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अब तक...
उस आदमी की चीख निकल गई और वो मेरा गिरेहबान छोड़ कर धड़ाम से ज़मीन पर जा गिरा था। वातावरण में एकदम से ख़ामोशी छा गई थी। इधर मैं हैरान कि उस आदमी को अचानक से क्या हुआ? जब मैंने गौर से उसकी तरफ देखा तो मेरी नज़र उसके दाहिने हाथ की कलाई पर धंसे चाकू पर पड़ी। चाकू उसकी कलाई के आर पार हो गया था और वहां से खून बहने लगा था। ये देख कर मैं तो बुरी तरह घबरा ही गया था लेकिन वहां खड़े लोग भी सन्नाटे में आ गए थे।
अब आगे...
फ़िज़ा में एकदम से मौत जैसा सन्नाटा छा गया था। किसी को समझ ही नहीं आ रहा था कि अचानक से ये क्या हो गया? फिर जैसे लोगों का ज़हन सक्रिय हुआ तो सब इधर उधर देखने लगे। सबकी घूमती हुई निगाहें एक जगह जा कर रुक गईं। मुख्य सड़क के पास एक कार खड़ी थी और कार के ड्राइविंग डोर के पास शानदार कोट पहने एक आदमी खड़ा था। कार के दूसरी तरफ एक और आदमी था और पीछे वाले दरवाज़े के पास उसी के जैसे वेश भूषा में एक दूसरा आदमी खड़ा था।
उस आदमी पर नज़र पड़ते ही मेरी और मेरे दोस्तों की हवा निकल गई। मैंने और मेरे सभी दोस्तों ने बारी बारी से एक दूसरे की तरफ देखा। चेहरों पर पसीना उभर आया था। कोई नार्मल सिचुएशन होती तो हमारी ऐसी हालत नहीं होती लेकिन ये सिचुएशन नार्मल नहीं थी। हम सब तो ये सोच कर घबराहट से भर गए थे कि क्या होगा उस वक़्त जब उस आदमी को हमारी इस करतूत की असलियत का पता चलेगा? ख़ैर वो आदमी हमारी तरफ बढ़ा तो उसके पीछे वो दोनों आदमी भी चल पड़े। उन दोनों की कमर के पास लटक रहे हॉलेस्टर में मौजूद रिवाल्वर के दस्ते साफ़ दिख रहे थे।
"ये चाकू मैं तेरे मुँह के आर पार भी कर सकता था।" उस आदमी ने पास आ कर उस आदमी से कहा जिसे चाकू लगा था और इस वक़्त वो उठ कर ज़मीन पर ही बैठा दर्द से कराह रहा था____"क्योंकि तेरी गन्दी ज़ुबान ने एक ऐसे लड़के से बत्तमीज़ी से बात की जो मेरे दोस्त का चश्मो चिराग़ है। ख़ैर अब मैं तुझे दिखाता हूं कि तुझे किसी बात से फ़र्क पड़ता है की नहीं।"
"मुझे माफ़ कर दीजिए सर।" ज़मीन पर बैठे कराह रहे उस आदमी ने लडखडाती आवाज़ में कहा____"मुझे पता ही नहीं था कि ये लड़के आपके पहचान वाले हैं।"
"ये सब मेरे जिगर के टुकड़े हैं।" उस आदमी ने कहा जो वास्तव में कोई और नहीं बल्कि रंजन के पापा थे, बोले____"और तूने सबके सामने इनसे बत्तमीज़ी में बात की है और इतना ही नहीं तूने अपनी मर्दानगी दिखाते हुए मेरे दोस्त के चश्मो चिराग़ का गिरेहबान भी पकड़ा। इसकी सज़ा तो तुझे मिलेगी।"
"न..नहीं नहीं सर।" वो आदमी जो की क्लब का बाउंसर था बुरी तरह गिड़गिड़ाने लगा____"प्लीज़ मुझे माफ़ कर दीजिए। आइंदा कभी भी ऐसी ग़लती नहीं करुंगा।"
"क्या हो रहा है यहाँ?" तभी पीछे से भीड़ को चीरता हुआ एक और आदमी आया। जैसे ही उसकी नज़र रंजन के पापा पर पड़ी तो वो बुरी तरह चौंक गया। फिर बड़े ही अदब से उनसे बोला_____"अरे! सर आप यहाँ कैसे और ये सब क्या है?"
"तुम्हारे इस कुत्ते ने मेरे बच्चे का गिरेहबान पकड़ा और उसके साथ बत्तमीज़ी से बात की है।" संजय अंकल कहा____"इस लिए अब इसे इसके किए की सज़ा इसे मिलेगी।"
"मैं मानता हूं सर कि इसने बहुत बड़ी ग़लती की है।" उस आदमी ने कहा जो क्लब का मैनेजर था____"लेकिन यकीनन इसे ये पता नहीं था कि इसने जिसके साथ ऐसी बत्तमीज़ी से बात की है वो आपके घर के हैं।"
"बात सिर्फ ये नहीं है कि ये बच्चे हमारे घर के हैं।" संजय अंकल ने कहा____"बात ये भी है कि तुम्हारे इस कुत्ते का लहजा सबके लिए ऐसा ही होगा। ऐसे कुत्ते को क्लब में क्यों रखा हुआ है तुमने जिसे किसी से बात करने का मैनर ही नहीं है?"
क्लब के मैनेजर ने संजय अंकल को बहुत समझाया लेकिन वो न माने। यहाँ तक कि वो बाउंसर भी अपने किये की माफियां मांगता रहा लेकिन संजय अंकल के इशारे पर उनके साथ आए उन दोनों आदमियों ने उस बाउंसर को उठाया और ले जा कर कार की डिग्गी में डाल कर बंद कर दिया।
इधर संजय अंकल उस लड़के के पास गए जिसे मैंने मारा था। वो अभी भी सहमा सा खड़ा हुआ था। उसकी गर्लफ्रेंड भी डरी सहमी उसके पास ही खड़ी थी।
"मेरा नाम संजय भाठिया है।" मोहित की आँखों में झांकते हुए संजय अंकल ने कड़क लहजे में कहा____"जा कर अपने बाप को बता देना कि जिसने तुम्हारा ये हाल किया है वो लड़का मुझसे ताल्लुक रखता है।" कहने के साथ ही अंकल ने उस लड़की की तरफ देखा तो वो डर के मारे और भी सहम गई।
"मैं अच्छी तरह जानता हूं कि यहाँ पर जो कुछ भी हुआ है।" संजय अंकल ने उसकी तरफ देखते हुए कहा____"उसकी शुरुआत मेरे बच्चे ने नहीं की थी। अपने बच्चों की रग रग से वाक़िफ़ हूं मैं, इस लिए मेरी सलाह है कि इस सबको बुरा ख़्वाब समझ कर ज़हन से निकाल देना। मैं नहीं चाहता कि किसी के घर की इज्ज़त मेरे गुस्से का शिकार हो जाए।"
संजय अंकल की मौजूदगी ने जैसे जादू सा कर दिया था। वहां किसी में भी हिम्मत न हुई थी कि उनसे कुछ बोल सके। ख़ैर उसके बाद अंकल चले गए और हम लोग भी अपनी अपनी मोटर साइकिल स्टार्ट कर के घर चल पड़े। हम सबके ज़हन में एक ही बात चल रही थी कि संजय अंकल ने इस सबके बारे में हम में से किसी से भी कोई सवाल क्यों नहीं किया था? क्या अपने सामने वो हम सबकी क्लास लेने वाले थे? यही सब सोचते हुए हम अंदर ही अंदर घबरा रहे थे।
उस आदमी की चीख निकल गई और वो मेरा गिरेहबान छोड़ कर धड़ाम से ज़मीन पर जा गिरा था। वातावरण में एकदम से ख़ामोशी छा गई थी। इधर मैं हैरान कि उस आदमी को अचानक से क्या हुआ? जब मैंने गौर से उसकी तरफ देखा तो मेरी नज़र उसके दाहिने हाथ की कलाई पर धंसे चाकू पर पड़ी। चाकू उसकी कलाई के आर पार हो गया था और वहां से खून बहने लगा था। ये देख कर मैं तो बुरी तरह घबरा ही गया था लेकिन वहां खड़े लोग भी सन्नाटे में आ गए थे।
अब आगे...
फ़िज़ा में एकदम से मौत जैसा सन्नाटा छा गया था। किसी को समझ ही नहीं आ रहा था कि अचानक से ये क्या हो गया? फिर जैसे लोगों का ज़हन सक्रिय हुआ तो सब इधर उधर देखने लगे। सबकी घूमती हुई निगाहें एक जगह जा कर रुक गईं। मुख्य सड़क के पास एक कार खड़ी थी और कार के ड्राइविंग डोर के पास शानदार कोट पहने एक आदमी खड़ा था। कार के दूसरी तरफ एक और आदमी था और पीछे वाले दरवाज़े के पास उसी के जैसे वेश भूषा में एक दूसरा आदमी खड़ा था।
उस आदमी पर नज़र पड़ते ही मेरी और मेरे दोस्तों की हवा निकल गई। मैंने और मेरे सभी दोस्तों ने बारी बारी से एक दूसरे की तरफ देखा। चेहरों पर पसीना उभर आया था। कोई नार्मल सिचुएशन होती तो हमारी ऐसी हालत नहीं होती लेकिन ये सिचुएशन नार्मल नहीं थी। हम सब तो ये सोच कर घबराहट से भर गए थे कि क्या होगा उस वक़्त जब उस आदमी को हमारी इस करतूत की असलियत का पता चलेगा? ख़ैर वो आदमी हमारी तरफ बढ़ा तो उसके पीछे वो दोनों आदमी भी चल पड़े। उन दोनों की कमर के पास लटक रहे हॉलेस्टर में मौजूद रिवाल्वर के दस्ते साफ़ दिख रहे थे।
"ये चाकू मैं तेरे मुँह के आर पार भी कर सकता था।" उस आदमी ने पास आ कर उस आदमी से कहा जिसे चाकू लगा था और इस वक़्त वो उठ कर ज़मीन पर ही बैठा दर्द से कराह रहा था____"क्योंकि तेरी गन्दी ज़ुबान ने एक ऐसे लड़के से बत्तमीज़ी से बात की जो मेरे दोस्त का चश्मो चिराग़ है। ख़ैर अब मैं तुझे दिखाता हूं कि तुझे किसी बात से फ़र्क पड़ता है की नहीं।"
"मुझे माफ़ कर दीजिए सर।" ज़मीन पर बैठे कराह रहे उस आदमी ने लडखडाती आवाज़ में कहा____"मुझे पता ही नहीं था कि ये लड़के आपके पहचान वाले हैं।"
"ये सब मेरे जिगर के टुकड़े हैं।" उस आदमी ने कहा जो वास्तव में कोई और नहीं बल्कि रंजन के पापा थे, बोले____"और तूने सबके सामने इनसे बत्तमीज़ी में बात की है और इतना ही नहीं तूने अपनी मर्दानगी दिखाते हुए मेरे दोस्त के चश्मो चिराग़ का गिरेहबान भी पकड़ा। इसकी सज़ा तो तुझे मिलेगी।"
"न..नहीं नहीं सर।" वो आदमी जो की क्लब का बाउंसर था बुरी तरह गिड़गिड़ाने लगा____"प्लीज़ मुझे माफ़ कर दीजिए। आइंदा कभी भी ऐसी ग़लती नहीं करुंगा।"
"क्या हो रहा है यहाँ?" तभी पीछे से भीड़ को चीरता हुआ एक और आदमी आया। जैसे ही उसकी नज़र रंजन के पापा पर पड़ी तो वो बुरी तरह चौंक गया। फिर बड़े ही अदब से उनसे बोला_____"अरे! सर आप यहाँ कैसे और ये सब क्या है?"
"तुम्हारे इस कुत्ते ने मेरे बच्चे का गिरेहबान पकड़ा और उसके साथ बत्तमीज़ी से बात की है।" संजय अंकल कहा____"इस लिए अब इसे इसके किए की सज़ा इसे मिलेगी।"
"मैं मानता हूं सर कि इसने बहुत बड़ी ग़लती की है।" उस आदमी ने कहा जो क्लब का मैनेजर था____"लेकिन यकीनन इसे ये पता नहीं था कि इसने जिसके साथ ऐसी बत्तमीज़ी से बात की है वो आपके घर के हैं।"
"बात सिर्फ ये नहीं है कि ये बच्चे हमारे घर के हैं।" संजय अंकल ने कहा____"बात ये भी है कि तुम्हारे इस कुत्ते का लहजा सबके लिए ऐसा ही होगा। ऐसे कुत्ते को क्लब में क्यों रखा हुआ है तुमने जिसे किसी से बात करने का मैनर ही नहीं है?"
क्लब के मैनेजर ने संजय अंकल को बहुत समझाया लेकिन वो न माने। यहाँ तक कि वो बाउंसर भी अपने किये की माफियां मांगता रहा लेकिन संजय अंकल के इशारे पर उनके साथ आए उन दोनों आदमियों ने उस बाउंसर को उठाया और ले जा कर कार की डिग्गी में डाल कर बंद कर दिया।
इधर संजय अंकल उस लड़के के पास गए जिसे मैंने मारा था। वो अभी भी सहमा सा खड़ा हुआ था। उसकी गर्लफ्रेंड भी डरी सहमी उसके पास ही खड़ी थी।
"मेरा नाम संजय भाठिया है।" मोहित की आँखों में झांकते हुए संजय अंकल ने कड़क लहजे में कहा____"जा कर अपने बाप को बता देना कि जिसने तुम्हारा ये हाल किया है वो लड़का मुझसे ताल्लुक रखता है।" कहने के साथ ही अंकल ने उस लड़की की तरफ देखा तो वो डर के मारे और भी सहम गई।
"मैं अच्छी तरह जानता हूं कि यहाँ पर जो कुछ भी हुआ है।" संजय अंकल ने उसकी तरफ देखते हुए कहा____"उसकी शुरुआत मेरे बच्चे ने नहीं की थी। अपने बच्चों की रग रग से वाक़िफ़ हूं मैं, इस लिए मेरी सलाह है कि इस सबको बुरा ख़्वाब समझ कर ज़हन से निकाल देना। मैं नहीं चाहता कि किसी के घर की इज्ज़त मेरे गुस्से का शिकार हो जाए।"
संजय अंकल की मौजूदगी ने जैसे जादू सा कर दिया था। वहां किसी में भी हिम्मत न हुई थी कि उनसे कुछ बोल सके। ख़ैर उसके बाद अंकल चले गए और हम लोग भी अपनी अपनी मोटर साइकिल स्टार्ट कर के घर चल पड़े। हम सबके ज़हन में एक ही बात चल रही थी कि संजय अंकल ने इस सबके बारे में हम में से किसी से भी कोई सवाल क्यों नहीं किया था? क्या अपने सामने वो हम सबकी क्लास लेने वाले थे? यही सब सोचते हुए हम अंदर ही अंदर घबरा रहे थे।