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Adultery अतीत की खोज

"महाराज भानुप्रतापदेव सारणीया!"

हैरानी के मारे अपने गालों पर हाथ रखे पिंकी बोली। बाबा अमरेश्वर के आश्रम से वापस आकर, राज ने सेनापति वीरभद्र के कत्ल की साज़िश के बारे में जो कुछ बताया था, उस पर विश्वास करना पिंकी को मुश्किल लग रहा था।

"मैंने तो सबको यही कहते सुना है कि महाराज बड़े नेकदिल इंसान थे।" पिंकी ने पास बैठे राज को देखा, "वो ऐसा कर सकते हैं, मैं तो सपने में भी नहीं सोच सकती।"

"स्वार्थ इंसान से क्या क्या नहीं करवाता, पिंकी दीदी," राज ने आह भरी।

"बिल्कुल सच कहा आपने," कहकर पिंकी थोड़ी देर के लिए चुप हो गयी। और फ़िर बोली, "मगर राज बाबू, इसे बीती बात समझकर भुलाया नहीं जा सकता। परेशानी की बात तो ये है कि महाराज भानुप्रतापदेव का पुनर्जन्म हुआ है। और वो आज भी आपके पास ही कहीं मौजूद हैं। और सिर्फ़ इतना ही नहीं, वो हरगिज़ आपकी शादी शहज़ादी अपराजिता से होने नहीं देंगे। मैं अगर अपनी जान देकर शहज़ादी को फ़िर से जिंदा कर भी दूँ तो भी आप दोनों का मिलन नही हो पायेगा।"

पिंकी ने सोच में डूबे राज को ग़ौर से देखा। वो ज़रा हिचकिचायी मगर फ़िर उसने अपनी बात कह देना ही ठीक समझा।

"राज बाबू," पिंकी ने ज़रा धीमी आवाज़ में कहा, "क्या आपके क़रीबियों में कोई ऐसा इंसान है, जो महाराज भानुप्रतापदेव जैसा लगता हो?"

"मैं आपका मतलब नहीं समझा?" राज ने सर उठाकर पिंकी को देखा।

"देखिए, राज बाबू," पिंकी की नज़रें थोड़ी देर के लिए ईधर उधर गयीं फ़िर राज की ओर लौट गयीं। "हमारे लिए ये जानना बहुत ज़रूरी है कि महराज भानुप्रतापदेव का पुर्नजन्म किस के रूप में हुआ है। इस वक़्त हम सिर्फ़ इतना ही जानते हैं कि वो आपके करीबियों में से ही कोई है। इसलिए आप अपने सभी करीबी दोस्तों और रिश्तेदारों के चेहरों को अपने मन में याद कीजिए। क्या आपको उनमें से कोई भी महराज भानुप्रतापदेव जैसा लगता है?"

"नहीं," राज सोच में डूब गया और उसके माथे पर शिकन पड़ी। "उनमें से कोई भी महाराज भानुप्रतापदेव जैसा तो नहीं है।"

"वैसे भी, कोई ज़रूरी नहीं है कि हमें हर जन्म में वही शरीर मिले," कहते हुए पिंकी ने आह भरी।

"तो फ़िर हम महाराज भानुप्रतापदेव को कैसे पहचानेंगे?" राज परेशान हो उठा।

"चलिए, वो सब छोड़िए," पिंकी को एक नया तरीका सूझा और उसकी आँखें खुशी से चमक उठीं। "ये बताइए कि अगर आप शहज़ादी से शादी करना चाहें तो कौन ऐसा है आपके क़रीबियों में से जो इस फैसले से नाखुश होगा? जो इसका विरोध करेगा?"

"हाँ, मेरे डैडी ज़रूर इसके खिलाफ़ होंगे।" राज ने कुछ सोचते हुए पिंकी को देखा और कहा, "वो मेरी शादी अपनी दूसरी पत्नी के भाई की बेटी से करना चाहते थे। मैंने इस शादी से इनकार कर दिया था। मगर, वो फ़िर भी मुझ पर दबाव डालते ही रहे। अब, अगर मैं अपनी पसन्द की लड़की से शादी करना चाहूँ तो ज़ाहिर है वो उसका विरोध करेंगे।"

राज कुछ दो मिनट चुप चाप बैठा सोचता रहा जैसे वो कुछ याद करने की कोशिश कर रहा हो।

"और वैसे भी," भौहें सिकोड़ते हुए राज ने कहा, "उन्होंने कभी मुझे पिता का प्यार दिया ही नहीं। जब माँ थी, तब भी वो हम दोनों से कटे कटे ही रहते थे। माँ के साथ अक्सर झगड़ा किया करते थे। माँ के गुज़र जाने के बाद उन्होंने मुझे बोर्डिंग स्कूल में डाल दिया और खुद दूसरी शादी कर के घर बसा लिया। कभी मुझसे बोर्डिंग स्कूल में मिलने तक नहीं आये।"

"मैं, उन्हें फूटी आँख नहीं भाता। ठीक वैसे ही जैसे पिछ्ले जन्म में महराज भानुप्रतापदेव मुझसे नफ़रत किया करते थे। अब, और किसी सबूत की क्या ज़रूरत है, पिंकी दीदी? साफ़ ज़ाहिर है कि मेरे डैडी हीं पिछले जन्म में महाराज भानुप्रतापदेव सारणीया थे।"

राज के मुँह से ये शब्द निकलने की देर थी कि ज़ोर से आँधी चली और पिंकी के घर की सारी चीज़ें ऐसे काँपने लगीं जैसे भूकम्प आया हो। राज ने चौंकते हुए चारों तरफ़ देखा और फ़िर उसकी नज़र पिंकी पर जा रुकी। वो बिल्कुल शांत बैठी थी।

"ये अचानक तूफान कैसे आ गया?" राज की हैरानी पिंकी के शान्त चेहरे को देखकर और ज़्यादा बढ़ गयी। "अब तक तो सब शांत था। फ़िर ये सब एकदम से..."

"कोई आत्मा मुझसे बात करना चाहती है, राज बाबू," पिंकी के चेहरे पर खौफ़ ज़रा भी नहीं दिख रहा था।

"क्या?" राज ने चौंकते हुए फ़र्श पर बैठी पिंकी को देखा।

कमरे की चीज़ों के साथ ही पिंकी का बदन भी ऐसे काँपने लगा जैसे उसे दौरे पड़ रहे हों। वो ज़ोर ज़ोर से अपना सर झटकने लगी। उसका जूड़ा खुल गया और उसके लंबे रेशमी बालों ने उसके चेहरे को ढँक दिया। पिंकी फ़िर भी सर झटकती ही रही। उसके बदन का काँपना और ज़्यादा बढ़ गया। उसका बदन पसीने से भीग गया। अचानक, कमरे में तेज़ रोशनी फ़ैली जिसने राज और पिंकी के बीच एक दीवार सी खड़ी कर दी। राज की आँखें चौंधिया गयीं और उसने अपनी हथेलियों से अपना चेहरा ढँक लिया।

कुछ देर बाद, सब शांत हो गया। तेज़ हवा का बहाव भी रुक गया। राज ने चेहरे से हथेलियाँ हटा लीं और देखा कि वो तेज़ रोशनी का चुकी है। पिंकी भी पहले कि तरह शांत बैठी थी जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो। उसकी आँखें बंद थीं और वो गहरी गहरी साँसें ले रही थी। राज कुछ देर तक तो उसे देखता रहा। राज की हिम्मत नहीं हो रही थी पिंकी से बात करने की। जब कुछ और वक़्त बीत गया तो राज ने किसी तरह हिम्मत की और पिंकी के करीब, फ़र्श पर जाकर बैठ गया।

"पिंकी दीदी," राज ने धीरे से पिंकी के कँधे पर हाथ रखा और पूछा, "आप ठीक तो हैं?"

"राज बाबू," पिंकी ने एकदम से आँखें खोलीं और राज को देखा, "आपकी माँ की आत्मा ने आपके लिए एक सन्देश दिया है। उन्होंने कहा कि जो शक़्स महाराज भानुप्रतापदेव का पुनर्जन्म है, उसी ने आपकी माँ की हत्या की है।"

"नहीं, पिंकी दीदी," रोहित ने हाथ हिलाकर इनकार किया, "आप ग़लत समझ रही हैं। मेरी माँ की हत्या नहीं हुई थी | उनकी मौत तो एक हादसे में हुई थी।"

"सब उसे हादसा मानते हैं मगर उस हादसे का सच कोई नहीं जानता," पिंकी ने एक साँस लीं और उसकी आँखें खिड़की के बाहर दूर किसी बिंदु पर जा टिकीं। "असल में आपकी माँ का कत्ल हुआ था। और ये बात आपको बताने के लिए आपकी माँ, अपनी मौत के बाद भी आपसे मिलने आया करती थीं।"

"हाँ, ये तो सच है," राज को अपने बचपन के वो दिन याद आए और उसने सर हिलाकर हामी भरी | "माँ के गुज़र जाने के बाद भी मुझे ऐसा लगता था कि वो मेरे आस पास ही हैं। मुझे माँ की आवाज़ सुनायी देती थी। वो मेरी बातों का जवाब दिया करती थीं। मगर, कुछ दिनों बाद वो सब बन्द हो गया। और मैंने इस घटना को अपना वहम मानकर भुला दिया।"

"वो इसलिए कि जिस शख्स ने आपकी माँ का कत्ल किया उसने आपके शरीर पर ऐसा कुछ बाँध दिया जिससे आपकी माँ की आत्मा आपसे सम्पर्क नहीं कर पाए। कोई ऐसी चीज़ जैसे कि..." पिंकी पल भर के रुक गयी और फ़िर बोली, "कोई ताबीज़!"

"ताबीज़?" राज हैरान हो गया। "मगर, मेरे शरीर पर तो कोई ताबीज़ नहीं है। अगर होती तो क्या मुझे नहीं पता चलता?"

"अभी पता चल जाएगा," पिंकी उठी और पूजाघर चली गयी।

उसने ईश्वर की मूर्ति के पास रखा कलश उठाया और राज के पास आकर खड़ी हो गयी।

"राज बाबू," कलश की ओर इशारा करते हुए पिंकी बोली, "इस कलश में मन्त्रों से सिद्ध तेल है। इसे मैं आप पर उड़ेल दूँगी तो आपका पूरा शरीर नीले रंग में रंग जाएगा। यदि आपके शरीर पर कोई ताबीज़ है तो सिर्फ़ उसका रंग नीला नहीं होगा।"

पिंकी ने राज के शरीर पर कलश में भरा तेल उड़ेल दिया। तेल राज के सर से होता हुआ उसके पूरे बदन पर फ़ैल गया। उसके बाल, उसका चेहरा, उसका बदन का हर अंग, ही नहीं उसके कपड़े, जूते, घड़ी, अँगूठी, सब नीले रंग में रंग गए। सिवाय उसके गले में पड़ी सोने की चैन के।

"ये चैन आपको किसने दी?" पिंकी ने चैन को ग़ौर से देखते हुए पूछा।

"मेरे डैडी ने," राज ने चैन के लॉकेट को देखते हुए कहा, "ये हमारी खानदानी चैन है। ऐसी चैन तो हमारे परिवार में सभी मर्दों के गले में है। पर ये चैन तो मेरे गले में मेरी माँ की मौत से पहले से है। मेरे जन्म के कुछ दिनों बाद ही ये चैन मुझे पहना दी गयी थी। और जहाँ तक मुझे याद है, उसके बाद मैंने इसे कभी अपने गले से नहीं उतारा।"

"ज़रा अपनी चैन उतारकर मुझे दीजिये," पिंकी ने हाथ आगे बढ़ाया।

राज ने अपने गले से चैन उतारकर पिंकी की हथेली में रख दिया। पिंकी ने पहले तो हथेलियों में रखकर चैन को उलट पलटकर देखा। फ़िर उसकी नज़र चैन के लॉकेट पर आकर रुक गयी। पिंकी ने अपना पूरा ज़ोर लगाकर उस लॉकेट को खोला। उस लॉकेट के अंदर एक ताबीज़ थी।

"ये ताबीज़ क्या इस लॉकेट के अंदर पहले से थी?" पिंकी ने ताबीज़ दिखाते हुए राज से पूछा।

"मुझे तो ये भी नहीं मालूम था कि ये लॉकेट खुलता भी है?" राज हैरान था। “फिर इसके अंदर किसी ताबीज़ के होने या न होने का पता मुझे कैसे लग सकता है ?”

"मैं जानती हूँ ऐसी ताबीज़ें कौन बनाता है?" ताबीज़ को ग़ौर से देखते हुए पिंकी बोली, "आप तांत्रिक कालेश्वर के पास चले जाइए और उनसे पूछिये ये ताबीज़ किसने और कब बनावायी थी? और उनसे कहिए कि वो इस ताबीज़ को नष्ट कर दें।"

"इस ताबीज़ का असर खत्म होते ही आपकी माँ की आत्मा आपसे बात कर सकेगी। उन्हें आपको बहुत कुछ बताना है, राज बाबू । वो आपको कई सारे ऐसे राज़ बताना चाहती हैं जो आप नहीं जानते। या फ़िर शायद उनके अलावा कोई भी नहीं जानता।”
 
"तुम तो अगले हफ़्ते आनेवाले थे न, शूटिंग जल्दी खत्म हो गयी क्या?"

डॉ दामले ने अपने केबिन के दरवाज़े पर राज को खड़े देखा तो मुस्कुराते हुए पूछा। राज ने उनकी बात का कोई जवाब नहीं दिया और केबिन के अंदर चला आया।

"तुम्हारा शो, चैनल पर कब आ रहा है?" डॉ दामले ने राज को बैठने का इशारा करते हुए कहा, "कॉफी पियोगे, चैम्प?"

राज ने उनके किसी सवाल का कोई जवाब नहीं दिया। वो अपनी भावहीन आँखों से डॉ दामले को घूरे जा रहा था। उसके चेहरे की पेशियाँ यूँ जकड़ गयीं थीं जैसे उसे कोई ज़बरदस्त सदमा लगा हो। उसके चेहरे को ग़ौर से देखते ही डॉ दामले के चेहरे की हँसी उड़ गयी। उन्हें राज का ऐसा बर्ताव बड़ा अजीब लग रहा था।

"क्या बात है, चैम्प?" डॉ दामले का चेहरा भी गम्भीर हो गया। "ऐसे क्यों देख रहे हो?"

इस सवाल का जवाब देने से पहले राज के होंठ ज़रा फड़फड़ाये और आँखों में नमी की हल्की सी परत भी उभर आयी। राज का मन हुआ कि वो केबिन से बाहर भाग जाए ताकि उसे इस सवाल का जवाब न देना पड़े। मगर, इस सवाल का जवाब देना ज़रूरी था। जो इंसान राज के लिए उसके अपनों से भी अपना था, उसके इस सवाल का जवाब देना राज के लिए बेहद ज़रूरी था।

"आपने मेरी माँ का कत्ल क्यों किया, डॉक?" राज ने अपनी सारी हिम्मत बटोर कर वो सवाल पूछ डाला।

पल भर के लिए डॉ दामले के चेहरे का रंग उत्तर गया और वो काँप उठे। फ़िर उन्होनें एक गहरी साँस ली और खुद को शांत किया।

"कत्ल?" दामले ने राज से नज़रें फ़ेर लीं और उठकर केबिन की खिड़की के पास खड़े हो गए। "मैं सुमन का कत्ल कैसे कर सकता हूँ? मैं तो उससे बेइंतहा प्यार करता था।"

"क्या?" राज को ऐसा लगा जैसे उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गयी।

"मैं और तुम्हारे डैडी प्रेम शर्मा, एक ही क्लास में पढ़ा करते थे। बचपन से ही मैं पढ़ने में बहुत होशियार था इसलिए मुझे स्कॉलरशिप मिली और अमीरों के स्कूल में दाखिला मिल गया। वहीं मेरी मुलाकात प्रेम से हुई जो एक अमीर बाप की बिगड़ी हुई औलाद था। मेरी ग़रीबी का मज़ाक उड़ाने का एक भी मौका प्रेम नहीं छोड़ता था। उस वक़्त से ही मैं उससे नफ़रत करता था। मगर, उससे उलझने की फुरसत नहीं थी मुझे। क्योंकि मुझे पढ़ लिखकर अपने परिवार का सहारा बनना था।"

"जवानी की दहलीज़ पर कदम रखते ही मेरी ज़िंदगी में सुमन आ गयी और मैं उसे अपना दिल दे बैठा। हालाँकि अपने दिल की बात उससे कहने की मेरी हिम्मत कभी नहीं हुई। पर फ़िर भी, उसके साथ पूरी ज़िंदगी बिताने के ख़्वाब बुनने शुरू कर दिए थे मैंने। मगर, प्रेम फ़िर मेरी ज़िंदगी में विलेन बन कर आ गया।"

"उसके पिता ने सुमन के घर प्रेम का रिश्ता भेजा जिसे सुमन के घरवालों ने फ़ौरन स्वीकार कर लिया। करते भी क्यों नहीं? रईस बाप का इकलौता बेटा जो था। सुमन की शादी के बाद, मैं बिल्कुल टूट गया | मन हुआ की खुदखुशी कर लूँ | लेकिन अगर ऐसा करता तो मेरा परिवार बिल्कुल बेसहारा हो जाता | उनकी खातिर मैंने अपना ग़म भुला दिया और अपने भाई बहनों की ज़िम्मेदारी पूरी करने में लग गया। इस तरह 9 साल बीत गए।"

"इन 9 सालों में मैंने अपनी बहनों को शादी करवा दी और मेरे दोनों भाई नौकरी करने लगे थे। मेरा भी अपना खुद का क्लीनिक था और अच्छी खासी प्रैक्टिस थी। सारी ज़िम्मेदारियों से आज़ाद होते ही मैंने प्रेम से अपने अपमान के बदला लेने की ठान ली। उन दिनों, मेरे क्लिनिक में एक खूबसूरत नर्स काम किया करती थी जिसका नाम लूसी था। मैंने लूसी को कुछ पैसे देकर उसे प्रेम को प्यार के जाल में फाँसने को कहा। लूसी पैसों के लिए कुछ भी कर सकती थी। प्रेम, लूसी के हुस्न और जवानी के जाल में फंसता चल गया और सुमन से दूर होता रहा ।"

"मैंने इस मौके का फायदा उठाया और सुमन से दोस्ती बढ़ाकर उसके और प्रेम के बीच गलतफहमियों की दीवार खड़ी कर दी। उन दोनों में आये दिन झगड़े होने लगे और उनका रिश्ता बिगड़ता चला गया। मैं ऐसे ही मौके की तलाश में था। अगले 2 सालों तक मैं, सुमन के नज़दीक आने की कोशिश करने लगा ताकि प्रेम को उसके मन से निकाल सकूँ। सब मेरे प्लान के मुताबिक ही जा रहा था कि एक दिन उस लूसी ने सब बर्बाद कर दिया।"

"एक दिन सुमन के बुलाने पर मैं उसके फार्महाउस चला गया। उस दिन वो अपने कुछ दोस्तों को पार्टी दे रही थी। मैं वक़्त से पहले वहाँ पहुँचकर सुमन को सरप्राइज़ देना चाहता था। लूसी भी मेरे पीछे पीछे वहाँ आ गयी और मुझसे ज़्यादा पैसे की माँग करने लगी। उस वक़्त मेरे पास उतने पैसे नहीं थे। मैंने उसे टालने की कोशिश की तो उसने मुझे धमकी दी कि वो सुमन को मेरे प्लान के बारे में बता देगी।"

"अचानक, सुमन मेरे सामने आ गयी। मुझे नहीं पता था कि वो वहाँ पहले से मौजूद थी। मेरी असलियत जानने के बाद उसे मुझसे नफ़रत हो गयी थी। वो प्रेम के पास वापस जाना चाहती थी और उससे माफ़ी माँगना चाहती थी। मैं ड़र गया कि अगर ऐसा हुआ तो मैं सुमन को हमेशा के लिए खो दूँगा। मैंने सुमन को रोकने की बहुत कोशिश की। मैं उसे बताना चाहता था कि ये सब मैंने इसलिए किया क्योंकि मैं उससे पागलों की तरह प्यार करता हूँ।"

"लेकिन, सुमन कुछ सुनना नहीं चाहती थी। उसने अपनी बंदूक निकाल ली और कहा कि अगर मैंने उसके करीब आने की कोशिश की तो वो मुझे गोली मार देगी। मैं जानता था सुमन में किसी की जान लेने की हिम्मत नहीं है। मैंने उससे बंदूक छीनने की कोशिश की और इसी छीना झपटी में कब गोली चल गई पता ही न चला। सुमन ने वहीं दम तोड़ दिया।"

"लूसी और मैंने मिलकर हमारे वहाँ मौजूद होने के सारे सबूत मिटा दिए और वहाँ से भाग गए। सबने यही समझा कि बंदूक साफ़ करते हुए गलती से गोली चल गयी और सुमन की मौत हो गयी। अब मेरी अगला मकसद प्रेम के बेटे को उससे अलग करना था। लूसी, उन दिनों प्रेम के काफ़ी करीब थी। उसके ज़रिये मुझे मालूम हुआ कि तुम अपनी माँ से बातें करते हो। मैंने लूसी का इस्तेमाल कर प्रेम के दिमाग में ये बात डाल दी कि तुम्हें इलाज की ज़रूरत है।"

"लूसी के कहने पर प्रेम ने तुम्हें मेरे पास भेज दिया। मैंने तुम्हारे हिप्नोसिस सेशन लेने शुरू कर दिए। हिप्नोसिस के दौरान तुमने मुझे कुछ ऐसी बातें बतायीं जिन्हें सुनकर मुझे यकीन होने लगा कि सुमन की आत्मा तुमसे मिलने आती है | मुझे डर था कि कहीं वो तुम्हें अपनी मौत का सच न बता दे | मैं कोई रिस्क नहीं लेना चाहता था | मैंने एक तांत्रिक की मदद से एक ताबीज़ बनवा लिया | और हिपनोसिस सेशन के दौरान जब तुम गहरी नींद में थे तब मैंने तुम्हारी चैन में वो ताबीज़ डाल दी ताकि तुम्हारी माँ की आत्मा तुमसे दूर रहने को मजबूर हो जाए। इलाज के दौरान मैंने तुमसे दोस्ती कर ली और तुम्हारे मन में ये बात डाल दी कि तुम्हारे पिता को न तुमसे प्यार है, न तुम्हारी माँ से। तुम भी प्रेम से नफ़रत करने लगे।"

"और इस तरह मैंने प्रेम शर्मा से उसकी ज़िन्दगी की हर खुशी छीन ली ताकि उसे उस उस दुख का एहसास हो सके जो उसने कभी मुझे दिया था। मगर, मैं नहीं जानता था कि तुम किसी भूतिया किले के अतीत की खोज करते करते, उस राज़ की कब्र भी खोद डालोगे जिसे मैं बहुत पहले दफ़न कर चुका था।"

डॉ दामले ने मुड़कर राज के हैरान चेहरे को देखा और ज़ोर से ठहाके लगाकर हँस दिए। फ़िर वो अपनी मेज़ की दराज़ की तरफ़ बढ़े।‘’

"ख़ैर कोई बात नहीं।" झुककर मेज़ की दराज़ खोलते हुए डॉ दामले बोले, "सोचो, प्रेम पर क्या बीतेगी जब उसे ये पता चले कि उसका जवान बेटा मारा गया।"

डॉ दामले ने पिस्तौल राज की तरफ़ कर दी। राज को विश्वास नहीं हुआ कि ये वही डॉ दामले हैं जिन्हें वो अपना भगवान मानता था। राज को ऐसा सदमा लगा कि वो अपने बचाव के लिए कुछ किये बिना बुत बना कुर्सी पर ही बैठा रहा गया।

तभी आसमान में ज़ोर से बजली कड़की और कमरे की सारी चीज़ें काँपने लगीं जैसे कोई भयानक भूकम्प आया हो। कमरे में एक तेज़ रोशनी फैले गयी जिसे देखते ही डॉ दामले के हाथ से पिस्तौल नीचे गिर गयी। उनकी आँखें खौफ़ के मारे फ़ैल गयीं और वो थर थर काँपने लगे।

"नी...नील...ल...म!"

डॉ दामले के फड़फड़ाते होंठो से सिर्फ़ ये एक शब्द निकल पाया और उनकी आँखें पथरा गयीं। वो रोशनी अचानक बहुत ज़्यादा तेज़ हो गयी और राज की आँखें चौंधियाँ गयीं। उसने अपन चेहरा हथेलियों में छुपा लिया। बाहर ज़ोर से आँधी चली और केबिन की खिड़कियाँ खड़खड़ाने लगीं।

इन सभी खौफ़नाक आवाज़ों के बीच से डॉ दामले के दर्द में कराहने की आवाज़ राज के कानों में पड़ी तो उसके दिल में टीस उठी। उसने फ़ौरन अपने चेहरे से हाथ हटा लिए और सब कुछ भूलकर उनकी मदद के लिए खड़ा हो गया। मगर, तब तक सब कुछ शांत हो चुका था और वो तेज़ रोशनी भी जा चुकी थी।

केबिन के कोने में डॉ दामले फ़र्श पर पड़े नज़र आये। उनके हाथ पाँव जकड़ गए थे और जगह जगह से मुड़े हुए थे। जैसे किसी शक्तिशाली, अदृश्य हाथों ने उनके जिस्म को मरोड़ दिया हो। उनकी पथरायी आँखें खुली हुई थी और चेहरा एक तरफ़ को सिकुड़ा हुआ था। उनके चेहरे का रंग इतना सफ़ेद था जैसे किसी ने उनका पूरा खून चूस लिया हो। राज उन्हें इस हालत में देखकर काँप उठा।

"डॉक!" राज दौड़ते हुए गया और डॉ दामले के पास फ़र्श पर जाकर बैठ गया। "ये आपको क्या हो गया है?"

मगर, डॉ दामले के शरीर में ज़रा भी हरकत नहीं हुई। ड़र के मारे राज का गला सूख गया। वो दौड़ते हुए केबिन के बाहर चला गया। बाहर, रिसेप्शन पर डॉ दामले की सेक्रेटरी जूली, बैठी फ़ोन पर अपने बॉयफ्रेंड से बतिया रही थी। राज को हड़बड़ाते हुए अपनी तरफ़ आते देखकर जूली चौंक गयी। राज का डरा हुआ चेहरा देखकर उसने फ़ौरन फ़ोन रख दिया।

"जूली!" राज हाँफते हुए जुली के पास जाकर खड़ा हो गया, "जल्दी से एम्बुलेंस बुलाओ।”
 
अपने फ़्लैट के दरवाज़े की घण्टी की आवाज़ सुनते ही राज चौंकते हुए गहरी नींद से जागा। डॉ दामले का अंतिम संस्कार करने के बाद, राज कल रात को बड़ी देर से घर लौटा था। डॉ दामले की मौत अस्पताल पहुँचने से पहले ही हो गयी थी। डॉक्टरों का कहना था कि उन्हें दिल का दौरा पड़ा था। उनकी सेक्रेटरी जूली ने डॉ दामले के परिवार को उनके गुज़रने की ख़बर दी तो सबने उनसे किनारा कर लिया। वो सब अपना मतलब निकाल चुके थे और अब अपने बड़े भाई से कोई नाता नहीं रखना चाहते थे। किसी ने बच्चों के एक्ज़ाम का बहाना बनाया यो किसी ने बीमार होने का।

आखिरकार, राज ने ही उनका अंतिम संस्कार कर दिया। चाहे, डॉ दामले ने जो भी किया हो उसकी माँ और डैडी के साथ, मगर राज को उन्होंने हमेशा ही पिता का प्यार दिया था। इस नाते राज का फर्ज़ बनता था कि वो उनकी चिता को आग दे। और वैसे भी भानुगढ़ में जो कुछ हुआ उसने राज को समझा दिया था कि नफ़रत की आग सिर्फ़ को हवा देकर कोई कुछ भी हासिल नहीं कर पाया है। वो आग तो सिर्फ़ जलाकर ख़ाक ही कर सकती है। इसलिए, राज ने डॉ दामले के सारे बुरे कर्मों को माफ़ कर दिया।

दरवाज़े की घण्टी दोबारा बजी तो राज अनमने मन से उठा और बिस्तर से नीचे उतरकर, दरवाज़े की तरफ़ चल पड़ा।

"अरे! पिंकी दीदी," दरवाज़ा खोलते ही राज के चेहरे पर मुस्कान उतर आयी। "अंदर आईये न, कोई तकलीफ तो नहीं हुई सफ़र में?"

"नहीं राज बाबू," घूँघट संभालते हुए पिंकी ने फ़्लैट के अंदर कदम रखा, "रेलगाड़ी का सफ़र तो आराम से कट गया। फ़िर स्टेसन पर आपका डिराईवर आ गया था लेने।"

"बैठिये न, आप थक गयीं होगीं," राज ने हॉल का एयर कंडीशनर चालू कर दिया।

"राज बाबू," सोफ़े पर बैठी पिंकी का चेहरा उतर गया और उसने नज़रें झुका लीं, "आपने मुझे अपने प्राणों की बलि क्यूँ नहीं देने दी? अगर मैं अपनी बलि दे देती तो शहज़ादी फ़िर से जी उठती। और आप दोनों का मिलन हो जाता।"

"नहीं, दीदी," अपने अधूरे प्यार को याद करते हुए राज ने एक दर्द में डूबी आह भरी और कहा, "आपकी गौरी अभी बहुत छोटी है और उसे आपकी ज़रूरत है। रही बात, हमारे मिलन की तो उसके लिए मैं अगले जन्म का इंतज़ार करूँगा। अगर, भगवान ने चाहा तो अगले जन्म में हमारा मिलन ज़रूर होगा। आपने दोनों शहज़ादियों की आत्माओं को काले जादू के उस जाल से मुक्ति दिला दी, यही बहुत है।"

"आपने फ़िर मुझे उस ज़िल्लत की ज़िंदगी जीने पर मजबूर कर दिया," पिंकी की आँखें भर आयीं।

"अब उसकी कोई ज़रूरत नहीं है," राज मुस्कुराया। "मैं जानता हूँ आप सिलाई बुनाई का काम करने में माहिर हैं। मेरा एक दोस्त है जो फ़ैशन डिज़ाइनर है। मैंने आपकी नौकरी उसके यहाँ लगवा दी है। और हमारे इस शहर में हुनर की कद्र बहुत अच्छी तरह से होती है।"

"क्या मालूम कल आप भी अपने इस हुनर के बल पर कोई बहुत बड़ी कामयाबी हासिल कर लें। और सिर्फ़ कामयाबी ही नहीं बल्कि दौलत और शौहरत भी।

फ़िर यहीं एक घर खरीद लजिये और अपनी गौरी का दाखिला भी यहीं के स्कूल में करवा लिजिये।"

"बस, बस बाबू जी," साड़ी के पल्लू से अपने आँसू पोछते हुए पिंकी मुस्कुरायी।

"इतने भी बड़े बड़े ख्वाब मत दिखाओ मुझे।"

"ठीक है तो फ़िर नहा धोकर जल्दी से तैयार हो जाइये," राज ने बड़े जोशीले अंदाज़ में कहा। "तब तक मैं आपके लिए चाय नाश्ते का इंतज़ाम कर देता हूँ। फ़िर हम आपके नए बॉस के ऑफिस चलेंगे उनसे मिलने। उनकी कंपनी ने आपके रहने का इंतज़ाम भी कर दिया है।"

"बड़ा उपकार आपका, राज बाबू," पिंकी हाथ जोड़ते हुए सोफ़े से उठ खड़ी हुई।

"वॉशरूम... ओह...मेरा मतलब है स्नानघर, उस तरफ़ है।"

पिंकी खुशी खुशी वॉशरूम की तरफ़ चल पड़ी। उसे खुश देखकर राज भी बहुत खुश था। वो कॉफ़ी बनाने किचन की तरफ़ बढ़ा ही था कि उसका फ़ोन बजने लगा।

"हेलो," राज ने फ़ौरन कॉल ले लिया।

"ओ! मेरे शेर," फ़ोन पर राज का बॉस जय बड़े जोश में था। "तुम तो रातों रात स्टार बन गए। तुम्हारे शो की TRP असमान को छू रही है बंधु"मुबारक हो।"

"थैंक यू, सर," राज ने बड़े शांत स्वर में कहा।

"पता है आज तक सब समझते थे कि भानुगढ़ दो राजाओं की आपसी दुश्मनी की वजह से बर्बाद हुआ है। पर तुमने इस कहानी में शहज़ादी की लव स्टोरी डाल कर शो को सुपर हिट बना दिया। क्या रिसर्च की है, यार तुमने! मान गए तुमको।"

"शुक्रिया सर," सीने पर हाथ रखे राज मुस्कुराया। "मेरी और कितनी तारीफ़ करेंगे आप?"

"अब काम की बात सुनो," जय ने दुगुने जोश से कहा। "साउथ में एक जगह है, नागेश्वरपुरम। वहाँ एक बड़ी सी हवेली है, जो हॉन्टेड है। हवेली क्या उसे तो महल कहना चाहिए। वो हवेली एक NRI बिजनेसमैन वेकन्टेश चोलामंडलम की है। और वो चाहता है कि तुम अपना अगला एपिसोड उस हवेली पर करो। बड़ी मालदार पार्टी है वो। देश विदेश में कई कंपनियाँ हैं उसकी। हमारा शो स्पॉन्सर करने को भी तैयार है। तो फ़िर कल से ही लग जाओ काम पर!"

"फ़िलहाल मुझे दो हफ्तों की छुट्टी चाहिए," राज ने एक गहरी साँस ली।

"छुट्टी?" जय को छूट्टी के नाम से चिढ़ थी। "वो किस लिए?"

"अपने डैडी के साथ 2 हफ्तों की वेकेशन पर पेरिस जा रहा हूँ।" राज ने मुस्कुराते हुए कहा।

"तुमने अपने डैडी को माफ़ कर दिया ?" जय की चिढ़ एक पल में ग़ायब हो गयी।

"हाँ, बचपन से लेकर आज तक उनसे जो दूरी बनाए रखी थी मैंने," कहते हुए राज का गला भर आया, "उसे इन 2 हफ़्तों में मिटा देना चाहता हूँ।"

"ये तो बहुत अच्छी बात है, रो।" जय दिल खोलकर मुस्कुराये और बोले, "चलो दी तुम्हें छुट्टी। बाप बेटे खूब एन्जॉय करना। लेकिन ठीक दो हफ़्ते बाद सीधे नागेश्वरपुरम पहुँचकर काम पर लग जाना।"

"जैसी आपकी आज्ञा बॉस," राज ने फ़ोन बन्द किया और किचन की तरफ़ चल पड़ा।

समाप्त
 
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