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Adultery अधूरी दास्तां
राजस्थान का विशाल रेगिस्तान उस रात किसी सोई हुई बला की तरह खामोश नहीं था। आसमान का सीना चीरकर बिजली कड़क रही थी, और सूखी, बंजर ज़मीन पर बारिश की बूंदें ऐसे गिर रही थीं जैसे हज़ारों साल की प्यास बुझाने आई हों।
एक पुरानी, संकरी सड़क पर एक काले रंग की विंटेज मर्सिडीज़ आहिस्ता-आहिस्ता रेंग रही थी। उसके टायरों से कीचड़ उछल रहा था।
कार के अंदर डॉली बैठी थी। 28 वर्षीय लेखिका, जिसकी आँखों में कहानियों से ज्यादा खालीपन था। उसने अपनी शॉल को अपने कंधों पर कस लिया, लेकिन ठंड बाहर की हवा में नहीं, बल्कि उसके अंदर थी।
वह यहाँ, इस अनजान जगह पर, अपनी खोई हुई 'आग' को ढूँढने आई थी—लेखन की आग, और शायद... अपने जिस्म की भी।
कार एक झटके के साथ रुकी।
"मैडम, आगे रास्ता बंद है। गेट तक पैदल जाना होगा," ड्राइवर ने पीछे मुड़कर कहा।
डॉली ने कार का दरवाज़ा खोला। रेगिस्तानी हवा का एक तूफानी झोंका अंदर आया, जो अपने साथ गीली मिट्टी और किसी पुराने, दबे हुए राज़ की गंध लेकर आया था। उसने अपना छोटा लेदर बैग उठाया और बाहर कदम रखा।
सामने वह खड़ी थी—'लाल हवेली'।
बिजली की चमक में वह इमारत किसी खूंखार जानवर जैसी लग रही थी जो अपने शिकार के इंतज़ार में बैठा हो। लाल बलुआ पत्थर की ऊँची दीवारें बारिश में खून जैसी लाल लग रही थीं। विशाल लोहे का गेट बंद था, जिस पर जंग लगे हुए ताले लटक रहे थे।
डॉली गेट की ओर बढ़ी। बारिश की तेज़ बौछारें उसकी पतली शिफॉन की साड़ी को भिगोने लगीं। कुछ ही पलों में, वह कपड़ा उसकी त्वचा से किसी दूसरी चमड़ी की तरह चिपक गया।
पानी की बूंदें उसके बालों से टपककर उसकी गर्दन, उसकी रीढ़ की हड्डी और फिर नीचे साड़ी के प्लीट्स में समा रही थीं।
ठंड की वजह से उसके निप्पल्स ब्लाउज़ के कपड़े के पार सख्त होकर उभर आए थे, जिसका उसे अहसास भी था और शायद... एक अजीब सा रोमांच भी।
गेट के पास पहुँचकर उसने देखा कि वह अकेली नहीं है।
वहाँ एक पुरानी जीप के बोनट पर एक आदमी बैठा था, जो बारिश से बेपरवाह लग रहा था। यह राज था।
उसने एक मिलिट्री ग्रीन टी-शर्ट और कार्गो पैंट्स पहनी थीं। बारिश उसके छोटे कटे बालों से बहते हुए उसके सख्त जबड़े और चौड़ी छाती पर गिर रही थी। वह सिगरेट पी रहा था, जिसे उसने अपने हाथ के कप बनाकर बारिश से बचाया हुआ था। उसकी आँखें... वे किसी बाज की तरह तीखी थीं।
और उसके ठीक बगल में, एक पिलर से टेक लगाकर खड़ी थी कामिनी । वह किसी फैशन मैगज़ीन के कवर से निकली हुई लग रही थी, जिसे तूफ़ान में फेंक दिया गया हो।
उसने एक बेज रंग की मिनी ड्रेस पहनी थी जो पानी में भीगकर पूरी तरह पारदर्शी हो चुकी थी। उसके काले लॉन्जरी का सेट साफ़ झलक रहा था, लेकिन उसने खुद को ढकने की कोई कोशिश नहीं की थी। बल्कि, वह अपनी बाहें फैलाकर बारिश का मज़ा ले रही थी।
"स्वागत है," राज ने अपनी सिगरेट का कश लेते हुए कहा, उसकी आवाज़ बादलों की गड़गड़ाहट से भी भारी थी।
"लगता है हम सब एक ही नरक में आमंत्रित हैं।"
डॉली ने अपनी भीगी हुई साड़ी का पल्लू ठीक करने की नाकाम कोशिश की। "दरवाज़ा बंद है?" उसने पूछा।
"फिलहाल तो हाँ," कामिनी ने अपनी भीगी लटों को उंगली में लपेटते हुए कहा। उसने राज की तरफ एक शरारती नज़र डाली।
"शायद यह गेट किसी 'खास' तरह से खुलता हो? क्यों फौजी साहब, आपके पास कोई बड़ा हथियार है इसे तोड़ने के लिए?"
राज ने कामिनी की द्विअर्थी बात को नज़रअंदाज़ कर दिया, लेकिन उसकी नज़रें डॉली पर जा टिकीं।
डॉली का भीगा हुआ बदन, उसकी ठिठुरती हुई देह और साड़ी से झांकता उसका पेट—राज की मर्दाना नज़रों ने उसे एक ही पल में स्कैन कर लिया।
डॉली ने उस नज़र को महसूस किया—एक ऐसी नज़र जो कपड़े उतारने का इंतज़ार नहीं करती, बल्कि कपड़ों के पार देख लेती है। डॉली को लगा जैसे किसी ने उसके पेट पर गर्म मोम गिरा दिया हो।
"मैं डॉली हूँ," उसने अपनी आवाज़ को स्थिर रखने की कोशिश की।
"यहाँ नाम कोई मायने नहीं रखते," राज ने कहा, बोनट से नीचे उतरते हुए। वह डॉली के करीब आया, बहुत करीब। "सिर्फ यह मायने रखता है कि तुम यहाँ क्यों आई हो।"
राज की मौजूदगी हावी होने वाली थी। डॉली को उसकी सिगरेट, बारिश और कस्तूरी की गंध आई। वह पीछे हटना चाहती थी, लेकिन उसके पैर ज़मीन में गड़ गए थे।
तभी, लोहे के गेट से एक भारी, धातुई आवाज़ आई। चरा्र्र्र…
गेट धीरे-धीरे, बिना किसी इंसानी मदद के, खुलने लगा।
"जादू," कामिनी हंसी और सबसे पहले अंदर भागी।
राज ने डॉली को रास्ता दिया। "लेडीज़ फर्स्ट।"
डॉली ने राज को देखा, फिर गेट को। उसने एक गहरी सांस ली और अंदर कदम रखा।
राजस्थान का विशाल रेगिस्तान उस रात किसी सोई हुई बला की तरह खामोश नहीं था। आसमान का सीना चीरकर बिजली कड़क रही थी, और सूखी, बंजर ज़मीन पर बारिश की बूंदें ऐसे गिर रही थीं जैसे हज़ारों साल की प्यास बुझाने आई हों।
एक पुरानी, संकरी सड़क पर एक काले रंग की विंटेज मर्सिडीज़ आहिस्ता-आहिस्ता रेंग रही थी। उसके टायरों से कीचड़ उछल रहा था।
कार के अंदर डॉली बैठी थी। 28 वर्षीय लेखिका, जिसकी आँखों में कहानियों से ज्यादा खालीपन था। उसने अपनी शॉल को अपने कंधों पर कस लिया, लेकिन ठंड बाहर की हवा में नहीं, बल्कि उसके अंदर थी।
वह यहाँ, इस अनजान जगह पर, अपनी खोई हुई 'आग' को ढूँढने आई थी—लेखन की आग, और शायद... अपने जिस्म की भी।
कार एक झटके के साथ रुकी।
"मैडम, आगे रास्ता बंद है। गेट तक पैदल जाना होगा," ड्राइवर ने पीछे मुड़कर कहा।
डॉली ने कार का दरवाज़ा खोला। रेगिस्तानी हवा का एक तूफानी झोंका अंदर आया, जो अपने साथ गीली मिट्टी और किसी पुराने, दबे हुए राज़ की गंध लेकर आया था। उसने अपना छोटा लेदर बैग उठाया और बाहर कदम रखा।
सामने वह खड़ी थी—'लाल हवेली'।
बिजली की चमक में वह इमारत किसी खूंखार जानवर जैसी लग रही थी जो अपने शिकार के इंतज़ार में बैठा हो। लाल बलुआ पत्थर की ऊँची दीवारें बारिश में खून जैसी लाल लग रही थीं। विशाल लोहे का गेट बंद था, जिस पर जंग लगे हुए ताले लटक रहे थे।
डॉली गेट की ओर बढ़ी। बारिश की तेज़ बौछारें उसकी पतली शिफॉन की साड़ी को भिगोने लगीं। कुछ ही पलों में, वह कपड़ा उसकी त्वचा से किसी दूसरी चमड़ी की तरह चिपक गया।
पानी की बूंदें उसके बालों से टपककर उसकी गर्दन, उसकी रीढ़ की हड्डी और फिर नीचे साड़ी के प्लीट्स में समा रही थीं।
ठंड की वजह से उसके निप्पल्स ब्लाउज़ के कपड़े के पार सख्त होकर उभर आए थे, जिसका उसे अहसास भी था और शायद... एक अजीब सा रोमांच भी।
गेट के पास पहुँचकर उसने देखा कि वह अकेली नहीं है।
वहाँ एक पुरानी जीप के बोनट पर एक आदमी बैठा था, जो बारिश से बेपरवाह लग रहा था। यह राज था।
उसने एक मिलिट्री ग्रीन टी-शर्ट और कार्गो पैंट्स पहनी थीं। बारिश उसके छोटे कटे बालों से बहते हुए उसके सख्त जबड़े और चौड़ी छाती पर गिर रही थी। वह सिगरेट पी रहा था, जिसे उसने अपने हाथ के कप बनाकर बारिश से बचाया हुआ था। उसकी आँखें... वे किसी बाज की तरह तीखी थीं।
और उसके ठीक बगल में, एक पिलर से टेक लगाकर खड़ी थी कामिनी । वह किसी फैशन मैगज़ीन के कवर से निकली हुई लग रही थी, जिसे तूफ़ान में फेंक दिया गया हो।
उसने एक बेज रंग की मिनी ड्रेस पहनी थी जो पानी में भीगकर पूरी तरह पारदर्शी हो चुकी थी। उसके काले लॉन्जरी का सेट साफ़ झलक रहा था, लेकिन उसने खुद को ढकने की कोई कोशिश नहीं की थी। बल्कि, वह अपनी बाहें फैलाकर बारिश का मज़ा ले रही थी।
"स्वागत है," राज ने अपनी सिगरेट का कश लेते हुए कहा, उसकी आवाज़ बादलों की गड़गड़ाहट से भी भारी थी।
"लगता है हम सब एक ही नरक में आमंत्रित हैं।"
डॉली ने अपनी भीगी हुई साड़ी का पल्लू ठीक करने की नाकाम कोशिश की। "दरवाज़ा बंद है?" उसने पूछा।
"फिलहाल तो हाँ," कामिनी ने अपनी भीगी लटों को उंगली में लपेटते हुए कहा। उसने राज की तरफ एक शरारती नज़र डाली।
"शायद यह गेट किसी 'खास' तरह से खुलता हो? क्यों फौजी साहब, आपके पास कोई बड़ा हथियार है इसे तोड़ने के लिए?"
राज ने कामिनी की द्विअर्थी बात को नज़रअंदाज़ कर दिया, लेकिन उसकी नज़रें डॉली पर जा टिकीं।
डॉली का भीगा हुआ बदन, उसकी ठिठुरती हुई देह और साड़ी से झांकता उसका पेट—राज की मर्दाना नज़रों ने उसे एक ही पल में स्कैन कर लिया।
डॉली ने उस नज़र को महसूस किया—एक ऐसी नज़र जो कपड़े उतारने का इंतज़ार नहीं करती, बल्कि कपड़ों के पार देख लेती है। डॉली को लगा जैसे किसी ने उसके पेट पर गर्म मोम गिरा दिया हो।
"मैं डॉली हूँ," उसने अपनी आवाज़ को स्थिर रखने की कोशिश की।
"यहाँ नाम कोई मायने नहीं रखते," राज ने कहा, बोनट से नीचे उतरते हुए। वह डॉली के करीब आया, बहुत करीब। "सिर्फ यह मायने रखता है कि तुम यहाँ क्यों आई हो।"
राज की मौजूदगी हावी होने वाली थी। डॉली को उसकी सिगरेट, बारिश और कस्तूरी की गंध आई। वह पीछे हटना चाहती थी, लेकिन उसके पैर ज़मीन में गड़ गए थे।
तभी, लोहे के गेट से एक भारी, धातुई आवाज़ आई। चरा्र्र्र…
गेट धीरे-धीरे, बिना किसी इंसानी मदद के, खुलने लगा।
"जादू," कामिनी हंसी और सबसे पहले अंदर भागी।
राज ने डॉली को रास्ता दिया। "लेडीज़ फर्स्ट।"
डॉली ने राज को देखा, फिर गेट को। उसने एक गहरी सांस ली और अंदर कदम रखा।