• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

हिन्दी नॉवल-काली दुनिया का भगबान - complete

  • Thread starter Thread starter StoryPublisher
  • Start date Start date
तुम्हारे दिमाग में इस कमरे से बाहर निकलने का कोई रास्ता है मेरे कानों से एक धीमा-सा स्वर टकराया । मैं चौंकी । मैंने पट से आंखें खोल दीं । फिर मुझे कुछ सुनाई नहीं दिया था ।

मैंने सोचा मेरा वहम है । लेकिन वो मेरा वहम कैसे हो सकता था? वो आवाज मैंने साफ-साफ सुनी थी ।

मेरे कान खड़े हो गये।

"जवाब दो ।" इस बार दूसरा स्वर मुझे सुनाई दिया था ।

वह आवाज ऐसी थी जैसे कोई मच्छर भिनभिनाता हो ।

आवाज बगल वाले कमरे से आई थी, जिसके मजबूत दरवाजे पर लोहे का ताला लटका हुआ था ।

पलक झपकते ही मेरे जेहन में एक सवाल कौंध गया था ।

कमरे में कौन लोग हैँ?

"मेरे दिमाग में कमरे से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं है ।" जवाब में कहा गया ।

मेरी उत्सुकता आसमान छूने लगी ।

मै स्प्रिग लगे खिलौने की तरह उछलकर खडी हो गई और दबे कदमों कोने में रखी मेज की तरफ बढी ।

"ओपफो ।" इस बार तीसरे व्यक्ति का बैचेनी भरा स्वर मुझे सुनाई दिया…"कुछ तो सोचो । इस तरह हथियार डाल देने से काम नहीं चलेगा, अगर हमलोग यहां से नहीं निकले तो हमें ऐसी भयानक मौत मिलेगी, जिसकी हमने सपने में भी कल्पना नहीं की होगी ।"

"तुम ही कुछ क्यों नहीं सोचते?"

"क्या सोचूं?. मेरे दिमाग ने तो काम करना ही की कर दिया है ।"

"फिर तो मौत का इंतजार करो । कुछ देर बाद हमें गोलियों से भून दिया जायेगा, और हमारी लाशें चीलें-कौओ के खाने के लिये छत पर डाल दी जायेंगी । मुझे एक ही बात का अफसोस है कि मैं सर एडलॉफ के लिये कुछ नहीं कर सका ।"

अब मैं समझ गई कि वे लोग सर एडलॉफ के समर्थक हैं ।

मैं मेज के करीब पहुंची ।

मैंने मेज उठाकर उसका वजन परखा, वो ज्यादा भारी नहीं थी । मैंने मेज को खिड़की के नीचे दीवार के साथ सटाकर रख दिया, फिर उस पर चढ गई । "

अब मेरा चेहरा खिड़की के सामने था ।

मैंने चेहरा सलाखों से सटाकर दूसरी तरफ झाका, उस कमरे के फर्श पर छ: व्यक्ति बैठे हुए थे । सभी के चेहरों पर पत्थर जैसी कठोरता नजर जा रहीँ थी ।

कमरे में बल्ब का पीला एवं बीमार प्रकाश फैला हुआ था ।

"अच्छा ये बताओ क्या किसी तरह इस कमरे की दीवार नहीं तोडी जा सकती?" एक ने कहा ।

"पागल हो तुम?" दुसेर ने कहा-"इस कमरे की दीवारें कागज की हैं क्या, जो तोडी जा सकी तुम्हारा सवाल बहा ही बचकाना है ।"

पहले वाला अपना-सा मुँह लेकर रह गया

क्षण भर कुछ सोचकर सलाखों पर दस्तक दी ।

सभी ने चेहरे उठाकर खिड़की की तरफ देखा । मुझे खिड़की के पीछे देख उनके चेहरों पर असमंजस के भाव उभरे।

मैंने उनमें से एक को हाथ से अपनी तरफ़ आने का इशारा किया । उसने प्रश्न भरी निगाहों से अपने साथियों की तरफ देखा ।

"सोच क्या रहे हो?" मैंने धीमे स्वर में कहा----" जल्दी से मेरे पास आओं ।"

वह एक झटके से उठा और लपकता हुआ खिड़की के नीचे आकर खड़ा हो गया, फिर उसने अपना ऊपर उठाकर पूछा-"कौंन हो ?"

" हमदर्द समझो ।"

" मेरी हमदर्द यहाँ कहां से आ गई?" वह चकराया-सा बोला---"यहाँ तो हर कोई हमारा दुश्मन है । हमारे खून का प्यासा !"

"मैंने जो कहा है । वह सच है ।"

"तुमने मुझे क्यों बुलाया?" उसने सवाल किया ।

"तुम दीवार को तोड़ने की बात कर रहे थे न ।"

"हां ।"

"कमरे की दीवार तोड्री जा सकती है ।"

" क. .क्या ?" उसका मुंह हैरत से भाड़ की तरह खुल गया ।

" मैँ ठीक का रही हू । इस काम में मैं तुम्हारी मदद कर सकती हूं !"

"लेकिन तुम हमारी मदद क्यों करना चाहती हो, इसमें तुम्हारी क्या दिलचस्पी हैं ?"

"तुम लोग सर एंडलॉफ़ के समर्थक हो और एक अच्छे काम के लिये जालिमो के खिलाफ जंग लड़ रहे हो । यही वजह है कि मैं तुम लोगों की मदद करना चाहती हूं।" मैं फुसफुसाई ।

उसका चेहरा चमक उठा ।

"ल .लेकिन दीवार कैसे तोडी जा सकती है ?" उसने सवाल किया ।

"वो भी बताऊगी । लेकिन पबले ये बताओ कि दीवार के दूसरी तरफ़ क्या है?"

"खाली जगह है ।"

"पक्की बात ।"

" एकदम पक्की बात ।"

" यानि दीवार टूटने के बाद तुम आसानी से यहां से भागने मे कामयाब हो जाओगे !"

"अबश्य ।"

"यहां से निकलने के बाद तुम लोगों को एक काम करना होगा ।"

"क्या ?" उसकी सवालिया निगाहें मेरे चेहरे पर फिक्स होकर रह गई ।

"तुम सर एडलॉंफ के समर्थक हो । तुम्हें इस बारे में जानकारी होगी कि इस शहर में तुम लोगों के ठिकाने कहां-कहां हैँ? तुम्हारे साथी किस जगह छिपकर अपनी कार्यवाही करते हैं ।"

"हमें पूरी जानकारी है ।"

"यहां से निकलने के बाद तुम उन ठिकानों पर मोजूद अपने साथियों को सावधान कर दोगे कि अब वो जगह उनके लिये सुरक्षित नहीँ रही है । कभी भी सैनिक यहां पहुंचकर उन्हें गिरफ्तार कर सकते ।"

मैंने ये बात उसे-इसलिए कहीं थी कि अगर सैनिक क्लाइव का मुंह खुलवाने में कामयाब हो भी जायं तो वहां उन्हें चिडिया का बच्चा भी न मिले ।

" अपने साथियों को खबर करना मेरी जिम्मेदारी है । अब मुझें जल्दी से बताओं कि दीवार केसे तोडी जा सकती हे? अगर सैनिक यहां आ गये तो हम लोगों की मौत निश्चित है ।"

"अपनी शर्ट फैलाओ ।"

उसने अपनी शर्ट के दोनों कोने पकड़कर आगे की तरफ फैला दिए।

मैंने अपने सैडिल की एडी ढक्कन की तरह खोली और उस खोखली एडी में रखा बड़े आकार का एक कैप्सूल निकालकर सलाखों के बीच में हाथ डालकर नीचे छोड़ दिया ।

कैप्पूल उसकी फैली शर्ट पर'गिरा ।

"य. . .ये क्या है ?“ उसने र्केप्सूल पर निगाह मारी, फिर चेहरा उठाकर मेरी तरफ देखता हुआ बोला ।

"दरअसल ये कैप्सूल एक शक्तिशाली बम है । ये इन्सानी जान भी ले सकता है । कमरे की दीवार को ध्वस्त करने के लिये । एक कैंप्यूल बम काफी होगा ।"

"अ. . . अच्छा ।" उसके होठों से आश्चर्य भरा स्वर निकला ।

"हां !"

उसने कैप्पूल उठाकर अपनी मुट्ठी में दबा लिया । पलक झपकते ही उसका चेहरा पत्थर की तरह कठोर होता चला गया । जबड़े कस गये । इस बीच उसके पांचो साथी भी वहीं पहुच गये थे ।

"लेकिन एक बात है ।" मैंने कहा ।

"क्या?" इस बार उसका एक साथी बोल उठा ।

दीवार उडाने के चक्कर में तुम लोगों की जाने भी जा सकती हैं । तुम लोग मलवे की चपेट में आ सकते हो ।"

"हम लोग सैनिकों के हाथों दर्दनाक मोत मरने से ऐसी मौत मरना बैहतर समझते हैं ।" तीसरे ने कहा ।

"एक बात और ।"

"वो क्या?" उन सभी की निगाहें मेरे चेहरे पर आ टिकी ।

"बम फटने से जबरदस्त धमाका होगा । धमाके की आवाज इस समूची इमारत में सुनी जायेगी । तुम लोग पकडे भी जा सकते हो । फिर सैनिक तुम्हे ऐसी मौत देगे, जिसका अंदाजा तुम स्वयं भी लगा सकते हो ।" मैंने कहा ।

" वो बाद की बात है । अगर हम यहां से भाग निकले तो फिर हम सैनिकों के फरिश्तों के हाथ भी नहीं आयेंगे । बस हमें भागने . के लिए रास्ता मिल जाये ।"

"रास्ता तो तुम्हें मिल ही जायेगा । गोड का नाम लेकर इस कैपूसूल को पूरी ताकत से सामने वाली दीवार पर दे मारो । कमरे की दीबार मलबे के देर में तब्दील हो जायेगी ।"

उस शख्स ने कैप्सूल पूरी ताकत से सामने वाली दीवार पर दे मारा ।

अगले क्षण ।

धड़ाम् ।
 
एक जबरदस्त विस्फोट हुआ ।. . पलक झपकते ही .कमंरे मे धुएं का पहाड-सा खडा हो गया था । फिर मलबे के गिरने की आवाज सुनाई दी इस धुएं में मेरे लिए कुछ भी देख पाना संभव नहीं था । कुछ क्षणों वाद धूआं छंटा । मेंने देखा, तो दीवार आधी से अधिक उड़ चुकी थी । कमरे में मलवा बिखरा पड़ा था 1 उस त्तरफ खाली जगह थी ।

"अब देर मत करो ।" मैं बोल उठी-"भाग जाओं ।"

मेरे कहने की देर थी कि वे खुली जगह में जम्प लगा गये । फिर खाली जगह में यूं भाग खड़े हुए मानो उनके पीछे सेकंडों भूत लगे हो ।

मैंने उन लोगों की जान बचा दी थी ।

तभी ।

इमारत में भारि ब्रूटो की आवाज गूजती चली गई । जाहिर था कि विस्फोट की आबाज़ सेनिकों ने सुन ली थी ।

अब बो आबाज करीब आती जा रही थी ।

एक क्षण का सौवा हिस्सा भी व्यर्थ किये बगैर मैं मेज से नीचे कूद गई थी । मैंने दोनों हाथों से मेज़ उठाकर यथास्थान रख दी, फिर आगे बढकर दीवार से पीठ सटाकर खडी हो गई । अब बूटो की आवाज बाहर राहदारी में गूंज रही थी । कुछ क्षण ही गुजरे थे कि मेरे कमरे का दरवाजा तीव्रता के साथ खुला। अगले क्षण कई सेनिक घडधड़ाते हुए भीतर दाखिल हुए।

सैनिकों के पीछे सोल्जर ने भीतर कदम रखा।

"धमाका क्रिस तरफ हुआ रीमा?" सोल्जर ने मुझसे पूछा ।

"बगल वाले कमरे में ।" मेने कहा-"धमाका बडा जबरदस्त था । मुझे तो अपने कानों के परदे फटते हुए से महसूस हुए थे । चक्कर क्या हैं ?"

मेरे सवाल का जबाब दिये बगैर वह सैनिकों को सम्बोधित करता हुआ आदेशपूर्ण लहजे में बोला-"मुझें कोई गड़बड़ लगती है । जल्दी से कमरा खोलकर देखो ।"

सैनिक दरवाजे की तरफ लपके । मैं उठकर खडी हो चुकी थी । सैनिक ने दरवाजे के मुंह पर पडा ताला खोला और दरवाजा धकेलते हुए 'तीर की तरह भीतर दाखिल हुए । भीतर उन्हें क्या मिलना था? कमरा खाली पड़ा हुआ था । पंछी उड़ चुके थे ।

"कमरे में तो कोई नहीं है सर ।" एक सैनिक कमरे से बाहर निकलता हुआ बोला--"कमरे की पीछे वाली दीवार टूटी पडी है ।"

"व. . . व्हाट ?" सोल्जर उछल पडा ।

"यस सर ।" सैनिक ने कहा---" वे दीवार तोडकर भाग गये हैं । दीवार को बम से उड़ाया गया है । वॅ धमाका बम का ही था ।"

"उन लोगों के पास बम कहां से आ गया बेवकूफ ।" सोल्जर ' बोला---" उन हरामजादों को इस कमरे में बंद क्रिया गया था, उनकी बारीकी से तलाशी ली गई थी । उनके पास सुई तक नहीं थी और तुम कह रहे हो कि वे बम से दीवार तोड़कर भागे हैं ।"

सैनिक पर कुछ कहते नहीं वना ।

"वे भागे नहीं हैँ! उन्हें भगाया गया है ।" बह पुन: बोल उठा-"उन्हें भगाने में जरूर किसी ने उनकी मदद की ।"

मेरा दिल जोरों से धडक उठा ।

पलक झपकते ही मेरे दिमाग में एक बिचार चकराता चला गया कि अगर सोल्जर को मेरे ऊपर शक हो गया तो मेरी सारी मेहनत पर पानी फिर जाएगा ।

"उन कुत्तों का पीछा करो । अभी वो ज्यादा दूर नहीं गये होंगे ।" सोल्लर ने हुक्म दनदनाया----"हरिअप ।"

सेनिकं पलटकर कमरे में दाखिल हो गया ।

"अजीब बात है ।" सोज्जर बढ़बड़ाया-"उन लोगों को यहाँ से कौन भगा सकता है? इस बारे में तो कोई नहीं जानता था कि वे इस इमारत में कैद हैं ।"

"बात क्या है सोज्जर?" मैंने मासूमियत से पूछा ।

"इस कमरे में सर एडलाफ के छ समर्थक कैद थे ।" उसने बताया- "वे कमरे से गायब हैं । सवाल इस बात का है कि वे भागे कैसे ? "

"जरूर किसी ने उनकी मदद की है ।"

" 'कौन कर सकता है उनकी मदद ?" सोल्जर ने अजीब निगाहीं से मुझे देखा ।

"मुझे यहाँ आये आधा घंटा भी नहीं हुआ है । तुम मुझसे पूछ रहे हो? इस सवाल का जवाब तो तुम्हारे पास होगा ।"

"इस बारे में वे खुद बतायेंगे कि उनकी मदद किसने की है, क्योंकि अब वे ज्यादा देर तक खुली हवा में सांस नहीं ले सकेंगे । बहुत जल्दी सेनिक उन हरामजार्दो को तलाश कर लेंगे ।"

कहने कै साथ ही वह लंबे-लंबे डग भरता हुआ बगल वाले कमरे में प्रवेश कर गंया ।

इस वक्त सोज्जर की हालत घायल शेर जैसी हो रही थी ।

एक मिनट बाद यह कमरे से बाहर निकला और सामने, वाले दरवाजे की तरफ बढ गया ।

एक पल बाद मैंने सोल्जर को राहदारी कै उस पार सामने वाले कमरे का दरवाजा खोलकर भीतर दाखिल होते देखा ।

मैं दबे पांव दरवाजे की तरफ बढी ।

=====

=====

"सोल्जर स्पीकिंग. . . ओवर ।"

मेरे कानों से सोज्जर का स्वर टकराया ।

इस वक्त में उस कमरे के दरवाजे से कान सटाये खडी थी, जिसमें अभी-अभी सोज्जर दाखिल हुआ था ।

"मार्शल कालिंग । मेसेज दो.. .ओवर ।"

ट्रांसमीटर पर वार्तालाप चल रहा था । मुझे मार्शल की आवाज भी साफ सुनाई दे रहीँ थी ।

"रीमा भारती ने जो कुछ बताया है । वो सब सच है सर ।"

मैंने हिन्दुस्तान में अपने "सोसँज' से सम्पर्क स्थापित करुके जानकारी हासिल की है...ओवर ।"

"गुड ।"

"अब मेरे लिये क्या आदेश है सर. . .सर ।"

"रीमा भारती एक दिमागदार और तेज-तर्रार जासूस है । वो हमारे लिये वहुत काम की साबित हो सकती है । तुम रीमा भारती को लेकर मेरे पास पहुचो-ओवर ।"

"में पहुंचता हूँ सर, लेकिन एक बुरी खबर है. . . ओवर ।"

"व... बूरी खबर क्या हे... ।"

" हम लोगों जिन छ: सर एडलॉफ के समर्थकों को गिरफ्तार किया था । वे कैदखाने से फरार हो गये ।"

"व . .व्हाट?"

"मैं ठीक कह रहा हू सर. . सर ।"

"इतने कडे सुरक्षा-प्रबंधों के बावजूद वो कैसे फरार हो गये. . .ओवर?"

"यहीँ बात तो मेरी समझ में नहीं आ रही है । अचानक इमारत में एक जबरदस्त धमाका हुआ । ऐसा लगा जैसे कोई शक्तिशाली बम फटा हो । मैं सैनिकों लेकर कैदखाने में पहुचा तो मेंने देखा कि कमरे की दीवार टूटी हुई थी और वे सभी कैदी गायब थे-ओबर ।"

सुनकर दूसरी तरफ मौजूद मार्शल का दिमाग निश्चित रूप से फिरकनी की तरह घूमकर रह गया होगा ।

"जाहिर है कि उन लोगों को कैदखाने से भगाने में किसी ने उनकी मदद की है.. .ओवर ।"

"कहीं ऐसा तो नहीँ कि तुम्हारा कोई सैनिक उन लोगों से मिल गया हो ।"

"जी नहीं । ये कैसे ममकिन हो सकता है? किसी बाहरी आदमी ने उनकी मदद की . . .ओवर ।"

मै मन-ही-मन मुस्कुराई ।

वे तो सपने में भी कल्पना नहीं कर सकते थे कि. उन को भगाने में मेरा हाथ था ।

"उन सर एडलॉफ के समर्थकों का फरार हो जाना हमारे लिये चिंता की बात है सर । अब हमेँ इस बारे में कैसे जानकारी मिलेगी कि सर एडलॉफ के और समर्थक कहां छिपे हुए हैं । शहर में उनके ठिकाने क्रहां-कहां हैं, . . ओवर ।", . .

"इस बारे में तो हम लोग क्लाइव से मालूम कर लेंगे. . लेकिन उन लोगों क्रो भी गिरफ्तार करने जरूरी है .ओवर ।"

"मैंने उनकी तलाश में सैनिक दौड़ा दिये हैं । वो ज्याद-देर तक आजाद नहीं रह सकेंगे। उम्मीद है कि उन्हें जल्दी ही गिरफ्तार कर लिया जायेगा. . . !"

"गुड और कुछ. .. ।"

" नो सर । ओवर एण्ड आल ।"

उन लोगों का वार्तालाप खत्म हो चुका था । अब मेरा यहां खड़े रहने का कोई मतलब नहीं था । अत: मैं घूमी और पंजों के बल दौडती हुई उसी कमरे में वापस आ गई ।

एक मिनट बाद सोल्जर मेरे कमरे में दाखिल हुआ, फिर मेरे करीब ठिठकता हुआ बोला-"तुमने अपने बारे में जो कुछ बताया मैं था । वो सही निकला । तुम वाकई में आइ एस०सी० छोड़ चुकी हो । इस बारे में मैं पूरी इंफार्मेशन हासिल कर चुका हु ।"

"मैंने सच ही बताया थ्, लेकिन तुमने मेरी बात पर विश्वास ही नहीं किया ।" मैंने कहा।

" सच जानना जरूरी था ओर ये मार्शल साहब का आदेश था । इसका मुझे खेद है कि तुम्हें थोड़े समय के लिये सहीं लेकिन एक कैदी की तरह की करना पड़ा ।"

"मार्शल साहब का आदेश जो था ।"

"राइट !"

मैं मुस्कराई ।

" अब मेरे साथ चलो मिस रीमा ।" बह बोला ।

"कहां ?" मैंने जानबूझकर अनजान बनते हुए पूछा ।

"मार्शले साहब के पास ।"

" क. . . क्यों ?"

! मार्शल साहब ने तुम्हें बुलाया है !"

मैं भी यहीं चाहती थी । मैंने इतना लंबा खेल मार्शल तक पहुओने के लिये ही तो खेला था !
 
"क्या मार्शल साहब ने मेरी शर्त मान ली है ?' मैंने उत्सुकता भरे स्वर में पूछा ।

"इस बारे में मैं कुछ नहीं कह सकता । ये तो मार्शल साहब के पास पहुचने के बाद ही मालूम होगा । वेसे मुझे विश्वास है कि तुम्हारी मान ली जायेगी ।" बह बोला----"चलो ।" कहकर सोल्जर घूमा जोर दरवाजे की तरफ बढ़ गया ।

मैं उसके-पीछे चल पडी ।

कुछ पलै बाद सोल्जर मुझे लेकर कम्पाउण्ड में पहुंचा । फिर वह एक जीप की ड्रायविंग सीट संभालता हुआ 'बोला-"बैठो ।"

मैं उसकी बगल वाली सीट पर बैठ गई ।

सोल्जर ने जीप स्टार्ट करके आगे बढा ही । जीप तीर की तरह कम्पाउंड से बाहर निकली और फिर एक दिशा नें भागती चली गई ।

लगभग एक घंटा शहर की विभिन्न सडकों पर दौडने के बाद वो जीप एक इमारत के कम्पाउंड में पहुंचकर रुकी ।

"नीचे उतरो रीमा ।" सोज्जर जीप से कूदता हुआ बोला ।

मैं समझ गई कि मंजिल आ गई है ।

मैं भी तुरंत जीप से नीचे उतर गई ।

वो लंबा-चौड़ा कम्पाउण्ड था । वहाँ कई जीपों के अलावा दो नई नकौर कारें भी खडी हुई थीं । कम्पाउण्ड में थोड़े थोड़े फासले में सशस्त्र सैनिक टहलते नजर आ रहे थे ।

सोल्जर जीप के सामने से चक्कर काटकर मेरे करीब पहुंचता हुआ बोला…"आओ ।"

मैं सोल्जर के साथ चल पडी ।

वो किले जैसी इमारत लाल पत्थरों से बनी हुई थी । उसके अग्रभाग में लोहे का मज़बूत गेट लगा हुआ था, जो इस वक्त बंद था । गेट के दायें-बाये दो सशस्त्र सैनिक खड़े थे ।

मैं सोज्जर के साथ मुख्य द्वार की तरफ़ बढ़ रही थी ।

सोज्जर जिस सेनिक के सामने से गुजरता उसी सेनिक की एडियों बज उठतीं । हाथ सैल्यूट की मुद्रा में माथे से चिपक जाता । सोल्जर सिर की हल्की सी जुम्बिश साथ उसके अभिवादन का जवाब देकर आगे बढ जाता ।

"इसी इमारत में मार्शल साहब रहते हैं ।" मैंने पूछा ।

"हां, ये इमारत नहीं किला है ।"

" उन्होंने तो अपनी सुरक्षा के बहुत कड़े प्रबंध किये हुए हैं ।"

"अभी तुमने मार्शल साहब की सुरक्षा के प्रबन्ध देखे ही कहां है? उन्होंने अपनी सुरक्षा के ऐसे कड़े प्रबंध किये हैं कि उनकी मर्जी के खिलाफ एक परिन्दा भी उनके पास पर नहीं मार सकता ।"

मेरे लिये मार्शल के सुरक्षा प्रबंधों की जानकारी हासिल करना वहुत जरूरी था । आज की डेट में मार्शल मेरा सबसे बड़ा शिकार था मुझे उसे अपने कब्जे में करना था । उसे कब्जे में किये बिना मेरा मिशन पूरा नहीं होने वाला था ।

हम प्रवेश द्धार के करीब पहुंचे ।

वहां मौजूद सैनिकों की एड्रियां बज उठी ।

तदुपरांत । उनमें से एक सैनिक ने लोहे का वो मजबूत दरवाजा खोल दिया, फिर वह पीछे हटकर सावधान मुद्रा में खडा हो गया ।

सोज्जर भीतर प्रवेश कर गया । मैं उसके पीछे थी । सैनिकों ने विचित्र निगाहों से देखा था । . .

दरबाजे के उस पार खुली जगह थी ।

उसके दो तरफ ऊंची-ऊची पत्थरों ,की दीवारें थीं । सामने खूबसूरत इमारत दिखाई दे रही थी । खुली जगह में भी कई सशस्त्र सैनिक विचरते दिखाई है रहे थे ।

कुछ देर बाद मुझे लेकर सोज्जर एक हॉल में पहुंचा । .

वह लंबा चौड़ा होल टूयूब लाइंटूस के दूधिया प्रकाश से रोशन था । हाॅल के बीचो-बीच आबनूस की एक लंबी मेज बिछी हुई थी । उसके पीले रिवाल्विंग चेयर पर एक व्यक्ति था । उसकी उम्र पैंतालिस साल से ज्यादा नहीं रही होगी । सुर्ख रंग । लंबा कद । कसरती जिस्म । बिल्ली जैसी चमकीली आंखें । उसमें ब्लेड की धार जैसा पैनापन था । चेहरे पर पत्थर जैसी कठोरता थी । चेहरे से 'ही धूर्त और जालिम किस्म का इंसान लगता था । सिर के बाल छोटे-छोटे थे । मूंछे छोटी थीं । किन्तु उन्हें संवारने में हज्जाम ने काफी मेहनत की लगती थी ।

उस शख्स के दायेँ-बायें और पीछे कमाण्डो जैसे लगने वाले सैनिक उपस्थित थे । उनके हाथों में गनें थमी हुई थीं । आंखें सर्षीली थीं ।

मुझे अंदाजा लगाने में क्षण भर से ज्यादा का वक्त नहीं लगा था कि मेजर के पीछे कुर्सी पर मोजूद शख्स ही मार्शल था ।

सेना का प्रमुख ।

हॉल के एक कोने में वायरलेस सेट और दूसरे नीचे मं टेलीविजन रखा हुआ था । सामने परिवार में यही नफासत के साथ फिक्स क्रिया हुआ मूवी कैमरा, मूवी कैमरे की इकलौती आँख, मेरी निगाहों से छिपी नहीं रह सकी थी ।

जैसे ही मैं सोज्जर के साथ हाॅल में दाखिल हुई थी, मार्शल की निगाहें दरवाजे की तरफ उठ गई थीं । फिर उसकी निगाहें सिर से पांव तक मेरे जिस्म पर सरसराती चली गई थी ।

मैंने उसकी आँखों में दिलचस्पी के भाव नोट किये थे । भला वह मेरे रूप के जादू से कैसे बच सकता था?

आखिर मैं चीज ही ऐसी हूं ।

हम मेज…के करींवं पहुचे?"

तीनों कमाण्डो जैसे सेनिक-पहले से कहीं ज्यादा सतर्क दिखाई देने लगे ।

"तो तुम रीमा भारती हो ।" मार्शल मेरे चेहरे पर आंखे फिक्स करता हुआ बोला !

"यस ।" मैं मुस्कुराई ।

" तुम्हारी काबलियत के साथ साथ तुम्हारी खूबसूरती के जितने चर्चे मैने सुने थे , उससे कुंछ ब्रढ़कर पा रहा हू।"

" शुक्रिया ।" मेरे होंठों की मुस्कान गहरी ही उठी ।

" मुझे मार्शल कहते हैं । मैं सेना का प्रमुख भी और मुझसे हर मुल्क कीं सरकार खौफ़ खाती है ।"

" आपसे मिलकर खुशी हुई मार्शल । मैंने खनकदार स्वर में कहा ।

" तुम खडी क्यों हो , बैठो ना ?" एकाएक… मार्शल बोल पड़ा ।

मैंने उसके सामने कुर्सी संभाल ली ।

मार्शल ने सोल्जर भी बैठने का संकेत क्रिया ।

बह मेरी बगल में खाली कुर्सी पर बैठ गया ।

मैने मार्शल की तरफ देखा तो मैंने उसे भौचक्का सा अपनी तरफ देखते पाया । बह अजीब निगाहों से मुझे यूं घूर रहा था, मानो एकाएक उसने कोई अजूबा देख लिया हो ।

फिर मैंने उसकी निगाहों का पीछा किया तो उसकी'निगाहीं को अपने योवन शिखरों पर टिके पाया ।

दरअसल मैंने जानबूझकर अपनी शर्ट के उपरी तो बटन खुले छोड दिये थे । मैं नीचे ब्रा नहीं पहनी थी । अत: मेरी दूधिया गोलाइयां क्रांफी हद तक नुमायां हो रही थीं ।

"मिस्टर मार्शल !" एकाएक मैं बोल उठी ।

मार्शल हढ़बड़ाकर रह गया । उसने तुरंत अपनी निगाहें वहा से हटा लीं और मेरे चेहरे पर टिका दीं । मेरी हंसी छूटते-छूटते बची ।

"यस मिस रीमा ।" बह अपनी हडबड़ाहट पर काबू करता हुआ बोला ।

"हम लोगों का परिचय तो हो चुका ।" मैंने पहलू बदला-" अब-काम की बाते भी हो जाये ।"

… "जरूर ।"'

"मैंने मिस्टर सोल्जर से जो वादा क्रिया था उसे पूरा क्रिया । यानि क्लाइव को गिरफ्तार क्ररवा दिया है ।"

" हूं !"

"इस काम की एवज में मैंने अपनी एक शर्त रखी थी । वो शर्तं मिस्टर सोल्जर ने आपको बता दी होगी !"

‘ 'यस !" उसने कहा---" लेकिन वो शर्त मैं तुम्हारे मुंह से सुनना चाहता हूं । तुम मुझे अच्छी तरह से समझा सक्रोगी कि तुम चाहती क्या हो ?"

"उसमें समझाने के लिये है ही क्या मिस्टर मार्शल ? मैंने कोई लंवी-चौड्री शर्तं तो नहीं रखी थी ।" मैंने कहा-" जैसा कि मैं बता चुकी हूँ कि मैंने आई०एस०सी० छोड़ दी है । आज की तारीख में मेरी स्थिति एक मुजरिम जैसी है । मेरा अपना ही डिंपार्टमेंट मेरा दुश्मन बन चुका है । यहीं वजह है कि मुझे इस मुल्क में पनाह लेने के लिये मजबूर होना पड़ा है । अत: मेरी पहली शर्तें ये है कि आपको मुझे पनाह देनी होगी, बल्कि मेरी जिदगी की गारंटी लेनी होगी !"

" मुझे तुम्हारी शर्त मंजूर है ।"

" दूसरी शर्त है कि अपनी जीविका चलाने के लिये आप मुझे कोई काम देंगे ।"

"क्या काम करना चाहती हो तुम?"

"आप मेरे एक सवाल का जबाब देगे ।"

"अवश्य ।"

"आप मुझसे अच्छी तरह से परिचित हैं ।"

"में अच्छी तरह से परिचित ही नहीं हुं बल्कि तुम्हारी पूरी जन्मपत्री मेरे पास है । तुम एक ऐसी खतरनाक हौंसले वाली यूवती हो । जिस काम में हाथ डालती हो, उसे पूरा करके दम-लेती हो तुमने दुनिया के खतरनाक मुजरिमों, गैगस्टरों, डाॅन, जुर्म के पंडितों और अण्डरवर्ल्ड के बादशाहों को या तो बेरहमी की मौत दी है अथवा उन्हें जेल की सलाखों के पीछे पहुचाकर जिंदगी भर एड्रियां रगड़ने पर मजबूर कर दिया है ।"

"जब आपको मेरे बारे में इतना कुछ मालूम है तो मैं अपनी हैसियत के आधार पर ही काम करना चाहती हूं।"

"में तुम्हे सेना में आर्मी इन्टेलीजेस में रखना पसंद करूँगा । क्योंकि मुझे तुम जैसी जासूस की सख्त जरूरत है । अब बोलो, तुम इस पद पर रहकर काम करोगी?"

" मुझे आर्मी इंटेलीजेंस के लिये काम करने में वेहद खुशी होगी मिस्टर मार्शल । आपने मेरी हैसियत देखकर ही मुझे काम दिया है । इसके लिये आपका वहुत-वहुत शुक्रिया है" '

"इसमें शुक्रिया वाली क्या बात है मिस रीमा । मुझे तो तुम जैसी युवती की तलाश थी । मेरे लिये खुशी की बात है दुनिया की नः वन जासूसी मेरे लिए काम करेगी !"

"आप मेरी कुछ ज्यादा ही प्रशंसा कर रहे हैं मिस्टर मार्शल ।"

"प्रशंसा उसी की की जाती है, जो प्रशंसा के काबिल होता है । तुममें वो हर खूवी मौजूद है, जो एक सफल जासूस में होनी चाहिए ।"

मैंने खामोशी साध ली ।

"और भी शर्त हो तो बोलो ।"

"नहीं मार्शल साहब ।“ "

"तुम्हें चिंत्ता करने की जरूरत नहीं है रीमा । अब तुम मार्शल की छत्रछाया में हो । तुम अपने आपकी पूरी तरह से सुरक्षित समझो । कोई तुम्हारा बाल बांका नहीं कर सकता ।"

"शुक्रिया मार्शल साहब ।"

"एक बात और सुनो ।"

"वो क्या?" . "

"तुम्हें जल्दी ही इस मुक्त की नागरिकता मिल जायेगी ।"

मैंने पुन: उसका शुक्रिया अदा क्रिया ।

मैं जो चाहती थी । वहीं हुआ । मैं मार्शल को अपने शीशे में उतारने मे कामयाब रही थी ।

मैनै जो चाल चली थी । वो कामयाब रही थी । है

मार्शल तो मुझे मडलैंड की नागरिकता दिलाना चाहता था, मगर वो पट्ठा क्या जानता था कि मैं इस मुल्क में चंद दिनों की मेहमान हूं । मिशन सफल होते ही मुझे अपने प्यारे भारत की तरफ रुख करना था ।
 
अब मेरे दो मकसद थे ।

पहला मकसद डगलस तथा क्लाइव को जेल से छुड़बाकर सर एडलॉफ तक पहुंचना था ।

और ।

दूसरा मकसद मार्शल का खात्मा करना था ।

उसका खात्मा करने के लिये सबसे पहले मुझे सोल्जर को अपने रास्ते से हटाना था ।

उसके बाद राष्ट्रपति सर एडलॉफ का फिर से मडलैंड की सता की बागडोर संभालने का रास्ता साफ हो जाना था ।

"सोल्जर ।" मार्शल की निगाहें सोज्जर की तरफ घूमी ।

"यस सर ।"

===========

"क्लमइव के हमारे कब्जे में आ जाने से हमारी एक वहुत बडी प्रॉब्लम सौल्व हो गई है । क्लाइव की गिरफ्तारी से सर एडलॉफ के समर्थकों के हौंसले पस्त हो जायेंगे । उनमें सेना के खिलाफ़ आबाज बुलंद करने की हिम्मत नहीं बचेगी ।"

"आप ठीक कह रहे हैं ।

"लेकिन ये हमारी प्रॉब्लम का अंत नहीं है सोल्जर । हमारी प्राब्लम का अंत उस वक्त होगा । जब हम सर एडलॉफ को तलाश करके सलाखों के पीछे पहुचा देगे । वरना वह हमारे लिये सिरदर्द बना रहेगा ।"

मैं खामोश बैठी सब सुन रही थी ।

"मैं आपकी बात से सहमत हूँ लेकिन डगलस तो कुछ भी बताने के लिये तैयार नहीं है । वह तो अपने मुंह पर ताला डाले हुए है । उसे इतनी भयानक यातनाएं दी गई हैं कि अगर उसकी जगह पत्थर भी होता तो वो भी अपना मुंह खोलने पर मजबूर हो जाता । "

"जब ऐसी समस्या सामने आ जाये तो इंसान को दूसरा रास्ता सोच लेना चाहिये, और वह रास्ता हमारे सामने है ।"

सोल्जर के देने पर आश्चर्य के भाव उभरे।

"व. , .वो कौन-सा रास्ता है सर?" सोल्जर की सवालिया निगाहें मार्शल के चेहरे पर जा टिकी ।

"तुम इतनी छोटी-सी बात भी नहीं समझे ।"

वह हढ़बड़ाकर रह गया ।

"वो रास्ता है, क्लाइब ।"

"आपके कहने का मतलब है कि क्लाइव जानता है कि सर एडलॉफ कहां छिपा हुआ है?"

"उसे क्यों मालूम नहीं होगा? हर हालत में वो जानता होगा कि सर एडलॉफ कहा छिपा हुआ है? आखिर वो सर एडलॉफ के समर्थकों का मुखिया है ।" मार्शल ने कहा-"डगलस को छोड़कर क्लाइव का मुंह खुलवाओ । अगर वह अपना मुंह न खोले तो उसे इतनी भयानक यातनाएं दो कि उसे उपने पैदा होने पर अफसोस होने लगे !"

"अगर क्लाइव ने भी अपना मुँह नहीं खोला तो. . . ।"

"तुम यहीं बैठे-बैठे अंदाजों की खिचड़ी मत पकाओ । उसका मुह खुलबाने की कोशिश तो करो, अगर उसने अपना मुंह नहीं खोला तो कोई रास्ता सोचेगे लेकिन मेरी निगाहों में इससे आसान रास्ता दूसरा नहीं हो सकता ।"

"क्लाइव का मुंह खुलवाने की पूरी कोशिश की जायेगी ।" सोल्जर का लहजा कठोर हो उठा- "लेकिन डगलस के बारे में आपने क्या सोचा?"

"उसके बारे में भी सोच लेंगे । वो कहीं भागा नहीं जा रहा है !!"

"मैं एक बात कहू सर ।"

"कहो ।"

"जब डगलस हमारे क्रिसी मतलब का नहीं है तो उसे गोली मार देनी चाहिये----" सोल्जर का लहजा खुरदुरा था ।

मुझे जोरों का झटका लगा । किंतु मैंने अपने चेहरे पर किसी तरह का भाव नहीं उभरने दिया ।

"पागलों जैसी बात मत को सोल्जर ।" मार्शल ने अजीब निगाहों से सोल्जर को घूरा-"भले ही डगलस ने सर एडलॉफ के बारे से अपना मुह नहीं खोला है, लेकिन वो हमारे लिये काम का आदमी साबित सकता है । उसे उस वक्त तक जिंदा रखना होगा जब तक हम अपने हाथ मजबूत नहीं कर लेते । डगलस के सीने में तो हम कभी भी गोली उतार देगे ।"

"ठीक है सर । आप मुझसे बेहतर जानते हैं ।"

"शहर के हालात केसे हैं?" मार्शल ने सवाल क्रिया ।

"शहर के हालात तो खराब है सर ।" सोल्जर ने वताया-----" मालूम हुआ है, सर एडलॉफ के समर्थक घात लगाकर -सैनिकों पर हमला कर रहे हैं । एक तरह से उन्होंने छापामार युद्ध शुरु कर दिया है । अब तक काफी संख्या में सेनिक मारे जा चुके हैं । वे सैनिकों पर हमला करके छलावे क्री तरह गायब हो जाते है । जनता तो सैनिक शासन का विरोध कर ही रही थी । बच्चा-बच्चा विद्रोह पर उतर आया है । स्थिति विस्फोटक होती जा रही है ।"

मार्शल के चेहरे पर गम्भीरता नाच उठी ।

"मैं कुछ कहना चाहती हूं मार्शलं साहब ।" मैंने बीच में टांग र्फसाईं ।

"जरूर कहो ।"

"हमें सर एडलॉफ के समर्थकों को चुन-चुनकर खत्म करना होगा । तभी ये विद्रोह दब पायेगा ।"

"हमें तो मालूम नहीं है कि वे कहां-कहां छिपे हुए हैं, उन तक कैसे पहुंचा जा सकता है?"

" उन तक पहुंचने का एक आम-सा रास्ता है और उस रास्ते का नाम है क्लाइव ! वह बतायेगा कि सर एडलॉफ के समर्थक शहर में कहां-कहां छिपे हुए हैं । इस बारे में हुमें क्लाइव का मुंह खुलवाना होगा और जब मालूम हो जाये तो उन पर एक साथ हल्ला बोल दिया जायेगा । किसी को बचकर निकलने का मौका नहीं दिया जायेगा । अगर कुछ भी समर्थक बच गये तो वे उन लोगों को अपने साथ मिला लेगे, जो सेना के खिलाफ हैं । जब सर एडलॉफ का कोई समर्थक ही नहीं बचेगा तो जनता के दिलो में विद्रोह की आग कौन भड़कायेगा? उन्हें आधुनिक हथियार कौन देगा ? जब सर एडाॅलफ के समर्थक ही नही होंगे तो वो भी अपग हो जाएँगे ।!"

मार्शल ने प्रशंसनीय निगाहों से मेरी तरफ देखा ।

मैंने जानबूझकर मार्शल के सामने ये विचार रखा था, ताकि उसे पूस विश्वास हो जाये कि अब मैं हर तरह से उन लोगों के साथ हू । "

!इसे कहते हैं दिमाग ।" मार्शल सोल्जर की तरफ देखता हुआ बोला-"रीमा भारती ने एकदम सहीं राय दी है ।"

"वो तो ठीक है सर, लेकिन अगर क्लाइव ने भी जुबान -नहीँ खोली तो क्या होगा?"

" वो जुबान जरूर खोलेगा सोल्जर । जब उस पर यातनाओं के पहाड़ टूटेगे तो यह सब टेप रिकार्डर की तरह बतायेगा ।" मार्शल मुस्कृराया ।

सोल्जर चुप रहा ।

"हमारे बीच सब बातें तय हो गइं हैं मार्शल साहब ।" मैंने कहां-"अब मुझे अपने रहने की कोई-न-कोई व्यवस्था, करनी होगी ।"

" तुम्हें अपने रहने की व्यवस्था करने की कोई जरूरत नहीं है ।" मार्शल बोला-"आखिर तुम हमारी महत्वपूर्ण डिपार्टमेंट, का अंग बन चुकी हो । तुम्हारे रहने की व्यवस्था करने को जिम्मेदारी हमारी. . है । तुम इसी इमारत में रहोगी । सिर्फ इतना ही नहीं, तुम्हारी हर सुख सुबिधा का पूरा ध्यान रखा जायेगा ।"

" थेंक्यू मार्शल साहब ।" मैं मन-हो-मन खुशी से झूम उठी ।

"तुम्हें रीमा भारती का पूरा ध्यान रखना है सोल्जर ।" मार्शल ने सोल्जर को हिदायत दी, फिर मुझसे मुखातिब हुआ-"अगर तुम आराम करना चाहती हो तो तुम्हें तुम्हारा कमरा दिखा दिया जाये ।"

"जेसी आपकी मर्जी ।"

"ओ०के०---रीमा मारती को इसका कमरा दिखा दो ।"

"आओ .रीमा ।" सोल्जर एक झटके से कुर्सी छोड़ता हुआ बोला ।

"चलो ।" मैं भी उठ खड़ी हुई । सोल्जर मुझे लेकर हॉल से बाहर निकला और एक तरफ चल पड़ा । अब मेरे मिशन का अगला चरण शुरु हो चुका था ।

======

======
 
"मेरा शुक्रिया अदा नहीं करोगी रीमा ।" एकाएक सोल्जर बोल उठा ।

मै चौकी ।

इस वक्त सोल्जर आगे चल रहा था । मैं उसके पीछे थी । मेरा मस्तिष्क तेजी से काम कर रहा था । मैं अपने अगले कदम के बारे में सोच रही थी ।

सहसा सोल्जर का स्वर मेरे कानों से टकराया था ।

मैं न सिर्फ चौंकी, बल्कि मेरी सोचें भी बिखर गई थीं । मैंने जल्दी से स्वयं को संभालकर पूछा---" शुक्रिया अदा करने में मेरा क्या जाता है, लेकिन मुझे ये तो मालूम ही चाहिये कि तुम मुझसे किस बात का शुक्रिया अदा करवाना चाहते हो?"

" 'मैँने तुमसे कहा था कि मैं अपनी तरफ से पूरी कोशिश करूंगा कि मार्शल साहब तुम्हारी शर्त मान लें । मैंने मार्शल साहब से तुम्हारी सिफारिश की थी और मेरी वजह से ही ये सब सम्भव हो पाया है ।"

मैं मन…ही मन मुस्कुराई ।

मैं समझ गई थी कि सोल्जर हवा में गप्प मार रहा है, लेकिन मुझे कुछ फ़र्क पड़ने वाला नहीं था । ये तो मेरे लिये शुभ संकेत था कि सोल्जर मेरी तरफ खिंच रहा है ।

शुक्रिया अदा करने में मेरा कुछ जाने वाला नहीं था । सोल्जर को खुश हो जाना था । अत: मैं बोल उठी-"बहुत्-वहुत शुक्रिया मिस्टर सोल्जर । तुमने वाकई मेरी बहुत मदद की है ।"

वह खामोश रहा।

किन्तु अब वह मेरे साथ-साथ सटकर चलने लगा था ।

मैं उसके इरादे भांपकर मन-हीं-मन मुस्कुराई । यह 'पट्ठा मेरी खूबसूरती के सामने चारों खाने चित्त हो गया लग रहा था है लेकिन मैंने अपने चेहरे पर किसी तरह का कोई भाव नहीं उभरने दिया ।

वह एक राहदारी से गुजरते हुए एक कमरे के सामने पहुंचे । कमरे का दरवाजा बंद था ।

सोल्जर दरवाजा खोलकर भीतर दाखिल हुआ ।

मैंने भी भीतर कदम रखा ।

कमरा टूयूब लाईट के दूधिया प्रकाश में जगमगा रहा था ।

कहने को तो वो कमरा था, लेकिन किसी हॉल से कम नहीं था । उसकी सामने बाली दीवार के साथ किंग साइज वेड पड़ा हुआ था । दीवारों पर एक-से-एक खूबसूरत पेन्टिग्स लगी हुई थीं । फर्श पर सुर्ख रंग का मोटा कालीन बिछा हुआ था । यहाँ टी०वी०, फ्रीज, कम्यूटर इत्यादि क्या नहीं था ।

कुल मिलाकर तो कमरा हर आधुनिक सुबिधा से पूर्ण था ।

"तुम यहीं रहोगी रीमा ।" सोज्जर ने कहा ।

" ओ के !"

"कमरा पसंद आया ।"

"ना पसंद आने का तो सवाल ही नहीं पैदा होता ।" मैंने गर्दन मोड़कर अपनी बगल में खड़े सोल्जर की तरफ देखते हुए कहा-"वेसे , अगर मुझे किसी चीज की जरूरत पड़ जाये तो में किससे कहुंगी ।"

"जब भी तुम्हें किसी चीज कीं जरूरत महसूस हो तो पास लगी बैल बजा देना । क्रोईं-न-क्रोई तुम्हारी सेवा में हाजिर हो जायेगा ।"

" बेहतर ।"

"अब में चलता हू।"

"ओ०के० ।"

सोल्जर चला गया । मैंने आगे बढ़कर दरवाजा बंद क्रिया और बारीकी से कमरे का निरीक्षण करने लगी । जल्दी ही एक बात की तो तस्दीक हो गई कि उस कमरे में कोई कैमरा इत्यादि नहीं लगा हुआ था ।

मैंने राहत की सांस ली ।

इसके बावजूद मैंने सतर्कता का दामन नहीं छोड़ा था, हालांकि सोल्जर मेरे बारे में भारत से अपनी तसल्ली का चुका था । लेकिन फिर भी मेरा सावधान रहना और एक-एक कदम फूकफुक कर रखना वेहद जरूरी था ।

मैंने आगे बढकर वेड संभाल लिया ।

इस वक्त मेरा मस्तिष्क तीव्रता से काम कर रहा था । मेरे दिमाग में सिर्फ एक उलझन थी कि सोल्जर को अपने रास्ते से कैसे हटाया जाये ?

दिमाग ठस्स पड़ चुका था ।

समझ में कुछ नहीं आ रहा था ।

फिलहाल इस बारे में दिमाग खराब करना ठीक नहीं समझा था । मुझे अपने आप पर पुरा भरोसा था कि मैं जल्दी ही कोइं-न-कोई रास्ता तलाश कर लूगी ।

इस वक्त मैं व्हिस्की के दो तीन पेग की जरूरत महसूस कर रही थी ।

मैंने बेड के करीब लगी बैल का बटन पुश कर दिया ।

दो पल बाद दरवाजे पर दस्तक पडी ।

"तुम जो कोई भी हो, चले आओ । दरवाजा खुला है ।" दस्तक के जवाब में मैंने कहा ।

दरवाजा खुला । अगले क्षण एक युवती ने भीतर कदम रखा ।

वह भी कम खूबसूरत नहीं थी ।

========

युवती बिचित्र निगाहों से मुझे देख रही थी और मैं उसे । मैं समझ नहीं पा रही थी कि वह मुझे अजीब निगाहों से क्यों देख रही है ?

"यस मैडम ।" वह वेड के करीब पहुंचकर बोली ।

"व्हिस्की मिलेगी ?"

"आप व्हिस्की की बात कर रही हैं । आप जो कहेंगी, वही मिलेगा, आखिर आप मार्शल साहब की खास मेहमान हैं ।"

"अच्छा ?!

"हां ।" यह पलटकर दरवाजे की तरफ बढती हुई बोली---" मै आपके लिये व्हिस्की लेकर आती हु ।"

युवती चली गई ।

युवती के लौटने का ज्यादा इंतजार नहीं करना पहा था । कठिनाई से पाच मिनट ही गुजरे थे कि युवती दोनों हाथों में ट्रे संभाले भीतर दाखिल हुई ।

युवती ने ट्रे मेज पर रख दी और उसमें से व्हिस्की की बोतल और खाने का सामान इत्यादि मेज पर रखने लगी ।

मैंने उसके चेहरे पर गम्भीरता और आँखों में सूनापन देखा था । ऐसा लगता था जैसे कोई फूल धूप में झुलस गया हो । मैंने अनुमान लगा लिया कि वह जिदगी से टूटी हुई है ।

जब यह सामान रख चुकी तो सीधी होती हुई बोली -" अब मैं चलू मेडम ।'"

"जल्दी है क्या ?"

"नहीं तो ।"

"चलीजाना ।'" मैंने काम ---" कुछ देर मुझे कम्पनी दे दो । । वैसे तुम पीती हो?"

"कभी पीती थी । लेकिन अब पीनी छोड़ दी है ।"

"क्यों?' मैंने सवाल किया ।

"शराब से नफरत हो गई है ।" उसने एक लंबी सर्द सांस छोड़ी ।

"मेरे लिये एक पैग बनाकर दो ।"

युवती ने पेग बनाकर मुझे थमा दिया ।

"बैठो ।" मैं बोली । वह मेरी बगल में बेड पर बैठ गई ।

"क्या नाम है तुम्हारा?" मैं अपनी निगाहें उसके चेहरे पर फिक्स करती हुई बोली।

" "सारा ।" "

"मार्शल साहब और सोज्जर को कब से जानती हो?"

=========

सारा के चेहरे के भाव तेजी से बदले---"' इस बारे में क्यों पूछ रही हैं मैडम?"

" यू ही उत्सुकता बश पूछ रही हू ।"

"कई सालों से जानती हूं।"

मैंने व्हिस्की का लंबा घूट भरा । अभी भी मेरी निगाहें सारा के चेहरे पर टिकी हुई थी । मैं जल्दबाजी में कुछ भी पूछने के मूड में नहीं थी । ऐसे में काम बिगड़ सकता था । ये भी तो हो सकता था कि सारा को सोल्जर ने मेरी मानसिकता जानने के लिये मेरे पास जानबूझकर भेजा हो ।

"आपका क्या नाम है मैडम ?" सारा ने पूछा ।

"रीमा भारती ।"

"आप तो शायद इण्डियन हैं ।"

"हा ।"

"मैंने आपको यहाँ पहली बार देखा है ।"

"पहली बार तो देखोगी ही । आज ही तो आई हू।"

"ओह ।" सारा के होठों से निक्ला-"वेसे आप यहां कैसे आ फंसी ?"

मैं चौकी ।

सारा ने जो कहा था । उससे मेरा चौंकना स्वाभाविक ही था ।

"मैं र्फसी नहीं हू। खुद आई हूं।" स्वयं को संभालकर मैं बोली

"क्यों?" उसने आश्चर्यभरी निगाहों से मेरी तरफ देखा ।

मैने गिलास होठों से लगाकर एक ही सांस में खाली किया फिर ‘बोली-"क्या करोगी जानकर?"

"उत्सुकता बश पूछ रहीं हु ।"

"दरअसल मैं भारत की एक महरपूर्ण जासूसी संस्था में एक जासूस के रूप में काम क्रिया करती थी । मुझसे एक ऐसा काम हो गया, जिसको वजह से मुझे उस जासूसी संस्था से निकाल दिया गया और वहीँ लोग मेरे पीछे हाथ धोकर पड़ गये । उनका मकसद मुझे गिरफ्तार करके सलाखों के पीछे पहुंचाना था ।" मैंने सारा को वहीँ झूठी कहानी सुनाईं…"मैं हिन्दुस्तान के किसी भी कोने में सुरक्षित नहीं रह गई । इसलिये मैंने अपने को सदा-सदा के लिये अलविदा करने का निर्णय कर लिया, मैं भयानक मौत मरना नहीं चाहती थी । अत: मैं किसी तरह से छिपती-धिपाती मडलैंड पहुंच गई । अब मुझे एक सुरक्षित ठिकाने की जरूरत्त थी । अत: मैंने सोल्जर से सम्पर्क स्थापित जिसने मुझे मार्शल से मिलवाया और मैंने मार्शल को अपने बारे में बताया 'तो उसने मुझे न सिर्फ आर्मी इंटेलीजेंस

===========
 
मे जगह दे दी, बल्कि सारी जिदगी की सुरक्षा की गारंटी दी है !"

"आपकी बात में कितना सच है ?" सारा की निगाहें मेरे चेहरे पर फिक्स हो गई ।

"सब सच ही है ।"

"मुझे नहीं लगता ।" उसने 'कहा-"माफ़ कीजिये मैडम मुझे ऐसा लग रहा है जैसे आप मुझे भी कहानी गढकर सुना रही हैं ।"

मैं मन-सी-मन हैरान रह गई ।

मुझे सारा नाम को वो युवती कोई पहुंची हुई चीज लगी थी । भगवान जाने उसने कैसे इस बारे में अंदाजा लगा लिया था, लेकिन मैंने अपने चेहरे पर किसी तरह का भाव नहीं उभरने दिया ।

"ये कहानी नहीं, हकीकत है सारा ।" मैंने दृढ़ता भरे स्वर में कहा।

सारा व्यंग्य से मुस्कुराई ।

मुझे जो हल्का सा नशा हुआ था । वो कपूर की तरह उड़ गया था ।

"मैं मान लेती कि आप सच कह रहीँ हैं मैडम ।" सारा ने कहा----" लेकिन मार्शल जैसा शख्स ऐसे ही किसी को इतने महत्वपूर्ण विभाग में तो नहीं रखेगा । आखिर आपने उस पर ऐसा कोन-सा जादू कर दिया, जो वह आपको आर्मी इंटेलीजेंस में रखने पर मजबूर गया ?"

मार्शल पर कोई जादू नहीं किया सारा । मैंने एक ऐसा काम किया है, जिसकी वजह उसने मुझे आर्मी के महत्वपूर्ण डिपार्टमेंट में जगह दी है ।" कहने के साथ ही मैंने पैग बनाने के लिये बोतल की तरफ हाथ बढाया ।

तभी सारा हाथ बढ़ाकर बोल उठी--"आपको कष्ट करने की जरूरत नहीं है मेडम । मुझे गिलास दीजिये। मैं आपके लिये पैग बनाती हूं ।"

मैंने गिलास सारा को थमा दिया ।

सारा ने उठकर मेरे लिये पैग बनाया और गिलास मुझे थमा दिया । फिर वह यथास्थान बैठती हुई बोली----" हां ,तो आपने ऐसा कौन-सा काम किया है?"

"मैंने सर एडलॉफ के समर्थकों के मुखिया क्लाइव को -गिस्पतार करवाया है ।" मैंने बताया ।

सारा उछल पड्री-"'क. . .क्या?"

"यस ।"

"ओह ! गॉड अपने क्लाइव को गिरफ्तार करवा कर अच्छा नही किया ।" सारा के होठों से नफरत का सेलाब निकला-आपने अपने स्वार्थ की खातिर इस मुल्क की जनता के साथ बहुत बड़ा जुल्म क्रिया है । आपने एक ऐसे शख्स को उन दरिन्दों के हबाले कर दिया, जो जुल्म के खिलाफ जंग लड़ रहा था । आपको इस मुल्क की जनता कभी माफ नहीं करेगी मैडम ।"

मैं व्हिस्की पीना भूल गई थी।

सारा के शब्दों से तो तस्दीक हो गया था कि कमरे में माइक्रोफोन्स वगेरह नहीं छिपाया गया था, अगर ऐसा होता तो वह मुझसे इस तरह की बातें कभी नहीं करती ।

उसकी बातों से साफ था कि वह मार्शल और सोल्जर से नफरत करती थी तथा क्लाइव से उसे हमदर्दी थी । जाहिर था कि सारा अपने सीने में गहरे जख्म लिये हुए है और वो जख्म मार्शल अथवा सोल्जर ने उसे दिये होंगे ।

किन्तु मैं अभी भी ये फैसला नहीं का पा रही थी कि सारा पर पूरा विश्वास किया जाये अथवा नहीं?

"सारा ।" मैं बोली ।

"यस मैडम ।"

"कोई हमारी बाते तो नहीं सुन रहा होगा ।"

"नहीं-: मार्शल और सोल्जर एक जरूरी मीटिंग में व्यस्त हैं । उन दोनों के अलावा तीसरा शख्स इस तरफ़ नहीं आ सकता, क्योंकि किसी भी सैनिक को इस तरफ आने की मनाही है ।"

" ओह?"

"आप पैग लिये क्यों बैठी हैं मेडम? पैग खत्म कीजिये ।"

"तुम्हारी बाते सुनकर मेरा मन व्हिस्की पीने को नहीं रहा सारा । तुमने तो मुजरिम साबित कर दिया है ।"

"अगेन साॅरी पैडमा लेकिन आप किसी मुजरिम से कम भी नहीं हैं । आपने एक ऐसा काम क्रिया है, जिसकी वजह से अब सर एडलॉफ के समर्थकों के हौंसले पस्त हो जायेंगे । क्या आप समझती हैं कि मार्शल, क्लाइव को जिंदा छोड़ देगा । जब भी क्लाइव से उसका मकसद हो जायेगा । बह उसे भयानक मौत मारेगा और उसकी मौत की जिम्मेदार आप होंगी ।" वह मुझे नफ़रत भरी निगाहों से देखती हुई बोली-"क्या आप समझती हैं कि मार्शल आपके साथ वफादारी निभायेगा ? नहीं मेडम । जिस दिन उसका मकदस पूरा हो जाएगा, उस दिन बह आपको दूध की मक्खी की तरह निकालकर फेंक देगा ।"

"क्या वो इतना घटिया इंसान है कि जुबान देकर मेरे साथ ऐसा करेगा?"

=========

"सांप में और मार्शले में जरा भी अंतर नहीं हे? सांप को कितना भी दूध क्यों न पिलाओ, आखिर वो जहर ही उगलेगा ।"

मुझें इन लोगों के बारे में सारा से कुछ भी पूछने की जरूरत, नहीं थी । बह खुद मुझे सबकुछ बता रहीं ।

"एक बात बताओ सारा ।"

" क्या?"

"ये सोज्जर कैसा आदमी है?"

"वो भी एक नम्बर का हरामजादा है । वह अपने स्वार्थ के लिये किसी भी हद तक जा सकता है? औरतों के मामले में भूखा भेडिया है साला! अगर उसका दिल किसी औरत पर आ जाये तो ' उसे हासिल करने के लिये वह कुछ भी कर सकता है । अगर उसे किसी को गोली भी मारनी पड़े वह बेझिझक उसे गोली भी मार देगा ।"

मेरे चेहरे पर अजीब-सी चमक आकर लुप्त हो गई ।

सारा के इन शब्दों से ही मेरी समस्या का समाधान हो गया था । अब में सोल्जर को आसानी से अपने रास्ते से हटा सकती थी ।

"तुम्हें सर एडलॉफ के समर्थकों और इस मुल्क की जनता से इतनी हमदर्दी क्यों है ?" मैंने सारा से अगला सवाल क्रिया ।

"मैं किसी पर जुल्म होते हुए नहीं देख सकती मेडम ।" सारा ने जवाब दियाके । सेना ने तो जुल्म की हद ही कर दी है । निर्दोष लोगों को गाजर-मुली की तरह काट रहे हैं । जो भी सेना के खिलाफ आबाज उठाता है, उसे गोली मार दी जाती है । मासूमों का खून बहाया जा रहा है । धीरे-धीरे सर एडलॉंफ के समर्थकों के हौंसले पस्त हो जायेंगे, क्योंकि उनके सरगना को गिरफ्तार करके जेल की सलाखों के पीछे पहुंचाया जा चुका है और ऐसा आपकी वजह से हुआ है मेडम । आपने सर एडलॉंफ के समर्थकों की सारी मेहनत, सारी कुर्बानियों पर पानी फेर दिया है । अब उन लोगों की पराजय होगी सेना कीं जीत ।"

"सेना की जीत नहीं होगी सारा ।" न चाहते हुए भी मेरे होठों से निकल गया---" वो दिन ज्यादा दूर नहीं है जब फिर से इस मुल्क की सत्ता सर एडाॅलफ के हाथों में होगी ।" '

"ऐसा नहीं होगा मैडम ।"

"जरूर होगा ।" मैंने कहा…"ओर तब न मार्शंल बचेगा और न 'हीँ सोल्जर ।"

" काश ऐसा हो जाये तो मुझे इस नर्क से छूटकारा मिल जाए !" "वंह सर्द सांस छोडती हुई बोली-"मैं अपने परिवार के पास वापस लौट सकूंगी ।"

"अगर मैं ये कहू हूँके मार्शल ने मुझे अपनी रखैल बनाकर रख लिया था तो गलत नहीं होगा । वक्त गुजरता रहा । मौसम बदलते रहे । जब भी उसे वासना की भूख होती तो वह दरिन्दे की तरह मेरे ऊपर टूट पढ़ता । मैं कली से फूल बन गई थी । कई बार मैंने उसके चंगुल से निकल भागने का प्रयास किया, लेकिन कामयाब नहीं हो सकी थी । उसने मेरी निगरानी के लिये सैनिक तैनात कर दिये थे ।" वह अपनी बात आगे बढाती हुई बोलीं-"धीरे धीरे मार्शल की दिलचस्पी मुझमें कम होती चली गई और फिर उसने मुझे सोल्जर को सौंप दिया । सोल्जर उसका बाप निकला । वह मुझसे अपनी प्यास तो बुझाता ही, साथ में मुझे अपने मिलने वालों को भी सौप दिया करता था । धीरे धीरे मैं उस खेल की आदीं हो गई थी । मैंने विरोध करना बंद कर दिया था । जब सोल्जर का दिल भी मुझसे भर गया तो उसने मुझे अपने एक अन्य सहायक को सौंप । जिसने मुझे यहां की नौकरानी बनाकर रख दिया ।"

"तो ये बात है?"

"हां ।" कहते-कहते सारा का चेहरा भभक-सा उठा-"मेरे सीने में इंतकाम की आग धधक रही है ।.जब तक मैं उन दरिन्ब्दों से बदला नहीं ले लेती तब तक मुझे चेन नहीं मिलेगा मेडम । बस मुझे मुनासिब वक्त का इंतजार ।"

"तो फिर ये समझो किवो मुनासिब आ पहुँचा है सारा ।"

सारा ने आश्चर्य भरी निगाह से मेरी तरफ देखा--"अ. . . आप ये क्या कह रही हैं मेडम?"

' "मैं सच कह रही हू।" मैंने, कहा…"तुम्हें बहुत जल्दी इस नर्क से छुटकारा मिलने वाला है ।"

""म. . 'मुझे यहां से कौन छुटकारा दिलायेगा?"

"तुम आम खान से मतलब रखो । पेड़ गिनने की जरूरत नहीं ।"

सारा का आश्चर्य बाल बराबर भी कम नहीं हुआ था । उसे तो जैसे मेरी बात पर बिश्वास ही नहीं हो रहा था ।

"अगर आप बुरा न माने तो एक बात कहू मैडम?"

" हाँ !"

"अ. . . आप जवान के साथ-साथ खूबसूरत भी हैं ।" सारा हिचकिचाती हुई बोली---" अपने आपको बचाकर रखियेगा। कहीं आपकी हालत भी मेरे जैसी न होकर रह जाये ।"

मैं सारा की बात का मतलब समझ गई थी ।

कहने के साथ ही सारा ने मेरे हाथ से खाली गिलास लिया और उठकर पैग बनाने लगी…"एक बात पूछू मेडम ।"

" हूँ ।" . .

"'जब आप चाहती हैं कि मार्शल और सोल्जर जिंदा न बचें ।' इसके बावजूद आपने क्लाइव को गिरफ्तार क्यों करवाया?"

"मुझे पैग दो ।" मैं उसकी बात सुनी अनसुनी करती हुई बोली ।

सारा ने को पैग थमा दिया ।

"आपने भी सवाल का जवाब नहीं दिया ।"

"कुछ सवाल ऐसे होते हैं, जिनका जवाब वक्त आने पर दिया जाता है ।" मैं बोली---"" मेरे को में तो सब कुछ पूछ लिया, . लेकिन अपने बारे में कुछ नहीं बताया।"

"मैं अपने बारे मे क्या बताऊं?"

"बो सब कुछ जो तुम्हारे साथ घटा है, जिसकी वज़ह से तुम मार्शल और सोल्जर को जिंदा देखना नहीं चाहती । जबकि तुम उनकी विश्वासपात्र' लगती हो । ऐसा क्यों?" मैंने पूछा ।

पलक झपकते ही उसके चेहरे पर सोच के गहरे भाव उभरते चले गये । कदाचित् वो ये फैसला करने की कोशिश कर रही थी कि अपनी बात कहां से शुरू करे? '

मेरी निगाहें सारा के चेहरे पर जमी हुई थीं ।

"मार्शल ने मुझे भी आर्मी में अच्छी सर्विस दी थी । ये आज से तीन साल पहले की बात है उस वक्त मैं और भी ज्यादा हसीन थी । मेरी खूबसूरती देखकर मार्शल मुझ पर फिदा हो गया था ।

चंद दिनों बाद उसने मुझे आर्मी से हटा लिया और ये कहकर मुझे अपने पास रख लिया कि आज से मैं उसकी पी०ए० हूँ । मेरे वेतन में . भी उंसने अच्छा-खासा इजाफा कर दिया था, लेकिन उसके दिल की बात मेरी निगाहों से छिपी नहीं रह गई थी ।"

बह बताती चली गई--"एक दिन मार्शल ने अपने दिल की बात मेरे सामने रख ही दी । तो मुझ अपने बेडरूम में ले जाना चाहता था । लेकिन मैंने उसकी बात मानने से साफ इंकार कर दिया । बह अपनी जिद पर अड़ा रहा और उसने अपनी हवस मिटाके दम लिया । उस दिन के बाद बह रोज मेरे जिस्म से खेलने लगा । मैंने मार्शल का, विरोध किया, मगर उस पर कोई प्रभाव नहीं पडा उल्टा मेरे विरोध. का परिणाम यह हुआ कि उसने मुझे इस किले में नजरबंद-सा कर लिया और सेरी स्थिति एक, कैदी जैसी होकर रह गई ।"

कहते-कहते सारा का गला भर आया।

मैं उसका एक-एक शब्द गोर से सुन रही थी ।।
 
" मुझमें और तुममेँ जमीन आसमान का अन्तर है सारा । मेरी मर्जी के मुझे कोई छू भी नहीं सकता । मैं वो जहरीली नागिन जिसका काटा इंसान पानी नहीं मांगता । वो तो मेरी किस्मत खराब है, जो मुझे आई०एस०सी० छोड़नी पडी और मुझे मार्शल की पनाह में आना पड़ा । वरना मैं मार्शल जैसे शख्स को घास तक नहीँ ' डालती ।"

"आपकी बातें सुनकर तो मेरी खोपडी नाचकर रह गई है मेडम ।" सारा चकराई बोली…"कहीं ऐसा तो नहीँ-हे कि आपने अपने बारे में जो कुछ बताया है । वो सब कुछ झूठ हो और आपका मार्शल तक पहुंचने का मकसद मार्शल और सोल्जर का खात्मा करना हो !"

मैं मनं-ही-मन सारा कै दिमाग की तारीफ किये बगेर-नहीं रह सकी थी । इससे पहले कि मैं कुछ कह पाती, वह पुन: बोल उठी--"अगर मैंने सच कहा है तो आप अकेली इन लोगों का बाल भी बांका नहीं कर सकेंगी । मार्शल और सोल्जर दोनों ही खतरनाक किस्म के इंसान हैं । दोनों ने अपनी सुरक्षा का-तगड़ा बंदोबस्त क्रिया हुआ है ।"

सारा को क्या मालूम था कि जब मैं कहर बनकर उन दरिंन्ब्दों पर टूटूगी तो उनके सारे सुरक्षा-प्रबंध धरे-के-धरे रह जायेंगे ।

मैं तो बड़े बडो को एक दहशतनाक अंजाम तक -पहुचा चुकी हूँ । वे दोनों तो किस खेत की मूली थे ।

"यानि मेरा अंदाजा ठीक निकला मेडम ।"

मैं उसका जवाब गोल कर गई ।

फिलहाल मैं उसे अंधेरे में ही रखना चाहती थी ।

!मैडम !"

"यस ।"

"अगर आप मुझे यहां से निकाल दे तो मैं मरते दम तक आपका अहसान नहीं भूलूगी । मैं अपने पृरिवार वालों के पास जाना चाहती हू

"तुम्हाऱी इच्छा अवश्य पूरी होगी सारा ।"

" मैं किसी काबिल तो नहीं हूं मेडम, अगर मेरी मदद की जरूरत हो तो बेझिझक बोल देना । आपके लिये मैं अपनी जान पर खेल जाऊंगी ।" वह दृढ़ता भरे स्वर में बोली ।

मैंने सारा के चेहरे का गोर से अध्ययन क्रिया । "

सारा के चेहरे के भाव बता रहे थे कि वह सच्चे दिल से मेरी मदद करने की ख्वाहिशमंद है । मुझे ऐसे शख्स की ज़रूरत भी थी ।

वक्त पड़ने पर सारा मेरी काफी यहीं मददगार साबित हो सकती थी ।

अचानक ।

बाहर राहदारी में बूटों की आवाजे गूंज उठी ।

पलक झपकते ही सारा वेड से नीचे उतर गई । अगले क्षण उसकी निगाहें दरवाजे की तरफ घूम गई । साथ ही उसके होठों से नफरत फूट निकली---"दोनों हरामजादों में से ही कोई एक

होगा ।"

मेरी निरराहें दरवाजे पर स्थिर हो चुकी थीं ।

आवाज कमरे के करीब आती जा रही थी । फिर कठिनाई से एक पल ही गुजरा था कि सोल्जर ने भीतर कदम रखा ।

सोल्जर ने मेरी तरफ देखा ।

मैँ धीरे से मुस्कुरा दी ।

वह भी मुस्कुराया।

. "तुम यहां क्या कर रही हो?" वेड के करीब पहुंचकर सोल्जर सारा से मुखातिब होकर गुर्रा उठा ।

इससे पहले कि सारा कोई जवाब देती, मैं बोल उठी-"मुझे व्हिस्की की सख्त जरूरत थी । इसीलिये मैंने इसे बुलाया था ।"

"ठीक है । तुम जाओं ।" सोल्जर ने कहा---" जब तक बुलाया न जाये, तब तक इस तरफ का रुख करने की भी जरूरत नही है ।"

"ठीक है ।" सारा सिर हिलाकर रह गई ।

"अब खड्री खडी मेरा मुंह क्यों देख रही हो? यहां से निकलो ।"

सारा पलटकर तेज तेज कदमों से दरवाजे की तरफ बढ गई।

"ये कब आई थी?" सोल्जर ने पूछा ।

"अभी-अभी आई थी ।"

"कुछ कह रही थी ।"

. . "नहीं तो ।"

. " 'उसका नाम सारा है ।" सोल्जर बोना--" "नौकरानी है जब भी कोई मेहमान आता है । उसकी खातिरदारी और देखभाल यहीं करती है । तुम उसे मुह मत लगाना और न हीँ ज्यादा बातें करना । वस अपने काम-से मतलब रखना ।"

" मैं सोज्जर का तात्पर्य समझ गई थी । वो नहीं चाहता था कि मै सारा से ज्यादा मेंल जोल बढाऊं । वह मुझे वो सब कुछ बता सकती है, जो कुछ उसके साथ गुजरा था ।

परन्तु वेचारा सोज्जर क्या जानता था किं वह न सिर्फ सब कुछ बता चुकी है, बल्कि उसकी मौत का इंतजाम भी कर गई है ।

मेरी इच्छा तो हुई कि फौरन वेड से नीचे उतरकर कराटे कै एक ही वार में कमीने की गर्दन छोड़ दूं किन्तु मैं बडी मुश्किल से अपनी इस इच्छा को क्रियान्वित करने से रोक पाई थी ।

"बैठो सोल्जर ।" मैंने कहा ।

"मेरे पास बैठने के लिये वक्त नहीं है । मैं एक जरूरी काम से जा रहा हूँ ।" उसने कहा---"तुम्हारे लिये मार्शल साहब का एक मेसेज है ।"

"क्या मेसेज है?"

"वे कुछ देर बादं तुम्हारे पास पहुच रहे हैं?"

" खास बात है क्या?"

जवाब में सोज्जर के होठों पर अर्थ पूर्ण मुस्कान नाच उठी ।

मै बच्ची तो नहीं थी । मैं उसकी मुसकान का मतलब अच्छी तरह से समझ गई थी । आज तक न जाने कितने लोगों से मेरा वास्ता पड चुका है । फिलहाल मेरी दिलचस्पी मार्शल से ज्यादा सोल्जर में थी। . .

सोल्जर ।

मेरे मिशन में एक बहुत बडी रूकावट था वह ।

मुझे उस रुकावट को अपने रास्ते से हटाना था ।

"में चलता हूं रीमा ।"

" ओ के ।"

सोल्जर चला गया ।

मैं बेड से नीचे उतरकर अपने लिये नया जाम तैयार करने लगी । अब मुझे मार्शल का इंतजार था । . .

======

======

इंतजार की घडियां लंबी होती जा रहीं थीं ।

मार्शल न जाने कहां अटक गया था ।

अब तक मैं पांच लार्ज पैग हलक से नीचे उतार चुकी थी ।

और अब ।

सिगरेट-पर-सिगरेट फूर्के जा रही थी । बेड के करीब मेज पऱ रखी ऐश-ट्रे ठसाठस भर चुकी थी ।

तकरीबन चालीस मिनट बाद मार्शल का चेहरा नजर आया ।

"हेलो यंग लेडी ।" वह बेड की तरफ बढता हुआ बोला ।

"हेलो ।" मैं चहकी ।

मेरी निगाहें मार्शल के चेहरे पर थीं । उसके चेहरे पर शराब की तमतमाहट साफ नजर आ रही थी । आखो मे सुर्खी तैर रही थी ।।
 
उसकी चाल में हल्की-सी लडखड़ाहट थी । जाहिर था कि इस समय मार्शल लिमिट से ज्यादा पीये था ।

मैंने एक खास बात और नोट कि वह अकेला नहीं आया था । उसके साथ तीन कमाण्डो भी थे, जो दरवाजे के बाहर ही रूक गये थे और दीवार से किसी छिपकली की तरह चिपके खड़े थे ।

यानि बहुत ही चालाक और चौकस रहने वाला शख्स. था मार्शला . .।

"म. . .मुझे आने में थोड्री देर हो गई रीमा ।" मार्शल का स्वर लड़खड़ाया। "

"कोई बात नहीं मार्शल साहब । मैँ आपका और भी इंतजार कर सकती थी ।" मैंने कहा ।

वह मुस्कुरा दिया । मार्शल बेड के करीब पहुच चुका था और उसकी निगाहें मेरे चेहरे पर टिकी हुई थीं ।

"क्या देख रहे हैं आप ?' मैंने पूछा ।

"तुम पहले से कहीं ज्यादा खूबसूरत लग रही हो बेबी ।"

" आपकी नजरों का धोखा है । मैं तो पहले जितनी ही खूबसूरत हूं।" मेरे होठों पर दिलकश मुस्कान नाच उठी ।

वह कुछ बोला नहीं ।

बस खामोश खडा मेरा चेहरा निहारता रहा ।

" आप खड़े क्यों हैं?" मैंने सिगरेट का आखरी कश लेकर उसे ऐश- ट्रे में झोंकते हुए कहा-"बैठिये न?"

मार्शल मेरी बगल में मुझसे सटकर बैठ गया ।

अगले क्षण मैं चौंकी । अपने नितम्ब पर कुछ सरसराता-सा महसूस हुआ था ।

दूसरे क्षण मेरा हाथ पीछे गया तो मार्शल की उंगलियां मेरी उँगलियों से उलझ गई ।

"य. . . ये क्या शरारत है मार्शल साहब ?" मैं शिकायती लहजे में बोली ।

मार्शल ने तुंरत अपना हाथ पीछे खींच लिया ।

उसके इरादे साफ़ हो चुके थे । वह इस समय मौजमस्ती करने का इरादा लेकर मेरे पास आया था । किन्तु मैं फिर भी अनजान वनी रही ।

"तुम्हें यहां कोई तकलीफ तो नहीं है रीमा ।" वह मेरी बात सुनी अनुसनी करता हुआ बोला ।

" आपके होते हुए भला मुझे कोई तकलीफ कैसे हो सकती है !" मैने उंत्तर दिया, फिर एक क्षण ठहरकर बोली-

" आपने मेरे बारे में क्या सोचा?"

"म...मतलब?"

"मतलब ये कि मेरे काम के बारे में क्या सोचा? अगर मैं इसी तरह खाली बैठी रही तो बोर हो जाऊंगी । मैं कुछ करते रहना चाहतीं हूं। मुझे करने के लिये कोई काम दीजिये ।"

" तुम इतनी परेशान क्यों हो रही हो ? जब तुम्हारे लायक कोई काम आएगा तो मैं तुम्हें बता दूंगा । फिलहाल तो तुम आराम करो । वैसे मैं तो ये चाहता किं तुम काम-जाम छोडकर मेरी होकर रह जाओं । क्योंकि तुम मुझे पसंद हो ।"

सारा ने गलत नहीं कहा था । यह मेरे साथ यही सब करने के चक्कर में था, जो उसने सारा के साथ क्रिया था, लेकिन वो क्या जानता था कि इस बार उसका पाला रीमा भारती से पडा है, जो उस जैसे जाने कितनों को अपनी 'पैंटी' में रखती है । मैंने अपनी नशीली आंखें उसकी आँखों में डाल दीं-"मैं बंधनों में जिदगी गुजारने की आदि नहीं हूँ मार्शल साहब ! मैं एक आजाद पंछी की तरह जीवन व्यतीत करती रही हूं। न मेरे उपर _ किसी का दबाव रहा है, और न ही कोई अंकुश । ये मेरी अपनी जिदगी है और मैं आगे भी इसे अपने ढंग से बसर करना चाहती हू । "

'गुड गर्ल ।" वह बोला---" मैँ तुम्हारी आजादी पर किसी तरह क्री पाबन्दी लगाने का इरादा नहीं रखता। तुम अपने ढंग से जी सकती हो । मगर कहना पड़ेगा रीमा डार्लिंग कि तुम बहुत खूबसूरत हो । तुम्हें देखकर मेरा दिमाग खराब हो रहा है ।"

फिर मार्शले ने मेरी खूबसूरती के कसीदे काढने शुरु कर दिये थे । इस घडी मेरे होठों पर एक दिलकश मुस्कान नृत्य कर रही थी । मार्शल को बढावा देने वाली मुस्कान ।

अचानक । मार्शल ने अपना चेहरा आगे की तरफ सुझाया और मेरे होठों . पर चुम्बन जड़ दिया ।

मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे होठों पर कोई अंगारा गिरा हो ।

"य. . .ये क्या हरकत है ?" मैंने हड़बड़ाने की शानदार एस्टिंग की…"दरवाजा खुला हुआ है । कोई भी भीतर आ सकता हैं।"

"मेरे होते हुए किसकी मजाल है, जो अन्दर कदम भी रख दे? फिर भी अगर तुम्हें खुले दरवाजे के कारण शर्म आ रही है तो मैं बंद करवा देता हूं।" ककहर बह दरवाजे की तरफ़ मुंह करके आदेश पूर्ण लहजे में बोला-"दरवाजा बंद कर दो ।" मार्शल के आदेश का तुरंत पालन हुआ है "

दरवाजा बंद होने वाला मार्शल का एक कमाण्डो था, जो दरवाजे के बगल में दीवार से चिपका ख़ड़ा था ।

"अब तो हमें कोई नहीं देखेगा ।" बोला वह ।

मैंने खामोशी साध ली ।

"माई स्वीट हार्ट ।" बह मुस्कराया ---" आई लव यू।"

अब मेरे रूप का जादू मार्शल के सिर चढकर बोलने लगा था ।

मैंने अपने होठ उसकी गंर्दन से रगड़ दिये ।

मार्शल ने मेरी शर्ट के खुले गले में हाथ डालकर मेरे वक्ष कौ छुआ । मगर दूसरे ही क्षण अपना हाथ यूं झटके से पीछे खींच लिया । मानो उसे बिजली का शॉक लगा हो ।

"क्या हुआ मार्शल साहब?" मैंने पूछा ।

वह सकपकाकर रह गया । फिर वह बूट उतारकर वेड पर बैठ गया । मैं पहले ही पालथी मारकर वेड पर बैठं चुकी थी । मार्शल ने मेरी बांह थामकर अपने कंधो पर रख लीं । मैंने अपनी बांहें उसके गले का हार बना दीं और अपने अधर उसके होठो की तरफ बढा दिए ।

अगले क्षणा . . ।

मेरे अधर उसके होठों से टकरा गये । साथ ही मेरी बांहें उसकी गर्दन के इदे-गिर्द फदे की तरह कस गई ।

मार्शल ने मुस्कुराकर अपने दांतों से मेरी कान की लो को धीरे से द्रबा दिया ।

मैं रोमांचित हो उठी ।

हम दोनों एक दूसरे के इतने करीब थे कि एक दूसरे के दिल को धड़कने साफ सुन रहे थे । हमारी गर्मा-गर्म सांसें एक दूसरे के चेहरे से टकरा रहीँ थीं ।

उत्तेजना बढ़ रहीं थी ।

मैंने मार्शल की आँखों में झांका ।

बहां वासना के-सुर्ख डोरे तैर रहे थे । सांसें भारी थीं । चेहरा कनपटियों तक सुर्ख नजर आ रहा था ।

बह मुझमें समाने के लिये बेताब था ।

. ". . .अब तुम अपने कपड़े उतार दो रीमा ।" मार्शंल के सब्र का प्याला छलक गया ।

" क.....क्यो ?" मैने चौकने का अभिनय किया ।

"मै तुम्हारी खूबसुरती देखना चाहता हूं ।"

भला मुझे कपड़े उतारने में क्या शर्म थी? आज तक मैं न जाने कितने मर्दो के सामने वस्त्र उतार चुकी हूँ । दूसरे क्षण मैंने अपने कपडे उतार फेकें । ’

अब में निर्वस्त्र थी ।

मेरा शोला बदन अपनी स्वर्णिम आभा कै साथ उसके सामने . . था ।

वह पट्ठा तो मानो सांस लेना तक भूल गया था । मार्शल अवाक्-सा मेरे उफनते यौवन को देखता रह गया । जब मेरा कयामत बरपा देने वाला जिस्म अपनी जन्मजात अवस्था में किसी बालिग मर्द के सामने हो तो वह अपने जिस्म पंर कपडों का वजन कैसे सहन कर सकता है?

यही मार्शल के साथ हुआ ।

शीघ्र ही वह मेरी तरह निर्वस्त्र था।

… फिर उसने मुझे बेड पर पीछे की तरफ़ धकेल दिया की मुझ पर छाता चला गया ।

प्यार का खेल शुरु हुआ ।

थाप-पर-थाप पड़ने लगी ।

. , मार्शल तो दरिन्दा साबित हो रहा था । उसे संभाल पाना मेरे लिये कठिन काम था ।

मेरे होठों से पीड़ा भरी चीखे निकल रही र्थी । किन्तु उस पर मेरी चीखों का जरा भी प्रभाव नहीं पड़ा था । वह तो मानो बहरा हो गया था । मैंने मार्शल के नीचे से निकलने का प्रयास क्रिया, लेकिन उसने मुझे हिलने तक नहीं दिया था ।

एकाएक मार्शल की गति में तीव्रता भरती चली गई । ऐसा लग रहा था जैसे कमरे में तूफान आ गया हो । हम दोनों पसीने से लथपथ हो चुके थे । . … और फिर ।

मार्शल के जिम क्रो जोरों का झटका लगा, साथ ही वह मेरे ऊपर गिरकर कुत्ते की तरह हांफने लगा । वह काफी देर तक मुझसे लिपटा पड़ा रहा ।

फिर यह मेरी बगल में गिरकर लंबी-लंबी सांसें लेने लगा ।

वह तो लंबी रेस का घोडा निकला था । कुछ पल ही गुजरे थे क्रि मार्शल का हाथ पुनः मेरे जिस्म पर फिसलने लगा । वह दूसरी पारी खेलने के मूड लग रहा था ।

मैं उसे इंकार भी तो नहीं कर सकती थी ।

"मेंने आज़ तक ऩ जाने कितनी औरतों का मानमर्दन क्रिया है ।" वह मेरे होठों पर ऊंगली फिराता हुए बोला-"लेकिन जो आनन्द मुझे तुमसे मिला है किसी और से नहीं मिला । वाकई में तुम बहुत जानदार चीज हो रीमा ।"

मैंने मन-ही-मन उसे भद्दी-सी गाली दी और उठकर बैठ गई ।

"क्या हुआ" मार्शल ने पूछा ।

"कुछ नहीं ।"

"फिर तुम् उठकर क्यों बैठ गई?"

"उठकर बैठना मना है क्या ?"

"नहीं तो !"

" फिर ।"

" मै दूसरी पारी खेलने के मूड में हू । लेट जाओ ।"

वह मेरी कलाई थामकर बोला । तभी दरवाजे पर दस्तक पडी ।

"कौन हरामजादा है?" मार्शल दरवाजे की तरफ मुंह करके चीख उठा ।

"म.. .मैं टामसऩ हू बॉस ।"

"बया बात है?" वह बोला---"दरवाजे पर दस्तक क्यों दी?"

" आइं०एम० सॉरी । ट्रासमीटर पर आपके लिये जरूरी मैसेज है, । इसलिये मुझे आपको डिस्टर्ब करना पडा ।"

पलक झपकते ही मार्शल का सारा जोश ठंडा पड गया । वह स्प्रिंग लगे खिलौने की तरह उछलकर बेड पर बैठ गया ।

"ट्रांसमीटर पर भी अभी मैसेज आना था ।" वह बड़बडाया-"वो जो कोई भी है । मुझसे कुछ देर बाद सम्पर्क स्थापित नहीं का सकता था ।"

कहने के साथ ही वह कपड़े उठाकर पहनने लगा ।

"मेरे लिये क्यो आदेश है सर?" बाहर से टायसन का स्वर उभरा ।

"तुम चलो । मैँ जाता हु ।"

मार्शल कपड़े पहनकर बेड से नीचे उतरा ।

"हरामजादे ने सारा मूड बिगाड़ का रख दिया ।" वह मेरी तरफ देखता हुआ बोला--" मैं कल रात दस बजे आऊंगा रीमा । अब मैं चलता हूं ।"

'

"जब आपका मन करे चले आना मार्शल साहब ।" न चाहते हुए भी मैं मुस्कराई-"मेरे दिलं के दरवाजे आपके लिये चौबीस घंटे खुले हैँ । मुझे आपका इंतजार रहेगा ।"

मेरे गाल पर हल्का-सा चुम्बन अंकित किया । फिर पलटकर दरवाजे की तरफ बढता चला गया ।

मैँने छुटकारे की लम्बी सांस ली ।

कई दिन तेजी से गुजर गये।

मार्शल हर रात दस बजे के आसपास मेरे कमरे में आता और मुझे रौंद कर चला जाता । मेरा मिशन बीच में ही रूक-सा गया था । इस बीच सोल्जर से मेरी मुलाकात नहीं हुई थी । न जाने वो कहां गायब हो गया था?

शाम ढल रही थी ।

इस वक्त मैं इमारत के लंबे…चौड़े आँगन में टहल रहीं थी ।

टहलने का तो सिर्फ ब्रहाना था । दरअसल में वहा की सुरक्षा व्यवस्था जांच कर रही थी, ताकि ज़रुरत पडते पर यहाँ से सहीं-सलामत निकला जा मुझे ।

सहसा!

सामने से सोल्जर आता दिखाई दिया ।

सोल्जर को देखकर मैं अदा से मुस्कुराई ।

"हैलो यंग लेडी ।" वह मेरे करीब पहुंचकर बोला ।

"हैली हैंडसम ।" मेरे होठों की मुस्कान गहरी हो उठी-" तुम कई रोज से दिखाई नहीं दिये । कहां चले गये थे?"

मैंने अपनी बात इस अंदाज में कहीँ थी जैसे मैं उससे मिलने के लिये मरी जा रही हूं । उसे लेकर मेरे दिमाग में जो स्कीम थी, उसके हिसाब से मुझे सोल्जर को पहले अपने जाल में र्फसाना था ।

" मैं एक जरूरी काम से कहीं गया हुआ था । अभी-अभी लौटा हूँ । लेकिन तुम यहां क्या कर रही हो?" वह बोला ।

"मैं अकेली कमरे में पड्री पड्री बोर हो रही थी । इसलिये इस तरफ़ निकल आई ।"

"मार्शल साहब तो आते होगे ।"

"उनका आना न आने के बराबर ही है । वे कुछ देर के लिये आते हैं और अपनी प्यास बुझा कर चले जाते हैं । दिन में तो मैं बहुत ज्यादा बोरियत महसूस का रही हूं । अकेलापन वहुत खलता है । रात में अकेले नीद नहीं आती ।" मैंने सर्द सांस छोड़ी ।

"शायद तुम्हें किसी साथी की जरुरत है ।" वह अर्थपूर्ण अंदाज में मुस्कुराया ।

"यस ।" में भी मुस्कुराई…"बशर्तें वह मेरी पसद का हो । उसके साथ मेरां वक्त आराम से कट सके ।"

"तुम्हें सिर्फ वक्त काटने के लिये साथी चाहिये । मैं तो कुछ और समझा था ।"

" कुछ और क्या समझे थे ?"

" मेरा ख्याल था कि तुम्हें वेड पार्टनर... ।"

"ओह !"

मैं अपनी तरफ़ से पहल करने के हक में नहीं थी ।

सोल्जर को मुझपर शक हो सकता था।

"रीमा ।" वह बोला ।

"यस ! "

"आईं लव यू।"

प्रत्युत्तर में मैं अदा से मुस्करा उठी ।

"अगर तुम बुरा न मानो आज़ रात मैं तुम्हारे कमरे में आ सकता हूँ ।"

"आ जाओ । मैं मना कब क्रिया" है? बहुत मजा जायेगा जब मिल बैठेंगे दीबांने दो ।"
 
उसके चेहरे पर हजार बांट का वल्ब-सा जल उठा, मानो उसे मनमांगी मुराद मिल गई हो । साथ ही उसका चेहरा जिस तेजी से चमका था । उसी तेजी से बुझ भी गया । वह बोला… "'अ.. .अगर मार्शल साहब कमरे में आ गये तो… !"

"डरपोक । प्यार भी करना चांहते हो और डरते भी हो । प्यार करने बाले डरते नहीं हैं । बैसे घबराने की बात नहीं है । आज रात मार्शल साहब मेरे पास नहीं आयेंगे ।"

" तुम्हें कैसे पता ? "उसका स्वर उत्सुकता से भर उठा ।

" मुझे कह गये थे कि आज रात उन्हें कोई जरूरी काम है !"

" फिर तो मैं जरूर आऊंगां । अब ये बताओ कि मैं आज रात कितने बजे हाजिर हो जाऊ?"

"नौ बजे के आसपास जा जाओ ।"

"ठीकं है, तो मैं रात नौ बने हाजिर होता हू।"

" तुम्हारा इंतजार करूंगी ।" एक तरफ बढती हुई बोली ।

किन्तु ।

मेरा बोलने का अंदाज कुछ ऐसा था कि निसंदेह उसके दिल पर हजारों बिजलियाँ एक साथ टूट पड़ी होगी । कुछ पलों बाद मैँ अपने कमरे में बैड पर फैली थी ।

====

====

दरवाजा नॉक हुआ ।

मैंने वाॅल क्लाक पर नजर डाली, उस वत्त ठीक नौ बज रहे थे ।

इस घडी मैं एक हाथ की दो उगलियों के बीच सिगरेट दबाये ओर दूसरे हाथ में व्हिस्की का गिलास थामे सोल्जर की ही प्रतीक्षा कर रहीँ थी । मैंने जान-बूझकर एक झीना-भा गाउन पहन रखा था जिसके नीचे मैं अन्य कोई कपडा नहीं पहने थी ।

दरवाजा पुनः नॉक हुआ ।

"आ जाओ । दरवाजा खुला है ।"' मैंने कहा ।

अगले क्षण दरवाजा खुला और सोल्जर ने भीतर कदम रखा ।

वह वक्त का पाबंद था ।

"आओ डियर ।" मैंने प्यारी सी मुस्कान के साथ उसका स्वागत किया । उसने दरवाजे के दोनों पल्ले आपस में मिलाये और पलटकर वेड की तरफ़ बढता हुआ बोला-"देख लो, मैंने तुम्हे जरा भी इंतजार नहीं करने दिया । मैं ठीक वक्त पर हाजिर हुआ हूँ ।"

"आदमी को वक्त का पाबंद होना ही चाहिये ।" मैंने सिगरेट का कश लिया ।

सोल्जर मेरे करीब वेड पर बैठ गया । फिर उसकी निगाहें मेरे जिस्म पर सरसराती चली गई ।"

" तुम्हारे लिये पेग बनाऊं?" मैंने पूछा ।

" नेकी और पूछ-पूछ ।" उसने उत्तर दिया-------"पीने के बाद प्यार का मजा दौगुना हो जाता है ।"

मैँने अपना गिलास मेज पर रखा । सिगरेट का आखिरी कश लेकर उसे ऐश-ट्रे में मसला फिर बेड से नीचे उतरकर सोल्जर के लिये पैग बनाने लगी ।

पैग बनाकर मैंने बेड के नीचे से एक छोटी-सी पुढिया निकालकर खोली और उसमें मौजूद सफेद रंग का पाउडर गिलास में डाल दिया । वह शीघ्र ही व्हिस्की धुल गया । दरअसल वो पाऊडर इंसान की वासना को चरम सीसा पर पहुंचाने के लिये था । उसके पेट में जाने के बाद इंसान वासना में पागल हो जाता है । उसे और कुछ सुझाई नहीं देता । ऐसे छोटे-मोटे 'फार्मूले' तो आपके सपनों ही रानी यानि मैं हमेशा अपनी 'अंटी' में रखती थी ।

व्हिस्की में पाउडर मिलाना भी मेरी स्कीम का हिस्सा था । मेरी पीठ सोल्जर की तरफ़ थी । इसलिये वो मेरी हरकत नहीं भांप पाया था । मैं गिलास उठाकर सोल्जर की तरफ घूमी और उसे गिलास थमाकर अपना पैग उठा लिया, फिर उसकी बगल में बैठ गई ।

हमने गिलास आपस में टकराये और होठों से लगा लिये । सोल्जर ने एक ही सांस में गिलास खाली कर दिया । मैंने भी गिलास खाली कर दिया ।

और फिर ।

नये पैग बने ।

हलक से नीचे उतरे ।

पीने का सिलसिला उस वक्त खत्म हुआ जब हमारे पेट में चार-चार लार्ज पैग उतर गये थे ।

इस ब्रीच मेरी निगाहें बराबर सोल्जर के चेहरे पर रही थी । पाउडर ने अपना काम कर दिया था । उसका चेहरा अंगारे की तरह सुर्ख पड़ चुका था ।

आंखों में वासनामय पागलपन के भाव साफ़ नजर आने लगे थे ।

"त.. .तुम तो शराब से भी ज्यादा नशीली हो जानेमन ।" वह मेरी बांह सहलता हुआ बोला ।

मेरे होठों पर दिलकश स्वान नाच उठी ।

पलक झपकते ही सोल्जर ने मुझे बांहों मेँ भर लिया और पाग़लो की तरह मेरे होठ, गर्दन, माथा गर्दन चूमने लगा ।

" अपने कपड़े उतार दो रीमा ।" उसका स्वर थरथराया ।

" क्यों ?"

"मै तुम्हारा संगमरमरी बदन देखना चाहता हूं उस रूप में जिसमें कुदरत ने तुम्हें बनाया है ।"

जिस्म पर कपड़े ही कितने थे ? जो मुझे उतारने में देर लगती । सिर्फ एक गाउन ही तो था । मैंने बेड से नीचे उतरकर गाउन की डोरी खींचते हुए अपने कंधों को एक विशेष आज में झटका दिया ।

दूसरे क्षण.....!

गाउन मेरे जिस्म पर फिसलता हुआ पैरों में ढेर नज़र आ रहा था ।

अब मैं निर्वस्त्र थी ।

मेरा जिस्म दूधिया प्रकाश में चमक उठा ।

सोल्जर की निगाहे जब मेरे फूल की तरह खिले यौवन पुष्यों और मखमली जिस्म पर पडी तो उसके छक्के छूट गये, वह भाड़-सा मुंह फाडे देखता रह गया ।

मेरे निर्वस्त्र जिस्म ने उसकी वासना पर आगग में घी जैसा काम क्रिया था ।

आंखों में वासना-ही-वासना तैरती चली गई थी ।

" उफ! तुम्हारा जिस्म है या धधकता ज्वालामुखी?" उसके होठों से बरबस ही निकल गया ।

जवाब में मैं दातों से अपना निचला होंठ दबाकर मुस्करा उठी ।

सोल्जर की निगाहें लगता है मेरे जिस्म पर फिसल रही थीं ।

उस पट्ठे की निगाहें एक जगह पर टिक ही नहीं पा रंहीँ थीं ।

" क्या हुआ सोज्जर?" मैंने उसे कुरेदा ।।

उसका सम्मोहन टूटा ।

"ऐसा सांचे में ढला जिस्म तो मैंने आज तक नहीँ देखा ।"

वह मेरे वक्षों पर निगाहें टिकाता हुआ बोला-"तुम्हारे अंग-अंग से यौवन फूट रहा है । "

मैने अपने वक्षों के नीचे हथेलियाँ रखकर उन्हें तनिक ऊपर उठा लिया ।

मेरे वक्ष और मुखर हो उठे ।

सोल्जर पर तो मानो कड़कड़ाकर बिजली गिरी ।

"म. .मेरे पास आओ ।" उसका स्वर थरथराया ---" अब और मत तरसाओ ।"

"मुझे अपने पास क्यों बुला रहे हो?" मैं मजे लेने वाले स्वर में बोली ।

"में प्यासा हू। अपनी प्यास बुझाना चाहता हू।"

"ये तो ठीक बात नहीं है ।"

"क. .क्यों ठीक नहीं है?"

"तुम तो मेरा जिस्म देखना चाहते थे, और अब प्यास बुझाने की बात कर रहे हो?"'

"मैं क्या करूं? तुम्हारा हाहाकारी जिस्म देखकर मैं पागल हो उठा हूँ। मुझे अपने आप पर काबू नहीं रह गया है ।"
 
एक तो मेरा हाहाकारी जिस्म । दूसरे सोल्जर पर शराब का नशा और तीसरे पाउडर का प्रभाव ।

तीनों ने मिलकर सोल्जर की हालत खराब कर दी थी ।

"प.. .प्लीज़ रीमा! अब और नहीं सहा जाता ।"

"मगर तुम भी तो अपने कपड़े उतारो । तभी तो बात आगे हैं बढेगी ।"

भेरी तरफ से हरी झण्डी मिलते ही उसने उठकर आनन-फानन में अपने कपड़े उतार फेके ।

अब वह भी वेलिवास था ।

मैं उसकी बगल में जा बैठी ।

सोल्जर का ध्यान किसी भी तरफ नहीं था । वह ती मुझमें समाने के लिये बेताब हुआ जा रहा था । मैं देख चुकी थी कि उसकी पैंट की जेब में रिवाल्वर मौजूद था । मैंने जेब से रिवाल्वर निकालकर बड़ी सफाई से तकिये के नीचे सरका दिया ।

अब खेल की शुरुआत होनी थी ।

और वो खेल वेड पर खेला जाने वाला था ।

सहसा ।

सोल्जर ने मुझे पीछे की तरफ धकेल दिया । मैं पीठ के वल बेड पर गिरी । वह मेरे जिस्म को देखकर पागल-सा हुआ जा रहा था । उसने मेरे उपर झुककर मेरी नाभि पर अपने होंठ रख दिये । दूसरे क्षण उसके होंठ रोम-रोम में गुदगुदाहट भरते हुए नीचे की तरफ सरकने लगे ।

मैंने वॉल क्लाक की तरफ़ देखा ( दस बज रहे थे ।

मार्शल क्रिसी भी क्षण यहां पहुंच सकता था ।

फिर एक पल भी नहीं गुजरा।

तभी भड़ाक की तीव्र आवाज के साथ दरवाजा खुला।

सोल्जर चौंका ।

उसने हढ़बड़ाकर अपना चेहरा उठाया ।

साथ ही उसकी निगाहें दरवाजे की तरफ उठ गईं ।

मेरी निगाह भी दरवाजे की तरफ घूम गई थीं ।

दरवाजे कै र्बीचों बीच मार्शल ख़ड़ा था । भीतर का दृश्य देखते ही उसका चेहरा सुर्ख पड़ता चला गया था, मानो जिस्म का सारा खून सिमटकर पर एकत्र हो गया हो । आँखों से अंगारे बरस उठे थे । जबड़े एक-दूसरे पर जमकर सख्ती से कस गये थे ।

वो मेरी आशा के अनुरूप हर रात की तरह आज भी शराब में टुन्न होकर आया था ।

मैंने मांर्शले का उग्र रूप देखा तो मैं उछलकर बेड पर बैठ गई ।

" 'हरामजादे' !" मार्शल के होठों से भेडिये जैसी गुर्राहट निकली- ! तेरी इतनी हिम्मत कि तू रीमा भारती को हाथ लगाये? ऐसा करते वत्त तुझे मेरा खौफ़ नहीं आया सुअर के बच्चे ।"

" आप मुझ पर खामखा खफा हो रहे हैं सर ।" सोल्जर बेखौफ स्वर में बोला-" अगर में रीमा के साथ मौज-मस्ती कर लूगा तो आपका क्या विगड जायेगा? ये आपकी प्रॉपर्टी… तो नहीं है?"

"जुबान चलाता है कुत्ते ।" मार्शल आगे बढ़ता हुआ गला फाड़कर चिल्लाया----" तू अच्छी तरह से जानता है कि जिस लड़की पर मैं हाथ रख देता हूं उसकी तरफ कोई आँख उठाकर नहीं देखता, अगर कोई ऐसी गलती करता है तो मैं उसकी आखे नोंच लेता हूं और तूने तो बहुत भयंकर भूल की है ।"

मै 'मन'-मन खुश थी ।

मुझे अपनी योजना कामयाब होती लग रही थी ।

"आप मुझसे ओहदे में ब्रड़े हैं मार्शल साहब, लेकिन इसका मतलब ये नहीं हैं कि आप मेरे साथ इस तरह से पेश आयें । आखिर मेरी भी कोई इज्जत है ।" सोल्जर का स्वर जोश से भर उठा ।

" और रही बात रीमा की तो मैं फिर कहता हूँ ये आपकी जागीर नहीं है । ऐसी चीजें मिल वाटकर इस्तेमाल की जाती हैं ।"

" तुझमें इतना हौंसला कहां से आ गया हरामी, जो तू मुझसे इस तरह की बातें कर सके । मैं तेरी बोटी-बोटी करके कुत्तों के सामने डाल दूंगा ।"

वह वेड के करीब पचकर ठिठ्कता हुआ बोला ।

"मैंने भी हाथों में चुड्रियां नहो पहन रखी हैं मार्शल साब । अगर आने मुझ पर हाथ उठाया तो मैं भूल जाऊंगा कि आप मेरे चीफ हैं । बेहतर है कि आप यहाँ से चले जाइये ।"

मार्शल के चेहरे पर हैरत के भाव थिरके । कदाचित् उसे सोल्जर से ऐसे शब्दों की उम्मीद नहीं थी । सोल्जर तो मानो मुझे पाने के लिये मरा जा रहा था । रही सहीं कसर उस पाउडर ने कर दी थी । बह गया था कि इस समय सेना का सर्वोच्च कमाण्डर उसके खड़ा था ।

"ऐसा लगता है कि तेरा बुरा वक्त आ गया है, अगर अपनी जिन्दगी चाहता है तो फौरन यहां से भाग जा, वरना मैं मौत बनकर तुझ पर टूट पडूंगा ।"

" धमकी मत दो मार्शल । में तुम्हारी धमकी से डंरने वाला नहीं हू ।"

"तो तू यहां से नहीं जायेगा?"

"नहीं ।"

इस घडी दोनों एक-दूसरे के खून के प्यासे नजर आ रहे थे और इसका कारण मैं थी ।

तो जो मेरा जाखिरी हथियार है । मेरा रूप, योबन, जिस्म की हरारत । उसने मानो उन दोनों की बुद्धि को कुन्ठित करके रख दिया था । अपहरण कर लिया था उसका।

मैं खामोश बैठी सब सुन रही थी । अब मुझे मार्शल के अगले कदम का इन्तजार था ।

"मेरे रहमो-करम पर पलने वाले कुत्ते मुझे ही आंखें दिखा रहा है?" मार्शल फुफ़क्रारा-"मैँ ऐसी मौत मारूगां कि तेरी रूह तक कांप उठेगी ।"

"कोशिश करके देख तो मार्शलों शायद कामयाब हो जाओ ।"

मार्शल का गुस्सा आसमान छू गया । बह सोल्जर पर झपटा ।

सोल्जर भी मानो पागल हुआ जा रहा था । वह बला की फुर्ती से बेड से नीचे उत्तरा । साथ ही उसने अपने सिर की भयानक टक्कर मार्शल के चेहरे पर जड़ दी ।

मार्शल लड़खड़ाया ।

तभी सोल्जर ने उसकी कनपटी पर जबरदस्ती घूंसा जढ़ दिया । इससे पहले कि मार्शल सम्भल पाता, उसने पुनः घूंसा चला दिया ।

इस बार घूसां उसके जबड़े पर पड़ा । उसके होंठ फट गये । खून की पतली धार बह निकली ।

मैं दिलचस्प नजरों से सब देख रहीँ थी ।

"'मैँ तुझे छोडूंग़ा नहीं ।" मार्शल दहाड़ा-"तूने मेरे ऊपर हाथ उठाया ।" कहने के साथ ही उसने अपने सिर की भयानक टक्कर सोल्जर के सीने पर जड़ दी ।

सोल्जर लड़खड़ाकर दो कदम पीछे हट गया ।

मार्शल को मौका मिल गया । उसने स्प्रिंग लगे खिलौने की तंरह उछलकर सोल्जर के सीने पर फ्लाइंग किक जड़ दी । सोल्जर -पीछे वेड से टकराया।

वह उठा ।

तब तक हवा का झोंका बना मार्शल उसके सिर पर पहुचे चुका था । सोल्जर ने घूंसा चलाया । किन्तु मार्शल ने बीच में ही उसका -हाथ थामकर उसके पेट में मुक्क्रा जड़ दिया ।

सोल्जर कराहकर दुहरा होता चला गया ।

मार्शल का घुटना तीव्रता के साथ उसकी ठोड्री पर पड़ा । वह पीछे की तरफ उलट गया । हलक से मार्मतक चीख उबल पडी थी ।

मार्शल उस पर छलांग लगाने ही जा रहा था कि सोल्जर ने अपना पैर उठा दिया । पेर से टकराकर वह गिरा । फिर इससे पहले कि बह संभल पाता, सोल्जर ने उठकर उसकी पसलियों पर जबरदस्त ठोकर जड़ दी ।

पीड़ा से बिलबिला उठा मार्शल ।

निःसन्देह दोनों में से कोई कम नहीं था । साथ ही उनका ये मुकाबला पल-पल खूनी रूप अख्तियार करता जा रहा था ।

मार्शल उठकर खड़ा हो चुका था । उसने उछलकर उसके गुप्तांग पर ठोकर जड़ दी । वह पीड़ा से चीख उठा । उसके चेहरे पर पीडा की असंख्य रेखाएं खिंचती चली गई और वह दोनों हाथों से. .जांघों का जोड़ दबाकर झुकता चला गया ।

मगर ये जरुर कहना पड़ेगा कि दिलेर किस्म का इन्सान था सोल्जर । उसने इस हालत में भी अपने हौसले नहीं छोड़े थे । उसने मार्शल की एक टांग-पकड़कर जोरों का झटका दिया ।

मार्शल फिरकनी की तरह नाचकर फर्श पर गिरा ।

इधर सोल्जर उछलकर खडा हुजा और जैसे ही मारूशल ने उठने का प्रयास किया तो वह उस पर जम्प लगाकर उसे बाजुओं में समेटे दूर तक फिसलता चला गया, फिर उसने मार्शल को पैरों पर रखकर दूर उछाल दिया था ।

वह फर्श से टकराया ।

"मैं तुम्हें छोडूंगा नहीं मार्शल ।" सोल्जर कहता हुआ अपने कपडों की तरफ झपटा ।

उसका इरादा अपनी पैन्ट की जेब से रिवाल्वर निकालने का था, मगर रिवाल्वर तो मैंने पहले ही पार कर दिया था । मैं जानती थी कि ऐसी स्तिति आ सकती है ।

सोल्जर ने पैन्ट उठाकर अपनी जेब में हाथ डाला ।

धक्क से रह गया वह ।

जेब से रिवाल्वर गायब था । उसके चेहरे पर हैरानी के भाव उभरे । जाहिर है कि वह समझ नहीं पाया होगा कि रिवाल्वर कहां गायब हो गया था?

वह पैन्ट रखकर फुर्ती से फिरकनी की तरह मार्शल की तरफ़ घूमा ।

उधर मार्शल अपनी जेब से रिवाल्वर निकाल चुका था और सोल्जर पर तानता हुआ गुर्रा उठा-"रिवाल्वर निकाल रहा था हरामजादे! चल, निकाल रिवाल्वर ।"

सोल्जर बेबसी भरे अन्दाज में दांत पीसकर रह गया ।

"मरने के लिये तैयार हो जा ।" वह रिवाल्वर के ट्रेगर पर अपनी ऊंगली सख्त करता हुआ भयानक अन्दाज में गुर्राया-"ओर घबराना नहीं । मैं गोली ऐसी जगह मारूगाकि मरते वत्त तुझे जरा भी तकलीफ नहीं होगी । आखिर मेरा वफादार कुत्ता रहा है मगर क्या करूं? कुत्ता जब पागल हो तो उसे गोली मारनी ही पडती है ।"

साथ ही मार्शल ने ट्रेगर दबा दिया ।

धांय! !

हवा में सनसनाती गोली सोल्जर की खोपडी में धंसी । उसकी खोपडी से खून का फव्वारा फूट निकला ।

मार्शल ने पुन: ट्रेगर दबा दिया ।

इस बार गोली सोज्जर के माथे के ठीक बीचों-बीच धंसी । वह फिरकनी की तरह घूमकर कटे पेड़ की तरह धड़ाम् से फर्श पर गिरा । गिरते ही वह स्थिर हो गया । जाहिर था कि यह लाश में तब्दील हो चुका था ।

वही हुआ जो मैं चाहती थी'। . . . . मेरी स्कीम कामयाब हुई थी ।

मैंने अपने दिमाग के वल पर सोल्जर को मार्शल के हाथों ही अपने रास्ते-से हटा द्रिया था ।

मै चुप रही ।

"टामसन ।" मार्शल ने दरवाजे की तरफ मुँह करके आवाज लगाई ।

टामसन नाम का कमाण्डो भीतर दाखिल हुआ ।

"इस हरामजादे की लाश उठाकर गटर में फेंक दो ।" मार्शल ने हुक्म दनदनाया ।

टामसन ने आगे बढकर सोल्जर की लाश उठाकर रेत के बोरे की तरह कधे पर लादी ओर दरवाजे की तरफ बढता चला गया ।

उसके चेहरे पर किसी तरह का कोई भाव नहीं था ।

जब टामसन बाहर निकल गया तो मार्शल ने आगे बढकर दरवाजा बन्द किया और पलटकर बेड की तरफ बढता चला गया ।

मेरा कलेजा लरज उठा ।

अब मेरी शामत आने वाली थी । मैं उस शामत को सहने के लिये अपने आपको मानसिक रूप से तैयार करने लगी ।

इतना सब होने के बावजूद मार्शल मेरे साथ वेड का खेल खेलने के पूरे मूड में लग रहा था ।

======

======
 
Back
Top