक अलग ही अवतार में नज़र आ रहा था। उसे लग ही नहीं रहा था कि वो दो दो जवान बच्चों का एक ऐसा पिता है जिसने आज से पहले कभी भी इस तरह सेक्स के प्रति इतनी उग्रता और निर्लज्जता नहीं दिखाई थी।

"अब देखती ही रहोगी या इसे प्यार भी करोगी मेरी जान?" वागले ने सावित्री को देखते हुए मुस्कुरा कर कहा तो सावित्री उसकी ये बात सुन कर हड़बड़ा गई और एकदम से अपनी नज़रें वागले के लंड से हटा कर वागले की तरफ देखने लगी।

"उठो मेरी जान।" वागले बेड पर सीधा लेटते हुए बोला____"और जैसे मैंने तुम्हारी चूत को चाट चाट कर प्यार किया है वैसे ही अब तुम मेरे लंड को अपने मुंह में भर कर इसे प्यार करो।"

"क् क्...क्या???" वागले की बात सुन कर सावित्री को जैसे ज़बरदस्त झटका लगा। उसने हैरतज़दा आँखों से वागले की तरफ देखते हुए आगे कहा____"ये क्या कह रहे हैं आप??"

"इतना चकित न हो डियर।" वागले ने सावित्री का हाथ पकड़ कर उसे उठाते हुए कहा____"असली मज़े की तरंग में डूबना है तो वही करो जो मैं कह रहा हूं। चलो उठो अब, देर मत करो वरना सारा मज़ा किरकिरा हो जाएगा।"

वागले के द्वारा हाथ पकड़ कर उठाए जाने पर सावित्री उठ तो गई लेकिन वो अभी भी उसकी तरफ फटी फटी आँखों से देखे जा रही थी। जैसे यकीन न कर पा रही हो कि उसके पति ने अभी अभी उससे जो करने के लिए कहा है वो सच है या बेवजह ही उसके कान बज उठे थे।

"ऐसे क्यों देख रही हो यार?" सावित्री को भौचक्की सी हालत में अपनी तरफ देखते देख वागले ने इस बार थोड़ा खीझते हुए कहा_____"जो कह रहा हूं वो करो जल्दी।"

"प...पर ये सब।" सावित्री के जैसे होश उड़े हुए थे, हकलाते हुए बोली____"ये मैं नहीं कर सकती। आप सोच भी कैसे सकते हैं कि मैं इतना गन्दा काम करुँगी?"

"तुमने मुझसे वादा किया था सावित्री कि तुम वही करोगी जो करने को मैं कहूंगा।" वागले ने शख़्त भाव से कहा___"और अब तुम अपना किया हुआ वादा तोड़ रही हो। अगर वादा ही तोड़ना था तो ऐसा बोला ही क्यों था तुमने?"

"म..मुझे क्या पता था कि आप मुझसे ये करने को कहेंगे।" सावित्री ने एक नज़र वागले के लंड पर डालते हुए कहा____"मैं तो यही समझती थी कि आप मुझे सेक्स करने के लिए कहेंगे और मैं वो ख़ुशी ख़ुशी आपके साथ कर लूंगी। भला मैं ये कैसे सोच सकती थी कि आप मुझसे ऐसा गन्दा काम करने को कहेंगे? आख़िर आपको हो क्या गया है? मैं तो यही सोच कर शर्म और हैरत में डूबी जा रही हूं कि आपने मेरे वहां पर मुँह कैसे लगाया। भला कोई ऐसी गन्दी जगह पर मुँह लगता है क्या?"

"मैं भी अभी तक इस बारे में ऐसा नहीं सोच सकता था।" वागले ने कहा____"लेकिन अब मैं जान चुका हूं कि दुनियां में ये सब भी होता है। आज कल सेक्स करने की शुरुआत ही इसी तरीके से होती है। पहले मुझे भी भरोसा नहीं हो रहा था लेकिन जब मैंने खुद किया तो मुझे यकीन हो गया कि ये सब करने में एक अलग ही मज़ा आता है। तुम खुद भी तो मेरे द्वारा ऐसा किए जाने पर कितना आनंद में डूब गई थी। याद करो जब मैं तुम्हारी चूत को मज़े से चाट रहा था तब तुम किस क़दर मज़े में डूब गई थी और मज़े में सिसकियां ले रही थी। यहाँ तक कि उसी मज़े में डूब कर तुम अपने हाथों से मेरे सिर को अपनी चूत पर झोंकती जा रही थी और ये भी कह रही थी कि तुम्हें ऐसा मज़ा इसके पहले कभी नहीं मिला।"

वागले की बातें सुन कर सावित्री का चेहरा ये सोच कर शर्म से झुकता चला गया कि उसका पति सही कह रहा है। उस वक़्त सच में वागले के ऐसा करने पर उसे बेहद आनंद मिल रहा था और उसका दिल कर रहा था कि वागले ऐसे ही उसकी चूत को चाटता रहे। उसे शर्म से सर झुकाए और कुछ न बोलता देख वागले ने उसके चेहरे को पकड़ कर ऊपर किया।

"मैं जनता हूं कि शुरू शुरू में ये सब करना किसी के लिए भी आसान नहीं होता।" वागले ने जैसे उसे समझाते हुए कहा____"ख़ुद मेरे लिए भी आसान नहीं था। जैसे तुम ये कह रही हो कि उस गन्दी जगह पर कोई कैसे मुँह लगा सकता है वैसे ही मैं भी यही सोचता था लेकिन सच के प्रमाण को जानने समझने के लिए मैंने ज़बरदस्ती ऐसा किया और यकीन मानो ऐसा करने के बाद मुझे बेहद मज़ा ही आया। उसके बाद तो मैं वैसा ही करता चला गया। मेरे ज़हन में ज़रा भी ये ख़याल नहीं आया कि वो जगह कितनी गन्दी होती है।"

"पर मुझसे नहीं हो पाएगा।" सावित्री ने उसकी आँखों में देखते हुए बेबस भाव से कहा____"मुझे तो सोच के ही घिन आती है। ऐसा करुँगी तो न जाने क्या हो जाएगा।"

"कुछ नहीं होगा मेरी जान।" वागले ने झुक कर उसके होठों को प्यार से चूमा और फिर कहा____"हर चीज़ को करने का एक तरीका होता है। जब किसी चीज़ को तरीके से किया जाता है तो वो चीज़ करने में बेहद आसान हो जाती है और ये बात मैं यूं ही नहीं कह रहा हूं बल्कि जब खुद किया तब मुझे भी समझ आया है। तुम भी करो डियर। अपनी आँखें बंद कर के और अपनी साँसें रोक कर करो। पहले धीरे धीरे करो और जब लगे कि ऐसा करने में कोई परेशानी नहीं है तो उसे मज़े में डूब कर करना शुरू कर दो।"

वागले की बातें सुन कर सावित्री ख़ामोशी से अपने पति की तरफ देखती रही। उसके चेहरे पर कई तरह के भाव उभर रहे थे। वो समझ चुकी थी कि उसे वो करना ही पड़ेगा जो करने के लिए उसका पति कह रहा है। वो जानती थी कि अगर उसने ऐसा नहीं किया तो उसका पति फिर से उससे नाराज़ या गुस्सा हो जाएगा। ये सोच कर उसने अपनी आँखें बंद कर के गहरी सांस ली। वागले उसी को ध्यान से देख रहा था। जब सावित्री ने आँखें बंद कर के गहरी सांस ली तो वो समझ गया कि सावित्री वैसा करने के लिए खुद को तैयार कर रही है।

वागले जानता था कि इन सारी बातों के चलते दोनों के जिस्म में मज़े की जो तरंगे इसके पहले भर गईं थी वो अब गायब हो चुकी हैं। इस लिए उसने उन मज़े की तरंगों को वापस लाने के लिए फिर से सावित्री को पकड़ कर उसके होठों को चूमना चूसना शुरू कर दिया। उसकी सोच थी कि सावित्री जब मज़े में डूब जाएगी तो उसके लिए उसके लंड को मुँह में भर कर प्यार करना थोड़ा आसान सा हो जाएगा।

वागले सावित्री के होठों को चूसते हुए एक हाथ से उसकी बड़ी बड़ी छातियों को भी मसलता जा रहा था। कुछ देर छातियों को मसलने के बाद उसने अपना हाथ सावित्री की चिकनी चूत पर रखा और उसे सहलाने लगा। उसके ऐसा करते ही सावित्री के जिस्म में हलचल होने लगी जिसे उसने खुद भी महसूस किया। ये महसूस करते ही उसने अपनी एक ऊँगली उसकी चूत के अंदर डाल दी और उसे अंदर बाहर करने लगा। उसके ऐसा करते ही सावित्री का जिस्म बुरी तरह मचलने लगा। उसने जल्दी से अपना हाथ बढ़ा कर वागले के उस हाथ पर रख लिया। इधर वागले ज़ोर ज़ोर से अपनी ऊँगली को उसकी चूत में अंदर बाहर करने लगा था जिससे सावित्री ने उसके होठों से अपने होठों को आज़ाद किया और तेज़ तेज़ सिसकियां लेने लगी। आँखें बंद किए वो बुरी तरह मचलने लगी थी। इधर वागले सिर नीचे कर के उसकी चूची के एक निप्पल को मुँह में भर कर चूसना शुरू कर दिया। दो तरफ से हो रहे हमलों ने सावित्री की हालत ख़राब कर दी। वो बुरी तरह छटपटाते हुए वागले के सिर को अपनी छाती पर दबाती जा रही थी।

"आह्ह्ह्ह रूप के पापा।" सावित्री आहें भरते हुए बोल पड़ी____"ये क्या हो रहा है मुझे? मेरा जिस्म क्यों इतना ज़्यादा मचला जा रहा है? ऐसा लगता है जैसे आअह्ह्ह शीश्श्श् जैसे मेरे अंदर एक ऐसी गर्मी सी भरती जा रही है जो मुझे जला भी रही है और मुझे असीम सुख भी दे रही है।"

"मेरे साथ इस आग में जलती रहो मेरी जान।" वागले ने उसकी चूची के निप्पल को मुँह से निकालते हुए कहा____"और जो मज़ा मिल रहा है उसमें बस डूबती जाओ। अच्छा ये बताओ कि इस सबसे तुम्हें कितना मज़ा आ रहा है?"

"मत पूछिए रूप के पापा।" सावित्री ने उसके चेहरे को अपनी उसी छाती पर ज़ोर से दबाते हुए कहा जिसे वागले चूस रहा था, बोली____"मैं कुछ बता नहीं सकती। बस इतना ही महसूस कर रही हूं जैसे मैं मज़े में डूबती जा रही हूं। फिर दूसरे ही पल ऐसा लगने लगता है जैसे मैं यहाँ पर हूं ही नहीं बल्कि किसी और ही दुनियां की तरफ भागी जा रही हूं। आह्हहहह मेरी छाती को ज़ोर से चूसिए न।"
 
वागले समझ गया कि उसकी बीवी अब उसी स्टेज पर है जहां पर वो उसे पहुंचा देना चाहता था ताकि जब वो उसे अपना लंड मुँह में भरने को कहे तो वो इंकार न कर सके। ख़ैर उसके कहने पर वागले ने एक बार फिर से उसकी चूची के निप्पल को मुँह में भरा और ज़ोर ज़ोर से चूसने लगा। वो निप्पल को चूसते हुए खींच भी लेता था जिससे सावित्री ज़ोर से मचलते हुए सिसिया उठती थी। उधर उसकी चूत में वो अभी भी ऊँगली करता जा रहा था जिससे उसकी वो ऊँगली ही नहीं बल्कि उसकी हथेली भी सावित्री के चूत से निकले कामरस से भींग गई थी।

वागले के मन में जाने क्या आया कि उसने सावित्री की चूत से अपनी ऊँगली निकाली और तेज़ी से ऊपर ला कर सावित्री के मुँह में डाल दिया। सावित्री आँखें बंद किए मज़े में डूबी हुई थी और अपने होठ खोले सिसकियां ले रही थी। जैसे ही वागले ने उसके मुँह में चूत रस से भींगी ऊँगली डाली तो सावित्री अपने होठ उसकी ऊँगली में कस लिए और उसकी उंगली को चूसना शुरु कर दिया। मज़े और मदहोशी में जैसे उसे पता ही नहीं चला था कि उसके पति की ऊँगली में उसका ही चूत रस लगा हुआ था।

वागले ने अपनी ऊँगली को आधा निकाल कर फिर से उसके मुँह में अंदर तक डाला। ऐसा उसने दो तीन बार किया, सावित्री ने उसकी ऊँगली को अपने होठों की पकड़ से छोड़ा नहीं। ये देख कर वागले मुस्कुराया।

"मेरी ऊँगली का स्वाद कैसा लगा मेरी जान?" वागले ने उसके कान में सरगोशी करते हुए पूछा तो सावित्री ने उसकी ऊँगली को अपने मुँह से निकाल कर सिसियाते हुए कहा_____"बड़ा नमकीन सा स्वाद है रूप के पापा। मेरे मुँह में अपनी ऊँगली फिर से डालिए न।"

सावित्री की बात सुन कर वागले मन ही मन ये सोच कर हँसा कि सावित्री को अभी भी ये एहसास नहीं हुआ कि उसे उसकी ऊँगली में जो नमकीन सा स्वाद महसूस हुआ था वो असल में क्या था। ख़ैर वागले उसके कहने पर अपना वो हाथ तेज़ी से नीचे लाया और सावित्री की चूत में उस हाथ की बड़ी वाली ऊँगली झटके से घुसेड़ दी, जिससे सावित्री ने मचलते हुए लम्बी आह भरी। इधर वागले ने तेज़ी से उसकी चूत में अपनी ऊँगली को दो तीन बार अंदर बाहर किया और फिर उसी तेज़ी से निकाल कर उसके मुँह में डाल दिया।

सावित्री के मुँह में जैसे ही उसकी ऊँगली घुसी तो सावत्री फ़ौरन ही उसे लोलीपाप की तरह चूसने लगी। ये देख कर वागले के होठों पर गहरी मुस्कान उभर आई। इस वक़्त सावित्री पर उसे बेहद प्यार आ रहा था और यही वजह थी कि उसने अगले ही पल उसके मुँह से अपनी ऊँगली निकाली और उसके होठों को अपने मुँह में भर लिया।

सावित्री पूरी तरह मज़े के तरंग में डूब चुकी थी। बंद कमरे में उसकी आहें तथा उसकी सिसकारियां गूँज रहीं थी। वागले ने उसे बड़े ही आहिस्ता से बेड पर सीधा लेटाया और फिर जल्दी ही उसके चेहरे के पास अपना लंड ला कर उसके होठों पर छुआया। सावित्री मज़े में आँखें बंद किए हुए थी और जैसे ही उसे अपने होठों पर किसी चीज़ का एहसास हुआ तो उसे लगा उसका पति फिर से अपनी ऊँगली उसके मुँह में डालना चाहता है इस लिए उसने फ़ौरन ही अपना मुँह खोल दिया।

सावित्री ने जैसे ही अपना मुँह खोला तो वागले ने अपने खड़े लंड को उसके मुँह में बड़ी ही सावधानी से घुसेड़ दिया। सावित्री को पहले तो समझ न आया लेकिन जल्दी ही उसे एक अलग एहसास हुआ और उसने फ़ौरन ही अपनी आँखें खोल दी। नज़र अपने बेहद क़रीब हल्का झुके वागले पर पड़ी। कुछ पल उसे कुछ समझ न आया लेकिन जल्द ही उसे पता चल गया कि इस वक़्त उसके मुँह में उसके पति का लंड है। उसकी आँखें हैरत से फट पड़ीं और उसने जल्दी से अपने मुँह से उसके लंड को निकालना चाहा मगर वागले जैसे पहले से ही जानता था इस लिए उसने सावित्री के सिर को मजबूती से पकड़ लिया और अपनी कमर को थोड़ा और आगे सरकाया जिससे उसका लंड सावित्री के मुँह में थोड़ा और अंदर चला गया।

"घबराओ मत मेरी जान।" वागले ने सावित्री को देखते हुए कहा____"आँखें बंद कर लो और ये समझो कि तुम मेरी ऊँगली को ही चूस रही हो। एक बार कोशिश तो कर के देखो डियर, मुझे पूरा यकीन है कि तुम्हें इसको लोलीपाप की तरह चूसने में बेहद मज़ा आएगा।"

सावित्री के चेहरे पर अभी भी अजीब से भाव थे। वागले की बात सुन कर उसने बेबस भाव से ही सही लेकिन आँखें बंद कर ली। उसके मुँह में वागले का लंड टोपे सहित घुसा हुआ था। जब सावित्री ने अपनी आँखें बंद कर ली तो वागले अपनी कमर को हिलाने लगा। उसने सावित्री के सिर को छोड़ा नहीं था, क्योंकि वो जानता था कि उसके हाथ हटाते ही सावित्री उसके लंड को अपने मुँह से निकाल देगी। कुछ देर बाद वागले ने महसूस किया कि सावित्री ने विरोध करना बंद कर दिया है तो उसने अपने दोनों हाथ उसके सिर से हटा लिए और उसकी छातियों को मसलने लगा।

सावित्री का चेहरा ही बता रहा था कि अपने मुँह में अपने पति का लंड होने से उसे कितना ख़राब लग रहा था लेकिन जैसे उसने अब ये सोच लिया था कि अब जब उसके पति का लंड उसके मुँह में आ ही गया है तो उसे भी अब एक बार ये देख ही लेना चाहिए कि लंड चूसने से कैसा लगता है? अभी तक वो शर्म और गन्दा होने की वजह से ऐसा नहीं कर रही थी। उसने अपनी जीभ से अंदर ही अंदर वागले के लंड के टोपे को छुआ। उसे बड़ा ही अजीब लगा और साथ ही कुछ नमकीन सा स्वाद महसूस हुआ। शायद वागले का लंड मज़े की तरंग में अपना रस छोड़ रहा था।

वागले की कमर दुखने लगी तो उसने सावित्री के मुँह से अपना लंड निकाल लिया। लंड के निकलते ही सावित्री ने राहत की लम्बी सांस ली और फ़ौरन ही उठ कर बैठ गई।

"आख़िर आपने अपने मन का ही किया न।" सावित्री ने हांफते हुए कहा___"बहुत गंदे हैं आप।"

"क्यों तुम्हें अच्छा नहीं लगा?" वागले ने मुस्कुरा कर पूछा।

"क्या ऐसा करने से अच्छा लगना चाहिए था?" सावित्री ने कहा____"मुझे तो रह रह कर उल्टी आ रही थी लेकिन आप नाराज़ न हो जाएं ये सोच कर आपके उसे मुँह में लिए हुए थी।"

"अच्छा ये बताओ कि।" वागले ने कहा____"जब तुम मेरी ऊँगली चूस रही थी तब तुम्हें उसमें नमकीन जैसा स्वाद लग रहा था न?"

"हां।" सावित्री ने कहा____"मेरा मन कर रहा था कि मैं उस नमकीन स्वाद को ऐसे ही आपकी ऊँगली से चूसती रहूं।"

"वाह भाई वाह!" वागले ने ब्यंगात्मक भाव से कहा_____"मतलब अपनी चूत का रस नमकीन जैसा स्वाद दे रहा था और उसे बार बार चूसने का भी मन कर रहा था और मेरे लंड को चूसने में उल्टी आ रही थी। गज़ब भाग्यवान, क्या बात है।"

"ये...ये क्या कह रहे हैं आप?" सावित्री उसकी बात सुन कर बुरी तरह चौंकी थी।

"और नहीं तो क्या।" वागले ने मुस्कुराते हुए कहा_____"मेरी ऊँगली में तुम्हारी ही चूत का रस लगा हुआ था। उसी ऊँगली से मैं तुम्हारी चूत में ऊँगली कर रहा था, याद करो ज़रा।"

वागले की बात सुन कर सावित्री के चेहरे पर घनघोर आश्चर्य तांडव कर उठा। फिर जैसे उसे कुछ याद आया तो एकदम से उसके चेहरे पर शर्म की लाली उभर आई और उसने झट से अपना चेहरा अपने घुटनों के बीच छुपा लिया।

"आप बहुत ख़राब हैं।" फिर उसने उसी पोजीशन में कहा_____"छी, ये क्या करवा दिया मुझसे। हे भगवान! मैंने अपनी चू....।"

आंगे के शब्द बोलते बोलते अचानक ही सावित्री रुक गई और उसने और भी ज़ोरों से अपने चेहरे को घुटनों के बीच भींच लिया। वो शर्म से जैसे गड़ी ही जा रही थी और इधर वागले उसकी हालत देख कर धीरे से हंस पड़ा था।

"अरे! तो क्या हुआ मेरी जान।" फिर वागले ने मुस्कुराते हुए कहा____"अगर तुमने अपनी ही चूत के रस का स्वाद ले लिया तो इसमें इतना शर्माने की क्या ज़रूरत है? वैसे ये बात तो तुमने सच कही कि उसका स्वाद नमकीन जैसा था।"

"चुप कीजिए आप।" सावित्री ने घुटनों में अपना चेहरा छुपाए हुए ही कहा____"आपको तो ज़रा भी शर्म नहीं आती लेकिन मैं अब ये सोच कर शर्म से मरी जा रही हूं कि ये मैंने क्या कर दिया है। हे भगवान! इस उम्र में यही सब करवाना था मुझसे।"

"इसमें भगवान को दोष क्यों दे रही हो भाग्यवान?" वागले ने उसके चेहरे को ऊपर करने की कोशिश करते हुए कहा तो सावित्री ने नाराज़ लहजे में कहा_____"मुझे हाथ मत लगाइए। आपने ऐसा कर के बिल्कुल भी अच्छा नहीं किया है।"

"अच्छा छोड़ो।" वागले ने कहा____"चलो अब वो काम तो कर लें जिसे करने में तुम्हें कोई ऐतराज़ नहीं होगा।"

"मुझे अब कुछ नहीं करना है।" सावित्री ने घुटनों से सिर निकाल कर कहा____"आपको अगर नाराज़ हो जाना है तो हो जाइए।"

कहने के साथ ही सावित्री बेड से नीचे उतर गई और अपनी ब्रा पेंटी के साथ नाइटी भी उठा कर बाथरूम में चली गई। उसे इस तरह चले जाते देख वागले समझ गया कि उसका के.एल.पी.डी. हो गया है। उसने अब सावित्री को इसके लिए मानना ठीक नहीं समझा। वो जानता था कि अब सावित्री कुछ भी करने वाली नहीं थी। ये सोच कर उसने गहरी सांस ली और अपने कपड़े पहनने लगा।

रात दोनों के बीच छा गई ख़ामोशी में ही गुज़र गई। बाथरूम से आने के बाद सावित्री चुप चाप बेड पर लेट गई थी। वागले ने उससे बात करने की कोशिश की थी लेकिन सावित्री ने उसे बस एक ही बार शख़्त लहजे में कहा था कि अब चुप चाप सो जाइए वरना अच्छा नहीं होगा। उसके बाद वागले ने भी चुप चाप सो जाना ही बेहतर समझा था।

दूसरे दिन वागले जेल पहुंचा। अपने सभी कामों से फुर्सत होने के बाद उसने ब्रीफ़केस खोल कर विक्रम सिंह की डायरी निकाली और उसके मोटे कवर पर लिखे सी एम एस शब्दों को ध्यान से देखा और फिर छोटे अक्षरों में लिखे उसके फुल फॉर्म को। कुछ देर यूं ही देखते रहने के बाद उसने उस पेज को खोला जहां पर वो इसके पहले पढ़ रहा था।

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अब तक....

दूसरे दिन वागले जेल पहुंचा। अपने सभी कामों से फुर्सत होने के बाद उसने ब्रीफ़केस खोल कर विक्रम सिंह की डायरी निकाली और उसके मोटे कवर पर लिखे सी एम एस शब्दों को ध्यान से देखा और फिर छोटे अक्षरों में लिखे उसके फुल फॉर्म को। कुछ देर यूं ही देखते रहने के बाद उसने उस पेज को खोला जहां पर वो इसके पहले पढ़ रहा था।

अब आगे....

माया कोमल और तबस्सुम के साथ सेक्स की ट्रेनिंग लेते हुए पांच दिन कब गुज़र गए पता ही नहीं चला। इन पांच दिनों में उन तीनों हसीनाओं ने मुझे सेक्स के हर वो गुन सिखाए जिन्हें मैं सोच भी नहीं सकता था। अगर अपने दिल की कहूं तो वो ये था कि मैं उन तीनों हसीनाओं पर पूरी तरह फ़िदा हो चुका था। वो मेरे साथ ऐसा ब्यौहार करती थीं कि लगता ही नहीं था कि मैं उनके पास सेक्स की ट्रेनिंग लेने आया हूं। मेरा दिल करता था कि मैं चौबीसों घंटे उन ख़ूबसूरत बालाओं के साथ ही रहूं और जी भर कर उनसे वैसे ही प्यार करता रहूं। इन पांच दिनों में मैं अपनी बाहरी दुनियां को जैसे भूल ही गया था। ख़ैर मेरी ट्रेनिंग पूरी हो चुकी थी और इस ट्रेनिंग की वजह से अब मेरे अंदर किसी भी तरह की शर्म या झिझक नहीं रह गई थी। मैं खुद महसूस करने लगा था कि अब मैं पहले वाला वो विक्रम नहीं रह गया था जो लड़की के सामने आते ही उससे नज़रें चुराने लगता था बल्कि अब तो मुझे खुद ऐसा महसूस होता था जैसे मैं दुनियां की किसी भी लड़की या औरत से बेझिझक हो कर हर तरह की बातें कर सकता हूं।

01 जनवरी 1999

तीन ख़ूबसूरत हसीनाओं से सेक्स की ट्रेनिंग ले कर मैं नए साल को एक नए रूप में दुनियां के सामने आने वाला था। सुबह का नास्ता करने के बाद मैं माया कोमल और तबस्सुम से बातें ही कर रहा था कि तभी वहां पर वही सफेदपोश आदमी आया जो कुछ दिन पहले मुझे यहाँ ले कर आया था। उसे देखते ही हम सब उसके सामने खड़े हो ग‌ए। मैंने देखा कि माया कोमल और तबस्सुम तीनों ही उससे बड़े ही अदब से बातें कर रहीं थी। ज़ाहिर था कि वो आदमी उनके लिए एक बड़ी हैसियत रखता था। ख़ैर कुछ देर उसने उन तीनों से बातें की जिसमें उसने मेरी ट्रेनिंग के बारे में ही पूंछा, उसके बाद उसने मुझे अपने साथ चलने को कहा तो एकदम से मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे मुझे उसके साथ नहीं जाना चाहिए बल्कि माया कोमल और तबस्सुम के पास ही रहना चाहिए। पता नहीं पर शायद उन तीनों से मुझे लगाव सा हो गया था।

माया कोमल और तबस्सुम से विदा लेने का वक़्त आ गया था। मेरा मन एकदम से भारी हो गया था। मैंने उन तीनों की तरफ देखा तो उन्हें भी अपनी तरफ मुस्कुराते हुए देखता पाया। सफेदपोश के सामने उनके चेहरे पर मेरे प्रति कोई भाव नहीं थे, जबकि इसके पहले मैं महसूस करता था कि उनके मन में मेरे प्रति कहीं न कहीं प्यार या सम्मान वाली बात ज़रूर थी। ख़ैर उस सफेदपोश की मौजूदगी में मैंने उनसे ज़्यादा कुछ नहीं कहा, बल्कि भारी मन से उन्हें हाथ हिला कर ही अलविदा कहा और फिर उस सफेदपोश आदमी के साथ वहां से चल पड़ा।

उस जगह से जब मैं उस सफेदपोश के साथ थोड़ा बाहर की तरफ आया तो उसने मेरी आँखों में काली पट्टी बाँध दी। उसके बाद मैं उसके ही सहारे चलता हुआ आगे गया। कुछ देर बाद उसने मुझे कार में बैठाया और खुद भी मेरे बगल से बैठ गया। कार का दरवाज़ा बंद हुआ तो कार झटके से आगे बढ़ चली। क़रीब आधे घंटे बाद कार रुकी तो सफेदपोश आदमी ने मुझे कार से नीचे उतारा और फिर मुझे ले कर एक तरफ को चल दिया। मैंने महसूस किया कि यहाँ पर मेरे जिस्म में ठंडक का आभास हो रहा था। क़रीब पांच मिनट बाद उसने मुझे एक जगह रुक जाने को कहा और फिर मेरी आँखों से वो काली पट्टी निकाल दी। मेरी आँखों के सामने धुंधला धुंधला सा मंज़र नज़र आया। मैंने अपनी पलकें झपकते हुए इधर उधर नज़रें घुमाई तो कुछ ही पलों में मुझे समझ आया कि मैं एक बार फिर से उसी हाल पर आ गया था जिस हॉल में नीम अँधेरा था और हॉल के दूसरे छोर पर एक बड़ी सी सिंघासन जैसी कुर्सी पर वो काला नक़ाबपोश बैठा हुआ था जो शायद इन सबका बॉस था।

"वेलकम बैक ट्रिप्पल वन।" हॉल में उस रहस्यमयी आदमी की अजीब सी आवाज़ गूंजी____"हमें उम्मीद है कि इन पांच दिनों में तुम ट्रेनिंग के बाद अब उस चीज़ के लिए बेहतर हो गए होगे जिस चीज़ के लिए तुम्हें चुना गया है।"

"जी मुझे भी ऐसा ही लगता है सर।" मैंने उस आदमी को सर कह कर सम्बोधित किया____"उस ट्रेनिंग के बाद मैं अपने आप में एक अलग ही तरह का बदलाव महसूस कर रहा हूं।"

"वैरी गुड।" रहस्यमयी आदमी की आवाज़ गूंजी____"इसी तरह धीरे धीरे तुम्हें बाकी चीज़ों की ट्रेनिंग भी दे दी जाएगी। ख़ैर अब तुम हमारी इस संस्था के मेंबर बन चुके हो और इस संस्था के मेंबर के रूप में तुम्हारा नाम ट्रिप्पल वन है। यानी आज के बाद यहाँ पर लोग तुम्हें ट्रिप्पल वन के नाम से ही जानेंगे। हालांकि तुम्हारा चेहरा किसी की नज़र में नहीं आएगा और ना ही तुम कभी किसी को अपना चेहरा दिखाने का सोचोगे। संस्था की गोपनीयता बनाए रखने के लिए हर एजेंट को अपना चेहरा छुपा के रखने के साथ साथ अपनी असल पहचान को भी छुपा के रखना अनिवार्य है।"

"जी जैसी आपकी आज्ञा।" मैंने बड़े अदब से कहा।

"हमारी संस्था के नियम कानून का शख़्ती से पालन करना अनिवार्य है।" उस रहस्यमयी आदमी ने कहा____"संस्था का कोई भी नियम तोड़ने पर शख़्त से शख़्त सज़ा दी जाएगी।"

"पर मुझे तो अभी तक संस्था के सारे नियम कानून बताए ही नहीं गए सर।" मैंने हिम्मत कर के कहा।

"संस्था के ज़रूरी नियम तुम्हें हमने पहले ही बता दिया था।" उस शख़्स ने कहा_____"और अब बाकी के नियम कानून भी बता देते हैं। संस्था का पहला नियम ये है कि संस्था की गोपनीयता का ख़याल रखना संस्था के एजेंट की सबसे पहली प्राथमिकता है। अगर तुम्हारी वजह से संस्था का भेद किसी के सामने खुलने वाला हो तो तुम उसी वक़्त अपनी जान दे कर संस्था का भेद खुलने से बचाओगे। दूसरा नियम ये है कि तुम अपने बारे में जीवन में कभी भी किसी को ये नहीं बताओगे कि तुम सी एम एस नाम की किसी संस्था के एजेंट हो या इस नाम की किसी संस्था को जानते हो और अगर किसी को तुम्हारे इस भेद के बारे में पता चल जाता है तो तुम उसी वक़्त उस इंसान को ख़त्म कर दोगे।

संस्था का तीसरा नियम ये है कि अपने मन में खुद कभी संस्था की जासूसी करने का ख़याल नहीं लाओगे, क्योंकि अगर संस्था को ये पता चल गया कि तुम संस्था के अंदर किसी तरह की जासूसी कर रहे हो तो तुम्हें फ़ौरन ही मौत की सज़ा दे दी जाएगी। संस्था का चौथा नियम ये है कि संस्था के किसी भी एजेंट से तुम ना तो उसके बारे में जानने की कोशिश करोगे और ना ही उसे अपने बारे में बताओगे। क्योंकि ऐसा करना संस्था के भेद जानने जैसा कहलाएगा और इसके लिए तुम्हें मौत की सज़ा दी जा सकती है। संस्था का पांचवां नियम ये है कि जिसको तुम सेक्स की सर्विस दे चुके होंगे उससे तुम विक्रम सिंह के रूप में या ट्रिप्पल वन दोनों ही रूपों में अपनी मर्ज़ी से मिलने की कोशिश नहीं करोगे।"

रहस्यमयी आदमी के चुप होते ही हॉल में मौत जैसा सन्नाटा छा गया। मेरे कानों में अभी भी उस रहस्यमयी आदमी के बताए हुए नियम ही गूँज रहे थे। सारे नियम अपनी जगह पर सही और जायज़ थे और हाँ शख़्त भी थे।

"तुम्हें संस्था से दो जोड़ी ऐसे कपड़े दिए जाएंगे।" मुझे ख़ामोश देख कर उस रहस्यमयी शख़्स ने कहा____"जैसे कपड़े संस्था के हर एजेंट पहनते हैं लेकिन ये कपड़े तभी पहनना होता है जब संस्था की तरफ से किसी काम को करने का हुकुम दिया जाता है। कहने का मतलब ये कि जब भी तुम हमारे हुकुम से किसी को सेक्स की सर्विस देने जाओगे तो उन्हीं कपड़ों को पहन कर जाओगे। वो कपड़े ऐसे होंगे जिनमें तुम्हारे जिस्म का कोई भी हिस्सा किसी को नज़र नहीं आएगा। अब तुम ये सोचोगे कि ऐसे कपड़े पहन कर तुम सेक्स की सर्विस कैसे दे आओगे क्योंकि सेक्स के लिए तो अपने औज़ार को कपड़े के अंदर से निकालना ज़रूरी होता है।

असल में हमारा सर्विस देने का प्रोसेस ये है कि जब भी कोई एजेंट लड़की या औरत के पास सर्विस देने जाता है तो सबसे पहले उसकी आँखों में काली पट्टी बांधता है। उसके बाद कमरे में नीम अँधेरा या फिर पूरी तरह अँधेरा कर देता है। ऐसा इस लिए ताकि अगर मान लो उस लड़की या औरत के मन में अपने सेक्स पार्टनर को देखने का ख़याल आ गया और वो उसे देखने की कोशिश करे तो वो उसे देख न पाए। इसी लिए एजेंट को सेक्स करते समय अपने सारे कपड़े पहने रहना अनिवार्य है ताकि किसी भी तरह से उसकी पार्टनर उसका चेहरा न देख सके।"

"लेकिन ऐसी कोई लड़की या औरत ऐसा करेगी ही क्यों?" मैंने पूछा____"उसे तो सेक्स से और उस सेक्स से मिलने वाले सुख से ही मतलब होगा न?"

"दुनियां में कई तरह के प्राणी पाए जाते हैं।" रहस्यमयी शख़्स ने कहा____"कुछ लोगों के मन में ये ख़याल भी उभर आता है कि जो ब्यक्ति सेक्स में उन्हें इतना अधिक आनंद दे रहा है वो दिखने में कैसा होगा? ये ख़याल जब किसी के अंदर प्रबल हो उठता है तो फिर वो वही करता है जिसके बारे में हमने तुम्हें पहले बताया है। वो ये भूल जाती हैं कि जिससे वो सेक्स का मज़ा ले रही हैं उसकी गोपनीयता का ख़याल रखना उनका भी फ़र्ज़ होता है। क्योंकि एक तरह से वो एजेंट अपनी जान हथेली पर रख कर उनको सेक्स की सर्विस देने आया होता है। ख़ैर इन्हीं सब बातों का ख़याल रख कर ही हमने सेक्स की सर्विस देने का ऐसा नियम बनाया था।"

रहसयमयी आदमी की बात सुन कर मैं इस बार कुछ न बोला था बल्कि उसकी बातों के बारे में सोचने लगा था। उसकी बात बिलकुल सही थी। सेक्स की सर्विस देने वाले एजेंट को यकीनन जान का ख़तरा रहता है। जो लड़कियां या जो औरतें किसी और के साथ इस तरह से सेक्स का मज़ा लेती हैं अगर उनके घर वालों को कहीं से इसकी भनक लग जाए और वो मौके पर वहां पर पहुंच जाएं तो यकीनन एजेंट के लेने के देने पड़ जाएंगे। ये सोचते ही मेरे जिस्म में झुरझुरी सी हुई। एकदम से मेरे मन में ये ख़याल आया कि बेटा ऐसा मज़ा मिलना इतना भी आसान नहीं होता है बल्कि अगर पकड़े जाएं तो अपने लौड़े भी लग जाते हैं।

"तुम्हारे मन में अब ये सवाल उभर रहा होगा कि।" अभी मैं ये सोच ही रहा था कि तभी हाल में उस रहस्यमयी आदमी की आवाज़ गूंजी____"इस काम में तो बहुत रिस्क है, तो फिर कैसे कोई एजेंट किसी लड़की या औरत को पूरी सफलता से सेक्स की सर्विस दे सकता है?"

"जी हाँ बिल्कुल।" मैंने झट से कहा____"ये सब बातें सुनने के बाद मुझे भी अब लग रहा है कि ये सब इतना आसान नहीं है।"

"फ़िक्र मत करो।" रहस्यमयी आदमी ने कहा____"संस्था के एजेंट सेक्स की सर्विस देने तभी जाते हैं जब हम खुद इस बात से संतुष्ट हो जाते हैं कि हमारे एजेंट्स को सर्विस देने में कोई ख़तरा नहीं है। इसके लिए हमारे दूसरे एजेंट्स पहले से ही ऐसी हर बातों का पता लगा लेते हैं और फिर हमें सूचित कर देते हैं। उनकी पॉजिटिव रिपोर्ट मिलने के बाद ही हम एजेंट्स को सर्विस देने के लिए भेजते हैं।"
 
रहसयमयी आदमी की ये बात सुन कर कसम से जान में जान आ गई थी वरना मैं तो अब ये समझ बैठा था कि बेटा तूने तो ख़ुशी ख़ुशी अपने ही हाथों अपनी ही गांड फाड़ लेने का बढ़िया जुगाड़ कर लिया है। ख़ैर रहस्यमयी आदमी की बातों से मुझे अपनी गांड के सही सलामत होने का एहसास हुआ।

अभी मैं ये सब सोच ही रहा था कि तभी मेरे पीछे वो सफेदपोश आदमी आया और उसने मेरे पास एक बड़ा सा नीले रंग का बैग रख दिया और मेरी तरफ एक चाभी बढ़ाई तो मैंने उसे ले लिया लेकिन मैं समझ नहीं पाया कि वो बैग और वो चाभी किस लिए थी?

"इस बैग में तुम्हारे वो कपड़े हैं ट्रिप्पल वन।" हाल में रहस्यमयी आदमी की आवाज़ गूंजी____"जिन्हें तुम्हें तब पहनना है जब तुम एजेंट के रूप में हमारे हुकुम से किसी को सर्विस देने जाओगे। उन कपड़ों के साथ इस बैग में कुछ और भी सामान है जो तुम्हारे लिए बेहद ज़रूरी होंगे और साथ ही एक मोबाइल भी है। एजेंट के रूप में जब भी तुम्हें कहीं भेजा जाएगा तो उसकी सूचना तुम्हें उसी मोबाइल पर दी जाएगी। एक बात और, तुम खुद कभी संस्था से सम्बन्ध स्थापित करने की कोशिश नहीं करोगे। हालांकि ग़लती से अगर तुम ऐसा करोगे भी तो तुम कर नहीं पाओगे क्योंकि उस मोबाइल में आउटगोइंग वाला कोई सिस्टम नहीं होगा। ख़ैर अब तुम जा सकते हो।"

रहसयमयी आदमी के कहने पर मैंने सिर हिलाया और वो बैग ले कर उस सफेदपोश आदमी के साथ चल पड़ा। मेरे ज़हन में कई सारी बातें चलने लगीं थी। जिनके बारे में जानने के लिए मेरे मन में उत्सुकता बढ़ गई थी।

"क्या मैं आपसे कुछ पूछ सकता हूं?" रास्ते में मैंने उस सफेदपोश आदमी से कहा तो उसने पलट कर मेरी देखा।

"क्या पूछना चाहते हो?" कुछ पलों तक मेरी तरफ देखते रहने के बाद उसने सपाट लहजे में कहा था।

"हाल के दूसरे छोर में बड़ी सी कुर्सी पर वो जो बैठे थे।" मैंने झिझकते हुए कहा____"उन्हें आप लोग क्या कहते हैं? मेरा मतलब है कि आप लोग उन्हें किस नाम से जानते हैं?"

"वो हमारे चीफ़ हैं।" उस सफेदपोश आदमी ने कहा____"और हम सब उन्हें ट्रिपल एक्स के नाम से जानते हैं और उन्हें सर या चीफ़ कहते हैं।"

"और आपको मैं क्या कह कर बुला सकता हूं?" मैंने हिम्मत कर के उससे पूछा तो उसने कहा____"मुझे ज़ीरो ज़ीरो सेवन कहते हैं और क्योंकि मैं तुमसे सीनियर हूं इस लिए तुम मुझे सर कह कर ही बुलाओगे। एक बात और, उस मोबाइल को हमेशा अपने पास ही रखना और इस बात का ख़ास ख़याल रखना कि वो मोबाइल किसी के हाथ न लगने पाए।"

उसकी बात सुन कर मैंने हाँ में सिर हिला दिया। उसके बाद मैंने उससे कुछ नहीं पूछा। थोड़ी ही देर में हम जब थोड़ा बाहर आए तो उस सफेदपोश ने मेरी आँखों में काली पट्टी बाँध दी। उसके बाद उसने किसी और को मुझे ले जाने का हुकुम दिया तो मैं दूसरे आदमी के साथ चल पड़ा। कुछ ही देर में मुझे एक कार में बैठाया गया और फिर मेरे बैठते ही कार आगे बढ़ चली। क़रीब बीस मिनट बाद मेरे आँखों से पट्टी हटा दी गई। मैंने कार की विंडो से बाहर देखा तो पता चला कि मैं शहर में दाखिल हो चुका था। मैंने मन ही मन सोचा कि सी एम एस नाम की संस्था वाली जगह शायद शहर से दूर कहीं पर है। ख़ैर कुछ ही देर में कार के ड्राइवर ने मेरे घर के क़रीब ही कार रोकी और मुझे उतर जाने को कहा तो मैं उतर गया।

मेरे पास अब दो बैग थे। एक तो वो जिसे मैं घर से ले के आया था और अब ये दूसरा बैग संस्था से मुझे मिल गया था। इस बैग में मेरे लिए ऐसे कपड़े रखे गए थे जिन्हें मैं अपनी फैमिली को नहीं दिखा सकता था। मैंने मन ही मन सोचा कि मुझे इस बैग को अपने कमरे में ऐसी जगह छुपा के रखना होगा जहां पर वो बैग मेरे माता पिता या बंगले की किसी नौकरानी की नज़र में न आए। यही सब सोचते हुए मैं घर पहुंच गया। मैं जानता था कि आज नए साल की पहली तारीख़ थी इस लिए मेरे माता पिता इस वक़्त अपने ऑफिस में ही होंगे।

मेरे लिए ये अच्छी बात थी। गेट पर पहुंच कर मैंने डोर बेल बजाई तो शीतल आंटी ने दरवाज़ा खोला। शीतल आंटी हमारे घर की बहुत पुरानी नौकरानी थीं। हालांकि हम उसे नौकरानी नहीं मानते थे बल्कि उसे अपनी फैमिली का ही मेंबर मानते थे। ख़ैर मुझे देखते ही शीतल आंटी के चेहरे पर ख़ुशी की चमक आ गई और उन्होंने मुझे अंदर आने का रास्ता दिया तो मैं अंदर दाखिल हो गया। उन्होंने मुझसे मेरा हाल पूछते हुए मेरे पिकनिक के बारे में पूछा तो मैंने उन्हें थोड़ा बहुत बताया और फिर अपने कमरे में चला गया।

कमरे में आ कर मैंने दरवाज़े को अंदर से बंद किया और फिर कमरे में कोई ऐसी जगह देखने लगा जहां पर मैं अपना ये बैग छुपा सकूं। मैं क्योंकि अपने माता पिता का इकलौता बेटा था इस लिए मेरा कमरा भी काफी बड़ा और खूबसूरत था। मैं सोचने लगा कि इस बैग को मैं इस कमरे में ऐसी कौन सी जगह पर छुपाऊं जिससे किसी की नज़र बैग पर न पड़ सके? काफी देर तक जांच परख करने के बाद मुझे यही समझ आया कि कमरे में और तो कोई ख़ास जगह नहीं है लेकिन एक जगह ऐसी है जहां पर मैं इस बैग को छुपा सकता हूं। मेरा बेड ही ऐसी वो जगह था, क्योंकि वो अंदर से खोखला था और उसमें सामान रखा जा सकता था। मैंने फ़ौरन ही बेड पर बिछे मोटे मोटे गद्दों को उठाया और फिर उसके नीचे की प्लाई को निकाल कर उसके अंदर देखा तो मेरे होठों पर मुस्कान उभर आई।

अभी मैं मुस्कुरा ही रहा था कि तभी दरवाज़े के बाहर से शीतल आंटी की आवाज़ आई। वो मुझसे खाने पीने का पूछ रहीं थी तो मैंने उनसे कहा कि मैं आधे घंटे बाद खाऊंगा। ख़ैर उसके बाद मैंने सोचा कि पहले ये देख लूं कि बैग में क्या क्या चीज़ें मेरे लिए रख कर दी गई हैं? ये सोच कर मैंने जेब से चाभी निकाली और बैग पर लगा ताला खोला। बैग के अंदर सच में ऐसे कपड़े थे जो काले रंग के थे और उनमें डिज़ाइन के रूप में लेदर की पट्टियां बनी हुई थीं। एक काला मास्क भी था और काले दस्ताने भी। कपड़ों के नीचे एक मोबाइल था जो कि था तो कीपैड ही लेकिन उसकी स्क्रीन बड़ी थी। बैग के अंदर एक खंज़र भी था जो लेटर के कवर में ही बंद था और उसी के पास एक काले रंग का बॉक्स रखा हुआ था।

मैंने उस बॉक्स को निकाल कर उसे खोला तो उसके अंदर मुझे जो चीज़ नज़र आई उसे देख कर मेरी आँखें आश्चर्य से चौड़ी हो ग‌ईं। दरअसल बॉक्स में एक रिवाल्वर था और उसी के साथ उसकी एक मैगज़ीन रखी हुई थी जिसमें गोलियां भरी हुई थीं। ये देख कर मेरे जिस्म में झुरझुरी सी हुई। मैं ये सोच कर थोड़ा कांप सा गया कि ऐसी ख़तरनाक चीज़ भला मेरे लिए किस काम में आ सकती थी? क्या इस लिए कि अगर मेरा राज़ किसी को पता चल जाए तो मैं उसे इसी रिवाल्वर के द्वारा जान से मार सकूं? मैंने कांपते हाथों से उस रिवाल्वर को बॉक्स से निकाला और बड़े गौर से उसे उलटा पलटा कर देखने लगा। रिवाल्वर में क्योंकि गोलियों से भरी मैगज़ीन नहीं लगी हुई थी इस लिए वो मुझे थोड़ा हल्का ही लग रहा था। सहसा मेरे ज़हन में ख़याल उभरा कि मुझे तो रिवाल्वर चलाना आता ही नहीं है और ना ही मेरा सटीक निशाना लग सकता है। इसका मतलब क्या इसे चलाने की भी मुझे ट्रेनिंग दी जाएगी? मुझे याद आया कि चीफ़ ने मुझसे कहा था कि धीरे धीरे मुझे बाकी चीज़ों की भी ट्रेनिंग दे दी जाएगी इसका मतलब उन चीज़ों में ये चीज़ भी शामिल है।

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अब तक....

अभी मैं मुस्कुरा ही रहा था कि तभी दरवाज़े के बाहर से शीतल आंटी की आवाज़ आई। वो मुझसे खाने पीने का पूछ रहीं थी तो मैंने उनसे कहा कि मैं आधे घंटे बाद खाऊंगा। ख़ैर उसके बाद मैंने सोचा कि पहले ये देख लूं कि बैग में क्या क्या चीज़ें मेरे लिए रख कर दी गई हैं? ये सोच कर मैंने जेब से चाभी निकाली और बैग पर लगा ताला खोला। बैग के अंदर सच में ऐसे कपड़े थे जो काले रंग के थे और उनमें डिज़ाइन के रूप में लेदर की पट्टियां बनी हुई थीं। एक काला मास्क भी था और काले दस्ताने भी। कपड़ों के नीचे एक मोबाइल था जो कि था तो कीपैड ही लेकिन उसकी स्क्रीन बड़ी थी। बैग के अंदर एक खंज़र भी था जो लेटर के कवर में ही बंद था और उसी के पास एक काले रंग का बॉक्स रखा हुआ था। मैंने उस बॉक्स को निकाल कर उसे खोला तो उसके अंदर मुझे जो चीज़ नज़र आई उसे देख कर मेरी आँखें आश्चर्य से चौड़ी हो ग‌ईं। दरअसल बॉक्स में एक रिवाल्वर था और उसी के साथ उसकी एक मैगज़ीन रखी हुई थी जिसमें गोलियां भरी हुई थीं। ये देख कर मेरे जिस्म में झुरझुरी सी हुई। मैं ये सोच कर थोड़ा कांप सा गया कि ऐसी ख़तरनाक चीज़ भला मेरे लिए किस काम में आ सकती थी? क्या इस लिए कि अगर मेरा राज़ किसी को पता चल जाए तो मैं उसे इसी रिवाल्वर के द्वारा जान से मार सकूं? मैंने कांपते हाथों से उस रिवाल्वर को बॉक्स से निकाला और बड़े गौर से उसे उलटा पलटा कर देखने लगा। रिवाल्वर में क्योंकि गोलियों से भरी मैगज़ीन नहीं लगी हुई थी इस लिए वो मुझे थोड़ा हल्का ही लग रहा था। सहसा मेरे ज़हन में ख़याल उभरा कि मुझे तो रिवाल्वर चलाना आता ही नहीं है और ना ही मेरा सटीक निशाना लग सकता है। इसका मतलब क्या इसे चलाने की भी मुझे ट्रेनिंग दी जाएगी? मुझे याद आया कि चीफ़ ने मुझसे कहा था कि धीरे धीरे मुझे बाकी चीज़ों की भी ट्रेनिंग दे दी जाएगी इसका मतलब उन चीज़ों में ये चीज़ भी शामिल है।

अब आगे....

अपने घर आए हुए मुझे तीन दिन गुज़र चुके थे। इन तीन दिनों में संस्था से मेरे पास उस मोबाइल पर कोई मैसेज नहीं आया था, जबकि मैं ये उम्मीद कर रहा था कि ट्रेनिंग पूरी होने के बाद अब हर रोज़ मैं एजेंट के रूप में किसी न किसी औरत या लड़की को सेक्स की सर्विस देने के लिए भेजा जाऊंगा। जिस दिन ट्रेनिंग के बाद जब मैं घर आया था तो शाम को मेरे माता पिता ने मुझसे मेरे पिकनिक टूर के बारे में पूछा था और मैंने उन्हें यही बताया था कि नए दोस्तों के साथ मेरा पिकनिक टूर बहुत अच्छा गया था। ख़ैर उसके बाद अपने असल दोस्तों के साथ घूमने फिरने में ही मेरे दिन गुज़रे थे। मेरे दोस्तों को भी पता चल चुका था कि मैं अपने कुछ नए दोस्तों के साथ पिकनिक टूर पर गया था और इस बात से मेरे दोस्त मुझसे नाराज भी हुए थे लेकिन मैंने भी आख़िर उन्हें मना ही लिया था।

तीसरे दिन की रात क़रीब दस बजे मेरे उस मोबाइल पर मैसेज टोन बजी थी जो मुझे संस्था की तरफ से मिला था। वो मोबाइल मैं अपने पास ही रखता था लेकिन इस तरह से कि किसी की नज़र में न आए। ख़ैर जब मुझे एहसास हुआ कि मैसेज टोन संस्था वाले मोबाइल पर बजी है तो मेरे जिस्म में एक अजीब सी झुरझुरी हुई। मेरी धड़कनें तेज़ हो ग‌ईं। मैंने खुद के जज़्बातों को काबू करते हुए उस मोबाइल पर आए मैसेज को देखा। मोबाइल में एक जगह का एड्रेस लिखा हुआ था और साथ ही उसमें वक़्त भी लिखा हुआ था। मैसेज पढ़ कर मेरी धड़कनें फिर से तेज़ हो ग‌ईं। ज़हन में ख़याल उभरा कि चल बेटा जिसका इंतज़ार था वो घड़ी अब आ गई है और अब तुझे अपने क्लाइंट को सेक्स की सर्विस दे कर खुश करना है।

मेरे घर में मेरे माता पिता का बनाया हुआ रूल चलता था। रूल के हिसाब से साढ़े दस बजे तक सबका डिनर हो जाता था और ग्यारह से साढ़े ग्यारह बजे तक सब अपने अपने कमरे में जा कर सो चुके होते हैं। मेसेज अनुसार जहां मुझे जाना था वहां पहुंचने का टाइम बारह बजे लिखा हुआ था। एड्रेस जिस जगह का था वहां के बारे में मुझे थोड़ा बहुत पता था इस लिए वहां जाने से पहले मैंने घर में सब को देख कर ये पता लगाया कि इस वक़्त कोई जाग तो नहीं रहा?? जब मैंने सब कुछ ठीक ठाक देखा तो मैंने अपने सूटकेस से वो कपड़े निकाले और उन्हें पहन कर कमरे की खिड़की के रास्ते बाहर निकल गया। इन तीन दिनों में मैं ये अच्छी तरह जांच परख कर चुका था कि खिड़की के रास्ते से मैं कैसे निकल सकता हूं।

मैं क्योंकि पहली बार इस तरह के काम के लिए घर से बाहर निकला था इस लिए मुझे अंदर से घबराहट भी हो रही थी और साथ ही ये डर भी था कि अगर किसी के द्वारा पकड़ा गया तो क्या होगा? ख़ैर यही सब सोचते हुए मैं पैदल ही कुछ दूर आया तो मुझे एक मोड़ पर मुड़ते ही सड़क के किनारे एक मोटर साइकिल खड़ी हुई दिखी। मैं समझ गया कि ये वही मोटर साइकिल है जिसका ज़िक्र मैसेज में था। मैंने क़रीब जा कर देखा तो मोटर साइकिल में चाभी लगी हुई थी। मैंने उसमें बैठ कर उसे स्टार्ट किया और आगे बढ़ चला।

क़रीब पंद्रह मिनट में मैं दिए गए एड्रेस पर पहुंच गया। मेरे दिल की धड़कनें तेज़ तेज़ चल रहीं थी। मेरे ज़हन में हज़ारो तरह के ख़याल उभर रहे थे। ख़ैर मैं जैसे ही दिए हुए एड्रेस पर पंहुचा तो मैंने अँधेरे में एक जगह मोटर साइकिल को छुपा कर खड़ी कर दिया और फिर उस जगह की तरफ बढ़ चला।

उस जगह को देखते ही मैंने अंदाज़ा लगा लिया कि वो किसी अमीर ब्यक्ति की मिल्कियत है। चारो तरफ सन्नाटा फैला हुआ था। ये ऐसी जगह थी जो शहर से बाहर थी और किसी अमीर आदमी का फार्म हाउस था। फार्म हाउस के चारो तरफ ऊँची बाउंड्री वाल थी। मेरे ज़हन में ख़याल उभरा कि यहाँ की देख रेख के लिए यकीनन सिक्योरिटी गार्ड भी होंगे। मैं दबे पाँव गेट की तरफ आया तो देखा गेट के अंदर दो सिक्योरिटी गार्ड थे जो इस वक़्त अस्त ब्यस्त सी हालत में पक्की ज़मीन पर लुढ़के से पड़े थे। ज़ाहिर था उन्हें अपना कोई होश नहीं था। मैंने गर्दन घुमा कर चारो तरफ देखा और फिर लोहे के उस गेट पर चढ़ कर दूसरी तरफ आ गया।

पांच मिनट में ही मैं अंदर बने मकान के मुख्य दरवाज़े के पास खड़ा बेल बजा रहा था। मेरी धड़कनें अभी भी तेज़ चल रहीं थी और मैं ये सोच सोच कर थोड़ा घबरा भी रहा था कि अब इसके आगे सब कुछ कैसे होगा? ख़ैर जल्दी ही दरवाज़ा खुला तो मेरी नज़र नाइटी पहने एक औरत पर पड़ी। उसने मुझे ठीक से उसे देखने का मौका ही नहीं दिया बल्कि उसने मुझे देख कर फ़ौरन ही अंदर आने को कहा तो मैं अंदर दाखिल हो गया। मैं ये उम्मीद कर रहा था कि वो मुझे जब ऐसे कपड़ों में देखेगी तो शायद बुरी तरह चौकेंगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ था। ऐसा लगा जैसे उसे सब कुछ पहले से ही पता था।

उसके साथ चुप चाप चलते हुए मैं कुछ ही देर में उसके कमरे में आ गया। जैसा कि मैं बता चुका हूं कि वो अमीर खानदान से थी इस लिए अंदर की हर चीज़ ख़ास ही नज़र आ रही थी। उसका कमरा काफी खूबसूरत था। कमरे में दुधिया प्रकाश फैला हुआ था इस लिए मैंने उस औरत को ग़ौर से देखा। उसको देखने से मैं ये अंदाज़ा नहीं लगा पाया था कि उसकी उम्र क्या रही होगी। दिखने में खूबसूरत थी और उसका जिस्म थोड़ा भरा हुआ था लेकिन उसे मोटी नहीं कहा जा सकता था। क्रीम कलर की नाइटी के अंदर शायद उसने कुछ भी नहीं पहना हुआ था क्योंकि सीने पर उसकी बड़ी बड़ी चूचियों के निप्पल साफ़ महसूस हो रहे थे।

"आई हैव एन ऑवर डियर।" बेड पर बैठते ही उसने अंग्रेजी में जब ये कहा तो मैंने उसकी तरफ देखा, जबकि उसने आगे कहा____"आफ्टर दैट आई हैव टू गो टू दा एयरपोर्ट। आई वांट यू टू गिव मी सच फन इन दिस वन ऑवर दैट आई कैन बी कम्प्लीटली हैप्पी।"

उसके ऐसा कहने पर मैंने हाँ में सिर हिलाया और फिर अपने कपड़े के अंदर से एक काली पट्टी निकाल कर मैं उसकी तरफ बढ़ा। वो मुझे ही देख रही थी। उसके चेहरे पर डर या घबराहट जैसी कोई बात नहीं थी। ऐसा लगता था जैसे उसने मुझ जैसे इंसान को पहले भी देखा हुआ था।

"मेरी आँखों में ये काली पट्टी बाँधने से पहले।" मैं जैसे ही उसके पास पंहुचा तो उसने मेरी नक़ाब से झांकती आँखों में देखते हुए कहा____"क्या तुम मुझे अपना हथियार दिखा सकते हो? असल में मैं देखना चाहती हूं कि मेरे सेक्स पार्टनर का हथियार किस तरह का है?"

उसकी ये बात सुन कर मैं दुविधा में पड़ गया था। चीफ़ ने मुझे इस बारे में कुछ नहीं बताया था। मुझे दुविधा में पड़ा हुआ देख उसने कहा____"इतना क्या सोच रहे हो अजनबी? मैंने तुम्हारे हथियार को देखने की बात कही है ना कि तुम्हारे चेहरे की। मुझे नहीं लगता कि इसमें तुम्हें कोई समस्या होगी।"

उसकी ये बात सुन कर मैंने सोचा कि बात तो सही ही कह रही है वो। भला हथियार दिखाने में मुझे कैसे कोई समस्या हो सकती है? ये सोच कर मैंने अपनी पोशाक की ज़िप खोल कर अपने लंड को बाहर निकाला। मैं अंदर से थोड़ा घबराया हुआ सा महसूस करने लगा था इस लिए मैंने खुद को सम्हाला। मेरा लंड क्योंकि इस वक़्त शांत था इस लिए उसका आकार वैसा नहीं था जिससे उसकी आँखें फ़ैल जाएं। हालांकि वो इस हालत में भी दूसरे मर्दों के लंड से भारी था। मैंने जैसे ही अपना लंड निकाला तो उसकी नज़र मेरे लंड पर पड़ी। लंड को देखते ही उसके चेहरे पर चमक और होठों पर गहरी मुस्कान उभर आई।

"वाव! इट्स अमेजिंग डियर।" उसने अपना हाथ आगे बढ़ा कर मेरे लंड को पकड़ते हुए कहा____"व्हेन इट इज सो बिग इवेन इन काल्म कण्डीशन, सो व्हेन इट विल कम इन इट्स फुल फॉर्म देन इट विल लुक इवेन बिगर।"

कहने के साथ ही वो मेरे लंड को प्यार से सहलाने लगी थी। उसके ऐसा करते ही मेरे जिस्म में बड़ी तेज़ी से झुरझुरी होने लगी थी। जिसका असर मेरी गोटियों में होने लगा था और उस असर के प्रभाव से मेरा लंड अपना सिर उठाने लगा था। उसके कोमल हाथों के स्पर्श से मुझे बेहद आनंद आने लगा था। कुछ ही देर में मेरा लंड उसके सहलाने से अपने फुल फॉर्म में आ गया जिसे देख कर उस औरत के चेहरे की चमक और भी बढ़ गई और आँखें हैरानी से फ़ैल ग‌ईं।

"माई गॉड।" फिर उसने कहा____"इट्स रियली बिग एण्ड वैरी फैट डियर। आई एम वैरी हैप्पी टू सी दिस। आई वन्ना सक दिस ब्यूटीफुल काक।"

"आहहह।" कहने के साथ ही उसने लपक कर मेरे लैंड को अपने मुँह में भर लिया था जिससे मेरे मुँह से मज़े में डूबी आह निकल गई थी। मैं चाह कर भी उसे रोक नहीं पाया था।

वो औरत अपने एक हाथ से मेरे लंड को पकड़ कर ज़ोर ज़ोर से चूसने लगी थी। उसके इस तरह चूसने से मेरे जिस्म में मज़े की अनगिनत तरंगें मानो तांडव सा करने लगीं थी। मेरा दिल किया कि मैं अपने हाथों से उसके सिर को पकड़ लूं और ज़ोर ज़ोर से उसके मुँह को चोदना शुरू कर दूं लेकिन मेरे ज़हन में तभी माया की कही हुई बातें गूँज उठीं थी और मैंने उसके सिर को पकड़ कर उसके मुँह को चोदने की अपनी ये हसरत मिटा दी।

"आहहहह शशंशशश इट इज वेरी टेस्टी डियर।" उसने मेरे लंड को मुँह से निकाल कर और चटकारा सा लेते हुए कहा____"आई लाइक दिस काक ऑफ योर्स वैरी मच एण्ड नाउ आई वांट यू टू केन्च माई थर्स्ट विद दिस काक ऑफ योर्स। मुझे इस तरह चोदो डियर कि मैं पूरी तरह से मस्त हो जाऊं।"

उस औरत की बात सुन कर मैंने अपने हाथ में ली हुई पट्टी को उसकी आँखों में बाँध दिया। उसके बाद मैं कमरे में नीम अँधेरा करने के लिए स्विच बोर्ड की तरफ बढ़ा। नाईट बल्ब जलने के बाद मैंने तेज़ दूधिया प्रकाश देने वाले बल्ब को बुझा दिया। कमरे की दीवारों पर सफ़ेद रंग का कलर था इस लिए नाईट बल्ब के प्रकाश में भी सब कुछ अच्छे से दिख रहा था।

मैं बेड पर आँखों में पट्टी लगाए बैठी उस औरत की तरफ बढ़ा और बेड पर उसके पास में ही बैठ गया। मैं जानता था कि ये मेरे लिए इम्तिहान जैसा है लेकिन मेरे लिए अच्छी बात ये हुई थी कि शुरुआत उस औरत ने कर दी थी और उसकी आँखों में पट्टी बंधी होने की वजह से मुझे किसी तरह की झिझक नहीं होनी थी।

मैंने अपने दोनों हाथों से उस औरत के चेहरे को पकड़ा और उसके अधखुले होठों को झुक कर अपने मुँह में भर लिया। नक़ाब ऐसा था जिसमें मुँह और नाक वाली जगह पर खुला हुआ था, ताकि सांस लेने में और ऐसे काम करने में कोई समस्या न हो। मैंने जैसे ही उसके होठों को अपने मुँह में भरा तो उस औरत ने भी मेरे सिर को थाम लिया और होठ चूसने में मेरा साथ देने लगी। वो बड़ी गर्मजोशी से कभी मेरे निचले तो कभी मेरे ऊपर वाले होठ को चूसने लगती थी। मेरे जिस्म में मज़े की तरंगें दौड़ने लगीं थी, जिसके असर से मैं भी जोश में उसके होठों को मुँह में भर कर चूसने लगता था। अपने एक हाथ को नीचे सरका कर मैंने नाइटी के ऊपर से ही उसकी दाहिनी चूची को पकड़ लिया था। जैसे ही मैंने उसकी एक छाती को पकड़ा तो मुझे महसूस हुआ कि औरत की छाती माया कोमल और तबस्सुम की छातियों से थोड़ा कम कड़क थी।

मैं ज़ोर ज़ोर से उसकी छातियां मसलने लगा था जिससे वो मस्ती में आ ग‌ई थी। मैंने उसे वैसे ही लेटा दिया और उसके ऊपर आ कर उसके होठों को चूमने चूसने लगा। एक हाथ से मैं बारी बारी से उसकी छातियां भी मसलता जा रहा था। सहसा उस औरत ने अपने होठों को मेरे होठों से छुड़ाया और अपनी छातियों की तरफ मेरे चेहरे को ढकेला।

"सक माई टिट्स डियर।" उसने हांफते हुए और सिसकारियां भरते हुए कहा____"ड्रिंक आल दा जूस आफ माई टिट्स। मुँह में भर कर काटो इन्हें।"

मैंने उसके कहने पर फ़ौरन ही उसकी नाइटी की डोरी को खींचा जिससे नाइटी की डोरी खुल गई। मैंने नाइटी के दोनों छोरों को पकड़ कर इधर उधर किया तो उसकी दोनों भारी भरकम छातियां बेपर्दा हो ग‌ईं। गोरी और बड़ी बड़ी छातियों के बीच गुलाबी रंग के निप्पल को देख कर मैं एकदम से मचल उठा और लपक कर उसके एक निप्पल को मुँह में भर लिया।

"आहहह शशंशशसशसशशस सक माई निप्पल्स हार्ड डियर।" उसने मेरे सिर को पकड़ कर ज़ोर से अपनी उस छाती पर दबाया तो मैं ज़ोर ज़ोर से उसके निप्पल को चूसते हुए खींचने लगा। एक हाथ से मैं उसकी दूसरी छाती को बुरी तरह मसल रहा था।

औरत बुरी तरह मचलने लगी थी। शुक्र था कि मैंने नक़ाब पहना हुआ था जिससे मेरे सिर के बाल उसके अंदर ही थे वरना वो मेरे बालों को पकड़ कर इतना ज़ोर से खींचती की मेरी चीखें निकल जाती।

"आह्ह्ह्ह सशशश ऐसे ही डियर।" वो मेरे सिर को पकड़े और सिसियाते हुए बोली____"बाइट माई ब्रेस्ट्स हार्डली। इस वाले को भी चूसो डियर और इसे भी आह्ह्ह यस लाइक दैट...ऐसे ही इसे भी काटो।"

वो औरत फुल मस्ती में आ चुकी थी और बड़बड़ाए जा रही थी। उसके कहे अनुसार मैं उसकी दोनों छातियों को मुँह में भर कर ज़ोर ज़ोर से काटने लगा था जिससे वो और भी मचलती और मेरे सिर को ज़ोर से अपनी छातियों को तरफ भींच लेती। काफी देर तक मैं उसकी दोनों छातियों को ऐसे ही चूसते हुए काटता रहा। इधर मेरा लंड बुरी तरह अकड़ गया था। मैंने उसकी छातियों से सिर उठा कर एक बार उसके होठों को चूमा और फिर नीचे आ कर उसके गुदाज़ पेट को चूमने लगा। पेट के बीच उसकी नाभी ऐसी दिख रही थी जैसे कोई गहरा कुआं हो। मैंने उसकी नाभी में अपनी पूरी जीभ घुसा दी जिससे वो मचल उठी।

थोड़ी देर उस औरत की नाभी में जीभ कुरेदने के बाद मैं नीचे की तरफ बढ़ा तो देखा उसने पेंटी नहीं पहन रखी थी। मैं समझ गया कि वो पहले से ही फुल रेडी थी सेक्स के लिए। दूध से गोरे और चिकने बदन को देख कर मैं उसकी मोटी मोटी जाँघों को चूमते हुए जैसे ही टांगों के बीच आया तो उसने ज़ोरदार सिसकी लेते हुए अपनी टांगों को पहले तो सिकोड़ा लेकिन फिर जैसे उसका मन बदल गया तो उसने अपनी टांगों को फैलाने के साथ दोनों हाथों से मेरे सिर को अपनी चिकनी चूत की तरफ दबाया तो मैंने उसकी दहकती चूत पर अपने होठ रख दिए।

मेरी नाक में उसके कामरस की खुशबू भरती चली गई थी। उसकी चूत की बड़ी बड़ी फांकों पर पहले मैंने दो तीन बार चूमा और फिर अपनी जीभ निकाल कर उसकी दरार पर नीचे से ऊपर की तरफ फेरा तो उसने जल्दी से अपने घुटने मोड़ लिए जिससे मेरा सिर उसकी चूत में फंस सा गया।

"आहहहह शशशसश लिक माय पुसी डियर।" औरत ने ज़ोर की सिसकी लेते हुए मेरे सिर को अपनी चूत पर दबाया_____"अपनी जीभ से मेरी चूत को चोदो। आह्ह्ह हाँ ऐसे ही। शशशशषस आह्ह्ह बड़ा अच्छा लग रहा है डियर। थोड़ा और अंदर तक डालो ना।"

मैं उसके निर्देशानुसार अपनी जीभ से उसकी चूत को चोदने लगा था और वो मेरा सिर थामे ज़ोर ज़ोर से आहें भर रही थी। कमरे में सिर्फ उसी की आवाज़ गूंज रही थी। मैं काफी देर तक उसकी चूत को ऐसे ही जीभ से चोदता रहा। मेरा खुद का बुरा हाल हो गया था। वो औरत अपने दोनों घुटनों के बीच मेरे सिर को बार बार मज़े में डूब कर दबा देती थी। जब उसके बर्दास्त के बाहर हो गया तो उसने मेरे सिर को ज़ोर दे कर ऊपर किया और उठ कर बैठ गई। पहले तो मुझे लगा कि कहीं मुझसे कोई ग़लती तो नहीं हो गई लेकिन जब उसने मुझे धक्का दे कर बेड पर गिरा दिया और झपट कर अंदाज़े से ही मेरे ऊपर आई तो मैंने अंदाज़ा लगाया कि शायद अब वो मुझे भी मज़ा देने वाली है।

उसने हाथों से टटोलते हुए मेरे लंड को पकड़ा और एक झटके से सिर झुका कर मेरे लंड को मुँह में भर लिया। पागलों की तरह वो इतना ज़ोर ज़ोर से मेरे लंड को चूसने लगी थी कि थोड़ी ही देर में मेरा बुरा हाल हो गया। अपने एक हाथ से वो मेरी गोटियों को भी सहलाती जा रही थी।

"योर काक इज वेरी नाइस डियर।" उसने मेरे लंड को अपने मुँह से निकाल कर कहा____"मन तो करता है कि ऐसे ही इसे चूसती रहूं लेकिन क्या करूं मज़बूरी है, क्योंकि मुझे जल्दी ही एयरपोर्ट के लिए निकलना है। ख़ैर चलो अब जल्दी से अपना ये मूसल लंड मेरी चूत में डाल कर मेरी ऐसी चुदाई करो कि मैं पूरी तरह मस्त हो जाऊं।"

कहने के साथ ही उसने एक बार और मेरे लंड को अपने मुँह में भर कर चूसा और फिर जल्दी से बेड पर अपनी टाँगें फैला कर लेट गई। उसके लेटते ही मैं फ़ौरन उठा और उसकी दोनों टांगों के बीच में आ कर मैंने अपने तमतमाए हुए लंड को उसकी चूत के छेंद पर टिका कर ज़ोर का झटका मारा तो मेरा लंड उसकी चूत को फाड़ता हुआ अंदर तक चला गया।

"ओह्ह्ह्ह माम, आई एम डेड।" वो ज़ोर से चीख पड़ी____"थोड़ा आराम से नहीं डाल सकते थे क्या? तुम्हारे इस मूसल ने मेरी चूत फाड़ दी होगी। ओह! गाड माई पुसी इज बर्निंग लाईक ए फायर एण्ड इट इज हर्टिंग टू। प्लीज़ होल्ड आन फार ए व्हाइल।"

उसकी बात पर मैं कुछ न बोला। असल में मुझे इतना जोश चढ़ा हुआ था कि मैंने बिना कुछ सोचे समझे ज़ोरदार झटका दे कर एक ही बार में अपना लंड उसकी चूत के अंदर तक डाल दिया था। वो तो शुक्र था कि औरत की चूत ज़्यादा तंग नहीं थी वरना वो बेहोश ही हो जाती। मैं कुछ पलों तक रुका रहा और झुक कर उसकी चूचियों को मसलने के साथ साथ उन्हें चूसता भी रहा। जब औरत ने नीचे से अपनी गांड उठाई तो मैं समझ गया कि अब वो धक्कों के लिए तैयार है। मैंने उसकी चूचियों से अपना चेहरा उठाया और उसकी मोटी मोटी जाँघों को पकड़ कर तेज़ तेज़ धक्के लगाने शुरू कर दिए।

मेरे तेज़ धक्कों से औरत की चीखें निकलने लगीं थी। हालांकि उसे दर्द नहीं हो रहा बल्कि वो मज़े में ज़ोर ज़ोर से चिल्ला रही थी और मुझे और भी ज़ोरो से चोदने को बोलती जा रही थी। मैं पूरी ताकत लगा कर धक्के लगा रहा था। मेरे हर धक्के पर उसकी बड़ी बड़ी खरबूजे जैसी चूचियां बुरी तरह उछल रहीं थी। क़रीब पांच मिनट तक मैं बिना रुके धक्के लगाता रहा। वो औरत इतना ज़ोर ज़ोर से चिल्लाने लगी थी कि उसके चिल्लाने से मुझे लगा कहीं उसकी चीखें घर से बाहर पहुंच कर किसी के कानों में न पड़ जाएं। फिर मुझे एहसास हुआ कि यहाँ फार्म हाउस में भला कौन होगा इस वक़्त उसकी चीखें सुनने वाला? ज़ाहिर है कि उसने इस एकांत जगह को इसी लिए ऐसा मज़ा लेने के लिए चुना था ताकि उसके इस मज़े में किसी तरह का ख़लल न पड़ सके और ना ही किसी को पता चल सके।

मैं ताबड़तोड़ धक्के लगाता जा रहा कि तभी वो औरत और भी बुरी तरह चीखने लगी। इस बार उसके हलक से गुर्राने जैसी आवाज़ें निकलने लगीं थी। मैं समझ गया कि उसका अब काम तमाम होने वाला है इस लिए और ज़ोर ज़ोर से धक्के लगाने लगा। मेरा अंदाज़ा सही निकला, यानि कुछ ही देर में वो औरत बुरी तरह चीखते हुए झड़ने लगी। उसने मेरी कमर को बुरी तरह अपनी टांगों पर जकड़ लिया था जिससे धक्के लगाने की मेरी रफ़्तार कम पड़ गई। औरत के जिस्म में झटके लग रहे थे और फिर वो एकदम से निढाल सी हो कर शांत हो गई। इधर मैं अभी झड़ा नहीं था इस लिए उसके शांत पड़ते ही मैं फिर से धक्के लगाने ही लगा था कि तभी उसने अपनी टांगों से मेरी कमर को जकड़ कर मुझे रुक जाने का इशारा किया तो मैं रुक गया।

क़रीब दो मिनट बाद उसने मुझे उसकी चूत से लंड निकालने के लिए कहा तो मैंने मन को मार कर अपना लंड निकाल लिया। जैसे ही मैंने लंड निकाला तो वो जल्दी से उठी और मुझे टटोल कर बेड पर गिराया और फिर टटोलते हुए ही मेरे लंड को पकड़ कर उसने जल्दी से उसे अपने मुँह में भर लिया। अपने ही कामरस में नहाए मेरे लंड को वो ऐसे चूसने लगी थी जैसे उसका स्वाद उसे कितना मीठा लग रहा हो।

"कम आन डियर।" मुँह से मेरा लंड निकालने के बाद उसने घोड़ी बन कर मुझसे कहा____"नाउ पुट योर काक इन माई पुसी फ्राम बिहाइंड एण्ड फक मी। यू फक रियली वेल डियर। योर काक इज रियली ऑवसम।"

उसकी बात सुन कर मैं मुस्कुरा उठा और फिर जल्दी से उसके पीछे आ कर मैंने पीछे से उसकी चूत में अपना लंड डाल दिया। लंड जैसे ही उसकी चूत में घुसा तो उसके मुँह से मज़े में डूबी सिसकी निकल गई। इधर मैं उसकी कमर को पकडे तेज़ तेज़ धक्के लगाने लगा था। एक बार फिर से कमरे में उसकी चीखें गूंजने लगीं थी। वो मेरे हर धक्के पर अपनी गांड को पीछे कर देती थी जिससे हम दोनों का ही रिदम मेल खा रहा था। मुझे इतना मज़ा आ रहा था कि जल्दी ही मैं फिर से मज़े में डूब गया। उसकी कमर को पकड़े मैं ताबड़तोड़ धक्के लगा रहा था। सहसा मेरी नज़र उसके भारी लेकिन गोरे गोरे चूतड़ों पर पड़ी तो मैंने ज़ोर से उस पर थप्पड़ मारा जिससे वो औरत उछल गई और साथ ही उसके मुख से कराह निकल गई। वो जितना चिल्ला रही थी उतना ही मुझे जोश चढ़ रहा था और मैं उसी जोश में पूरी ताकत से धक्के लगा रहा था।

कुछ ही देर में वो औरत बुरी तरह चीखते हुए कहने लगी कि आई एम कमिंग डियर, फ़क मी हार्ड। मेरा खुद का भी काम तमाम होने वाला था इस लिए मैं पूरी स्पीड में धक्के लगा रहा था। पहले वो औरत झड़ी और फिर जब मैं झड़ने वाला हुआ तो उस औरत ने फ़ौरन ही मुझसे कहा कि मैं उसकी चूत में न झड़ूं बल्कि उसके मुँह में झड़ूं ताकि वो मेरा कामरस पी सके।

मैंने जल्दी से लंड निकाला तो वो औरत बेड पर घुटने के बल खड़ी हो गई और अपना मुँह खोल दिया। उसके खुले मुँह को देख कर मैंने फ़ौरन ही उसके मुँह में अपने लंड का टोपा छुआया तो उसने जल्दी से मेरे लंड को पकड़ कर उसे मुँह में भर लिया और फिर दबा दबा के उसे चूसने लगी। मैं इस वक़्त इतने जोश में था कि उसके सिर को पकड़ लिया और फिर उसके मुँह को चोदने लगा। अभी एक मिनट भी न हुआ था कि औरत ने ज़ोर दे कर अपने मुँह से मेरा लंड निकाला और उसे चाटते हुए नीचे मेरी गोटियों पर पहुंच गई। जब उसने मेरी गोटियों को मुँह में भर कर चूसा तो मुझे झटका सा लगा। माया कोमल या तबस्सुम ने मेरे साथ ऐसा नहीं किया था। शायद यही वजह थी कि जब उस औरत ने ऐसा किया तो मुझे झटका लगा था और मुझे आश्चर्य भी हुआ था। ख़ैर जो भी हो पर उसके द्वारा ऐसा करने से मुझे एक अलग ही मज़ा आने लगा था।

कुछ देर मेरी गोटियों को चूसने के बाद उसने फिर से मेरे लंड को मुँह में भर लिया और ज़ोर ज़ोर से चूसने लगी। मैं इतने मज़े में था कि जल्दी ही मेरे मुख से असहनीय वाली सिसकियां निकलने लगीं। उस औरत को भी जैसे पता चल गया था इस लिए वो और ज़ोर ज़ोर से मेरे लंड को दबा दबा कर चूसने लगी थी। दो मिनट के अंदर ही मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे जिस्म में मज़े का ज्वालामुखी फूट पड़ा हो। मेरा पूरा बदन ऐंठ गया और फिर जैसे ही मेरे लंड से पिचकारी निकल कर उसके मुँह के अंदर गई तो मेरी आह निकल गई। एक के बाद एक झटके लगे मुझे और फिर मैं जैसे बेजान सा हो गया था। उधर उस औरत ने मेरे लंड से पानी का एक एक कटरा निचोड़ लिया था।

"ओह! वण्डरफुल डियर।" कुछ देर बाद उसने कहा____"आई रियली एंज्वॉइड हैविंग सेक्स विद यू। इट्स नेवर बीन एज फन एज टुडे। दि हेयर ऑफ माय ब्वाडी इज स्टिल इमेर्स्ड इन दि फीलिंग ऑफ दिस फन। इफ आई हैड मोर टाइम, आई वुड हैव फन विद यू वन मोर टाइम।"

कुछ देर आराम करने के बाद मैं बेड से उठा और अपने लंड को बेड की चादर में ही साफ़ किया। उसके बाद मैंने उस औरत की आँखों से पट्टी खोल कर उस पट्टी को अपनी पोशाक में डाल लिया। पट्टी हटने के बाद उस औरत ने मेरी तरफ देखा। जब उसकी आँखें अच्छी तरह देखने लायक हुईं तो वो मुस्कुराते हुए नंगी ही बेड से उतर कर मेरे पास आई और मेरे चेहरे को पकड़ कर उसने मेरे होठो को प्यार से चूम लिया। उसने मुझे इसके लिए थैंक्स कहा तो मैंने सिर हिला दिया।

औरत के साथ सेक्स कर के मुझे भी बेहद मज़ा आया था। ख़ैर उसके बाद मैं जैसे वहां पंहुचा था वैसे ही वहां से चला भी आया। जहां पर मुझे मोटर साइकिल खड़ी मिली थी वहीं पर मैंने उसे खड़ी कर दिया और अपने घर की तरफ बढ़ चला। कुछ ही समय में मैं खिड़की के रास्ते अपने कमरे में आ चुका था। कमरे में आ कर मैंने फ़ौरन ही अपने वो कपड़े उतारे क्योंकि उन कपड़ों में मुझे अब घुटन सी होने लगी थी। कपड़े उतारने के बाद मैंने सुकून की सांस ली और फिर बाथरूम में घुस गया। फ्रेश हो कर मैं बाथरूम से निकला और सबसे पहले उन कपड़ों को उसी बैग में रख कर बैग को बेड के अंदर छुपाया और फिर बेड पर आराम से लेट गया।

बेड पर लेटा अभी जो कुछ मैं कर के आया था उसके बारे में सोचने लगा। मैंने महसूस किया कि मुझे इस काम में उस औरत के साथ कोई समस्या नहीं हुई, यानी अब मैं पूरी तरह से एक मुकम्मल मर्द बन चुका था। उस औरत के चेहरे पर संतुष्टि के भाव थे और वो खुश भी थी। इसका मतलब मैं अपने कार्य में पूरी तरह सफल हुआ था। इस सबके बारे में सोच कर एक अलग ही ख़ुशी महसूस कर रहा था मैं। घर में किसी को भी ये पता नहीं चल सका था कि मैं अपने कमरे से कुछ समय के लिए गायब था और उस गायब समय में मैं क्या करने गया था? अपनी इस कामयाबी की ख़ुशी में ही जाने कब मेरी आँख लग गई और मैं नींद की आगोश में चला गया।

☆☆☆
 
अब तक....

बेड पर लेटा अभी जो कुछ मैं कर के आया था उसके बारे में सोचने लगा। मैंने महसूस किया कि मुझे इस काम में उस औरत के साथ कोई समस्या नहीं हुई, यानी अब मैं पूरी तरह से एक मुकम्मल मर्द बन चुका था। उस औरत के चेहरे पर संतुष्टि के भाव थे और वो खुश भी थी। इसका मतलब मैं अपने कार्य में पूरी तरह सफल हुआ था। इस सबके बारे में सोच कर एक अलग ही ख़ुशी महसूस कर रहा था मैं। घर में किसी को भी ये पता नहीं चल सका था कि मैं अपने कमरे से कुछ समय के लिए गायब था और उस गायब समय में मैं क्या करने गया था? अपनी इस कामयाबी की ख़ुशी में ही जाने कब मेरी आँख लग गई और मैं नींद की आगोश में चला गया।

अब आगे....

शिवकांत वागले ड्यूटी से फ़ारिग हो कर शाम को घर पहुंचा। आज उसके पास ज़्यादा काम नहीं था इस लिए उसने लगभग सारा दिन ही विक्रम सिंह की डायरी को पढ़ा था। उसके ज़हन में कई सारी बातें थी। विक्रम सिंह जिस संस्था से जुड़ा हुआ था उसके नियम कानून बड़े ही अजीब और ख़तरनाक थे। दूसरी बात जिस तरह से वो पहले मिशन पर एजेंट के रूप में सेक्स की सर्विस देने गया था उसमें उसकी राह में कई ऐसे चांस बन सकते थे जिससे लोगों की नज़र में वो आ सकता था और सबसे ख़ास बात ये कि जो कपड़े उसे पहनने के लिए मिले थे उन कपड़ों को पहने हुए किसी औरत के साथ सेक्स करने में कैसे इतना मज़ा मिल सकता था? सेक्स का असली मज़ा तो तभी मिलता है जब दोनों पार्टनर पूरी तरह नंगे हो और एक दूसरे को देख सकते हों।

वागले काफी देर तक इस बारे में सोचता रहा था उसके बाद उसने ये सोच कर इस बात को ज़हन से निकाल दिया था कि मज़ा तो महसूस करने से भी मिलता है, इस लिए संभव है कि उन दोनों ने उस चीज़ को अच्छे से फील कर के उसका आनंद प्राप्त किया हो। वैसे भी सेक्स का जो मुख्य कार्य होता है वो तो उसी तरह हुआ था न जैसे पूरी तरह नंगे होने पर भी होता है।

वागले घर पहुंचा तो सावित्री ने ही दरवाज़ा खोला था। वागले को देख कर जहां सावित्री मुस्कुराई थी वहीं वागले उसे पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर के अंदर दाखिल हो गया था। सावित्री को समझते देर नहीं लगी थी कि उसका पति शायद उससे इस लिए नाराज़ है कि उसने पिछली रात उसे गरम हालत में ही छोड़ दिया था जबकि खुद उसने पूरा मज़ा लिया था। सावित्री ने मन ही मन सोच लिया कि अगर आज रात भी उसका पति उससे वही सब करने को कहेगा तो इस बार वो किसी भी काम में संकोच या झिझक नहीं करेगी और ना ही अपने पति से उस बारे में कोई उल्टी सीधी बात करेगी।

मन में फ़ैसला कर के सावित्री कुछ ही देर में कमरे में पहुंच ग‌ई। उसके दोनों बच्चे इस वक़्त घर पर नहीं थे इस लिए उसे फिलहाल किसी बात की फ़िक्र नहीं थी। कमरे में पहुंच कर उसने देखा कि वागले बाथरूम में है। उसने सोचा कि जब तक उसका पति बाथरूम में फ्रेश होता है तब तक वो उसके लिए गरमा गरम चाय बना कर ले आती है। ये सोच कर वो फ़ौरन ही किचेन की तरफ बढ़ गई।

जब वो चाय ले कर दुबारा कमरे में पहुंची तो देखा वागले कुर्ता पजामा पहन चुका था और अब वो कमरे से बाहर ही निकलने वाला था। सावित्री को चाय लिए आया देख उसने एक नज़र उस पर डाली और बिना कुछ कहे उसने ट्रे से चाय का कप उठा लिया।

"क्या नाराज़ हैं मुझसे?" सावित्री ने धीरे से उससे पूछा। वागले ने एक नज़र उसकी तरफ देखा और बेड पर बैठ गया।

"बेशक़ आप मुझसे नाराज़ ही होंगे।" सावित्री ने अपना कप लेने के बाद ट्रे को वहीं एक तरफ रखते हुए कहा____"आख़िर मैंने एक बार फिर से आपका दिल जो दुखा दिया है, लेकिन यकीन मानिए उस वक़्त मुझे वो सब बहुत ही अजीब और गन्दा सा लगा था इस लिए मैंने आपसे वो सब कह दिया था।"

"क्या तुम सफाई दे कर ये साबित करना चाहती हो कि तुमने जो किया वो ठीक था?" वागले ने सपाट लहजे में कहा____"जबकि सच तो ये है कि जब तक तुम्हारे अंदर की गर्मी बाहर नहीं निकल गई तब तक तुम्हें भी उस सब में मज़ा ही आ रहा था और इतना ही नहीं खुद अपने हाथों से मेरे सिर को अपनी टांगों के बीच दबाए जा रही थी। उस वक़्त तो तुम्हें वो सब ग़लत या गन्दा नहीं लग रहा था और फिर जैसे ही तुम्हारा मतलब पूरा हो गया तो तुम्हें वही सब ग़लत और गन्दा लगने लगा, है ना?"

वागले की इन बातों पर सावित्री कुछ बोल न सकी। बस शर्म से उसकी नज़रें झुकती चली गईं थी। हालांकि वो ये मान चुकी थी कि उसके पति ने जो कुछ कहा था वो सच ही था। ऐसा ही तो हुआ था पिछली रात। उसे अच्छे से याद था कि कैसे वो अपने पति के सिर को दोनों हाथों से थामे अपनी चूत पर दबा रही थी और चाहती थी कि उसका पति उसकी चूत को अपनी जीभ से चाटता ही रहे।

"ख़ैर जाने दो।" वागले ने उसके झुके हुए चेहरे की तरफ देखते हुए कहा____"तुमने भले ही वो सब कर के मेरा दिल दुखाया है लेकिन मैं तुमसे नाराज़ नहीं हूं। जानती हो क्यों? क्योंकि एक तो मैं तुमसे बेहद प्यार करता हूं दूसरे मैं समझता हूं कि पहली बार में ऐसा करना तुम्हारे लिए आसान नहीं रहा होगा।"

"क्या सच में आप मुझसे नाराज़ नहीं हैं?" वागले की बात सुन कर सावित्री ने झटके से सिर उठा कर उसकी तरफ देखते हुए उससे पूछा था, जिस पर वागले ने कहा____"हां, लेकिन अगर आज रात भी तुमने वैसा किया तो मैं सच में तुमसे नाराज़ हो जाऊंगा और इतना ज़्यादा नाराज़ हो जाऊंगा कि इस बार तुम्हारे लाख माफ़ी मांगने पर भी तुमसे बात नहीं करुंगा।"

"आज मैं आपको शिकायत का कोई मौका नहीं दूंगी।" सावित्री ने हल्के मुस्कुराते हुए कहा____"चाहे मुझे जितना भी गन्दा लगे लेकिन मैं वो सब करुँगी जिससे आपको वैसा ही आनंद मिल सके जैसा आनंद और सुख कल आपने मुझे दिया था।"

"अच्छा ऐसा क्या?" वागले मन ही मन खुश होते हुए बोला____"अगर ये सच है तो चलो इसका सबूत भी दो।"

"सबूत??" सावित्री ने चौंकते हुए उसकी तरफ देखा____"कैसा सबूत?"

"मेरे पास आ कर।" वागले ने कहा____"मेरे होठों को वैसे ही अपने मुँह में भर कर चूसो जैसे कल मैं तुम्हारे होठों को चूस रहा था।"

"हाय राम!" सावित्री एकदम से लजा गई____"ये क्या कह रहे हैं आप? बच्चों के आने का वक़्त हो रहा है। अगर उन्होंने खुले दरवाज़े से मुझे ऐसा करते हुए देख लिया तो मैं कैसे उन्हें अपना मुँह दिखा पाऊंगी?"

"इसका मतलब तो यही हुआ न।" वागले ने नाराज़गी अख़्तियार करते हुए कहा____"कि तुमने अभी भी इस सबके लिए अपने अंदर एक दुविधा सी पाल रखी है? अगर तुम इस सबके लिए पूरी तरह से तैयार होती तो मेरे एक बार के कहने पर झट से वो करने लगती जो मैं कहता।"

वागले की बात सुन कर सावित्री ने चाय के कप को एक तरफ रखा और वागले की तरफ तेज़ी से बढ़ी। वागले उसी की तरफ देख रहा था। उसे अपनी तरफ आता देख पहले तो उसे समझ न आया लेकिन जल्द ही उसे समझ आ गया। इधर सावित्री वागले के क़रीब पहुंची और उसने झुक कर वागले के चेहरे को अपने हाथों से पकड़ लिया। कुछ पलों तक उसने वागले की आँखों में देखा और फिर आँखें बंद कर के उसने वागले के होठों पर अपने होठ रख दिए। उसका जिस्म अजीब तरह से कांपने लगा था लेकिन वो रुकी नहीं। जैसे वो सच में साबित कर देना चाहती थी कि उसके अंदर अब किसी भी तरह की कोई दुविधा जैसी बात नहीं है। पहले उसने वागले के होठों को दो तीन बार बड़े ही आहिस्ता से चूमा और फिर उसने उसके होठों को अपने मुँह में भर कर चूसना शुरू कर दिया। उसके जिस्म में एक सनसनी सी फैलने लगी थी जिसके प्रभाव से उसके अंदर एक अजीब सा नशा चढ़ने लगा था। उधर वागले उसकी इस क्रिया से बेहद खुश हो गया था। इधर सावित्री कुछ देर तक उसके होठों को चूमती चूसती रही और फिर उसने उसके होठों को आज़ाद कर दिया।

"अब मिल गया न आपको सबूत?" सावित्री ने आँखें खोल कर उसकी तरफ देखते हुए पूछा था। उसके चेहरे पर शर्म की लाली छा गई थी जिसे देख कर वागले मुस्कुरा उठा था।

"अभी तो ये आधा सबूत दिया है तुमने।" फिर वागले ने उसकी आँखों में झांकते हुए कहा____"इसके आगे का आधा सबूत तुम्हें आज रात में तब देना होगा जब हम प्रेम का कार्यक्रम शुरू करेंगे।"

"ठीक है।" सावित्री ने मुस्कुराते हुए कहा____"आज मैं भी आपको खुश कर के ही दम लूंगी। वैसे ये बताइए कि अचानक से ये सब करने का विचार कैसे आ गया है आपके मन में?"

"अगर तुम इस बारे में जानना ही चाहती हो।" वागले ने कहा____"तो मैं तुम्हें इसका राज़ भी बता दूंगा लेकिन उससे पहले तुम्हें मुझे वैसे ही खुश रखना होगा जैसे मैंने तुम्हें कल रात खुश किया था।"
 
वागले की बात सुन कर सावित्री ख़ामोशी से देखती रह गई थी उसकी तरफ। उसके चेहरे पर अभी भी मुस्कान उभरी हुई थी। ख़ैर उसके बाद सावित्री रात का खाना बनाने के लिए किचेन की तरफ चली गई थी। उसके जाने के बाद वागले ये सोच कर मुस्कुरा उठा था कि आज रात उसकी बीवी सावित्री उसे भी वैसा ही मज़ा देगी जैसा डायरी में विक्रम सिंह को माया, कोमल और तबस्सुम ने दिया था। मन में तरह तरह के ख़याल बुनते हुए वो चाय पीने के बाद कमरे से बाहर निकल गया।

रात में सबके साथ डिनर करने के बाद वागले अपने कमरे में आ गया था। बेड पर लेटा वो सावित्री के आने का इंतज़ार कर रहा था। उधर सावित्री किचेन में जूठे बर्तन धो रही थी। उसके मन में भी ये बातें चल रही थी कि उसने अपने पति से तो कह दिया था कि आज वो उसे खुश करेगी लेकिन अब उसे खुद ही समझ में नहीं आ रहा था कि वो सब कुछ कैसे कर पाएगी? उसने जीवन में ऐसा काम कभी नहीं किया था और ना ही ऐसा करने के बारे में कभी सोचा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसके पति को अचानक से इस तरह से सेक्स करने का ख़याल कहां से आ गया था?

सारे कामों से फुर्सत होने के बाद सावित्री कमरे में आई और उसने दरवाज़े को अंदर से कुण्डी लगा कर बंद कर दिया। पलट कर देखा तो अपने पति को बेड पर लेटे हुए अपनी तरफ ही देखता पाया। उसे इस तरह देखता देख उसके मन में ख़याल उभरा कि इन्हें अब तक नींद नहीं आई?

"आप अभी तक जाग रहे हैं?" फिर उसने बेड की तरफ बढ़ते हुए मुस्कुरा कर पूछा____"मुझे तो लगा था आप सो गए होंगे।"

"ऐसे कैसे सो जाता मेरी जान?" सावित्री जैसे ही बेड के क़रीब पहुंची तो वागले ने उसका हाथ पकड़ कर उसे अपनी तरफ खींचते हुए कहा____"जिसकी ख़ूबसूरत बीवी अपने पति को खुश करने के लिए आने वाली हो वो कैसे अपनी पलकें बंद कर सकता था भला?"

सावित्री अपने पति के द्वारा खींच लिए जाने पर उसके ऊपर जा लेटी थी जिससे उसकी बड़ी बड़ी छातियां वागले के सीने में धंस गईं थी। वागले को तो मज़ा आ गया था लेकिन सावित्री के मुख से आह निकल गई थी। उसने मुस्कुरा कर वागले की तरफ देखा था, जबकि वागले ने उसके चेहरे को पकड़ कर फ़ौरन ही उसके होठों को अपने मुँह में भर लिया था।

वागले सावित्री के होठों को ऐसे चूसने लगा था जैसे उसे उसके होठों से शहद और शराब दोनों का ही स्वाद मिल रहा था। इधर सावित्री के जिस्म में उसके इस तरह से अपने होठ चूसने पर एकदम से झुरझुरी होने लगी थी। उसे ऐसा लगने लगा जैसे उसके जिस्म में अचानक ही एक तरह का नशा चढ़ने लगा था जिसके असर से वो मदहोश होने लगी थी। उधर वागले उसके होठों को मुँह में भरे ही उसे पलटा कर बेड पर लेटाया और उसके ऊपर आ कर एक हाथ से उसकी छाती को ज़ोर ज़ोर से दबाने लगा। सावित्री एकदम से मचल उठी।

"आहहह थोड़ी देर रुक जाइए न।" सावित्री ने अपने होठों को उसके होठों से आज़ाद करते हुए कहा____"मुझे कपड़े तो बदल लेने दीजिए। उसके बाद जो मन करे वो कर लीजिएगा।"

"अरे! कपड़े बदलने की क्या ज़रूरत है जानेमन?" वागले ने ब्लाउज के ऊपर से ही सावित्री की छाती के निप्पल को मुँह में भर कर ज़ोर से खींचते हुए कहा____"कुछ देर में तो वैसे भी तुम पूरी तरह नंगी हो जाओगी।"

"आहहह शश्श्।" सावित्री ने ज़ोर की सिसकी लेते हुए कहा____"थोड़ा आराम से कीजिए न। आप तो ऐसे खींच रहे हैं जैसे वो रबर हों।"

"मेरी मर्ज़ी है मैं जैसे चाहूं खीचूं।" वागले ने कहने के साथ ही एक बार फिर से सावित्री के उस निप्पल को मुँह में भर ज़ोर से खींचा जिससे सावित्री की सिसकी निकल गई, जबकि वागले ने कहा____"मेरा मन करता है कि मैं तुम्हारे जिस्म के हर अंग को खा जाऊं।"

"हे भगवान!" सावित्री ने मुस्कुराते हुए कहा____"आख़िर क्या हो गया है आपको? इस तरह का प्यार और इस तरह का जोश इसके पहले तो कभी नहीं दिखा था आप में।"

"पहले की बात छोड़ो मेरी जान।" वागले ने कहा____"ये समझो कि इसके पहले मैं इन मामलों में थोड़ा नासमझ और अनाड़ी टाइप का था लेकिन अब इस मामले में एकदम से परफेक्ट बन जाना चाहता हूं। थोड़ी उमर बढ़ गई है तो क्या हुआ, दिल और मन की इच्छाएं तो अभी भी जवान हैं ना?"

इससे पहले कि सावित्री अपने पति की इन बातों का कोई जवाब देती वागले ने फ़ौरन ही उसके होठों को मुँह में भर लिया था। वागले में अचानक से जैसे पागलपन सवार हो गया था। वो जितनी तेज़ी से सावित्री के होठों को चूस रहा था उतनी ही तेज़ी से उसकी बड़ी बड़ी छातियों को भी मसलता जा रहा था। कुछ ही देर में सावित्री बिन पानी के मछली की तरह मचलने लगी थी। अपने दोनों हाथों से उसने वागले के सिर को पकड़ लिया था और खुद भी उसके होठों को चूमने चूसने लगी थी। शायद इसी दौरान उसने मन ही मन फ़ैसला कर लिया था कि अब वो भी पीछे नहीं हटेगी।

कुछ देर तक दोनों ही एक दूसरे के होठों का रस पीते रहे उसके बाद दोनों अलग हो गए। दोनों की ही साँसें चढ़ गईं थी और जिस्म में गर्मी भर गई थी। वागले ने फ़ौरन ही सावित्री को नंगा करना शुरू कर दिया। वो एक एक कर के उसके सारे कपड़े उतार रहा था। जल्दी ही सावित्री पूरी तरह नंगी हो गई और जैसे ही उसे अपने नंगेपन का एहसास हुआ तो उसने दोनों हाथों से अपने बदन को छुपाने की नाकाम कोशिश की। इधर वागले उसकी इस क्रिया से मुस्कुराया और खुद भी तेज़ी से अपने कपड़े उतार कर पूरी तरह नंगा हो गया।

लाइट की तेज़ रौशनी में सावित्री का ख़ूबसूरत बदन जैसे एक अलग ही अंदाज़ में चमक रहा था। वागले से रहा न गया तो उसने सावित्री की बड़ी बड़ी छातियों में अपना चेहरा घुसा दिया और दोनों हाथों से उसकी छातियों को पकड़ कर अपने चेहरे पर दबाने लगा। सावित्री के मुख से सिसकारियां फूटने लगीं और उसने वागले के सिर को पकड़ अपनी छातियों पर दबाना शुरू कर दिया। वागले ने बारी बारी से सावित्री की दोनों छातियों को मुँह में भर कर चूसा और फिर नीचे सरकते हुए जल्दी ही वो सावित्री की चिकनी चूत पर आ गया।

एक नज़र गौर से उसने सावित्री की चिकनी चूत को देखा और फिर एक हाथ से उसे सहलाया तो सावित्री का जिस्म मचल उठा और उसने अपनी टांगों को सिकोड़ने की कोशिश लेकिन वागले जैसे पहले से ही तैयार बैठा था। उसने फ़ौरन ही सावित्री की दोनों टांगों को पकड़ कर फैलाया और झुक कर उसकी चूत में अपना मुँह दे दिया। वागले ने उसकी चूत पर ज़ोर से चुम्बन लिया तो सावित्री बुरी तरह से मचलते हुए अपनी टांगों को सिकोड़ लिया जिससे वागले का सिर उसकी टांगों के बीच फंस गया। उधर वागले उसकी चूत को चूमने के बाद अपनी जीभ से उसे चाटना शुरू कर दिया था। सावित्री का थोड़ी ही देर में बुरा हाल हो गया अपने दोनों हाथों से उसने वागले के सिर को पकड़ा और अपनी चूत पर ज़ोर से दबाना शुरू कर दिया।

वागले द्वारा चूत चुसाई किए जाने पर सावित्री पूरी तरह मस्ती में आ गई थी। उसकी आहें उसकी सिसकारियां कमरे में गूंजने लगीं थी जिसे वो बड़ी मुश्किल से रोकने की कोशिश कर रही थी। अपने होठों को दांतों तले दबा कर और मुट्ठियों को कस कर वो मानो वागले के सिर के बालों को खींच लेना चाहती थी। कुछ ही देर में उसके जिस्म को झटके लगने लगे और वो बुरी तरह आहें भरते हुए झड़ने लगी थी। झड़ते वक़्त उसने वागले के सिर को अपनी टांगों में बुरी तरह दबा लिया था। वागले उसकी चूत से निकले कामरस का एक एक कतरा निगलता चला गया था।

सावित्री को जब झटके लगने बंद हुए तो वो किसी बेजान लाश की तरह शांत पड़ गई थी। कमरे में उसकी उखड़ी हुई साँसें ही गूँज रहीं थी। उधर वागले उसकी चूत से अपना चेहरा हटाने के बाद उसी की तरफ देखता जा रहा था। उसके मुँह पर अभी भी सावित्री का कामरस लगा हुआ था। कुछ सोच कर वो मुस्कुराया और आगे बढ़ कर आँखें बंद किए पड़ी सावित्री के होठों को मुँह में भर लिया। सावित्री के जिस्म में झटका सा लगा लेकिन उसने अपने होठों को उससे छुड़ाने की कोशिश नहीं की।

"मेरे मुँह के आस पास लगे अपनी चूत से निकले इस कामरस को चाटो मेरी जान।" वागले ने उसके होठों को आज़ाद कर के कहा तो सावित्री ने बड़ी मुश्किल से अपनी आँखें खोल कर उसकी तरफ देखा। आँखों में अभी भी सुर्खी छाई हुई थी। वागले को कुछ पल देखने के बाद वो हल्के से मुस्कुराई और अपनी जीभ को बाहर निकाल दिया। वागले ये देख कर मुस्कुराया और अपने चेहरे को उसकी जीभ के पास कर दिया। सावित्री ने धीरे धीरे अपनी जीभ से उसके मुँह के आस पास लगे अपने ही कामरस को चाटना शुरू कर दिया। उसके चेहरे पर बड़े अजीब से भाव उभर आए थे लेकिन उसने चाटना बंद नहीं किया।

"कैसा लगा जानेमन?" सावित्री ने जब सारा कामरस चाट लिया तो वागले ने मुस्कुराते हुए पूछा उससे, जिस पर सावित्री ने शर्मा कर अपना चेहरा दूसरी तरफ फेर लिया और फिर कहा_____"आप बहुत गंदे हैं।"

"अच्छा जी अब मैं गन्दा हो गया?" वागले हल्के से हंसते हुए बोला____"और अभी जब मज़े से अपनी चूत मुझसे चुसवा रही थी तब ये नहीं सोचा कि वो गन्दा हो सकता है?"

"हां तो मैंने ये तो नहीं कहा था कि आप मेरे वहां पर इस तरह से मुँह लगाइए।" सावित्री ने दूसरी तरफ चेहरा किए हुए ही कहा____"आप खुद ही ऐसा कर रहे थे तो मैं क्या करूं?"

"हां मैं अपनी मर्ज़ी से ही वो सब कर रहा था।" वागले ने उसके चेहरे को सीधा कर के उसकी तरफ देखते हुए कहा____"और मेरा मन करता है की एक बार फिर से मैं तुम्हारी चूत का मीठा मीठा रस पीने लगूं।"

"छी।" सावित्री ने बुरा सा मुँह बनाया____"सच में बहुत गंदे हैं आप। मुझे यकीन नहीं हो रहा कि मेरे पतिदेव जो इतने शरीफ़ थे वो इस तरह के गंदे काम करने लगे हैं।"

"यकीन तो करना ही पड़ेगा मेरी जान।" वागले ने सावित्री के सुर्ख होठों पर अपनी ऊँगली फिराते हुए कहा____"क्योंकि अब से तुम्हारा पति ऐसे ही गंदे काम करेगा और तुम्हें खुद भी उसके साथ सारे गंदे काम करने पडेंगे।"

"मैं आपकी तरह गन्दी नहीं हूं।" सावित्री ने मुस्कुराते हुए कहा____"और ना ही मैं आपकी तरह ऐसे गंदे काम करुंगी।"

"सोच लो।" वागले ने उसकी आँखों में देखा____"अगर तुमने इस बार मुझे अधूरा छोड़ कर इस तरह से मेरा दिल दुखाया तो इसका अंजाम अच्छा नहीं होगा।"

"आप तो नाराज़ हो गए लगता है।" सावित्री ने मुस्कुराते हुए कहा____"जबकि मैं तो आपको छेड़ रही थी।"

"छेड़ना ही है।" वागले ने अपने अकड़े हुए लंड की तरफ इशारा करते हुए कहा____"तो इसे छेड़ो मेरी जान। जो करना है इसके साथ करो, लेकिन कुछ इस तरीके से कि हम दोनों को ही मज़ा आए। चलो अब उठो, मैं अब और बरदास्त नहीं कर सकता।"

कहने के साथ ही वागले ने सावित्री को पकड़ कर उठाया। सावित्री का नशा क्योंकि उतर चुका था इस लिए अब उसे इस सब में शर्म आने लगी थी लेकिन वो जानती थी कि अगर उसने आज भी कल की तरह अपने पति को अधूरा छोड़ा तो इस बार उसके लिए सच में अच्छा नहीं होगा। ये सोच कर वो उठ गई और वागले के खड़े हुए लंड की तरफ देखने लगी। चेहरे पर शर्म की लाली लिए वो कुछ पलों तक उसके लंड को देखती रही फिर उसने धीरे से अपना हाथ बढ़ा कर उसके लंड को पकड़ लिया। जैसे ही उसके कोमल हाथों ने लंड को पकड़ा तो वागले के जिस्म में झुरझुरी सी दौड़ गई।

☆☆☆
 
अब तक....

कहने के साथ ही वागले ने सावित्री को पकड़ कर उठाया। सावित्री का नशा क्योंकि उतर चुका था इस लिए अब उसे इस सब में शर्म आने लगी थी लेकिन वो जानती थी कि अगर उसने आज भी कल की तरह अपने पति को अधूरा छोड़ा तो इस बार उसके लिए सच में अच्छा नहीं होगा। ये सोच कर वो उठ गई और वागले के खड़े हुए लंड की तरफ देखने लगी। चेहरे पर शर्म की लाली लिए वो कुछ पलों तक उसके लंड को देखती रही फिर उसने धीरे से अपना हाथ बढ़ा कर उसके लंड को पकड़ लिया। जैसे ही उसके कोमल हाथों ने लंड को पकड़ा तो वागले के जिस्म में झुरझुरी सी दौड़ गई।

☆☆☆

अब आगे.....

"तुम्हारे कोमल हाथों की छुअन से ही जब मुझे मज़ा आ गया है।" वागले ने आह भरते हुए धीरे सेकहा____"तो जब तुम इसे अपने मुँह में ले कर चूसोगी तो कितना मज़ा आएगा। अब तो तुम्हें भी यकीन आ ही गया होगा कि इस तरह से चुदाई करने में कितना मज़ा आता है।"

"उफ्फ! कुछ तो शर्म कीजिए।" सावित्री ने वागले की तरफ देख कर बुरा सा मुँह बनाया था____"कितना गन्दा शब्द बोल रहे हैं आप।"

"शर्म करूंगा तो इस तरह से मज़ा कैसे ले पाओगी मेरी जान?" वागले ने एक हाथ से सावित्री की चूची को मसल कर कहा____"मेरी बात मानों तो तुम भी इस मामले में शर्मो हया छोड़ दो और खुल कर इस सबका मज़ा लो। चुदाई के समय खुल कर ऐसे शब्दों को बोलो और खुल कर हर चीज़ का मज़ा लो, फिर देखो कैसे तुम्हें एक अलग ही मज़ा आएगा।"

वागले की बात सुन कर सावित्री ने कुछ पलों तक उसकी तरफ देखा और फिर मुस्कुराते हुए सिर झुका कर उसके अकड़े हुए लंड को देखने लगी। वागले का लंड उसकी मुट्ठी में क़ैद था जिसे वो हल्के हल्के सहला रही थी। उसने महसूस किया कि ऐसा करने से उसके अंदर एक अजीब सी सनसनी होने लगी थी।

"अब सहलाती ही रहोगी या उसे अपने मुँह में भर कर चूसोगी भी?" वागले ने कहा____"अब देर न करो डियर। इस सबके बाद हमें सोना भी है।"

""मुझे बड़ा अजीब सा लग रहा है।" सावित्री ने नज़र उठा कर उससे कहा____"मन में अजीब अजीब से ख़याल आ रहे हैं।"

"अपने मन के ख़यालों को निकाल कर बाहर फेंक दो यार।" वागले ने झल्लाते हुए कहा____"कितना नाटक करती हो तुम। अभी अगर मैं फिर से तुम्हारी चूत को मुँह में भर कर चूसने लगूं तो तुम्हारे मन में ऐसे कोई ख़याल नहीं आएंगे, बल्कि तब तो तुम्हें ऐसा मज़ा आने लगेगा कि अपने हाथों से मेरे सिर को अपनी चूत पर ही दबाती चली जाओगी। हद है यार।"

"मैं कोशिश कर रही हूं ना।" सावित्री ने धीमें स्वर में कहा____"आप नाराज़ क्यों हो रहे हैं?"

"नाराज़ न होऊं तो क्या करूं?" वागले ने इस बार सच में नाराज़ लहजे में कहा____"कल भी मैंने तुम्हें खुश किया था और तुमने मुझे अधूरा छोड़ दिया था और आज भी तुम वही कर रही हो। इसके पहले तो बहुत बड़ी बड़ी बातें और वादे कर रही थी, अब क्या हुआ? देखो अगर तुम्हें यही करना है तो छोड़ दो। तुम्हारे बस का कुछ नहीं है।"

कहने के साथ ही वागले पीछे हट गया जिससे सावित्री के हाथ से उसका लंड छूट गया। उधर उसकी बातों के बाद इस तरह पीछे हटते ही सावित्री बुरी तरह बौखला गई। वो समझ गई कि वागले उसके क्रिया कलापों से अब नाराज़ हो गया है इस लिए उसने फ़ौरन ही उसे मना लेने का सोचा।

"रूक जाइए न।" सावित्री ने मासूम सा चेहरा बनाते हुए कहा____"मैं सब कुछ करने को तैयार हूं। आप प्लीज नाराज़ मत होइए।"

"ये बातें मैं कई बार तुम्हारे मुँह से सुन चुका हूं।" वागले ने कहा____"तुम सिर्फ कहती हो और जब करने की बारी आती है तो मुकर जाती हो। अब अगर मैं ये कहूं कि ऐसे इंसान को धोखेबाज़ और बेवफ़ा कहते हैं तो क्या कहोगी तुम?"

"मैं मानती हूं कि मैंने अब तक जो कहा है वो किया नहीं है।" सावित्री खिसक कर उसके पास आते हुए बोली____"लेकिन आप भी तो समझिए कि जिन चीज़ों के बारे में मैंने कभी कल्पना तक न की हो और जिन चीज़ों को मैं बेहद गन्दा समझती हूं वो सब चीज़ें इस तरह अचानक से करना मेरे लिए कितना मुश्किल होगा।"

"तो क्या ये सब चीज़ें मैं सारी ज़िन्दगी करता आया हूं?" वागले ने नाराज़ लहजे में कहा____"मेरे लिए भी तो ये सब पहली बार ही है लेकिन मेरे लिए तो ये सब ज़रा भी मुश्किल नहीं रहा। सच तो ये है कि तुम मेरे साथ वो सब करके मुझे ख़ुशी ही नहीं देना चाहती।"

"ऐसी बात नहीं है।" सावित्री ने बेबस भाव से कहा____"भला मैं ये कैसे चाह सकती हूं कि मुझे इतना प्यार करने वाले मेरे पति मेरे किसी कार्य से खुश न हों? अच्छा अब नाराज़गी छोड़िए और आइए मैं अब ज़रा भी देर नहीं करुँगी वो सब करने में।"

सावित्री की बात सुन कर वागले उसके चेहरे को इस तरह देखने लगा था जैसे परख रहा हो कि वो सच कह रही है या अभी भी वो उसे झूठी तसल्ली दे रही है। वागले को इस तरह अपनी तरफ देखता देख सावित्री थोड़ा और उसकी तरफ खिसकी और फिर सिर झुका कर उसके लंड की तरफ देखा जो अब शांत पड़ गया था। सावित्री ने हाथ आगे बढ़ा कर वागले के लंड को पकड़ लिया और धीरे धीरे सहलाने लगी। वागले के जिस्म में झुरझुरी होने लगी और कुछ ही देर में उसका लंड अपना अकार बढ़ने लगा।

वागले का लंड जैसे जैसे अपना अकार बढ़ा रहा था वैसे वैसे उस पर सावित्री की पकड़ मजबूत होती जा रही थी। उसने नज़र उठा कर वागले की तरफ देखा तो उसे मज़े में आँखें बंद किए पाया। सावित्री की नज़र वापस वागले के लंड पर पड़ी। वो गौर से उसे देखने लगी थी। वागले का लंड अब अपने पूरे अकार में आ चुका था जो कि सावित्री की पूरी मुट्ठी में अब फिट बैठ रहा था। सावित्री ने एक बार फिर से वागले की तरफ देखा और जब उसे आँखें बंद किए ही पाया तो वो जल्दी से नीचे झुकी और अपनी आँखें बंद कर के वागले के लंड को मुँह खोल कर अंदर भर लिया।

"आह्ह्ह् शसषशशश्।" सावित्री के मुँह की गर्माहट जैसे ही लंड पर पड़ी तो वागले के मुँह से सिसकी निकल गई। वो समझ गया कि उसकी बीवी ने उसके लंड को अपने मुँह में भर लिया है। उधर सावित्री उसके लंड के टोपे को मुँह में भर कर अपने सिर को धीरे धीरे ऊपर नीचे करने लगी थी जिससे उसके गुलाब की पंखुड़ियों जैसे होंठ वागले के लंड पर घर्षण करने लगे थे। वागले के जिस्म में एकदम से आनंद की लहरें उठने लगीं थी। उसने एक हाथ से सावित्री के सिर को थाम लिया था।

सावित्री कुछ देर तक धीरे धीरे ही वागले के लंड को चूस रही थी किन्तु फिर उसकी रफ़्तार तेज़ होने लगी और साथ ही वो उसके लंड को और भी ज़्यादा अपने मुँह में भरने की कोशिश करने लगी। सावित्री ने शुरू में अपनी आँखों को कस कर बंद किया हुआ था लेकिन अब वो नार्मल दिख रही थी। शायद अब उसने खुद को इसके लिए तैयार कर लिया था या फिर उसे ऐसा करने में गन्दगी महसूस नहीं हो रही थी।

वागले तो मज़े के सातवें आसमान में था। सावित्री अब अपनी आँखें खोल कर उसके लंड को चूस रही थी और नज़र उठा कर वागले को भी देख लेती थी। वो देख रही थी कि कैसे उसका पति उसके ऐसा करने से मज़े में पहुंच चुका है और इतना ही नहीं अब वो अपनी कमर को हल्का हल्का उठा कर अपना लंड और भी ज़्यादा सावित्री के मुख में डालने की कोशिश कर रहा है।

"आह्ह्ह सावित्री मेरी जान।" वागले ने मज़े में आह भरते हुए कहा____"बहुत मज़ा आ रहा है सच में। तुम्हारे मुँह की गर्मी में मेरा लंड पिघलता जा रहा है। मन करता है कि तुम ऐसे ही मेरे लंड को चूसती रहो।"

"आपको तो मज़ा आ रहा है।" सावित्री ने उसके लंड को अपने मुँह से निकाल कर कहा____"लेकिन ऐसा करने से अब मेरा मुँह दुखने लगा है। एक काम कीजिए, आप अच्छे से बेड पर लेट जाइए। मैं भी आपको वैसे ही खुश करती हूं जैसे आपने मुझे किया था।"

"ठीक है।" वागले ने बेड पर लेटते हुए कहा____"तुम मुझे खुश करो और मेरा वादा है कि उसके बाद मैं तुम्हें इतना ज़्यादा खुश करुंगा कि तुम पूरी तरह से तृप्त हो जाओगी।"

"हां वो तो मैं जानती हूं।" सावित्री ने मुस्कुराते हुए कहा____"और अब मैं भी आपको खुश करने की पूरी कोशिश करुंगी।"

वागले बेड पर सीधा लेता हुआ था। दोनों पूरी तरह नंगे थे। लाइट की रौशनी में दोनों के ही बदन चमक रहे थे, ख़ास कर सावित्री का बदन कुछ ज़्यादा ही चमक रहा था। सावित्री ने वागले की तरफ देखा। वागले उसी को मुस्कुराते हुए देख रहा था। ये देख कर सावित्री थोड़ा शर्मा गई और फिर झुक कर उसके होठों पर अपने होठ रख दिए। कोमल और रसीले होठों को अपने होठों पर महसूस करते ही वागले को मज़ा आ गया। उसने सावित्री के सिर को थामने के लिए अपना हाथ बढ़ाया ही था कि फिर ये सोच कर वापस खींच लिया कि देखे सावित्री क्या करती है उसे खुश करने के लिए?

सावित्री हल्के हल्के वागले के होठों को चूमते हुए चूसने लगी थी। उसके खुद के जिस्म में मज़े की तरंगें उठने लगीं थी जिसके असर से वो मदहोश होने लगी थी। वागले से रहा न गया तो उसने अपने दोनों हाथ उठा कर सावित्री के नंगे लेकिन भारी चूतड़ों को थाम लिया और उन्हें मसलने लगा। सावित्री उसके द्वारा ऐसा करने पर एकदम से मचल उठी थी और होंठ चूसने की रफ़्तार बढ़ गई थी। एक हाथ से वो वागले के सिर को पकड़े थी और दूसरा हाथ नीचे ला कर वो उसके सीने को सहलाने लगी थी।

कुछ देर वागले के होठों को चूसने के बाद सावित्री ने चेहरा उठाया। उसकी साँसें भारी हो गईं थी और उसकी आँखों में एक नशा सा दिखने लगा था। वो नीचे सरकी और वागले के सीने को चूमने लगी। थोड़ी ही देर में वो चूमते हुए पेट और नाभी से होते हुए वागले के लंड की तरफ आ गई। नीचे आ जाने से वागले के हाथों से उसके भारी चूतड़ छूट गए थे। वागले के ज़हन में अचानक से कोई ख़याल उभरा तो उसने सावित्री को उसकी तरफ अपनी टाँगें कर लेने को कहा। सावित्री ने वैसा ही किया। अब सावित्री के जिस्म का निचला हिस्सा वागले की तरफ था। गोरे सफ्फाक़ जिस्म पर कहीं भी दाग नहीं था। वागले ने थोड़ा सा उठ कर दोनों हाथों से उसकी जाँघों को पकड़ा और ज़ोर दे कर सावित्री को अपने ऊपर लेटा लिया। इस पोजीशन में सावित्री का पिछवाड़ा वागले के चेहरे के पास आ गया था और सावित्री के चेहरे के पास वागले का लंड आ गया था।

सावित्री ने अपने इतने क़रीब वागले के लंड को देखा तो उसने फ़ौरन ही उसे पकड़ लिया और उसकी खाल को ऊपर नीचे करते हुए कुछ ही पलों में उसे अपने मुँह में धीरे से डाल लिया। उधर वागले उसकी टांगों को थोड़ा सा फैला कर उसकी चूत और उसके गांड के छेंद को देखने लगा था जो एकदम सफाचट और सुर्ख थी। सावित्री की चूत गीली थी और उसमें से उसका कामरस रिस रहा था। वागले ने सिर को थोड़ा सा उठाया और उसकी चूत पर अपना मुँह लगा दिया। वागले के ऐसा करते ही उसका लंड चूस रही सावित्री के जिस्म में झुरझुरी सी दौड़ गई और मज़े की तरंग में आ कर वो और ज़ोर से उसके लंड को चूसने लगी।

दोनों मियां बीवी एक दूसरे के गुप्तांगों को चूसने में लग गए थे। कुछ ही देर में आलम ये हो गया कि दोनों ही पागल कुत्तों की तरह एक दूसरे के गुप्तांगों को चाट और चूस रहे थे। सावित्री को देख कर लग ही नहीं रहा था कि ये सब वो पहली बार कर रही थी। शायद अब उसे भी इसमें मज़ा आने लगा था और अब वो पूरी तरह खुल कर इस सब में डूब चुकी थी।

वागले की चूत चुसाई से जल्दी ही सावित्री का बुरा हाल हो गया। अब वो उसका लंड नहीं चूस रही थी बल्कि मज़े में ज़ोर ज़ोर से आहें और सिसकिया भरती जा रही थी। एक हाथ से उसने अभी भी वागले के लंड को मुट्ठी में कसा हुआ था। वागले ने अपनी कमर को नीचे से ऊपर उठाया तो उसका लंड सावित्री के चेहरे से टकराया जिससे सावित्री ने लंड की तरफ देखा और उसे फिर से मुँह में भर लिया।

वागले को जब लगा कि सावित्री की चुसाई से वो कहीं झड़ ही न जाए तो उसने फ़ौरन ही सावित्री को अपने ऊपर से हटाया और उठ कर जल्दी से उसकी टांगों के बीच आ गया। दोनों हाथों से सावित्री की टांगों को फैला कर उसने अपने तमतमाए हुए लंड को सावित्री की चूत में टिकाया और एक ज़ोर का झटका दिया।

"आहहहह शशशश्श धीरे से आहह्ह्ह।" ज़ोर का झटका लगते ही सावित्री की हल्का दर्द में डूबी आह निकल गयी थी।

"ज़्यादा ज़ोर की आवाज़ मत निकालो मेरी जान।" वागले ने लंड को थोड़ा सा बाहर खींच कर फिर से धक्का लगाते हुए कहा____"वरना तुम्हारी ऐसी आवाज़ हमारे बच्चों के कानों में पहुंच जाएगी और फिर उन्हें ये समझने में ज़रा भी देर न लगेगी कि उनके माता पिता बंद कमरे में इस वक़्त क्या कर रहे हैं।"

"आह्ह्ह ठीक है मैं आवाज़ नहीं करुंगी।" सावित्री ने सिसकी लेते हुए कहा____"लेकिन आप रुकिएगा नहीं बल्कि ऐसे कीजिए कि मेरा बुरा हाल हो जाए।"

"वाह! क्या बात है मेरी जान।" वागले ने मुस्कुराते हुए कहा____"क्या सच में ऐसा ही चाहती हो तुम?"

"आह्हह्ह हाँ मैं ऐसा ही चाहती हूं।" सावित्री ने आह भरते हुए कहा____"आप ज़ोर ज़ोर से कीजिए बस।"

"क्या करूं ज़ोर ज़ोर से?" वागले ने ज़ोर का धक्का देते हुए पूछा।

"वही जो कर रहे हैं।" सावित्री ने एक नज़र वागले के चेहरे की तरफ डाल कर फिर से अपनी आँखें बंद कर ली।

"खुल कर बताओ न मेरी जान।" वागले ने कहा____"तभी तो तुम्हें चुदाई का असली मज़ा आएगा।"

"कैसे बोलूं?" सावित्री ने आँखें खोल कर वागले की तरफ देखा____"खुल कर ऐसे शब्द बोलने में मुझे शर्म आती है।"

"हद है यार।" वागले ने कहा____"अभी भी शर्म कर रही हो तुम। एक बार बोल के तो देखो।"

"आह्ह्ह् शशशश् कैसे बोलूं?" सावित्री ने सिसकी लेते हुए कहा।

"उसका जवाब दो जो मैंने पूछा था।" वागले ने कहा____"बोलो कि मेरी ज़ोर ज़ोर से चुदाई कीजिए।"

"उफ्फ!" सावित्री ने शर्मा कर अपनी गर्दन को दूसरी तरफ फेर लिया, फिर मुस्कुराते हुए कहा____"मेरी ज़ोर ज़ोर से चु...चुदा...मेरी ज़ोर ज़ोर से चुदाई कीजिए। हाए दैया ये क्या बोलवा रहे हैं आप मुझसे?"

"बहुत बढ़िया।" वागले ने ज़ोर का धक्का मारते हुए मुस्कुरा कर कहा____"अब बताओ कि मैं तुम्हारी किस तरह से चुदाई करूं?"

"जैसे कर रहे हैं।" सावित्री ने उसकी तरफ देख कर कहा____"वैसे ही कीजिए।"

"ऐसे नहीं डियर।" वागले ने अपना हाथ बढ़ा कर उसकी एक चूची को पकड़ कर ज़ोर से मसल दिया जिससे सावित्री की सिसकी निकल गई____"मैं जो भी पूछूं उसका खुल कर और नाम ले कर जवाब दो। चलो अब बताओ कि मैं कैसे तुम्हारी चुदाई करूं?"

"आह्हह्ह शश्श्श्श्।" सावित्री ने आह भरते हुए कहा____"आ...आप अपने लं...लंड से मेरी चुदाई कीजिए।"

"जो हुकुम मेरी जान।" वागले ने फिर से एक ज़ोर का धक्का मारते हुए कहा____"अच्छा ये बताओ कि इस वक़्त मेरा लंड तुम्हारी किस जगह पर घुस कर तुम्हारी चुदाई कर रहा है?"

"आपका लं...लंड" सावित्री ने दूसरी तरफ चेहरा कर के और आँखें बंद कर के कहा____"मेरी चू..चूत में घुस कर मेरी चु...चुदाई कर रहा है। हाय दैया आपने तो मुझे पूरी तरह बेशर्म ही बना दिया।"

"अभी कहां जानेमन?" वागले मुस्कुराया____"तुम तो अभी भी शर्मा रही हो। मैं चाहता हूं कि तुम मेरी आँखों में आँखें डाल कर मेरे हर सवाल का जवाब दो। तब मैं मानूंगा कि तुम अब पूरी तरह खुल चुकी हो।"

"आह्हह्ह शश्श्श्श्।" सावित्री ने वागले की तरफ देखा____"अगर मैं सच में पूरी तरह बेशर्म बन गई तो क्या आपको अच्छा लगेगा?"

"बिल्कुल अच्छा लगेगा मेरी जान।" वागले ने झुक कर उसके होठों को चूम कर कहा____"चुदाई के वक़्त अगर तुम पूरी तरह बेशर्म बन जाओगी तो मुझे यकीनन अच्छा लगेगा, क्योंकि इसी से हम दोनों को इस चुदाई का असली मज़ा मिलेगा।"

"आह्हह्ह अच्छा ऐसा क्या?" सावित्री उसकी आँखों में देखते हुए मुस्कुराई तो वागले ने मुस्कुराते हुए कहा____"हां डियर। चलो अब मैं तुम्हारी चुदाई करता हूं और तुम खुल कर मुझसे वो सब कहो जो जो तुम्हारे मन में आए।"

कहने के साथ ही वागले तेज़ तेज़ धक्के लगाने लगा। उसके हर धक्के पर सावित्री की भारी भरकम छातियां उछल जाती थीं जिससे वागले झुक कर कभी उसकी छातियों को मसल देता तो कभी मुँह में भर कर उसके निप्पल को ज़ोर से खींच लेता। सावित्री आनंद में डूबी आहें भर रही थी।

"आह्ह्ह् शश्श्श्श्।" सावित्री अपनी आहों को रोकने का प्रयास करते हुए बोली____"हां ऐसे ही चोदिए मुझे। मेरी चूत को अपने लंड से आह्ह्ह खूब चोदिए। उफ्फ! ऐसा मज़ा आपने पहले क्यों नहीं दिया था मुझे? हाय कितना मज़ा आ रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे मैं किसी और ही दुनियां में पहुंच गई हूं। आह्ह्ह और चोदिए मेरी चूत को। फाड़ दीजिए इस निगोड़ी को।"

सावित्री क्या क्या बोलती जा रही थी इसका उसे खुद ही अंदाज़ा नहीं था शायद। वो तो इस वक़्त मज़े की चरम सीमा पर थी। मज़े में आँखें बंद थी उसकी और वागले के धक्कों पर वो मचलते हुए अपनी गर्दन को इधर उधर कर रही थी। कुछ ही देर में दोनों ही मज़े की चरमसीमा पर पहुंच गए। सावित्री के जिस्म में झटके लगने लगे तो वो बुरी तरह आहें और सिसकियां भरने लगी थी। ये देख कर वागले ने उसके मुँह पर अपनी हथेली रख दी। वो खुद भी चरम पर था। जैसे ही सावित्री के गरमा गरम कामरस से उसका लंड भींगा तो वो खुद को सम्हाल नहीं पाया और वो बुरी तरह झटका खाते हुए झड़ने लगा। सावित्री की चूत वागले के कामरस से लबालब भर गई और फिर दोनों का ही कामरस एक साथ चूत से बाहर छलक पड़ा।

सेक्स और प्यार का तूफ़ान थमा तो कमरे में जैसे शान्ति छा गई थी। वागले सावित्री के ऊपर ही ढेर हो गया था। सावित्री को जैसे होश ही नहीं था। वो बस गहरी गहरी साँसें लेते हुए शक्तिहीन हो कर वागले के नीचे दबी पड़ी थी।

☆☆☆
 
अब तक....

सेक्स और प्यार का तूफ़ान थमा तो कमरे में जैसे शान्ति छा गई थी। वागले सावित्री के ऊपर ही ढेर हो गया था। सावित्री को जैसे होश ही नहीं था। वो बस गहरी गहरी साँसें लेते हुए शक्तिहीन हो कर वागले के नीचे दबी पड़ी थी।

अब आगे....

दूसरे दिन शिवकांत वागले अपने केबिन में बैठा पिछली रात हुई सावित्री के साथ अपनी शानदार चुदाई के बारे में सोच सोच कर मुस्कुरा रहा था। रात में दोनों मियां बीवी निर्वस्त्र हालत में ही सो गए थे। सुबह सावित्री ने उसे जगाया था। जागने के बाद उसने सावित्री को देखा था और फिर उसके होठों को चूम लिया था जिस पर सावित्री मुस्कुराते हुए बाथरूम में चली गई थी। वागले सोच रहा था कि इसके पहले उसने अपने जीवन का काफ़ी समय ऐसे ही बिना मज़े के गंवा दिया था। अगर उसे पहले से इस सबका इल्म होता तो आज उसे अपने गुज़रे हुए बेकार के समय का अफ़सोस न होता।

एक गहरी सांस ले कर वागले ने एक सिगरेट जलाई और उसके गहरे गहरे कश लेते हुए ब्रीफ़केस से विक्रम सिंह की डायरी निकाल कर टेबल पर रखा। उसके मन में अब ये जानने की उत्सुकता थी कि उस संस्था से जुड़ने के बाद विक्रम सिंह के जीवन में आगे और क्या क्या हुआ? उसने डायरी के उस पेज को खोला जहां से उसे अब आगे पढ़ना था। डायरी के उस पेज पर नज़रें जमाए उसने सिगरेट के और दो चार गहरे गहरे कश लिए और फिर सिगरेट को ऐशट्रे में बुझा कर उसने डायरी में लिखे विक्रम सिंह के किस्से को आगे पढ़ना शुरू किया।

☆☆☆

अगली सुबह मेरी आँख खुली। आज की सुबह मुझे एक अलग ही तरह की महसूस हो रही थी। मैं समझ नहीं पाया कि ये मेरा भ्रम था या पिछले कुछ दिनों से जो कुछ मेरी ज़िन्दगी में हो रहा था ये उसका असर था। ख़ैर मैं फ्रेश हुआ और नास्ते के लिए ब्रेकफास्ट की टेबल पर आ गया। मां पापा अपनी अपनी जगह बैठे हुए थे और शीतल आंटी ब्रेकफास्ट सर्व कर रहीं थी। पापा ने मेरा हाल चाल पूछा तो मैंने उन्हें अपना हाल बेहतर ही बताया। नास्ते के बाद पापा अपने ऑफिस चले गए और मैं मां को बता कर अपने दोस्तों से मिलने चला गया।

मेरे दोस्तों में सबसे घनिष्ट सिर्फ चार ही दोस्त थे। सबके सब मेरी तरह ही संपन्न घरों से थे लेकिन ये हम चारों का ही दुर्भाग्य था कि अब तक के जीवन में हमने कभी किसी लड़की या औरत के साथ सेक्स नहीं किया था। शर्मीला स्वभाव जैसे हम सबका दुश्मन बना हुआ था। ख़ैर मेरे लिए तो अब ये गुज़री हुई बातें ही हो चुकीं थी क्योंकि अब मेरे स्वभाव से शर्मीलापन पूरी तरह गायब हो चूका था। मेरे मन में उस संस्था से जुड़ने के बाद काफी कुछ चल रहा था लेकिन उस संस्था के नियम कानून ऐसे थे कि मैं उसके बारे में किसी को भी बता नहीं सकता था।

यहां पर मैं अपने दोस्तों का शार्ट इंट्रोडक्शन देना चाहूंगा।

(01) रंजन भाठिया

(02) शेखर सैनी

(03) तरुण पटेल

(04) ज़फर अली

ये चारो मेरे बचपन के दोस्त थे। हालांकि हमारी दोस्ती स्कूल के वक़्त शुरू हुई थी लेकिन हम चारो इतने गहरे दोस्त बन गए थे कि लगता था कि कई जन्मों की हमारी दोस्ती है। हम पांचों में से ज़फर मुश्लिम था लेकिन इससे हमारी दोस्ती पर कभी कोई फ़र्क नहीं आया था।

उस दिन मैंने फ़ोन कर के सबको मिलने को बुलाया था। असल में मैं चाहता था कि अब किसी तरह मैं उनको भी किसी लड़की या औरत के साथ सेक्स का मज़ा कराऊं और इसके लिए ज़रूरी था उनकी शर्म और झिझक को दूर करना। हालांकि मैं खुद नहीं समझ पा रहा था कि इसके लिए मैं क्या करूं लेकिन मैंने सोच लिया था कि अपने दोस्तों की निराश पड़ी ज़िन्दगी को रंगीनियों से भर दूंगा।

वो चारो सही टाइम पर हमारे पुराने अड्डे पर आ चुके थे। चारो मुझसे थोड़ा नाराज़ थे कि मैं इतने दिनों तक गायब रहा और अपने साथ उन्हें पिकनिक पर नहीं ले गया। मैंने बड़ी मुश्किल से उन्हें उस पिकनिक टूर के बारे में झूठ मूठ बता कर शांत किया था।

"अब तुझे क्या हुआ बे?" मैंने ज़फर को थोड़ा उदास सा देखा तो उससे पूछा____"इस तरह उदास उदास सा क्यों नज़र आ रहा है?"

"इसकी वजह सुनेगा तो तू अपनी हंसी नहीं रोक पाएगा विक्रम।" तरुण ने मुस्कुराते हुए कहा।

"ऐसी क्या बात है भला?" मैंने कहा____"ज़रा मुझे भी तो बता।"

"अरे! भाई साहब का निकाह तय हो गया है।" तरुण ने कहा____"और पता है किसके साथ? इसके चचा जान की लड़की से।"

"क्या?? नाज़िया से??" मैं चौंक पड़ा था।

"हां भाई।" शेखर ने कहा____"नाज़िया से इसके निकाह की बात तो पहले ही हो गई थी और ज़फर को वो पसंद भी है लेकिन इसकी उदासी की वजह ये है कि अब इसे समझ नहीं आ रहा कि निकाह के बाद ये नाज़िया के साथ सुहागरात कैसे मनाएगा?"

"सुहागरात कैसे मनाएगा?" मैंने ज़फर की तरफ हैरानी से देखा____"क्यों बे तू सुहागरात नहीं मना सकता क्या? तेरा सही सलामत तो है न? अभी कुछ दिन पहले तक तो तेरा सब ठीक ठाक ही था तो अब क्या हुआ?"

"अरे! वो तो अब भी ठीक है विक्रम।" रंजन हंसते हुए बोला____"इसकी असल प्रॉब्लम इसकी शर्म और झिझक करना है भाई। हालांकि ये प्रॉब्लम तो हम सबकी ही है लेकिन अभी हम इस लिए बचे हुए हैं क्योंकि हमारी शादी नहीं हो रही। जबकि इसका तो निकाह ही तय कर दिया है इसके अब्बू ने। ये बेचारा कई दिनों से ऐसे ही परेशान और उदास है।"

मैं ज़फर के बारे में ये सब जान कर हैरान नहीं हुआ था क्योंकि जानता था कि इसके पहले मैं भी उसी की तरह शर्मीले स्वभाव का था। नाज़िया उसके चाचा की लड़की थी और क्योंकि उनके धर्म में ऐसे रिश्तों में निकाह हो जाता है इस लिए उन दोनों के रिश्ते की बात बहुत पहले हो चुकी थी। ये अलग बात है कि अपने शर्मीले स्वभाव के चलते ज़फर ने कभी नाज़िया से उस रिश्ते के हिसाब से बात नहीं की थी। उधर नाज़िया का भी यही हाल था। हम सब उसे जानते थे, क्योंकि हमारा एक दूसरे के घरों में आना जाना लगा रहता था।

"भाई लोग समस्या तो सच में गंभीर है।" मैंने गहरी सांस लेते हुए कहा____"लेकिन अपने दोस्त के लिए इस बारे में कुछ तो करना ही पड़ेगा वरना सुहागरात को इसकी इज्ज़त मिट्टी में मिल जाएगी और नाज़िया भाभी इसके पिछवाड़े में लात मार कर इसे कमरे से भगा देंगी।"

मेरी बात सुन कर सबके सब हंसने लगे थे जबकि ज़फर मुझे घूर कर देखने लगा था। उसकी आँखों में नाराज़गी के भाव उभर आए थे।

"तुझे मज़ाक सूझ रहा है साले।" ज़फर ने नाराज़गी से कहा____"और यहाँ मेरी हालत ख़राब हो रखी है। मैं बहुत कोशिश करता हूं कि नाज़िया से खुल कर कुछ गुफ्तगू करूं लेकिन हिम्मत जवाब दे जाती है। जब आज मेरी ये कैफियत है तो उस रात क्या होगा। बस यही सोच सोच कर गांड फटी जा रही है।"

"चिंता मत कर भाई।" मैंने उसके कंधे पर हाथ रख कर हल्के से दबाते हुए कहा____"मैं तेरी इस प्रॉब्लम को साल्व करने के बारे में ज़रूर कुछ न कुछ करुंगा।"

"बोल तो ऐसे रहा है जैसे मेरी ये प्रॉब्लम चुटकियों में दूर कर देगा।" ज़फर ने आँखें फैला कर कहा____"ये मत भूल कि तू भी हम सबके जैसा ही है।"

"ग़लत कह रहा है तू।" मैंने तपाक से कहा____"पहले ज़रूर मैं तुम सबके जैसा ही था लेकिन अब ऐसा नहीं हूं।"

"क्यों? अब क्या किसी ने मार ली है तेरी?" ज़फर ने मुस्कुरा कर कहा तो बाकी सब हंसने लगे जबकि मैंने हल्की मुस्कान के साथ कहा____"किसी ने मेरी नहीं बल्कि मैंने किसी की मार ली है। मैं जानता हूं कि तुम लोगों को मेरी बात का यकीन नहीं होगा लेकिन बहुत जल्द तुम लोगों को इसका यकीन भी हो जाएगा। ख़ैर आज शाम हम सब क्लब जाएंगे।"

"ना भाई।" रंजन ने बुरा सा मुँह बनाते हुए कहा____"क्लब जाने का अब मन नहीं करता। साला वहां दूसरे लड़कों को अपनी अपनी माल के साथ मस्ती करते देख कर मूड ख़राब हो जाता है और फिर बेकार में मुट्ठ मार कर अपना अनमोल पानी बहा देना पड़ता है।"

"रंजन सही कह रहा है विक्रम।" शेखर ने कहा____"मुठ मार मार के थक गए हैं हम। साला इतना बड़ा हथियार होते हुए भी ऐसी फीलिंग आती है जैसे हम मर्द नहीं नामर्द हैं। लानत है हम पर और हमारी मर्दानगी पर।"

"लानत खुद पर या खुद की मर्दानगी पर नहीं।" मैंने कहा____"बल्कि अपनी शर्म और झिझक पर भेजो। अब बस ये सोच कर फैसला करो कि बहुत मुट्ठ मार लिए लेकिन अब से मुट्ठ नहीं बल्कि किसी की चूत मारनी है।"

"आज क्या तू भांग का नशा कर के आया है भोसड़ी के?" ज़फर ने मेरे कंधे पर हल्के से मुक्का मारते हुए कहा____"जो ऐसी बड़ी बड़ी फेंके जा रहा है? अबे चूत मारना क्या इतना आसान काम है? अगर इतना ही आसान काम होता तो अब तक हम सब मुट्ठ मार कर अपना पानी न फेंक रहे होते, समझा?"

"अबे कल की बात और थी।" मैंने कहा____"आज वक़्त कुछ और हो गया है। मैं जानता हूं कि तुम लोगों को मेरी बातों पर यकीन नहीं आएगा, इसी लिए कह रहा हूं कि आज शाम हम सब क्लब चलेंगे। वहां पर आज तुम सब मेरा एक नया ही रूप देखोगे।"

"तेरा नया रूप देखने के चक्कर में हम सब कहीं पेले न जाएं।" तरुण ने कहा____"साफ़ साफ़ ये कह दे कि कुछ दिनों से तूने मुट्ठ नहीं मारी है इस लिए वहां का मस्त नज़ारा देख कर तू मुट्ठ मारना चाहता है।"

"ये तूने सही पकड़ा है तरुण।" ज़फर ने हंसते हुए कहा____"असल में ये यही करना चाहता है लेकिन भाई इसके लिए तुझे अपना नया रूप दिखाने की क्या ज़रूरत है? हम सब तो पहले भी ऐसे मुट्ठ मार लेते थे।"

मैं समझ गया था कि उन चारो को इस बारे में मैं कुछ भी नहीं समझा सकता था। इस लिए सबको क्लब में चलने का बोल कर मैं वापस घर आ गया था। संस्था के द्वारा दिया हुआ मोबाइल मेरे पास ही था और मैं अकेले में चेक कर लेता था कि संस्था की तरफ से उसमें कोई मैसेज तो नहीं आया। सारा दिन कमरे में बेड पर लेटे हुए ही गुज़र गया। मां पापा ऑफिस में ही थे। अपने कमरे में लेटा हुआ मैं हर चीज़ के बारे में सोचता रहा था। एक तरफ संस्था के बारे में, दूसरी तरफ ज़फर की प्रॉब्लम के बारे में और तीसरी तरफ इस बारे में कि आज शाम को क्लब में मैं अपने दोस्तों को किस तरह से कुछ अलग करता हुआ दिखाऊंगा

☆☆☆
 
शाम को मैं अपने चारो दोस्तों के साथ क्लब पहुंचा। पूरे रास्ते वो मेरा मज़ाक उड़ाते हुए आए थे और मैं जानता था कि जब तक मैं उन सबको कुछ कर के दिखा नहीं दूंगा तब तक उनमें से किसी को भी मेरी बातों का यकीन नहीं होगा। हालांकि अंदर से मैं अब भी यही सोच रहा था कि क्लब में पहुंच कर आख़िर मैं ऐसा क्या करुंगा जिसके चलते मैं अपने दोस्तों को चौंका सकूं और उन्हें अपनी बातों का यकीन दिला सकूं?

"देख भाई मैं अब भी कहता हूं कि हम में से किसी का भी मुट्ठ मारने का ज़रा सा भी मन नहीं है।" शेखर ने क्लब के पास पहुंचते ही ठिठक कर मुझसे कहा____"और हाँ क्लब के अंदर हीरो बनने की तो कोशिश भी मत करना, क्योंकि तेरे चक्कर में हम सब बेवजह ही पेले जाएंगे।"

"असल में सच बात तो ये है कि हम सबने अपने सामने मर्द बनने की कोशिश तो बहुत की है।" मैंने पलट कर कहा____"लेकिन बाकी लोगों के सामने हमारी फट के हाथ में आ जाती रही है। हम अपने सामने ये ज़रूर सोचते थे कि ऐसा क्यों होता था और अगली बार ऐसा नहीं होगा लेकिन अगली बारी आने पर हम मर्द बन कर लोगों का सामना ही नहीं करते थे। यही वजह है कि हमारे अंदर की मर्दानगी ही ख़त्म हो गई है। ज़रा अपनी अपनी पर्सनालिटी को देखो। हमारी उम्र के लड़कों से कहीं बेहतर हमारी पर्सनालिटी है, इसके बावजूद हम उन लड़कों का भी सामना नहीं कर पाते जो हमसे भी गए गुज़रे हैं। अकेले में खुद पर कोसने से बेहतर है कि हम डंट कर प्रॉब्लम का सामना करें, फिर भले ही उसमें हमारी पेलाई ही क्यों न हो जाए। कम से कम दिल को ये मलाल तो नहीं होगा कि हम बुजदिल और कायर ही बने रहे।"

मेरी लम्बी चौड़ी बातें सुन कर सब के सब खामोश हो गए थे। कदाचित वो अच्छी तरह समझ गए थे कि ये वो बातें थी जो सच थीं। मैं चारो के चेहरों की तरफ ही बारी बारी से देखता जा रहा था।

"जब तक हम कोशिश नहीं करेंगे।" उन्हें खामोश देख मैंने कहा____"तब तक हमारे अंदर का डर जाएगा ही नहीं। सारी ज़िन्दगी इसी डर और इसी शर्मीले स्वभाव को लिए बैठे रहेंगे हम। कल को हमारी शादियां होंगी तो हमारी बीवियां हमारी मर्द बन जाएँगी और हम उनकी बीवियां। क्या यही चाहते हो तुम सब?"

"हर्गिज़ नहीं भाई।" तरुण ने कहा____"उपर वाले ने हमें मर्द बना कर भेजा है तो हम मर्द ही बने रहना चाहते हैं।"

"अगर मर्द ही बने रहना है।" मैंने कहा____"तो चलो अंदर और मर्द बन कर हर तरह की सिचुएशन का डंट कर सामना करो। ये मत सोचो कि पेले जाएंगे, बल्कि ये सोच रखो कि अगर कोई हमें पलेगा तो हम भी पीछे नहीं हटेंगे।"

"चलो ये सब तो ठीक है।" रंजन ने मेरी तरफ देखते हुए कहा____"लेकिन अगर सच में कोई लफड़ा हो गया और उस लफड़े के बारे में हमारे पेरेंट्स को पता चल गया तो क्या होगा? हम कैसे अपने अपने पेरेंट्स का सामना कर सकेंगे? जब उन्हें पता चलेगा कि हम किस तरह के लफड़े में फंस कर झगड़ा किए हैं तो क्या कहेंगे वो?"

"सिम्पल सी बात है भाई कि अगर इस लफड़े की वजह से हमारे पेरेंट्स हम पर गुस्सा करेंगे तो हम सब सह लेंगे।" मैंने कंधे उचका कर कहा____"इतना तो अब हमारे पेरेंट्स भी समझते हैं कि उनके बच्चे बड़े हो गए हैं और इस उम्र में अक्सर ऐसी बातें या ऐसे लफड़े हो जाते हैं। हालांकि मेरा ख़याल तो ये भी है कि वो हमारे द्वारा किए गए लफड़े को जान कर कहीं न कहीं खुश ही होंगे। ऐसा इस लिए क्योंकि वो भी जानते हैं कि उनके बच्चों का स्वभाव अब तक कैसा था। खुद सोचो कि कौन माता पिता ये नहीं चाहते कि उनके बच्चे किसी से कम हों या भीगी बिल्ली बन कर जीवन गुज़ार दें?"

"भाई बातें तो तेरी धाँसू हैं।" शेखर ने कहा____"लेकिन मैं ये सोच कर हैरान हूं कि आज से पहले तेरे मुख से ऐसे प्रवचन क्यों नहीं निकले थे? संभव है कि तेरे इन प्रवचनों से हम पहले ही मर्द बन जाते।"

"क्या तू मेरी टांग खींच रहा है?" मैंने शेखर को घूरते हुए कहा।

"टांग की माँ की चूत।" उसने तपाक से कहा____"सच तो ये है कि तेरी बातों से मेरे अंदर एक गर्मी सी भर गई है और अब मेरा मन कर रहा है कि मैं दो चार लौंडों का पिछवाड़ा मार मार लाल कर दूं।"

"वैसे ये तो तूने सच कहा विक्रम कि हमने कभी भी सिचुएशन का सामना करने की कोशिश नहीं की।" ज़फर ने कहा____"अपने सामने हमने बस डींगें ही मारी हैं और जब सिचुएशन का सामना करने की बारी आती थी तो हमारी गांड फट जाती थी। शर्मीला नेचर ही नहीं बल्कि शायद इस डर की वजह से भी ऐसा हो जाता था कि हमारे पेरेंट्स को अगर हमारे किसी लफड़े के बारे में पता चला तो वो हमारे बारे में क्या सोचेंगे और जाने क्या कहेंगे। हक़ीक़त तो ये हैं कि आज के युग में चाहे लड़का हो या लड़की, चाहे औरत हो या मर्द, हर कोई अपने लिए अपनी मर्ज़ी से जाने क्या क्या करते रहते हैं। बातें चाहे जैसी भी हों, चार दिन के बाद हर कोई उन्हें भुला ही देता है। ख़ैर मैंने तो सोच लिया है विक्रम कि अब चाहे जो हो जाए लेकिन मैं सिचुएशन का सामना करुंगा। अगर किसी लफड़े के बारे में मेरे पेरेंट्स को पता चलता है और वो मुझ पर गुस्सा होते हैं तो हो जाएं। मैं अब किसी भी हाल में अपने इस वाहियात नेचर को बदलना चाहता है।"

ज़फर ने जिस आत्मविश्वास के साथ कहा था उससे मुझे महसूस हो गया था कि इस बार वो पीछे नहीं हटेगा। मैंने बाकियों की तरफ देखा तो उन लोगों ने भी अपने हाथ खड़े कर दिए। मेरे चारो दोस्त अब हर तरह की सिचुएशन का सामना करने के लिए तैयार थे। ये देख कर एक अलग ही एहसास हो रहा था मुझे और अंदर से ख़ुशी भी महसूस हो रही थी। मैंने उन्हें समझाया कि क्लब के अंदर चाहे जैसी भी सिचुएशन आ जाए लेकिन उससे पीछे मत हटना। सब मेरी बात सुन कर एकदम तैयार थे।

क्लब के अंदर आए तो देखा हमेशा की तरह माहौल बना हुआ था और लड़के लड़कियां मस्ती में लगे हुए थे। मेरे लिए तो कोई समस्या नहीं थी लेकिन कहीं न कहीं मुझे भी ख़याल आ जाता था कि अगर मेरे सभी दोस्त आज फिर पीछे हट गए तो सच में मैं अकेला पेला जाऊंगा। ख़ैर हम सब पहले बार काउंटर पर गए और एक एक बियर का आर्डर दिया। कुछ देर बाद जब बियर का हल्का शुरूर आया तो मैंने दोस्तों को इशारा किया कि चलो अब।

मैं डांस फ्लोर की तरफ बढ़ा तो मेरे पीछे पीछे मेरे दोस्त भी चल पड़े। इस क्लब में ज़्यादातर टीन एजर ही आते थे। जिनके पास अपनी गर्लफ्रेंड होती थीं वो उनके साथ मस्ती करते थे और बाकी जो अकेले होते थे वो फुल मस्ती के लिए क्लब के अन्दरूनी हिस्से में चले जाते थे। उसके लिए अलग से चार्ज लगता था। आज से पहले हम लोगों के ज़हन में भी ये ख़याल आया था कि अंदर जा कर किसी लड़की के साथ फुल मज़ा करें लेकिन ऐसा करने की हिम्मत नहीं हुई थी कभी।

क्लब में ज़्यादातर लड़के लड़कियां हम लोगों को जानते थे और कभी न कभी उन लोगों ने हम पर ताने भी मारे थे जिसकी वजह से लड़कियां हम पर हंसने लगतीं थी। उस वक़्त खून तो खौलता था लेकिन इतने सारे लड़के लड़कियों को देख कर उनसे भिड़ जाने की हिम्मत नहीं कर सके थे। ख़ैर आज बात काफी अलग थी। आज मेरे अंदर डर घबराहट या झिझक जैसी कोई बात नहीं थी। मैं बेधड़क डांस फ्लोर की तरफ बढ़ता चला गया। मैंने पलट कर ये देखने की कोशिश नहीं की थी कि मेरे बाकी दोस्त मेरे पीछे डांस फ्लोर की तरफ आए थे कि नहीं।

"अरे! ये वही है ना?" डांस फ्लोर पर अपने बॉयफ्रेंड से चिपकी लड़की ने मुझे देखने के बाद उससे मुस्कुराते हुए पूछा____"जिसे तुम फट्टू फट्टू कहते थे और ये बेचारा चेहरा लटका कर चला जाता था?"

"हां डार्लिंग ये वही फट्टू है।" लड़के ने मेरी तरफ देखते हुए बड़ी जानदार मुस्कान के साथ कहा____"लेकिन आज काफी दिनों बाद आया है यहां। लगता है इसकी गांड की खुजली कुछ दिनों के लिए ठीक हो गई थी, हाहाहा।"

लड़के ने ये कहा तो लड़की उसके साथ ही खिलखिला कर हंसने लगी, जबकि इधर मेरी झांठें सुलग ग‌ईं। मेरा इरादा उसकी तरफ जाने का था भी नहीं लेकिन जब उन दोनों की बातें मेरे कानों में पड़ीं तो मैं उनकी तरफ ही पलट गया। मैंने पहले तो लड़के को आग उगलती आँखों से देखा और फिर उसकी गर्लफ्रेंड को बड़ी ही अश्लील नज़रों से ऊपर से नीचे तक देखते हुए बोला____"मैं तो यहाँ तेरी इस छमियां की गांड मारने आया हूं बेटा। हालांकि तू जितनी ख़ुशी से इसकी गांड चाटता है उतनी सेक्सी इसकी गांड है नहीं।"

"क्या बोला रे मादरचोद।" लड़के की गांड सुलग गई तो वो मेरी तरफ झपटा। मैं तो जानता ही था कि मेरे द्वारा ऐसा बोलने पर यही होना था इस लिए जैसे ही वो झपटा तो मैंने आव देखा न ताव सीधा घुमा कर एक मुक्का उसकी नाक में रसीद कर दिया। मुक्का लगते ही उसके हलक से घुटी घुटी सी चीख निकली और वो अपनी नाक पकड़ कर वहीं पर दोहरा हो गया। पलक झपकते ही डांस फ्लोर का माहौल जैसे अपनी जगह पर रुक गया, सिर्फ म्यूजिक की आवाज़ ही सुनाई दे रही थी। कुछ देर तक तो किसी को कुछ समझ न आया लेकिन जैसे ही लड़की उसकी हालत देख कर ज़ोर से चिल्लाई तो सब के सब जैसे नींद से जाग ग‌ए।

उस लड़के की नाक टूट गई थी और भल्ल भल्ल कर के खून बह रहा था। मैंने तो ये सोच कर उस पर मुक्का जड़ दिया था कि अगर उसे पहले मौका मिल गया तो संभव है कि मुझे मौका न मिले। इस चक्कर में कुछ ज़्यादा ही ज़ोर से मार दिया था उसे। अब उसकी हालत देख कर खुद मेरी भी गांड फट पड़ी थी। हालांकि मैंने जल्दी ही खुद को सम्हाला और पलट कर पीछे देखा तो बुरी तरह उछल पड़ा। मेरे दोस्तों का कहीं पता ही नहीं था। ये देख कर मेरी और भी गांड फट गई। ज़हन में एक ही बात गूँजी कि लौंड़े लग गए बेटा। साला जिनकी वजह से ऐसा कुछ करने की इतनी बड़ी हिम्मत की थी वही साथ छोड़ गए। मैं समझ गया कि अब गांड तोड़ाई पक्की है इस लिए इससे पहले कि मुसीबत मेरे ऊपर टूट पड़ती मैं फ़ौरन ही पलट कर दरवाज़े की तरफ दौड़ पड़ा।

"रूक जाओ भोसड़ी वालो।" बाहर आते ही मेरी नज़र जब अपने दोस्तों को अपनी अपनी मोटर साइकिल स्टार्ट करते देखा तो मैं चिल्लाया था____"अगर आज यहाँ से कायरों की तरह भागे तो सोच लेना कि मेरा तुम से कोई सम्बन्ध नहीं रहेगा।"

मेरी आवाज़ सुन कर सब के सब रुक गए और पलट कर मेरी तरफ देखा। सब के चेहरों पर बारह बजे हुए थे। मुझे उन पर ये सोच कर गुस्सा आया कि ये साले कैसे दोस्त थे मेरे? इसके पहले तो कितनी बड़ी बड़ी बातें कर के फैसला लिया था कि अब चाहे जो हो जाए लेकिन वो पीछे नहीं हटेंगे लेकिन अब ये किसी कुत्ते की तरह दुम दबा कर भागे जा रहे थे।

"ये तूने ठीक नहीं किया विक्रम।" तरुण ने मोटर साइकिल पर बैठे हुए ही कहा____"तुझे उस लड़के को मारने की क्या ज़रूरत थी? तुझे अंदाज़ा भी नहीं है कि क्लब के अंदर इस तरह किसी को मार देने से कितनी बड़ी मुसीबत हो जायेगी? अरे! पुलिस केस हो जाएगा भाई। क्या यही दिखाने ले आया था तू हमें?"

"तो क्या तू इतनी सी बात से डर कर भाग रहा है साले?" मैंने गुस्से से कहा____"अरे! पुलिस केस हो भी गया तो क्या हो जाएगा? क्या हम इतने कमज़ोर खानदान से हैं कि पुलिस केस हो जाने से हम पर कोई ऐसी मुसीबत आ जाएगी जिसकी वजह से हमारा सब कुछ बर्बाद हो जाएगा? तू ये क्यों भूल रहा है कि हम भी अमीर खानदान से हैं और हमारे पेरेंट्स की पहुंच भी ऊपर तक है। क्या तुझे लगता है कि इतने से हम पर कोई फ़र्क पड़ जाएगा? मर्द बनना है तो जीवन में बहुत कुछ करना पड़ेगा, समझे?"

मेरी बातें सुन कर सब के सब चुप हो ग‌ए। जबकि मैंने आगे कहा____"डर और घबराहट को अपने अंदर से निकालो भाई लोग और हर तरह की सिचुएशन का सामना करो। इस तरह कायरों की तरह यहाँ से भाग जाने से मर्द नहीं बन जाओगे। जब तक तुम डरोगे तब तक कुछ नहीं कर पाओगे।"

अभी मैं ये सब बोल ही रहा था कि तभी पीछे से कुछ लोगों का शोर सुनाई दिया मुझे। मैंने पलट कर देखा तो क्लब के कुछ आदमी काफी सारे लड़के लड़कियों के साथ अंदर से बाहर आ गए थे। हम पर नज़र पड़ते ही वो सब हमारी तरफ आने लगे। एक पल के लिए मेरे अंदर फिर से घबराहट जन्मी लेकिन मैंने भी सोच लिया कि अब जो होगा देखा जाएगा।

"यही है।" उस लड़की ने ऊंची आवाज़ में मेरी तरफ ऊँगली करते हुए कहा____"इसी ने मेरे मोहित को मारा था।"

"क्यों बे?" क्लब के एक हट्टे कट्टे आदमी ने मेरी तरफ बढ़ कर कहा____"क्यों मारा तूने उसे?"

"देखो मिस्टर तमीज़ से बात करो मुझसे।" मैंने पूरा आत्मविश्वास दिखाते हुए कहा_____"तुम्हें शायद पता नहीं है कि मैं किसकी औलाद हूं।"

"मुझे इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तू किसकी औलाद है?" उस आदमी ने कहा____"मैं जो पूछ रहा हूं उसका जवाब दे कि तूने इस लड़के को क्यों मारा?"

"तू खुद इस लड़के से पूछ कि मैंने इसे क्यों मारा?" मैंने भी तैश में आ कर उस आदमी से तू तड़ाक में बात करते कहा____"या फिर इस लड़की से पूछ कि मैंने इसके बॉयफ्रेंड को क्यों मारा?"

"साले मुझसे जुबान लड़ाता है?" उस आदमी ने झपट कर मेरा गिरेहबान पकड़ लिया और गुर्राते हुए कहा____"जो पूछा है उसका जवाब दे वरना तेरी गर्दन मरोड़ दूंगा, आअह्हह्ह्।"

उस आदमी की चीख निकल गई और वो मेरा गिरेहबान छोड़ कर धड़ाम से ज़मीन पर जा गिरा था। वातावरण में एकदम से ख़ामोशी छा गई थी। इधर मैं हैरान कि उस आदमी को अचानक से क्या हुआ? जब मैंने गौर से उसकी तरफ देखा तो मेरी नज़र उसके दाहिने हाथ की कलाई पर धंसे चाकू पर पड़ी। चाकू उसकी कलाई के आर पार हो गया था और वहां से खून बहने लगा था। ये देख कर मैं तो बुरी तरह घबरा ही गया था लेकिन वहां खड़े लोग भी सन्नाटे में आ गए थे।

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