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Adultery अधूरी दास्तां

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Adultery अधूरी दास्तां

राजस्थान का विशाल रेगिस्तान उस रात किसी सोई हुई बला की तरह खामोश नहीं था। आसमान का सीना चीरकर बिजली कड़क रही थी, और सूखी, बंजर ज़मीन पर बारिश की बूंदें ऐसे गिर रही थीं जैसे हज़ारों साल की प्यास बुझाने आई हों।

एक पुरानी, संकरी सड़क पर एक काले रंग की विंटेज मर्सिडीज़ आहिस्ता-आहिस्ता रेंग रही थी। उसके टायरों से कीचड़ उछल रहा था।

कार के अंदर डॉली बैठी थी। 28 वर्षीय लेखिका, जिसकी आँखों में कहानियों से ज्यादा खालीपन था। उसने अपनी शॉल को अपने कंधों पर कस लिया, लेकिन ठंड बाहर की हवा में नहीं, बल्कि उसके अंदर थी।

वह यहाँ, इस अनजान जगह पर, अपनी खोई हुई 'आग' को ढूँढने आई थी—लेखन की आग, और शायद... अपने जिस्म की भी।

कार एक झटके के साथ रुकी।

"मैडम, आगे रास्ता बंद है। गेट तक पैदल जाना होगा," ड्राइवर ने पीछे मुड़कर कहा।

डॉली ने कार का दरवाज़ा खोला। रेगिस्तानी हवा का एक तूफानी झोंका अंदर आया, जो अपने साथ गीली मिट्टी और किसी पुराने, दबे हुए राज़ की गंध लेकर आया था। उसने अपना छोटा लेदर बैग उठाया और बाहर कदम रखा।

सामने वह खड़ी थी—'लाल हवेली'।

बिजली की चमक में वह इमारत किसी खूंखार जानवर जैसी लग रही थी जो अपने शिकार के इंतज़ार में बैठा हो। लाल बलुआ पत्थर की ऊँची दीवारें बारिश में खून जैसी लाल लग रही थीं। विशाल लोहे का गेट बंद था, जिस पर जंग लगे हुए ताले लटक रहे थे।

डॉली गेट की ओर बढ़ी। बारिश की तेज़ बौछारें उसकी पतली शिफॉन की साड़ी को भिगोने लगीं। कुछ ही पलों में, वह कपड़ा उसकी त्वचा से किसी दूसरी चमड़ी की तरह चिपक गया।

पानी की बूंदें उसके बालों से टपककर उसकी गर्दन, उसकी रीढ़ की हड्डी और फिर नीचे साड़ी के प्लीट्स में समा रही थीं।

ठंड की वजह से उसके निप्पल्स ब्लाउज़ के कपड़े के पार सख्त होकर उभर आए थे, जिसका उसे अहसास भी था और शायद... एक अजीब सा रोमांच भी।

गेट के पास पहुँचकर उसने देखा कि वह अकेली नहीं है।

वहाँ एक पुरानी जीप के बोनट पर एक आदमी बैठा था, जो बारिश से बेपरवाह लग रहा था। यह राज था।

उसने एक मिलिट्री ग्रीन टी-शर्ट और कार्गो पैंट्स पहनी थीं। बारिश उसके छोटे कटे बालों से बहते हुए उसके सख्त जबड़े और चौड़ी छाती पर गिर रही थी। वह सिगरेट पी रहा था, जिसे उसने अपने हाथ के कप बनाकर बारिश से बचाया हुआ था। उसकी आँखें... वे किसी बाज की तरह तीखी थीं।

और उसके ठीक बगल में, एक पिलर से टेक लगाकर खड़ी थी कामिनी । वह किसी फैशन मैगज़ीन के कवर से निकली हुई लग रही थी, जिसे तूफ़ान में फेंक दिया गया हो।

उसने एक बेज रंग की मिनी ड्रेस पहनी थी जो पानी में भीगकर पूरी तरह पारदर्शी हो चुकी थी। उसके काले लॉन्जरी का सेट साफ़ झलक रहा था, लेकिन उसने खुद को ढकने की कोई कोशिश नहीं की थी। बल्कि, वह अपनी बाहें फैलाकर बारिश का मज़ा ले रही थी।

"स्वागत है," राज ने अपनी सिगरेट का कश लेते हुए कहा, उसकी आवाज़ बादलों की गड़गड़ाहट से भी भारी थी।

"लगता है हम सब एक ही नरक में आमंत्रित हैं।"

डॉली ने अपनी भीगी हुई साड़ी का पल्लू ठीक करने की नाकाम कोशिश की। "दरवाज़ा बंद है?" उसने पूछा।

"फिलहाल तो हाँ," कामिनी ने अपनी भीगी लटों को उंगली में लपेटते हुए कहा। उसने राज की तरफ एक शरारती नज़र डाली।

"शायद यह गेट किसी 'खास' तरह से खुलता हो? क्यों फौजी साहब, आपके पास कोई बड़ा हथियार है इसे तोड़ने के लिए?"

राज ने कामिनी की द्विअर्थी बात को नज़रअंदाज़ कर दिया, लेकिन उसकी नज़रें डॉली पर जा टिकीं।

डॉली का भीगा हुआ बदन, उसकी ठिठुरती हुई देह और साड़ी से झांकता उसका पेट—राज की मर्दाना नज़रों ने उसे एक ही पल में स्कैन कर लिया।

डॉली ने उस नज़र को महसूस किया—एक ऐसी नज़र जो कपड़े उतारने का इंतज़ार नहीं करती, बल्कि कपड़ों के पार देख लेती है। डॉली को लगा जैसे किसी ने उसके पेट पर गर्म मोम गिरा दिया हो।

"मैं डॉली हूँ," उसने अपनी आवाज़ को स्थिर रखने की कोशिश की।

"यहाँ नाम कोई मायने नहीं रखते," राज ने कहा, बोनट से नीचे उतरते हुए। वह डॉली के करीब आया, बहुत करीब। "सिर्फ यह मायने रखता है कि तुम यहाँ क्यों आई हो।"

राज की मौजूदगी हावी होने वाली थी। डॉली को उसकी सिगरेट, बारिश और कस्तूरी की गंध आई। वह पीछे हटना चाहती थी, लेकिन उसके पैर ज़मीन में गड़ गए थे।

तभी, लोहे के गेट से एक भारी, धातुई आवाज़ आई। चरा्र्र्र…

गेट धीरे-धीरे, बिना किसी इंसानी मदद के, खुलने लगा।

"जादू," कामिनी हंसी और सबसे पहले अंदर भागी।

राज ने डॉली को रास्ता दिया। "लेडीज़ फर्स्ट।"

डॉली ने राज को देखा, फिर गेट को। उसने एक गहरी सांस ली और अंदर कदम रखा।
 
अंदर का नज़ारा बाहर की वीरानी से बिल्कुल अलग था। एक लंबा रास्ता हवेली के मुख्य द्वार तक जाता था, जिसके दोनों ओर जलती हुई मशालें थीं।

बारिश के बावजूद आग जल रही थी। और पोर्च में, रोशनी के घेरे में, तीन और आकृतियाँ खड़ी थीं।

एक आदमी, विक्रम जो अपने महंगे अरमानी सूट को भीगने से बचाने के लिए रुमाल से झाड़ रहा था। उसके चेहरे पर झुंझलाहट थी।

उसके बगल में इरा खड़ी थी, एक काले गाउन में, बिल्कुल स्थिर, जैसे कोई मूर्ती हो। उसके हाथ में एक लंबा छाता था जिसका सिरा वह ज़मीन पर टेक रही थी।

उसकी आँखें डॉली, राज और कामिनी को ऐसे देख रही थीं जैसे कोई वैज्ञानिक लैब के चूहों को देखता है।

और सीढ़ियों के सबसे ऊपर, छाया में खड़ा था—रंगीला ।

हवेली का मालिक।

रंगीला ने एक लंबा, ढीला-ढाला कुर्ता पहना था जो हवा में लहरा रहा था। उसके चेहरे पर एक ऐसी शांति थी जो तूफ़ान के बीच भी विचलित नहीं होती। वह सीढ़ियाँ उतरकर नीचे आया। बारिश की बूंदें उस पर गिर रही थीं, लेकिन उसे परवाह नहीं थी।

"छह अजनबी," रंगीला की आवाज़ गहरी और मखमली थी, जो सीधे रूह में उतर जाती थी। "छह अधूरी कहानियाँ। लाल हवेली में आप सबका स्वागत है।"

वह डॉली के पास आकर रुका। डॉली कांप रही थी। ठंड से ज्यादा घबराहट से।

रंगीला ने डॉली के चेहरे को गौर से देखा।

"हैलो," रंगीला ने कहा। उसने अपना हाथ बढ़ाया, लेकिन डॉली को छुआ नहीं। उसका हाथ डॉली के गाल से इंच भर दूर था, उसकी त्वचा की गर्मी को महसूस करते हुए। "तुम भीगी हुई हो। लेकिन तुम्हारी आँखों में आग है। विरोधाभास... मुझे पसंद है।"

डॉली ने अपनी मुट्ठी भींच ली। "हम यहाँ क्यों हैं?"

"क्योंकि बाहर की दुनिया में तुम्हें वह नहीं मिला जिसकी तुम्हें तलाश थी," रंगीला ने राज की तरफ देखते हुए कहा। राज तनकर खड़ा था, रंगीला की आँखों में आँखें डालकर। "ताकत? नियंत्रण? या समर्पण?"

रंगीला ने कामिनी की तरफ मुड़ा, जो अब जानबूझकर अपनी ड्रेस का पानी निचोड़ रही थी, जिससे उसका क्लीवेज और भी गहरा दिख रहा था। "या फिर... बेशर्मी?"

"जाओ," रंगीला ने हवेली के विशाल दरवाज़े की तरफ इशारा किया जो अब खुल चुका था। अंदर से पीली, गर्म रोशनी और चंदन की महक आ रही थी।

"अपने कमरे ढूँढो। तुम्हारे बिस्तरों पर लिफाफे रखे हैं। उनमें तुम्हारे 'नंबर' और इस हवेली के 'नियम' हैं।"

वे सब अंदर दाखिल हुए।

डॉली का कमरा पहली मंज़िल पर था। 'मयूर कक्ष'।

डॉली ने दरवाज़ा खोला। कमरा किसी सपने जैसा था। ऊँची छत, जिस पर नक्काशी की गई थी। बीच में एक विशाल चार खंभों वाला बिस्तर, जिस पर सफेद मखमली चादर बिछी थी। कमरे के एक कोने में, एक बड़ी सी खिड़की थी जो फर्श से छत तक थी, और उसके सामने एक नक्काशीदार बाथटब रखा था।

डॉली ने दरवाज़ा बंद किया और उसे लॉक कर दिया। वह अभी भी कांप रही थी। उसने अपना बैग फर्श पर गिरा दिया। साड़ी उसके शरीर से चिपकी हुई थी और अब उसे चुभ रही थी।

उसने आईने में खुद को देखा। उसके बाल गीले होकर चेहरे पर चिपके थे। ब्लाउज़ भीगकर पारदर्शी हो गया था, उसके स्तनों के काले घेरे साफ़ दिख रहे थे। वह खुद को पहचान नहीं पा रही थी। वह वो शर्मीली लेखिका नहीं लग रही थी; वह कोई और थी—एक औरत जो अपनी कामुकता से रूबरू हो रही थी।

डॉली ने साड़ी का पल्लू गिरा दिया। फिर उसने ब्लाउज़ के हुक खोलने शुरू किए। उसकी उंगलियाँ सुन्न थीं। ब्लाउज़ उतरते ही उसे थोड़ी राहत मिली। उसने साड़ी की प्लीट्स खोलीं। रेशमी कपड़ा उसके पैरों के पास गिर गया। अब वह सिर्फ पेटीकोट में थी।

उसने पेटीकोट की डोरी खोली। वह भी गिर गया।

डॉली नग्न खड़ी थी। उसने बाथटब का नल खोला। गर्म पानी की भाप ने ठंडे कमरे को भरना शुरू कर दिया।

तभी, उसकी नज़र खिड़की पर गई।

खिड़की के बाहर, बारिश की धुंध के बीच, हवेली के दूसरे विंग की एक बालकनी दिख रही थी। और उस बालकनी में... कोई खड़ा था।
 
एक आदमी। नंगी छाती। हाथ में सिगरेट।

वह राज था।

राज अपने कमरे की बालकनी में खड़ा था, बारिश में भीगता हुआ। वह सीधे डॉली की खिड़की की तरफ देख रहा था। डॉली की खिड़की पर कोई पर्दा नहीं था, और कमरे की रोशनी के कारण, डॉली का नग्न शरीर अंधेरे में एक चमकती हुई मूरत की तरह दिख रहा था।

डॉली को छिप जाना चाहिए था। उसे लाइट बंद कर देनी चाहिए थी। लेकिन वह हिली नहीं।

राज ने अपनी सिगरेट का कश लिया, उसकी आँखों का अंगारा अँधेरे में चमक उठा। उसने डॉली को देखा—उसके स्तनों की गोलाई, उसकी कमर का कटाव, और उसकी जांघों के बीच का घना अंधेरा।

डॉली ने महसूस किया कि राज की नज़रें उसे छू रही हैं। वे हाथ नहीं थे, लेकिन उनका असर हाथों से ज्यादा था। उसके स्तनों में कसाव आ गया। उसकी जांघों के बीच एक मीठा दर्द और गीलापन महसूस होने लगा। यह 'वॉयुरिज़्म' का पहला पाठ था—देखे जाने का सुख।

राज ने अपना हाथ उठाया और अपनी छाती पर रखा, फिर धीरे-धीरे नीचे ले गया, अपनी पैंट के बेल्ट तक। यह एक मूक इशारा था, एक सवाल था—क्या तुम चाहती हो कि मैं रुकूँ?

डॉली ने बाथटब की ओर कदम बढ़ाया, लेकिन उसने अपनी नज़रें राज से नहीं हटाईं। उसने एक पैर टब में डाला, फिर दूसरा। गर्म पानी ने उसके शरीर को गले लगा लिया।

वह धीरे-धीरे पानी में बैठी, अपनी पीठ को राज की तरफ किया, और फिर... जानबूझकर पीछे मुड़कर देखा।

राज अभी भी वहीं खड़ा था। उसने अपनी सिगरेट को रेलिंग पर मसल दिया।

डॉली पानी में डूब गई। उसका दिल हथौड़े की तरह बज रहा था। यह हवेली... यह जगह... यहाँ की हवा में ही कुछ ऐसा था जो संयम को तोड़ रहा था।

यह सिर्फ पहली रात थी, और उसने एक अजनबी को अपने नग्न शरीर का प्रदर्शन कर दिया था।

पानी के अंदर, डॉली ने अपना हाथ अपनी जांघों के बीच ले जाकर रखा। राज की नज़रें अभी भी उसे याद थीं। उसने अपनी उंगलियों से खुद को छुआ।

"राज..." उसने बुदबुदाया, और अपनी आँखें बंद कर लीं।

एक घंटे बाद, लाल हवेली का डाइनिंग हॉल एक अलग ही दुनिया में बदल चुका था। बाहर का तूफ़ान अभी भी जारी था, लेकिन यहाँ अंदर सन्नाटा और रहस्य था।

हॉल की दीवारों पर लगे मशाल बुझा दिए गए थे। अब रोशनी का एकमात्र स्रोत मेज़ के बीचों-बीच रखे भारी चांदी के कैंडल-स्टैंड्स थे, जिनमें दर्जनों लंबी, सफ़ेद मोमबत्तियाँ जल रही थीं।

मोमबत्तियों की लपटें हवा के हल्के झोंकों से नाच रही थीं, जिससे मेहमानों के चेहरों पर लंबी, डरावनी परछाइयाँ बन रही थीं।

रंगीला मेज़ के सिरे पर बैठा था। वह किसी राजा की तरह लग रहा था जो अपनी प्रजा का निरीक्षण कर रहा हो। उसने अब एक काला रेशमी कुर्ता पहना था, जिसके गले के पास बारीक सोने की कढ़ाई थी। उसकी उंगलियाँ वाइन के गिलास के तने को बहुत ही नज़ाकत से सहला रही थीं।

मेहमान एक-एक करके सीढ़ियाँ उतरकर हॉल में आए।

सबसे पहले कामिनी आई। उसने अपने गीले कपड़े बदल लिए थे और अब वह एक डीप रेड बैकलेस गाउन में थी।

गाउन का कपड़ा इतना महीन था कि वह उसके चलने पर पानी की तरह लहरा रहा था। उसने कोई ज्वैलरी नहीं पहनी थी, सिर्फ़ डार्क रेड लिपस्टिक लगाई थी जो उसके होंठों को खून जैसा लाल दिखा रही थी।

उसके पीछे विक्रम था। उसने अपना सूट बदल लिया था और अब वह एक ढीली लिनेन शर्ट और ट्राउज़र्स में था। वह रिलैक्स्ड दिखने की कोशिश कर रहा था, लेकिन उसकी नज़रें लगातार कामिनी की नंगी पीठ पर टिकी थीं।

फिर इरा आई। वह एक सख्त, ब्लैक जंपसूट में थी, जो गले तक बंद था लेकिन बाहें पूरी खुली थीं। उसके बाल एक कड़े जूड़ में बंधे थे। उसकी चाल में एक शिकारी जैसी सतर्कता थी।

अंत में डॉली और राज आए। वे एक साथ नहीं थे, लेकिन उनके आने का समय लगभग एक ही था।

डॉली ने एक गहरी नीली साड़ी पहनी थी। यह साड़ी पारंपरिक बनारसी सिल्क की थी, लेकिन उसने इसे बहुत ही कामुक तरीके से लपेटा था—कमर के पास बहुत नीचे, जिससे उसकी नाभि और चिकनी कमर साफ़ दिख रही थी। ब्लाउज़ स्लीवलेस था और पीछे से सिर्फ़ डोरियों पर टिका था। उसके बाल खुले थे, जो अभी भी हल्के गीले थे और कंधों पर बिखरे हुए थे।

राज ने एक सफ़ेद शर्ट पहनी थी, जिसके ऊपर के तीन बटन खुले थे, जिससे उसकी चौड़ी छाती के बाल दिख रहे थे। उसने आस्तीनें ऊपर मोड़ रखी थीं।

जब उसने डॉली को देखा, तो उसकी आँखों में वही चमक आ गई जो बालकनी में थी। डॉली ने उसकी नज़रें महसूस कीं और अपना पल्लू थोड़ा ठीक किया, हालांकि वह जानती थी कि राज पहले ही सब कुछ देख चुका है।

"बैठिए," रंगीला ने अपने हाथ से मेज़ की तरफ इशारा किया।

सीटिंग अरेंजमेंट पहले से तय था। डॉली को राज के ठीक सामने बिठाया गया। कामिनी विक्रम के बगल में थी, और इरा रंगीला के दाहिनी ओर।

"नियम नंबर एक," रंगीला ने अपनी कुर्सी पर पीछे झुकते हुए कहा, उसकी आवाज़ हॉल में गूंजी। "इस मेज़ पर हम अपने अतीत को भूल जाएंगे। आप कौन थे, क्या करते थे, किसकी पत्नी या पति थे—सब भूल जाइए। यहाँ आप सिर्फ़ एक नंबर हैं, और एक इच्छा हैं।"

नौकरों ने खाना परोसना शुरू किया। लेकिन खाना सामान्य नहीं था। प्लेटों में सिर्फ़ छोटे-छोटे, कलात्मक रूप से सजाए गए व्यंजन और उस आसमान में, वे चारों आज़ाद पंछी थे।विश्वास, खुलापन और रजामंदी ने उनके रिश्तों को टूटने के बजाय और मजबूत बना दिया। हिस्से थे—अंजीर, डार्क चॉकलेट, चीज़, और कुछ मसालेदार मांस के टुकड़े।

"नियम नंबर दो," रंगीला ने एक घंटी बजाई। टिंग! "अगले बीस मिनट तक, कोई भी बात नहीं करेगा। सन्नाटा। सिर्फ़ स्वाद और स्पर्श।"

और इसके साथ ही, उसने एक और इशारा किया। नौकरों ने एक साथ हॉल की बची हुई मोमबत्तियाँ भी बुझा दीं।

अब हॉल में घुप अँधेरा था। सिर्फ़ खिड़कियों से कभी-कभी चमकती बिजली की रोशनी अंदर आ रही थी।

यह 'ब्लाइंड डाइनिंग'नहीं, बल्कि 'सेंसरी डाइनिंग' थी। अँधेरे ने सबकी सुनने और महसूस करने की शक्ति को बढ़ा दिया था।

डॉली अपनी कुर्सी पर असहज हो गई। अँधेरे में उसे राज की मौजूदगी और भी ज्यादा महसूस हो रही थी। उसे राज की सांसों की आवाज़ सुनाई दे रही थी, उसके कपड़ों की सरसराहट।
 
डॉली ने अपने हाथ से टटोलकर कांटा उठाया। उसने अंधेरे में अपनी प्लेट से कुछ उठाया—शायद एक अंगूर या जैतून। उसने उसे अपने मुंह में डाला। वह ठंडा और रसीला था।

अचानक, उसने मेज़ के नीचे कुछ महसूस किया।

एक पैर।

किसी का नंगा पैर उसकी साड़ी के नीचे, उसकी एड़ी को छू रहा था। डॉली का शरीर एक झटके से सीधा हो गया। उसका दिल ज़ोर से धड़कने लगा।

सामने राज बैठा था। क्या यह राज था?

वह पैर धीरे-धीरे ऊपर सरकने लगा। साड़ी का रेशमी कपड़ा उस स्पर्श को रोक नहीं पा रहा था। वह पैर उसकी एड़ी से होता हुआ, उसकी पिडली की गोलाई तक पहुँचा। वह स्पर्श खुरदरा था, मर्दाना था, और बहुत ही ढीठ था।

डॉली ने मेज़ के नीचे अपना पैर पीछे खींचने की कोशिश की, लेकिन वह पैर हटा नहीं। उसने डॉली के पैर को अपनी उंगलियों से जकड़ लिया और धीरे से दबाया।

डॉली ने अँधेरे में अपनी आँखें बंद कर लीं। उसे वह बालकनी वाला दृश्य याद आ गया। राज ने उसे देखा था, और अब वह उसे छू रहा था—सबके सामने, लेकिन किसी को दिखाई नहीं दे रहा था। यह जोखिम... यह एड्रेनालाईन... डॉली की जांघों के बीच फिर से वही गीलापन ले आया।

"हम्म..." डॉली के मुंह से अनजाने में एक हल्की सी आह निकल गई। सन्नाटे में वह आवाज़ बहुत तेज़ लगी।

इरा ने, जो अँधेरे में भी सतर्क थी, उस आवाज़ को सुना। वह मुस्कुराई। उसे समझ आ गया कि खेल शुरू हो चुका है।

वहीं दूसरी तरफ, कामिनी का खेल और भी सीधा था।

अँधेरे का फायदा उठाकर कामिनी ने अपना बायां हाथ विक्रम की जांघ पर रख दिया था। विक्रम, जो अपनी वाइन का गिलास ढूँढने की कोशिश कर रहा था, इस स्पर्श से चौंक गया। कामिनी की उंगलियाँ उसकी जांघ पर टहल रही थीं, धीरे-धीरे ऊपर, उसके क्रॉच की तरफ।

विक्रम की सांसें भारी हो गईं। उसने मेज़ के नीचे कामिनी का हाथ पकड़ने की कोशिश की, शायद उसे रोकने के लिए, या शायद उसे और आगे ले जाने के लिए।

कामिनी ने उसका हाथ अपनी हथेली में लिया और उसे अपनी नंगी जांघ पर रख दिया। कामिनी की ड्रेस का स्लिट बहुत ऊपर तक था, और विक्रम का हाथ सीधे उसकी गर्म, मखमली त्वचा को छू रहा था।

"ओह..." विक्रम ने फुसफुसाया।

रंगीला, जो मेज़ के सिरे पर बैठा था, सब कुछ सुन रहा था। कपड़ों की रगड़, भारी होती सांसें, और दबी हुई सिसकियाँ। उसे देखने की ज़रूरत नहीं थी; वह इस आर्केस्ट्रा का कंडक्टर था।

"स्वाद चखिए," रंगीला की आवाज़ अँधेरे में गूंजी। "खाने का नहीं, अपने साथी की इच्छा का।"

राज ने मेज़ के नीचे अपना पैर और ऊपर किया। अब वह डॉली के घुटने तक पहुँच चुका था। उसने अपने पैर के अंगूठे से डॉली के घुटने के पीछे की संवेदनशील त्वचा को गुदगुदाया। डॉली ने मेज़ के किनारे को कसकर पकड़ लिया। उसे लग रहा था कि वह पिघल जाएगी।

राज ने अपनी कुर्सी को थोड़ा आगे खिसकाया। अब वह मेज़ के नीचे डॉली के और करीब था। उसने अपना दूसरा पैर भी आगे बढ़ाया और डॉली के दोनों पैरों को अपने पैरों के बीच जकड़ लिया। अब डॉली हिल नहीं सकती थी। वह पूरी तरह राज की गिरफ्त में थी।

डॉली ने अँधेरे में अपनी प्लेट से एक स्ट्रॉबेरी उठाई। उसके हाथ कांप रहे थे। उसने उसे खाया नहीं। उसने उसे अपने होठों पर फेरा।

अचानक, बिजली कड़की। एक पल के लिए पूरा हॉल सफ़ेद रोशनी में नहा गया।

उस एक पल में, सबने सब कुछ देख लिया।
 
डॉली ने देखा कि राज उसे घूर रहा है, उसकी आँखें अंगारों की तरह दहक रही हैं। और राज ने देखा कि डॉली अपने होठों पर स्ट्रॉबेरी रगड़ रही है, और उसका चेहरा लाल है—शर्म से और उत्तेजना से।

विक्रम ने देखा कि उसका हाथ कामिनी की जांघों के बीच है, और कामिनी का सिर पीछे की ओर झुका हुआ है, उसकी आँखें बंद हैं और होंठ खुले हुए हैं।

और इरा ने देखा कि रंगीला... रंगीला उन सबको देख रहा है, एक अजीब सी संतुष्टि के साथ।

रोशनी चली गई। अँधेरा फिर छा गया। लेकिन अब वह अँधेरा मासूम नहीं था। वह गवाह बन चुका था।

"समय समाप्त," रंगीला ने कहा।

नौकरों ने मोमबत्तियाँ फिर से जला दीं। पीली रोशनी हॉल में फैल गई।

डॉली ने तुरंत अपने पैर राज की पकड़ से छुड़ाए। कामिनी ने विक्रम का हाथ अपनी जांघ से हटा दिया और अपनी ड्रेस ठीक की।

विक्रम पसीना पोंछ रहा था। राज ने अपना वाइन का गिलास उठाया और एक घूंट में खाली कर दिया, डॉली की आँखों में देखते हुए।

माहौल में यौन तनाव इतना घना था कि उसे चाकू से काटा जा सकता था।

"मुझे उम्मीद है कि भोजन... संतोषजनक रहा होगा," रंगीला ने एक तिरछी मुस्कान के साथ कहा।

"काफी... उत्तेजक था," कामिनी ने अपनी लिपस्टिक ठीक करते हुए कहा। उसने विक्रम की तरफ देखा और आँख मारी।

राज खड़ा हो गया। "मुझे थोड़ी हवा चाहिए।"

वह मेज़ छोड़कर जाने लगा। डॉली का दिल ज़ोर से धड़का। क्या वह उसे बुला रहा था?

राज दरवाज़े पर रुका। उसने पीछे मुड़कर डॉली को देखा। "नंबर 2, क्या तुम लाइब्रेरी का रास्ता जानती हो?"

यह एक सीधा निमंत्रण था। सबके सामने।

डॉली की सांस अटक गई। रंगीला उसे देख रहा था। इरा उसे देख रही थी।

डॉली ने अपनी साड़ी का पल्लू उठाया और खड़ी हो गई। "मैं... मैं ढूँढ लूँगी।"

डॉली ने मेज़ छोड़ दी और राज के पीछे चल दी।

हॉल में बचे हुए लोग मुस्कुराए।

"लगता है पहली कहानी शुरू हो गई," रंगीला ने कहा। उसने इरा की तरफ अपना गिलास बढ़ाया। "और तुम्हारी कहानी, नंबर 6?"

इरा ने अपना गिलास रंगीला के गिलास से टकराया। टिंग!

"मेरी कहानी," इरा ने कहा, "इन सबको देखने में है। और जब ये टूटेंगे... तब उन्हें समेटने में।"

डॉली और राज हॉल से बाहर निकल गए थे। अँधेरे गलियारे में, जहाँ सिर्फ़ उनकी कदमों की आवाज़ थी, राज ने अचानक डॉली का हाथ पकड़ लिया। उसने डॉली को खींचा और एक खंभे के पीछे अँधेरे में ले गया।

"राज..." डॉली ने कहना चाहा, लेकिन राज ने अपना हाथ उसके मुंह पर रख दिया।

"चुप," राज ने उसके कान में कहा। "यहाँ दीवारें भी सुनती हैं। और मुझे तुम्हें सुनना नहीं है... मुझे तुम्हें महसूस करना है।"

उसने डॉली को दीवार से सटा दिया। अँधेरे में, डाइनिंग टेबल का अधूरा खेल अब पूरा होने वाला था।डाइनिंग हॉल की पीली रोशनी अब पीछे छूट चुकी थी।

राज और डॉली हवेली के पूर्वी विंग के लंबे, अंधेरे गलियारे में थे। यहाँ सिर्फ खिड़कियों से आती बिजली की चमक और राज की भारी सांसों की आवाज़ थी।
 
राज ने डॉली का हाथ अभी तक नहीं छोड़ा था। उसकी पकड़ सख्त थी, अधिकारपूर्ण थी, जैसे कोई फौजी अपने कैदी को ले जा रहा हो। लेकिन डॉली कैदी नहीं थी, या शायद वह बनना चाहती थी। राज की हथेली की गर्मी डॉली की कलाई से होकर सीधे उसके दिल तक पहुँच रही थी।

वे एक भारी लकड़ी के दरवाज़े के सामने रुके। 'ग्रंथालय' ।

राज ने दरवाज़ा धक्का देकर खोला। अंदर अंधेरा था, लेकिन बिजली की एक और तेज़ चमक ने कमरे को रोशन कर दिया। यह लाइब्रेरी विशाल थी। फर्श से छत तक किताबों की अलमारियाँ थीं। हवा में पुरानी कागज़, लेदर बाइंडिंग और किसी मीठे इत्र की मिली-जुली गंध थी। कोने में एक पुराना ग्रामोफोन रखा था, जिससे कोई आवाज़ नहीं आ रही थी, लेकिन सुई अभी भी रिकॉर्ड पर थी।

राज ने दरवाज़ा बंद किया और कुंडी लगा दी। उस धातुई 'क्लिक' की आवाज़ ने डॉली के दिल की धड़कन बढ़ा दी। अब वे दुनिया से कट चुके थे।

"क्यों?" राज ने अचानक पूछा। वह डॉली की तरफ नहीं देख रहा था, वह कमरे के बीच में खड़ा था, अपनी पीठ डॉली की तरफ किए हुए। "तुमने डाइनिंग टेबल पर मेरा विरोध क्यों नहीं किया?"

डॉली दरवाज़े से सटी खड़ी थी। उसकी सांसें तेज़ थीं। "मुझे नहीं पता," उसने सच कहा। "शायद... शायद मुझे यह चाहिए था।"

राज घूमा। अंधेरे में उसकी आँखें चमक रही थीं। वह एक शिकारी की तरह धीरे-धीरे डॉली की तरफ बढ़ा। "क्या चाहिए था तुम्हें, डॉली? वह स्पर्श? वह जोखिम? या यह जानना कि एक अजनबी तुम्हें छू सकता है और तुम उसे रोकोगी नहीं?"

राज अब डॉली के बहुत करीब था। इतना करीब कि डॉली को पीछे हटने की जगह नहीं मिली। राज ने अपने दोनों हाथ डॉली के सिर के दोनों तरफ दरवाज़े पर रख दिए, उसे कैद करते हुए।

"बोलो," राज ने डॉली के कान के पास झुककर कहा। उसकी गर्म सांसें डॉली की गर्दन पर लग रही थीं।

"मुझे... मुझे ज़िंदा महसूस करना था," डॉली ने फुसफुसाया। "मेरी ज़िंदगी... बहुत सूखी है, राज। मैं सिर्फ पन्नों पर जीती हूँ। मैं... मैं हकीकत में महसूस करना चाहती थी।"

राज ने डॉली के चेहरे को अपने हाथों में लिया। "तो महसूस करो।"

उसने डॉली के होंठों को चूम लिया।

यह कोई कोमल, रोमांटिक चुंबन नहीं था। यह एक हमला था। राज का मुंह डॉली के मुंह पर हावी हो गया। उसकी जीभ डॉली के मुंह के अंदर प्रवेश कर गई, उसके स्वाद को चखते हुए, उसे अपने अधीन करते हुए। डॉली के घुटने कमज़ोर पड़ गए। उसने राज के कंधों को पकड़ लिया ताकि वह गिर न जाए।

राज का एक हाथ डॉली के बालों में उलझ गया, उसका सिर पीछे की ओर खींचते हुए ताकि वह चुंबन को और गहरा कर सके। दूसरा हाथ डॉली की कमर पर गया और उसे अपने शरीर से सटा दिया। राज की छाती डॉली के स्तनों को कुचल रही थी, और डॉली को राज के पौरुष का सख्त उभार अपने पेट पर महसूस हो रहा था।

"राज..." डॉली ने चुंबन तोड़ते हुए, हांफते हुए कहा। "हम... हम यहाँ नहीं कर सकते। कोई आ जाएगा।"

"यहाँ कोई नहीं आएगा," राज ने डॉली की गर्दन को चूमते हुए कहा। "रंगीला ने यह जगह हमारे लिए ही छोड़ी है।"

राज ने डॉली को बांहों में उठा लिया। डॉली ने अपनी टांगें राज की कमर पर लपेट लीं। राज उसे कमरे के बीच में रखे एक बड़े मखमली दीवान की तरफ ले गया। उसने डॉली को दीवान पर लिटा दिया।

बिजली फिर कड़की। डॉली ने देखा कि दीवान के ठीक सामने एक बड़ी सी पेंटिंग लगी थी—एक नग्न औरत की, जो अपनी पीठ दिखा रही थी।

राज डॉली के ऊपर आ गया। उसने अपना वजन डॉली पर नहीं डाला, वह अपनी कोहनियों पर टिका हुआ था। वह डॉली को देख रहा था—उसकी बिखरी हुई साड़ी, उसके उखड़े हुए सांस, और उसका लाल होता चेहरा।

"तुम्हारी साड़ी," राज ने डॉली के पल्लू को उंगलियों में लपेटते हुए कहा। "यह बहुत सुंदर है। लेकिन यह... रास्ते में आ रही है।"

डॉली ने राज की आँखों में देखा। "तो इसे हटा दो।"
 
राज ने मुस्कुराते हुए डॉली के ब्लाउज़ की डोरी खींची जो पीठ पर बंधी थी। डोरी खुल गई। ब्लाउज़ ढीला हो गया। राज ने उसे कंधों से नीचे सरका दिया। डॉली ने अपनी बाहें उठाईं और राज ने ब्लाउज़ को पूरी तरह उतार दिया।

अब डॉली सिर्फ अपनी साड़ी में लिपटी थी, लेकिन ऊपर से नग्न थी। राज की नज़रें उसके स्तनों पर टिक गईं। ठंड और उत्तेजना से उसके निप्पल्स सख्त हो चुके थे। राज ने अपना सिर झुकाया और एक स्तन को अपने मुंह में ले लिया।

"आहहह!" डॉली की पीठ दीवान से ऊपर उठ गई। राज की जीभ गर्म और गीली थी, और उसका सक्शन इतना तीव्र था कि डॉली को लगा कि उसकी रूह खींची जा रही है। राज ने दूसरे स्तन को अपनी हथेली में भर लिया और उसे मसलने लगा।

डॉली ने राज के बालों में अपनी उंगलियाँ फंसा दीं। "राज... राज..." वह उसका नाम एक मंत्र की तरह जप रही थी।

राज ने अपना सिर उठाया। उसके होंठ गीले थे। "तुम्हें पसंद आया?"

"हाँ..." डॉली ने स्वीकार किया।

राज खड़ा हो गया। डॉली को लगा कि वह चला जाएगा, लेकिन राज ने अपनी बेल्ट खोली। धातु की 'क्लिक' आवाज़ फिर गूंजी। उसने अपनी पैंट और बॉक्सर को एक साथ नीचे गिरा दिया।

डॉली ने उसे देखा। वह पूरी तरह उत्तेजित था। उसका आकार डराने वाला था, लेकिन साथ ही लुभाने वाला भी।

"मैं चाहता हूँ तुम मुझे देखो," राज ने कहा। "मैं चाहता हूँ तुम जानो कि तुम मेरे साथ क्या कर रही हो।"

राज ने डॉली की साड़ी को नीचे से खींचा। उसने पेटीकोट का नाड़ा खोल दिया। रेशमी कपड़ा डॉली के पैरों से सरक गया। अब डॉली पूरी तरह नग्न थी, उस गहरे रंग के मखमली दीवान पर। उसकी गोरी त्वचा अंधेरे में चमक रही थी।
 
राज ने डॉली की टांगों को फैलाया और उनके बीच घुटनों के बल बैठ गया। उसने डॉली को छुआ नहीं। वह बस उसे देख रहा था।

"तुम... तुम एक किताब हो, डॉली," राज ने फुसफुसाया। "और मैं तुम्हें पढ़ना चाहता हूँ। हर पन्ना। हर शब्द।"

राज ने डॉली की जांघों को अपने कंधों पर रख लिया। उसने अपना सिर नीचे झुकाया।

जब राज की जीभ ने डॉली के सबसे संवेदनशील हिस्से को छुआ, तो डॉली की चीख लाइब्रेरी की ऊँची छत से टकराकर गूंज गई।

"ओह गॉड! राज!"

राज ने रुकने का नाम नहीं लिया। वह एक सैनिक की तरह एकाग्र था। उसकी जीभ डॉली के क्लिटोरिस पर लयबद्ध तरीके से चल रही थी, जबकि उसकी उंगलियाँ डॉली के अंदर प्रवेश कर रही थीं।

डॉली का शरीर हवा में झूल रहा था। वह दीवान की चादर को मुट्ठी में भींच रही थी। उसे लगा कि वह फट जाएगी। यह सुख इतना तीव्र था कि यह दर्द की सीमा को छू रहा था।

"राज... मैं... मैं आ रही हूँ!" डॉली चिल्लाई।

राज ने अपनी गति और बढ़ा दी। उसने डॉली के रस को पी लिया। डॉली का शरीर अकड़ गया, वह कांपने लगी। एक ज़बरदस्त संभोग ने उसे हिला दिया। वह कुछ पलों तक उसी अवस्था में रही, कांपती हुई, सिसकती हुई।

राज ऊपर आया। उसने डॉली को चूमा—उसके आंसुओं को, उसके पसीने को।

"अब मेरी बारी," राज ने कहा।

डॉली ने अपनी टांगें राज की कमर पर लपेट लीं। वह तैयार थी। वह चाहती थी कि राज उसे भरे।

राज ने प्रवेश किया।

यह मिलन कोमल नहीं था। यह जंगली था। यह दो अजनबियों का मिलन था जो अपनी-अपनी दुनिया से भागकर यहाँ आए थे। राज के धक्के दीवान को हिला रहे थे। डॉली हर धक्के के साथ राज का नाम ले रही थी।

"मेरी आँखों में देखो," राज ने आदेश दिया, डॉली के दोनों हाथों को पकड़कर दीवान पर दबाते हुए।

डॉली ने राज की आँखों में देखा। वहां उसे अपना प्रतिबिंब दिखा—एक ऐसी औरत जो अब डरती नहीं थी, जो अपनी हवस को स्वीकार कर रही थी।

"मैं... मैं तुम्हारी हूँ," डॉली ने कहा।

राज ने एक अंतिम, गहरा धक्का मारा और डॉली के अंदर अपना सब कुछ छोड़ दिया। वह डॉली के ऊपर गिर गया, भारी सांसें लेते हुए।

वे कुछ देर तक वैसे ही जुड़े रहे। लाइब्रेरी का सन्नाटा अब उनकी भारी सांसों से टूट रहा था।

अचानक, लाइब्रेरी के दूसरे कोने से एक आवाज़ आई।

हंसी।

डॉली चौंक गई। राज तुरंत सतर्क हो गया। वह डॉली के ऊपर से हटा और उसे अपनी शर्ट से ढक दिया।

"कौन है?" राज ने अंधेरे में पूछा, अपनी मुट्ठी भींचते हुए।

कोने में रखे एक सोफे के पीछे से दो आकृतियाँ उठीं।

कामिनी और विक्रम।

कामिनी के बाल बिखरे थे और उसकी ड्रेस की स्ट्रैप टूटी हुई थी। विक्रम की शर्ट के बटन खुले थे। वे भी नग्न अवस्था में थे, या कम से कम आधे नग्न।

"माफ़ करना," कामिनी ने हंसते हुए कहा, अपनी ड्रेस को ठीक करते हुए। "हमें लगा हम अकेले हैं। लेकिन... शो काफी अच्छा था।"

डॉली शर्म से गड़ गई। उसने राज की शर्ट को अपने गले तक खींच लिया। वे दोनों... कामिनी और विक्रम... वे उन्हें देख रहे थे! पूरे समय!

राज को गुस्सा आया, लेकिन फिर उसने कामिनी की आँखों में देखा। वहां कोई मज़ाक नहीं था, वहां उत्तेजना थी। कामिनी और विक्रम ने भी वही किया था जो राज और डॉली ने किया था, शायद बस कुछ पल पहले।

"तुम लोग देख रहे थे?" राज ने ठंडी आवाज़ में पूछा।

"हम सुन रहे थे," विक्रम ने कहा, अपना गला साफ़ करते हुए। "और... देखना पड़ा। आवाज़ें काफी... आमंत्रित करने वाली थीं।"

माहौल अजीब हो गया। दो जोड़े। दोनों नग्नता और उत्तेजना के चरम पर। एक ही कमरे में।

राज ने डॉली को देखा। डॉली डरी हुई लग रही थी, लेकिन उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक भी थी। क्या उसे भी 'देखे जाने' का वही रोमांच महसूस हो रहा था जो बालकनी में हुआ था?

तभी, लाइब्रेरी का दरवाज़ा खुला।

वहां रंगीला खड़ा था। उसके हाथ में एक लालटेन थी।

रंगीला ने मुस्कुराते हुए कहा। "आप लोगों ने अपनी कहानियाँ लिख ली हैं। लेकिन याद रहे... लाल हवेली में कोई भी कहानी निजी नहीं होती।"

रंगीला ने लाइब्रेरी के अंदर कदम रखा। लालटेन की रोशनी में तीनों जोड़े (डॉली-राज, कामिनी-विक्रम, और अकेला रंगीला एक अजीब से त्रिकोण में खड़े थे।

"जाओ," रंगीला ने कहा। "अपने कमरों में जाओ। कल सुबह... एक नया खेल शुरू होगा। और उसमें... साझीदार बदल सकते हैं।"

राज ने डॉली को बांहों में उठाया (क्योंकि डॉली चलने की हालत में नहीं थी) और लाइब्रेरी से बाहर निकल गया। कामिनी और विक्रम भी पीछे-पीछे निकले।

डॉली ने राज के कंधे पर सिर रख दिया। उसे नहीं पता था कि कल क्या होगा। क्या राज बदल जाएगा? क्या उसे किसी और के साथ जाना होगा? लेकिन आज रात... आज रात वह राज की थी। और वह याद उसके शरीर पर राज के निशानों की तरह ताज़ा थी।

रात के तीन बज रहे थे। लाल हवेली अब पूरी तरह शांत थी, सिवाय दूर कहीं से आती झींगुरों की आवाज़ और बारिश के रुकने के बाद टपकती बूंदों के। लेकिन इस शांति के नीचे एक बेचैनी थी।

डॉली राज के कमरे में थी। राज उसे अपने कमरे में ले आया था, क्योंकि डॉली का कमरा (मयूर कक्ष) बहुत 'खुला' था। राज का कमरा, 'सिंह कक्ष, मर्दाना और सुरक्षित था। भारी लकड़ी का फर्नीचर, गहरे रंग के पर्दे, और एक बड़ी सी चिमनी जिसमें अब सिर्फ़ अंगारे बचे थे।

डॉली राज के बिस्तर पर लेटी थी, राज की शर्ट पहने हुए। शर्ट उसके लिए बहुत बड़ी थी, जो उसके घुटनों तक आ रही थी, लेकिन उसमें राज की खुशबू थी—कस्तूरी, पसीना और मर्दानगी की गंध। राज बालकनी में खड़ा था, सिगरेट पीते हुए। वह नग्न था, सिर्फ़ एक तौलिया लपेटे हुए।

डॉली उसे देख रही थी। उसकी चौड़ी पीठ, उसके कंधों के मज़बूत पट्टे... उसने अभी-अभी इस आदमी के साथ अपनी हदों को पार किया था। एक अजनबी।

"सो रही हो?" राज ने मुड़े बिना पूछा।

"नींद नहीं आ रही," डॉली ने कहा।

राज ने सिगरेट बुझाई और अंदर आया। वह बिस्तर के किनारे बैठ गया। उसने डॉली के बालों को, जो अब सूख चुके थे लेकिन उलझे हुए थे, अपनी उंगलियों से संवारा।

"तुम्हें पछतावा हो रहा है?" राज ने पूछा। उसकी आवाज़ में चिंता नहीं, बल्कि जिज्ञासा थी।

डॉली ने राज की आँखों में देखा। "नहीं। पछतावा नहीं। बस... डर। रंगीला ने जो कहा... 'साझीदार बदल सकते हैं'। इसका क्या मतलब था?"

राज की जबड़े की नस तन गई। "वह खेल रहा है, डॉली। वह चाहता है हम असुरक्षित महसूस करें। लेकिन जब तक तुम मेरे साथ हो, कोई तुम्हें छू नहीं सकता। सिवाय मेरे।"

राज का यह अधिकारपन डॉली को एक अजीब सी सुरक्षा और उत्तेजना दे रहा था। राज ने झुककर डॉली के माथे को चूमा, फिर उसकी नाक को, और फिर उसके होंठों को। यह चुंबन लाइब्रेरी जैसा आक्रामक नहीं था; यह कोमल था, एक वादे जैसा।

राज ने डॉली को अपनी बांहों में खींच लिया और उसके बगल में लेट गया। डॉली ने अपना सिर राज की छाती पर रख दिया। उसकी धड़कनें एक लोरी की तरह थीं। डॉली की आँखें भारी होने लगीं।

लेकिन राज नहीं सोया। वह छत को घूर रहा था। उसे पता था कि रंगीला का खेल सिर्फ़ शारीरिक नहीं है, मानसिक है। और उसे यह भी पता था कि इस हवेली में 'वफादारी' एक बहुत सस्ता शब्द है।
 
सुबह 8 बजे।

धूप की पहली किरण ने हवेली के लाल पत्थरों को सोने में बदल दिया था। लेकिन अंदर का माहौल ठंडा था।

नाश्ते की मेज़ बिछ चुकी थी। लेकिन कल रात के डाइनिंग हॉल के विपरीत, आज का नाश्ता पोर्च में बाहर लॉन की तरफ लगाया गया था। खुली हवा, ताज़ी धूप और चिड़ियों की चहचहाहट। सब कुछ बहुत सामान्य और सुंदर लग रहा था—अगर आप मेहमानों के चेहरों को न देखें।

कामिनी (नंबर 4) पहले से ही वहां थी। उसने एक बड़ा सा सनग्लास लगाया हुआ था और एक ढीला-ढाला काफ्तान पहना था। वह कॉफी पी रही थी, बहुत खामोश। उसकी गर्दन पर एक लव-बाइट का निशान था जिसे उसने छिपाने की कोशिश नहीं की थी।

विक्रम (नंबर 5) उसके पास बैठा था, अखबार पढ़ते हुए। वह भी शांत था, लेकिन बार-बार कनखियों से कामिनी को देख रहा था। कल रात लाइब्रेरी में जो हुआ, उसने उनके बीच एक अजीब सा बंधन बना दिया था—शर्मिंदगी और (सह-अपराध) का।

तभी डॉली (नंबर 2) और राज(नंबर 3) आए।

डॉली ने अपनी साड़ी बदल ली थी। आज उसने एक हल्का पीला सलवार-कमीज़ पहना था। वह बहुत ताज़ा और मासूम लग रही थी, लेकिन उसकी चाल में एक बदलाव था। उसके कूल्हों की हरकत में, उसके चलने के तरीके में एक नई नज़ाकत थी—एक ऐसी औरत की चाल जिसे बीती रात बहुत अच्छे से प्यार किया गया हो।

राज उसके ठीक पीछे था, एक रक्षक की तरह।

"गुड मॉर्निंग, लवबर्ड्स," कामिनी ने अपना चश्मा थोड़ा नीचे करते हुए कहा। "रात अच्छी रही?"

डॉली का चेहरा लाल हो गया। वह राज के बगल वाली कुर्सी पर बैठ गई।

"काफी... ज्ञानवर्धक," विक्रम ने तंज कसते हुए कहा, अख़बार को फोल्ड करते हुए। "लाइब्रेरी का इस्तेमाल पढ़ने के लिए कम और... 'प्रैक्टिकल' के लिए ज़्यादा हुआ।"

राज ने विक्रम को एक तीखी नज़र दी। "कम से कम हमने अपनी कहानी खुद लिखी, विक्रम। दूसरों की कहानी में झांकने की ज़रूरत नहीं पड़ी।"

माहौल में तनाव आ गया। कामिनी ने एक ज़ोरदार हंसी हंसी। "टच, फौजी साहब। लेकिन सच कहूँ, तो आपका परफार्मेंस... 5 स्टार था।"

डॉली ने अपनी नज़रें झुका लीं। वह जानती थी कि कामिनी उसे उकसा रही है।

तभी इरा वहां आई। वह जॉगिंग करके लौटी थी। वह पसीने में थी, टाइट स्पोर्ट्स वियर पहने हुए। वह बहुत ऊर्जावान लग रही थी।

"सब जाग गए?" इरा ने पानी की बोतल खोलते हुए पूछा। "रंगीला कहाँ है?"

"यहीं हूँ," रंगीला की आवाज़ आई।

वह लॉन की तरफ से आ रहा था। उसने एक सफ़ेद कुर्ता-पायजामा पहना था और उसके हाथ में कुछ मिट्टी लगी थी। शायद वह अपने स्टूडियो में काम कर रहा था।

रंगीला ने मेज़ के सिरे पर अपनी जगह ली। उसने सबको देखा—कामिनी के निशान, डॉली की झुकी हुई आँखें, राज का तनकर बैठना।

"रात के अंधेरे में जो सच बाहर आए," रंगीला ने एक सेब उठाते हुए कहा, "उन्हें सुबह की रोशनी में छिपाना मुश्किल होता है। है ना, डॉली?"

डॉली ने रंगीला को देखा। "मैं कुछ छिपा नहीं रही।"

"अच्छी बात है," रंगीला ने मुस्कुराते हुए कहा। "क्योंकि आज का खेल 'छिपाने' का नहीं, 'दिखाने' का है।"

सबके कान खड़े हो गए।

"आज का टास्क," रंगीला ने घोषणा की, "है 'मूर्तिकार का स्पर्श' ।"

उसने अपनी उंगलियों से मिट्टी साफ़ की। "मैं एक कलाकार हूँ। और मैं इस हवेली में अपनी सबसे बेहतरीन कृति बनाना चाहता हूँ। मुझे एक 'म्यूज़ ('प्रेरणा) चाहिए।"

उसने कामिनी को देखा, फिर इरा को, और अंत में डॉली पर अपनी नज़रें टिका दीं।

"मैं एक नग्न मूर्ति बनाना चाहता हूँ," रंगीला ने सीधे कहा। "और इसके लिए मुझे एक मॉडल चाहिए। कोई ऐसा जो सिर्फ कपड़े न उतारे, बल्कि अपनी रूह को भी नंगा कर सके।"

कामिनी तुरंत सीधी हो गई। "मैं तैयार हूँ। मैं कैमरा के सामने बहुत कम्फर्टेबल हूँ।"

रंगीला ने कामिनी को खारिज करते हुए हाथ हिलाया। "कामिनी, तुम एक प्रदर्शन हो। मुझे प्रदर्शन नहीं, पवित्रता चाहिए। वह पवित्रता जो टूटने के कगार पर हो।"

उसकी उंगली डॉली की तरफ उठी। "डॉली। तुम मेरी मॉडल बनोगी।"

राज ने मेज़ पर मुक्का मारा। "बिल्कुल नहीं!"

"फैसला डॉली का है," रंगीला ने ठंडी आवाज़ में कहा। "याद है? यहाँ कोई किसी का मालिक नहीं है। डॉली?"

डॉली सन्न रह गई। एक नग्न मूर्ति? एक अजनबी के सामने? और वह भी तब जब राज ने अभी कल रात उसे अपना बनाया था?

लेकिन रंगीला की आँखों में एक खिंचाव था। वह सम्मोहन।

"अगर... अगर मैं मना करूँ तो?" डॉली ने पूछा।

"तो तुम आज़ाद हो," रंगीला ने कहा। "लेकिन तुम यहाँ 'मुख्य पात्र' बनने आई थी, है ना? एक मुख्य पात्र कभी चुनौती से पीछे नहीं हटता।"

रंगीला ने डॉली की सबसे कमज़ोर नस दबा दी थी—उसकी महत्वाकांक्षा, उसका 'लेखक' वाला अहंकार।

डॉली ने राज को देखा। राज की आँखों में मनाही थी, गुस्सा था। "डॉली, मत करना," राज ने धीरे से कहा।

डॉली ने फिर रंगीला को देखा।

"मैं करूँगी," डॉली ने कहा।

मेज़ पर सन्नाटा छा गया। राज ने अपनी कुर्सी पीछे धक्का दी और खड़ा हो गया। "तुम पागल हो गई हो," उसने डॉली से कहा और वहां से चला गया।

कामिनी और विक्रम ने एक-दूसरे को देखा। इरा मुस्कुराई, अपनी नोटपैड में कुछ नोट करते हुए।

"शानदार," रंगीला ने कहा। "दोपहर 2 बजे। मेरे स्टूडियो में। अकेले।"
 
दोपहर 2 बजे। रंगीला का स्टूडियो।

यह हवेली का सबसे ऊँचा कमरा था। बड़ी-बड़ी कांच की खिड़कियाँ जिनसे अरावली की पहाड़ियाँ दिखती थीं। कमरे में मिट्टी की गंध, पेंट और तारपीन के तेल की महक थी। जगह-जगह अधूरी मूर्तियाँ रखी थीं—बिना सिर के धड़, हाथ, पैर।

डॉली अंदर आई। उसने वही पीला सूट पहना था। वह नर्वस थी।

रंगीला एक बड़े से कैनवास के सामने खड़ा था, लेकिन वह पेंटिंग नहीं कर रहा था। वह मिट्टी गूंथ रहा था। उसने डॉली को देखा।

"दरवाज़ा बंद कर दो," रंगीला ने कहा।‘’

डॉली ने दरवाज़ा बंद किया।

"कपड़े उतारो," रंगीला ने आदेश दिया, बिना डॉली की तरफ देखे। वह अपने काम में व्यस्त था।

डॉली हिचकिचाई। "पूरी तरह?"

"कला अधूरी चीज़ें पसंद नहीं करती, डॉली," रंगीला ने मुड़कर कहा। उसके हाथ मिट्टी से सने थे।

डॉली ने अपना दुपट्टा उतारा। फिर उसने अपनी कमीज़ के बटन खोले। उसके हाथ कांप रहे थे। राज का गुस्सा उसे याद आ रहा था, लेकिन रंगीला की मौजूदगी उसे बांध रही थी।

कमीज़ उतर गई। सलवार उतर गई। अब वह अपने अंडरगारमेंट्स में थी।

"सब कुछ," रंगीला ने कहा।‘

डॉली ने अपनी ब्रा का हुक खोला। वह गिर गई। फिर पैंटी।

डॉली नग्न खड़ी थी। दिन की रोशनी में। खिड़कियों से आती धूप उसके शरीर पर पड़ रही थी। यह राज के साथ अंधेरे कमरे में होने जैसा नहीं था। यहाँ वह पूरी तरह उजागर थी।

रंगीला उसके पास आया। डॉली ने अपनी आँखें बंद कर लीं, यह सोचकर कि वह उसे छुएगा।

लेकिन रंगीला ने उसे नहीं छुआ।

वह उसके चारों तरफ घूमा। उसकी नज़रें डॉली के शरीर के हर इंच का मुआयना कर रही थीं।

"खूबसूरत," रंगीला ने बुदबुदाया। "लेकिन अभी भी... बहुत तनाव है।"

रंगीला ने गीली मिट्टी का एक लोंदा उठाया।

"मैं तुम्हें छूऊंगा नहीं, डॉली," रंगीला ने कहा। "लेकिन यह मिट्टी तुम्हें छुएगी।"

रंगीला ने वह ठंडी, गीली मिट्टी डॉली के कंधे पर रख दी। डॉली सिहर उठी। मिट्टी की ठंडक और रंगीला की उंगलियों की गर्मी (जो मिट्टी के ज़रिए आ रही थी) का अहसास अजीब था।

रंगीला ने मिट्टी को डॉली के कंधे से नीचे, उसके स्तन की ओर सरकाया। वह मिट्टी से डॉली के शरीर का सांचा ले रहा था।

"सांस लो," रंगीला ने कहा, जब मिट्टी डॉली के निप्पल को छू गई। "महसूस करो कि तुम एक मूरत बन रही हो। अमर।"

डॉली ने अपनी आँखें खोलीं। वह रंगीला को देख रही थी। रंगीला की आँखों में वासना नहीं, बल्कि एक जुनूनी एकाग्रता थी। और यह बात डॉली को और भी ज्यादा उत्तेजित कर रही थी। राज ने उसे एक औरत की तरह चाहा था, लेकिन रंगीला उसे एक देवी बना रहा था।

रंगीला ने और मिट्टी ली। इस बार उसने उसे डॉली की कमर पर लगाया, और फिर नीचे... उसके पेट पर। वह धीरे-धीरे नीचे जा रहा था।

डॉली की सांसें तेज़ हो गईं। "रंगीला..."

"हिलो मत," रंगीला ने सख्ती से कहा। "कलाकार का हाथ हिलना नहीं चाहिए।"

उसने मिट्टी को डॉली की जांघों के बीच ले जाकर दबाया। मिट्टी का स्पर्श वहां... उस सबसे निजी जगह पर... यह एक ऐसा अनुभव था जो किसी भी सेक्स से अलग था। यह ठंडा था, भारी था, और बेहद कामुक था।

डॉली के घुटने कांपने लगे। उसे लगा वह गिर जाएगी।‘’

"रंगीला... प्लीज़..."’

रंगीला ने मिट्टी हटा ली। उसने अपनी गंदी उंगलियों से डॉली की ठुड्डी को ऊपर उठाया।

"तुम्हारी आँखों में अब वह कहानी है," रंगीला ने कहा। "गुनाह की कहानी। राज को धोखा देने की कहानी।"

डॉली को झटका लगा।

"हाँ, डॉली," रंगीला मुस्कुराया। "तुमने अभी-अभी, अपने दिमाग में, राज को धोखा दिया है। क्योंकि तुम्हें यह पसंद आया।"

रंगीला ने एक कपड़ा डॉली की तरफ फेंका। "ढक लो खुद को। सेशन खत्म हुआ।"

डॉली ने कपड़ा लपेटा। वह शर्मिंदा थी, लेकिन उत्तेजित भी। रंगीला सही था। उसे मज़ा आया था।

जब डॉली स्टूडियो से बाहर निकली, तो कॉरिडोर में राज खड़ा था।

राज ने डॉली को देखा—उसके बिखरे बाल, उसके चेहरे पर मिट्टी का एक हल्का सा निशान, और उसकी उखड़ी हुई सांसें।

राज ने कुछ नहीं कहा। वह बस डॉली को देखता रहा। उसकी आँखों में दर्द था, और गुस्सा। वह मुड़ा और चला गया।

डॉली वहां खड़ी रह गई। उसने राज को खो दिया था? या यह खेल का अगला चरण था?

हवेली की दीवारों ने एक और राज़ निगल लिया था। डॉली अब सिर्फ राज की नहीं रही थी; रंगीला ने उसके दिमाग पर अपना निशान छोड़ दिया था।

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