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Adultery अतीत की खोज

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Adultery अतीत की खोज

पैरानॉर्मल (परालौकिक) ताकतों का अस्तित्व एक ऐसा विषय है जो विज्ञान और विश्वास के बीच बंटा हुआ है। इसके मुख्य पहलुओं को निम्नलिखित रूप में समझा जा सकता है:

1. वैज्ञानिक दृष्टिकोण:

मुख्यधारा का विज्ञान पैरानॉर्मल ताकतों (जैसे भूत, आत्माएं, या टेलीपैथी) को स्वीकार नहीं करता क्योंकि इनके पक्ष में कोई ठोस, मापने योग्य प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं । अधिकांश वैज्ञानिक इन अनुभवों को मनोवैज्ञानिक कारकों जैसे 'स्लीप पैरालिसिस', मतिभ्रम (hallucinations), या 'इन्फ्रासाउंड' (कम आवृत्ति वाली ध्वनियां) का परिणाम मानते हैं ।

2. व्यक्तिगत अनुभव और साक्ष्य:

दुनिया भर में लाखों लोग अजीब घटनाओं, जैसे अचानक तापमान गिरना, अजीब आवाजें सुनना, या साये देखने का दावा करते हैं हालांकि ये अनुभव व्यक्तिगत रूप से बहुत वास्तविक लगते हैं, लेकिन इन्हें प्रयोगशाला की नियंत्रित स्थितियों में दोहराया नहीं जा सका है।

3. पैरानॉर्मल जांच (Paranormal Investigation):

जांचकर्ता EMF मीटर (इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड), थर्मल कैमरे और ऑडियो रिकॉर्डर (EVP) जैसे उपकरणों का उपयोग करके इन शक्तियों का पता लगाने की कोशिश करते हैं हालांकि, इन उपकरणों में होने वाली हलचल को अक्सर प्राकृतिक बिजली के उतार-चढ़ाव या अन्य भौतिक कारणों से भी जोड़ा जा सकता है।

4. सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विश्वास:

विभिन्न संस्कृतियों और धर्मों में परलौकिक शक्तियों, आत्माओं और पुनर्जन्म पर गहरा विश्वास है। कई लोग इसे जीवन और मृत्यु के बीच के अनसुलझे रहस्यों के रूप में देखते हैं।

निष्कर्ष:

वर्तमान में, पैरानॉर्मल ताकतों का होना प्रमाणित नहीं है, लेकिन यह मानव जिज्ञासा और डर का एक बड़ा हिस्सा बना हुआ है। यदि आप ऐसी घटनाओं का अनुभव कर रहे हैं, तो आप वैज्ञानिक स्पष्टीकरणों की जांच कर सकते हैं।

पर, इन सब में कितनी सच्चाई है, कोई नहीं जानता। ऐसी अनहोनी घटनाओं की वजह क्या है, ये भी कोई नहीं जानता। परलोक, आत्मा और पुनर्जन्म को लेकर कितने ही किस्से हम सुनते आए हैं। लेकिन, ये सब आखिर हैं क्या? मिथ्या या सच?"
 
अपडेट – 1)

एक 27-28 साल का गोरा चिट्टा युवक अपने बेडरूम में रखे ड्रेसर के आईने में ख़ुद को देखते हुए बोला।

"अगर, अच्छे कर्म करोगे तो स्वर्ग का सुख मिलेगा नहीं तो नर्क की आग में जलोगे। इस जन्म के कर्मों के हिसाब से ही अगला जन्म में सुख या दुख मिलता है। ये सारी बातें सुनी तो हम सबने हैं मगर क्या हम में से कोई भी जानता है कि पैदा होने से पहले और मौत के बाद हम कहाँ थे? किस हाल में थे? हमारे साथ क्या होता है? हो सकता है सचमुच, हमारी दुनिया से अलग एक दूसरी दुनिया हो, जिसे परलोक कहा जाता है। और जब किसी एक पॉइंट पर इन दोनों दुनियाओं का सामना होता है तब हमें ऐसी पैरानॉर्मल एक्टिविटीज़ देखने को मिलती हों। मेरा ये टेलीविज़न शो, 'सच की खोज' एक कोशिश है इन पैरानॉर्मल घटनाओं में छुपे रहस्यों की खोज करने की।"

उसने एक गहरी साँस छोड़ी और नज़रें झुकाकर कुछ सोचने लगा। कुछ दो- तीन मिनट बाद उसने फ़िर से नज़रें उठायी और आईने की तरफ़ देखा।

"हम्म..." उसने सर हिलाया और खुद से कहा, "नॉट बेड, राज! कल अगर चैनल के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स इस प्रेसेंटेशन से इम्प्रेस हो गए न तो समझ ले तेरी तो निकल पड़ी।"

राज शर्मा, चैनल P2 में काम करता था। उसे बचपन से ही हॉटेड जगहों पर जाना और पैरानॉर्मल एक्टिविटीज़ पर रिसर्च करने का बहुत शौक था। चैनल में काम मिलते ही राज ने अपने पहले शो के लिए यही विषय चुना था। कल सुबह चैनल के ऑफिस में डायरेक्टर बोर्ड़ के सामने उसे अपने नए शो का प्रेजेंटेशन देना था। इसलिए, आज की रात उसके लिए कयामत की रात थी। उसे हर हाल में अपने शो के लिए चैनल वालों की मंज़ूरी हासिल करनी ही थी।

राज अपने शो के ज़रिए हॉन्टेड बतायी जाने वाली जगहों पर जाकर वहाँ की पैरानॉर्मल गतिविधियों को दर्शकों के सामने लाना चाहता था और उनके वैज्ञानिक कारणों की खोज करना चाहता था। नाईट गाउन पहना राज अपने बेड पर जाकर बैठ गया और उसने अपना लैपटॉप ऑन किया। फ़िर, उसने कुछ बटन दबाये और लैपटॉप के स्क्रीन पर एक पुराने, वीरान किले की तस्वीर आ गयी।

"यहीं शूट होगा मेरे शो का पहला एपिसोड," लैपटॉप पर उस किले की तस्वीर को देखते ही राज की आंखों में एक अजीब सी चमक आ गयी। "देश की सबसे खतरनाक बतायी जाने वाली हॉटेड जगह, भानुगढ़ का किला।"

हालाँकि राज आज तक कभी उस जगह गया तो नहीं था। मगर, वो जब भी इस किले की तस्वीर को देखता तो वो अपने आसपास की सारी दुनिया को भूल जाता। न जाने कैसी अजीब सी कशिश थी उस उजड़े, वीरान किले में? तभी कमरे की दीवार पर लगी घड़ी से दो घंटियों के बजने की आवाज़ आयी।

"रात के 2 बज गए," राज ने हैरानी से घड़ी की तरफ़ देखा। "प्रेजेंटेशन की तैयारी करते करते पता ही न चला। चलो भई, जल्दी सो जाते हैं नहीं तो पता चला कल 12 बजे तक सोते ही रह गए। शो तो हाथ से जाएगा ही ऊपर से बॉस की डाँट भी सुननी पड़ेगी।"

राज ने जल्दी से लैपटॉप बन्द किया और उसे अलमारी में रख दिया। रात काफ़ी बीत चुकी थी इसलिए हर तरफ़ सन्नाटा था। राज अपने बिस्तर पर आकर लेट गया और कमरे की लाइट बन्द कर दी। कमरे को अँधेरे की चादर ने ढँक दिया। राज आज सुबह से ही अपने प्रेजेंटेशन को लेकर काफ़ी भाग-दौड़ कर चुका था और बहुत थक चुका था। इसलिए, उसे नींद भी बहुत जल्दी आ गयी।

• • •………………………….
 
झींगुरों की तेज़ आवाज़ कानों में पड़ी तो राज की नींद टूटी। आँखें खोले बिना ही उसने करवट ली और सोचा कि कहीं कोई खिड़की तो खुली नहीं छोड़ दी। करवट बदलते ही ठंडी हवा का तेज़ झोंका उसके चेहरे पर थपेड़े मारने लगा। अब, उसे यकीन हो गया कि उसने ज़रूर बैडरूम की कोई खिड़की खुली छोड़ दी है। राज ने खीजते हुए आँखें खोली मगर फ़िर जो नज़ारा उसने देखा उससे उसकी साँसें हलक में अटक गयीं। वो एक वीरान किले के खंडहर में पड़ा था।

चारों तरफ़ टूटी फूटी इमारतें थी जिनके ऊपर जँगली बेलों और मकड़ी के जालों ने कब्ज़ा कर लिया था। चौंकते हुए राज ने चारों तरफ़ नज़रें दौड़ायी। पूनम की रात थी और पूरे चाँद की दूधिया रोशनी में वो खंडहर बहुत ही खौफ़नाक लग रहा रहा। ये किला बिल्कुल वैसा ही लग रहा था जैसा कि उसने तस्वीरों में भानुगढ़ के किले को देखा था। राज की आँखें उसे जो दिखा रहीं थी, उसे उस पर यकीन नहीं हो रहा था।

किले में चारों तरफ़ गहरा सन्नाटा छाया हुआ था। ड़र के मारे राज का गला सूख गया और माथे से पसीने की धारायें फूट पड़ीं। वो ज़ोर ज़ोर से हाँफते हुए वहाँ से बाहर निकलने का रास्ता खोजने लगा। तभी किसी के ज़ोर से चीखने की आवाज़ आयी और राज सिहर उठा।

उसने ड़रते हुए उस दिशा की तरफ़ नज़रें घुमायी जहाँ से चीखने की आवाज़ आयी थी। अँधेरे में थोड़ी देर तक आँखें फाड़ फाड़कर देखने के बाद भी उसे कुछ नज़र नहीं आया। राज ने एक गहरी सांस ली और खुद को शांत किया।

अचानक एक खूबसूरत सी, जवान लड़की हाथों में तलवार लिए, उस दिशा से दौड़ती हुई आयी। उसका कद लंबा था और गोरा, छरहरा बदन था। उसके चेहरे पर नक़ाब लगा हुआ था जिसके अंदर से सिर्फ़ उसकी दो बड़ी बड़ी खूबसूरत, कजरारी आँखें ही नज़र आ रहीं थी। उसने रेशम की नीली तंग चोली और घाघरा पहना हुआ था। उसके पैरों में सोने की पायल और हाथों में सोने के कंगन थे। उसने गले में हीरों का हार, सोने का कमरबंद और हीरे जवाहरात जड़े झुमके भी पहने हुए थे। कुछ लोग हाथों में तलवार लिए उसके पीछे दौड़ रहे थे। पहनावे से वो लोग किसी रजवाड़े के सैनिक लग रहे थे।

सैनिकों का जत्था लड़की की ओर बढ़ा तो लड़की ने बड़ी बहादुरी से तलवार चलायी और अकेले ही उन सबको मार गिराया। लड़की थोड़ा ही आगे बढ़ी थी कि एक ऊँचे कद और पहलवान जैसे शरीर वाले जल्लाद ने सामने से आकर उसका रास्ता रोका। जल्लाद का रंग कोयले जैसा काला था और आँखें अंगारों जैसी लाल थीं। उसे देखते ही लड़की की आँखें पल भर के लिए ड़र से काँप उठीं मगर फ़िर उसने खुद को संभला और अपनी तलवार को कसकर पकड़ लिया।

कुछ देर तक दोनों में घमासान तलवारबाज़ी चलती रही। आख़िर, उस जल्लाद अपनी तलवार से एक ज़ोरदार वार किया और लड़की की तलवार को दो टुकड़ों में तोड़ दिया। अगले ही पल उसने लड़की को पीछे से उसकी कमर से बल दबोच लिया। लड़की खुद को छुड़ाने के लिए छटपटाने लगी। उस जल्लाद ने अपनी तलवार से लड़की के चेहरे से नक़ाब हटा दिया। चाँद की रोशनी से नहाया उस लड़की का चेहरा खुद भी चाँद से कम नहीं था।

उस जल्लाद ने लड़की की बेबसी पर जी भर कर ठहाके लगाए। उस लड़की की हिरणी जैसी आँखें गुस्से से लाल थीं। वो ज़ोर ज़ोर से साँसें ले रही थी और खुद को छुड़ाने की जी तोड़ कोशिश कर रही थी। जल्लाद ने अपनी तलवार से उस लड़की की कमरबंद को काट दिया। और फ़िर अपनी तेज़ धारवाली तलवार से उसके घाघरे समेत उसकी कमर के नीचे के सारे वस्त्र काट दिए।

"न...हीं...ही...!"

चाँद की किरणें लड़की की गोरी, सुड़ौल टाँगो से होती हुई उसकी नंगी चूत पर पड़ी तो लड़की लाज के मारे चिल्लायी। जल्लाद की तलवार का अगला निशाना लड़की की चोली थी। उसने लड़की की चोली के टुकड़े टुकड़े कर दिए। लड़की के सीने पर उभरी, दो कलियाँ भी चाँदनी में नहा गयीं।

"छोड़ दो हमें!" एक ग़ैर मर्द की बाहों के चँगुल में घिरे अपने नंगे बदन से शर्मिंदा होकर लड़की ने आंखें बंद कर लीं।
 
लड़की के खूबसूरती से तराशे जवान बदन पर पड़ते ही जल्लाद का लंड उतेजना से उठ गया। उसके हाथ से तलवार छूट गयी और उसका हाथ खुद-ब-खुद लड़की की टाँगों के बीच चला गया।

"आ...आ..आह!

जल्लाद ने अपनी खुरदरी उंगलियाँ लड़की की पँखुड़ियों जैसी नाज़ुक चूत की फाकों पर रगड़ी तो लड़की कराह उठी। लड़की चीखती रही मगर जल्लाद ने उस पर कोई दया नहीं दिखायी और वो उन नाज़ुक फाकों से खेलता ही रहा।

"आआह...ह!" लड़की की चूत भीग गयी और उसके मुँह से आह निकली।

चूत से उठकर जल्लाद का हाथ लड़की के सीने के उभारों को मसलने में मसरूफ़ हो गया।

"जाने दो हमें!"

लड़की के गाल गुस्से और लाज के मारे सुर्ख हो गए और उसने जल्लाद की टाँगों पर अपनी जूतियों से वार किया। जल्लाद ने लड़की के खुले, रेशमी बालों को पकड़कर उसे अपनी तरफ़ खींचा और उसके मखमली होंठो को बड़ी हैवानियत के साथ चूमने लगा। एक हाथ से उस जल्लाद ने अपनी बाहों में मचलती लड़की को कसकर पकड़ा। और दूसरे हाथ से लड़की की गर्दन की नस दबा दी। लड़की कुछ ही मिनटों में जल्लाद की बाँहों में बेहोश होकर गिर पड़ी। उसे अपनी बाहों में यूँ बेबस पड़े देख जल्लाद ने इतनी ज़ोर से अट्टहास किया कि किले की दीवारें भी काँप उठी।

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राज चौंकते हुए जगा और उसने हड़बड़ाते हुए चारों तरफ़ देखा। वो अपने कमरे में ही था। उसने फौरन पलंग के पासवाली टेबल लैंप जला दी। उसका पूरा बदन पसीने से भीगा हुआ था। उसने टेबल पर जग को हाथों में उठाया और गटागट पानी पीने लगा। पानी पीकर उसकी जान में जान आयी और उसने जग को वापस टेबल पर रख दिया।

"कितना भयानक सपना था!" काँपती आवाज़ में राज ने खुद से कहा।

…………………………………
 
राज अपने ऑफिस में बैठा लैपटॉप पर भानुगढ़ के किले की फ़ोटो देख रहा था। सुबह के 10 बज चुके थे और बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के साथ उसके प्रेसेंटेशन में करीब एक घंटा और बाकी था। किले की तस्वीर को देखते ही उसे उस भयानक सपने की याद आ गयी जो उसने काल रात देखा था। उस सपने की याद आते ही राज के मन में कई सारे सवाल उठे।

'कल रात मैंने खुद को उस किले के अंदर पाया जब कि मैं तो आज तक कभी वहाँ गया ही नहीं? फ़िर मुझे ऐसा क्यों लगा कि मैं उस किले के अंदर के चप्पे चप्पे से अच्छी तरह वाकिफ़ हूँ। वहाँ की हर इमारत, हर गली, हर चबूतरे को पहचानता हूँ। और वो लड़की? कौन थी वो कमसिन हसीना? क्यूँ उसकी चीखों से मेरा दिल तड़प उठता है? क्यों उस पर ढाए हर सितम के दर्द का एहसास मुझे होता है? क्या रिश्ता है मेरा उससे ? इस एहसास को क्या नाम दूँ, मैं? हमदर्दी, इंसानियत या फिर कुछ और?'

मेज़ पर रखे लैंडफोन कि घंटी बजी तो राज ने चौंकते हुए उसे देखा। उसने फ़ौरन खुद को संभाला और रिसीवर उठा लिया।

"हेलो?"

"सर, मिस्टर जय आपको अपने केबिन में बुला रहे हैं।" रिसेप्शनिस्ट की मीठी आवाज़ राज के कानों में पड़ी।

"ओके, मैं अभी आता हूँ।"

राज ने फ़ोन रख दिया और सोच में पड़ गया | प्रेज़ेंटेशन में तो अभी काफ़ी वक़्त है फ़िर चैनल के मैनेजिंग डायरेक्टर मिस्टर जय उससे अभी क्यों मिलना चाहते हैं? उन दोनों के बीच सारी बातें तो काफ़ी पहले ही तय हो गयीं थीं। कहीं लास्ट मिनट में मिस्टर जय ने कोई रोड़ा अटकाने का प्लान तो नहीं बना लिया?

राज ने सर झटका और सारे बुरे ख़यालों को अपने दिमाग से निकाल दिया। राज अपनी कुर्सी से उठा और वॉशरूम चला गया। उसने खुद को वॉशरूम के आईने में देखा। राज के 6 फुट लंबे, सुड़ौल शरीर पर काला सूट खूब जच रहा रहा। उसके नयन नक्श भी काफ़ी दिलकश थे।

उसने अपनी टाई सीधी की, बाल सँवारे और वॉशरूम से बाहर निकलकर मिस्टर जय के केबिन की तरफ़ चल पड़ा। ऑफिस के गलियारे में खड़े लड़कियों के एक ग्रुप ने उसे हसरत भरी निगाहों से देखा। मगर, राज उन्हें अनदेखा कर आगे बढ़ गया और मिस्टर जय के केबिन के दरवाज़े पर दस्तक दी।

"कम इन"

अंदर से एक कड़क आवाज़ आयी और राज ने केबिन के अंदर कदम रखा।

"आओ बंधु" स्टाइलिश गॉगल्स पहने, 45 साल के जय ने राज को देखते ही एक औपचारिक मुस्कान के साथ कहा। "प्लीज़ हेव ए सीट।"

ऑफिस में बाकी सबकी तरह जय भी राज को ' बंधु' कहकर बुलाता था।

"कहिए सर, कैसे याद किया आपने मुझे?" जय की आँखों में झाँककर उसके मनसूबों को भाँपने की कोशिश करते हुए राज ने पूछा।

" बंधु तुम्हारा ये जो शो है," अपने लैपटॉप पर राज के भेजे भानुगढ़ वाले प्रेज़ेंटेशन को देखते हुए जय ने पूछा, "क्या इसमें हॉन्टेड जगहों की असलियत ही दिखाना ज़रूरी है?"

"हम इस बारे में पहले भी डिस्कस कर चुके हैं सर," बुरे ख्याल फिर से राज के मन में घर कर गए और उसका चेहरा उतर गया। "और आपने इस प्रोजेक्ट को मंज़ूरी भी दे दी थी। फ़िर, अब ये सवाल क्यूँ ?"

"ऑफ कोर्स!" जय ने खाँसकर गला साफ़ किया और फ़िर मुस्कुराने की कोशिश करते हुए राज को देखा और पूछा, "मगर क्या तुम्हें नहीं लगता ये थोड़ा ...आय मीन...थोड़ा ज़्यादा ही रिस्की हो जाएगा?"

राज चुप रहा और जय की आँखों में देखकर उसके लब्ज़ों में छुपे मतलब को समझने की कोशिश करने लगा।

"देखो, मैं तुम्हें एक हॉरर सिरीस के लिए आसान सा कॉन्सेप्ट बताता हूँ।" जय की आँखें बड़े जोश से दमक उठीं। "एक 24 - 25 साल की खूबसूरत सी लड़की, एक हॉन्टेड बँगले में अकेले रहने आती है। रात को उसे कुछ पैरानॉर्मल एक्सपीरिएन्सेस होते हैं। वो ड़र जाती है और एक सेक्सी सा नाईट गाउन पहने, आधी रात के वक़्त बाहर सड़क पर दौड़ने लगती है।"

"तभी वो हीरो की गाड़ी से टकराते टकराते बच जाती है। दोनों की नज़रें मिलती हैं और प्यार हो जाता है। लड़की उस जाँबाज़ हैंडसम से मदद माँगती है। और हीरो उसके साथ उस हॉन्टेड बँगले में रहने लगता है। बस फ़िर क्या? हर रात प्यार में पागल इस जवान, हसीन जोड़े के बेडरूम सीन दिखाकर ऑडियंस को उकसायेंगे और साथ ही भूत का स्पेशल इफ़ेक्ट डालकर डराएंगे। अपने शो की TRP आसमान छूने लगेगी। बोलो, क्या कहते हो? इस कॉन्सेप्ट पर शो करना चाहोगे?"
 
"जी नहीं सर," अपने अंदर उबलते गुस्से और घिन्न को दबाते हुए राज बोला, "ये शो आप उस ठरकी रणदीप को दे दीजिए। वो इसे सुपरहिट बना देगा। मैं काम करूँगा तो अपने प्रोजेक्ट पर वरना नहीं।"

जय ने आह भरी और कुर्सी पर तनकर बैठ गया। राज की बात से न उसे हैरानी हु,ई न निराशा। उसे राज से इसी जवाब की उम्मीद थी।

"रमण सिंग का नाम तो सुना ही होगा?" जय ने एक मग में थोड़ी कॉफी उड़ेली और उसे राज की तरफ़ बढ़ा दिया। "कुछ साल पहले तक बड़ा फेमस टेलिविज़न रिपोर्टर हुआ करता रहा। उसके शोज़ सुपर डुपर हिट हुआ करते थे। रातों रात बड़ा हॉट स्टार बन गया था। हर चैनल चाहता था कि रमण उनके लिए काम करे। उसे मुँह माँगी कीमत देने के लिए तैयार थे सबके सब।"

"अच्छा खासा कैरियर बना लिया था उसने। फ़िर एक दिन, तुम्हारी तरह पेरानॉर्मल चीजों की हकीकत खोजने का भूत सवार हो गया था उसके सर पर भी। उसने भी अपने शो के पहले एपिसोड के लिए इसी भानुगढ़ के किले को ही चुना था। फ़िर कुछ ऐसा हुआ उसके साथ कि उसने अपना बना बनाया कैरियर छोड़कर जर्नलिज्म से ही सन्यास ले लिया। पता है क्या हुआ था उसके साथ?"

करीब 5 साल पहले, राज ने भी रमण सिंग के हॉरर शो से जुड़ी कुछ खबरें और कई सारी मसालेदार अफवायें सुनी थी।

"हाँ, कुछ सुना तो मैंने भी है," पुरानी बातें याद करते हुए राज के माथे पर शिकन पड़ी। "किले में रात के वक़्त शूट करते हुए उसका एक्सीडेंट हो गया...हम्म...उसे कुछ...बहुत सीरियस चोट लगी। कुछ दिन ICU में भी था। फ़िर काफ़ी अरसे तक विदेशों में उसका इलाज चलता रहा। अब सर, शूटिंग पर ऐसे हादसों का होना तो आम बात है, ना?"

"ये सब तो वो बातें हैं जो सिंग परिवार ने मीडियावालों से अपना पिंड छुड़ाने के लिए बतायीं" जय ने राज को घूरते हुए कहा। "अंदर की बात बस हम कुछ ही लोग जानते हैं। पता भी ICU के अंदर रमण कैसी कैसी हरकतें किया करता था?"

राज ने चौंकते हुए जय को देखा।

"उसका बदन ऐसे कांपता था जैसे उसे मिर्गी के दौरे पड़ रहे हों। वो कुछ अजीब से शब्दों को बार बार दोहराता रहता। दीवारों पर नाखूनों से कुरेद कर कुछ अजीब अजीब सी चीज़े बनाता रहता। बड़े बड़े डॉक्टर भी नहीं समझ पा रहे थे कि आखिर उसका मर्ज़ क्या है? जब मर्ज़ ही नही समझ पाते तो क्या ख़ाक इलाज करते?"

"उसके हॉस्पिटल के बाहर हर वक़्त मीडियावालों का मेला लगा रहता था। ये बात बाहरवालों को पता न चल जाये इसलिए उसके परिवार ने ज़बरदस्ती उसे हॉस्पिटल से डिस्चार्ज करवा लिया और वहाँ से ले गए। फ़िर किसी को उसकी कोई ख़बर नहीं मिली। उसके घरवाले उसे कहाँ ले गए? कहाँ उसका इलाज करवाया? कोई नहीं जानता। साल भर बाद पता चला कि उसने अपनी गर्लफ्रैंड से शादी कर ली है और अब अपने ससुर का बिज़नेस संभाल रहा है।"

जय ने एक गहरी साँस ली और राज की आँखों में देखकर कहा, "I am warning you, Bandhu उस जगह ज़रूर कुछ है जो बहुत खतरनाक है। अब तुम बताओ, क्या इतना बड़ा रिस्क लेना ज़रूरी है। अभी भी वक़्त है बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के साथ मीटिंग में। तुम चाहो तो भानुगढ़ वाले कांसेप्ट को बदलकर, कोई नया कांसेप्ट प्रेज़ेंट कर सकते हो।"

"मैं समझ सकता हूँ सर कि आपको मेरी कितनी फ़िक्र है।" राज ने एक गहरी साँस छोड़ी और पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा, "मगर, चाहे जो हो जाये, मैं इसी प्रॉजेक्ट पर काम करना चाहूँगा।"

"फाइन!" जय ने हाथ खड़े कर लिए "डायरेक्टर बोर्ड की मीटिंग में बस आधा घंटा बाकी है। मीटिंग के बाद मैं चाहूँगा कि तुम रमण सिंग के ऑफिस जाकर उससे एक बार मिल लो। अगर रमण से मिलने के बाद तुम्हारा इरादा बदल जाये तो डायरेक्टर बोर्ड को मैं हैंडल कर लूँगा। और अगर फ़िर भी तुम्हें इसी प्रोजेक्ट पर काम करना है तो रमण का एक्सपीरियंस तुम्हारे काम आएगा।"

"जी ज़रूर," राज कुर्सी से उठकर खड़ा हो गया और बोला, "Thank you sir.”

………………….
 
"सर, आपसे मिस्टर राज शर्मा मिलने आये हैं।"

अपनी सेक्रेटरी शबनम को कहते सुना तो पल भर के लिए रमण के दिल की धड़कनें रुक सी गयीं।

"उन्हें बाहर लाउन्ज में बिठाओ," रमण ने शबनम से मुँह फेर लिया। वो नहीं चाहता था कि शबनम उसके चेहरे से रंग उड़ता देखे। "मुझे एक बहुत इम्पोर्टेन्ट कॉल करनी है। उसके बाद ही मैं उनसे मिल पाऊँगा।"

"ओके सर," शबनम मुस्कुरायी और रमण के केबिन से बाहर चली गयी।

उसके जाते ही रमण ने आह भरी और अपना चेहरा हथेलियों में छुपा लिया।

"ये क्यों आया है?" चेहरे से हथेलियों को हटाकर रमण ने खुद से पूछा। "मेरा इंटरव्यू लेने के बहाने मेरे पुराने ज़ख्मों को कुरेदने? मेरे और कितने इम्तेहान लोगे, ईश्वर? अब तो मुझे बक्श दो!"

भानुगढ़ वाले हादसे के बाद, रमण कभी किसी भी मीडियावाले से नहीं मिला। वो अपने अतीत को भुलाकर गुमनामी के अँधेरे में खो जाना चाहता था। मगर उसके किसी रिश्तेदार ने उसकी शादी की तस्वीर सोशल मीडिया पर पोस्ट कर दी थी। उस तस्वीर में किसी रिपोर्टर ने उसे पहचान लिया और चला आया इंटरव्यू लेने। उस दिन तो रमण ने अपनी माँ की बीमारी का बहाना बनाकर किसी तरह अपनी जान छुड़ा ली।

मगर, उसके ज़रिये और लोग भी रमण के नए घर का पता जान गए। पर जो कोई भी उससे मिलने आता, रमण कोई न कोई बहाना बनाकर मिलने से इनकार कर देता। लेकिन, राज को जय ने भेजा था। और जय को रमण कभी मना नहीं कर सकता था। जर्नलिज्म के दिनों में जय के बहुत एहसान थे रमण पर।

दरअसल, रमण ने अपने करियर की शुरुआत जय के चैनल P2 से ही की थी। उन दोनों की मुलाक़ात पहली बार तब हुई थी जब रमण कॉलेज में था। उन दिनों को याद कर के रमण के मन में एक मीठी सी टीस उठी। कॉलेज के दिनों में जर्नलिज्म उसके लिए शौक, पेशा, जुनून सब कुछ था। कॉलेज का सबसे होनहार स्टूडेंट था, वो। सारे टीचर्स उससे उम्मीद लगाए बैठे थे कि वो एक दिन जर्नलिज्म की दुनिया का चमकता सितारा बनेगा।

अपने करियर के शुरुआती दिनों में सबको लगता था रमण सच मुच उनकी उम्मीदों पर खरा उतरेगा। मगर एक ग़लत चाल काफ़ी होती है आपको ज़िन्दगी की शतरंज में मात देने के लिए। और रमण के लिए वो ग़लत चाल थी, भानुगढ़। जय ने उसे भानुगढ़ जाने से रोकने की हर संभव कोशिश भी की थी। मगर, रमण जोश में इतना अंधा हो गया था कि अपने होश ही खो बैठा। और जब होश आया, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

"जिन शक्तियों के बारे में हम कुछ नहीं जानते उनसे न उलझने में ही हमारी भलाई है।"

रमण को अपने कुलगुरु की कही बात याद आ गयी। कुलगुरु को याद करते हुए उसने अपने गले में पहने रुद्राक्ष की माला को माथे से लगा लिया। फ़िर उसकी नज़र, कलाई पर बँधे कई सारे ताबीज़ों और उंगलियों में पहनी अंगूठियों की ओर गयी।

इन सब के होने के बावजूद और इतने सालों के गुज़रने के बाद भी रमण रातों को चैन की नींद नहीं सो पाता था। रात का अंधेरा, रमण को भानुगढ़ में बितायी उस अमावस की रात की याद दिलाता था जिसके बाद उसकी ज़िन्दगी में फ़िर कभी सवेरा हुआ ही नहीं। उसका जीवन तो जैसे उस एक बिंदु पर रुक सा गया था। और आज फ़िर कोई आया है रमण को उस अतीत की याद दिलाने, जिसे वो कभी दोबारा याद नहीं करना चाहता।

रमण ने एक दर्द में लिपटी आह भरी और फ़ोन का रिसीवर उठा लिया।

"शबनम," रमण ने भारी मन से कहा, "मिस्टर शर्मा को मेरे केबिन में भेज दो।"

केबिन के दरवाज़े पर दस्तक हुई तो रमण की दिल धड़कने भी तेज़ हो गयीं।

"प्लीज़, कम इन," अपनी भावनाओं को काबू में कर के रमण ने कहा।

"प्लीज़ टू मीट यू, मिस्टर सिंग," रमण से हाथ मिलाते हुए राज ने कहा।

"सेम हियर, मिस्टर शर्मा," रमण का स्वर भावहीन था। "प्लीज़ टेक योर सीट।"

"थैंक यू," राज बैठ गया और इधर उधर नज़रें घुमाकर रमण के आलीशान केबिन को देखने लगा।

"कहिए, क्या लेंगे आप ?" फ़ोन का रिसीवर हाथ में लेकर रमण ने पूछा, "टी ऑर कॉफ़ी?

"कुछ नहीं," राज ने हाथ हिलाकर मना कर दिया, "बस आपका थोड़ा सा वक़्त लेना चाहूँगा।"

"आधे घन्टे में मेरी एक क्लाइंट के साथ मीटिंग है," रिसीवर नीचे रखने के बाद कलाई पर बँधी महँगी घड़ी को देखते हुए रमण ने कहा। "मेरा ख्याल है, इतना वक़्त काफी होगा।"

"जी, बड़ी मेहरबानी आपकी।" राज ने सीधे रमण की आँखों में देखा और पूछा, "आपने जर्नलिज्म क्यों छोड़ दी, मिस्टर सिंग?"

"मेरी पत्नी, अपने माँ बाप की इकलौती बेटी है," रमण ने सारे जवाब पहले ही सोच रखे थे। न जाने कितनी बार उससे ये सवाल पूछा जा चुका था। "और उसके पिता का बहुत बड़ा बिज़नेस था, जिसे संभालने वाला कोई नहीं था। इसलिए, उनका दामाद होने के नाते ये ज़िमेदारी मैंने उठा ली।"

"मगर, आप तो कहा करते थे कि जर्नलिज्म आपके लिए सिर्फ पेशा नहीं बल्कि आपकी ज़िंदगी, आपका जुनून और आपका भगवान है।" रमण की लाख कोशिशों के बावजूद भी राज समझ गया था कि रमण झूठ बोल रहा है। "फ़िर अपने भगवान से क्यों मुँह मोड़ लिया आपने?"

"ज़िन्दगी चीज़ ही कुछ ऐसी है," आपने मन में उठते दर्द के सैलाब को दबाते हुए रमण ने कहा। "आपको अपने फ़ैसले और अपने रास्ते बदलने पड़ते हैं ताकि ज़िन्दगी का बहाव रुके नहीं।"

"आपके साथ, उस रात भानुगढ़ के किले में क्या हुआ था?" राज ने बिना घुमाए फिराए, सीधे ही पूछ लिया।

"मुझे बस इतना याद है कि मैं रात के करीब 12 बजे अपना हैंडीकैम लिए होटल से निकला। और जब वहाँ पहुँचा तो 12.30 बज चुके थे। किले के अंदर क्या हुआ मुझे कुछ याद नहीं। अगले दिन सुबह कुछ गाँव वालों ने मुझे किले के पास ज़ख़्मी हालत में देखा और अस्पताल पहुंचा दिया।" रमण ने एक गहरी साँस ली और कहा, "शायद, शूट करते हुए किले की दीवार से नीचे गिर गया था। मेरा हैंडीकैम भी टूटा हुआ मिला।"

"जब आप ICU में थे तो अजीबोगरीब हरकतें क्यों कर रहे थे? ऐसा क्या हुआ था आपके साथ?"

"सर पर चोट लग जाने की वजह से ऐसा होता है कभी कभी," राज के सवालों से रमण बेचैन हो उठा था मगर उसने खुद पर काबू बनाये रखा। "now, I'm perfectly alright!"

"हॉस्पिटल से डिस्चार्ज लेने के बाद साल भर तक आप कहाँ थे?"

"वो मेरा निजी मामला है। आप ये सब क्यों जानना चाहते हैं?" अब रमण के लिए खुद को काबू में रखना मुमकिन नहीं था।

"क्योंकि मैं भी भानुगढ़ के किले पर एक शो करने जा रहा हूँ," राज ने ठंडे स्वर में कहा। "और आपके तजुर्बों से मुझे मेरे प्रॉजेक्ट में मदद मिल सकती है।"

राज की बात सुनकर रमण का मुँह खुला का खुला रह गया। उसका रोम रोम, चिल्ला चिल्लाकर राज को वहां जाने से रोकना चाहता था। मगर, रमण जानता था कि उसके कहने से राज नहीं रुकेगा। ठीक वैसे ही जैसे सालों पहले जय के कहने पर रमण नहीं रुका था।

"विधि के विधान को कोई नहीं बदल सकता |"

कुलगुरु की बात रमण के कानों में गूँजने लगी और उसने खुद को संभाल लिया। राज को रोकने की बजाय वो चुप बैठा रहा और विधि के आगे सर झुका लिया।

"क्या आप मुझे अपने तजुर्बों के बारे में बताना नहीं चाहेंगे, मिस्टर सिंग?"

"तुम्हारे सारे सवालों का जवाब वो किला तुम्हें खुद देगा।" रमण ने सर झुका लिया और कहा, "मेरी मीटिंग का वक़्त हो गया है।"

"थैंक यू, मिस्टर सिंग," राज कुर्सी से उठकर खड़ा हो गया और केबिन से बाहर जाने को मुड़ा।

"भानुगढ़ में बाबा अमरेश्वर के आश्रम ज़रूर जाना, राज," रमण ने पीछे से आवाज़ दी। "वो हमारे कुलगुरु हैं।"

"सॉरी मिस्टर सिंग," राज मुँह दबाकर हँसा और बोला,"मैं इन साधु संतों और इनकी झूठी सिद्धियों में विश्वास नहीं करता।"

"तुम चाहो या न चाहो, राज," रमण ने केबिन की खिड़की से बाहर दूर क्षितिज को देखते हुए कहा, "नियति तुम्हें बाबा जी के पास ले ही जाएगी। मैं उनकी वजह से ही आज ज़िंदा हूँ। हॉस्पिटल से डिस्चार्ज लेने के बाद पूरे एक साल तक उन्ही के आश्रम में मेरा इलाज चला था |
 
रात के साढ़े 11 बज चुके थे। बेड पर बैठा राज, अपने लैपटॉप पर भानुगढ़ के बारे में इंटरनेट रिसर्च कर रहा था। हालाँकि, चैनल के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स को राज का प्रेज़ेंटेशन तो बहुत पसंद आया था मगर अब तक उन्होंने शो को लेकर कोई फ़ैसला नहीं लिया था। भानुगढ़ है ही ऐसी जगह कि बहुत सोच समझकर ही कोई फ़ैसला लिया जा सकता है। इंटरनेट पर भानुगढ़ के बारे में जितने भी आर्टिकल्स मिले, राज ने सब पढ़ डाले। फ़िर उसने लैपटॉप बन्द कर दिया और बिस्तर पर लेट गया।

'क्या हुआ होगा रमण के साथ उस रात भानुगढ़ के किले में?' बेड पर लेटा राज ने कमरे की छत को ताकते हुए राज सोचने लगा । 'सच आखिर है क्या? वो जो रमण कह रहा है? या फ़िर वो जो जय सर ने मुझे बताया? हो सकता है रमण की बात ही सही हो? शूट करते वक़्त उसे सर पर चोट लग गयी हो? दिमाग पर चोट लगने की वजह से उसे दौरे पड़े हों? और मीडियावालों ने बात का बतंगड़ बना दिया हो।'

"मीडिया को बस चटपटी खबरें चाहिए ताकी चैनल की TRP बढ़ जाये," मुँह बनाते हुए राज ने खुद से कहा।

राज ने करवट बदली और सोचा, 'फ़िर रमण ने ये क्यों कहा कि बाबा के आश्रम में उसका इलाज चल रहा था। आश्रम में कैसा इलाज हो सकता है?'

राज के मन में भानुगढ़ की तस्वीर उभर आयी और वो पीठ के बल लेटकर फ़िर से छत को ताकने लगा।

'क्या भानुगढ़ में सच मुच कुछ ऐसा है जिसे पैरानॉर्मल कहा जा सकता है? मेरी रिसर्च के दौरान मैंने बहुत कुछ सुना और पढ़ा है भानुगढ़ के बारे में। तरह तरह के लोग, तरह तरह की बातें बताते हैं। अब किसमें कितनी सच्चाई है ये तो कहना मुश्किल है।'

'मगर फ़िर भी, अगर सारी जानकारी को जोड़ तोड़कर देखें तो सबका यही मानना है कि सदियों पहले भानुगढ़ के किले में भयंकर आग लग गयी थी। जिसमें कई सारे लोग मारे गए थे। और माना जाता है कि उन लोगों की आत्माएं अब भी उसी किले में भटक रहीं हैं। इसलिए, ये किला भूतिया जगहों की लिस्ट में नम्बर वन पर है। अब इसमें कितनी सच्चाई है ये तो वहाँ जाकर ही पता चलेगा।'

दिन भर बहुत दौड़ धूप करने की वजह से राज थक गया था। ऊपर से देर रात हो चुकी थी। उसकी पलकें कब झपक गयीं पता ही न चला।

• • •

राज को अपनी आँखों के समाने, एक बार फ़िर भानुगढ़ का किला नज़र आया। और साथ ही, एक भयानक से दिखने वाले जल्लाद की बाहों में बेहोश पड़ी एक खूबसूरत लड़की का नग्न शरीर। राज देखते ही समझ गया कि ये वही डरावना सपना है जो उसे बीती रात आया था। उस जल्लाद की नज़रें, लड़की के हसीन चेहरे से होती हुई उसकी उभरी छाती तक और फ़िर उसकी सुड़ौल नाभि से होती हुई उसकी टाँगों के बीच जा रुकी।

जल्लाद का बदन काम की आग से झुलस उठा और उसका लंड उत्तेजना से तड़प उठा। उसने उस लड़की के कमसिन बदन को बाहों में उठा लिया और उसे वापस उसी दिशा में ले चला जहाँ से वो बचती बचाती हुई आयी थी। उस लड़की के हाथों की चूड़ियों और पैरों के पायलों की खनक उस वीराने में गूँज उठी।

जल्लाद ने दो कदम ही आगे बढ़ाए होंगे कि किसी ने पीछे से आकर उसकी गर्दन पर तलवार रख दी।

"छोड़ दो उसे," पीछे से एक स्त्री की आवाज़ सुनायी दी।

उस जल्लाद ने धीरे से अपनी गर्दन पीछे की तरफ़ घुमायी। अँधेरे की ओट से एक लड़की हाथ में तलवार लिए निकल आयी। उसका रंग साँवला था और नयन नक्श भी कुछ खास खूबसूरत नहीं थे। उसका छरहरा बदन, महँगे रेशमी कपड़ों और बेशकीमती गहनों से सजा था। उसकी खुली ज़ुल्फें उसकी कमर पर लहरा रहीं थी। उसके चेहरे का निचला आधा हिस्सा नक़ाब से ढँका था।

"ओह! तो तुम हो?" जल्लाद की आवाज़ में नफ़रत भी थी और घमंड भी।

"अपनी जान की सलामती चाहते हो तो छोड़ दो उसे और चले जाओ यहाँ से," तलवार को दोनों हाथों में मज़बूती से पकड़े वो लड़की चिल्लायी।

उस जल्लाद ने अपनी बाहों में बेहोश पड़ी लड़की को नीचे उतारा और उसके नग्न शरीर को नीचे फ़र्श पर लिटा दिया।

"आआह..."

उस जल्लाद के पीछे खड़ी लड़की की गर्दन पर पीछे से किसी ने एक ज़ोरदार मुक्का मारा। तलवार उसके हाथ से गिर पड़ी और उसका सर चकराने लगा। एक हैवान जैसे दिखने वाले आदमी ने आगे बढ़कर लड़की के लड़खड़ाते बदन को अपनी ताकतवर बाहों में थाम लिया। दो पलों के अंदर ही लड़की की पलकें झपक गयीं और वो उस हैवान की बाहों में बेहोश हो गयी।

उसके सामने खड़े जल्लाद ने फ़र्श पर पड़ी उस लड़की की तलवार को उठा लिया और उसके सारे कपड़े फाड़ डाले। फ़िर वो घुटनों के बल बैठ गया और लड़की की दोनों टाँगों को फैलाकर उसकी चूत को भूखे भेड़िये की तरह चाटने लगा। जो हैवान उस लड़की के बेहोश बदन को थामे हुआ था वो उसकी छाती के उभारों की नग्नता के साथ खिलवाड़ करने लगा।

जब दोनों का मन भर गया तो उस हैवान ने लड़की को उठाकर अपने कंधे पर लाद लिया। दूसरे जल्लाद ने फ़र्श पर बेहोश पड़ी लड़की को उठाया और अपने कंधे पर डाल दिया। फ़िर दोनों ने ऐसी खौफ़नाक आवाज़ में ठहाके लगाए कि किले की हर दीवार काँप उठी।

…………………………………………..

राज चौंककर उठ बैठा और घबरायी हुई नज़रों से आस पास देखने लगा। उसके बेडरूम में सन्नाटा छाया हुआ था। राज पसीने से नहाया हुआ था और ज़ोरों से हाँफ रहा था। उसने कमरे की लाइट ऑन की और मेज़ पर रखे जग से पानी को अपने मुँह में उड़ेलकर गटागट पी गया। फ़िर उसने जग को मेज़ पर रख दिया और एक गहरी साँस लेकर खुद को शांत किया। उसने सपने में जो भी चेहरे देखे, वो इस बार पिछली रात से भी ज्यादा साफ़ नज़र आ रहे थे |

राज को ऐसा लगा कि वो उन चेहरों को बहुत अच्छी तरह से पहचानता है | हालाँकि वो उन लोगों से आज तक कभी नहीं मिला, मगर फिर भी न जाने क्यूँ राज को लग रहा था कि वो उन सबको जानता है | उसे न उन लोगों के नाम मालूम थे, न ही वो जानता था कि वो लोग कौन हैं ? मगर, फिर भी उसे यकीन था वो लोग उसके लिए अजनबी तो नहीं हैं | राज को खुद अपनी इस सोच पर हैरानी हो रही थी | उसका दिमाग इस ख्याल को महज़ वहम मानकर ठुकरा देना चाहता था मगर उसका दिल इसे सच मानता था |

उसकी चढ़ी हुई साँसें ज़रा पकड़ में आयीं ही थी कि कमरे में अचानक एक तेज़ आवाज़ गूँज उठी। राज ने देखा कि मेज़ पर रखे उसके मोबाइल फ़ोन पर घण्टियाँ बज रहीं थी। उसने फौरन मेज़ से मोबाइल फ़ोन उठा लिया। फ़ोन के स्क्रीन पर जय का नम्बर दिख रहा था। राज ने खिड़की से बाहर देखा कि पौ फट चुकी थी। जय उन लोगों में से था जिनके दिन की शुरुआत कुछ ज़्यादा ही जल्दी हो जाती थी।

"गुड़ मॉर्निंग, बॉस," राज ने फ़ोन पर धीमी आवाज़ में कहा।

"मॉर्निंग बंधु" जय ने आह भरी और कहा, "चैनल के बोर्ड़ ऑफ डायरेक्टर्स ने तुम्हारे शो को रज़ामंदी दे दी है। डायरेक्टर्स चाहते हैं कि तुम जितनी जल्दी हो सके भानुगढ़ चले जाओ और शूटिंग शुरू कर दो। काँग्रेटज़ बंधु"!"

"थैंक यू, बॉस," राज का चेहरा खिल उठा।

"और सुनो," बॉस की आवाज़ में अचानक से उत्साह आ गया। "भानुगढ़ में तुम्हारे रहने का इंतज़ाम ब्रिगेडियर चौहान के बँगले पर किया गया है। वो मेरे संपूज्य ससुर जी के सबसे खास दोस्त हैं | एक ज़माने में वो हमारे ससुर जी की बटालियन में थे | दोनों की दोस्ती इतनी घहरी थी कि हर पसोटींग दोनों एक ही जगह पर लेते थे | फिर, ससुर जी रिटायर हो गए तो ब्रिगेडियर साहब ने भी फौज छोड़ दी |”

“उनकी फेमिली बड़ी दौलतमंद हैं और ब्रिगेडियर उस दौलत के इकलौते वारिस | अब अपनी रेटायरमेंट लाइफ बड़े आराम से अपनी पुश्तानी हवेली में बिता रहें हैं | मेरे ससुराल में जब भी कोई फंगक्शन होता है, ब्रिगेडियर साहब ज़रूर तशरीफ़ ले आते हैं | ऐसे ही हमारी भी उनसे दोस्ती हो गयी | हमने कहा, हमारे एक दोस्त अपने काम के सिलसिले में भानुगढ़ आ रहें हैं, तो उन्होंने ज़िद्द पकड़ ली कि उनकी हवेली में ही ठहराया जाए | हमने भी सोचा अच्छी बात हैं | इतनी बड़ी हवेली में अकेले रहते रहते ब्रिगेडियर साहब ऊब गए होंगे | तुम वहाँ रहोगे तो उन्हें एक अच्छी कंपनी मिल जाएगी | क्या कहते हो, कोई ऐतराज़ तो नहीं न तुम्हें ?”

"नो बॉस," राज मुस्कुराया, “मुझे क्या ऐतराज़ हो सकता है ?”

"ठीक है तो फिर मैं ब्रिगेडियर को इत्तला कर देता हूँ |" जय ने एक गहरी साँस ली और कहा, “अच्छा बंधु मेरे जिम जाने का वक़्त हो गया है। तुम आज ही रवाना हो जाओ। कैच यू लेटर।"

"ओके बॉस"

राज ने फ़ोन काट दिया और तैयार होने वॉशरूम की तरफ़ चल पड़ा। वो भानुगढ़ पहुँचने को बेसब्र हुआ जा रहा था। उसके बरसों की तमन्ना जो पूरी होने वाली थी।
 
राज की ट्रेन भानुगढ़ के सूनसान स्टेशन पर रुकी तो वो बड़े जोश के साथ अपना सामान लेकर प्लेटफॉर्म पर उतर गया। शाम ढ़ल चुकी थी। सूरज की बुझती रोशनी पर अँधेरे की काली चादर हावी हो रही थी। चारों तरफ़ एक मनहूस सा सन्नाटा छाया हुआ था। राज ने अपने जिस्म में एक अजीब सी ठंडक महसूस की और वो सिहर उठा। भानुगढ़ कि ज़मीन पर कदम रखते ही राज को ऐसा लगा जैसे वहाँ का किला ही नहीं, वहाँ की मिट्टी, हवा और बाकी सब कुछ शापित है। जिस नकारात्मक शक्ति के यहाँ होने का ज़िक्र उसने सुना था, राज को ऐसा लगा कि वो शक्ति सचमुच अपने होने का एहसास उसे करवा रही है।

राज ने अपने जैकेट की ज़िप बन्द कर ली और अपना सामान लेकर स्टेशन से बाहर निकल आया । बाहर एक बड़ी सी कार खड़ी थी जिसका ड्राइवर, राज को देखकर यूँ मुस्कुराया जैसे वो राज को पहले से जानता हो। उसकी उम्र करीब 40 - 45 साल की होगी और वो साफ़ सुथरी, सफ़ेद वर्दी पहने हुए था। उसके सर पर बालों का तो अकाल था मगर चेहरे पर मुस्कान बाढ़ के पानी की तरह बह रही थी।

"मैं कामत प्रसाद हूँ," वो राज के हाथ से उसका सामान लेकर कार की डिक्की में रखते हुए बोला, "ब्रिगेडियर साहब का ड्राइवर। आप कार में आराम से बैठ जाईये, राज बाबू। यहाँ से ब्रिगेडियर साहब की हवेली तक का सफ़र करीब घन्टे भर का होगा। यहाँ की सड़कें उबड़ खाबड़ हैं और ऊपर से रात का अँधियारा भी, जिसकी वजह से वक़्त थोड़ा ज़्यादा भी लग सकता है।"

"आपने मुझे कैसे पहचान लिया?" राज हैरान था।

"अरे! इस भूतिया नगर में कितने लोग आते हैं जो न पहचानने का सवाल उठे?"

कामत ने मुस्कुराते हुए पूछा। "अब आप ही बताइए, उस ट्रैन से आपके अलावा और कोई और उतरा इस स्टेशन पर?"

"हाँ, बात तो आपकी सही है," राज कार की पिछली सीट पर बैठ गया और खिड़की खोल ली।

"बाबू जी," सामने लगे शीशे में पीछे बैठे राज को देखते हुए कामत बोला, "आप खिड़की बन्द ही रखें तो अच्छा है। आगे का रास्ता काफ़ी सूनसान है। सड़क का एक हिस्सा तो जंगल के बीच से होकर जाता है। इस बख़त जंगल से बड़ी अजीब अजीब सी अवाज़ें सुनायी देती हैं। और वैसे भी ठंड बहुत है। बीमार पड़ जायेंगे आप।"

"आपकी ये बात भी सही है," राज ने मुस्कुराते हुए कार की खिड़की बन्द कर ली।

कामत ने कार स्टार्ट की और साथ ही कार का स्टीरियो ऑन कर के उस पर बड़ी तेज़ आवाज़ में हनुमान चालीसा चला दिया।

"आप बजरंग बली के बड़े भक्त मालूम होते हैं," राज मुस्कुराया।

"आप भी रट लीजिए हनुमान चालीसा," कामत बोला, "इस भानुगढ़ में आपकी रक्षा सिर्फ़ बजरंग बली ही कर सकते हैं।"

"यहाँ का किला सचमुच भूतिया है क्या, कामत जी?" कार सूनसान सड़क पर आगे बढ़ी तो राज ने पूछा।

"हाँ, जी बिल्कुल है," कामत इतने धीमे से फुसफुसाए जैसे भूत भी इस सफ़र में उनके हमसफ़र हों।

"ये बात आप इतने यकीन के साथ कैसे कह सकते हैं?" राज भौहें सिकोड़े कामत को देखने लगा। "आपका कभी सामना हुआ है भूतों से?"

"अगर भूतों से सामना हो गया होता तो हम यूँ आपके सामने बैठे होते क्या?"

"तो आप क्या बस सुनी सुनायी बातों पर यकीन करते हो?"

"सुनी, सुनायी नहीं बाबूजी," कामत के चेहरे का रंग उड़ गया, "हमारे बहुत सारे करीबी लोगों की आपबीती है। अभी पिछले साल ही हमारे पड़ोसी का लड़का कपिल इन बुरी शक्तियों का शिकार हो गया। एक शाम उसके बाबा की तबियत अचानक बिगड़ गयी। उन्हें शहर के अस्पताल में भर्ती करवा कर कपिल घर से कुछ पैसे, कपड़े वगैरह लेने यहाँ वापस आया।"

"यहाँ पहुँचा तो सूरज ढ़ल चुका था। उसके घर तक जाने वाली सड़क से किला दिखता था। कपिल किसी तरह भगवान का नाम लेकर उस रास्ते से निकल रहा था कि उसे किले में एक रोशनी नज़र आयी। उसे ऐसा लगा कि वो रोशनी उसे अपनी तरफ़ खींच रही है। न चाहते हुए भी वो इस रोशनी की तरफ़ बढ़ गया। फ़िर न जाने उसके साथ क्या हुआ कि वो पगला गया। दिन भर मंदिर में बैठा रहता है और पागलों की तरह न जाने क्या बड़बड़ाता रहता है?"

"ये सब मन का वहम है और कुछ नहीं," राज ने ज़ोर से अपना सर झटका। "आप सब लोगों के मन में ये बात गहरायी में बैठ गयी है कि वो किला भूतिया है। अब अगर उस किले में रात के वक़्त आपको कोई मामूली सी हरकत भी नज़र आये तो आप लोग न जाने क्या समझ बैठेंगे?"

"आपसे पहले भी शहर से एक बाबू आये थे," कामत ने आह भरी, "वो भी ऐसी ही बातें किया करते थे। फ़िर सुनने में आया कि उनका भी हाल कुछ कपिल जैसा ही हो गया था।"

"मैं सच का पता लगाने ही आया हूँ, कामत जी," राज ने मुस्कुराते हुए कामत को देखा।

"आप बड़े भले मानुस लगते हो, बाबूजी।" कामत ने अपने गले में बंधी ताबीज़ को कसकर पकड़ लिया और बोला, "मैं तो आपसे यही कहना चाहूँगा कि उस किले से दूर ही रहिये। बाकी आपकी मर्ज़ी। आप हमसे ज़्यादा पढ़े लिखे हो, समझदार हो।"

"फिलहाल, ये चर्चा हम यहीं बंद कर देते हैं," राज मुस्कुराया | "वैसे ब्रिगेडियर साहब की हवेली और कितनी दूर है?"

"बस 15 मिनट और लगेंगे," कामत ने कहा।

"बातों ही बातों में सफ़र कितनी जल्दी कट गया न?" राज ने अपना मोबाइल फ़ोन निकाला और उस पर मैसेज और मेल्स चेक करने लगा।

“सो तो है, बाबू जी,” इतना कहकर कामत ने चुप्पी साध ली |

हालाँकि कामत चाहता था कि बाकी का रास्ता भी बतियाते हुए कटे, मगर राज को काम में मसरूफ़ देखकर वो चुप हो गया |

कुछ देर बाद, राज ने अपने मोबाईल फ़ोन से नज़रें उठाकर सड़क की ओर देखा तो उसे अँधेरे में डूबी सड़क पर रोशनी की झलक नज़र आयी। कार थोड़ी और आगे बढ़ी और एक बड़े से लोहे के गेट के अंदर दाखिल हो गयी। उस गेट के दोनों तरफ़ दो बड़ी लाइट लगी हुई थी जो सूनी सड़क को रोशन किये हुई थी। गेट से एक तंग सा रास्ता, एक बड़े से बँगले की तरफ़ जाता था। उस रास्ते की दोनों तरफ़ लाइट्स लगीं हुई थी। रास्ते के दोनों तरफ़ बड़ा सा बगीचा था।

"आ गयी हमारी मंज़िल," बँगले के बरामदे में कार रोकते हुए कामत ने कहा।

"हनुमान चालीसा की शक्ति ने हमें सही सलामत पहुँचा दिया। जय बजरंग बली की!"

कामत ने डिक्की से राज का सामान निकाला ही था कि बँगले का दरवाज़ा खुला और काली वर्दी पहने दो नौकर दौड़े चले आये।

"ब्रिगेडियर साहब, अंदर लाइब्रेरी में आपका इंतज़ार कर रहे हैं," एक नौकर ने राज को इत्तला दी। "आप अंदर जाकर उनसे मिल लीजिए। हम आपका सामान गेस्टरूम में पहुँचा देंगे।"

"शुक्रिया," राज उनके पीछे पीछे बँगले के अंदर चल पड़ा।

बाहर के मुकाबले में बँगले के अंदर रोशनी काफी कम थी। खूबसूरत कालीन से सजी फ़र्श पर चलते हुए राज हॉल की तरफ़ बढ़ा। हॉल काफ़ी बड़ा था और उसकी छत से एक बहुत बड़ा और खूबसूरत झूमर लटक रहा था जो कि पूरे हॉल में रोशनी बिखेरने का काम कर रहा था। हॉल के दोनों तरफ़ से दो सीढ़ियाँ ऊपर की मंज़िल की तरफ़ जाती थीं। एक नौकर, राज का सामान लेकर उस सीधी पर चढ़ गया।

"लाइब्रेरी इस तरफ़ है सर," दूसरा नौकर सीढ़ियों के नीचे से होते हुए एक तंग गलियारे की तरफ़ बढ़ा।

राज भी उसके पीछे हो लिया।

कुछ कदम आगे बढ़ने के बाद नौकर ने एक बड़े से दरवाज़े पर दस्तक दी।

"कम इन!" अंदर से आवाज़ आयी।

"आप अंदर जा सकते है, सर," नौकर ने फ़ौजियों की तरह एकदम चुस्त अंदाज़ में कहा और बड़ी तेज़ी से वहाँ से निकल गया।

राज ने दरवाज़ा खोला और लाइब्रेरी के अंदर आ गया। लाइब्रेरी हॉल से भी बड़ी थी और उसकी हर दीवार पर एक बड़ी सी रैक लगी थी जिसमें सैकड़ों किताबें रखीं थी। ठीक बीच में एक आलीशान सोफा सेट था। सफेद रंग के मखमली सोफ़े के पास एक काँच की टेबल थी जिस पर शतरंज की बिसात बिछी हुई थी। सोफ़े पर नाईट गाउन पहने बैठा एक आदमी अकेले ही शतरंज खेल रहा था।

राज ने अंदाज़ा लगाया कि वो ही ब्रिगेडियर होंगें। जय के मुताबिक ब्रिगेडियर की उम्र 60 साल से ऊपर की होगी मगर देखने में वो 45-50 साल से ज़्यादा के नहीं लगते रहे।
 
जय ने बताया था कि उनकी पत्नी गुज़र चुकी थीं और इकलौती बेटी अपनी शादी के बाद विदेश जा बसी थी। इसलिए वो इतने बड़े बँगले में अकेले ही रहते थे। राज उनकी तरफ़ बढ़ चला। राज के कदमों की आहट सुनकर ब्रिगेडियर ने शतरंज से नज़रें उठाकर उसे देखा और बड़े प्यार से मुस्कुराये।

"प्लीज़ड टू मीट यू, यंगमैन," ब्रिगेडियर ने बड़ी गर्मजोशी से राज के साथ हाथ मिलाया।

"द प्लेशर इज़ ऑल माइन, सर," राज मुस्कुराया।

"बैठो," सोफ़े की तरफ़ इशारा करते हुए ब्रिगेडियर ने कहा, "सफ़र कैसा रहा तुम्हारा?"

"जी, अच्छा ही था," राज सोफ़े पर बैठ गया।

"नारायण, 2 कप कॉफ़ी भिजवा दो, प्लीज़," ब्रिगेडियर ने मेज़ पर रखे फ़ोन पर आर्डर दिया। "थैंक यू।"

"यहाँ आकर तुम्हें डर तो नहीं लग रहा?" ब्रिगेडियर मुँह दबाये हँसे।

"नहीं तो सर," राज ने हाथ खड़े कर दिए, "यहाँ ड़र लगने जैसा क्या है?"

"मानो तो है, नहीं मानो तो नहीं है," ब्रिगेडियर ने सिगार का डब्बा खोला और राज की ओर बढ़ाया।

राज ने हाथ के इशारे से मना कर दिया। तभी नौकर एक ट्रे में कॉफ़ी के दो कप लिए आ गया। उसने ट्रे राज की तरफ़ बढ़ायी।

"थैंक यू," राज ने कॉफ़ी का कप लेते हुए कहा।

ब्रिगेडियर को कॉफ़ी देने के बाद नौकर वहाँ से चला गया।

"और आप क्या मानते हैं, ब्रिगेडियर साहब?" कॉफ़ी का एक घूँट पीकर राज ने पूछा।

"मेरे लिए ये सब महज़ कहानियाँ हैं," कॉफ़ी का स्वाद चखते ही ब्रिगेडियर साहब की आँखों में चमक आ गयी। "सुनना चाहोगे भानुगढ़ के भूतिया किले की कहानी?"

"जी, ज़रूर," राज ने कॉफ़ी के कप को मेज़ पर रख दिया।

"हज़ारों साल पहले, यहाँ सारणीया राजवंश की हुकूमत हुआ करती थी। उस राजवंश की दसवीं पीढ़ी के महाराज भानुप्रतापदेव सारणीया से ये कहानी शुरू होती है। महाराज भानुप्रतापदेव बड़े ही दयालु और कर्तव्यनिष्ठ राजा थे। मगर, राजा का कोई बेटा नहीं था जो उनके बाद, उनका राजकाज संभाल सके और शत्रुओं से अपने राज्य और प्रजा की रक्षा कर सके। राजा को हर वक़्त एक डर सताया करता था। राजा की बढ़ती उम्र के साथ उनका ये ड़र और चिंता और ज़्यादा बढ़ते गए।"

"राजा के उस ड़र का नाम था, महाराज सुरेंदर प्रताप। वो भानुगढ़ के पड़ोसी देश, समरगढ़ का राजा था और बड़ा ही क्रूर था। उसने अपनी प्रजा पर तरह तरह के ज़ुल्म ढाए थे। हर वक़्त बस, प्रजा को सता कर अपनी तिजोरियाँ भरने की फ़िराक़ में रहता था वो। भानुगढ़ पर उसकी बुरी नज़र थी।

राजा भानुप्रतापदेव उस दुष्ट राजा सुरेंदर से किसी तरह का मन मुटाव नहीं चाहते थे। इसलिए, उन्होंने एक दिन सुरेंदर प्रताप को अपने महल आने का न्योता दे दिया ताकि दोनों आपसी बातचीत के ज़रिए कोई ऐसा रास्ता निकलें कि जिससे दोनों राज्य के बीच कभी जंग ने हो और अच्छे तालुकात बने रहें। इसी बीच राजा भानुप्रतापदेव की तबियत काफ़ी बिगड़ गयी। उनका आखिरी वक़्त करीब आ गया था।"

"राजा भानुप्रतापदेव का न्योता स्वीकार कर विराटपुर से कुछ लोग भानुगढ़ आ गए। भानुगढ़ की प्रजा के बीच किसी ने अफ़वाह उड़ा दी कि राजा भानुप्रतापदेव, अपना राज्य महाराज सुरेंदर प्रताप को सौंप रहे हैं ताकि महाराज सुरेंदर उनकी और राजपरिवार की जान बक्श दें। प्रजा का गुस्सा भड़क गया और वो राजा के खिलाफ़ विरोध पर उतर आए। करीब आधी रात के वक़्त, भानुगढ़ की पूरी प्रजा ने मिलकर राजमहल पर हमला कर दिया और वहाँ आग लगा दी।"

"राजा के सैनिक भी विद्रोहियों को कुचलने में नाकामयाब रहे और सब कुछ जलकर ख़ाक हो गया। महल के अंदर फँसे कई सारे बेकसूर लोग आग में झुलसकर मर गए। कहते हैं, भानुगढ़ के किले के अंदर आज भी उन बेकसूर लोगों की आत्मा भटकती है। वो आत्माएँ, भानुगढ़ के लोगों से अपनी मौत का बदला लेने को बेचैन हैं।"

"रात के अंधेरे में ये आत्माएँ बहुत ज़्यादा ताकतवर हो जाती हैं। उस वक़्त जो किले के अंदर जाता है, वो कभी ज़िंदा वापस नहीं आता। और अगर किले से बच निकल भी जाये तो अपना दिमागी संतुलन खो बैठता है। तो ये थी भानुगढ़ के भूतिया किले की दास्तान। कैसी लगी ये कहानी तुमको?"

"इंटरेस्टिंग! वेरी इंटरेस्टिंग," राज ने ताली बजायी और कहा, "और मैं अपने शो के ज़रिए के साबित कर दूँगा कि ये सिर्फ़ एक कहानी है और वहाँ कोई भूत नहीं है।"

"ऑल द बेस्ट!" ब्रिगेडियर ने राज से हाथ मिलाया और कहा, "चलो, अब तुम फ्रेश हो जाओ। और ठीक 8 बजे डायनिंग रूम में पहुँच जाओ। आज तुम्हारे लिए बहुत स्पेशल खाना बना है। और सुनो देर मत करना, मैं वक़्त का बड़ा पाबंद हूँ।"

"जी, बन्दा ठीक 8 बजे हाज़िर हो जाएगा," राज अपने सीने पर हाथ रखते हुए सोफ़े से उठा।

"ऊपर की मंज़िल पर दायीं तरफ़ पहला कमरा, गेस्टरूम है," ब्रिगेडियर की नज़रें शतरंज की ओर लौट गयीं। "वहाँ तुम्हारी ज़रूरत की सारी चीज़ों का इंतज़ाम करवा दिया गया है। और भी किसी चीज़ की ज़रूरत हो तो किचन में फ़ोन कर के शंकर को कह देना। इंटरकॉम के पास ही सारे नंबर लिखे हुए हैं।"

"शुक्रिया, सर"

राज लाइब्रेरी से बाहर चला आया और तेज़ी से ऊपर की तरफ़ जाती सीढ़ियाँ चढ़ने लगा।

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डिनर के बाद, राज गेस्टरूम के किंग साइज़ बेड पर आराम से लेट गया। राज को अपने अंदर एक नया जोश महसूस हो रहा था। ब्रिगेडियर आदमी बड़ा खुशमिज़ाज़ और मिलनसार था। कुछ ही घंटों में ही राज की उससे अच्छी दोस्ती हो गयी है। और खाना भी बड़ा लज़ीज़ था। राज का पेट और मन दोनों ही खुशी से भर गए थे।

रात के खाने का लुत्फ़ उठाने के बाद, दोनों ने लाइब्रेरी में बैठकर व्हिस्की पी और ब्रिगेडियर ने अपने फ़ौजी जीवन के कुछ किस्से सुनाए। साथ ही, ब्रिगेडियर ने उसे बहुत सारी ऐसी पेरानॉर्मल घटनाओं के बारे में भी बताया जो भानुगढ़ के लोगों के साथ हुई थीं। बँगले के सारे नौकर, राज को ऐसी नज़रों से देख रहे थे जैसे मानो कह रहे हों, 'क्यों भरी जवानी में शहीद होना चाहते हो? ' उनके डरे हुए चेहरों की याद आते ही राज खिलखिलाकर हँस पड़ा।

"ब्रिगेडियर ने जो कुछ किले के बारे में बताया, उससे मेरे शो के पहले एपिसोड के लिए काफ़ी मैटीरियल मिल गया है," राज बेड पर उठकर बैठ गया।

राज ने पलंग के पास रखी मेज़ पर पड़े बैग से लैपटॉप निकाला और उस पर अपने शो की डिटेल्स टाइप करने लगा।

"शो की शुरुआत मैं, दो पड़ोसी राजाओं की आपसी दुश्मनी की कहानी सुनाकर करूँगा। उसके बाद, राजमहल में विद्रोहियों की लगायी आग और उस आग में जलकर मारे गए लोगों की आत्माओं के बारे में बताकर ऑडिएंस को डराउंगा। हाँ, ये ठीक रहेगा।" राज ने चुटकी बजायी और लैपटॉप पर टाइप करने लगा।

"उसके बाद, वहाँ के चप्पे चप्पे की रिकॉर्डिंग दिखाऊँगा। अगर, कहीं कोई पेरानॉर्मल एक्टिविटी नहीं दिखायी देती, मतलब नो भूत!" राज ने अपने लैपटॉप पर किले की तस्वीर को ग़ौर से देखा।

"कल दिन में ही हर तरफ़ सीसीटीवी कैमरे लगावाने होंगे। बॉस को बोल दिया है, कल तड़के ही वो टेक्निशियंस को भेजकर काम शुरू करवा देंगें। अगर, कल दिन में ही काम पूरा हो जाये तो रात होते ही शूटिंग शुरू कर दूँ। पूरे किले में घूमकर मुझे अकेले ही सब शूट करना होगा।"

राज ने एक बार फ़िर लैपटॉप पर किले की फ़ोटो को देखा और फ़िर उसे बन्द कर वापस बैग में रख दिया। वो बिस्तर पर लेट गया और मन ही मन अगले दिन के शूट की प्लानिंग करने लगा। कहाँ कहाँ कैमरा लगाना है। कौन सा शॉट कैसे लेना है। यही सब सोचते सोचते उसे नींद आ गयी।

पलकें झपकते ही उसकी आँखों के सामने भानुगढ़ का किला आ गया। मगर इस बार, उसे खण्डर नहीं नज़र आये बल्कि राजमहल की संगमरमर से बनी दीवारों की सुंदर नक्काशी नज़र आयी। राजमहल के गलियारों में बिछी खूबसूरत कालीन नज़र आयी। ऊँची छत पर लटकते झूमर और खिडकियों के काँच पर बनी रंगीन तस्वीरें दिखीं। वो, राजमहल की शान-ओ-शौकत को बस देखता ही रह गया।

इतने में किसी के चीखने की आवाज़ सुनकर राज चौंक उठा। आवाज़ पीछे से आयी थी इसलिए वो फौरन पीछे मुड़ गया। उसने देखा एक खूबसूरत सी लड़की दौड़ती हुई उसके करीब आ रही थी। ये वही लड़की थी जिसे राज पिछले कई दिनों से अपने सपनों में देख रहा था।

उसके पीछे 2 जल्लाद, हाथों में तलवारें लिए उसे पकड़ने के लिए भाग रहे थे। और उनके पीछे वर्दी पहने सैनिकों का एक जत्था था। वो लड़की दौड़ती हुई आयी और राज के सीने से लग गयी। फ़िर उसने राज के सीने से अपना सर ऊपर उठाया और उसकी आँखों में देखा। लड़की की कजरारी आँखों में आँसू भरे थे।

"आपने तो हमारी रक्षा करने का वचन दिया था, न?" उस लड़की ने सिसकियाँ भरते हुए पूछा, "जब हमें आपकी ज़रूरत पड़ी तो आप हमें छोड़कर कहाँ चले गए, वीरभद्र?"

उसकी बात सुनकर राज हैरान रह गया। राज के मन में हज़ारों सवाल तूफान की तरह उठे। मगर इससे पहले की वो कुछ कह पाता उन दोनों जल्लादों ने आगे बढ़कर उस लड़की को खींचकर राज से अलग कर दिया। उस लड़की की आँखों से आँसू छलककर उसके गालों पर फिसल आये। उसने अपना हाथ राज की तरफ़ बढ़ाया।

राज का अपने ऊपर बिल्कुल काबू न रहा और उसका हाथ खुद ब खुद उस लड़की की तरफ़ बढ़ गया। राज पर एक अजीब सा जुनून सवार हो गया। उसने हर हाल में उस लड़की को बचाने के लिए कमर कस ली। वो अकेला, निहत्था उन दो ताकतवर जल्लादों और उनकी पूरी सेना से लड़ने को तैयार हो गया।

फ़िर चाहे वो अपनी तलवारों से उसके टुकड़े टुकड़े क्यों न कर दे। मगर, अपनी जान की बाज़ी लगाकर भी वो उसकी जान ज़रूर बचाएगा। राज नहीं जानता था उस लड़की से उसका क्या रिश्ता था मगर इतना ज़रूर जानता था कि वो उसके लिए अपनी जान से भी प्यारी थी। मगर इससे पहले कि राज उस लड़की तक पहुँच पाता उस जल्लाद ने लड़की की गर्दन की नस दबाकर उसे बेहोश कर दिया। और फ़िर उसके बेहोश जिस्म को कंधे पर लादकर अँधेरे में कहीं गायब हो गया।
 
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