रात के 8 बजे, तरह तरह की रोशन से जगमगाता शहर बहुत खूबसूरत लग रहा था।
राज खिड़की के पास चुपचाप खड़ा, नीचे सड़कों पर रात की चहल पहल को देख रहा था। दोनों तरफ़ लगे स्ट्रीट लाइट्स की सुनहरी रोशनी में भीगी सड़क पर हज़ारों गाड़ियाँ सरपट दौड़ रही थीं। गाड़ियों के हेडलाइट्स की रोशनी और हॉर्न की आवाज़ सड़क पर रौनक को बरक़रार रखे हुए थे। चौड़ी सड़क के दोनों ओर बड़े बड़े शॉपिंग मॉल्स और आलीशान होटल्स थे जिनका वैभव काबिल-ए-तारीफ़ था। शहर में पले बढ़े होने के कारण राज के लिए ये नज़ारा कोई नयी बात तो थी नहीं | मगर, आज उसके पास वक़्त काटने का इसके अलावा कोई और ज़रिया था नहीं।
राज, डॉ दामले की क्लिनिक में बैठा था। डॉ दामले अपने केबिन में किसी मरीज़ का मुवायना करने में मसरूफ़ थे। डॉ दामले अक्सर राज को सबसे आखिर में अपॉइंटमेंट देते थे ताकि बाकी सारे मरीजों को चलता करने के बाद राज के साथ ज़्यादा से ज़्यादा वक़्त गुज़ार सकें। डॉ दामले और राज की बड़ी पुरानी दोस्ती थी। 10 साल की उम्र में राज ने जब अपनी माँ को खो दिया, तब उस सदमे से उबरने में डॉ दामले ने उसकी बहुत मदद की थी। बस, तब से दोनों बड़े अच्छे दोस्त बन गए। राज उन्हें प्यार से ‘डॉक’ बुलाता था और वो राज को ‘चैम्प’ बुलाते थे |
राज के लिए डॉ दामले उसके पिता समान थे। रही बात डॉ दामले की तो अपना कहने को उनके पास राज क अलावा और कोई नहीं था। बड़ी छोटी उम्र में पिता को खो देने के बाद पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी उन पर आ पड़ी। छोटे भाई बहनों का घर बसाते बसाते, उन्हें ख्याल ही रहा कि कब उनकी उम्र ढ़ल गयी। उनकी इस भूल का नतीजा ये हुआ कि अब 60 की उम्र में 25 साल के बैचलर की मस्त मौला ज़िन्दगी का लुत्फ़ उठा रहे हैं, डॉ दामले।
"आप अंदर जा सकते हैं, सर," रिसेप्शन पर बैठी डॉ दामले की कमसिन सेक्रेटरी जूली ने बड़े सेक्सी अंदाज़ में राज को सर से पाँव तक देखा।
राज ने उसके नापाक मंसूबों को नज़रंदाज़ किया और डॉ दामले के केबिन की तरफ़ बढ़ गया।
"क्या मैं अंदर आ सकता हूँ, Doc?" केबिन के दरवाज़े से अंदर झाँकते हुए राज ने पूछा ।
"अरे, आओ, मेरे चैम्प!" डॉ दामले की बूढ़ी आँखें खुशी से झिलमिला उठीं। "आज कल आपके दर्शन तो सिर्फ़ टी वी चैनल पर ही होते हैं। बहुत बड़े सेलेब्रिटी जो बन गए हो। आज इस बूढ़े डॉक्टर की याद कैसे आ गयी?"
"याद तो आपकी हमेशा आती थी, Doc," राज कुर्सी पर बैठ गया और बोला, "मगर, काम में इतना बीज़ी हो गया कि वक़्त ही नहीं निकाल पाता था।"
"तो अब कैसे निकल आया वक़्त?" नाक पर लटकती मोटी ग्लास के चश्मे से डॉ दामले की आँखें राज के मन में झाँकने की कोशिश कर रही थीं।
"कुछ दिनों से मेरे साथ कुछ अजीब सा हो रहा है," कहते हुए राज का चेहरा उतर गया और उसने नज़रें झुका लीं।
"बात क्या है, चैम्प?" डॉ दामले के माथे पर सिलवटें पड़ी, "बड़े परेशान लग रहे हो।"
राज खुद ही समझ नहीं पा रहा था कि वो डॉ दामले को क्या समझाए? उसके साथ जो हो रहा था उसे कैसे बयाँ करे? कहाँ से शुरू करे और क्या क्या बताए? इसी उधेड़बुन में खोये राज ने बिना कुछ कहे सर झुका लिया।
"देखो, चैम्प," डॉ दामले की आवाज़ में पिता का प्यार झलक रहा था। "तुम खुलकर मुझे सब कुछ बताओगे तो ही मैं तुम्हारी मदद कर पाऊँगा। ऐसे चुप रहने से काम नहीं चलेगा।"
Doc के दबाव देने पर राज ने अपना सारा हाल के सुनाया।
"हम्म..."
राज की बातें आराम से सुनने के बाद डॉ दामले बोले, "देखो चैम्प, इसमें घबराने या परेशान होने वाली कोई बात नहीं है। तुम, भानुगढ़ के किले पर शो कर रहे हो और इसके लिए तुमने उस किले पर काफ़ी रिसर्च भी की है। दिन रात बस तुम उस किले और उसके इतिहास के बारे में ही सोचते रहते हो। इसलिए, तुम्हें रात को सपने भी उस किले के ही आते हैं। ये तो नॉर्मल सी बात है।"
"और वो लोग कौन हैं जिन्हें मैं रोज़ सपनों में देखता हूँ?" राज ने भौंहें सिकोड़ते हुए डॉ दामले को देखा। "उनसे मैं ना तो कभी मिला हूँ, न उन्हें कभी देखा है तो फ़िर वो मेरे सपनों में क्यों नज़र आते हैं?"
"देखा तो ज़रूर होगा," डॉ दामले ने आह भरी और कहा, "बस, तुम्हें याद नहीं।"
"ऐसा कैसे हो सकता है, डॉक?" राज ने हैरान होकर पूछा, "मेरी याद्दाश्त इतनी भी बुरी नहीं है। अगर मैंने उन लोगों को कहीं देखा होता तो मैं उन्हें ज़रूर पहचान लेता। हाँ, ये हो सकता है कि मुझे उनके नाम याद न हों मगर इतना ज़रूर याद रहता कि मैं इनसे पहले कहीं न कहीं मिला ज़रूर हूँ।"
“हर रोज़ कितने ही चेहरे हमारी आँखों के सामने से गुज़रते हैं।“
डॉ दामले ने एक गहरी साँस ली और अपने केबिन की खिड़की के पास खड़े होकर बाहर सड़क से गुज़रते ट्रैफिक को देखने लगे ।
"वो चेहरे पल भर के लिए हमारी आँखों के सामने आते हैं और अगले ही पल हमारी यादों से ओझल हो जाते हैं। मगर उनमें से कुछ चेहरे ऐसे होते हैं जो नज़रों से तो ओझल हो जाते हैं पर उनकी छाप, हमारे सबकॉन्शियस माइंड में हमेशा के लिए छूट जाती है। शायद, इसकी कोई ख़ास वजह भी रही होगी जैसे कि कुछ चेहरे जो बेहद खूबसूरत होते हैं या ज़रूरत से ज़्यादा बदसूरत होते हैं या फ़िर शायद कुछ और।"
"जिन चेहरों को तुम अपने सपनों में देखते हो वो भी कभी न कभी, पल भर के लिये ही सही, तुम्हारी आँखों के सामने से गुज़रे ज़रूर होंगे। तुम उन्हें देखकर भूल गए मगर उनकी छाप अब भी तुम्हारे सबकॉन्शियस माइंड में दर्ज है। फ़िर, जब तुमने उस किले के इतिहास के बारे में सुना तो तुम्हारे सबकॉन्शियस माइंड ने उन कहानियों के किरदारों को वो चेहरे दे दिए जिनकी छाप पहले से वहाँ मौजूद थी। अब, तुम्हारी समझ में आयी बात?"
"मगर डॉक," राज की परेशानी और ज़्यादा बढ़ गयी। "मैंने तो उस किले के बारे में बस इतना सुना है कि वहाँ एक भयंकर आग लगी थी जिसमे महल के कई सारे लोग मारे गए। पर मैं जो सपनों में देखता हूँ वो तो कुछ और ही घटना है।"
"सब तुम्हारे दिमाग का खेल है, चैम्प," डॉ दामले, राज के पास आये और उसके कंधे पर हाथ रखकर बोले, "हम कितने ही अजीबोगरीब सपने देखते हैं। ये सपने दरअसल हमारे दिमाग की बुनी कल्पना के सिवाय और हैं ही क्या? आजकल तुम्हारा सारा ध्यान उस किले पर लगा है इसलिए तुम्हारे सपने यानी तुम्हारे दिमाग की कल्पनाएं भी उस किले को ही अपना रंगमंच बना रही हैं। यकीन मानो चैम्प, तुम्हें जो सपने आते है वो तुम्हारे दिमाग की बनायी काल्पनिक तस्वीरों के अलावा और कुछ नहीं है। अगर सीधे सीधे शब्दों में कहा जाए तो तुम्हारे सपने सिर्फ़ एक फ़िल्म है, जिसका प्रोड्यूसर और डायरेक्टर तुम्हारा दिमाग है।"
न जाने क्यों राज को डॉ दामले की बातों पर विश्वास कर पाना बड़ा मुश्किल लग रहा था। जो खौफ़नाक मंज़र रोज़ रात को उसकी आँखों के सामने से गुज़रता था क्या वो महज़ उसका वहम हो सकता है? वो, डॉ दामले की बात का कोई जवाब न दे सका और हैरान आँखों से बस उन्हें देखता ही रह गया।
"ठीक है, चैम्प," डॉ दामले ने मुस्कुराते हुए राज की पीठ पर धौल दी और कहा, "तुम्हारे सारे सवालों का जवाब तुम्हें हिप्नोसिस के ज़रिए मिल जाएगा।"
"हीप्नोसिस?" राज चौंक गया, "मगर वो क्यूँ?"
"हिप्नोसिस का नाम सुनकर चौंकने की कोई ज़रूरत नहीं है," डॉ दामले, राज का सहमा हुआ चेहरा देखकर मुस्कुरा उठे। "ये तो बस मेडीटेशन करने जैसा है। हिप्नोसिस के ज़रिए हम, तुम्हारे सुबोध मन यानी कॉन्शियस माइंड को गहरी नींद सुला देंगे ताकि वो तुम्हारे सबकॉन्शियस माइंड पर हावी न हो।"
"उसके बाद तुम्हें पूरा ध्यान सिर्फ़ एक बिंदु पर केंद्रित करना होगा। क्योंकि हमारे सबकॉन्शियस माइंड में भी बहुत सारी यादें दर्ज होती हैं। उन यादों के समंदर में से तुम्हें उन चेहरों को ढूँढना होगा जो तुम्हें सपनों में नज़र आते हैं। देखना तुम्हें सब याद आ जायेगा कि तुमने इन चेहरों को कहाँ देखा? या फ़िर वो लोग कौन हैं? तुम उनसे कब मिले थे वैगरह वगैरह।"
"क्या आप अभी हिप्नोसिस कर सकते हैं?" राज ने फ़ौरन पूछा। "इन सपनों ने मुझे परेशान कर रखा है। और, मैं जल्द से जल्द इनकी हकीकत जानना चाहता हूँ।"
"हाँ, हाँ, ज़रूर," डॉ दामले उठ खड़े हुए और केबिन के कोने में रखे बेड की तरफ़ बढ़े, "यहाँ आओ चैम्प और इस पर आराम से लेट जाओ।"