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कामिनी सन्न रह गई। उसके जेठ ने उसके पति को नामर्द कहा? और वह भी उसके सामने? यह मर्यादा के खिलाफ था, लेकिन... यह कड़वा सच भी था। और राज की आवाज़ में जो गुस्सा और अधिकार था, वह कामिनी को कहीं न कहीं अच्छा लगा। उसे लगा जैसे कोई तो है जो उसका दर्द समझता है।
"लाओ, मैं मदद कर देता हूँ," राज ने अचानक कहा, सिंक में पड़े बर्तनों की तरफ देखते हुए।
"नहीं नहीं बाबूजी!" कामिनी घबरा गई। उसका पल्लू फिर गिर गया। "यह औरतों का काम है। आप क्यों... आप बड़े ठाकुर हैं।"
"विला का काम है," राज ने एक कदम और आगे बढ़ाया। अब उनके और कामिनी के बीच सिर्फ इंच भर का फासला था। कामिनी को राज के शरीर की गर्मी अपनी त्वचा पर महसूस हो रही थी।
राज ने सिंक की तरफ हाथ बढ़ाया, शायद एक भारी पतीले को उठाने के लिए। ऐसा करते हुए, उनकी कोहनी 'गलती से' या 'जानबूझकर' कामिनी के सीने से टकरा गई।
कामिनी के स्तन पर एक सख्त, हड्डी वाला स्पर्श हुआ। उसे करंट जैसा झटका लगा। वह घबराकर पीछे हटी, लेकिन पीछे सिंक का किनारा था। उसका हाथ सिंक की मुंडेर पर रखे पानी से भरे दूसरे लोटे पर लगा।
"छपाक!"
लोटा गिर गया और उसका सारा पानी कामिनी के ऊपर आ गिरा।
"आह!" कामिनी चीखी।
पानी ने उसकी साड़ी के पल्लू और उसके ब्लाउज के सामने वाले हिस्से को पूरी तरह भिगो दिया। पीली सूती साड़ी अब एकदम कांच की तरह पारदर्शी हो गई थी। उसके अंदर का ब्लाउज, उसकी त्वचा का दूधिया रंग, और उसके भारी स्तनों का उभार... सब कुछ राज की भूखी आंखों के सामने नंगा हो गया था।
गीला कपड़ा उसके निप्पल से बुरी तरह चिपक गया था। ठंडे पानी और राज की नज़दीकी की वजह से उसके निप्पल पत्थर जैसे सख्त होकर तन गए थे और कपड़े के बाहर से साफ दिखाई दे रहे थे।
कामिनी शर्म से पानी-पानी हो गई। उसने अपने दोनों हाथ अपनी छाती पर रख लिए। "हे भगवान... मैं..."
राज हटे नहीं। वे उसे घूरते रहे। उनकी आंखों में हवस का एक नंगा नाच था। उन्होंने अपनी नज़रें वहां से नहीं हटाईं।
"भीग गई तुम," राज ने बहुत धीमे, फिसलते हुए स्वर में कहा। उनकी आवाज़ अब भारी और रफ हो चुकी थी। "पूरी तरह।"
उन्होंने अपनी धोती की जेब से अपना बड़ा सा मलमल का रुमाल निकाला।
"लाओ, पोंछ दूँ," राज ने कहा।
इससे पहले कि कामिनी मना करती या पीछे हटती, राज ने अपना रुमाल कामिनी की छाती पर रख दिया। उन्होंने उसके दाहिने स्तन के ऊपर, जहाँ पानी टपक रहा था, रुमाल रखा और हल्के हाथ से दबाया।
कामिनी की सांस रुक गई। उसके जेठ का हाथ... उसके स्तन पर। यह महापाप था। यह अधर्म था। लेकिन उसने उन्हें रोका नहीं। उसका शरीर जम गया था, या शायद वह चाहती थी कि यह स्पर्श न रुके।
राज का हाथ बड़ा और खुरदरा था। रुमाल के बहाने, उन्होंने कामिनी के नरम मांस को अपनी हथेली में महसूस किया। उन्होंने थोड़ा दबाव डाला, अपनी उंगलियों को गड़ाया।
"प्रताप ने कभी ऐसे छुआ है?" राज ने अचानक पूछा। उनकी उंगलियां अब कामिनी के सख्त निप्पल को रुमाल के ऊपर से रगड़ रही थीं। "क्या उसने कभी तुम्हें महसूस किया है?"
कामिनी की आंखों में आंसू आ गए। शर्म, लाचारी और दबी हुई हवस के आंसू। उसने ना में सिर हिलाया।
"लाओ, मैं मदद कर देता हूँ," राज ने अचानक कहा, सिंक में पड़े बर्तनों की तरफ देखते हुए।
"नहीं नहीं बाबूजी!" कामिनी घबरा गई। उसका पल्लू फिर गिर गया। "यह औरतों का काम है। आप क्यों... आप बड़े ठाकुर हैं।"
"विला का काम है," राज ने एक कदम और आगे बढ़ाया। अब उनके और कामिनी के बीच सिर्फ इंच भर का फासला था। कामिनी को राज के शरीर की गर्मी अपनी त्वचा पर महसूस हो रही थी।
राज ने सिंक की तरफ हाथ बढ़ाया, शायद एक भारी पतीले को उठाने के लिए। ऐसा करते हुए, उनकी कोहनी 'गलती से' या 'जानबूझकर' कामिनी के सीने से टकरा गई।
कामिनी के स्तन पर एक सख्त, हड्डी वाला स्पर्श हुआ। उसे करंट जैसा झटका लगा। वह घबराकर पीछे हटी, लेकिन पीछे सिंक का किनारा था। उसका हाथ सिंक की मुंडेर पर रखे पानी से भरे दूसरे लोटे पर लगा।
"छपाक!"
लोटा गिर गया और उसका सारा पानी कामिनी के ऊपर आ गिरा।
"आह!" कामिनी चीखी।
पानी ने उसकी साड़ी के पल्लू और उसके ब्लाउज के सामने वाले हिस्से को पूरी तरह भिगो दिया। पीली सूती साड़ी अब एकदम कांच की तरह पारदर्शी हो गई थी। उसके अंदर का ब्लाउज, उसकी त्वचा का दूधिया रंग, और उसके भारी स्तनों का उभार... सब कुछ राज की भूखी आंखों के सामने नंगा हो गया था।
गीला कपड़ा उसके निप्पल से बुरी तरह चिपक गया था। ठंडे पानी और राज की नज़दीकी की वजह से उसके निप्पल पत्थर जैसे सख्त होकर तन गए थे और कपड़े के बाहर से साफ दिखाई दे रहे थे।
कामिनी शर्म से पानी-पानी हो गई। उसने अपने दोनों हाथ अपनी छाती पर रख लिए। "हे भगवान... मैं..."
राज हटे नहीं। वे उसे घूरते रहे। उनकी आंखों में हवस का एक नंगा नाच था। उन्होंने अपनी नज़रें वहां से नहीं हटाईं।
"भीग गई तुम," राज ने बहुत धीमे, फिसलते हुए स्वर में कहा। उनकी आवाज़ अब भारी और रफ हो चुकी थी। "पूरी तरह।"
उन्होंने अपनी धोती की जेब से अपना बड़ा सा मलमल का रुमाल निकाला।
"लाओ, पोंछ दूँ," राज ने कहा।
इससे पहले कि कामिनी मना करती या पीछे हटती, राज ने अपना रुमाल कामिनी की छाती पर रख दिया। उन्होंने उसके दाहिने स्तन के ऊपर, जहाँ पानी टपक रहा था, रुमाल रखा और हल्के हाथ से दबाया।
कामिनी की सांस रुक गई। उसके जेठ का हाथ... उसके स्तन पर। यह महापाप था। यह अधर्म था। लेकिन उसने उन्हें रोका नहीं। उसका शरीर जम गया था, या शायद वह चाहती थी कि यह स्पर्श न रुके।
राज का हाथ बड़ा और खुरदरा था। रुमाल के बहाने, उन्होंने कामिनी के नरम मांस को अपनी हथेली में महसूस किया। उन्होंने थोड़ा दबाव डाला, अपनी उंगलियों को गड़ाया।
"प्रताप ने कभी ऐसे छुआ है?" राज ने अचानक पूछा। उनकी उंगलियां अब कामिनी के सख्त निप्पल को रुमाल के ऊपर से रगड़ रही थीं। "क्या उसने कभी तुम्हें महसूस किया है?"
कामिनी की आंखों में आंसू आ गए। शर्म, लाचारी और दबी हुई हवस के आंसू। उसने ना में सिर हिलाया।