फिर मैंने गन क्लाइव पर तान दी । क्लाइव ने एक गहरी सांस लेकर आंखें बन्द कर लीं और शरीर ढीला छोड़ दिया । मानो उसे यकीन हो गया था कि मैं उसे वाकई गोली मारने जा रहीँ थी ।
परन्तु तभी, मैंने पासा पलंट दिया ।
एकाएक मैं एडियों पर घूमी ।
और.......
पलक झपकते ही मैंने गन की नाल मार्शल के सीने से सटा दी ।
मार्शल बुरी तरह से उछल पड़ा-"य. . .ये क्या हरकत है रीमा?"
"इसे हरकत नहीं, गन कहते हैं मार्शल !" मैंने बर्फ की मानिन्द सर्द स्वर में कहा-"और जब ये चलती है तो इसकी गोली ये नहीं देखती कि तो क्लाइव जैसे क्रान्तिकारी के सीने में उतर रही है या तुम्हारे जैसे किसी फौजी कुत्ते के सीने में । इसलिये कोई गलत हरकत मत करना ।"
मार्शल का चेहरा पीला पड़ता चला गया ।
उसके साथ आये कमाण्डो और जेल अधिकारों बुरी तरह बौखलाये नजर आ रहे थे ।
उधर क्लाइव ने भी फटाक से आँखे खोल दी थीं और वह हैरत से मुंह बाये इस बदले दृश्य को देख रहा था ।
"माफ़ करना क्लाइव दोस्त ।" मैंने कहा-"तुम्हारी जो हालत हुई है, उसके लिये मैँ जिम्मेदार हूँ लेकिन मैं करती भी क्या? मुझे मज़बूरी में तुम्हारे साथ ऐसा करना पडा था । मेरा मकसद डगलस तक पहुंचना था और बरनाड नाम के कमाण्डर से मुझे जेल की सुरक्षा व्यवस्या के बारे में जो जानकारी मिली थी, उसे भेदने का मेरे पास सिर्फ यही एक रास्ता था । मैंने तुम्हें कुर्बानी का बकरा बना दिया ।"
क्लाइव अजीब निगाहों से मेरी तरफ देखता रह गया था । किन्तु उसकी आँखों में मेरे प्रति उत्पन्न नफरत के भाव गायब होते चले गये थे, और उनकी जगह उसके चेहरे पर उभर आये भाव इस बात की चुगली कर रहे थे कि अब उसे मुझसे कोई शिकायत नहीं रह गई ।
"और तुम ये भी समझ चुके होगे क्लाइव कि मेरा जेल में जाने का क्या मसकद है?" मैं पुन: बोली ।
जवाब में क्लाइव, धीरे से हां में गर्दन हिलाकर रह वया ।
अब सब कुछ क्लाइव के सामने खुली किताब की तरह था ।
इधर मार्शल अभी भी नहीं समझ पाया होगा कि मेरा जेल में पहुचने का मकसद क्या है? मैंने उसके साथ जो हरकत की थी और जो कुछ क्लाइव से कहा ।
उसे सुनने के बाद उसकी खोपडी अवश्य अंतरिक्ष में उड़ने लगी-होगी ।।
उधर कमाण्डोज़ के हाथ गनों पर कसे हुए थे और उनके चेहरे के भाव बता रहे थे कि उन्हें सिर्फ एक मौके की तलाश थी ।
"खबरदारा" मैं जहरीली नागिन की तरह फुफकार उठी---" गलत हरकत मत करना, वरना तुम्हारे जिस्म में सुराखन्हीं-सुराख नजर आयेंगे और तुम लोगों की आत्मा ये सोचने पर मजबूर हो जायेगी कि वह किस सुराख से बाहर निकले । इसे मेरी धमकी मत समझना । मेरा नाम रीमा मारती है । मैं जो कहती हूं। वह करके दिखाती हूं ।"
कमाण्डोज के के रंग उड गये ।
"अपने कमाण्डोज़ से कहो मार्शल कि गनें फेक दें ।" मैंने कहा ।
'मार्शल मजबूर था।
"गने फेंक दो ।" उसके होठों से आदेश भरा स्वर निकला ।
दोनों कमाण्डो ने अपने हाथों से गनें फिसल जाने दीं ।
"गर्ने उठा तो क्लाइव ।" मैंने कहा ।
क्लाइव ने दोनों गने उठा लीं ।
वातावरण में पुन: मेरा चेतावनी भरा स्वर गूंजा-"अगर तुम लोगों में से किसी ने भी गलत हरकत करने की कोशिश की अथवा चालाकी दिखाई तो मैं मार्शल को गोलियों से छलनी कर दूंगी और इसकी मौत के जिम्मेदार तुम लोग होगे ।" `
किसी के होठों से बोल नहीं फूटा ।
इसबीच मार्शल संभल चुका था । वह मुझे घूरता हुआ बोला-"तुम्हारी इस हरकत का मतलब… क्या है?"
"मतलब मैं बाद में समझाऊंगी मार्शल ।" ' मैंने उत्तर दिया-"पहले डगलस को यहाँ बुलवाओ ।"
मार्शल मानो आसमान से गिरा ।
उसके चेहरे पर समूचे संसार के आश्चर्य ने एक साथ हमला-सा कर दिया था । मार्शल तो सपने में भी गुमान नहीं होगा कि मैं डगलस को भी जानती हो सकती हू।
"अब ये मत कह देना कि डगलस इस जेल में नहीं है ।" मैं बोली--" मैं जानती हूं कि उसे इसी जेल में रखा गया है । तुम्हीं ने सोल्जर से कहा था क्लाइव को उसी जेल में भेज दो! जिसमें डगलस को रखा गया है ।"
मार्शल के झूठ बोलने का सवाल ही नहीं बचा था ।
"मैं ये नहीं कहूंगा कि डगलस इस जेल में नहीं है । वो इसी जेल में बन्द है, लेकिन तुम डगलस को कैसे जानती हो और ,उससे 'तुम्हारा क्या सम्बन्ध हैं?" मार्शल ने सबाल किया ।
मै तुमहारे हर सवाल का जबाब दूंगी ।
पहले अपने कामाण्डो को आदेश दो कि वो डगलस को यहां: लेकर आए !"
"लेकिन क्यों ?" मार्शल ने गुस्से से दांत पीसे ।
"सवाल मत करो । इस वक्त तुम सवाल करने की स्थिति में नहीं हो और तुम्हारी खैरियत इसी मेँ है कि मैं जैसा कह रही हूँ वैसा करते जाओ ।"
“अगर मैं डगलस को यहां न बुलवाऊं तो?" वह दिलेरी का परिचय देता हुआ बोला ।
"तो मैं तुम्हें गोली मार दूंगी ।"
"मुझे गोली मारने का अंजाम जानती हो?"
" अंजाम की परवाह होती तो मैं इस देश में कदम ही क्यों रखती मार्शल? फिलहाल तो तुम अपने अंजाम के बारे में सोचो । मेरे इशारे करने भर की देर है । क्लाइव तुम्हें गोलियों से भून डालेगा । ये तो पहले ही तुम लोगों से खार खाए बैठा है । ये जानता है कि तुम मिलेट्री के चीफ हो, अगर तुम मर गये तो सेना के हौंसले पस्त हो जायेंगे और बाजी सर एडलॉंफ़ के समर्थकों के हाथों में होगी ।"
मार्शल खामोश रहा ।
"जल्दी डगलस को वुलवाओ, वरना मेरे सब्र का प्याला छलक जायेगा और वो स्थिति तुम्हारे लिये खतरनाक होगी मार्शल । मेरे बारे में सब कुछ जानते हो । मेरी बात न मानने का मतलब मौत होता है ।"
मैं गन की नाल -उसके माथे से सटाती हुई सर्द स्वर में कह उठी ।
क्या मजाल कि मार्शल के चेहरे पर खौफ का एक भी भाव उमरा हो । वह बडी दिलेरी-के साथ बोला-"मुझे धमकाने की कोशिश मत करो रीमा । मैं तुम्हारी गीदड़ भभकियों से डरने वाला नही हूं !"
" डरोगे तो उस वक्त जब रीमा भारती तुम पर कहर बनकर । तुम क्या समझते हो मैं डगलस तक नहीं पहुच पाऊँगी । वो इसी जेल में है । उसे तो मैं देर-सबेर तलाश कर ही लूंगी, लेकिन तुम बेमौत मोरे जाओगे मार्शल ।"
"तो फिर कर तो न तलाश । मुझें बार-बार धमकाने की कोशिश क्यों कर रही हो?"
मैं पहले ही जानती थी कि मार्शल इतनी आसानी से डगलस को वहां बुलाने वाला नहीं है । आखिर वो भी एक जीवट बाला इंसान था । लेक्रिन मैं क्या कम हू? मेरे हाथ' में सुनहरी मौका था । मैं उस मोके को भला कैसे केश न करती? …
बैसे इस वक्त मार्शल उस पल को अवश्य कोस रहा होगा । जब यह मेरे जाल में फंस कर मुझे क्लाइव का मुंह खुलवाने के लिये इस सबसे सुरक्षित जेल में ले आया था । लेकिन अब उसके पछताने से कुछ होने वाला नहीं था । तीर तो कमान से निकल चुका था । फिलहाल बाजी मेरे हाथ में थी ।
"तुम इस वक्त एक तरह से शेर की मांद में खडी हो लड़की ।" पहली बार वहां मौजूद एक जेल अधिकारी ने अपना मुंह खोला-"मार्शल साहब को छोड़ दो, वरना अंजाम बहुत बुरा होगा ।"
"पैं मार्शल को किस खुशी में छोड़ दूं?" "मैंने मजे लेने वाले अंदाज में पूछा ।
"अगर तुम ये समझ रहीं हो कि तुम मार्शल साहब का कुछ बिगाड़ पाओगी तो ये तुम्हारी वहुत बडी गलतफहमी है ।" इस बार दूसरा गुर्राया---" तुम यहां से जिंदा बचकर नहीं निकल सकती ।"
"तुम भी मेरी एक बात कान खोलकर सुन लो मिस्टर ।" मैंने जवाब 'दिया-"मेरा नाम रीमा भारती है । भारत की सबसे महत्वपूर्ण जासूसी संस्था की नम्बर वन ऐंजट । आज तक जिस किसी ने भी मेरे काम में टांग र्फसाई है । मैंने जिंदा नहीं छोड़ा है , तुम किस खेत की मूली हो, अगर तुम लोग बेमौत मरना नहीं
चाहते हो तो चुपचाप तमाशा देखते रहो ।"
उसने तुरंत अपने होठ भीच लिये । कदाचित मेरा परिचय सुनकर उसके देवता कूच कर गये थे ।
"'त...तो तुम एजेन्ट रीमा भारती हो ।" पहले वाले के होठों से हैरत भरा स्वर निकला ।
" हां, मैं वही रीमा भारती हूं अगर तुम्हें विश्वास नहीं हो रहा है तो मैं तुम्हें लिखकर दूं?"
उस पट्टे के होठों पर भी मानो ताला पड़ गया ।
"अभी तक तुमने अपने कमाण्डोज को डगलस को लाने का आदेश नहीं दिया मार्शल । लगता है कि तुम जिन्दा रहने के मूड में नहीं हो ।”
"मेरी बात तो सुनो... ।"
"में कुछ सुनना नहीं चाहती ।" मैं उसका वाक्य बीच में ही काटती हुई फूंफकारी-"इंकार का मतलब है तुम्हारी मौत ।"
उसकी आँखों में साक्षात् मौत नृत्य करने लगी ।
" मैं ट्रेगर दबाऊं या डगलस को बुलवात्ते हो।" मैंने पूछा । मांर्शलं की सारी दिलेरी धरी की धरी रह गई ।
" ट्रेगर मत दबाना ।" उसके होठों से अजीब-सा फंसा फंसा स्वर निकला-----" मै डगलस को बुलबाता हू !"
मेरा चेहरा सफलता से चमक उठा-" तो देख क्या रहे हो? बुलबाओ ।' "
" 'प. . . पहले गन की नाल मेरे मुंह से बाहर निकालो ।"
मैंने गन वापस खींच ली ।
"डगलस को लेकर आओ ।" मार्शल जेल अधिकारियों से आदेश भरे स्वर में बोला ।
जेल अधिकारी पलटकर भागे ।
इस बीच मैं एक क्षण के लिये भी असावधान नहीं हुई थी । मेरी निगाहें बराबर मार्शल और उसके कमाण्डो पर जमी हुई थीं ।
"मेरी एक बात सुनो ।" मार्शल बोला ।
"अब तुम अपनी हर बात सुना सकते हो । मैं तुम्हारी सारी बकवास सुनने के लिये तैयार हूं!"
"तुम जो कर रही हो अच्छा नहीं कर रही हो रीमा । अब तुम्हारी जिन्दगी की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है , ये मत भूलो कि इस वक्त भी तुम्हारी जिन्दगी मेरी मुट्ठी में है । मेरे रहमो-करम पर जिंदा हो । अगर मैं तुम्हारी जिदगी की गांरटो ले सकता हुं तो तुम्हें-मौत के, मुंह में भी पहुंच' सकता हूँ । तुम्हारी अपनी ही जासूसी संस्थान आई०एस०सी० तुम्हारी दुश्मन वन चुकी है । उसे बड्री शिद्दत से तुम्हारी तलाश है । अगर मैं उन्हें खबर कर दूं कि तुम मडलैण्ड में हो तो जानती हो क्या होगा?"
"क्या होगा?" मैंने मुस्कराते हुए पूछा।
" वे लोग तुम्हें हांसिल हासिल के ऐडी चोटी का जोर लगा देंगे, और जैसे तुम उनके हाथ आई तुम्हें जिन्दगी भर एडिया रगड़ने के लिये किसी अज्ञात जेल में डाल दिया जायेगा या फिर हो सकता है कि तुम्हें बडी खामोशी से मार डाला जाये । अभी भी वक्त है अगर तुम जिंदा रहना चाहती हो तो अपने खतरनाक इरादों से बाज आ जाओ ।"
मै दिल खोलकर हंसी ।
बह अजीब निगाहों से मेरी तरफ़ देखता हुआ होता---".,हंस रही हो ।' मैंने गलत नहीं कहा है । अगर तुम्हें अई एस सी को सोंप दिया गया तो तुम इतिहास की चीज बन जाओगी । लोग जान भी नहीं पयेयेंगे कि कभी आ०एस०सी० में रह चुकी नम्बर बन एईजेन्ट रीमा भारती अचानक दुनिया के तख्ते से कहां गायब होगई ?"
" तो मुझे आई०एसं०सी को सौपने का इरादा रखते हो मार्शल ?" मैंने पूछा ।
"अगर तुम अपने इरादों से बाज नहीं आई तो मुझे ऐसा ही करना पडेगा ।"
"तुम कह चुके मार्शल ।"
"हां ।"
"अब तुम मेरी बात सुन लो ।"
" सुनाओ ।"
"मैंने सोल्जर को अपने बारे में जो कुछ बताया था, वो सब झूठ था । न तो मैंने आई०एस०सी० छोडी और न ही मैंने कोई जुर्म किया है । वास्तव में मैंने तुक तक पहुंचने के लिए एक झूठी कहानी गढकर सोल्जर को सुनार थी ।"
"तुम सरासर बकवास कर रही हो । अपनी मौत के डर से झूठ बोल रही हो तुम ।" उसने कहा… " 'उस वत्त मुझे तुम्हारी कहानी पर विश्वास नहीं हुआ था । मैंने सोल्जर से हिन्दुस्तान में अपने एक पहुंच वाले सोर्संजे से तुम्हारी कहानी के बारे तस्दीक करने के लिये कहा था और फिर तल्दीक होने के बाद ही मैंने तुम्हें अपने करीब फटकने दिया था ।"
"तुम्हारे सोर्स ने तुम्हें गलत रिपोर्ट नहीं दी थी मार्शला दरअसल उस बेचारे को भी आई०एस०सी० से यही मालूमात हासिल हुई होगी । क्योंकि अपनी योजना पर अमल शुरु करने से पहले ही ट्रांसमीटर पर अपने चीफ से सम्पर्क करके उसे सब कुछ समझा दिया था । मैं जानती थी कि तुम तस्दीक किये बगैर मानने वाले … नहीं हो, इसलिए मैंने पहले ही पुख्ता इंतजाम कर दिया था । फिर तुम्हें 'वहीँ' सुनने को मिला, जो मै तुम्हें सुनाना चाहती थी और तुम जाल में फंस गये मार्शल !"
मेरी बात सुनकर नि:संदेह मार्शल की खोपडी फिरकनी की तरह नाचकर रह गई होगी ।
"म. . .मगर तुम्हें ये सब करने की क्या ज़रूरत आ पडी थी ?" मार्शल के होठों से वहीं कठिनाई से निकला !
उसी क्षण । जेल अधिकारियों से घिरे डगलस ने भीतर कदम रखा । वार्तालाप बीच मे ही रूपक गया ।
डगलस की निगाहें हम लोगों के ऊपर चकराती चली गई । उसके चेहरे परे उलझन के भाव थे ।
कदाचित वह समझ नहीं पा रहा था कि माजरा क्या है और उसे यहाँ क्यों लाया गया ।।
उसकी हालत देखकर लग रहा था कि उसे भी भयानक यातनाओं के दौर से गुजरना पंढ़ रहा था ।
कुछ पल के लिये ,वहां खामोशी ने अपने पांव पसार दिये थे ।
डगलस की घूमती निगाहे मेरे चेहरे पर स्थिर होकर रह गई । चेहरे पर सोच के भाव उभर आये थे । जाहिर था उसकी सोचों का केन्द्र मैं ही थी ।