S
StoryPublisher
Guest
एक रात ऐसी भी
राज कचहरी की इमारत से बाहर निकला । बाहर अन्धेरा छा चुका था और ठन्डी बर्फीली हवा चल रही थी ।
अखबार में मौसम का जो पूर्वाभास छपा था, उसके अनुसार उर रात कश्मीर में बर्फ का भीषण तूफान आने वाला था लेकिन अभी तक उस तूफान के कोई लक्षण वातावरण में प्रकट नहीं हुए थे ।
कोर्ट में से मजिस्ट्रेट साधारणतया पांच बजे उठ जाता था लेकिन उस रोज ऐसा नहीं हुआ था । उस रोज गवाही के लिए उसकी बारी आने तक ही साढे छः बज चुके थे ।
उसने अपने कोट का कालर ऊंचा कर लिया और कम्पाउन्ड में उस ओर बढा जिधर खड़ी कई कारों में उसकी फियेट भी खड़ी थी ।
उसे अपनी खूबसूरत बीवी कामिनी का ख्याल आया ।
कामिनी से उसकी शादी हुए तीन महीने हुए थे और उन तीन महीनों में वह पहला मौका था जब राज वक्त पर घर नहीं पहुंचा था । उसके फ्लैट पर फोन था लेकिन इत्तफाक से वह फोन पर भी कामिनी को खबर नहीं कर सका था कि उस रोज लौटने में उसे देर हो सकती थी ।
बेचारी चिंता न कर रही हो मेरी - उसने सोचा ।
चिंता तो वह जरूर कर रही होगी । ऐसा पहले कभी हुआ जो नहीं था ।
तभी एक कार की ओट में से एक साया प्रकट हुआ और उसके सामने आ खड़ा हुआ ।
राज ठिठका ।
वह केवल इतना ही देख पाया कि वह एक लम्बा-चौड़ा आदमी था । कम्पाउन्ड के नीम अन्धेरे में उसे उसकी सूरत दिखाई न दी ।
“क्या है ?” - राज तनिक कठोर स्वर में बोला ।
“तुम्हारा नाम राज है ?” - उस आदमी ने पूछा ।
“हां ।” - वह बोला । ठन्ड इतनी थी कि उस एक शब्द के साथ भी उसके मुंह से ढेर सारी भाप निकली और उसके चश्मे के शीशे धुंधला गए ।
“तुम प्रोफेसर हो ?”
“हां, हां !”
“तुम गवर्नमेन्ट कालेज में इतिहास पढाते हो ?”
“हां भई । लेकिन क्या बात है ?”
लम्बे-चौड़े आदमी ने उसके सवाल की ओर ध्यान नहीं दिया, उसने एक ओर मुंह फेरा और उच्च स्वर में बोला - “वीरू ! यही है वो आदमी ।”
कार के पीछे से एक आदमी और प्रकट हुआ ।‘’
“क्या बात है ?” - राज ने फिर पूछा ।
“अभी मालूम हुआ जाता है ।” - दूसरा आदमी बोला ।
उसी क्षण कचहरी की इमारत के खुले दरवाजे में से एक हवलदार ने बाहर कदम रखा । उसके एक कदम पीछे हथकड़ियों से बंधा कुणाल चल रहा था । वे दोनों समीप आए तो कुणाल ने राज को पहचान लिया ।
“प्रोफेसर साहब” - कुणाल नफरत भरे स्वर में बोला - “लानत है आप पर । मेरी खातिर जरा-सा झूठ बोल देते तो क्या बिगड़ जाता आपका ?”
“मेरा तो कुछ न बिगड़ता ।” - राज बोला - “लेकिन मेरे झूठ बोल देने से तुम्हारा बहुत-कुछ बिगड़ जाता ।”
“मेरा क्या बिगड़ जाता ?”
“यह तुम्हें इस वक्त समझ नहीं आएगा लेकिन आने वाला वक्त बताएगा कि मैंने झूठ न बोलकर तुम्हारा भला ही किया है ।”
“लानत है तुम्हारे ऐसे भले पर जिसकी वजह से मुझे जेल की हवा खानी पड़ने वाली है ।”
“इसी में तुम्हारी भलाई है ।”
“आए बड़े मेरी भलाई परखने वाले । प्रोफेसर ! तुम्हारी वजह से मुझे जेल जाना पड़ रहा है । देख लेना तुम्हें पछताना पड़ेगा । शिमले में मेरे बड़े हिमायती हैं ।”
हवलदार ने कुणाल के हाथों में लगी हथकड़ी को एक झटका दिया और कठोर स्वर में बोला - “छोकरे ! क्या प्रोफेसर साहब को धमकी दे रहा है ?”
“ये इसे जो चाहे समझ सकते हैं ।” - कुणाल लापरवाही से बोला ।
“चलो हिलो यहां से ।”
कुणाल और हवलदार परे खड़ी पुलिस की जीप की ओर बढ गए ।
राज ने असहाय भाव से गर्दन हिलाई । कुणाल अभी उन्नीस साल का था और सेकेन्ड ईयर का विद्यार्थी था । गलत सोहबत की वजह से ही वह अपने आज के अंजाम तक पहुंचा था । उसे मालूम हुआ था कि जो कुछ उसने किया था, उसी कालेज की एक लड़की की वजह से किया था ।
लम्बे-चौड़े आदमी ने उत्सुक भाव से राज से पूछा - “क्या किया है इस छोकरे ने ?”
“दिन-दहाड़े एक दुकानदार का गल्ला लूटने की कोशिश की थी इसने ।” - राज ने बताया - “किसी छोकरी के साथ ऐश करने के लिए । लेकिन बाद में पकड़ा गया था ।”
“तुमसे क्यों खफा है वो ?”
“पकड़े जाने के बाद यह इस बात से साफ मुकर गया था कि इसने दोपहर के समय किसी दुकानदार को चाकू दिखाकर उसका गल्ला लूटा था । इसने कहा था कि उस घटना के समय यह कालेज में था और मेरी क्लास में बैठा इतिहास पढ रहा था । यह मुझसे अपनी खातिर झूठ बुलवाना चाहता था ।”
“अगर तुम कह देते कि उस वक्त यह तुम्हारी क्लास में मौजूद था तो पुलिस उसे छोड़ देती ?”
“हां ।”
“तुमने ऐसा क्यों नहीं कहा ?”
“मैं क्यों कहता ऐसा ?”
“क्योंकि तुम्हारे ऐसा कह देने से बेचारा जेल जाने से बच सकता है । अभी बच्चा ही तो है वो ।”
“मेरे झूठ बोल देने से नरेश इस बार तो बच जाता लेकिन इस बात से क्या यह कोई सबक लेता ? क्या यह सुधरने की कोशिश करता ? हरगिज नहीं । सजा पाये बिना छूट जाने को यह अपनी कामयाबी मानता । इसके हौसले बुलन्द हो जाते और यह पहले से बड़ा अपराध करने की कोशिश करता । आज इसके हाथ में चाकू लग गया था । कल यह पिस्तौल मुहैया करने की कोशिश करता । आज यह मामूली सजा पाकर छूट जाएगा । कल तक इसने अपने लिए फांसी की सजा का सामान कर लेना था । आग को भड़कने से पहले दबा देना ही समझदारी होती है । बुराई को शुरू में रोकना जरूरी होता है । यह इस बात को आज नहीं समझ सकता लेकिन आगे चलकर समझ जाएगा कि इसके हक में झूठी गवाही न देकर मैंने इसका भला किया है ।”
“शायद तुम ठीक कह रहे हो ।”
“लेकिन तुम लोग कौन हो और मुझसे क्या चाहते हो ?”
तभी वहां से रवाना होने को तत्पर पुलिस की जीप की हैडलाइट की रोशनी उन दोनों आदमियों पर पड़ी । राज ने देखा वे दोनों बड़े सलीके के कपड़े पहने हुए थे और बड़े रोबदार लग रहे थे । राज सोचने लगा क्य वे सी आई डी के आदमी थे ।
“हम लोग ।” - लम्बा-चौड़ा आदमी बोला - “यह समझ लो कि कामिनी के दोस्त हैं ।”
“तुम लोग मेरी बीवी को जानते हो ?”
“बहुत अच्छी तरह से ।” - दूसरा आदमी बोला - “क्या कामिनी ने तुम्हें हमारे बारे में कभी नहीं बताया ?”
“नहीं ।”
“कभी हमारा जिक्र तक नहीं किया ?”
“नहीं ।”
“यह कैसे हो सकता है ?”
“मैं सच कह रहा हूं । आप लोग बराय मेहरबानी मुझे इजाजत दीजिए । मुझे घर पहुंचना है ।”
और राज ने अपनी कार की दिशा में कदम बढाया ।
राज कचहरी की इमारत से बाहर निकला । बाहर अन्धेरा छा चुका था और ठन्डी बर्फीली हवा चल रही थी ।
अखबार में मौसम का जो पूर्वाभास छपा था, उसके अनुसार उर रात कश्मीर में बर्फ का भीषण तूफान आने वाला था लेकिन अभी तक उस तूफान के कोई लक्षण वातावरण में प्रकट नहीं हुए थे ।
कोर्ट में से मजिस्ट्रेट साधारणतया पांच बजे उठ जाता था लेकिन उस रोज ऐसा नहीं हुआ था । उस रोज गवाही के लिए उसकी बारी आने तक ही साढे छः बज चुके थे ।
उसने अपने कोट का कालर ऊंचा कर लिया और कम्पाउन्ड में उस ओर बढा जिधर खड़ी कई कारों में उसकी फियेट भी खड़ी थी ।
उसे अपनी खूबसूरत बीवी कामिनी का ख्याल आया ।
कामिनी से उसकी शादी हुए तीन महीने हुए थे और उन तीन महीनों में वह पहला मौका था जब राज वक्त पर घर नहीं पहुंचा था । उसके फ्लैट पर फोन था लेकिन इत्तफाक से वह फोन पर भी कामिनी को खबर नहीं कर सका था कि उस रोज लौटने में उसे देर हो सकती थी ।
बेचारी चिंता न कर रही हो मेरी - उसने सोचा ।
चिंता तो वह जरूर कर रही होगी । ऐसा पहले कभी हुआ जो नहीं था ।
तभी एक कार की ओट में से एक साया प्रकट हुआ और उसके सामने आ खड़ा हुआ ।
राज ठिठका ।
वह केवल इतना ही देख पाया कि वह एक लम्बा-चौड़ा आदमी था । कम्पाउन्ड के नीम अन्धेरे में उसे उसकी सूरत दिखाई न दी ।
“क्या है ?” - राज तनिक कठोर स्वर में बोला ।
“तुम्हारा नाम राज है ?” - उस आदमी ने पूछा ।
“हां ।” - वह बोला । ठन्ड इतनी थी कि उस एक शब्द के साथ भी उसके मुंह से ढेर सारी भाप निकली और उसके चश्मे के शीशे धुंधला गए ।
“तुम प्रोफेसर हो ?”
“हां, हां !”
“तुम गवर्नमेन्ट कालेज में इतिहास पढाते हो ?”
“हां भई । लेकिन क्या बात है ?”
लम्बे-चौड़े आदमी ने उसके सवाल की ओर ध्यान नहीं दिया, उसने एक ओर मुंह फेरा और उच्च स्वर में बोला - “वीरू ! यही है वो आदमी ।”
कार के पीछे से एक आदमी और प्रकट हुआ ।‘’
“क्या बात है ?” - राज ने फिर पूछा ।
“अभी मालूम हुआ जाता है ।” - दूसरा आदमी बोला ।
उसी क्षण कचहरी की इमारत के खुले दरवाजे में से एक हवलदार ने बाहर कदम रखा । उसके एक कदम पीछे हथकड़ियों से बंधा कुणाल चल रहा था । वे दोनों समीप आए तो कुणाल ने राज को पहचान लिया ।
“प्रोफेसर साहब” - कुणाल नफरत भरे स्वर में बोला - “लानत है आप पर । मेरी खातिर जरा-सा झूठ बोल देते तो क्या बिगड़ जाता आपका ?”
“मेरा तो कुछ न बिगड़ता ।” - राज बोला - “लेकिन मेरे झूठ बोल देने से तुम्हारा बहुत-कुछ बिगड़ जाता ।”
“मेरा क्या बिगड़ जाता ?”
“यह तुम्हें इस वक्त समझ नहीं आएगा लेकिन आने वाला वक्त बताएगा कि मैंने झूठ न बोलकर तुम्हारा भला ही किया है ।”
“लानत है तुम्हारे ऐसे भले पर जिसकी वजह से मुझे जेल की हवा खानी पड़ने वाली है ।”
“इसी में तुम्हारी भलाई है ।”
“आए बड़े मेरी भलाई परखने वाले । प्रोफेसर ! तुम्हारी वजह से मुझे जेल जाना पड़ रहा है । देख लेना तुम्हें पछताना पड़ेगा । शिमले में मेरे बड़े हिमायती हैं ।”
हवलदार ने कुणाल के हाथों में लगी हथकड़ी को एक झटका दिया और कठोर स्वर में बोला - “छोकरे ! क्या प्रोफेसर साहब को धमकी दे रहा है ?”
“ये इसे जो चाहे समझ सकते हैं ।” - कुणाल लापरवाही से बोला ।
“चलो हिलो यहां से ।”
कुणाल और हवलदार परे खड़ी पुलिस की जीप की ओर बढ गए ।
राज ने असहाय भाव से गर्दन हिलाई । कुणाल अभी उन्नीस साल का था और सेकेन्ड ईयर का विद्यार्थी था । गलत सोहबत की वजह से ही वह अपने आज के अंजाम तक पहुंचा था । उसे मालूम हुआ था कि जो कुछ उसने किया था, उसी कालेज की एक लड़की की वजह से किया था ।
लम्बे-चौड़े आदमी ने उत्सुक भाव से राज से पूछा - “क्या किया है इस छोकरे ने ?”
“दिन-दहाड़े एक दुकानदार का गल्ला लूटने की कोशिश की थी इसने ।” - राज ने बताया - “किसी छोकरी के साथ ऐश करने के लिए । लेकिन बाद में पकड़ा गया था ।”
“तुमसे क्यों खफा है वो ?”
“पकड़े जाने के बाद यह इस बात से साफ मुकर गया था कि इसने दोपहर के समय किसी दुकानदार को चाकू दिखाकर उसका गल्ला लूटा था । इसने कहा था कि उस घटना के समय यह कालेज में था और मेरी क्लास में बैठा इतिहास पढ रहा था । यह मुझसे अपनी खातिर झूठ बुलवाना चाहता था ।”
“अगर तुम कह देते कि उस वक्त यह तुम्हारी क्लास में मौजूद था तो पुलिस उसे छोड़ देती ?”
“हां ।”
“तुमने ऐसा क्यों नहीं कहा ?”
“मैं क्यों कहता ऐसा ?”
“क्योंकि तुम्हारे ऐसा कह देने से बेचारा जेल जाने से बच सकता है । अभी बच्चा ही तो है वो ।”
“मेरे झूठ बोल देने से नरेश इस बार तो बच जाता लेकिन इस बात से क्या यह कोई सबक लेता ? क्या यह सुधरने की कोशिश करता ? हरगिज नहीं । सजा पाये बिना छूट जाने को यह अपनी कामयाबी मानता । इसके हौसले बुलन्द हो जाते और यह पहले से बड़ा अपराध करने की कोशिश करता । आज इसके हाथ में चाकू लग गया था । कल यह पिस्तौल मुहैया करने की कोशिश करता । आज यह मामूली सजा पाकर छूट जाएगा । कल तक इसने अपने लिए फांसी की सजा का सामान कर लेना था । आग को भड़कने से पहले दबा देना ही समझदारी होती है । बुराई को शुरू में रोकना जरूरी होता है । यह इस बात को आज नहीं समझ सकता लेकिन आगे चलकर समझ जाएगा कि इसके हक में झूठी गवाही न देकर मैंने इसका भला किया है ।”
“शायद तुम ठीक कह रहे हो ।”
“लेकिन तुम लोग कौन हो और मुझसे क्या चाहते हो ?”
तभी वहां से रवाना होने को तत्पर पुलिस की जीप की हैडलाइट की रोशनी उन दोनों आदमियों पर पड़ी । राज ने देखा वे दोनों बड़े सलीके के कपड़े पहने हुए थे और बड़े रोबदार लग रहे थे । राज सोचने लगा क्य वे सी आई डी के आदमी थे ।
“हम लोग ।” - लम्बा-चौड़ा आदमी बोला - “यह समझ लो कि कामिनी के दोस्त हैं ।”
“तुम लोग मेरी बीवी को जानते हो ?”
“बहुत अच्छी तरह से ।” - दूसरा आदमी बोला - “क्या कामिनी ने तुम्हें हमारे बारे में कभी नहीं बताया ?”
“नहीं ।”
“कभी हमारा जिक्र तक नहीं किया ?”
“नहीं ।”
“यह कैसे हो सकता है ?”
“मैं सच कह रहा हूं । आप लोग बराय मेहरबानी मुझे इजाजत दीजिए । मुझे घर पहुंचना है ।”
और राज ने अपनी कार की दिशा में कदम बढाया ।