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Adultery ' गाँव का टेलर '

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उसने धीरे से अपना मोबाइल ऑन किया और एक वीडियो शालू की ओर कर दिया। एक मिनट में ही ख़ुद को निर्वस्त्र आकाश उर्फ़ अल्ताफ़ के साथ ख़ुद को देखकर अवाक रह गई और डैनी के हाथ से मोबाइल छिनने लगी। डैनी की पकड़ मज़बूत थी उसने उसे ऑफ किया और फिर से जेब में डाल लिया। शालू ठंडी हो चुकी थी।

“यह! यह! तुझे कहाँ से मिला?”

“मरीन लाइंस के समंदर किनारे जिसकी गोद में सोकर अक्सा बीच के गोल्डन कॉटेज का प्लान बना रही थी, मैं भी वहीं था तुम्हारे पीछे।”

“ओह्ह!”

“चल छोड़ मज़ाक़ मत कर चलते हैं बेडरूम में।”

“नहीं डैनी, तू मेरा...”

“पगली, क्या फ़र्क़ पड़ता है, और फिर हम ही कौन से सगे हैं! तेरा बाप दूसरा, मेरी माँ दूसरी, आख़िर वे दोनों भी तो मज़े ले रहे हैं न, फिर हम क्यों प्यासे रहें? और तू भी कहाँ गंगाजल-सी पवित्र है! छोड़ सब, आ चलते हैं बेडरूम में।”

डैनी बेडरूम की ओर चल दिया। शालू भी खिंचती चली गई। आज एक और पार्टनर उसे मिल चुका था।

एक बार ही शर्म की दीवार को टूटने में वक़्त लगता है, एक बार टूट जाने पर फिर दरवाज़ा खुला का खुला ही रह जाता है। फिर तो चाहे जब आओ चाहे जब जाओ।

अब डैनी और शालू के लिए वह रोज़मर्रा का खेल हो चुका था। उसी से शालू को यह भी पता चला कि डैनी के संबंध उसी से ही नहीं, बल्कि उसकी माँ से भी हैं, कभी-कभी डैडी बाहर चले गए तो दो-तीन दिन उनका आना नहीं होता और तब मम्मी और डैनी ही एक-दूसरे के पार्टनर होते हैं। इसीलिए उसकी तरफ़ भी बढ़ने की उसकी हिम्मत भी हुई। शालू यह भी जानती है कि कभी-कभी सतीश अंकल भी आते हैं मम्मी से मिलने। पहले वह दोनों ही एक-दूसरे के लवर थे, कई बार वह ख़ुद छेद में से उन दोनों के बीच को भीतर देख चुकी है और जब भी देखी है उसका भी दिल अंकल से मिलने को हुआ है लेकिन मम्मी की वजह से वह ख़ामोश ही रही। उसने कई बार अंकल को भी अपनी और प्यासी नज़रों से देखते हुए देखा था लेकिन उन्हें ज़ाहिर नहीं होने दी थी।

डैनी के साथ भी दो साल का समय गुज़र चुका था। वह चौबीस की उम्र पार कर रही थी, उम्र के साथ-ही-साथ उससे दुगनी उसकी कामवासना बढ़ रही थी। धीरे-धीरे वह सेक्स एडिक्ट होती जा रही थी। रोज़-रोज़ उसको ज़रूरत रहने लगी प्यास बुझाने की, अब वह साधारण लड़की नहीं रही थी। घर से मिली खुली छूट, घर का वातावरण और पैसों की मनमानी ने उसे बहुत दूर तक धकेल दिया था। वह इस रास्ते से लाख चाहकर भी अब लौट नहीं सकती थी।

कभी कोई पार्टनर के न मिलने पर, वह ख़ुद भी अकेले डांस क्लब में चली जाया करती थी और वहीं किसी को अपने शिकंजे में लेकर क्लब रूम में ही चली जाती थी और घंटे दो घंटे बाद वह फ्रेश मूड में कमरे से बाहर निकलती और अपने फ्लैट पर आती।

कभी-कभी उसका मूड कुछ अलग से करने को होता तो गाड़ी उठाती और पहुँच जाती बांद्रा के बैंड स्टैंड पर, समुद्र के किनारे जगह जगह बैठे जिगोलो पर नज़र घुमाती और जो बंदा हट्टा-कट्टा नज़र आता उस पुरुष वेश्या को इशारा कर बुला लेती और गाड़ी में बैठकर पहुँच जाती किसी पॉश होटल के कमरे में।

वासना में डूबी शालू केवल सेक्स एडिक्ट तक ही सीमित नहीं रही बल्कि वासना के मेरी और दोस्तों के संगत में अब वह ब्राउन शुगर, कोकीन, चरस आदि के नशे की ओर भी बढ़ चुकी थी। कामोत्तेजक ड्रग्स भी लेना शुरू कर दिया था। उसका पूरा शरीर, पूरी सोच, पूरी पसंद सब कुछ हवस के जाम में घुल चुके थे। महँगी से महँगी कोई शराब या कोई दूसरी नशे की ऐसी चीज़ नहीं जिसका स्वाद उसने चखा न हो।

ऐसा भी नहीं कि शालू की यह सारी हरकतें केके या ट्रिल्बो के नज़र में ना आई हो। केके मामूली आदमी नहीं थे, यहाँ तक का सफ़र उन्होंने ऐसे ही हासिल नहीं कर लिया था लेकिन काम की अधिकता और पैसों के जादू ने उन्हें इतना मौक़ा ही नहीं दिया कि समय के रहते अपने बीवी बच्चों पर नज़र रख सकें, ध्यान दे सकें। तितली भी उन्हें दूसरी तरफ़ ध्यान देने नहीं दे रही थी। आज भी उसके संगी साथी आते-जाते थे। लेकिन यह सब वह इतनी होशियारी से करती थी कि केके को अधिक सोचने का समय ना मिले। हालाँकि केके भी अपनी गैर मौजूदगी में होने वाले तितली के खेल से वाक़िफ़ थे, लेकिन उनकी भी अपनी मजबूरी यही थी की उम्र हो जाने के बाद तितली को संतुष्ट कर पाना उनके वश में नहीं था, और इसीलिए जानकर भी अंजान बने रहना उनकी विवशता भी थी।

कई बार केके और ट्रिल्बो ने कोशिश भी किया कि शालू की शादी हो जाए, शालू से उन्होंने इस विषय में चर्चा भी किया कि कोई लड़का पसंद हो तो बताएँ, लेकिन शालू क्या कहती किसका नाम लेती उसे तो रोज़ एक नए-नए बेड पार्टनर की चाहत थी। अब किसी एक के साथ बंधकर वाइफ बनना उसे पसंद नहीं था। जो हर बंधन से आज़ाद और बदलती थाली का भोजन पसंद करने लगे, उसे शाकाहारी चीज़ पसंद नहीं आती। शालू डेली चेंज की आदी हो चुकी थी और वह साफ़ मना कर देती थी कि उसे शादी नहीं करना है।

केके और तितली भी सब समझ रहे थे लेकिन ज़ोर-जबरदस्ती भी नहीं कर सकते थे। पानी बहुत आगे तक बह चुका था उसे इकट्ठा नहीं किया जा सकता था। वह दोनों ही समझाते और ख़ामोश हो जाते।
 
इसी तरह समय और बीतता रहा शालू भी तीस के क़रीब पहुँच चुकी थी और आधुनिकता के चकाचौंध में बहुत आगे तक निकल चुकी थी अब लौट पाने की स्थिति वह भी नहीं थी। इस बात को वह भी जानती-समझती थी लेकिन कोई पर्याय नहीं रह गया था।

ऐसे ही एक दिन तो तब शालू का माथा ठनका जब आधे नशे और आधे होश में उसके दोस्तों ने जब उसे स्क्रीन पर एक क्लिप दिखाए। उसने उसमें देखा कि वह अकेले ही निर्वस्त्र नहीं थी बल्कि चार-पाँच लोग भी वस्त्रहीन थे और सभी उसके जिस्म से खेल रहे थे। वह सभी के हाथों की कठपुतली बनी हुई थी। यह देखकर वह ख़ुद पसीने-पसीने हो गई, समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या देख रही थी, क्या हो रहा था और जो हो रहा था क्या वह ख़ुद उसके साथ ही हो रहा था! वह काँपने लगी थर थर, पूरा बदन पसीने से भीग गया, अवाक! बेहोश होते-होते बची। स्क्रीन पर उभरता दृष्य बंद हो गया। एक ने पानी का ग्लास उसकी और बढ़ाया और बोला– “कम ऑन बेबी, लो पानी पियो, इतना टेंशन लेने की ज़रूरत नहीं। यह तो खेल है खेला जाता रहेगा, नॉर्मल हो जाओ, घबरा क्यों रही है, तुझे ज़्यादा कुछ नहीं करना होगा।”

शालू ने काँपते हाथों से पानी का गिलास लिया और एक ही झटके में ख़त्म कर ग्लास टेबल पर रखते हुए सवाल या नज़रों से उसे देखने लगी।

“देख शालू, तुझे तो पता है कि हमारे घर का दरवाज़ा एक ही नहीं होता अलग-अलग घर अलग-अलग दरवाज़े। तू बहुत बड़े घर की बेटी है इसीलिए तुझे खुली छूट है लेकिन हम भी मजबूर हैं। ऊपर से दबाव आ रहा है कई दिनों से हमने लड़कियों की सप्लाई नहीं दिए। लड़कियाँ जाएगी नहीं तो हमारा खर्च कैसे चलेगा! अब तुझे भी हमारा काम करना होगा। तुझे कुछ ऑफ़िस और एक दो कॉलेज के पते दे दिए जाएँगे, वहाँ के हमारे लोगों का परिचय भी तुझे मिल जाएगा। तुझे उनसे मिलकर कुछ लड़के-लड़कियों को ये ड्रग्स भी देने होंगे और यहाँ तक ख़ूबसूरत कन्याओं को लाना भी होगा। तेरी बहार भी बरकरार रहेगी और हमारा भी काम चलता रहेगा। और हाँ, तूने तो ख़ुद को देख ही लिया है आगे क्या हो सकता है यह तू ख़ुद समझ सकती है। जा अब अपने घर, घर वाले तेरा इंतज़ार करते होंगे और हम भी करेंगे।”

शालू भीतर से घबराई हुई होने के बावजूद मुस्कुराई और ढंग का इशारा करते हुए खड़ी हो गई। मानो इस काम को उसने मंज़ूरी दे दी हो। गले मिली और सीधा नीचे आकर अपनी गाड़ी में बैठ गई। गाड़ी सड़क पर उतरते ही कब ज़ीरो से एक सौ बीस की स्पीड में पहुँच गई उसे पता ही नहीं चला। उसकी पसलियाँ आपस में टकराकर धाड़-धाड़ बज रही थीं, धड़कन इतनी बढ़ गई थी के मुँह से सिस्कारी-सी बजने लगी थी। हाँफती हुई ही गाड़ी चला रही थी, उसे इस समय ख़ुद नहीं पता कि वह गाड़ी में बैठी गाड़ी चला रही है। एक सौ बीस से आगे की ओर बढ़ता स्पीड काँटा एक सौ तीस, एक सौ चालीस! एक सौ पचास! और... और... फिर अचानक धड़ाम!

एक ज़ोर की आवाज़ के साथ गाड़ी सड़क पर खड़े टैंकर से टकराई! ज़ोर का धमाका हुआ, झटका इतना जबरदस्त था कि गाड़ी पूरी तरह पिचक गई थी, उसमें कोई था भी कि नहीं, यही पता लगाना मुश्किल हो रहा था। सिर्फ़ फैलता जा रहा ख़ून था और पिचकी हुई गाड़ी!

उड़ान, एकाएक रुक गई थी, ज़िंदगी सदा-सदा के लिए शांत होकर, न गिने जा सकने वाले टुकड़ों में सिमट गई थी।

,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,समाप्त,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
 
वर्जित सुख

'वर्जित सुख' जिसे समाज पाप कहता है, लेकिन बंद कमरों में हर कोई उसे जीने की ख्वाहिश रखता है।

राजस्थान के जोधपुर जिले का वह छोटा सा गाँव 'अज़ानगढ़' आज अपनी सबसे पुरानी और रईस विला की रोशनी में नहाया हुआ था। विला के हर कोने से शहनाइयों की गूंज अब थम चुकी थी।

मेहमानों की गाड़ियां धूल उड़ाती हुई वापस जा चुकी थीं। विला के विशाल दरवाजों को बंद कर दिया गया था और अब वहां सिर्फ रात के सन्नाटे और थके हुए नौकरों की फुसफुसाहट का राज था।

लेकिन विला की दूसरी मंजिल पर, पश्चिम दिशा वाले उस बड़े कमरे में, एक दिल ज़ोरों से धड़क रहा था।

यह 'सुहाग-कक्ष' था। कमरे को दुल्हन की तरह सजाया गया था। मोगरे और गुलाब की ताज़ा फूलों की लड़ियाँ बिस्तर के चारों तरफ लटकी थीं, जिनकी मादक और भारी खुशबू कमरे की हवा में ऐसे घुली हुई थी कि सांस लेने पर नशा सा चढ़ता था। कमरे के बीचों-बीच सागवान की लकड़ी का एक विशाल पलंग था, जिस पर लाल रंग की मखमली चादर बिछी थी और बीच में फूलों की सेज सजाई गई थी।

और उस पलंग के बीचों-बीच, अपने घुटनों को छाती से लगाए, सिमटी हुई बैठी थी—कामिनी।

22 साल की कामिनी। उसकी खूबसूरती ऐसी थी कि अगर वह घूंघट उठा दे तो कमरे के दीये फीके पड़ जाएं। उसका रंग दूधिया गोरा था, जो राजस्थानी गर्मी में तपे बिना, विला की छांव में पला-बढ़ा था। उसने लाल रंग का भारी-भरकम, सोने की तारों से कढा हुआ लहंगा पहना था। उसका वजन इतना था कि कामिनी को हिलने में भी मशक्कत करनी पड़ रही थी।

उसने अपने चेहरे को एक लंबे, पारदर्शी घूंघट में छिपा रखा था, लेकिन घूंघट के अंदर उसकी बड़ी-बड़ी कजरारी आंखें डर, संकोच और एक अनजानी उम्मीद से भरी थीं।

कामिनी ने अपनी हथेलियों को देखा, जिन पर गहरी मेहंदी रची थी। मेहंदी की गंध और मोगरे की गंध मिलकर उसे एक अजीब सी बेचैनी दे रही थी। उसने अपनी सहेलियों और चाचियों से सुना था कि सुहागरात एक लड़की की ज़िंदगी की वह रात होती है जब वह 'लड़की' से 'औरत' बनती है। उसे बताया गया था कि आज रात उसका पति, प्रताप सिंह, उसके जिस्म का मालिक बनेगा।

कामिनी के शरीर में एक अजीब सी सिहरन दौड़ गई। वह अभी तक पूरी तरह से 'अछूती' थी। किसी भी मर्द ने आज तक उसकी उंगली भी नहीं पकड़ी थी। उसका शरीर एक बंद कली की तरह था, जो खिलने के लिए तैयार तो था, लेकिन डरा हुआ भी था।

कमरे में एसी नहीं था, सिर्फ पुरानी विला की मोटी दीवारें और छत का पंखा था जो धीरे-धीरे चल रहा था। भारी कपड़ों और गहनों की वजह से उसे पसीना आ रहा था। पसीने की एक बूंद उसकी कनपटी से लुढ़कती हुई, उसके गाल से होती हुई, उसके भारी सोने के हार के नीचे से गुज़री और उसके चोली की गहरी घाटी में समा गई।

कामिनी ने अपनी सांस रोकी। उसकी चोली बहुत तंग थी। दर्जी ने उसे जानबूझकर इतना कसा हुआ बनाया था कि कामिनी का यौवन उभर कर दिखे। उसके युवा, 21 साल के सख्त और सुडौल स्तन उस कपड़े में बुरी तरह कसे हुए थे। हर सांस के साथ उसे अपनी छाती पर दबाव महसूस हो रहा था, जैसे उसके स्तन उस कैद से आज़ाद होना चाहते हों। उसे अपने स्तनाग्र पर कपड़े की रगड़ महसूस हो रही थी, जो डर और उत्तेजना के मिश्रित भाव से सख्त हो गए थे।

उसने अपनी कमर को थोड़ा हिलाया। भारी लहंगे के नीचे उसके गोल और भरे हुए नितंब गद्दे में धंसे हुए थे। उसे अपने जांघों के बीच, अपनी योनि में एक अजीब सी मीठी टीस, एक भारीपन महसूस हो रहा था। यह डर था या प्यास? वह नहीं जानती थी, क्योंकि उसने कभी इस प्यास को बुझाने का अनुभव नहीं किया था।
 
दीवार घड़ी ने टन-टन करके 12 बजाए। आवाज़ सन्नाटे में गूंज गई।

"खट... खट... खट..."

गलियारे में भारी कदमों की आहट हुई। कामिनी का दिल गले में आ गया। धड़कनें इतनी तेज़ हो गईं कि उसे लगा उसका ब्लाउज फट जाएगा। उसने अपना घूंघट और नीचे खींच लिया और अपनी मुट्ठी भींच ली, जिससे उसकी चूड़ियाँ खनक गईं।

प्रताप आ रहा था। उसका पति। वह आदमी जिसे उसने फोटो में देखा था और जयमाला के वक्त एक झलक। वह आदमी जो आज रात उसके नाज़ुक शरीर को तोड़ेगा।

कामिनी ने मन ही मन अपनी माँ की विदाई के वक्त कही बातें दोहराईं—"बेटी, पति परमेश्वर होता है। वो जैसा चाहे, जो चाहे, उसे करने देना। यह उसका हक़ है। थोड़ा दर्द होगा, खून भी निकलेगा, पर उफ मत करना। यही रीत है।"

दरवाजे की कुंडी हिली। दरवाजा खुला और फिर जोर से बंद हुआ। अंदर से सिटकनी लगाने की आवाज़ आई।

कमरे में एक और गंध फैल गई, जो मोगरे और गुलाब की खुशबू को चीरती हुई कामिनी की नाक तक पहुँची—एक तीखी, कड़वी और सड़ी हुई गंध।

शराब की गंध।

कामिनी ने घूंघट की झीनी आड़ से अपनी नज़रें झुकाए हुए नीचे देखा। उसे काले रंग के चमड़े के जूते दिखाई दिए जो थोड़े लड़खड़ा रहे थे। प्रताप सीधा नहीं चल पा रहा था।

"अरे... मेरी रानी..." प्रताप की आवाज़ आई। वह आवाज़ भारी थी, लड़खड़ाती हुई और उसमें वह रोब नहीं था जो एक ठाकुर में होना चाहिए। उसमें एक लाचारी और नशा था।

प्रताप बिस्तर के पास आया और धड़ाम से बैठ गया। गद्दे पर इतना ज़ोरदार उछाल आया कि कामिनी का संतुलन बिगड़ गया और वह एक तरफ झुक गई।

"घूंघट... उठाओ..." प्रताप ने आदेश दिया। उसकी आवाज़ में कामुकता कम और ज़िद ज्यादा थी।

कामिनी के हाथ कांप रहे थे। उसने धीरे-धीरे, कांपते हाथों से अपना भारी घूंघट उठाया। उसने अपनी पलकें ऊपर कीं।

सामने प्रताप बैठा था। उसकी आंखें लाल थीं और सूजी हुई थीं। वह पसीने में तर था और उसने अपनी शेरवानी के ऊपर के तीन बटन खोल रखे थे, जिससे उसकी पतली और बाल रहित छाती दिख रही थी। वह देखने में बुरा नहीं था—गोरा चिट्टा था—लेकिन उसका शरीर ढीला-ढाला था।

उसकी छाती पतली थी और पेट थोड़ा बाहर निकला हुआ था। वह विला का छोटा ठाकुर था, जिसे ऐशो-आराम और मुफ्त की दौलत ने अंदर से खोखला और कमजोर बना दिया था।

"वाह..." प्रताप ने कामिनी के चेहरे को देखा, फिर उसकी गर्दन को, और फिर उसकी चोली में कैद उफनते हुए स्तनों को। "तुम तो... तुम तो फोटो से भी ज्यादा माल हो।"

वह आगे झुका। उसके मुंह से व्हिस्की और प्याज की इतनी तेज़ बदबू आई कि कामिनी ने अपनी नाक सिकोड़ ली और चेहरा पीछे कर लिया। लेकिन प्रताप ने उसे देखा नहीं, या शायद उसे परवाह नहीं थी।

उसने अपने दोनों हाथ कामिनी के नंगे कंधों पर रख दिए। उसके हाथ गीले, ठंडे और चिपचिपे थे। कामिनी की गर्म त्वचा पर वह स्पर्श किसी मरे हुए जानवर जैसा लगा।

"आज रात... तुम मेरी हो," प्रताप ने कहा और कामिनी को एक झटके से अपनी तरफ खींचा।

कामिनी का चेहरा प्रताप की शेरवानी से टकराया। उसने अपनी आंखें बंद कर लीं। उसे वह जादुई, रोमांटिक अहसास नहीं हो रहा था जिसके बारे में उसने सहेलियों से सुना था। उसे बस एक शराबी, पसीने से बदबूदार आदमी का बोझ महसूस हो रहा था।

"लेट जाओ," प्रताप ने उसे धक्का दिया।

कामिनी बिस्तर पर चित गिर गई। उसका भारी लहंगा फैल गया। प्रताप उसके ऊपर चढ़ गया। उसका पूरा वजन कामिनी के नाजुक शरीर को दबा रहा था। उसकी हड्डियों में दर्द होने लगा।

"चलो... शुरू करते हैं... बहुत पैसे खर्च किए हैं शादी में," प्रताप ने बेताबी में कामिनी की चोली पर हाथ मारा। वह हुक खोलने की कोशिश कर रहा था, लेकिन नशे की वजह से उसकी उंगलियां काम नहीं कर रही थीं। वह हुक में उलझ रहा था।

"प्रताप जी... प्लीज... धीरे..." कामिनी ने डरते हुए कहा। उसकी आवाज़ रुंध गई थी।

"चुप रहो," प्रताप ने झुंझलाकर चोली के कपड़े को ही खींच दिया।

"चर्र..."

रेशमी कपड़ा उसके कंधे के पास से फट गया। कामिनी की गोरी, मलाईदार बांह नंगी हो गई। प्रताप ने वहां अपना मुंह लगा दिया। वह चूस नहीं रहा था, बस अपनी लार वहां गिरा रहा था, चाट रहा था जैसे कोई कुत्ता हड्डी चाटता है।
 
कामिनी को घिन आई। उसका मन हुआ कि उसे धक्का दे दे, लेकिन उसने मुट्ठी भींच ली और छत को देखने लगी। यह मेरा पति है। यह उसका हक़ है।

प्रताप का हाथ नीचे गया। उसने कामिनी के भारी लहंगे को घुटनों से ऊपर खींचना शुरू किया। कामिनी ने शर्म और डर के मारे अपनी टांगें सिकोड़ लीं और घुटने आपस में जोड़ लिए।

"टांगें खोलो," प्रताप ने हुक्म दिया, उसके घुटनों को जबरदस्ती फैलाते हुए। "मुझे जगह चाहिए। मुझे अंदर जाना है।"

कामिनी ने धीरे-धीरे, कांपते हुए अपनी टांगें सीधी कीं। प्रताप ने अपना हाथ उसके पैरों के बीच डाला। वहां कामिनी ने शादी के लिए खरीदी गई महंगी रेशमी पैंटी पहन रखी थी। प्रताप ने उसे टटोला।

"गीली हो?" प्रताप ने बेहूदगी से पूछा।

कामिनी का चेहरा शर्म से लाल हो गया। वह गीली नहीं थी, वह सूखी थी, रेगिस्तान की तरह। डर ने उसके शरीर के सारे रस सुखा दिए थे।

प्रताप ने अपनी शेरवानी उतारने की कोशिश की, लेकिन वह फंसी रह गई। उसने झुंझलाकर उसे वैसे ही रहने दिया और अपना पायजामा नीचे खींचा।

कामिनी ने अपनी आंखें कसकर बंद कर लीं। वह उस पल का इंतज़ार करने लगी जब दर्द होगा। जब उसका शरीर फटेगा और वह औरत बनेगी। वह तैयार थी उस दर्द के लिए।

प्रताप उसके ऊपर लेटा हुआ था, हांफ रहा था। उसका पसीना कामिनी के चेहरे पर टपक रहा था। वह अपने लिंग को कामिनी की जांघों पर, उसकी पैंटी के ऊपर रगड़ रहा था।

रगड़... और रगड़…

लेकिन कुछ नहीं हुआ।

"अरे यार..." प्रताप बड़बड़ाया। "यह क्या हो गया?"

कामिनी ने एक आंख खोली। प्रताप पसीने से लथपथ था। वह कोशिश कर रहा था। वह अपने लिंग को अपने हाथ से सहला रहा था, उसे हिला रहा था, कामिनी के चिकने पेट पर रगड़ रहा था, लेकिन उसका 'औजार' साथ नहीं दे रहा था।

वह बिल्कुल नरम, छोटा और सोया हुआ था। शराब की अधिकता और शरीर की कमजोरी ने उसे बेजान कर दिया था। वह खड़ा होने का नाम नहीं ले रहा था।
 
अगले बीस मिनट तक उस सजे हुए कमरे में एक अजीब और शर्मनाक संघर्ष चला।

प्रताप ने हर कोशिश की। वह हताश हो चुका था। अपनी नामर्दी को छिपाने के लिए वह और ज्यादा आक्रामक हो गया। उसने कामिनी के कोमल स्तनों को जोर से दबाया, इतनी जोर से कि कामिनी के मुंह से चीख निकल गई। उसने उसके निप्पल को काटा।

कामिनी दर्द से तड़प रही थी, लेकिन उसका शरीर उत्तेजित नहीं हो रहा था। और प्रताप का शरीर... वह तो जैसे मर चुका था।

कामिनी वहां लेटी थी, एक बेजान गुड़िया की तरह। उसका ब्लाउज फटा हुआ था, लहंगा कमर तक उठा हुआ था, उसकी जांघें नंगी थीं, और उसका पति उसके ऊपर पसीने में नहाया हुआ अपनी ही नाकामी से लड़ रहा था।

प्रताप ने उसका हाथ पकड़कर अपने ढीले लिंग पर रख दिया।

"इसे हिलाओ," प्रताप ने आदेश दिया। "इसे खड़ा करो।"

कामिनी ने पहली बार किसी पराये मर्द के अंग को छुआ। वह नरम था, चिपचिपा था। उसने उसे सहलाया, लेकिन उसे घिन आ रही थी। उसे कोई उत्तेजना महसूस नहीं हुई, सिर्फ दया और अजीब सा डर महसूस हुआ।

"साली शराब..." प्रताप ने आखिरकार हार मान ली। "आज ही ज्यादा पी ली। दोस्तों ने पिला दी।"

वह थक गया था। हताशा, शर्मिंदगी और नशे ने उसे घेर लिया। वह कामिनी के ऊपर से लुढ़क कर बगल में गिर गया।

"कल..." प्रताप ने आंखें बंद करते हुए कहा, अपनी आवाज़ में झूठा वादा भरते हुए। "कल करेंगे। कल पक्का। आज... मूड नहीं है। तुम सो जाओ।"

और दो मिनट के अंदर, प्रताप के गहरे, भद्दे खर्राटे गूंजने लगे।

कामिनी सन्न रह गई।

क्या यही थी सुहागरात? क्या इसी पल के लिए उसने इतने सपने देखे थे? क्या इसी के लिए उसने अपनी माँ का घर छोड़ा था?

वह वहां लेटी रही, छत पर घूमते पंखे को घूरते हुए। उसकी आंखों के कोनों से आंसू बह निकले और कानों में समा गए। उसे अपने शरीर पर प्रताप की चिपचिपी लार और पसीने की गंध महसूस हो रही थी, लेकिन उसे वह 'स्पर्श' नहीं मिला था जो उसकी आत्मा को छू सके।

उसका शरीर अभी भी अछूता था। उसकी योनि अभी भी बंद थी, प्यासी थी। उसके स्तन, जिन्हें एक मर्द की मज़बूत पकड़ और प्यार की ज़रूरत थी, वे बस प्रताप की नोच-खसोट की वजह से दुख रहे थे। उसे अपने पेट के निचले हिस्से में एक भारीपन महसूस हो रहा था—एक अधूरी प्यास का भारीपन।

कामिनी उठी। उसने अपने कपड़े ठीक किए। फटा हुआ ब्लाउज उसने एक दुपट्टे से ढक लिया। उसने अपनी पैंटी ठीक की।
 
कमरे में प्रताप के खर्राटों की आवाज़ और शराब की बदबू अब असहनीय हो गई थी। उसे ताजी हवा चाहिए थी। उसका दम घुट रहा था। उसे लगा अगर वह एक पल भी और यहाँ रही, तो वह पागल हो जाएगी।

वह बिस्तर से उतरी। उसके पैरों में भारी चांदी की पायल की 'छन-छन' हुई, लेकिन प्रताप नहीं जागा। वह धीरे-धीरे, दबे पांव कमरे की बड़ी खिड़की की तरफ बढ़ी। यह खिड़की विला के पिछले आंगन में खुलती थी।

कामिनी ने भारी मखमली परदा हटाया और खिड़की का पल्ला खोला।

बाहर रात का सन्नाटा था। ठंडी हवा का एक झोंका उसके पसीने से भीगे चेहरे और गर्दन पर लगा। उसने अपनी आंखें बंद कर लीं और हवा को महसूस किया। चाँद पूरा था और उसकी चांदनी आंगन में दूध की तरह बिखरी हुई थी।

कामिनी ने गहरी सांस ली। वह वापस मुड़ने ही वाली थी कि तभी उसे नीचे आंगन में, बाईं तरफ बने अखाड़े में कुछ हरकत दिखाई दी।

उसने ध्यान से देखा।

नीचे, विला के अखाड़े में, एक आदमी कसरत कर रहा था।

वह राज सिंह थे।

बड़े ठाकुर। प्रताप के बड़े भाई और इस विला के असली मालिक, असली वारिस। 45 साल के राज सिंह, जिनकी पत्नी का देहांत 5 साल पहले हो चुका था।

कामिनी ने उन्हें शादी की रस्मों में देखा था, लेकिन हमेशा घूंघट की आड़ से और दूर से। वे हमेशा गंभीर रहते थे, भारी मूंछें, माथे पर तिलक और सफेद कुर्ता-पायजामा। उनकी आवाज़ में एक ऐसा रोब था कि पूरा गाँव कांपता था।

लेकिन इस वक्त... नज़ारा कुछ और ही था।

राज ने अपने कपड़े उतार रखे थे। वह सिर्फ एक छोटी सी, लाल रंग की लंगोट पहने हुए थे। वह लंगोट उनके भारी नितंबों और लिंग के उभार को कसकर थामे हुए थी, और बाकी पूरा शरीर नंगा था।

48 साल की उम्र में भी उनका शरीर किसी 25 साल के पहलवान से ज्यादा गठीला और मजबूत था। 6 फीट 2 इंच का कद। चौड़ा सीना जिस पर काले बालों का घना जंगल था। उनके कंधे इतने चौड़े थे कि लग रहा था वे आसमान का बोझ उठा सकते हैं। उनके डोले किसी बरगद के पेड़ की टहनियों जैसे मोटे और सख्त थे।

वे एक भारी 'मुदगर' को अपने सिर के ऊपर घुमा रहे थे।

"हुम... हुम... हुम..."

हवा को चीरने की आवाज़ आ रही थी।

हर बार जब वे मुदगर घुमाते, उनकी पीठ और बांहों की मांसपेशियों में एक लहर दौड़ जाती। उनका पूरा शरीर पसीने और सरसों के तेल से चमक रहा था। चांदनी में उनकी सांवली त्वचा तांबे जैसी दमक रही थी।

कामिनी की नज़रें उन पर जम गईं। वह चाहकर भी अपनी पलकें नहीं झपका पा रही थी। यह दृश्य किसी जादू जैसा था।

उसने अभी-अभी अपने पति प्रताप को देखा था—ढीला, कमजोर, शराबी और नामर्द। और अब वह राज को देख रही थी—ताकतवर, विशाल, अनुशासित और पौरुष से भरपूर।

राज ने मुदगर रखा और दंड-बैठक लगाने लगे।

"एक... दो... तीन..."

कामिनी उनकी भारी सांसों की आवाज़ सुन सकती थी। वे लय में थे। जब वे नीचे जाते, उनकी पीठ की रीढ़ की हड्डी के दोनों तरफ मांसपेशियां एक गहरा नक्शा बना देतीं। जब वे ऊपर आते, उनके कंधे किसी चट्टान की तरह उभर आते। उनके नितंब लंगोट में कसे हुए थे और पत्थर जैसे सख्त लग रहे थे।

कामिनी को अपनी छाती में एक अजीब सी जकड़न महसूस हुई। उसकी सांसें तेज होने लगीं। उसने अनजाने में अपना हाथ अपने गले पर रखा और फिर उसे नीचे अपने स्तनों की तरफ ले गई। उसके निप्पल, जो प्रताप के छूने पर, काटने पर भी कुछ महसूस नहीं कर रहे थे, अब राज को इतनी दूर से देखकर ही सख्त हो रहे थे। वे उसके ब्लाउज के कपड़े से रगड़ खा रहे थे।

राज ने कसरत खत्म की। वे खड़े हुए। उनका सीना जोर-जोर से ऊपर-नीचे हो रहा था। उन्होंने पास रखी बाल्टी से पानी का मग भरा।

उन्होंने पानी अपने ऊपर उंडेल लिया।

"छपाक!"

पानी उनके बालों से होता हुआ, उनके चौड़े माथे, घनी मूछों, छाती के बालों और फिर पेट के सिक्स-पैक एब्स से होता हुआ नीचे लंगोट तक बह गया।

कामिनी ने अपनी सांस रोक ली।

उसने देखा कि गीली होने के बाद वह लाल लंगोट उनके लिंग से पूरी तरह चिपक गई थी। वहां एक विशाल, भारी और स्पष्ट उभार था। एक ऐसा आकार जो आराम की अवस्था में भी प्रताप के 'जागे' हुए आकार से कहीं ज्यादा बड़ा और मोटा लग रहा था। वह पानी से भीगा हुआ उभार चांदनी में चमक रहा था।

कामिनी का गला सूख गया। उसके पेट के निचले हिस्से में, उसकी जांघों के बीच एक गीलापन रिसने लगा। उसकी योनि, जो प्रताप के साथ सूखी पड़ी थी, अब अपना रस छोड़ रही थी। यह वो 'प्यास' थी जिसके बारे में उसने सुना था, लेकिन आज पहली बार महसूस किया था।

राज ने अपने गीले बालों को झटका और तौलिए से बदन पोंछने लगे। उन्होंने अचानक ऊपर, कामिनी की खिड़की की तरफ देखा।

कामिनी घबरा गई। क्या उन्होंने उसे देख लिया? वह जल्दी से पर्दे के पीछे छिप गई। उसका दिल किसी पक्षी की तरह फड़फड़ा रहा था। उसे डर था कि कहीं बड़े ठाकुर उसकी चोरी न पकड़ लें।

लेकिन राज ने उसे नहीं देखा था। वे बस आसमान को देख रहे थे, गहरी सांस ले रहे थे। एक अकेले, तन्हा शेर की तरह जो अपने इलाके का मुआयना कर रहा हो।

कामिनी ने पर्दे की ओट से एक आखिरी बार उन्हें देखा। राज अपनी धोती पहन रहे थे।
 
वह वापस बिस्तर पर आई और प्रताप के बगल में लेट गई। प्रताप अभी भी खर्राटे ले रहा था। लेकिन अब कामिनी को प्रताप की बदबू परेशान नहीं कर रही थी। उसकी नाक में, उसके दिमाग में अभी भी वह दृश्य बसा हुआ था—पसीना, तेल, मांसपेशियां और वह भीगी हुई लंगोट का उभार।

उस रात, अपनी सुहागरात पर, कामिनी एक नामर्द पति के बगल में लेटी थी, लेकिन उसके सपनों में... उसके सपनों में विला का बड़ा ठाकुर उसे अपनी मजबूत, पसीने से भीगी बांहों में जकड़ रहा था। उसे पता नहीं था कि यह सिर्फ एक सपना नहीं, बल्कि आने वाले तूफ़ान की पहली आहट थी।

विला की चारदीवारी के अंदर, मर्यादा का चीरहरण शुरू हो चुका था। और उसकी शुरुआत कामिनी की उस 'प्यास' से हुई थी जो अब किसी मामूली पानी से नहीं बुझने वाली थी।

◆◆◆
 
शादी को एक हफ्ता बीत चुका था। अज़ानगढ़ की उस विशाल विला में दिन तो किसी तरह कट जाते थे, लेकिन रातें... रातें कामिनी के लिए किसी सजा से कम नहीं थीं।

हर रात वही पुरानी, घिसी-पिटी कहानी दोहराई जाती। प्रताप देर रात को शराब पीकर लड़खड़ाता हुआ कमरे में आता। वह थोड़ी देर कामिनी के जिस्म के साथ जबरदस्ती करने की भद्दी कोशिश करता, उसे नोचता, काटता, और जब उसका 'औजार' साथ नहीं देता, तो वह अपनी नामर्दी का गुस्सा कामिनी पर उतारते हुए गालियां बकता और सो जाता।

कामिनी हर सुबह अपने बदन पर प्रताप के नाखूनों के निशान और अपनी आत्मा पर एक कुंवारी औरत होने का बोझ लेकर उठती। उसकी प्यास बढ़ती जा रही थी, एक ऐसी प्यास जो पानी से नहीं बुझने वाली थी।

दोपहर के 2 बज रहे थे। राजस्थान का सूरज आग बरसा रहा था। विला के मर्द—राज सिंह (बड़े ठाकुर) और मुनीम—बाहर कचहरी या खेतों के काम से गए हुए थे। प्रताप अपने कमरे में एसी चलाकर नशे में धुत होकर घोड़े बेचकर सो रहा था। नौकर अपनी कोठरियों में आराम कर रहे थे।

पूरी विला में एक अजीब सा, भारी सन्नाटा था, सिवाय रसोई के।

कामिनी रसोई में अकेली थी। विला की रसोई बहुत बड़ी थी, पुरानी शैली की, जहाँ आज भी एक कोने में मिट्टी का चूल्हा था और दूसरे कोने में आधुनिक गैस स्टोव। दोपहर का खाना बन चुका था, लेकिन बर्तनों का ढेर लगा हुआ था।

विला का पुराना रसोइया (महाराज) आज बीमार था, इसलिए आज यह काम नई बहू के सिर आ गया था। सास ने हुक्म दिया था कि बहू को घर के काम आने चाहिए, चाहे वह कितने भी बड़े घर की क्यों न हो।

कामिनी सिंक के पास खड़ी बर्तन धो रही थी। रसोई में पंखा तो था, लेकिन चूल्हे की गर्मी और बाहर की लू ने वहां का तापमान बहुत बढ़ा दिया था।

उसने घर पहनने वाली एक हल्की पीली, सूती की प्रिंटेड साड़ी पहनी थी। यह साड़ी देखने में साधारण थी, लेकिन इस वक्त पसीने ने इसे जिस्म की दूसरी त्वचा बना दिया था। रसोई की गर्मी और शारीरिक मेहनत की वजह से कामिनी पसीने में तर-बतर थी।

उसका ब्लाउज, जो पीठ से गहरा कटा हुआ था, पूरी तरह भीग चुका था। पसीने की वजह से ब्लाउज का पतला कपड़ा उसकी गोरी पीठ से चिपक गया था, जिससे उसकी रीढ़ की हड्डी की लकीर और ब्रा की पट्टी का हुक साफ उभर रहा था। उसकी कमर पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं।

कामिनी ने अपने माथे से पसीना पोंछने के लिए हाथ उठाया। उसकी साड़ी का पल्लू उसके कंधे से सरक कर नीचे लटक गया। उसे ठीक करने का होश उसे नहीं था, या शायद गर्मी इतनी थी कि वह चाहती थी कि हवा उसके बदन को छुए।

उसकी गर्दन से पसीने की एक नमकीन बूंद लुढ़की। वह बूंद उसकी कॉलर-बोन से होती हुई, उसके ब्लाउज के गले के अंदर रेंगती चली गई। कामिनी को एक गुदगुदी हुई। वह बूंद उसके दोनों स्तनों के बीच की संकरी और गहरी घाटी में जाकर रुक गई।

कामिनी ने एक गहरी सांस ली। उसका सीना जोर-जोर से ऊपर-नीचे हुआ। ब्लाउज तंग था। प्रताप भले ही नामर्द था, लेकिन उसने सुहागरात पर और उसके बाद की रातों में अपनी कुंठा निकालने के लिए कामिनी के स्तनों को इतनी जोर से मसला था कि वे अभी भी दुख रहे थे और थोड़े सूजे हुए थे। कपड़े की रगड़ से उसके निप्पल संवेदनशील हो गए थे और ब्लाउज के अंदर तन रहे थे।

"हे भगवान... यह ज़िंदगी..." कामिनी बड़बड़ाई। उसने एक भारी पीतल के बर्तन को उठाया और उसे जोर-जोर से रगड़ने लगी, अपना सारा गुस्सा और हताशा उस बर्तन पर निकाल रही थी। उसे अपनी जवानी बर्बाद होती दिख रही थी। उसे एक मर्द चाहिए था। एक ऐसा मर्द जो उसे बांहों में भरे तो उसकी हड्डियों में दर्द न हो, बल्कि एक सुकून मिले। एक ऐसा मर्द जो उसे पूरा कर सके।

तभी, रसोई के दरवाजे पर एक लंबी और चौड़ी परछाई पड़ी। किसी के भारी, रोबदार कदमों की आहट हुई।

कामिनी चौंक गई। उसके हाथ से साबुन छूट गया। उसने मुड़कर देखा।

दरवाजे पर राज सिंह खड़े थे।

वे अभी-अभी खेतों का मुआयना करके लौटे थे। उन्होंने एक सफेद मलमल का कुर्ता और धोती पहनी थी। धूप और धूल की वजह से उनका चेहरा लाल था, जो उनके पौरुष को और बढ़ा रहा था।

कुर्ते के ऊपर के तीन बटन छाती तक खुले थे, जिससे उनका पसीने से भीगा हुआ, घने काले बालों से भरा चौड़ा सीना दिख रहा था। उनकी आस्तीनें कोहनियों तक ऊपर मुड़ी हुई थीं, और उनकी मज़बूत कलाइयों पर नसें रस्सियों की तरह उभरी हुई थीं।

कामिनी घबरा गई। उसका पल्लू नीचे गिरा हुआ था और ब्लाउज पसीने से लगभग पारदर्शी हो रहा था। उसने जल्दी से अपने गीले और साबुन से सने हाथों से पल्लू उठाया और अपनी छाती को ढकने की कोशिश की, लेकिन इसमें हड़बड़ी ज्यादा थी।

"बा... बाबूजी..." कामिनी ने हकलाते हुए कहा (वह जेठ को बाबूजी कहती थी, राजस्थानी रिवाज के अनुसार। "आप? अभी? मुझे लगा आप कचहरी गए हैं।"

राज ने तुरंत कोई जवाब नहीं दिया। उनकी शेर जैसी गहरी और काली आंखें सीधे कामिनी पर गड़ी थीं। उन्होंने देखा कि कैसे वह घबराई हुई है, कैसे उसकी छाती तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही है।

उन्होंने देखा कि पसीने ने उसके ब्लाउज को उसकी छाती से चिपका दिया है, जिससे उसके भारी और कड़े स्तनों का गोल आकार साफ पता चल रहा है। उन्होंने देखा कि उसकी कमर पर साड़ी पसीने से गीली होकर उसकी त्वचा से चिपक गई है, उसके कर्व्स को उभार रही है।
 
"प्यास लगी है," राज ने अपनी भारी, गूंजती आवाज़ में कहा। उनकी आवाज़ में एक अजीब सा भारीपन था, जो सिर्फ पानी की प्यास नहीं लग रही थी। "बहुत ज़ोर की।"

"मैं... मैं पानी लाती हूँ। फ्रिज से ठंडी बोतल..." कामिनी ने वहां से हटने के लिए कदम बढ़ाया।

"रहने दो," राज ने हाथ उठाया। "फ्रिज का पानी नहीं, मटके का चाहिए। और तुम अपना काम करो।"

राज रसोई के अंदर आ गए।

रसोई काफी बड़ी थी, लेकिन राज के अंदर आते ही वह अचानक बहुत छोटी और तंग लगने लगी। उनके विशाल शरीर और उनकी मर्दाना गंध—पसीना, खेत की मिट्टी, तंबाकू और कड़ी धूप की गंध—ने वहां की हवा को भर दिया।

कामिनी उस गंध से मदहोश होने लगी। यह प्रताप की सड़ी हुई शराब की बदबू नहीं थी, यह एक असली, मेहनतकश मर्द की गंध थी जो किसी भी औरत के हारमोंस को जगा सकती थी।

राज सीधे उस बड़े मिट्टी के मटके के पास गए जो सिंक के बिल्कुल बगल में रखा था। कामिनी वहीं खड़ी थी। राज उसके इतने पास से गुज़रे कि उनका कुर्ता कामिनी की गीली साड़ी से हल्का सा रगड़ खा गया।

कामिनी की सांस हलक में अटक गई। वह पीछे हटने की जगह नहीं पा रही थी। पीछे सिंक था और आगे राज का विशाल शरीर।

राज ने मटके से तांबे का लोटा भरा। उन्होंने गिलास नहीं लिया। उन्होंने लोटा ऊपर उठाया और राजस्थानी अंदाज़ में, मुंह लगाकर नहीं, बल्कि ऊपर से धार बनाकर पानी पीने लगे।

"गट... गट... गट..."

कामिनी उन्हें मंत्रमुग्ध होकर देख रही थी। पानी की मोटी धार उनके मुंह में जा रही थी, लेकिन चूंकि वे बहुत प्यासे थे, कुछ पानी उनके मुंह के कोनों से बहकर उनकी घनी दाढ़ी, उनकी मजबूत गर्दन और फिर उनके खुले हुए कुर्ते के अंदर उनकी छाती पर गिर रहा था। पानी की बूंदें उनके छाती के बालों में उलझ रही थीं और नीचे उनके पेट की तरफ, उनकी धोती की तरफ बह रही थीं।

कामिनी का गला सूख गया। उसे लगा जैसे वह पानी राज के गले से नहीं, बल्कि उसकी अपनी प्यास बुझा रहा हो। वह सम्मोहित सी उनके गले की उस हड्डी को ऊपर-नीचे होते देख रही थी। उसे ख्याल आया कि अगर वह अपनी जीभ वहां रखे, तो कैसा लगेगा।

राज ने पूरा लोटा एक सांस में खाली कर दिया और एक लंबी, संतुष्ट आवाज़ निकाली। "आह..."

उन्होंने लोटा वापस रखा और मुड़े। अब वे और कामिनी बिल्कुल आमने-सामने थे। बीच में मुश्किल से एक फुट की दूरी थी। राज की गर्म सांसें कामिनी के चेहरे पर लग रही थीं।

"अकेली हो?" राज ने पूछा। उनकी नज़रें कामिनी की आंखों में नहीं, बल्कि उसके भीगे हुए ब्लाउज पर थीं, जहां पसीने और पानी की वजह से कपड़ा त्वचा से चिपक गया था।

"जी...," कामिनी ने नज़रें झुका लीं, लेकिन उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।

"और प्रताप?" राज ने पूछा। इस सवाल में भाई वाला प्यार नहीं, बल्कि एक मर्द वाला ताना था।

"वो... सो रहे हैं," कामिनी की आवाज़ धीमी हो गई।

"सो रहा है," राज ने एक कड़वी, मज़ाकिया हंसी हंसी। "दोपहर में सोता है, रात को पीता है। और करता कुछ नहीं। नामर्द कहीं का।"
 
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