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हिन्दी नॉवल-काली दुनिया का भगबान - complete

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दरवाजे पर दस्तक पडी । मेरी नींद में खलल पड़ गया था । मैंने फटाक से आखें खोलकर वॉल फ्लॉक में वक्त देखा ।

सुबह के आठ बज रहे थे ।

मै… झुझला उठी ।

मेरा झुंझला उठना स्वाभाविक भी था ।

मैं दस बजे से पहले उठने वाली कहां हू!

"कौन !" दरवाजे की तरफ मुंह करके हाक लगाई ।

"सारा ।"

"क्या बात है?"

"ब्रेकफास्ट लाई हूं ।"

मैंने उठकर दरबाज़ा खोला ।

सारा हाथों में ब्रेकफास्ट की ट्रे सम्भाले भीतर दाखिल हुई ।।
 
मैंने दरवाजा बन्द किया और अटैच्ड बाथरूम में घुस गई । दस मिनट बाद मैं फ्रेश होकर बाहर निकली, फिर बेड की तरफ बढ़ गई ।

सारा मेज पर ब्रेकफास्ट लगा चुकी थी ।

मैं टेबल के सामने कुर्सी पर बैठती हौई बोली----"बैठोसारा ।"

" म . .मेँ ऐसे ठीक हु मेडम ।"

" क्यों ?"

"आपने सोल्जर का व्यवहार तो देखा था । वह मुझसे कितनी बुरी तरह से पेश आया था ?" वह बोली--" वह इस तरफ आ धमका तो मुझे डॉट पिंलायेगा । बड़ा ही कमीना इन्सान है ।"

सारा की बात से साफ था कि कल रात इस कमरे में जो कुछ हुआ था, उसकी सारा को भनक तक नहीं थीं ।

"अब तुम्हें कोई कुछ नहीं कहेगा सारा । तुम बैठो तो सही ।" मैं टोस्ट उठाकर चबाती बोली ।

लह सिमटी-सी कुर्सी पर बैठ गई ।

"तुम्हें सोल्जर के बोरे कुछ मालूम नहीं है क्या?"

"नहीं तो ।" उसकी सवालिया निगाहें मेरे देने पर फिक्स होकर रह गईं-"बात क्या है?"

"इस इमारत में इतनी यही घटना घट गई और तुम्हें मालूम ही नहीं है?"

"मुझे कुछ मालूम नहीं ।" सारा के चेहरे पर उत्सुकता के भाव उभरे-"आखिर हुआ क्या ?"

"तुम्हारा एक दुश्मन खत्म हो गया है ।" मैंने जैसे धमाका किया-"सोज्जर को मार्शल ने गोली मार दी है ।"

सारा उछल पडी ।

यह आश्चर्य और अविश्वास भरी निगाहों से मेरा चेहरा देखती रह गई । उसे तो मानो मेरी बात पर विश्वास ही नहीं हुआ था ।

"य. . .ये आप क्या कह रही हैं?" एक पल बाद सारा किसी तरह से कहने में कामयाब हुई थी ।

"मैं सच कह रही हूँ सारा । कल रात दस बजे के आसपास मार्शले ने इसी कमरे में सोल्जर को गोली मारी थी, फिर उसकी लाश गटर में फिकवा दी गई थी ।" मैंने कॉफी का घूट भरने के बाद कहा ।

"ल. . . लेकिन सोल्जर तो मार्शल का दायां हाथ था । वह उस पर आँखे मूंदकर विश्वास करता था । आखिर उसे सोल्जर को गोली मारने की क्या जरूरत आ पडी थी?" चकराई-सी सारा ने पूछा ।

"मार्शल ने मेरी वजह से सोल्जर को गोली मारी है ।"

=========

"अ. ..आपकी वजह से?"

"मैं कुछ समझी नहीं । साफ-साफ बताइये ।" मैंने सारा क्रो पूरा किस्सा बता दिया । वो सब कुछ. जो मेरे कमरे में हुआ था और अन्त में बोली-"सोल्जर को अपनी गलती का खामियाजा भुगतना पड़ा था ।"

"अब समझी ।" . मैंने कॉफी का आखिरी घूंट भरकर खाली कप ट्रे में रखकर कहा-" अब तुम जल्दी ही इस कैद से आजाद-हो जाओगी सारा ।"

"जब तक वो दरिन्दा मार्शले जिन्दा है, तब तक मेरा इस कैद से आजाद होना असम्भव है ।"

"घबराओ मत । मार्शले के ऊपर पहुंचने का वक्त करीब आ चुका है ।"

"वो कैसे?" उसका चेहरा चमक उठा ।

"इस बारे में मैं खुद नहीं जानती ।" मैंने झूठ बोला ।

"आप मुझसे जरूर कुछ छिपा रहीँ हैं ।" इससे पहले कि मैं कुछ का पाती, मार्शल का टामसन नाम का कमाण्डो तीर की तरह भीतर दाखिल हुआ ।

मैंने होंठ भौंच लिये । सारा जल्दी-जल्दी मेज पर रखा सामान समेटने लगी ।

"मेरे साथ चलो मेडम ।" टामसन मेरे करीब पहुंचकर बोला ।

"कहा ?"

"मार्शलं साहब ने आपको फौन बुलाया है ।"

कुछ सोचकर मैंने कहा-"तुम चलो, मैं आती हूं।"

"मार्शल साहब ने कहा है कि मैं आपको अपने साथ लेकर ही जाऊं ।" वह बोला ।

"चलो ।" मैं एक झटके से कुर्सी छोड़ती हुई बोली ।

टामसन पलटकर दरवाजे की तरफ़ बढ गया । उसके पीछे वढ़ते हुए मैं समझ नहीं पा रही थी कि मार्शल को अचानक मेरी क्या जरुरत आ पडी थी?

====

====

कमाण्डो मुझे लेकर उसी हॉल में पहुचा जहाँ मार्शल से मेरी पहली मुलाकात हुई थी । मार्शल आबनूस की लम्बी मेज के पीछे कुर्सी पर मौजूद था । उसके चेहरे पर गम्भीरता कुण्डली मारे बैठी थी ।

वह किसी भारी उलझन में दिखाई दे रहा था । "यस मार्शल साहव ।" मैं मेज के करीब पहुंचकर बोली ।

"बैठो ।" मैंने उसके सामने कुर्सी सम्भाल ली । साथ ही मेरी सवालिया निगाहें मार्शल के चेहरे पर जा टिकी ! मार्शल खामोश रहा ।

जब उसकी खामोशी मुझे खलने लगी तो मैं बोल उठी-"आपने मुझे किसलिये बुलाया मार्शल साहब?"

"मैं एक भारी उलझन में र्फस गया हु रीमा ! इसलिये मैंने तुम्हें बुलवाया है ।"

"आप-ऐसी कौनन्सी उलझन में फंस गये हैं?"

"जिस जेल में क्लाइव को कैद करके रखा गया है । अब से कुछ देर पहले वहां से एक अधिकारी का मैसेज आया है कि क्लाइव बुरी तरह से टॉर्चर क्रिया गया है, लेकिन वो बराबर अपने मुंह पर ताला डाले हुए है, जबकि हमारे लिये उसका मुंह खुलबाना जरूरी है ।"

मेरा अनुमान ठीक निकला था ।

" आप इतनी छोटी-सी बात को लेकर परेशान हैं मिस्टर मार्शल "

"तुम इसे छोटी बात कह रही हो । ये मेरे लिये बहुत बडी परेशानी का सबब है, अगर क्लाइव ने अपना मुंह नहीं खोला तो` हमारे लिये बहुत बड़ी प्रॉब्लम खडी हो जायेगी । क्लाइव का मुंह खुलवाना जरूरी है, ताकि हमें सर एडलॉंफ का पता मालूम हो । जब तक वो हमारे कब्जे में नहीं आ जाता, तब तक हमारे सिर पर एक तलबार-सी लटकी रहेगी ।"

" हूं ।! "

" इतनी यातनाएं सहने के बाद तो बेजुबान पत्थर भी मुंह खोल देते हैं, मगर क्लाइव तो एक ही जवाब पर अड़ा हुआ है कि उसे सर एडलॉफ के बारे में कुछ मालूम नहीं है । मेरा दिल तो करता है कि हरामजादे का किस्सा ही खत्म कर दूं ।" वह अपनी हथेली पर मुक्का मारता हुआ बेबसी भरे अंदाज मे बोला-"मगर मैं वो भी नहीं कर सकता । क्योंकि उसे सर एडलॉफ के बारे में मालूम हैं !"

इस वत्त मेरे भीतर का जासूस सजग था ।

मेरा मस्तिष्क तेजी से काम कर रहा था ।

"जिस तरह से क्लाइव को यातनाएं दी गई हैं ।" वह बैचेनी से पहलू बदलता हुआ गम्भीर स्वर में बोला---और वह रटा रटाया एक ही राग अलापे जा रहा है । उससे तो यहीं लगता है कि क्लाइव मरता पर जायेगा, मगर अपने मुंह पर पडा ताला नहीं खोलेगा ।"

"मेरे लिये क्या आदेश हैं मार्शल साहब?"

"तुम आई०एस०सी० की नम्बर वन एजेन्ट रह चुकी हो रीमा । तुम्हारा दिमाग कम्प्यूटर से भी ज्यादा तेज चलता है । एक-से-एक खत्तरनाक मुजरिमो से तुम्हारा वास्ता पढ़ चुका है । अब तुम्ही क्लाइव का मुंह खुलवाने का कोई रास्ता सोचो ।"

मैं मन ही मन खुशी से उछल पडी ।

मेरे मस्तिष्क के सारे बल्ब एक साथ रोशन हो गये । मार्शल ने मेरी बहुत बडी प्रॉब्लम सॉल्व कर दी थी ।

मैंने अपने चेहरे पर किसी तरह का भाव नहीं उभरने दिया । मैं पहले से ज्यादा गम्भीर नजर आने लगी थी ।

"आप फिक्र न करें मार्शल साहब ! आप अपने दिमाग से सारी चिन्ता निकाल दीजिये ।" एक पल ठहरकर मैंने कहा-"आप मुझे क्लाइव के पास ले चलिये । उसका मुंह खुलवाने की जिम्मेदारी मेरी है । क्लाइव तो है क्या चीज ? उसके तो फरिश्ते भी मुंह खोलने पर मज़बूर हो जायेंगे ।"

'"त. . .तुम उसका मुह खुलवाने में कामयाब हो जाओगी ।"

"क्यों नहीं?" मैंने शांत स्वर में उत्तर दिया…"मिशंस के दोरान मेरा वास्ता बड़े-बड़े सूरमाओं से पड़ चुका है मार्शल साहब । जिनके बारे में कहा जाता था कि वे मरते-मर जायेंगे, लेकिन अपना मुंह नहीं खोलेंगे । वे मेरे सामने टेपरिकार्द्ध बनने पर मजबूर हो गये । आप मुझे एक मौका दीजिये है यकीन कीजिये, आपकी सारी समस्या का समाधान हो जायेगा ।"

"ठीक है रीमा ।" मार्शल ने काम' 'मैं तुम्हें मौका देता हूँ ।"

मेरी खुशी का तो ठिकाना ही नहीं था । मै तो ऐसे ही किसी मौके की तलाश में थी और वो मौका खुद मार्शल ने मुझे दे दिया था ।

"क्लाइव को किस जेल में रखा गया है !" हालांकि मुझे मालूम था । डगलस के बारे में मुझे बरनाड नाम का कमाण्डर बुटैल जेल की खासियत बता चुका था, फिर भी मैंने पूछ लिया था ।

"क्लाइब को कौंनन्सी जेल में रखा गया है?"

"उसे बुटैल जेल में रखा गया है ।"

"फिर देर किस बात की हे? मेरी रवानगी का बन्दोबस्त करवाइयेगा, क्योंकि ऐसे कामों में देर करना उचित नहीं होता है ।"

"वहां अकेली नहीं जाओगी रीमा । मैं तुम्हारे साथ चलूगा ।" मार्शल ने कहा-"मैं अपने कानों से क्लाइव के मुंह से सव कुछ सुनना चहाता हूं।"
 
"ये तो मेरे लिये खुशी की बात है कि आप मेरे साथ चलेंगे । आप चलने की तैयारी कीजिए ।"

"हमें बुटैल जेल पहुंचना है टामसन ।" मार्शल ने करीब खडे कमाण्डो को हिदायत्त दी-" चलने की तैयार करो ।"

" ओ०कै० !!" कहकर टामसन पलटा और लम्बे-लम्बे डग भरता हुआ दरवाजे की तरफ़ बढता चला गया ।

कुछ देर बाद मार्शल मुझे लेकर इमारत के कापाउण्ड मे पहुँचा । उसके कमाण्डो साथ थे ।

"जोंगें में बैठो रीमा ।" मार्शल बोला । मैं जोंगे में सवार हो गई । मेरे पीछे-पीछे मार्शल और उसके कमाण्डो भी जोंगे में आ समाये । ड्राइविंग सीट पर पहले से ही एक सैनिक मौजूद था । जोंगा चल पड़ा ।

जोंगा किले के कम्पाउण्ड से बाहर निकला और शहर से बाहर जाने वालीं सड़क पर दौड़ पड़ा । मैं सीट से पीठ टिकाकर अपने अगले कदम के बारे में सोचने लगी ।

=====

=====

मेरी निगाहें बिन्दु स्कीन के उस पार उठ गई । सामने जेल का विशाल फाटक नजर आ रहा था । फाटक के बाहर दो सशस्त्र सेनिक सतर्कता की मूर्ति बने खड़े थे । फाटक के शीर्ष पर सेन्द्रल जेल बुटैल अंकित था ।

ऐसा लगता था मार्शल के यहाँ आने की खबर पहले ही पहुचे चुकी थी, क्योंकि जेल का फाटक भाड़-का मुंह फाड़े हमारे स्वागत के लिये तैयार था । अत: जोंगा निर्विघ्न आगे बढता चला गया ।

आने बाले क्षण मेरे लिये बड़े ही खतरनाक थे ।

एक जगह पहुंचकर जोंगा रूक गया ।

पहले तीनों कमाण्डो जोगे से नीचे उतरे । फिर मैं और मार्शल भी नीचे उतर गये ।

वो एक खुला मैदान था । जिसके दोनों तरफ कैदियों की वैरक्स बनी हुई थीं । मैदान में कई सेनिक मुस्तेदी से पहरा देते नजर आ रहे थे।

मार्शल को देखकर जेल में हड़कम्प-सा मच गया था । वहां का प्रत्येक कर्मचारी सावधान हो गया था । जेल के कई अधिकारी दौड़ते हुए बहा आ पहुँचे थे ।

इस वक्त मेरे पास शानदार मौका था । मैं क्लाइव के साथ-साथ डगलस को भी जेल से सुरक्षित निकाल सकती थी । बहरहाल, मैं एक खतरनाक रिस्क लेने जा रही थी, मगर रिस्क लेने के अलावा मेरे सामने अन्य कोई रास्ता भी तो नहीं था ।

कुछ देर बाद हम एक बैरक के सामने पहुंचकर ठिठके ।

बैरक का सलाखों वाला दरवाजा बन्द था । उसके मुंह पर लोहे का मजबूत ताला लटका हुआ था ।

बाहर एक गार्ड कंधे पर गन लटकाये चौकन्ना खडा था ।

बैरक के भीतर उजाला था ।

भीतर सीमेन्ट के एक चबूतरे पर मुझे क्लाइव बैठा नजर आया । उसके कपड़े जगह-जगह से फ़टे हुए थे । फटे कपडों के बीच से झांकते जिस्म पर टॉर्चर करने के निशान साफ नजर आ रहे थे ।

चेहरा खून से रंगा हुआ था । आंखों के नीचे नीले निशान दिखाई दे रहे थे । माथे पर जख्म के कई निशान थे ।

क्लाइव की निगाहें मेरे ऊपर पड़ी तो उसका चेहरा पत्थर की मानिन्द कठोर पड़ता चला गया । जबड़े कस गये और आँखों से नफरत की चिंगारियां फूट निकली ।

"दरवाजा खोलो ।" मार्शल गार्ड से मुखातिब हुआ ।

गार्ड ने जेब से चाबियों का गुच्छा निकाला, फिर ताला खोलकर दरवाजे को भीतर की तरफ धकेल दिया ।

मार्शल भीतर प्रवेश कर गया ।

कमाण्डो साये की तरह उसके साथ लगे हुए थे ।

मार्शल के भीतर प्रवेश करते ही मैं भीतर दाखिल हो गई ।

"कैसे हो क्लाइव ?" मैं चबूतरे के करीब पहुंच-बोली ।

"मैं जैसा भी हु, तुम्हारे सामने हूं । तुमने तो मुझे मरवाने में कोई कसर नहीं छोडी है । अब तुम यहां किसलिये आई हो?" वह चबूतरे से नीचे उतरता हुआ बोला ।

इससे पहले, कि मैं कुछ कह पाती, मार्शल भेड्रिये जैसे स्वर में गुर्रा उठा-'"सर एडलॉफ कहां हैं?"

"तो तुम लोग सर एडलॉफ का पता-टिकाना जानने के लिये मेरे पास दौड़े आये हो, लेकिन तुम लोगों का यहां आना बेकार साबित होगा, क्योंकि मुझे सर एडलॉफ के बारे में कुछ मालूम नहीं है ।"

"बक्रो मत ।" मार्शल भयानक स्वर में दहाड़ा-"अगर तुम अपनी जिन्दगी चाहते हो तो चुपचाप बता दो, वरना मैं तुम्हारी खाल खींचकर भुस भरवा दूंगा ।"

क्लाइव खामोश रहा ।

मैं अच्छी तरह जानती थी, वह सर एडलॉफ के बारे में तो तब बतायेगा, जब उसे खुद मालूम होगा । वो तो खुद एडलॉफ को तलाश कर रहा था, मगर बात जानते हुए भी मैँ खामोश रही । क्योंकि यही तो मेरी स्कीम का एक अहम् हिस्सा था ।

"जवाब दो ।" मार्शल फूंफकारा ।

"जवाब तो मैं तब दूं जब मुझे कुछ मालूम हो । तुम लोग बेवजह मेरे पीछे हाथ धोकर पड़े हुए हो । तुम लोग मेरी बात पर विश्वास क्यों नहीं करते ?"

क्लाइव एक-एक शब्द पर जोर देता हुआ बोला ।

पलक झपकते ही मार्शले का चेहरा पत्थर की तरह सख्त एवं खुरदरा पड़ता चला गया ।

आँखों में कहर नाच उठा ।

साथ ही उसका हाथ घूम गया ।

'तडाक् . .!'

मार्शल की चौडी हथेली क्लाइव के गाल से टकराईं । थप्पड़ की आबाज फायर की तरह गूंजी थी । पांचों उंगलियां उसके गाल पर छप गई थीं । अगर उसका बश चलता तो वह मार्शल को . चीर-फाड़कर रख देता, लेकिन इस वक्त बह मजबूर था और कुछ भी कर पाने की स्थिति में नहीं था ।

"अभी भी वक्त है क्लाइव ।" तभी मैं बोल उठी-"एडलाॅफ का पता बता दो । क्यों बेवजह मरना चाहते हो? जिन्दगी बहुत कीमती होती है, अगर एक बार चली जाये तो दोबारा नहीं मिलती ।"

क्लाइव ने रटा-रटाया राग अलापा।

"तुम क्या समझते हो कि मैं इतनी आसानी से तुम्हारी बात पर विश्वास कर लूंगी । तुम झूठ बोलकर मुझे बहका नहीं सकते क्लाइव । मेरा नाम रीमा भारती है । मैं टॉर्चर करने के ऐसे-ऐसे तरीके जानती हुं किं इन्सान तो क्या बेजुबान जानवर भी बोलने पर मजबूर हो जाते ।तुम्हारी तो औकात क्या है?"

"मैं टार्चर तो क्या मौत से भी नहीं डरता रीमा. . . और बेहतर ही होगा कि तुम मुझे मार डालो । बस मेरे सीने में एक गोली उतारने की जरूरत है । में समझूगां कि तुमने मेरे ऊपर एक अहसान कर दिया है !"

"वो मौत तो तुम्हारे लिये आसान मौत होगी । क्लाइव, मैं ऐसीं मौत दूंगी आज तक किसी ने किसी को नहीं दीं । अगर तुम मेरे सवाल का जवाब दे दो तो मैं मार्शल साहब से रिक्वेस्ट करूंगी कि ये तुम्हारी जिन्दगी वख्श दे और हो सकता है कि मार्शल साहब कौं तुम्हारे ऊपर दया जा जाये ।"

"मुझे किसी की दया ही जरुरत नहीं है रीमा । मैं इतना कायर नहीं हूँ मौत से डर जाऊ । मैं तो खुद चाहता हू कि तुम लोग के मुझे मार डालो ।"

मैंने उसकी कनपटी पर जबरदस्त घूसा जड़ दिया । वह होठों से चीख उगलता हुआ पीछे चबूतरे से टकराया, फिर नीचे फर्श पर फैल गया ।

"उठ हरामजादे।" मैं उसकी पसलियों पर बूट की ठोकर जड़ती हुई गुर्रा उठी ।

किन्तु वह नहीं उठा । …

मैं झुकी और उसका गिरेहबान थामकर उसे एक झटके से उसके पैरों पर खडा कर दिया, फिर उसकी आँखों में आँखे डालकर हिसक स्वर में बोली----" मैं तुम्हें एक मिनट देती हू.. . सिर्फ एक मिनट ! या तो तुम सब कुछ बकोगे, या फिर मैँ तुम्हारे जिस्म में इतना बारूद भर दूंगी कि तुम कभी बोलने के काबिल नहीं रहोगे। सर एडलाॅफ को तो हम और किसी ढंग से भी ढूढ़ लेंगे !"

कहने के साथ ही मैंने एक झटके से उसका गिरेहबान छोड़ दिया ।

वह लढ़खड़ाकर गिरते-गिरते बचा था ।

====

====

"मुझे गन दो ।" मैंने एक कमाण्डो की तरफ हाथ बढाकर कहा ।

उस कमाण्डो ने हडबड़ाकर प्रश्नभरी निगाहों से मार्शल की तरफ देखा । मैं जानती थी कि मार्शल के इंकार करने का सवाल ही नहीं था । मैं उस पर अपना पूस विश्वास जमा चुकी थी ।

उधर मार्शल तो सपने में भी नहीं सोच सकता था कि मैं गन क्यों मांग रही थी? उसकी नजरों में तो मैं क्लाइव को धमकाने जा रहीं थी ।

"मेरी तरफ क्या देखरहे हो ? " मार्शल ने हुक्म दनदनाया--"रीमा भारती को गन दो ।"

कमाण्डो ने तुरन्त गन मेरी तरफ बढा दी ।

मैंने गन थाम ली ।
 
फिर मैंने गन क्लाइव पर तान दी । क्लाइव ने एक गहरी सांस लेकर आंखें बन्द कर लीं और शरीर ढीला छोड़ दिया । मानो उसे यकीन हो गया था कि मैं उसे वाकई गोली मारने जा रहीँ थी ।

परन्तु तभी, मैंने पासा पलंट दिया ।

एकाएक मैं एडियों पर घूमी ।

और.......

पलक झपकते ही मैंने गन की नाल मार्शल के सीने से सटा दी ।

मार्शल बुरी तरह से उछल पड़ा-"य. . .ये क्या हरकत है रीमा?"

"इसे हरकत नहीं, गन कहते हैं मार्शल !" मैंने बर्फ की मानिन्द सर्द स्वर में कहा-"और जब ये चलती है तो इसकी गोली ये नहीं देखती कि तो क्लाइव जैसे क्रान्तिकारी के सीने में उतर रही है या तुम्हारे जैसे किसी फौजी कुत्ते के सीने में । इसलिये कोई गलत हरकत मत करना ।"

मार्शल का चेहरा पीला पड़ता चला गया ।

उसके साथ आये कमाण्डो और जेल अधिकारों बुरी तरह बौखलाये नजर आ रहे थे ।

उधर क्लाइव ने भी फटाक से आँखे खोल दी थीं और वह हैरत से मुंह बाये इस बदले दृश्य को देख रहा था ।

"माफ़ करना क्लाइव दोस्त ।" मैंने कहा-"तुम्हारी जो हालत हुई है, उसके लिये मैँ जिम्मेदार हूँ लेकिन मैं करती भी क्या? मुझे मज़बूरी में तुम्हारे साथ ऐसा करना पडा था । मेरा मकसद डगलस तक पहुंचना था और बरनाड नाम के कमाण्डर से मुझे जेल की सुरक्षा व्यवस्या के बारे में जो जानकारी मिली थी, उसे भेदने का मेरे पास सिर्फ यही एक रास्ता था । मैंने तुम्हें कुर्बानी का बकरा बना दिया ।"

क्लाइव अजीब निगाहों से मेरी तरफ देखता रह गया था । किन्तु उसकी आँखों में मेरे प्रति उत्पन्न नफरत के भाव गायब होते चले गये थे, और उनकी जगह उसके चेहरे पर उभर आये भाव इस बात की चुगली कर रहे थे कि अब उसे मुझसे कोई शिकायत नहीं रह गई ।

"और तुम ये भी समझ चुके होगे क्लाइव कि मेरा जेल में जाने का क्या मसकद है?" मैं पुन: बोली ।

जवाब में क्लाइव, धीरे से हां में गर्दन हिलाकर रह वया ।

अब सब कुछ क्लाइव के सामने खुली किताब की तरह था ।

इधर मार्शल अभी भी नहीं समझ पाया होगा कि मेरा जेल में पहुचने का मकसद क्या है? मैंने उसके साथ जो हरकत की थी और जो कुछ क्लाइव से कहा ।

उसे सुनने के बाद उसकी खोपडी अवश्य अंतरिक्ष में उड़ने लगी-होगी ।।

उधर कमाण्डोज़ के हाथ गनों पर कसे हुए थे और उनके चेहरे के भाव बता रहे थे कि उन्हें सिर्फ एक मौके की तलाश थी ।

"खबरदारा" मैं जहरीली नागिन की तरह फुफकार उठी---" गलत हरकत मत करना, वरना तुम्हारे जिस्म में सुराखन्हीं-सुराख नजर आयेंगे और तुम लोगों की आत्मा ये सोचने पर मजबूर हो जायेगी कि वह किस सुराख से बाहर निकले । इसे मेरी धमकी मत समझना । मेरा नाम रीमा मारती है । मैं जो कहती हूं। वह करके दिखाती हूं ।"

कमाण्डोज के के रंग उड गये ।

"अपने कमाण्डोज़ से कहो मार्शल कि गनें फेक दें ।" मैंने कहा ।

'मार्शल मजबूर था।

"गने फेंक दो ।" उसके होठों से आदेश भरा स्वर निकला ।

दोनों कमाण्डो ने अपने हाथों से गनें फिसल जाने दीं ।

"गर्ने उठा तो क्लाइव ।" मैंने कहा ।

क्लाइव ने दोनों गने उठा लीं ।

वातावरण में पुन: मेरा चेतावनी भरा स्वर गूंजा-"अगर तुम लोगों में से किसी ने भी गलत हरकत करने की कोशिश की अथवा चालाकी दिखाई तो मैं मार्शल को गोलियों से छलनी कर दूंगी और इसकी मौत के जिम्मेदार तुम लोग होगे ।" `

किसी के होठों से बोल नहीं फूटा ।

इसबीच मार्शल संभल चुका था । वह मुझे घूरता हुआ बोला-"तुम्हारी इस हरकत का मतलब… क्या है?"

"मतलब मैं बाद में समझाऊंगी मार्शल ।" ' मैंने उत्तर दिया-"पहले डगलस को यहाँ बुलवाओ ।"

मार्शल मानो आसमान से गिरा ।

उसके चेहरे पर समूचे संसार के आश्चर्य ने एक साथ हमला-सा कर दिया था । मार्शल तो सपने में भी गुमान नहीं होगा कि मैं डगलस को भी जानती हो सकती हू।

"अब ये मत कह देना कि डगलस इस जेल में नहीं है ।" मैं बोली--" मैं जानती हूं कि उसे इसी जेल में रखा गया है । तुम्हीं ने सोल्जर से कहा था क्लाइव को उसी जेल में भेज दो! जिसमें डगलस को रखा गया है ।"

मार्शल के झूठ बोलने का सवाल ही नहीं बचा था ।

"मैं ये नहीं कहूंगा कि डगलस इस जेल में नहीं है । वो इसी जेल में बन्द है, लेकिन तुम डगलस को कैसे जानती हो और ,उससे 'तुम्हारा क्या सम्बन्ध हैं?" मार्शल ने सबाल किया ।

मै तुमहारे हर सवाल का जबाब दूंगी ।

पहले अपने कामाण्डो को आदेश दो कि वो डगलस को यहां: लेकर आए !"

"लेकिन क्यों ?" मार्शल ने गुस्से से दांत पीसे ।

"सवाल मत करो । इस वक्त तुम सवाल करने की स्थिति में नहीं हो और तुम्हारी खैरियत इसी मेँ है कि मैं जैसा कह रही हूँ वैसा करते जाओ ।"

“अगर मैं डगलस को यहां न बुलवाऊं तो?" वह दिलेरी का परिचय देता हुआ बोला ।

"तो मैं तुम्हें गोली मार दूंगी ।"

"मुझे गोली मारने का अंजाम जानती हो?"

" अंजाम की परवाह होती तो मैं इस देश में कदम ही क्यों रखती मार्शल? फिलहाल तो तुम अपने अंजाम के बारे में सोचो । मेरे इशारे करने भर की देर है । क्लाइव तुम्हें गोलियों से भून डालेगा । ये तो पहले ही तुम लोगों से खार खाए बैठा है । ये जानता है कि तुम मिलेट्री के चीफ हो, अगर तुम मर गये तो सेना के हौंसले पस्त हो जायेंगे और बाजी सर एडलॉंफ़ के समर्थकों के हाथों में होगी ।"

मार्शल खामोश रहा ।

"जल्दी डगलस को वुलवाओ, वरना मेरे सब्र का प्याला छलक जायेगा और वो स्थिति तुम्हारे लिये खतरनाक होगी मार्शल । मेरे बारे में सब कुछ जानते हो । मेरी बात न मानने का मतलब मौत होता है ।"

मैं गन की नाल -उसके माथे से सटाती हुई सर्द स्वर में कह उठी ।

क्या मजाल कि मार्शल के चेहरे पर खौफ का एक भी भाव उमरा हो । वह बडी दिलेरी-के साथ बोला-"मुझे धमकाने की कोशिश मत करो रीमा । मैं तुम्हारी गीदड़ भभकियों से डरने वाला नही हूं !"

" डरोगे तो उस वक्त जब रीमा भारती तुम पर कहर बनकर । तुम क्या समझते हो मैं डगलस तक नहीं पहुच पाऊँगी । वो इसी जेल में है । उसे तो मैं देर-सबेर तलाश कर ही लूंगी, लेकिन तुम बेमौत मोरे जाओगे मार्शल ।"

"तो फिर कर तो न तलाश । मुझें बार-बार धमकाने की कोशिश क्यों कर रही हो?"

मैं पहले ही जानती थी कि मार्शल इतनी आसानी से डगलस को वहां बुलाने वाला नहीं है । आखिर वो भी एक जीवट बाला इंसान था । लेक्रिन मैं क्या कम हू? मेरे हाथ' में सुनहरी मौका था । मैं उस मोके को भला कैसे केश न करती? …

बैसे इस वक्त मार्शल उस पल को अवश्य कोस रहा होगा । जब यह मेरे जाल में फंस कर मुझे क्लाइव का मुंह खुलवाने के लिये इस सबसे सुरक्षित जेल में ले आया था । लेकिन अब उसके पछताने से कुछ होने वाला नहीं था । तीर तो कमान से निकल चुका था । फिलहाल बाजी मेरे हाथ में थी ।

"तुम इस वक्त एक तरह से शेर की मांद में खडी हो लड़की ।" पहली बार वहां मौजूद एक जेल अधिकारी ने अपना मुंह खोला-"मार्शल साहब को छोड़ दो, वरना अंजाम बहुत बुरा होगा ।"

"पैं मार्शल को किस खुशी में छोड़ दूं?" "मैंने मजे लेने वाले अंदाज में पूछा ।

"अगर तुम ये समझ रहीं हो कि तुम मार्शल साहब का कुछ बिगाड़ पाओगी तो ये तुम्हारी वहुत बडी गलतफहमी है ।" इस बार दूसरा गुर्राया---" तुम यहां से जिंदा बचकर नहीं निकल सकती ।"

"तुम भी मेरी एक बात कान खोलकर सुन लो मिस्टर ।" मैंने जवाब 'दिया-"मेरा नाम रीमा भारती है । भारत की सबसे महत्वपूर्ण जासूसी संस्था की नम्बर वन ऐंजट । आज तक जिस किसी ने भी मेरे काम में टांग र्फसाई है । मैंने जिंदा नहीं छोड़ा है , तुम किस खेत की मूली हो, अगर तुम लोग बेमौत मरना नहीं

चाहते हो तो चुपचाप तमाशा देखते रहो ।"

उसने तुरंत अपने होठ भीच लिये । कदाचित मेरा परिचय सुनकर उसके देवता कूच कर गये थे ।

"'त...तो तुम एजेन्ट रीमा भारती हो ।" पहले वाले के होठों से हैरत भरा स्वर निकला ।

" हां, मैं वही रीमा भारती हूं अगर तुम्हें विश्वास नहीं हो रहा है तो मैं तुम्हें लिखकर दूं?"

उस पट्टे के होठों पर भी मानो ताला पड़ गया ।

"अभी तक तुमने अपने कमाण्डोज को डगलस को लाने का आदेश नहीं दिया मार्शल । लगता है कि तुम जिन्दा रहने के मूड में नहीं हो ।”

"मेरी बात तो सुनो... ।"

"में कुछ सुनना नहीं चाहती ।" मैं उसका वाक्य बीच में ही काटती हुई फूंफकारी-"इंकार का मतलब है तुम्हारी मौत ।"

उसकी आँखों में साक्षात् मौत नृत्य करने लगी ।

" मैं ट्रेगर दबाऊं या डगलस को बुलवात्ते हो।" मैंने पूछा । मांर्शलं की सारी दिलेरी धरी की धरी रह गई ।

" ट्रेगर मत दबाना ।" उसके होठों से अजीब-सा फंसा फंसा स्वर निकला-----" मै डगलस को बुलबाता हू !"

मेरा चेहरा सफलता से चमक उठा-" तो देख क्या रहे हो? बुलबाओ ।' "

" 'प. . . पहले गन की नाल मेरे मुंह से बाहर निकालो ।"

मैंने गन वापस खींच ली ।

"डगलस को लेकर आओ ।" मार्शल जेल अधिकारियों से आदेश भरे स्वर में बोला ।

जेल अधिकारी पलटकर भागे ।

इस बीच मैं एक क्षण के लिये भी असावधान नहीं हुई थी । मेरी निगाहें बराबर मार्शल और उसके कमाण्डो पर जमी हुई थीं ।

"मेरी एक बात सुनो ।" मार्शल बोला ।

"अब तुम अपनी हर बात सुना सकते हो । मैं तुम्हारी सारी बकवास सुनने के लिये तैयार हूं!"

"तुम जो कर रही हो अच्छा नहीं कर रही हो रीमा । अब तुम्हारी जिन्दगी की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है , ये मत भूलो कि इस वक्त भी तुम्हारी जिन्दगी मेरी मुट्ठी में है । मेरे रहमो-करम पर जिंदा हो । अगर मैं तुम्हारी जिदगी की गांरटो ले सकता हुं तो तुम्हें-मौत के, मुंह में भी पहुंच' सकता हूँ । तुम्हारी अपनी ही जासूसी संस्थान आई०एस०सी० तुम्हारी दुश्मन वन चुकी है । उसे बड्री शिद्दत से तुम्हारी तलाश है । अगर मैं उन्हें खबर कर दूं कि तुम मडलैण्ड में हो तो जानती हो क्या होगा?"

"क्या होगा?" मैंने मुस्कराते हुए पूछा।

" वे लोग तुम्हें हांसिल हासिल के ऐडी चोटी का जोर लगा देंगे, और जैसे तुम उनके हाथ आई तुम्हें जिन्दगी भर एडिया रगड़ने के लिये किसी अज्ञात जेल में डाल दिया जायेगा या फिर हो सकता है कि तुम्हें बडी खामोशी से मार डाला जाये । अभी भी वक्त है अगर तुम जिंदा रहना चाहती हो तो अपने खतरनाक इरादों से बाज आ जाओ ।"

मै दिल खोलकर हंसी ।

बह अजीब निगाहों से मेरी तरफ़ देखता हुआ होता---".,हंस रही हो ।' मैंने गलत नहीं कहा है । अगर तुम्हें अई एस सी को सोंप दिया गया तो तुम इतिहास की चीज बन जाओगी । लोग जान भी नहीं पयेयेंगे कि कभी आ०एस०सी० में रह चुकी नम्बर बन एईजेन्ट रीमा भारती अचानक दुनिया के तख्ते से कहां गायब होगई ?"

" तो मुझे आई०एसं०सी को सौपने का इरादा रखते हो मार्शल ?" मैंने पूछा ।

"अगर तुम अपने इरादों से बाज नहीं आई तो मुझे ऐसा ही करना पडेगा ।"

"तुम कह चुके मार्शल ।"

"हां ।"

"अब तुम मेरी बात सुन लो ।"

" सुनाओ ।"

"मैंने सोल्जर को अपने बारे में जो कुछ बताया था, वो सब झूठ था । न तो मैंने आई०एस०सी० छोडी और न ही मैंने कोई जुर्म किया है । वास्तव में मैंने तुक तक पहुंचने के लिए एक झूठी कहानी गढकर सोल्जर को सुनार थी ।"

"तुम सरासर बकवास कर रही हो । अपनी मौत के डर से झूठ बोल रही हो तुम ।" उसने कहा… " 'उस वत्त मुझे तुम्हारी कहानी पर विश्वास नहीं हुआ था । मैंने सोल्जर से हिन्दुस्तान में अपने एक पहुंच वाले सोर्संजे से तुम्हारी कहानी के बारे तस्दीक करने के लिये कहा था और फिर तल्दीक होने के बाद ही मैंने तुम्हें अपने करीब फटकने दिया था ।"

"तुम्हारे सोर्स ने तुम्हें गलत रिपोर्ट नहीं दी थी मार्शला दरअसल उस बेचारे को भी आई०एस०सी० से यही मालूमात हासिल हुई होगी । क्योंकि अपनी योजना पर अमल शुरु करने से पहले ही ट्रांसमीटर पर अपने चीफ से सम्पर्क करके उसे सब कुछ समझा दिया था । मैं जानती थी कि तुम तस्दीक किये बगैर मानने वाले … नहीं हो, इसलिए मैंने पहले ही पुख्ता इंतजाम कर दिया था । फिर तुम्हें 'वहीँ' सुनने को मिला, जो मै तुम्हें सुनाना चाहती थी और तुम जाल में फंस गये मार्शल !"

मेरी बात सुनकर नि:संदेह मार्शल की खोपडी फिरकनी की तरह नाचकर रह गई होगी ।

"म. . .मगर तुम्हें ये सब करने की क्या ज़रूरत आ पडी थी ?" मार्शल के होठों से वहीं कठिनाई से निकला !

उसी क्षण । जेल अधिकारियों से घिरे डगलस ने भीतर कदम रखा । वार्तालाप बीच मे ही रूपक गया ।

डगलस की निगाहें हम लोगों के ऊपर चकराती चली गई । उसके चेहरे परे उलझन के भाव थे ।

कदाचित वह समझ नहीं पा रहा था कि माजरा क्या है और उसे यहाँ क्यों लाया गया ।।

उसकी हालत देखकर लग रहा था कि उसे भी भयानक यातनाओं के दौर से गुजरना पंढ़ रहा था ।

कुछ पल के लिये ,वहां खामोशी ने अपने पांव पसार दिये थे ।

डगलस की घूमती निगाहे मेरे चेहरे पर स्थिर होकर रह गई । चेहरे पर सोच के भाव उभर आये थे । जाहिर था उसकी सोचों का केन्द्र मैं ही थी ।
 
उधर मार्शल खूनी निगाहों से मुझे घूर रहा था । उसके घूरने का अंदाज बता रहा था, अगर उसक बश चलता तो चीर फाड़ कर सुखा देता । किन्तु इस वक्त वह कुछ भी करने की स्थिति में न था ।

वैसे इसमें रत्ती भर भी संदेह नहीं था कि एक लंबे अरसे बाद एक दिलचस्प मिशन मेरे हाथ लगा था । . .

"तुमने मुझसे पूछा था मार्शल कि मेरा डगलस से क्या सम्बंध, है? मैंने तुम्हें कहा था कि जब डगलस मेरे सामने आ जायेगा तो मैं तुम्हें भी जरूर बताऊंगी ।" मैंने खामोशी को शहीद किया----" मैं तुम्हें बताती हूं कि डगलस मेरा हमपेशा है और विंगस्टनं में आई आस सी का स्थानीय एजेन्ट है ।"

मार्शंल यूं उछल पडा मानो मैंने उसके सिर पर कोई शक्तिशाली बम फोड़ दिया हो ।

उसकी आंखें आश्चर्य की अधिकता से फटती चली गई । वह हेरतभरे अंदाज में मुझे देखता रह गया ।

उधर डगलस भी उछल पड़ने पर मज़बूर हो गया था । आज तक उसने मुझे देखा नहीं था । मेरा नाम ही सुना था । यह मुझे हैरत भरी निगाहों से देख रहा था ।

"क्या बकती हो तुम?" मार्शल ने अपना मुंह खोला ह

‘ "में बक नहीं रही, हकीकत बयान कर रही हूं मार्शंल । मैं पागल , नहीं हूं और न ही मेरे दिमाग में फोडा निकला हुआ है, जो इतना रिस्क लेकर यहां तक पहुंचती । आखिर अई एस सी के एक एजेंट की जिंदगी का सवाल है? तुम लोगों ने डगलस को बहुत यातनाएं दी हैं और रीमा भारती उन यातनाओं का पूरा हिसाब लेगी ।"

डगलस को मानो जोरों का झटका लगा ।

मार्शल के कुछ कहने से पहले उसके होठों से आश्चर्य भरा स्वर निकला-" मैडम आप ?"

"इसका-मतलब है कि तुम मुझे जानते हो डगलस !"

"क्यों नहीं जानता ।" बह तपाक से बोला---" ये बात अलग है कि आज मैं पहली बार आपकी देख रहा हूं।"

"मुझे यहाँ देखकर हैरानी हो रही होगी?"

"मुझे बिल्कुल भी हैरानी नहीं हुई मेडम ।" उसने जवाब दिया ----"मैंने खुराना साहब को फैक्स भिजवा दिया था । मैं जानता था कि मेरा मैसेज मिलते ही वे आप ही को मुझे जेल से निकलवाने के लिये भेजेंगे । हां, मैं इस बात को लेकर हैरान अवश्य हूँ कि जेल के इतने कड़े सुरक्षा-प्रबंधों. के बावजूद आप इतनी जल्दी यहां कैसे पहूंच गई?"

"जेल में पहुंचने के लिये तो मुझे कोई खास मेहनत नहीं करनी पडी। बस थोडा-सा दिमाग लगाया और परिणामस्वरुप सहीँ-सलामत तुम्हारे सामने खडी हू।" '

डगलस का चेहरा चमक उठा ।

"अब तुम्हें घबराने की जरूरत नहीं है डगलस । अपने आपको आजाद समझो । अब तुम्हे जेल की दीवारें नहीं रोक सकेंगी । तुम्हें जितनी यातनाएं दी जानी थी, दी जा चुकी । अब कोई टेढ़ी आख नहीं देख सकता । अब तुम्हारी सुरक्षा की जिम्मेदारी मेरी है !"

उसके चेहरे की चमक दोगुनी हो उठी ।

"तुमने मुझसे सवाल क्रिया था मार्शल कि मुझे ये सब करने की क्या जरूरत आ पडी थी?"

"किया था ।"

"अब मैं तुम्हें बताती हूँ । मैं एक मिशन के तहत मडलैण्ड पहुंचीं हू। मुझे न सिर्फ डगलस को सही-सलामत जेल से बाहर निकालना हे, बल्कि सर एडलॉफ की सुरक्षा भी करनी है ताकि तुम लोग उन्हें गिरफ्तार करके उनका बाल भी बांका करने की न सोच सको ।"

"त; . .तो तुम इस मिशन के तहत यहां आई हो?"

"हां ।"

"अगर तुम समझ रही हो कि तुम डगलस और क्लाइव को यहां से सहीँ सलामत निकाल ले जाने में सफल हो जाओगी तो ये तुम्हारी भूल है रीमा ।"

" कौन रोकेगा मुझे?"

"मैं तुम्हें रोकूगा ।"

" वो, जो खुद मौत के सामने खड़ा है?" मैंने कहा-"मेरी एक बात अच्छी तरह से अपने भेजे में बिठा लो कि आज तक मैंने जितने अत्याचारियों, दरिब्दों, माफिया किंग और अपने दुश्मनों को उनके घर में घुसकर मारा है और वो मेरा बाल तक बांका नहीं कर सके । उन्होंने तुम्हारे जैसे ही डायलॉग बोले थे । मगर मैं आज भी सही-सलामत मौत बनी तुम्हारे सामने खडी हूँ और उन लोगों का नामो-निशान तक मिट चुका है । तुम्हारे पापों का घड़ा भर चुका है मार्शल । अब और तुम्हारी सेना इस देश की जनता पर और जुल्म नहीं ढा सकेगी ।"

"इंसान अपने ओवर कांफीडेंस में कभी-कभी कुत्ते की मौत भी मारा जाता है ओर तुम भी मारी जाओगी डॉटर आँफ बिच तुमने मार्शल से पंगा लिया है ।" बह गुर्राया ।

चटाक् !

मेरा हाथ घूमा और एक झन्नाटेदार थप्पड़ उसके चेहरे पर पड़ा ।

थप्पड इतना ताकतवर था कि शर्तिया उसकी खोपडी झनझनाकर रह गई होगी ।

कमाण्डोज ने मेरे उपर झपटना चाहा ।

तभी ।

क्लाइव के होठों से गुर्राहट निकली…"खबरदारा अगर कोई, अपनी जगह से हिला तो उसे गोलियों से भून का रख दूंगा ।

वे फ्रिज होकर रह गये ।

दूसरी तरफ, मेरा ध्यान तनिक बंटा हुआ पाकर मार्शंल हरकत कर गया था । उसका इरादा मेरी गन छीनने का था ।

परन्तु उसकी किसी भी हरकत की तरफ से पूरी तरह सतर्क थी । अत: मैंने उससे कहीं ज्यादा फुर्ती से अपनी खडी हथेली का वार उसके अपनी तरफ झपटते हाथ पर कर दिया ।

मार्शल का हाथ नीचे लटक गया । होठों से घुटी घुटी चीख निकल गई । उसके चेहरे पर पीडा की असंख्य रेखाएं उभर आई थीं ।

तुमने मेरे ऊपर हाथ उठाकर अच्छा नही क्रिया ।" उसने बेबसी अंदाज में दांत पीसे ।

" तुम हाथ उठाने की बात कर रहे हो, अगर मैं अपनी पर आ गई पैर भी उठा सकती हूँ । बेहतर यहीं है कि अपना सड़ा मुंहुं बंद रखो और हम लोगों को यहां से बाहर निकलने का रास्ता दिखाओ ।"

"तुम यहां से किसी भी कीमत पर बाहर नहीं ज़ा सकती रीमा?" वह कठोर लहजे में बोला-"इस जेल से भाग निकलना नामुमकिन है । यहां चप्पे-चप्पे पर सशस्त्र गार्ड फैले हुए हैं, अगर ज्यादा दिलेरी दिखाई तो तुम्हारे साथ-साथ क्लाइव और डगलस की लाशे भी यही गिरेगी !"

"हम लोग जेल से सुरक्षित बाहर निकलेंगे 'मार्शल ओर तुम एक अच्छे मेजबान की तरह हमें बाइंज्जत बाहर तक छोडकर आओगे !"

"मै तुम्हें बाहर तक छोडकर जाऊंगा?"

" ऑफकोर्स ।"

"नामुमकिन ।"

"नामुमकिन को मुमकिन बनाना मुझे आता है ।"

"मार्शल साहब ठीक कह रहे हैं रीमा ।" एक जेल अधिकारी ने बीच में टांग फसाई-"तुम किसी भी कीमत पर यहां से बाहर नहीं निकल सकती ।"

"वको मत ।" मेरे चेहरे पर कहर नाच उठा-"अगर मार्शल की ज्यादा तरफदारी की तो तुम्हारे जिस्म में इतना ज्यादा बारूद भर दूंगी कि तुम्हारी आत्मा घायल होकर यमलोक पहुँचेगी ।"

बह बगले झांकने लगा ।

"मेरे पास वक्त नहीं है मार्शल ।" मैंने कहा-"मेरे साथ चलो ।"

"म.. .मगर. . . ।"

"अगर-मगर कुछ नहीं । मैंने जैसा कहा है, वो करो ।" मेरा लहजा आदेशपूर्ण था…"वरना फिर मुझे वो करना पडेगा, जो शायद तुम्हें अच्छा न लगे । पहले मैं तुम्हारे इन तीनों वफादार कुत्तों को गोली से उड़ाऊंगी और उसके बाद. . ।"

" म. . .मैँ चलता हूं।" वह सर्द सांस छोड़ता हुआ बोला ।

"गुड । अब तुमने अक्ल की बात की है ।" मैंने कहा---"घूमो ।"

मार्शल एडियों पर घूम गया ।

"आगे बढो ।" बह दरवाजे की तरफ बढ गया । "

मैं उसके पीछे थी । मैंने गन की नाल उसकी पीठ से सटा रखी थी । क्लाइव और डगलस मेरे दायेँ-बायेँ चल रहे थे । उन्होंने भी अपने-अपने हाथों में गनें संभाल रखी थी ।

बह बैरक से निकलकर मैदान में पहुचे ।
 
मैने गर्दन मोड़कर पीछे देखा तो पाया कि तीनों कमाण्डो तथा जेल अधिकारी बडी सावधानी से हमारे पीछे-पीछे चले आ रहे थे । शायद उसे मेरी तरफ से होने बाली किसी एक गलती का इंतजार था, ताकि वे बाज बनकर हमें दबोच सकें ।

" तुम लोग वहीं ठहरो ।" मैं गुर्रा उठी---" किसी ने हमारे पीछे आने की कोशिश की तो अच्छा नहीं होगा ।"

उनके पांव जहाँ के तहां चिपक कर रह गये ।

फिर मैंनें चारों तरफ़ नजरें घूमाई, मैदान में मौजूद गार्ड तथा सैनिक उस मंजर को देखकर सन्नाटे में खडे थे । वे सभी हथियारों से लैस थे ।

मगर उनके हथियार मानो कुंद होकर रह गये ।

बेचारा मार्शल ।

उसने तो सपने मे भी कल्पना नही की होगी कि मै उसके साथ इस तरह का भयानक खेल खेलूगी ।

====

"स्टाप !" जोंगे के करीब पहुंचते ही मैंने हुक्म दनदनाया । मार्शल के पैरों में ब्रेक लग गये जोगे की ड्रायविंग सीट खाली पडी थी ।

"डगलस ।" मैंने कहा ।

"यस मेडम ।" वह सतर्क नजर आया ।

"ड्रायविंग सीट संभालो ।"

डगलस ने तीर की तरह आगे बढकर ड्रायविंग सीट संभाल ली ।

"जोंगे में बैठो मार्शल ।" मैंने आदेश दिया ।

मरता क्या न करता? मार्शल के पास मेरा आदेश मानने के अलावा दूसरा कोई रास्ता भी तो नहीं था । एक क्षण गंवाये बगैर वह जोंगे के पिछले हिस्से में चढ गया ।

मै उसे कोई भी हरकत करने का जरा भी मौका देना नहीं चाहती थी । अत: बला की फुर्ती का प्रदर्शन करती हुई उसके सामने वाली सीट पर जा बैठी । साथ ही मैंने अपने हाथों में दबी गन उसके ऊपर तान दी ।

"बैठो क्लाइव ।" मैंने कहा ।

क्लाइव भी जोंगे में बैठ गया ।

"मैं मार्शल को कवर किये हुए हूँ क्लाइव ।" मैंने क्लाइव को हिदायत दी--"अगर कोई जोंगे का पीछा करे तो उस हरामजादे की लाश बिछा देना । इस वक्त मैं जरा भी रिस्क लेने के मूड में नहीं हूँ !"

"ओ०के० मैडम ।" वह पहले से कहीं ज्यादा सतर्क हो उठा ।

"जोगां जेल के फाटक की तरफ़ बढाओ डगलस ।"

डगलस ने जोगा स्टार्ट करके आगे बढा दिया ।

मार्शल अंगारे बरसाती निगाहों से मुझे घूर रहा था । उसका बश नहीं चल पा रहा था, वरना वह हम तीनों को यहीं सात फूट नीचे जमीन में दफना देता ।

जोंगे का वो हिस्सा दावे-बाये से बंद था ।

आगे-पीछे से खुला था । मैं बीच-बीच में सतर्क निगाहों से आगे-पीछे देख लेती थी । किसी भी क्षण खतरा आ सकता था ।।

सामने मैदान में खडे सेनिक स्टेचू बने जोंगे को जाता देखते रहे !

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किसी में भी इतना हौंसला नहीं था कि वे मुझ पर गोलियों चलाते । वेसे भी मार्शल गोली न चलाने का आदेश दे चुका था ।

उसे भी अपनी जिदगी का खतरा था । गोली उसे भी लग सकती । . . .

सहसा ।

जोणा एक झटके से रुक गया ।

सामने जेल का बंद विशाल फाटक था ।

"फाटक खुलबाओ मार्शल ।" मैंने कहा ।

मार्शल ने जरा भी हील-हुज्जत किये बगैर चीखकर फाटक खोलने का आदेश दनदना दिया ।

उसके आदेश का तुरंत पालन हुआ ।

डगलस ने जोंगा आगे बढा दिया । दूसरे क्षण जोंगा फाटक पार करता हुआ बाहर निकला और सडक पर आ गया ।

"किधर चलना है मेडम?" डगलस ने पूछा ।

"शहर से बाहर चलो ।"

जोंगा सड़क पर दौड पड़ा ।

"ज. . .जोंगा रुकवाओ ।" मार्शल बोल उठा ।

"क्यों?" मैंने उसे घूरा ।

"मैंने तुम लोगों को जेल से बाहर निकाल दिया है । मैंने वहीँ किया है, जो तुमने कहा था ।" मार्शल ने कहा----"अब तो मुझे मुक्त्ति दो ।"

"तुम्हें इतनी आसानी से मुक्ति नहीं मिलेगी मार्शल । अभी तो मुझे तुमसे बहुत सारी बाते करनी हैं ।”

" 'ज्यादा चालाक बनने की कोशिश मत करो ।" वह गुर्राहटपूर्ण लहजे में बोला…"इस खुशफहमी में मत रहना कि तुम मेरा कुछ बिगाड़ पाओगी । इस घटना की खबर सेना के आला आफिसरों को मिल गई होगी । सेना तुम्हारी तलाश में टिड्डीदल की तरह चारों तरफ जायेगी । तुममें से कोई भी जिंदा नहीं बचेगा ।"

"हमारी फिक्र छोडो मार्शल । फिलहाल तुम अपनी जिदगी के बारे में सोचो । इस वक्त तुम्हारी जिदगी मेरी मुट्ठी में है ।। मेरे ट्रेगर दबाते ही तुम्हारा राम नाम सत्य हो जायेगा ।"

"बको मत ।जोंगा स्कवाओ ।" मार्शल गला फाड़कर चिल्लाया ।

"जोंगा नहीं रुकैगा मार्शल ।"

"आखिर चाहती वया हो?" वह दडाड़ा।

"धीरज । मैं जो चाहती हूं वो जल्दी ही तुम्हारे सामने आ जाएगा ।" मैंने उत्तर दिया ।

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मार्शल सख्ती से होंठ भीच कर रह गया ।

उसके सामने खामोश रहने के अलावा दूसरा कोई रास्ता भी नहीं था ।

इस वक्त मार्शल हम लोगों के लिये सुरक्षा कवच का कार्य कर रहा था । जब तक वो हमारे कब्जे में था, हम सुरक्षित थे ।

====

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जोंगा तेज रफ्तार से एक सुनसान सड़क पर भागा जा रहा था । इस समय जोंगे के भीतर गहरी खामोशी पांव पसारे थी । मैं अपने इस खतरनाक मिशन के आखरी चरण के बारे में सोच रही थी ।

आखरी चरण था सर एडलॉफ ।

इसके बावजूद में सतर्क थी । मैं जानती थी कि मार्शल अपने बचाव में कुछ भी कर सकता था । क्योंकि उसे अपनी मौत का अहसास हो चुका था ।

इस वक्त मेरे दिमाग में एक ही बात थी कि टहनियों को काटने से बेहतर है कि सीधे जड़ पर वार करके इस किस्से को ही खत्म कर दिया जाये ।

और जड़ था मार्शल ।

मार्शल की मौत के बाद सैना और उनके विदेशी समर्थकों के हौंसले पस्त हो जाने थे ।

सहसा ।

मार्शल हरकत कर गया ।

मानो बिजली-सी चमकी ।

,उसके दोनों हाथों का भरपूर प्रहार मेरी गर्दन पर पड़ा । अगले क्षण गन मेरे हाथों से छूट गई और मार्शल की बगल में गिरी । सब कुछ इतनी तीव्रता से हुआ था कि मुझे संभलने अथवा कुछ करने का जरा भी मोका नहीं मिला था ।

गजब 'कर गया था मार्शल ।

मैं तो सोच भी नहीं सकती थी कि गन सीने पर तनी होने के बावजूद मार्शल ऐसी हरकत भी कर सकता है ।

मेरी सारी सतर्कता धरी-की-धरी रह गई थी ।

फिर पलक झपकते ही मार्शल के हाथ में रिवाॅल्वर प्रकट हूआ जैसे जादूके जोर से उसके हाथ में आ गया हो । उसने न सिर्फ रिवात्वर मेरे ऊपर तान दिया था, बल्कि वह भेड्रिये जैसे स्वर में गुर्रा भी उठा था-"गन फेंक दो क्लाइव, वरना में रीमा भारती की खोपडी उड़ाकरं रख दूंगा ।"

हालात की नाजुकता को देखते हुए क्लाइव ने गन अपने हाथों से फिसल जाने दी ।

अब बाजी मार्शल के हाथ में थी ।

"कोई गलत हरकत मत करना रीमा?" मार्शल पुन पूर्ववत लहजे में बोल उठा…"वरना तुम अपनी मौत की खुद जिम्मेदार होगी !"

मैं बेबसी से दांत पीसकर रह गई ।

"तुम मुझे मार नहीं सकी । तुमने अपने हाथ में आया सुनहरी मौका गंवा दिया, लेकिन मैं तुम्हारी तरह बेवकूफ नहीं, हूं ! हाथ में आया मौका गंवाऊंगा । मैं जानता हूँ अगर तुम जिंदा बच गई तो मेरा बेड़ागर्क करके ही दम लोगी । इसलिए मै छोड़ने वाला नहीं हूँ । अगर तुम आंधी हो तो में तूफान हू और मार्शल नामक ये तूफान तुम्हें उस जगह पहुचा देगा, जहाँ से इंसान कभी वापस लौटकर नहीं आता ।"

मार्शल बोले जा रहा था और मैं अपनी आदत के विपरीत खामोश बैठी थी । मगर मेरा मस्तिष्क तेजी से काम ’कर रहा था । जोगा बदस्तूर तेज रफ्तार से भागा जा रहा था ।

इस वक्त तो मार्शल का दूसरा ही रूप नजर आ रहा था । चेहरे पर कहर नाच रहा था उसके । आंखें भट्टी में पडे अंगारो से शर्त लगाती प्रतीत हो रही थीं और जबड़े सख्ती से कसे हुए थे । साक्षात् खून का प्यासा दरिन्दा नजर आ रहा था वह ।

"अब बोलो रीमा?" वह खतरनाक अंदाज में रिवाॅल्बर हिलाता हुआ बोला---" तुम्हे केसी मौत चाहिये?"

मैं व्यंग से मुस्कुराई ।

"तुम्हारी ये मुस्कान बता रही है कि तुम्हें अभी भी उम्मीद है कि तुम मेरे हाथों से बच जाओगी।"

"इन्सान की उम्मीद तो मरते वक्त तक खत्म नहीं होती मार्शल । सच तो ये है कि इंसान उम्मीद के सहारे ही जिंदा रहता है ।"

"तो तुम भी उम्मीद के सहारे जिंदा हो ।'"

"ऑफकोर्स !"

मैंने ये इकलौता शब्द इस अंदाज में कहा था कि वह स्वयं पर नियन्त्रण नहीं रख सका और ट्रैगर दवा बैठा ।

धांय ।

उसके रिवॉल्वर ने शोला उगल दिया ।

--------------

परन्तु उस बेचारे को क्या मालूम था कि मुझे बचने का आर्ट भी आता है ।

गोलियों से बचने का एक विशेष आर्ट । जिसकी मदद से मैं दुनिया के बडे से बड़े निशानेबाज को भी चकमा दे चुकी हू । बिजली को भी मात देने वाली गतिसे अपनी जगह से बस मामूली-सी हिली ।

गोली खाली गई ।

अपना निशाना यू खाली जाते देख हक्का बक्का रह क्या मार्शल ।

फिर भी उसने दूसरा फायर का दिया ।

परन्तु उसका भी वही निकला था ।

"मैंने कहा था न कि उम्मीद पर, दुनिया कायम है मार्शल ।" मैंने कहा---" मेरी सांसें बाकी हैं तो तुम मेरा कुछ नहीं बिगाड सकते । एक बार फिर कोशिश करके देख लो । शायद मुझे मारने में कामयाब हो जाओ?"

मेरे शब्दों ने तो मानो आग में घी जैसा काम किया था । उसका चेहरा गुस्से और अपमान से सुर्ख पड़ता चला गया था ।

और

धांय ।

उसके रिवाल्वर ने तीसरा शोला उगल दिया था । मगर इस बार भी मैं अपने विशेष आर्ट का प्रदर्शनी करती हुई उसकी गोली को अंगुठा दिखा गई थी ।

"मार्शल ।" मैंने इत्मीनान से कहा-"तुम्हारी तीनों गोलियों का क्या परिणाम हुआ , ये तुम देख चुके हो । अगर चाहो तो अपने रिबाॅल्बर की बाकी गोलियाँ भी खर्च कर सकते हो । मगर नतीजा इससे अलग कुछ नही निकलने वाला । इसोलिये वेहतर होगा कि रिवाल्बर फेंक दो ।"

प्रत्युत्तर में उसने पुन: ट्रेगर दबाना चाहा ।

परन्तु ।

इस बार मैंने उसे वेसा नहीं करने दिया ।

पलक झपकते ही मैंने बला की फुर्ती का परिचय देते हुए उसका हाथ हवा में थाम लिया । वह अपना हाथ छूडाने का प्रयास करने लगा, लेकिन मेरे चाहने वाले जानते हैं कि मेरे हाथ लोहे के शिकंजे हैं । उनकी गिरफ्त से निकलना इतना आसान नहीं होता ।

दूसरे हाथ से मार्शल का रिवाल्वर छीनने का प्रयास करने लगी किन्तु मार्शल मुझे इस कार्य में सफल नहीं होने दे रहा था । वह एक मर्दं था ,एक फौजी था और जाहिर है जिस्मानी ताकत में मुझसे ज्यादा रहा होगा ।

फिर भी में अपनी समूची ताकत बटोरकर उसका हाथ मरोड़ती चली गई ।

सहसा!

धांय

रिवाल्वर ने शोला उगल दिया ।

गोली डगलस की पीठ में धंसी । उसके होठों से घूटी-घूटी-सी चींख निकल गई । उसके हाथों से स्टयेरिग लगभग छूट ही गया ।

जोंगा बुरी तरह लहराया ।

मेरे जिस्म को जोरों का झटका लगा ।

"हरामजादे !" क्लाइव हलक फाढ़कर चिल्लाया-"तूने डगलस को गोली मार दी। मैं तुझे जिंदा नहीं छोडूंगा ।"

.. कहने के साथ ही उसने अपने पैरों में पडी गन उठा ली । . मार्शल का इरादा डगलस को गोली मारने का कतई नहीं था । रिवाल्वर की सीना झपटी में न जाने कैसे ट्रेगर दब गया था? उस घड़ी संयोग से रिवाल्वर का रुख डगलस की तरफ था ।

अतः गोली उसकी पीठ में जा धंसी थी ।

"मार्शल से तो मैं निबट लूंगी क्लाइव । तुम डगलस को संभालो ।" मैं चीखी-"ओर पूछो कि वो जगह कहां है? जहाँ सर एडलॉंफ छिपा हुआ है, अगर डगलस को कुछ हो गया तो हमारी सारी मेहनत पर पानी फिर जायेगा !"

" क्लाइव ने गन छोड़ दी और वह डगलस की तरफ झपटा । डगलस जोंगा संभाल नहीं पा रहा था । जोगा सड़क पर लिमिट से ज्यादा पीये शराबी की तरह लहरा रहा था ।

मैंने पुन: अपना पूरा ध्यान मार्शल पर केन्दित का दिया । हमं अभी एक-दूसरे से जूझ रहे थे ।

वे क्षण बड़े ही खतरनाक थे ।

कई बार रिवाल्वर की नाल मेरे सीने और माथे को चूम चुकी थी ।

मेरा भाग्य ही अच्छा था जो उस घडी गोली नही चली थी । मार्शल अपनी समूची ताकत लगाकर मुझसे अपना रिवाल्वर वाला हाथ. छुडाने का प्रयास का रहा था ।

मगर मैं क्या कम थी

मैं उसे उसके इरादों को कामयाब नहीं होने दे रही थी । मैं जानती थी कि अगर मार्शल अपना हाथ छूडाने में कामयाब हो गया तो मेरी मौत निश्चित है ।

"सर एडलॉफ किस जगह छिपे हैं डगलस?" सहसा मेरे कानों में क्लाइव का स्वर टकराया ।

""व...वो...।" डगलस के होठों से कांपता-सा स्वर निकला ।

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डगलस की आवाज़ डूबती जा रही थी । मुझे लगा जैसे किसी भी क्षण डगलस की सांसों की डोर टूट जायेगी ।

उधर क्लाइव कह रहा था-"ज़वाब दो डगलस ।" बताओ सर एडलॉफ कहां हैं?"

मेरे कान वायरलेस बने हुए थे । मैं सब कुछ सुन रही थी ।

"बोलो डगलस ।" क्लाइव बैचेनी भरे स्वर में बोला ।

और फिर ।

डगलस ने अपनी पूरी हिम्मत बटोरकर क्लाइव को उस जगह के बारे में बता दिया, जहाँ सर एडलाॅफ छिपा हुआ था । फिर उसका अस्फुट स्वर मुझे सुनाई दिया"----.. . अब मेरा आखरी वक्त करीब आ गया है . . म. . . मैं नहीं बचूंगा. . .सर एडलॉफ क्रो. . .मेरा. . .स. . . सलाम. . . ।"

"ड. . . डगलस !" क्लाइव ने पुकारा ।

मगर जवाब में खामोशी छाई रही ।

"आंखे खोलो डगलस । तुम्हें कुछ नहीं होगा ।"

इस बार भी डगलस की खामोशी नहीं टूटी थी । मैं समझ गई कि उसकी सांसे टूट चुकी थीं । मुझे इस बात का बेहद दुख था कि मैं डगलस के लिये कुछ नहीं कर सकी थी । आई०एस०सी० ने अपना एक काबिल और जांबाज ऐजट खो दिया था ।

"डगलस अब इस दुनिया में नहीं है मैडम ।" सहसा मेरे कानों से क्लाइव का स्वर टकराया ।

उसकी आवाज ऐसी थी मानो किसी अंधकूप से निकली हो ।

मै मन-हो-मन भगवान से डगलस की आत्मा की शांति के लिये प्रार्थना के अलावा कर भी क्या सकती थी?

मैंने कनखियों से अगली सीट की तरफ़ देखा, ड्रायविंग सीट -क्लाइव संभाले था । साफ था कि उसने डगलस की लाश को फर्श पर लुढ़का दिया था ।

इधर मार्शल ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी ।

मुझे लगा कि बो किसी भी क्षण अपना रिवाल्वर वाला हाथ आजाद करने में कामयाब हो जायेगा ।।

अतः मैंने दूसरे हाथ की खडी हथेली का बार मार्शल के रिवाल्वर बाले हाथ पर कर दिया । वार सटीक साबित हुआ । रिवाल्वर उसके हाथ से छूटकर हमारे बीच जोंगे के फर्श पर गिरा ।
 
अब मार्शल खाली हाथ हो चुका था । जवाब में उसने भी अपना हाथ घुमा दिया । मार्शल का इरादा मेरे चेहरे पर घुसा मारने का था । परन्तु मै उसकी किसी भी हरकत की तरफ से पूरी तरह तैयार थी । अत: मैंने उसका हाथ हवा मे ही थाम लिया । साथ ही मेरे दूसरे हाथ का फौलादी मुक्का उसके पेट में जा धंसा था ।

वह कराहता हुआ झुका ।

मैंने उसका हाथ छोडकर दोनों हाथ बांधते हुए दुहत्तड़ की शक्ल में उसकी गुदूदी पर रसीद कर दिये ।

बह मुंह कै बल नीचे गिरां।

अभी वह उठ भी नहीं पाया था कि मेरी ठोकर उसकी कनपटी पर पडी । इस बार उसके हलक से हलाल होते बकरे जैसी चीख उबलती चली गई थी ।

"चल उठ हरामजादे ।" मैं बोली ।

वह कमबख्त बड़ा तेज निकला । उठकर खड़ा होने के बजाय उसने अपना चेहरा ऊपर उठाया था । साथ ही उसने मेरी दोनों टागे पकडकर खींच दी थीं । मैं नीचे गिरी ।

और फिर वह मेरे सीने पर सवार हो गया और मेरे चेहरे पर ताबड़तोड़ घूंसे बरसाने लगा । मुझे संभलने में एक क्षण जरूर लगा, फिर मैंने भी अपना हाथ घुमा दिया । मेरा हाथ घूसे की शक्ल में उसके चेहरे से टकराया । बह होठों से चीख उगलता हुआ पीछे की तरफ उलट गया । मार्शल ने उठकर मुझ पर हमला करना चाहा । तब तक मैं उठकर चुकी थी । मैंने अपना दायाँ पांव चला दिया ।

अगले क्षण मेरे बूट की जबरदस्त ठोकर उसके चेहरे पर पडी । बह फिर पीछे की तरफ उलट गया ।

जोंगा अपनी पूरी रफ्तार से भागा जा रहा था ।

गिरते ही सहसा न जाने कहाँ से मार्शल में इतनी ताकत आ गई थी कि वह स्प्रिग लगे खिलौने की तरह उछलकर खड़ा हुआ और मेरी तरफ झपटां । मेरे करीब ही उसका रिवाल्वर पडा हुआ था । उसका लक्ष्य रिवाल्वर ही था ।. भला मैं उसे रिवाल्वर उठाने का मौका कैसे दे सकती थी? इससे पहले कि बह रिवाल्वर को छू भी पाता, मैं उछलकर तीर की तरह उससे जा टकराई ।

पलक झपकते ही मेरा घूटना उसके पेट पर पड़ा और सिर की भयानक टक्कर उसके चेहरे पर ।

वह होठों से हलाल होते बकरे जैसी चीख उगलता हुआ पीछे की तरफ उलट गया ।

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जोंगे के पिछले हिस्से में जगह कम थी । इसलिये मार्शल पर वार करने का मौका कम मिल पा रहा था और सबसे बडी बात तो ---------ये थी कि जोंगा पूरी स्पीड से भागा जा रहा था । अत: खड़ा हो पाना भी मुश्किल हो रहा था ।. मैं बडी कठिनाई से अपने आपको सम्भाले थी । जोंगे की रफ्तार अधिक होने के कारण कई बार में गिरते-गिरते बचीं थी ।

मेरी निगाहें मार्शल पर थीं ।

अब उसे इस बात का अहसास हो गया था कि मैं उसे छोड़ने बाली नहीं हूँ । वह अपने बचाव के चक्कर में था । अत: वह जोंगे के पिछले दरवाजे के करीब पड़ी गन की तरफ़ सरका ।

उसी क्षण ।

मैरे बूट की भरपूर ठोकर उसके नितम्बी पर पड़ी ।

वह बिलबिला उठा ।

और फिर ।

मैंने बिजली जैसी गति से अपने करीब पड़ी गन उठा ली ।

साथ ही उस पर गन तानते हुए मेरे होठों से भयानक गुर्राहट खारिज हुई-"गन उठा रहा था हरामजादे? चल, अगर मां का दूध पिया तो उठा गन ।"

मार्शल ने गर्दन मोड़कर मेरी तरफ देखा । साथ ही अपने ऊपर गन तनी देखकर उसके चेहरे का रंग भक्क से उड़ गया । आंखों में मौत की परछाइयां नाच उठी ।

"अब बोल मार्शल ।" मेरा लहजा पूर्ववत् था…"तू किस तरह की मौत मरना चाहता है, क्योंकि तेरे पापी का इस धरती से उठ जाना ही बेहतर हैं, अगर तू जिन्दा रहा तो न जाने कितने निर्दोष लोगों की जाने लेगा । अपने स्वार्थ की खातिर कितने मासूमो के खूंनं से हाथ रंगेगा । अब मरने के लिये तैयार हो जा । तेरी मौत के बांद इस मुल्क की जनता राहत की सांस तो ले सकेगी ।"

किन्तु तभी बह पट्ठा गजब ही कर गया ।

वैसे तो मौत को सामने देखकर एक चींटी भी आश्चर्यजनक साहस का परिचय दे बैठती है । उस पर मौत, दो मौत ही थी, जिसने मार्शल में भी इतना साहसभर दिया था कि पलक झपकते ही बह स्प्रिग की तरह उछला । अगले क्षण उसका हाथ मेरी गन पर पड़ा । साथ ही उसके बूट की ठोकर मेरे घुटने से टकराई।

हमला… अप्रकाशित था ।

गन मेरे _हाथ से छूट गई और मैं मीठ के बल सीट पर गिरी ।

मार्शल ने आव देखा न ताव जोगे से नीचे जंप-लगा गया । साथ ही वह लड़खड़ाक्रर सड्क पर गिरां और लुढ़क्ता चला गया ।

मगर ।

मैं इतनी आसानी से उसे कहां छोड़ने वाली थी?

मैं न सिर्फ विद्युतीय गति से उठकर खडी हो चुकी थी, बल्कि गन उठाकर नीचे छलांग भी लगा चुकी । मैं दूर तक लुढकती चली गई । मेरा भाग्य अच्छा था कि मुझे के चोट नही लगी थी । मेरा लुढकना रुका तो में तीव्रता से उठकर खडी हुई तो मैंने मार्शल को एक तरफ भागते देखा ।

मेरे और उसके बीच काकी फासला था । मैं उसके पीछे भाग छूटी । वह पट्ठा यूं भाग रहा था जैसे अचानक उसके पैरों में पंख उग जाये हों । ऐसे-भागते जब उसने गर्दन मोढ़कर पीछे देखा तो मुझे अपने पीछे साक्षात् मौत बनी भागती देखकर उसके चेहरे पर खौफ ही खौफ उभर आया ।

हमारे बीच का फासला लगातार घटता जा रहा था ।

" जितना मर्जी भाग ले मार्शल ।" मैं ठिठ्कती हुई चीखीं-" लेकिन तुझे दुनिया की कोई भी ताकत मेरे हाथों से नहीं बचा सकती । आज तेरी मौत मेरे हाथों होनी तय है ।"

और मेरा चेहरा पत्थर की तरह सख्त ऐवं खुरदरा पड़ता चला गया । आँखों से मानो शोले फूट पड़े ।

दात पर-बांत जमाकर गन का लीवर खींच दिया ।

"तड...तड...रेट....रेट.. .रेट. . . ।"

गोलियों की बाढ मार्शल की तरफ झपटी । दूसरे ही पल मैंने मार्शल के जिस्म में सुराख-ही-सुराख बनते देखे । साथ ही उन सुराखों से सुर्ख लहू उबल पडा था ।

मार्शल-कटे पेड़ की तरह लहराकर सड़क के किनारे उलटा और दूसरी तरफ अनन्त खाई में गिरता चला गया । जाहिर-सी बात थी कि इतनी सारी गोलियों जिस्म में धंसने के खाद उसके जिन्दा बचने का सवाल ही नहीं रह गया था ।

मैंने इत्मीनान की लम्बी सांस ली ।

एक दरिन्दा दुनिया से कूच कर चुका था ।

मार्शल ने सपने में भी अपनी ऐसी दर्दनाक मौत की कल्पना नहीं की होगी । वैसे ऐसे पापियों का ऐसा ही अंजाम होता है ।

मैंने सडक पर नजर डाली । मैं देख लेना चाहती थी कि उस पर कोई अन्य वाहन तो नहीं आ रहा है ? किन्तु फिलहाल मुझे कोई वाहन आता नजर नहीँ आया था । जोगां अब रूक चुका था ।

और क्लाइव जोंगे के पीछे खड़ा मेरी तरफ देख'रहा था ।

अब मेरा ज्यादा देर , रुकना खतऱनाक हो सकता था ।

जाहिर है, जेल वाली घटना की ख़बर सेना के उच्व अधिकारियों को मिल चुकी होगी और सेना हरकत में आ चुकी होगी । अंब तक सैनिक बडी तादाद में शिकारी कुत्तों की तरह हमारी तलाश में लग गये होगे ।

एक क्षण गंवाये बगैर मैं पलटकर जोगे के करीब पहुंची ।

"कुत्ते की मोत मारा गया हरामजादा ।" क्लाइव बोल उठा । उसकी आवाज में खुशी साफ़ झलक रही थी ।

"ऐसे लोगों ऐसी ही दर्दनाक मौत मिलती है क्लाइव ।" मैंने कहा" -बहरहाल, ये हम लोगों के लिये सबसे बडी कामयाबी है, लेकिन हमें ये नहीं समझना चाहिये कि, हमने मुकम्मल जंग फतह कर ली है । असली जंग तो अब शुरू होगी । अब मुझे ये बताओ कि वो जगह कितनी दूर हैं जहाँ सर एडलॉफ छिपा हुआ है ।"

"वो जगह तो यहीं से काफी दूर है ।"

" तुमने वो जगह देखी हे?"

"यस मैडम?"

"आगे का सफर, हम लोगों को पैदल' तय करना होगा क्लाइव ।"

"लेकिन सफर तो काफी लम्बा है ।"

" कितना भी लम्बा क्यों न हो ? अगर हम जोंगे में सवार होकर आगे का सफ़र तय करेंगे तो आते-जाते वाहनों में सवार लोगों की नजरों में जोंगा आ जायेगा, सैनिकों को पता चल सकता है कि जोंगा किस दिशा में गया है ? उस स्थिति में हम लोग मुसीबत में फंस सकते हैं ।"

"ओह !" क्लाइव का सिर स्वयं ही सहमति में हिलने लगा ।

"एक बात और सुनो क्लाइव ।"

क्लाइव ने सवालिया निगाहों से मेरी तरफ देखा ।

"हमे सर एडलॉफ तक पहुंचने के लिये एक ऐसा रास्ता चुनना होगा कि आसानी से किसी की निगाह हम लोगों पर न पड़ सके । इस घटना के बाद हमारे लिये खतरा और ज्यादा बढ गया है । सेनिक टिट्डी दल की तरह हमें तलाश कर रहे होंगे । वहाँ तक पहुचने के लिये तुम्हारी नजरों में ऐसा कोई रास्ता है ?"

'क्लाइव के चेहरे पर सोच के भाव उभरे।

एक पल ठहरकर वह बोला---" सर एडलॉफ तक पहुंचने के लिये ऐसा एक रास्ता मेरी नजरों में है । हम उस रास्ते से रास्तों की अपेक्षा जल्दी पहुंच जायेगे, लेकिन वो रास्त ऊबढ़-खाबड़, दलदली और कंटीली झाडियों से भरा है । रास्ते मैं घना जंगल भी पडेगा ।

" हमें उस जंगल को पार करना पडेगा ।"

"मैँ छोटी मोटी कठिनाइयों की परवाह नहीं करती क्लाइव । मेरे ख्याल से वही रास्ता ठीक रहेगा ।"

"तो फिर चलिये मैडम ।“

"चलने से पहले हमें जोंगे को टिकाने लगा होगा । इस तरह खुले में बीच सडक में जोंगे का खड़े रहना हम लोगों के लिये सिरदर्द बन सकता है । जोंगे को देखकर सैनिक अनुमान लगा लेंगे कि हम यहां से क्रिसी रास्ते से निकले हैं ।"

"आप कह तो ठीक रही हैं, लेकिन जोगे का क्या क्रिया जाये? इतना बड़ा जोंगा सैनिकों की निगाहों से कैसे बच सकता है?"

"हम जोंगे को खाई में धकेल देगे । गहरी खाई में जोंगा किसी को नजर नहीँ आयेगा ।" मैंने कहा ।

"ल.. .…लेकिन !"

"लेकिन क्या ?"

"जोगे में तो डगलस की लाश मौजूद है ।"

. "अगर डगलस की लाश खुले में रहेगी तो उसकी लाश को चीलन्कोए नोंच-नोचकर खायेंगे । बेहतर है कि लाश को जोंगे में ही रहने देना चाहिये ।"

"हमेँ डगलस की लाश का अन्तिम संस्कार कर देना पहिये ।"

"हमारे पास डगलस की लाश का अन्तिम संसार करने का वक्त नहीं है । हम क्रिसी भी क्षण खतरों से धिर सकते हैं । फिलहाल हम भगवान से उसकी आत्मा की शांती के लिये प्रार्थना के अलावा उसके लिये और कुछ नहीं कर सकते क्लाइव ।। मैं तुम्हारी भावनाओं की कद्र करती हूँ लेकिन ये वत्त भावनाओं में बहने का नहीं है । अगर डगलस तुम्हारा जान-पहचान वाला था तो मेरा हमपेशा था । आई०एस०सी० का एक जाबांज और काबिल जासूस था । तुमसे कहीं ज्यादा मुझे उसकी मौत का दु ख है , लेकिन दुखी होने से क्या होगा? डगलस तो जिन्दा नहीं हो सकता । अब देर मत करी क्लाइव । जोगे को खाई में धकेलने में मेरी मदद करो ।"

क्लाइव तुरन्त हरकत में आ गया ।

हमने जोगे को पीछे से सडक के किनारे गहरी खाई की तरफ धकेलना शुरु कर दिया ।

हमें जोगे को धकेलने में अपनी पूरी ताकत लगानी पडी थी । हमारी सांसे फूल गई थीं । जिस्म पसीने भीग चुकं थे, लेकिन हमने हिम्मत नहीं हारी थी । हम वहीं कठिनाई से जोंगे को सडक के किनारे तक लाने में कामयाब हो सकै थे ।

अगले क्षण ।

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जोंगा लुढ़कनिया खाता हुआ खाई में गिरता चला गया, फिर जोंगा आग की लपटों के बीच धिर गया ।

जाहिर था कि जोगे की पैट्रोल की टंकी में आग लग गई थी ।।

" अब यहीं से हिलो क्लाइव ।" मैं बोल उठी ।

क्लग्रइव आगे बढ गया । मैं उसके पीछे थी ।

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=====
 
वो ऊबढ़-खाबड़ झाडियों से भरा रास्ता वास्तव में बड़ा कठिन था।

जिस्म में पीड़ा की … लहरें उछाले मार रही थीं । मगर । अपनी पीडा को भूलकर मैं क्लाइव के पीछे चली जा रहीं थी ।

चारों तरफ सन्नाटा था ।

सूरज आसमान में सिर पर चमक रहा था । . झाडियों का सिलसिला खत्म हुआ ऊबड़-खाबड़ रास्ता शुरु हो गया । उस रास्ते पर हम कठानाई से आगे बढ पा रहै थे । रास्ता ऊबड़-खाबड़ होने के कारण हमारी रफ्तार धीमी थी ।

"हमें कुछ देर आराम कर लेना चाहिये ।" एक जगह क्लाइव ठिठकता हुआ बोला--"उसके बाद आगे का सफर शुरू करेंगे ।"

"अभी सफ़र कितना बाकी है?" मैंने भी ठिठककर पूछा ।

"अभी तो सफर बहुत लम्बा है । यू समझिये अभी तो-सफर शुरु ही हुआ है ।" कहने के साथ ही क्लाइव बैठ गया ।

मैंने पेन्ट की जेब से सिगरेट का पैकेट बाहर निकालकर एक' सिगरेट सुलगाई और एक गहरा कश लिया ।

"एक सिगरेट मुझे भी मिलेगी मैडम?" क्लाइव ने कहा ।

मैंने खामोशी से पैकेट और लाईटर क्लाइव की तरफ़ बढा दिया ।

… उसने दोनो चीजे थाम ली । मैंने चहु ओर निगाहें भगाई । सामने दूर तक ऊबढ़-खाबड़ रास्ता नजर आ रहा था । तरफ धनी कंटीली झाडियाँ थी ओर उनके पीछे पांच-सात पेड़ आपस में सिर जोड़े खडे थे । उन पेडों के पीछे छोरी-छोटी पहाडियों का सिलसिला नजर आ रहा था । मुझे आसपास कही कोई खतरा नजर नहीं आया था ।

मैंने संतोष की सांस ली और फिर सिगरेट के हल्के हल्के कश लेने लगी ।

"बैठिये मेडम?" क्लाइव बोला-" आप खडी क्यों हैं?"

मैं उसकी बगल में बैठ गई । परन्तु ऐसा लगता था कि आराम मेरे नसीब में ही नहीं था ।

उसी क्षण । . .

वातावरण में गड़गड़ाहट का तेज स्वर गूंजता चला. गया ।

मेरे जिस्म को जोरों का अटका लगा ।

मैं सिगरेट पीना तक भूल गई ।

ये किसी हैतीकाप्टर की आबाज थी।

ख़तरा ।।

ये शब्द किसी धन की तरह मेरे जेहन से टकराया था ।

" य. . . ये तो हैलीकॉप्टर की आवाज है मैडम ।" एकाएक कलाइव के होठों से निकला ।

"हा ।" . . .

' कहने के साथ ही मैंने आवाज की दिशा में देखा । '

. तभी जैसे उस दिशा से एक हैलीकाॅप्टर मानो जादू के जोर से प्रकट हुआ था और वह तेजी से हमारी तरफ बढने लगा था ।

वह सेना का हेलीकॉप्टर था ।

हैलीकाॅप्टर को देखकर मुझे रत्ती भर भी आश्चर्य नहीं हुआ था । क्योंकि पैं पहले से ही जानती थी कि हम लोगों की तलाश शुरू हो चुकी होगी । खतरा तो आना ही था, लेकिन खतरा इतनी जल्दी जा जायेगा । इसकी मुझे उम्मीद नहीं थी ।

"अब कया करें ?" क्लाइव फुसफुसाया ।

"हमें खुद को बचाना है, इस वक्त हम खुले में हैं । हैलीकॉप्टर में सवार सैनिकों की निगाहें हम लोगों पर पड़ सकती हैं । उस स्थिति मेँ हम _मुसीबत में फंस जायेंगे । सिर्फ इतना ही नहीं, बल्कि हमारी जान को भी खतरा हो सकता है । सेनिक हथियारों से लेस होंगे ।"

" वो तो होगे, लेकिन हमें करना क्या है?"

"उठै ।" मैं स्प्रिंग लगे खिलौने की तरफ़ उछलकर खडी हुई और सिगरेट फेंककर लगभग चीखती हुई बोली…"इससे पहले के हम लोग सैनिकों की निगाहों में आयें, जल्दी से दायी तरफ उन झाडियों में पहुचो ।"

कहने साथ ही मैं उनं झाडियों की तरफ़ भागी ।

क्लग़इब ने भी बला की फुर्ती दिखाई ।

हम यूं भाग रहे थे मानो एकाएक हमारे प्रैरों में पंख उग आये हो. ।

और अभी हम झाड्रियों से बीस कदम दूर थे कि-एक और हेलीकॉप्टर आसमान मे दिखाई दिया । वह दूसरी दिशा से गड़गड़ाता हुआ चला आ रहा था ।

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"एक और हेलीकॉप्टर आ रहा है मैडम ।" क्लाइव ने कहा ।

"मैं उसे देख चुकी हूं । तुम जल्दी से झाडियों में जाकर छिप जाओ ।" मैंने आदेश भरे स्वर में कहा ।

"और आप ।"

"मैं भी आ रही हूं।" मैं भागती हुई बोली-"फालो मी ।"

क्लाइव ने मेरा अनुसरण क्रिया ।

हेलीकॉप्टर करीब पहुंचते जा रहे थे ।

इससे पहले कि हैलीकॉप्टर हमारे ऊपर पहुंचते, हम उन धनी कंटीली झाडियों में दाखिल हो चुके थे । झाडियां इतनी लम्बी और ऊंची थीं कि उनकी शाखाओं ने हमें पूरी तरह छिपा लिया था ।

अन्तत: हैलीकॉप्टर में मौजूद सैनिकों की निगाहें हम पर नहीं पड़ सकतीं थीं ।

परन्तु झाडियों के नुखीले कांटों ने हमारे जिस्मो को जगह-जगह से घायल कर दिया थे । कपड़े जगह-जगह से फट चुके थे । पीड़ा से बुरा हाल था, मगर फिर भी हम दम साधे बैठे थे ।

" कहीं सैनिकों ने हमें झाडियों में घुसते हुए देख तो नहीं लिया है ।" क्लाइव ने पुछा ।

"अगर उन्होंने हमेँ देख लिया होता तो अब तक हैलीकॉप्टर से झाडियों पर गोलियों की बारिश हो रही होती ।" मैंने कहा--" 'लेकिन हम लोगों का ज्यादा देर तक झाडियों में छिपे रहना ठीक नहीं होगा । हो सकता है कि कुछ देर बाद यहाँ पैदल सैनिक भी पहुँच जायें । उस स्थिति में ये यहां का चप्पा चप्पा छान मारेंगे ।"

"फिर तो हमें जल्दी ही अपने बचाव का कोई-न कोईं-रांस्ता सोचना चाहिये ।" बह बोला ।

"क्या सोचें? जब तक ये हेलीकॉप्टर हमारे सिरों पर उढ़ रहे हैं, तब तक हम कुछ भी नहीं कर सकते ।" मैंने कहा-"पहले हमें हैलीकाॅप्टरो से पीछा छुड़ाना है ।"

"पीछा छुडाने में हमेँ कौन-सा ज्यादा वक्त लगना है?, हमारे पास गर्ने हैं । हम हैलीकाॅप्टरो को नीचे गिरां सकते हैं ।" वह कठोर लहजे में बोला---"' आप कहें तो में ये शुभ काम कर डालूं "

" ऐसी गलती लकर भी मत करना क्लाइव ।" मैंने उसे सख्ती से कहा----"' तुमेन गोलियाँ चलाईं तो सैनिकों को हमारी यहां मौजूदगी के बोरे में मालूम हो जायेगा और हमारे ऊपर मौत बरसने लगेगी । हम बच नहीं पायेंगे । झाडियों में हमारी गोलियों से छलनी लाशें पडी होंगी ।"

हेलीकॉप्टर बराबर उस जगह के ऊपर मंडरा रहे थे । वक्त की रफ्तार मानो बेहद सुस्त हो गई थी । एक-एक पल सदियों से भी लम्बा प्रतीत हो रहा था । फिर बीस मिनट गुजरते-गुगरते हैलीकाॅप्टरो की आवाज दूर होने लगी । संतोष की गहरी सांस ली ।

कुछ पलों बाद आबाज एकदम गायब हो गई थी ।

हम दम साधे यथास्थान बैठे रहे ।

"हेलीकॉप्टर चले गये ।" बोला क्लाइव-" "अब हमें झाडियों से बाहर निकल जाना चाहिये ।"

"अभी नहीं क्लाइव ।"

" क्या आपको उम्मीद है कि हेलीकॉप्टर फिर वापस आ सकते है ।"

इससे पहले कि में कुछ कह पाती, मेरे कानों से एक तेज स्वर टकराया-"हेलीकॉप्टर से मेसेज मिला है कि रीमा भारती, क्लाइव के साथ यहीँ आसपास कहीं छिपी हुई है । उसे तलाश करो । वो हरामजादी बचकर नहीं निकलनी चाहिये । उस उल्लू की पट्ठी ने हमारा सारा काम बिगेढ़कर रख दिया है ।"

"फिर तो मार्शल साहब भी उस हररमजादी की गिरफ्त में होंगे ।" इस बार दूसरा स्वर उभरा !

"नहीं ।" जवाब में पहले व्यक्ति का स्वर उभरा-"मार्शल साहब अब इस दुनिया में नहीं हैं । हैलीकाॅप्टर से मेसेज मिला है कि उनकी गोलैयो से छलनी लाश एक खाई में पडी हुई पाई गई है ।"

जाहिर था कि हेलीकॉप्टर में सवार सैनिकों ने मार्शल की लाश को खाई से बरामद कर लिया था ।

मैंने सोचा क्या था और हो क्या गया? "

सोचा था सैनिकों को पता नहीं चल पायेगा कि हम लोगों की स्थिति क्या है । लेकिन सैनिकों की निगाहें लाश पर पड़ चुकी थीं । मैंने इस बारे में ज्यादा दिमाग खराब करना उचित नहीं समझा था । अब हमें वहाँ से सुरक्षित निकलना था ।

" 'तुम लोग इस तरफ़ जाओ और तुम उस तरफ ।" वातावरण में आदेश भरा स्वर उभरा--"और बचे हुए उन झाडियों में जाकर देखो । वे झाडियों में भी छिपे हो सकते हैं । गो हरिअप ।"

मैं सतर्क हो उठी । वे सैनिक गिनती में कितने होगे । इस बात का अंदाजा लगाना मुश्किल था । वे दस भी हो सकते थे और पचास भी ।

फिलहाल मेरा इरादा उन सैनिकों से टकराने का नहीं था । मुझे क्लाइव के साथ यहां से सुरक्षित निकलना था ।

"अब जल्दी से कुछ करो मेडम ।" क्लाइव ने कहा--"" सैनिक झाडियों के करीब आ गये तो हम लोग नहीं बचेंगे-!"

"घबराओ मत । मेरे होते हुए वे लोग तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकते क्लाइव ।"

"मुझे अपनी नहीं, आपकी चिन्ता है मेडम !" अगर मैं मारा भी गया तो कोई गम नहीं है । मुझे इस बात की खुशी होगी कि मैं अपने मुल्क के काम आया ।"

"मुझे तुम जैसे शख्स पर गर्व है क्लाइव ।" मैंने प्रशंसा भरी निगाहों उसकी तरफ देखा‘ 'जिस मुल्क में तुम जैसे. देशभक्त और जांबाज लोग मौजूद हैं, वो कभी गुलाम नहीं रह सकता । अपनी आंखों से इस मुल्क में अमन-चैन देखोगे । आजादी देखोगे क्लाइव । सत्य की हमेशा जीत होती है ।"

क्लाइव खामोश हो गया । .

"मेरे साथ आओ क्लाइव ।" मैं उठकर झाडियों में एक तरफ़ बढी ।

क्लाइव मेरे साथ हो लिया ।

कंटीली झाडियों में आगे बढना हमारे लिये कठिन हो रहा था । कांटे हमारे आगे बढने में बाधक सिद्ध हो रहे थे । लेकिन हमारा बढ़ना नहीं रुका । हम' लगातार आगे बढते रहे ।

कुछ देर बाद हम झाडियों से बाहर निकले । सामने खुली जगह थी । मेरा इरादा सामने पहाडियों तक पहुंचने का था । उन पहाडियों

से सुरक्षित जगह. मुझे दूसरी दिखाई नहीं दी थी ।

मैं जान छोडकर पहाडियों की तरफ भागी । क्लाइव मेरे साथ भागा । हम यूं भाग रहे थे जैसे हमारे पीछे सैकडों भूत लगे हों । हमारी रफ्तार देखते ही बनती थी ।

और हम सुरक्षित उन पहाडियों में पहुंच ही गये । जहाँ हम . ठिठके वहां एक गुफा-सी थी । इस वक्त भाग्य हमारा साथ दे रहा था । उस गुफा के आसपास घने पेड़ थे । इतने ज्यादा घने कि आसमान भी दिखाई नहीं है रहा था । …

. , उन पहाडियों तक पहुंचने के लिये बामुश्किल एक मिनट का वक्त लगा होगा । हम यहाँ किस स्पीड से पहुचे होंगे, इसका अन्दाजा इस बात से लगाया जा सकता था कि हमारी सांसें बुरी तरह से उखढ़ चुकी थीं । . . एके क्षण गंवाये बगैर हम उस-गुफा में घुस गये ।

मुझे कदमों की आहट सुनाई दी, जो उसी गुफा की तरफ आ रही थी ।

मैं सतर्क हो उठी ।

मुझे अंदाजा लगाने में एक क्षण से ज्यादा का वक्त नहीं लगा था कि बो कदमों की आबाज सैनिकों के अलावा और किसी की नहीं हो सकती थी ।

आहटें करीब और कंरीब आती जा रही थीं ।

" अब हमें हेलीकॉप्टर से देखे जाने का डर नहीं था । हां, हम सैनिकों की नज़र में अवश्य आ सकते थे, । मैं सैनिकों के पहुंचने का इन्तजार करने लगों ।

"इन. पहाडियों में देखो ।" सहसा वातावरण में एक आदेश भरा स्वर गूंजा… "वे पहाडियों में भी छिपे हो सकते हैं ।"

" कठिनाई से एक पल भी नहीं गुजरा था कि कदमों की आहटें गुफा के करीब आकर रुक गई थीं । . .

मैंने उस तरफ देखा ।

… . वे आठ सैनिक ये । सभी हथियारों से लेस थे । मेरी आँखे शिकारी बिल्ली की तरह चमक उठी थी ।
 
आठो सैनिकों की निगाहें हमारी तलाश में चारों तरफ घूम रही थीं । दो सैनिकों की निगोहें घूमती हुई उस गुफा पर स्थिर होकर रह गई, जिसके भीतर हम छिपे बैठे थे ।

" वो रही !" एक सैनिक हर्षित स्वर में बोला ।

अब मुझे कुछ-न कुछ करना था । सैनिकों ने हमें देख लिया था ।

किसी क्षण उनके हाथों में दबी गने गरज सकती थीं ।

क्लाइव ने मेरी तरफ देखा, मैं उसका अभिप्राय समझ गई थी । वह पूछ रहा था कि खतरा सामने है । अब क्या करें?

"भून डालों हरामजाद्रों को ।" मैं बोल उठी ।

अगले क्षण ।

हमारे हाथों में दबी गर्ने. गरज उठी ।

'तढ़.. .तढ़.. .रेट. .रेट... !'

गोलियों कीं तढ़तड़ाहट के बीच इन्सानी चीखे गूंजी ।

आठो सेनिक होठों से हदय-विदारक चीखे उगलते हुए पीछे की तरफ उलट गये । हम लोगों ने उन्हें कुछ करने का मौका ही नहीं दिया था ।

" गोलियों किधर से चलीं हैं !" वातावरण में एक तेज स्वर गुजां ।

"पहाडियों की तरफ से चली हैं ।" दूसरा स्वर मेरे कानों से टकराया ।

"पहाडियों को घेर लो ।" कोई चीखा-" भागों ।"

और फिर दूसरे क्षण वातावरण में भारी बूटों की आवाजें गूंजती चली गई

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गोलियों चलने की आबाज वातावरण में सुनी गई थी , लेकिन हम मजबूर थे । हमारे सामने गोलियों चलाने के अलावा रास्ता भी तो नहीं था, अगर हम गोलियां न चलाते तो सैनिक मार डालते ।

"सैनिक आ रहे हैं मैडम !" क्लाइव बोला ।

"आने दो । हमें तैयार रहना है ।" मैंने जवाब दिया-"उनमे' से कोई भी जिन्दा नहीं बचना चाहिये । पहले हम सैनिकों से निबर्टेगे उसके बाद अगले कदम के बारे में सोचेंगे ।"

क्लाइव खामोश हो गया ।

हम सैनिकों के पहुंचने का इन्तजार करने लगे ।

देखते ही-द्रेखते गुफा के सामने सैनिक प्रकट हुए ।

मैंने सैनिकों को गिना । वे: संख्या बारह थे । सेनिक पथराये खड़े अपने साथियों की गोलियों से छलनी लाशो को देख रहे थे ।

अभी तक वे हमें देख नहीं पाये थे ।

अपने साथियों की लाशें देखकर उनको तो जैसे लकवा मार गया था । हमारी निगाहें सैनिकों पर थीं ।

"इ.. .इन दोनों को किसने मार डाला?" कई पलों बाद एक सैनिक के होठों से आश्चर्य भरा स्वर निकला ।

"ये काम उसी जासूस रीमा भारती का है ।" दूसरे सेनिक ने कहा--" उसे तलाश करके कुत्ते की मौत मार डालो । वो शर्तिया इन्हीं पहाडियों में कहीं छिपी है ।“

मैं व्यंग से मुस्कुराई ।

"मुझे मारने का इरादा रखते हो मिस्टर ।" एकाएक मैं बोल उठी ।

वे उछल पड़े । पलक झपकते ही उनकी निगाहें आबाज की दिशा में घूम गई ।

"यहां छिपी बैठी है हरामजादी ।" उस सैनिक के होंठों से कि गुर्राहट निकली, फिर बह अपने साथियों को सम्बोधित करते हुए बोला-----"देख क्या रहे हो? इसे गोलियों से भून डालो ।"

इससे पहले कि सैनिक हम लोगों पर हमला करते । हमारे हाथों में दबी गने गर्ज उठी ।

तड.....तड़.. ..रेट .रेंट…

गोलियां उनकी तरफ झपटीं ।

सैनिक होठों से हौलनाक चीख उगलते हुए पीछे की तरफ उलटने लगे ।

हमने उनमें से किसी को भी संम्भलने कां मौका नहीं दिया था । कुछ पलो बाद वहाँ उन सैनिकों की लाशें बिखरी नजर आ रही थी ।

"अब यहां से हिलो क्लाइव । अब हमारा यहां एक पल भी रुकना खतरनाक हो सकता है ।" मैंने कहा----"गुफा से निकलकर अपनी मंजिल की तरफ बढो ।"

"ओ०के० मेडम ।"

हम गुफा से बाहर निकल आये । मैंने अपनी गन चेक की । मेरी गन खाली हो चुकी थी । मैंने गन फेंककर एक सैनिक की लाश के पास से गन उठा ली ।

हम पेडों के नीचे से गुज़रते हुए आगे बढे गये । उस तरफ खाली जगह थी ।

रास्ता ऊबड़-खाबड़ था ।

मैं पाले से कहीं ज्यादा सतर्क हो उठी थी ।

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न्यू

हम लगातार आगे बढ़ रहे थे ।

खतरा बढ गया था ।

अचानक मेरे पेरों में ब्रेक लग गये । मेरे हाथों की पकड़ गन पर मजबूत होती चली गई ।

वजह ।

हमारे बायी तरफ धनी झाड्रियां थीं । उन झाडियों में हल्की-सी सरसराहट हुई थी । जिसे मेरे वायरलेस बने कानों ने साफ साफ सुना था ।

मेरे ठिठकते ही क्लाइव भी ठिठक गया था । वह सतर्कता की मूर्ति नजर आ रहा था । उसने अपनी गन का रुख उसी तरफ कर दिया था । जाहिर था कि उसने भी सरसराहट सुन ली थी । हम अगले पाच मिनट तक यूं ही दम साधे सतर्कता की मुर्ती बने खडे रहे, फिर न तो दोबारा झाडियाँ ही हिलीं ओर न ही सरसराहट सुनाई दी ।

"झाडियों में सरसराहट क्यों हुई थी?" क्लाइव फुसफुसाया । ।

"कोई जंगली जानवर होगा ।" मैँ बोली ।

"मुझे तो गढ़बड़ लगती है ।"

"क्या गड़बड़ हो सकती है?"

"झाडियों में सैनिक भी छिपे हो सकते हैं ।"

"पागल हो !" मैंने कहा…"ये तुम्हारा वहम है, अगर झाडियों में सैनिक छूपे होते तो अब तक हमारे ऊपर हमला कर चुके होते ।

आगे बढो ।।।

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