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सी. एम. एस {चूत मार सर्विस }

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अब तक...

उस आदमी की चीख निकल गई और वो मेरा गिरेहबान छोड़ कर धड़ाम से ज़मीन पर जा गिरा था। वातावरण में एकदम से ख़ामोशी छा गई थी। इधर मैं हैरान कि उस आदमी को अचानक से क्या हुआ? जब मैंने गौर से उसकी तरफ देखा तो मेरी नज़र उसके दाहिने हाथ की कलाई पर धंसे चाकू पर पड़ी। चाकू उसकी कलाई के आर पार हो गया था और वहां से खून बहने लगा था। ये देख कर मैं तो बुरी तरह घबरा ही गया था लेकिन वहां खड़े लोग भी सन्नाटे में आ गए थे।

अब आगे...

फ़िज़ा में एकदम से मौत जैसा सन्नाटा छा गया था। किसी को समझ ही नहीं आ रहा था कि अचानक से ये क्या हो गया? फिर जैसे लोगों का ज़हन सक्रिय हुआ तो सब इधर उधर देखने लगे। सबकी घूमती हुई निगाहें एक जगह जा कर रुक ग‌ईं। मुख्य सड़क के पास एक कार खड़ी थी और कार के ड्राइविंग डोर के पास शानदार कोट पहने एक आदमी खड़ा था। कार के दूसरी तरफ एक और आदमी था और पीछे वाले दरवाज़े के पास उसी के जैसे वेश भूषा में एक दूसरा आदमी खड़ा था।

उस आदमी पर नज़र पड़ते ही मेरी और मेरे दोस्तों की हवा निकल गई। मैंने और मेरे सभी दोस्तों ने बारी बारी से एक दूसरे की तरफ देखा। चेहरों पर पसीना उभर आया था। कोई नार्मल सिचुएशन होती तो हमारी ऐसी हालत नहीं होती लेकिन ये सिचुएशन नार्मल नहीं थी। हम सब तो ये सोच कर घबराहट से भर गए थे कि क्या होगा उस वक़्त जब उस आदमी को हमारी इस करतूत की असलियत का पता चलेगा? ख़ैर वो आदमी हमारी तरफ बढ़ा तो उसके पीछे वो दोनों आदमी भी चल पड़े। उन दोनों की कमर के पास लटक रहे हॉलेस्टर में मौजूद रिवाल्वर के दस्ते साफ़ दिख रहे थे।

"ये चाकू मैं तेरे मुँह के आर पार भी कर सकता था।" उस आदमी ने पास आ कर उस आदमी से कहा जिसे चाकू लगा था और इस वक़्त वो उठ कर ज़मीन पर ही बैठा दर्द से कराह रहा था____"क्योंकि तेरी गन्दी ज़ुबान ने एक ऐसे लड़के से बत्तमीज़ी से बात की जो मेरे दोस्त का चश्मो चिराग़ है। ख़ैर अब मैं तुझे दिखाता हूं कि तुझे किसी बात से फ़र्क पड़ता है की नहीं।"

"मुझे माफ़ कर दीजिए सर।" ज़मीन पर बैठे कराह रहे उस आदमी ने लडखडाती आवाज़ में कहा____"मुझे पता ही नहीं था कि ये लड़के आपके पहचान वाले हैं।"

"ये सब मेरे जिगर के टुकड़े हैं।" उस आदमी ने कहा जो वास्तव में कोई और नहीं बल्कि रंजन के पापा थे, बोले____"और तूने सबके सामने इनसे बत्तमीज़ी में बात की है और इतना ही नहीं तूने अपनी मर्दानगी दिखाते हुए मेरे दोस्त के चश्मो चिराग़ का गिरेहबान भी पकड़ा। इसकी सज़ा तो तुझे मिलेगी।"

"न..नहीं नहीं सर।" वो आदमी जो की क्लब का बाउंसर था बुरी तरह गिड़गिड़ाने लगा____"प्लीज़ मुझे माफ़ कर दीजिए। आइंदा कभी भी ऐसी ग़लती नहीं करुंगा।"

"क्या हो रहा है यहाँ?" तभी पीछे से भीड़ को चीरता हुआ एक और आदमी आया। जैसे ही उसकी नज़र रंजन के पापा पर पड़ी तो वो बुरी तरह चौंक गया। फिर बड़े ही अदब से उनसे बोला_____"अरे! सर आप यहाँ कैसे और ये सब क्या है?"

"तुम्हारे इस कुत्ते ने मेरे बच्चे का गिरेहबान पकड़ा और उसके साथ बत्तमीज़ी से बात की है।" संजय अंकल कहा____"इस लिए अब इसे इसके किए की सज़ा इसे मिलेगी।"

"मैं मानता हूं सर कि इसने बहुत बड़ी ग़लती की है।" उस आदमी ने कहा जो क्लब का मैनेजर था____"लेकिन यकीनन इसे ये पता नहीं था कि इसने जिसके साथ ऐसी बत्तमीज़ी से बात की है वो आपके घर के हैं।"

"बात सिर्फ ये नहीं है कि ये बच्चे हमारे घर के हैं।" संजय अंकल ने कहा____"बात ये भी है कि तुम्हारे इस कुत्ते का लहजा सबके लिए ऐसा ही होगा। ऐसे कुत्ते को क्लब में क्यों रखा हुआ है तुमने जिसे किसी से बात करने का मैनर ही नहीं है?"

क्लब के मैनेजर ने संजय अंकल को बहुत समझाया लेकिन वो न माने। यहाँ तक कि वो बाउंसर भी अपने किये की माफियां मांगता रहा लेकिन संजय अंकल के इशारे पर उनके साथ आए उन दोनों आदमियों ने उस बाउंसर को उठाया और ले जा कर कार की डिग्गी में डाल कर बंद कर दिया।

इधर संजय अंकल उस लड़के के पास गए जिसे मैंने मारा था। वो अभी भी सहमा सा खड़ा हुआ था। उसकी गर्लफ्रेंड भी डरी सहमी उसके पास ही खड़ी थी।

"मेरा नाम संजय भाठिया है।" मोहित की आँखों में झांकते हुए संजय अंकल ने कड़क लहजे में कहा____"जा कर अपने बाप को बता देना कि जिसने तुम्हारा ये हाल किया है वो लड़का मुझसे ताल्लुक रखता है।" कहने के साथ ही अंकल ने उस लड़की की तरफ देखा तो वो डर के मारे और भी सहम गई।

"मैं अच्छी तरह जानता हूं कि यहाँ पर जो कुछ भी हुआ है।" संजय अंकल ने उसकी तरफ देखते हुए कहा____"उसकी शुरुआत मेरे बच्चे ने नहीं की थी। अपने बच्चों की रग रग से वाक़िफ़ हूं मैं, इस लिए मेरी सलाह है कि इस सबको बुरा ख़्वाब समझ कर ज़हन से निकाल देना। मैं नहीं चाहता कि किसी के घर की इज्ज़त मेरे गुस्से का शिकार हो जाए।"

संजय अंकल की मौजूदगी ने जैसे जादू सा कर दिया था। वहां किसी में भी हिम्मत न हुई थी कि उनसे कुछ बोल सके। ख़ैर उसके बाद अंकल चले गए और हम लोग भी अपनी अपनी मोटर साइकिल स्टार्ट कर के घर चल पड़े। हम सबके ज़हन में एक ही बात चल रही थी कि संजय अंकल ने इस सबके बारे में हम में से किसी से भी कोई सवाल क्यों नहीं किया था? क्या अपने सामने वो हम सबकी क्लास लेने वाले थे? यही सब सोचते हुए हम अंदर ही अंदर घबरा रहे थे।
 
इस हादसे को गुज़रे हुए दो दिन गुज़र गए थे लेकिन अभी तक संजय अंकल ने हम में से किसी से भी इस बारे में कोई बात नहीं की थी। हम लोगों को समझ नहीं आ रहा था कि आख़िर ऐसा कैसे हो सकता है? रंजन से पूछते तो वो यही कहता कि उससे भी उसके पापा ने इस बारे में कुछ नहीं कहा बल्कि उससे उन्होंने जब भी कोई बात की तो उनका लहजा नार्मल ही था। ऐसा लगता था जैसे कुछ हुआ ही न हो। ख़ैर हमारे लिए तो ये अच्छा ही था।

जब हमें पूरी तरह लगने लगा कि संजय अंकल उस बारे में हमसे कुछ नहीं कहने वाले तो हम भी नार्मल हो गए और पहले की तरह सहज हो कर घूमने फिरने लगे। इस बीच मैं बराबर संस्था के द्वारा दिए गए मोबाइल को चेक करता रहा था लेकिन अभी तक कोई मैसेज नहीं आया था उसमें। किसी औरत के साथ सेक्स किए हुए मुझे काफी दिन हो गए थे इस लिए अब मुझे लगने लगा था कि कितना जल्दी मुझे कोई खूबसूरत लड़की या औरत भोगने को मिल जाए और ऊपर वाले ने जैसे मेरी सुन ली थी। उसी रात संस्था वाले मोबाइल पर मैसेज आया। मैसेज देख कर मैं बड़ा खुश हुआ।

रात में सबके सो जाने के बाद मैं खिड़की के रास्ते चुपके से वही कपड़े पहन कर निकल गया। रास्ते में एक जगह छुपाई गई मोटर साइकिल मिली तो मैं उसमें बैठ कर आगे बढ़ चला। क़रीब पंद्रह मिनट बाद मैं दिए गए एड्रेस पर पहुंच गया।

वो जगह शहर के अंदर ही थी लेकिन मुख्य सड़क से हट कर थी। ज़्यादा अँधेरा नहीं था। मोटर साइकिल की हेडलाइट में दूर मुझे एक ब्लू कलर की कार का पिछला हिस्सा दिख रहा था। मैंने मोटर साइकिल को अँधेरे में ही एक जगह ले जा कर छुपा कर खड़ी कर दिया। आस पास का बारीकी से मुआयना करने के बाद मैं उस तरफ बढ़ चला जिस जगह कार का पिछला हिस्सा दिख रहा था। मेरे अंदर थोड़ी घबराहट तो थी क्योंकि ये काम बहुत ही रिश्की था और मैं अच्छी तरह जानता था कि अगर किसी के द्वारा पकड़ा गया तो लेने के देने पड़ जाएंगे। मेरे ज़हन में ऐसी सिचुएशन के प्रति अब एक ही विचार चलने लगा था कि इस बार चीफ़ से इस बारे में ज़रूर बात करुंगा।

कार के पास पंहुचा तो कोई नज़र न आया मुझे। हर तरफ ख़ामोशी ही कायम थी। मैंने अभी इधर उधर देखना शुरू ही किया था कि एक सुरीली आवाज़ मेरे कानों में पड़ी। मैं आवाज़ दिशा में घूमा तो नीम अँधेरे में मुझे कुछ दूरी पर एक औरत का साया नज़र आया। मैं सावधानी से उसी की तरफ बढ़ चला।

"मेरे पीछे आओ।" मैं उसके पास पंहुचा ही था कि उसने बिना किसी भूमिका के मुझसे कहा और पलट कर एक तरफ बढ़ चली। मैं भी बिना कुछ बोले उसके पीछे पीछे चल पड़ा।

नीम अँधेरे में उस जगह को ठीक से पहचानना मुश्किल था लेकिन इतना ज़रूर समझ आ रहा था कि ये कोई ऐसी जगह है जहां पर लोगों का आना जाना बहुत कम ही होता होगा। ख़ैर उस औरत के पीछे चलते हुए मैं जल्दी ही एक दरवाज़े से अंदर दाखिल हो गया। अंदर दाखिल हुआ तो उस औरत ने मुझे दरवाज़ा अंदर से बंद कर देने को कहा। मैंने दरवाज़ा बंद किया और उसकी तरफ पलट कर फिर से उसके पीछे चलने लगा। अंदर भी नीम अँधेरा ही था। उस औरत ने अपने मोबाइल की टोर्च जला कर रौशनी की और आगे बढ़ने लगी। जल्द ही मैं एक हॉल में आ गया। मोबाइल की रौशनी जब उस हॉल के आस पास पड़ी तो मुझे कुछ जंग लगी हुई मशीनें नज़र आईं। मेरे ज़हन में ख़याल उभरा कि ये जगह शायद कोई कारखाना है जो कि काफी समय से बंद पड़ा हुआ है। मशीनों की हालत देख कर तो यही लगता था।

उस औरत ने अपने मोबाइल को एक जगह रख दिया। टोर्च वैसी ही जल रही थी। टोर्च रखने के बाद जब वो एक तरफ बढ़ी तो मेरी नज़र एक बड़े से बैग पर पड़ी। उस औरत ने उस बैग को खोला और उसमें से एक ऐसा कपड़ा निकाला जो की गद्देदार था। मैं समझ गया कि वो सारा इंतजाम कर के आई है। ज़ाहिर है उसे इस जगह के बारे में पहले से पता था और इसी लिए वो अपना इंतजाम खुद ही कर के आई थी।

उस गद्देदार कपड़े को हॉल के बीचो बीच बिछा कर वो मेरी तरफ पलटी और फिर बोली____"माफ़ करना डियर, हमें यहीं पर सब कुछ करना पड़ेगा। उम्मीद है तुम्हें इससे कोई प्रॉब्लम नहीं होगी और तुम मुझे बेहतर सर्विस दे कर खुश कर दोगे।"

उसकी बात सुन कर मैंने ख़ामोशी से सिर हिलाया और उसकी तरफ बढ़ा। अपने जूते उतार कर मैं उसके क़रीब ही बैठ गया। मोबाइल की रौशनी में मुझे उस औरत का चेहरा और उसका जिस्म साफ़ दिख रहा था। उसकी उम्र यही कोई पैतीस चालीस के क़रीब रही होगी। गोरा चेहरा और भरे भरे सुर्ख गाल। कुल मिला कर गज़ब की माल लग रही थी। जिस्म भरा भरा तो था लेकिन उसे मोटी नहीं कह सकते थे। वो मुझे ही देख रही थी और मेरी ये सोच कर धड़कनें बढ़ गईं थी कि अब मुझे उसको सेक्स की सर्विस दे कर खुश करना है।

क़रीब एक घंटे से ऊपर का ही समय लग गया था मुझे उस औरत को सर्विस देते हुए। इस एक घंटे में मैंने उस औरत को पूरी तरह मस्त और पस्त कर दिया था। आख़िर में वो अपनी आँखें बंद किए गहरी गहरी साँसें लेती हुई लस्त पस्त पड़ी नज़र आ रही थी। हाल तो मेरा भी बेहाल था क्योंकि मेरे जिस्म पर कपड़े थे जो मुझे इस सबके बाद और भी ज़्यादा गर्मी से चूर किए हुए थे। हालांकि ठण्ड का मौसम था लेकिन इस वक़्त गर्मी चरम पर थी। ख़ैर कुछ देर रेस्ट लेने के बाद मैं उठ कर खड़ा हुआ तो उस औरत ने मुझे थैंक्स कहते हुए कहा कि उसकी उम्मीद से कहीं ज़्यादा मैंने उसे खुश किया है। उसे मेरा मोटा तगड़ा हथियार बेहद पसंद आया था।

मैं जिस तरह आया था उसी तरह वापस घर आ गया था। कमरे में आ कर मैंने सबसे पहले वो कपड़े उतारे और बाथरूम में घुस गया। मोटर साइकिल मैंने उसी जगह पर छोड़ दी थी जहां पर वो मुझे मिली थी। आज उस औरत को भोगने में पहले वाली से भी ज़्यादा मज़ा आया था मुझे।

☆☆☆
 
एक दो दिन ऐसे ही गुज़र गए। ज़फर अभी भी अपने निक़ाह की बात से परेशान था। मैं बहुत कोशिश कर रहा था कि उसकी परेशानी ख़त्म करूं लेकिन समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या करूं? एक दिन हम सभी दोस्तों ने फिर से उसी क्लब में जाने का प्रोग्राम बनाया। मोहित नाम के लड़के के साथ जो हादसा हुआ था उससे हम पर किसी भी तरह की कोई बात नहीं आई थी। शायद संजय अंकल का नाम ही काफी था सब कुछ शांत रखने के लिए।

शाम को अपने टाइम पर हम सभी दोस्त क्लब पहुंचे तो वहां मौजूद लोग हमें पलट पलट कर देखने लगे। शायद उस हादसे के बाद हम उन सबकी नज़रों में कुछ ख़ास ही चढ़ गए थे। ख़ैर हम लोग बार काउंटर की तरफ बढ़ ही रहे थे कि तभी हमें वहां का मैनेजर हमारी तरफ ही आता हुआ दिखा। हम पर नज़र पड़ते ही वो तेज़ी से हमारे पास आया और बड़े अदब से हमसे कहने लगा कि हमें जो कुछ भी चाहिए वो हमें फ़ौरन ही दिला देगा।

मैनेजर की बातें सुन कर हम सब अंदर ही अंदर खुश हो गए। उसके बाद हम सब बियर पीने लगे। मैनेजर हमारे पास ही खड़ा हुआ था। ऐसा लग रहा था जैसे ये उसकी ड्यूटी थी। मैंने अपने दोस्तों को एक नज़र देखा और फिर मैनेजर को एक तरफ ले जा कर उससे बोला कि क्लब में जो सबसे बढ़िया लड़की हो उससे मज़ा करने के लिए वो ब्यावस्था करे। मैनेजर हल्के से मुस्कुराया और फिर बोला कि हो जाएगा और इतना कह कर वो एक तरफ चला गया।

मैं मन ही मन ये सोच कर खुश हो रहा था कि ये तो कमाल ही हो गया। मतलब जिस चीज़ के लिए मैं सोच सोच कर परेशान हो रहा था वो बड़ी आसानी से होने जा रही थी। मैंने मन ही मन संजय अंकल को शुक्रिया कहा और दोस्तों के पास आ गया। दोस्तों से मैंने कहा कि मैं ज़फर की परेशानी दूर करने के लिए उसे अपने साथ ले जा रहा हूं, इस लिए वो लोग या तो हमारे लौटने का इंतज़ार करें या फिर घर लौट जाएं। मेरी बातें सुन कर सब के सब मुझे घूरने लगे थे। ज़फर खुद भी मुझे ऐसे देखने लगा था जैसे उसे कुछ समझ न आया हो।

मैंने आख़िर बाकियों को समझा बुझा कर घर भेज दिया और ज़फर को सब कुछ समझाने लगा। ज़फर को जब ये पता चला कि मैं उसकी परेशानी दूर करने के लिए उसे कहां और किस लिए ले जाने वाला हूं तो वो बुरी तरह हैरान रह गया।

"अबे तू सोच भी कैसे सकता है कि मुझसे ये हो पाएगा?" ज़फर ने मुझसे घूरते हुए कहा____"अगर ये हमारे लिए इतना ही आसान होता तो क्या अब तक हम सब मुट्ठ मार रहे होते?"

"बकवास मत कर तू और जो कह रहा हूं वो कर, समझा?" मैंने थोड़े शख़्त लहजे में कहा____"साला कहता है कि कैसे हो पाएगा, अबे लौड़ा तो तेरा भी मेरे वाले से कम नहीं है।"

"बात उसकी नहीं है भाई।" ज़फर माथे का पसीना पोंछते हुए बोला____"बल्कि बात है हिम्मत की। तू अच्छी तरह जानता है कि हम लोग इस मामले में कितना शरमाते हैं।"

"शरम वरम को निकाल कर फेंक दे भाई।" मैंने कहा____"अगर नाज़िया भाभी के साथ सुहागरात मनानी है तो अपने अंदर से अपनी ये परेशानी दूर करनी ही होगी वरना सोच लेना कि क्या होगा। मैं अपने तज़ुर्बे की बात बता रहा हूं तुझे कि जब तू एक बार किसी लड़की को तबीयत से पेल लेगा तो तेरे अंदर से सारी शर्म और झिझक निकल जाएगी।"

"भोसड़ी के।" ज़फर ने गाली देते हुए कहा____"तुझे कब इसका तज़ुर्बा हो गया बे?"

"बस हो गया मुझे।" मैंने कहा____"अब ये मत पूंछ कि कब और कैसे हो गया? अगर तुझे मेरी बात का यकीन नहीं होता तो चल मेरे साथ। मैं तेरे सामने उस लड़की को पूरा नंगा करके पेलूंगा और तू खुद अपनी आँखों से देखना कि मेरे अंदर लेश मात्र की भी शर्म और झिझक है कि नहीं।"

ज़फर मेरी बातें सुन कर हैरत से मुझे देखने लगा था। अभी वो कुछ बोलने ही वाला था कि तभी मैनेजर मेरे पास आ गया और उसने मुझसे कहा कि इंतजाम हो गया है। मैनेजर की बात सुन कर मैं उसके साथ चलने को तैयार हो गया। मैं ज़फर का हाथ पकड़ कर खींचते हुए मैनेजर के पीछे चलने लगा था। ज़फर को समझ नहीं आ रहा था कि ये अचानक से क्या होने जा रहा है?

कुछ ही देर में मैनेजर हमें अंदर की तरफ बने एक कमरे के पास पहुंचा दिया और कहा कि कमरे के अंदर लड़की हमारा इंतज़ार कर रही है। मैनेजर की बात सुन कर जहां मैंने ख़ामोशी से सिर हिला दिया वहीं ज़फर आँखें फाड़ कर मेरी तरफ देखने लगा था। शायद अब उसे एहसास हो गया था कि मैं यूं ही नहीं फेंक रहा था।

मैनेजर के जाने के बाद मैंने कमरे के दरवाज़े को अंदर की तरफ धकेला तो वो खुल गया। इधर ज़फर धीमी आवाज़ में मुझसे कहने लगा कि भाई मुझे अंदर मत ले जा क्योंकि उसे इस बारे में सोच कर ही घबराहट होने लगी है। मैं ज़फर की हालत को समझ सकता था इस लिए उसे हौंसला दिया और ज़बरदस्ती उसे कमरे के अंदर खींच कर ले गया। कमरे को अंदर से बंद कर के मैं जैसे ही मुड़ा तो एक शानदार बेड पर बैठी हुई बड़ी ही खूबसूरत लड़की दिखी। हम पर नज़र पड़ते ही वो बड़ी अदा से मुस्कुराई। ज़फर उसे देखते ही बुत सा बन गया था। उसका एक हाथ अभी भी मेरे हाथ में था इस लिए मैं उसके हाथ के द्वारा ही उसके जिस्म में हो रही थरथराहट को महसूस कर रहा था।

"हैल्लो डियर।" मैंने उस लड़की की तरफ देखते हुए मुस्कुरा कर कहा तो उस लड़की ने मुस्कुराते हुए हेलो कहा। इधर ज़फर मेरे मुँह से ऐसा सुन कर हैरानी से मेरी तरफ देखने लगा था। मैंने उसकी तरफ देखा और मुस्कुराते हुए धीमी आवाज़ में कहा कि मर्द बन भाई और मेरे साथ साथ इस लड़की पर छा जाने को तैयार हो जा।

ज़फर की हालत बड़ी ही दयनीय जैसी हो गई थी। उसका बस चलता तो वो उस कमरे से भाग खड़ा होता लेकिन मैंने मजबूती से उसका हाथ थाम रखा था। ख़ैर उस लड़की के हैलो कहते ही मैं ज़फर को लिए बेड की तरफ बढ़ा तो ज़फर अपना हाथ मुझसे छुड़ाने के लिए ज़ोर देने लगा। मैंने पलट कर उसकी तरफ गुस्से से देखा और धीमे स्वर में कहा कि साले बाहर तो उस दिन बहुत बड़ी बड़ी बातें कर रहा था तो अब क्या हुआ? मैंने उसे धमकाया कि अगर वो मेरे कहे अनुसार कोई काम नहीं किया तो मैं उसे इस लड़की के सामने बुरी तरह ज़लील करुंगा। ज़फर मेरी बात सुन कर अपना थूक गटक कर रह गया।

"क्या तुम हम दोनों को खुश कर सकती हो डियर?" मैंने पलट कर उस लड़की से पूछा तो उसने मुस्कुराते हुए कहा____"बेशक, मैं पूरी कोशिश करुँगी कि आप दोनों को मैं हर तरह से खुश कर दूं।"

"बहुत बढ़िया।" मैंने कहा____"वैसे मैं ये चाहता हूं कि तुम मेरे इस दोस्त को ज़्यादा खुश करने की कोशिश करो लेकिन कुछ इस तरह से कि इसके अंदर का मर्द पूरा का पूरा जाग जाए।"

"जी मैं समझ गई आपकी बात।" लड़की ने मुस्कुराते हुए कहा_____"आप फिक्र न करें। मैं आपके दोस्त को ऐसे तरीके से ही खुश करुँगी जिससे हमेशा के लिए इनकी मर्दानगी जाग जाए।"

"चलो तो फिर शुरू करो।" मैंने कहा और फिर ज़फर की तरफ देखा तो वो मेरी तरफ देखते हुए बहुत ही धीमे स्वर में बोला____"भोसड़ी के मुझे यहाँ से जाने दे वरना बाहर तेरी गांड तोड़ दूंगा।"

"अगर तूने यहाँ से जाने के बारे में सोचा तो मैं तेरी गांड में इस लड़की के द्वारा डंडा डलवा दूंगा। चल अब नौटंकी मत कर और इस लड़की के साथ शुरू हो जा। वैसे तू घबरा मत, मुझे पूरा यकीन है कि इस कमरे से तू खुशी से नाचते हुए आएगा।"

"तेरे जैसा दोस्त हो तो किसी दुश्मन की ज़रूरत ही नहीं है?" ज़फर ने दाँत पीसते हुए धीमे स्वर में कहा____"साले छोड़ूंगा नहीं तुझे।"

"साला भलाई का तो ज़माना ही नहीं रहा।" मैंने झल्लाते हुए कहा____"देख मुझे गुस्सा मत दिला वरना सच में तेरे लिए अच्छा नहीं होगा। ज़रा सोच भाई कि अगर तू यहाँ से बिना कुछ किए ही चला जाएगा तो ये लड़की क्या सोचेगी तेरे बारे में? क्या तू चाहता है कि ये तुझे सिक्सर किंग समझे?"

मेरी बातें सुन कर ज़फर कुछ न बोल सका। खैर मैंने उसे ज़बरदस्ती बेड पर उस लड़की के बगल से बैठा दिया और खुद कमरे में ही एक तरफ रखे एक सोफे पर बैठ गया। ज़फर का चेहरा पसीने से तरबतर हो चुका था। उसकी धड़कनें बढ़ी हुईं थी। मैं समझ सकता था कि इस वक़्त उसे कैसा लग रहा होगा। आख़िर मैं भी तो उसी हालत से गुज़रा था।

"भोसड़ी के, अब क्या तू यहाँ बैठ कर मेरी इज्ज़त को लुटते हुए देखेगा?" ज़फर फ़ौरन ही बेड से उठ कर मेरे पास आ कर धीरे से बोला था____"या तो मुझे यहाँ से जाने दे या फिर तू यहाँ से चला जा। मैं तेरे सामने वो होते नहीं देख सकूंगा।"

"चल ठीक है मैं चला जाता हूं।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा____"लेकिन याद रखना कि तुझे ये जंग जीत के आना है बाहर।"

"मैंने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन ऐसा भी आएगा जब मेरा ही दोस्त मुझे ऐसे हाल में डाल कर मेरी इज्ज़त का जनाज़ा उठने का इंतज़ार करेगा।" ज़फर ने धीमे स्वर में तथा हताश भाव से कहा____"तू दोस्त नहीं है साले बल्कि मेरा सबसे बड़ा दुश्मन है।"

मैं ज़फर की बातें सुन कर मुस्कुराते हुए सोफे से उठा और कमरे से बाहर चला गया। बाहर आ कर मैंने दरवाज़े को बाहर से ये सोच कर बंद कर दिया कि कहीं ज़फर सच में ही न भाग आए। खैर बार काउंटर के पास आया तो मैनेजर मिल गया मुझे। उसने मुझे देखा तो लपक कर मेरे पास आया और पूछा कि मैं इतना जल्दी बाहर कैसे चला आया तो मैंने उसे बताया कि मेरा दोस्त उस लड़की के साथ है।
 
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