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उसने धीरे से अपना मोबाइल ऑन किया और एक वीडियो शालू की ओर कर दिया। एक मिनट में ही ख़ुद को निर्वस्त्र आकाश उर्फ़ अल्ताफ़ के साथ ख़ुद को देखकर अवाक रह गई और डैनी के हाथ से मोबाइल छिनने लगी। डैनी की पकड़ मज़बूत थी उसने उसे ऑफ किया और फिर से जेब में डाल लिया। शालू ठंडी हो चुकी थी।
“यह! यह! तुझे कहाँ से मिला?”
“मरीन लाइंस के समंदर किनारे जिसकी गोद में सोकर अक्सा बीच के गोल्डन कॉटेज का प्लान बना रही थी, मैं भी वहीं था तुम्हारे पीछे।”
“ओह्ह!”
“चल छोड़ मज़ाक़ मत कर चलते हैं बेडरूम में।”
“नहीं डैनी, तू मेरा...”
“पगली, क्या फ़र्क़ पड़ता है, और फिर हम ही कौन से सगे हैं! तेरा बाप दूसरा, मेरी माँ दूसरी, आख़िर वे दोनों भी तो मज़े ले रहे हैं न, फिर हम क्यों प्यासे रहें? और तू भी कहाँ गंगाजल-सी पवित्र है! छोड़ सब, आ चलते हैं बेडरूम में।”
डैनी बेडरूम की ओर चल दिया। शालू भी खिंचती चली गई। आज एक और पार्टनर उसे मिल चुका था।
एक बार ही शर्म की दीवार को टूटने में वक़्त लगता है, एक बार टूट जाने पर फिर दरवाज़ा खुला का खुला ही रह जाता है। फिर तो चाहे जब आओ चाहे जब जाओ।
अब डैनी और शालू के लिए वह रोज़मर्रा का खेल हो चुका था। उसी से शालू को यह भी पता चला कि डैनी के संबंध उसी से ही नहीं, बल्कि उसकी माँ से भी हैं, कभी-कभी डैडी बाहर चले गए तो दो-तीन दिन उनका आना नहीं होता और तब मम्मी और डैनी ही एक-दूसरे के पार्टनर होते हैं। इसीलिए उसकी तरफ़ भी बढ़ने की उसकी हिम्मत भी हुई। शालू यह भी जानती है कि कभी-कभी सतीश अंकल भी आते हैं मम्मी से मिलने। पहले वह दोनों ही एक-दूसरे के लवर थे, कई बार वह ख़ुद छेद में से उन दोनों के बीच को भीतर देख चुकी है और जब भी देखी है उसका भी दिल अंकल से मिलने को हुआ है लेकिन मम्मी की वजह से वह ख़ामोश ही रही। उसने कई बार अंकल को भी अपनी और प्यासी नज़रों से देखते हुए देखा था लेकिन उन्हें ज़ाहिर नहीं होने दी थी।
डैनी के साथ भी दो साल का समय गुज़र चुका था। वह चौबीस की उम्र पार कर रही थी, उम्र के साथ-ही-साथ उससे दुगनी उसकी कामवासना बढ़ रही थी। धीरे-धीरे वह सेक्स एडिक्ट होती जा रही थी। रोज़-रोज़ उसको ज़रूरत रहने लगी प्यास बुझाने की, अब वह साधारण लड़की नहीं रही थी। घर से मिली खुली छूट, घर का वातावरण और पैसों की मनमानी ने उसे बहुत दूर तक धकेल दिया था। वह इस रास्ते से लाख चाहकर भी अब लौट नहीं सकती थी।
कभी कोई पार्टनर के न मिलने पर, वह ख़ुद भी अकेले डांस क्लब में चली जाया करती थी और वहीं किसी को अपने शिकंजे में लेकर क्लब रूम में ही चली जाती थी और घंटे दो घंटे बाद वह फ्रेश मूड में कमरे से बाहर निकलती और अपने फ्लैट पर आती।
कभी-कभी उसका मूड कुछ अलग से करने को होता तो गाड़ी उठाती और पहुँच जाती बांद्रा के बैंड स्टैंड पर, समुद्र के किनारे जगह जगह बैठे जिगोलो पर नज़र घुमाती और जो बंदा हट्टा-कट्टा नज़र आता उस पुरुष वेश्या को इशारा कर बुला लेती और गाड़ी में बैठकर पहुँच जाती किसी पॉश होटल के कमरे में।
वासना में डूबी शालू केवल सेक्स एडिक्ट तक ही सीमित नहीं रही बल्कि वासना के मेरी और दोस्तों के संगत में अब वह ब्राउन शुगर, कोकीन, चरस आदि के नशे की ओर भी बढ़ चुकी थी। कामोत्तेजक ड्रग्स भी लेना शुरू कर दिया था। उसका पूरा शरीर, पूरी सोच, पूरी पसंद सब कुछ हवस के जाम में घुल चुके थे। महँगी से महँगी कोई शराब या कोई दूसरी नशे की ऐसी चीज़ नहीं जिसका स्वाद उसने चखा न हो।
ऐसा भी नहीं कि शालू की यह सारी हरकतें केके या ट्रिल्बो के नज़र में ना आई हो। केके मामूली आदमी नहीं थे, यहाँ तक का सफ़र उन्होंने ऐसे ही हासिल नहीं कर लिया था लेकिन काम की अधिकता और पैसों के जादू ने उन्हें इतना मौक़ा ही नहीं दिया कि समय के रहते अपने बीवी बच्चों पर नज़र रख सकें, ध्यान दे सकें। तितली भी उन्हें दूसरी तरफ़ ध्यान देने नहीं दे रही थी। आज भी उसके संगी साथी आते-जाते थे। लेकिन यह सब वह इतनी होशियारी से करती थी कि केके को अधिक सोचने का समय ना मिले। हालाँकि केके भी अपनी गैर मौजूदगी में होने वाले तितली के खेल से वाक़िफ़ थे, लेकिन उनकी भी अपनी मजबूरी यही थी की उम्र हो जाने के बाद तितली को संतुष्ट कर पाना उनके वश में नहीं था, और इसीलिए जानकर भी अंजान बने रहना उनकी विवशता भी थी।
कई बार केके और ट्रिल्बो ने कोशिश भी किया कि शालू की शादी हो जाए, शालू से उन्होंने इस विषय में चर्चा भी किया कि कोई लड़का पसंद हो तो बताएँ, लेकिन शालू क्या कहती किसका नाम लेती उसे तो रोज़ एक नए-नए बेड पार्टनर की चाहत थी। अब किसी एक के साथ बंधकर वाइफ बनना उसे पसंद नहीं था। जो हर बंधन से आज़ाद और बदलती थाली का भोजन पसंद करने लगे, उसे शाकाहारी चीज़ पसंद नहीं आती। शालू डेली चेंज की आदी हो चुकी थी और वह साफ़ मना कर देती थी कि उसे शादी नहीं करना है।
केके और तितली भी सब समझ रहे थे लेकिन ज़ोर-जबरदस्ती भी नहीं कर सकते थे। पानी बहुत आगे तक बह चुका था उसे इकट्ठा नहीं किया जा सकता था। वह दोनों ही समझाते और ख़ामोश हो जाते।
“यह! यह! तुझे कहाँ से मिला?”
“मरीन लाइंस के समंदर किनारे जिसकी गोद में सोकर अक्सा बीच के गोल्डन कॉटेज का प्लान बना रही थी, मैं भी वहीं था तुम्हारे पीछे।”
“ओह्ह!”
“चल छोड़ मज़ाक़ मत कर चलते हैं बेडरूम में।”
“नहीं डैनी, तू मेरा...”
“पगली, क्या फ़र्क़ पड़ता है, और फिर हम ही कौन से सगे हैं! तेरा बाप दूसरा, मेरी माँ दूसरी, आख़िर वे दोनों भी तो मज़े ले रहे हैं न, फिर हम क्यों प्यासे रहें? और तू भी कहाँ गंगाजल-सी पवित्र है! छोड़ सब, आ चलते हैं बेडरूम में।”
डैनी बेडरूम की ओर चल दिया। शालू भी खिंचती चली गई। आज एक और पार्टनर उसे मिल चुका था।
एक बार ही शर्म की दीवार को टूटने में वक़्त लगता है, एक बार टूट जाने पर फिर दरवाज़ा खुला का खुला ही रह जाता है। फिर तो चाहे जब आओ चाहे जब जाओ।
अब डैनी और शालू के लिए वह रोज़मर्रा का खेल हो चुका था। उसी से शालू को यह भी पता चला कि डैनी के संबंध उसी से ही नहीं, बल्कि उसकी माँ से भी हैं, कभी-कभी डैडी बाहर चले गए तो दो-तीन दिन उनका आना नहीं होता और तब मम्मी और डैनी ही एक-दूसरे के पार्टनर होते हैं। इसीलिए उसकी तरफ़ भी बढ़ने की उसकी हिम्मत भी हुई। शालू यह भी जानती है कि कभी-कभी सतीश अंकल भी आते हैं मम्मी से मिलने। पहले वह दोनों ही एक-दूसरे के लवर थे, कई बार वह ख़ुद छेद में से उन दोनों के बीच को भीतर देख चुकी है और जब भी देखी है उसका भी दिल अंकल से मिलने को हुआ है लेकिन मम्मी की वजह से वह ख़ामोश ही रही। उसने कई बार अंकल को भी अपनी और प्यासी नज़रों से देखते हुए देखा था लेकिन उन्हें ज़ाहिर नहीं होने दी थी।
डैनी के साथ भी दो साल का समय गुज़र चुका था। वह चौबीस की उम्र पार कर रही थी, उम्र के साथ-ही-साथ उससे दुगनी उसकी कामवासना बढ़ रही थी। धीरे-धीरे वह सेक्स एडिक्ट होती जा रही थी। रोज़-रोज़ उसको ज़रूरत रहने लगी प्यास बुझाने की, अब वह साधारण लड़की नहीं रही थी। घर से मिली खुली छूट, घर का वातावरण और पैसों की मनमानी ने उसे बहुत दूर तक धकेल दिया था। वह इस रास्ते से लाख चाहकर भी अब लौट नहीं सकती थी।
कभी कोई पार्टनर के न मिलने पर, वह ख़ुद भी अकेले डांस क्लब में चली जाया करती थी और वहीं किसी को अपने शिकंजे में लेकर क्लब रूम में ही चली जाती थी और घंटे दो घंटे बाद वह फ्रेश मूड में कमरे से बाहर निकलती और अपने फ्लैट पर आती।
कभी-कभी उसका मूड कुछ अलग से करने को होता तो गाड़ी उठाती और पहुँच जाती बांद्रा के बैंड स्टैंड पर, समुद्र के किनारे जगह जगह बैठे जिगोलो पर नज़र घुमाती और जो बंदा हट्टा-कट्टा नज़र आता उस पुरुष वेश्या को इशारा कर बुला लेती और गाड़ी में बैठकर पहुँच जाती किसी पॉश होटल के कमरे में।
वासना में डूबी शालू केवल सेक्स एडिक्ट तक ही सीमित नहीं रही बल्कि वासना के मेरी और दोस्तों के संगत में अब वह ब्राउन शुगर, कोकीन, चरस आदि के नशे की ओर भी बढ़ चुकी थी। कामोत्तेजक ड्रग्स भी लेना शुरू कर दिया था। उसका पूरा शरीर, पूरी सोच, पूरी पसंद सब कुछ हवस के जाम में घुल चुके थे। महँगी से महँगी कोई शराब या कोई दूसरी नशे की ऐसी चीज़ नहीं जिसका स्वाद उसने चखा न हो।
ऐसा भी नहीं कि शालू की यह सारी हरकतें केके या ट्रिल्बो के नज़र में ना आई हो। केके मामूली आदमी नहीं थे, यहाँ तक का सफ़र उन्होंने ऐसे ही हासिल नहीं कर लिया था लेकिन काम की अधिकता और पैसों के जादू ने उन्हें इतना मौक़ा ही नहीं दिया कि समय के रहते अपने बीवी बच्चों पर नज़र रख सकें, ध्यान दे सकें। तितली भी उन्हें दूसरी तरफ़ ध्यान देने नहीं दे रही थी। आज भी उसके संगी साथी आते-जाते थे। लेकिन यह सब वह इतनी होशियारी से करती थी कि केके को अधिक सोचने का समय ना मिले। हालाँकि केके भी अपनी गैर मौजूदगी में होने वाले तितली के खेल से वाक़िफ़ थे, लेकिन उनकी भी अपनी मजबूरी यही थी की उम्र हो जाने के बाद तितली को संतुष्ट कर पाना उनके वश में नहीं था, और इसीलिए जानकर भी अंजान बने रहना उनकी विवशता भी थी।
कई बार केके और ट्रिल्बो ने कोशिश भी किया कि शालू की शादी हो जाए, शालू से उन्होंने इस विषय में चर्चा भी किया कि कोई लड़का पसंद हो तो बताएँ, लेकिन शालू क्या कहती किसका नाम लेती उसे तो रोज़ एक नए-नए बेड पार्टनर की चाहत थी। अब किसी एक के साथ बंधकर वाइफ बनना उसे पसंद नहीं था। जो हर बंधन से आज़ाद और बदलती थाली का भोजन पसंद करने लगे, उसे शाकाहारी चीज़ पसंद नहीं आती। शालू डेली चेंज की आदी हो चुकी थी और वह साफ़ मना कर देती थी कि उसे शादी नहीं करना है।
केके और तितली भी सब समझ रहे थे लेकिन ज़ोर-जबरदस्ती भी नहीं कर सकते थे। पानी बहुत आगे तक बह चुका था उसे इकट्ठा नहीं किया जा सकता था। वह दोनों ही समझाते और ख़ामोश हो जाते।