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Adultery ' गाँव का टेलर '

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कामिनी सन्न रह गई। उसके जेठ ने उसके पति को नामर्द कहा? और वह भी उसके सामने? यह मर्यादा के खिलाफ था, लेकिन... यह कड़वा सच भी था। और राज की आवाज़ में जो गुस्सा और अधिकार था, वह कामिनी को कहीं न कहीं अच्छा लगा। उसे लगा जैसे कोई तो है जो उसका दर्द समझता है।

"लाओ, मैं मदद कर देता हूँ," राज ने अचानक कहा, सिंक में पड़े बर्तनों की तरफ देखते हुए।

"नहीं नहीं बाबूजी!" कामिनी घबरा गई। उसका पल्लू फिर गिर गया। "यह औरतों का काम है। आप क्यों... आप बड़े ठाकुर हैं।"

"विला का काम है," राज ने एक कदम और आगे बढ़ाया। अब उनके और कामिनी के बीच सिर्फ इंच भर का फासला था। कामिनी को राज के शरीर की गर्मी अपनी त्वचा पर महसूस हो रही थी।

राज ने सिंक की तरफ हाथ बढ़ाया, शायद एक भारी पतीले को उठाने के लिए। ऐसा करते हुए, उनकी कोहनी 'गलती से' या 'जानबूझकर' कामिनी के सीने से टकरा गई।

कामिनी के स्तन पर एक सख्त, हड्डी वाला स्पर्श हुआ। उसे करंट जैसा झटका लगा। वह घबराकर पीछे हटी, लेकिन पीछे सिंक का किनारा था। उसका हाथ सिंक की मुंडेर पर रखे पानी से भरे दूसरे लोटे पर लगा।

"छपाक!"

लोटा गिर गया और उसका सारा पानी कामिनी के ऊपर आ गिरा।

"आह!" कामिनी चीखी।

पानी ने उसकी साड़ी के पल्लू और उसके ब्लाउज के सामने वाले हिस्से को पूरी तरह भिगो दिया। पीली सूती साड़ी अब एकदम कांच की तरह पारदर्शी हो गई थी। उसके अंदर का ब्लाउज, उसकी त्वचा का दूधिया रंग, और उसके भारी स्तनों का उभार... सब कुछ राज की भूखी आंखों के सामने नंगा हो गया था।

गीला कपड़ा उसके निप्पल से बुरी तरह चिपक गया था। ठंडे पानी और राज की नज़दीकी की वजह से उसके निप्पल पत्थर जैसे सख्त होकर तन गए थे और कपड़े के बाहर से साफ दिखाई दे रहे थे।

कामिनी शर्म से पानी-पानी हो गई। उसने अपने दोनों हाथ अपनी छाती पर रख लिए। "हे भगवान... मैं..."

राज हटे नहीं। वे उसे घूरते रहे। उनकी आंखों में हवस का एक नंगा नाच था। उन्होंने अपनी नज़रें वहां से नहीं हटाईं।

"भीग गई तुम," राज ने बहुत धीमे, फिसलते हुए स्वर में कहा। उनकी आवाज़ अब भारी और रफ हो चुकी थी। "पूरी तरह।"

उन्होंने अपनी धोती की जेब से अपना बड़ा सा मलमल का रुमाल निकाला।

"लाओ, पोंछ दूँ," राज ने कहा।

इससे पहले कि कामिनी मना करती या पीछे हटती, राज ने अपना रुमाल कामिनी की छाती पर रख दिया। उन्होंने उसके दाहिने स्तन के ऊपर, जहाँ पानी टपक रहा था, रुमाल रखा और हल्के हाथ से दबाया।

कामिनी की सांस रुक गई। उसके जेठ का हाथ... उसके स्तन पर। यह महापाप था। यह अधर्म था। लेकिन उसने उन्हें रोका नहीं। उसका शरीर जम गया था, या शायद वह चाहती थी कि यह स्पर्श न रुके।

राज का हाथ बड़ा और खुरदरा था। रुमाल के बहाने, उन्होंने कामिनी के नरम मांस को अपनी हथेली में महसूस किया। उन्होंने थोड़ा दबाव डाला, अपनी उंगलियों को गड़ाया।

"प्रताप ने कभी ऐसे छुआ है?" राज ने अचानक पूछा। उनकी उंगलियां अब कामिनी के सख्त निप्पल को रुमाल के ऊपर से रगड़ रही थीं। "क्या उसने कभी तुम्हें महसूस किया है?"

कामिनी की आंखों में आंसू आ गए। शर्म, लाचारी और दबी हुई हवस के आंसू। उसने ना में सिर हिलाया।
 
"मुझे पता था," राज ने कहा। "वो हिजड़ा है। उसे नहीं पता कि असली सोने को कैसे पिघलाया जाता है।"

राज ने अपना हाथ हटाया नहीं, बल्कि उसे धीरे-धीरे नीचे की तरफ सरकाया। रुमाल अब कामिनी के पेट पर था। गीली साड़ी में कामिनी की नाभि एक गहरे कुएं की तरह दिख रही थी। राज ने अपनी उंगली उस नाभि पर रखी और गोल घुमाई।

"तुम कांप रही हो, बहू," राज ने उसके कान के पास झुककर फुसफुसाया। "ठंड लग रही है? या... कुछ और?"

कामिनी सचमुच कांप रही थी। उसके पेट में, उसकी बच्चेदानी में एक मीठा दर्द उठ रहा था। राज का स्पर्श... वह कितना अधिकार भरा था। ऐसा लग रहा था जैसे वह उसका मालिक हो, जेठ नहीं।

"बाबूजी... प्लीज... कोई आ जाएगा..." कामिनी ने सिसकते हुए कहा। यह विरोध बहुत कमजोर था, जैसे वह भीख मांग रही हो कि वे रुकें नहीं।

"कोई नहीं आएगा," राज ने एक कदम और आगे बढ़ाया। अब उनका विशाल शरीर कामिनी को सिंक से दबा रहा था। राज की एक मज़बूत जांघ कामिनी की दोनों जांघों के बीच घुस गई।

कामिनी को महसूस हुआ कि राज की धोती के नीचे कुछ बहुत सख्त, गर्म और बड़ा है जो उसकी जांघों और पेट को दबा रहा है। वह उनका लिंग था। वह पूरी तरह जाग चुका था और अपनी मौजूदगी का एलान कर रहा था।

रसोई की हवा भारी हो गई थी।

दाल-सब्जी की महक अब पीछे छूट गई थी, अब वहां सिर्फ मर्द और औरत की गंध थी।

राज ने अपना दूसरा हाथ उठाया और कामिनी के भीगे हुए, पसीने से चिपके बालों की एक लट को उसके चेहरे से हटाया। उनकी उंगलियां कामिनी के गाल और गर्दन को छू गईं।

"तुम बहुत सुंदर हो कामिनी," राज ने कहा। "इस विला के लिए बहुत कीमती। प्रताप तुम्हें डिजर्व नहीं करता।"

उन्होंने अपना चेहरा नीचे झुकाया।

कामिनी को लगा वे उसे किस करेंगे। उसने अपनी आंखें बंद कर लीं, अपनी मुट्ठी भींच ली। वह तैयार थी। उसका शरीर चीख रहा था कि उसे ले लिया जाए।

लेकिन राज ने उसे किस नहीं किया। वे उसके कान के पास गए। उनकी घनी मूंछें कामिनी के गाल और कान को गुदगुदा रही थीं, जिससे कामिनी के रोंगटे खड़े हो गए।

"आज रात..." राज ने उसके कान में फुसफुसाया, अपनी गर्म सांसें उसके कान के अंदर छोड़ते हुए। "आज रात मैं अपने कमरे में अकेला हूँ। मेरी कमर में बहुत दर्द है। मुझे तेल मालिश चाहिए।"

कामिनी ने अपनी आंखें खोलीं। वह समझ नहीं पाई। क्या वे उसे बुला रहे थे?

"क्या तुम आओगी?" राज ने पूछा। यह सवाल नहीं, हुक्म था। "नौकर के हाथ बहुत सख्त हैं। मुझे तुम्हारे ये नरम हाथ चाहिए।"

उन्होंने कामिनी की कलाई पकड़ी और उसके हाथ को उठाया। उन्होंने उसके हाथ को अपनी छाती पर, अपने कुर्ते के खुले बटन के अंदर रख दिया।

कामिनी की छोटी हथेली राज के बालों वाले, पसीने से भीगे और पत्थर जैसे सीने को छू रही थी। उसे उनके दिल की तेज़ धड़कन अपनी उंगलियों में महसूस हुई। वहां एक ज्वालामुखी धधक रहा था।

"महसूस करो," राज ने कहा, कामिनी के हाथ को अपनी छाती पर दबाते हुए।

"इसके अंदर आग लगी है। और इसे सिर्फ तुम बुझा सकती हो।"

कामिनी की उंगलियां अनजाने में उनके सीने के बालों में उलझ गईं। उसे मज़ा आ रहा था।

उन्होंने कामिनी का हाथ छोड़ा और एक कदम पीछे हट गए।

"रात को 11 बजे," राज ने जाते-जाते कहा, अपनी धोती ठीक करते हुए, जिसमें उनका उभार साफ दिख रहा था।

"प्रताप के सो जाने के बाद। मेरा दरवाजा खुला रहेगा। इंतज़ार मत करवाना।"

राज मुड़े और भारी कदमों से रसोई से बाहर निकल गए।
 
उनके जाने के बाद भी वहां उनकी गंध, उनकी गर्मी और उनके शरीर का वह दबाव रह गया था जो कामिनी अभी भी अपनी जांघों के बीच महसूस कर रही थी।

कामिनी वहीं सिंक के सहारे खड़ी रह गई, कांपती हुई। उसकी साड़ी गीली थी, उसका ब्लाउज पारदर्शी था, और उसका शरीर... उसका शरीर जल रहा था।

उसने अपने हाथ को देखा, जिसने अभी राज की छाती को छुआ था। उसने उस हाथ को अपने चेहरे पर लगाया और राज की गंध को सूंघा—पसीना और तंबाकू।

यह गलत था। यह पाप था। नरक में भी जगह नहीं मिलेगी। लेकिन कामिनी जानती थी कि आज रात वह उस दरवाजे से ज़रूर गुज़रेगी। क्योंकि उसका नामर्द पति उसे वो कभी नहीं दे सकता था, जो उसे राज की भूखी आंखों में बमुश्किल 5 मिनट में दिख गया था। वह सुरक्षा, वह ताकत, वह अधिकार।

उसका पल्लू अभी भी गीला था, लेकिन उसकी योनि... वह उससे भी ज्यादा गीली हो चुकी थी। उसका रस उसकी जांघों पर बहने को तैयार था। विला की रसोई में आज मर्यादा का पहला और सबसे मज़बूत धागा टूट चुका था, और आज रात... शायद पूरा पर्दा ही गिरने वाला था।

◆◆◆
 
विला की पुरानी दीवार घड़ी ने अपनी भारी और गूंजती आवाज़ में रात के 11 बजाए। "टन... टन... टन..."

हर घंटा कामिनी के दिल पर किसी हथौड़े की तरह बज रहा था। वह अपने कमरे में, अपने सुहाग के बिस्तर के किनारे बैठी थी। उसके बगल में उसका पति, प्रताप, बेसुध होकर सो रहा था। उसका मुंह खुला था और लार तकिए पर बह रही थी।

कमरे में एसी की ठंडक के बावजूद शराब की सड़ी हुई बदबू फैली थी, जिसने कामिनी का दम घोट रखा था। प्रताप ने आज भी कोशिश की थी, और आज भी वह असफल रहा था। अपनी नामर्दी की खीझ उसने कामिनी को दो-चार गालियां देकर और सो जाने में निकाली थी।

कामिनी की आंखों में नींद नहीं थी। उसके शरीर का पोर-पोर जाग रहा था। उसे दोपहर की वह बात याद आ रही थी जो राज सिंह ने रसोई में कही थी—"रात को 11 बजे। मेरा दरवाजा खुला रहेगा। मुझे तुम्हारे नरम हाथ चाहिए।"

कामिनी ने अपनी साड़ी के पल्लू को मुट्ठी में भींचा। क्या उसे जाना चाहिए? यह गलत था। यह पाप था। वह इस घर की इज़्ज़त थी, और राज उसके जेठ थे। पिता समान। लेकिन... क्या पिता समान व्यक्ति अपनी बहू के स्तनों को उस तरह घूरता है? क्या वह अपनी बहू का हाथ अपने नंगे सीने पर रखता है?

उसने प्रताप की तरफ देखा। एक कमजोर, शराबी और अक्षम पति। फिर उसे राज का वह रूप याद आया—अखाड़े में पसीने से तर बदन, वह भीगी हुई लंगोट जिसमें उनका पौरुष साफ दिख रहा था, और रसोई में उनकी वह गर्म सांसें। उसका शरीर अपने आप प्रतिक्रिया देने लगा। उसकी योनि में एक अजीब सी टीस उठी, एक गीलापन जो उसे बेचैन कर रहा था।

उसने फैसला कर लिया। वह जाएगी। सिर्फ मालिश करने के बहाने ही सही, लेकिन उसे उस मर्द के पास जाना था। उसे उस ताकत को महसूस करना था।

कामिनी उठी। उसने अपनी भारी रेशमी साड़ी उतार दी। मालिश करने के लिए भारी कपड़े ठीक नहीं थे, और शायद... शायद उसके अवचेतन मन में यह चाहत थी कि राज उसे देखें। उसने अपनी अलमारी से एक बहुत ही पुरानी, हल्की और झीनी सूती की आसमानी रंग की साड़ी निकाली।

यह साड़ी इतनी पतली थी कि रोशनी में इसके आर-पार देखा जा सकता था। उसने उसके नीचे जो ब्लाउज पहना, वह भी सूती था और बिना अस्तर का था।

उसने आईने में खुद को देखा। उसने अपनी मांग में सिंदूर गहरा किया और होठों पर हल्की लाली लगाई। उसने अपने बालों को खोला और फिर एक ढीले जूड़े में बांधा, ताकि काम करते वक्त कुछ लटें उसकी गर्दन पर गिरती रहें। उसने अपनी कलाइयों में सिर्फ कांच की दो-दो चूड़ियाँ रहने दीं, बाकी सोने के कंगन उतार दिए ताकि आवाज़ न हो।

वह दबे पांव कमरे से निकली। प्रताप ने करवट ली और बड़बड़ाया, लेकिन जागा नहीं। कामिनी ने राहत की सांस ली।

विला के गलियारे में अंधेरा था, सिर्फ कुछ मद्धम 'जीरो वॉट' के पीले बल्ब जल रहे थे जो परछाइयों को और लंबा और डरावना बना रहे थे। हर तरफ सन्नाटा था। नौकर-चाकर सब नीचे वाले हिस्से में सो चुके थे।

वह राज के कमरे की तरफ बढ़ी, जो गलियारे के दूसरे छोर पर था। यह रास्ता उसे बहुत लंबा लग रहा था। हर कदम के साथ उसकी पायल की 'छन-छन' उसे डरा रही थी। उसने झुककर अपनी पायल उतार दी और हाथ में ले ली। अब वह नंगे पैर थी। ठंडे फर्श का स्पर्श उसके तलवों से होता हुआ सीधे उसके पेट में गुदगुदी कर रहा था।

राज के कमरे का भारी शीशम का दरवाजा थोड़ा सा खुला था, जैसा उन्होंने कहा था। अंदर से पीली रोशनी की एक लकीर बाहर आ रही थी।
 
कामिनी दरवाजे पर रुकी। उसका गला सूख गया था। उसके हाथ पसीने से गीले थे। उसने धीरे से, बहुत धीरे से दरवाजे को धक्का दिया।

"चर्र..."

पुराने कब्ज़ों ने एक हल्की सी आवाज़ की और दरवाजा खुल गया।

अंदर का नज़ारा देखकर कामिनी की सांसें थम गईं।

यह कमरा प्रताप के कमरे से दोगुना बड़ा था। दीवारों पर राजपुताना शान की निशानियाँ थीं—पुरानी तलवारें, ढाल और एक राइफल। फर्श पर कालीन बिछा था। हवा में एक बहुत ही मर्दाना गंध थी—महंगे इत्र, पाइप के तंबाकू और गर्म सरसों के तेल की मिली-जुली गंध।

कमरे के बीच में एक विशाल, राजा-महाराजाओं वाला पलंग था। और उस पर राज लेटे थे।

वे पेट के बल लेटे थे। उन्होंने अपने कपड़े उतार रखे थे। उनके शरीर पर सिर्फ एक छोटा सा, सफेद रंग का तौलिया था जो उनकी कमर के नीचे बंधा था, उनके नितंबों को आधा ढकते हुए।

उनका बाकी शरीर नंगा था। उनकी चौड़ी, सांवली पीठ पर मांसपेशियों का पहाड़ था। रीढ़ की हड्डी एक गहरी खाई की तरह दिख रही थी जो गर्दन से शुरू होकर तौलिये के अंदर गायब हो रही थी। उनके कंधे इतने चौड़े थे कि पूरा बिस्तर भर गया था। उनकी बांहें किसी पेड़ की जड़ों की तरह बिस्तर पर फैली थीं।

"आ गई?" राज की भारी, नींद में डूबी हुई आवाज़ आई। उन्होंने मुड़कर नहीं देखा। उन्हें पता था कि वह आएगी।

"जी... बाबूजी," कामिनी ने बहुत धीरे से कहा, जैसे उसकी आवाज़ गले में ही फंस गई हो। उसने दरवाजा बंद किया और कांपते हाथों से सिटकनी लगा दी। अब वह कैद थी। अपनी मर्जी से।

"पास आओ," राज ने कहा। "तेल मेज पर रखा है।"

कामिनी ने बिस्तर के पास रखी मेज पर देखा। वहां एक पीतल की कटोरी में सरसों का तेल रखा था। उसमें लहसुन की कलियां और मेथी दाने काले पड़ चुके थे—तेल को पकाया गया था। उसमें से भाप निकल रही थी।

कामिनी ने कटोरी उठाई। वह गुनगुनी गर्म थी। वह बिस्तर के पास आई।

नज़दीक से देखने पर राज का शरीर और भी विशाल और डरावना लग रहा था। कामिनी को लगा जैसे वह किसी सोए हुए शेर के पास खड़ी है जो किसी भी वक्त जागकर उसे दबोच सकता है।

"खड़ी क्यों हो?" राज ने तकिए में मुंह गड़ाए हुए कहा। "शुरू करो। पीठ बहुत दुख रही है। और गर्दन भी।"

कामिनी ने अपनी हथेली पर तेल लिया। तेल गाढ़ा और गर्म था। उसने अपनी दोनों हथेलियां रगड़ीं ताकि तेल शरीर के तापमान पर आ जाए। फिर उसने कांपते हुए अपने दोनों हाथ राज की चौड़ी पीठ पर रख दिए।

जैसे ही उसके नरम, ठंडे और नाजुक हाथों ने राज की गर्म, सख्त और पसीने से हल्की नम त्वचा को छुआ, दोनों के शरीर में करंट दौड़ गया। राज की पीठ की मांसपेशियां एक पल के लिए कस गईं।

कामिनी ने मालिश शुरू की। उसने उनकी गर्दन से शुरुआत की। उसके छोटे हाथ राज के मोटे, गठीले कंधों पर चल रहे थे। वहां की मांसपेशियां पत्थर जैसी सख्त थीं। उसे बहुत जोर लगाना पड़ रहा था।

"जोर से," राज ने गुर्राते हुए कहा।

"तुम्हारे हाथ बहुत हल्के हैं, बहू। थोड़ा दम लगाओ। मैं कांच का नहीं बना हूँ।"

कामिनी ने अपनी पूरी ताकत लगा दी। उसने अपनी चूड़ियाँ ऊपर चढ़ाईं और अपनी उंगलियों को उनके मांस में गड़ाने लगी। तेल की वजह से उसके हाथ आसानी से फिसल रहे थे।

"चुप-चुप..."

तेल की आवाज़ सन्नाटे में गूंज रही थी।

कामिनी का ब्लाउज, जो झुकने की वजह से थोड़ा नीचे हो गया था, राज की पीठ के करीब था। उसकी साड़ी का पल्लू बार-बार गिर रहा था, और अब उसने उसे संभालने की कोशिश छोड़ दी थी। वह अपनी कमर पर खोस लिया था।

कामिनी धीरे-धीरे नीचे बढ़ी। वह राज की रीढ़ की हड्डी के दोनों तरफ अपनी हथेलियां चला रही थी। राज की पीठ पर काले बालों की एक लकीर थी जो गर्दन से शुरू होकर नीचे तौलिये के अंदर गायब हो रही थी।

कामिनी की उंगलियां उन बालों में उलझ रही थीं। यह स्पर्श उसे अजीब सा सुकून दे रहा था। प्रताप की छाती एकदम चिकनी थी, लड़कियों जैसी। लेकिन यह... यह एक मर्द की पीठ थी।

"आह... हाँ... वहीं..." राज ने एक लंबी कराह भरी। "कमर के पास। वहां दर्द है। उस गांठ को खोलो।"

कामिनी और नीचे झुकी। अब वह बिस्तर के किनारे खड़ी थी और झुककर मालिश कर रही थी। इस पोज़िशन में उसके स्तन गुरुत्वाकर्षण की वजह से ब्लाउज में लटक रहे थे।

राज की कमर बहुत चौड़ी थी। कामिनी ने वहां तेल डाला और अपने अंगूठों से दबाना शुरू किया।

"ऐसे नहीं बनेगा," राज ने तकिए से सिर उठाए बिना कहा। "बिस्तर पर चढ़ जाओ। ऊपर बैठकर करो। ताकत नहीं लग रही।"

कामिनी का दिल धक से रह गया। "बिस्तर पर? बाबूजी... यह ठीक नहीं..."

"चढ़ो," राज ने सख्ती से कहा। "नखरे मत करो। दर्द से जान निकल रही है। और तुम मेरी बहू हो, कोई गैर नहीं।"

कामिनी के पास कोई चारा नहीं था। उसने अपनी चप्पलें उतारीं और बिस्तर पर चढ़ी। गद्दा बहुत नरम था, उसके पैर धंस गए।

"मेरी कमर पर बैठ जाओ," राज ने निर्देश दिया।

कामिनी ने अपनी टांगें राज के दोनों तरफ कर लीं और उनकी कमर पर घुटनों के बल बैठ गई। उसने अपना वजन अपनी एड़ियों पर रखा ताकि पूरा भार राज पर न पड़े।

अब वह पूरी तरह राज के ऊपर थी। उसकी जांघों के अंदरूनी हिस्से राज की पसलियों को छू रहे थे। उसकी साड़ी घुटनों तक ऊपर उठ गई थी।

इस स्थिति में मालिश करना आसान था, लेकिन यह स्थिति बहुत खतरनाक थी। कामिनी को राज के शरीर की पूरी गर्मी अपनी जांघों के बीच, अपनी योनि के पास महसूस हो रही थी।

उसने फिर से तेल लिया और अब अपने पूरे शरीर का वजन डालकर मालिश करने लगी। वह आगे-पीछे हो रही थी। जब वह आगे झुकती, तो उसका पेट राज की पीठ से सट जाता। उसके स्तन राज की पीठ को लगभग छू रहे थे।

"हाँ... अब ठीक है," राज ने कहा। "तुम्हारी जांघें... गर्म हैं।"

कामिनी शर्म से लाल हो गई, लेकिन उसने मालिश नहीं रोकी। वह एक लय में आ गई थी। उसके हाथ राज के कंधों से लेकर कमर तक फिसल रहे थे।

मालिश के दौरान, राज का तौलिया थोड़ा और नीचे खिसक गया।
 
कामिनी की नज़र वहां गई। तौलिये के खिसकने से राज के नितंबों की शुरुआत दिख रही थी। वहां भी काले बाल थे। कामिनी ने अपनी नज़रें फेरने की कोशिश की, लेकिन एक अजीब सी जिज्ञासा और हवस उसे रोके हुए थी।

"नीचे भी," राज ने आदेश दिया।

"क... कहाँ?" कामिनी की आवाज़ कांप गई।

"कूल्हों पर," राज ने कहा। "दर्द वहां तक जाता है। नसों को खोलो।"

कामिनी के हाथ हवा में रुक गए। जेठ के नितंबों की मालिश?

"रुक क्यों गई?" राज ने अपनी गर्दन घुमाकर उसे देखा। उनकी आंखों में लाल डोरे थे और एक नशा था। "करो। मैं हुक्म दे रहा हूँ।"

कामिनी ने कांपते हाथों से कटोरी से और तेल लिया। उसने अपने हाथ राज के तौलिये के ठीक ऊपर रखे। उसने तौलिये को थोड़ा और नीचे खिसका दिया ताकि वह मालिश कर सके। अब राज के नितंब लगभग आधे नंगे थे।

राज के नितंब बहुत सख्त, गोल और मस्कुलर थे। वे किसी घोड़े के पुट्ठों जैसे थे। कामिनी ने उन्हें अपनी मुट्ठी में भरा। वे लोहे के गोलों जैसे थे। उसने उन्हें गूंथना शुरू किया।

"आह्ह्ह! माई री..." राज ने बिस्तर की चादर को अपनी मुट्ठी में भींच लिया।

"तेरी उंगलियों में जादू है कामिनी... जादू... थोड़ा और नीचे..."

कामिनी अब पूरी तरह कामुकता के वश में थी। सरसों के तेल की तीखी गंध, राज की मर्दाना गंध और एक वर्जित पुरुष को छूने का नशा... उसका सिर चकरा रहा था। उसकी योनि गीली हो चुकी थी और साड़ी के अंदर उसकी जांघों पर चिपचिपापन महसूस हो रहा था। वह अनजाने में अपनी योनि को राज की पीठ पर रगड़ने लगी थी।

"बस," राज ने अचानक कहा। उन्होंने एक झटका दिया और कामिनी का संतुलन बिगड़ गया। "अब आगे से।"

"आगे से?" कामिनी संभलते हुए पीछे हटी।

"हाँ," राज घूमे और पीठ के बल लेट गए।

कामिनी जल्दी से बिस्तर से नीचे उतरने लगी, शर्म के मारे। "मैं... मैं चलती हूँ।"

लेकिन राज ने बिजली की फुर्ती से उसका हाथ पकड़ लिया। उनकी पकड़ लोहे जैसी थी।

"कहाँ जा रही हो?" राज ने उसे खींचा। कामिनी उनके ऊपर गिरते-गिरते बची। "बैठी रहो। अभी काम पूरा नहीं हुआ।"

कामिनी अब राज की जांघों के बीच, घुटनों के बल बैठी थी। राज उसके सामने चित लेटे थे।

तौलिया अभी भी उनकी कमर पर था, लेकिन अब स्थिति पूरी तरह बदल गई थी। तौलिये के बीचों-बीच एक विशालकाय, गगनचुंबी तंबू बना हुआ था। वह उभार इतना ऊँचा, मोटा और सख्त था कि तौलिया उसे छिपा नहीं पा रहा था। वह राज का लिंग था, जो पूरी तरह जाग चुका था और कामिनी की तरफ इशारा कर रहा था।

कामिनी की नज़रें सीधे उस उभार पर टिक गईं। उसने प्रताप का 'सामान' देखा था—छोटा, सिकुड़ा हुआ और ढीला। लेकिन यह... यह तो किसी दानव जैसा लग रहा था। तौलिये के नीचे वह धड़क रहा था।

"तेल लगाओ," राज ने अपनी चौड़ी, बालों वाली छाती की तरफ इशारा किया। "सीने पर।"

कामिनी ने तेल लिया। उसने राज की छाती के बालों में अपनी उंगलियां चलाईं। वहां के बाल बहुत घने और कड़े थे। उसके नीचे राज का दिल तेज़ धड़क रहा था। कामिनी ने उनके निप्पल को छुआ, जो छोटे, भूरे और सख्त थे।

राज उसे देख रहे थे। उनकी नज़रें कामिनी के झुके हुए चेहरे और उसके बिना अस्तर वाले ब्लाउज के डीप-नेक पर थीं। इस पोज़िशन में कामिनी के स्तन राज के चेहरे के सामने लटक रहे थे। राज उनके आकार और गोलाई का अनुमान लगा रहे थे।

"प्रताप तुझे खुश रखता है?" राज ने अचानक पूछा। उनकी आवाज़ बहुत गंभीर थी।

कामिनी का हाथ उनकी छाती पर रुक गया। "जी... वो..."

"झूठ मत बोल," राज ने उसका हाथ पकड़कर अपनी छाती पर जोर से दबाया। "उसकी आंखों में नामर्दी दिखती है। और तेरी आंखों में... प्यास। मैं देख सकता हूँ कि तू सूखी हुई है।"

कामिनी की आंखों में आंसू आ गए। शर्म, अपमान और लाचारी के आंसू। एक आंसू टपका और राज की छाती के बालों में खो गया।

"रो मत," राज ने अपना दूसरा हाथ उठाया और कामिनी के गाल को पोंछा। उनका अंगूठा उसके होंठों पर फिरा। “मैं अभी ज़िंदा है। इस विला की औरतों को प्यासा रहने की आदत नहीं है। मैं हूँ ना।"

राज ने कामिनी का हाथ अपनी छाती से नीचे सरकाया। उन्होंने उसे अपने पेट के एब्स पर ले गए।

"दबाओ इसे," राज ने कहा। "महसूस करो कि मर्द कैसा होता है। पत्थर जैसा।"

कामिनी का हाथ नीचे फिसलता गया। नाभि... और फिर पेड़ों के बाल जो तौलिये के ऊपर दिख रहे थे।

अब उसका हाथ तौलिये के किनारे पर था। उसके ठीक नीचे राज का लिंग धड़क रहा था। उसकी गर्मी कामिनी की हथेली तक पहुँच रही थी।

"जांघों की मालिश करो," राज ने अपनी टांगें थोड़ी फैला दीं।
 
कामिनी ने उनकी जांघों पर तेल मला। राज की जांघें किसी पेड़ के तने जैसी मोटी और सख्त थीं। कामिनी के छोटे हाथ उन्हें पूरा घेर भी नहीं पा रहे थे। वह जांघों के अंदरूनी हिस्से की मालिश करने लगी।

यह बहुत संवेदनशील हिस्सा होता है। राज की सांसें भारी हो गईं। उनका पेट ऊपर-नीचे होने लगा।

"और ऊपर..." राज ने फुसफुसाया।

"जड़ तक। वहां नसें खिंची हुई हैं।"

कामिनी का हाथ ऊपर सरका। अब उसकी कलाई राज के लिंग (जो तौलिये के नीचे था) से रगड़ खा रही थी। वह बहुत गर्म था। लोहे जैसा सख्त।

कामिनी का दम घुटने लगा। उसे पता था कि वह आग से खेल रही है।

अचानक, राज ने अपनी कमर उठाई और एक हाथ से तौलिया खींचकर फेंक दिया।

कामिनी की आंखें फटी की फटी रह गईं।

उसके सामने राज का नंगा लिंग खड़ा था। वह काला, बेहद मोटा, नसों से भरा हुआ और बहुत लंबा था। उसका टोपा एक बड़े मशरूम जैसा था, जिस पर तेल की एक बूंद चमक रही थी। वह प्रताप के अंग से कम से कम तीन गुना बड़ा लग रहा था। वह हवा में गर्व से तना हुआ था।

"देख ले," राज ने कहा। "यह है असली मर्द की निशानी। यह है वो चीज़ जो तुझे चाहिए।"

कामिनी ने अपना मुंह दोनों हाथों से ढक लिया। "बाबूजी... यह... प्लीज..."

"इसे 'बाबूजी' मत बोल," राज ने उसका हाथ खींचा और जबरदस्ती अपने लिंग पर रख दिया। कामिनी की उंगलियां उस गर्म मांस से चिपक गईं। "इसे अपना मालिक बोल। पकड़ इसे।"

कामिनी ने पहली बार एक पूर्ण विकसित, उत्तेजित और ताकतवर पुरुष अंग को छुआ। वह बहुत गर्म था। उसने उसे मुट्ठी में भरा। वह उसकी मुट्ठी से बाहर निकल रहा था। उसकी नसों में खून दौड़ रहा था।

"हिला इसे," राज ने आदेश दिया। "तेल लगा और हिला।"

कामिनी ने कांपते हुए तेल की मदद से उसे ऊपर-नीचे करना शुरू किया। उसे डर लग रहा था, लेकिन एक अजीब सा रोमांच भी था। वह एक 'वर्जित' चीज़ के साथ खेल रही थी।

राज ने अपनी आंखें बंद कर लीं। कामिनी के कोमल, छोटे हाथ उनके सख्त लिंग पर जादू कर रहे थे।

"आह... कामिनी... जोर से..." राज के मुंह से उसका नाम निकला।

कामिनी ने अपनी रफ़्तार बढ़ाई। वह सम्मोहित थी। वह देख रही थी कि कैसे उसकी रगड़ से वह और बड़ा और लाल होता जा रहा है। उसमें से प्री-कम की एक बूंद निकली।

राज ने अचानक उठकर बैठने की कोशिश की। उन्होंने कामिनी को बांहों से पकड़ा और उसे एक झटके में अपने ऊपर खींच लिया।

कामिनी का चेहरा राज के चेहरे के पास आ गया। उनके होंठ बस एक इंच दूर थे।

"तू बहुत सुंदर है," राज ने कहा और बिना किसी चेतावनी के अपने होंठ कामिनी के होंठों पर रख दिए।

यह कामिनी का पहला असली किस था। प्रताप ने सिर्फ थूक लगाया था, लेकिन राज... राज उसे खा रहे थे। उनके होंठ सख्त थे, मूंछें चुभ रही थीं। उन्होंने अपनी जीभ कामिनी के मुंह में जबरदस्ती डाल दी। वह उसकी जीभ को ढूंढ रहे थे, चूस रहे थे।

कामिनी ने विरोध करने की कोशिश की, उसने उनकी छाती पर हाथ रखा, लेकिन राज की ताकत के आगे वह बेबस थी। और सच तो यह था कि वह विरोध करना भी नहीं चाहती थी। उसका शरीर पिघल रहा था। उसने अपना मुंह खोल दिया। उनकी जीभें आपस में लड़ने लगीं।

राज का एक हाथ कामिनी की पीठ पर गया। उन्होंने ब्लाउज के हुक टटोलने में समय बर्बाद नहीं किया। उन्होंने अपनी उंगलियां फंसाईं और जोर से खींचा।

"टच-टच-टच!"

हुक टूट गए। ब्लाउज खुल गया। राज ने उसे कंधों से नीचे खींच दिया। कामिनी ने ब्रा नहीं पहनी थी (या शायद वह इतनी पतली थी कि पता नहीं चला)। उसके युवा, कड़े और गोरे स्तन आज़ाद हो गए। वे राज के पसीने से भीगे सीने से दब गए।

"आह्ह्ह!" कामिनी ने अपना मुंह अलग किया। सांस लेने के लिए तड़पते हुए।

"बाबूजी... क्या कर रहे हैं... छोड़िए..."

"वही जो तेरे पति को करना चाहिए था, लेकिन वो नहीं कर पाया," राज ने उसे धक्का देकर बिस्तर पर चित लिटा दिया।

अब राज उसके ऊपर थे। उनका विशाल शरीर कामिनी को पूरी तरह ढक रहा था। कामिनी के स्तन उनके वजन के नीचे दबे हुए थे।

राज ने अपना सिर नीचे किया। उन्होंने कामिनी के बाएं स्तन को देखा। निप्पल सख्त और गुलाबी था। उन्होंने अपना मुंह खोला और पूरा निप्पल अपने मुंह में भर लिया।

कामिनी की पीठ धनुष की तरह मुड़ गई। "उफ्फ! माँ!" उसने राज के बालों को पकड़ लिया।
 
राज उसे चूस रहे थे, काट रहे थे। उनका अनुभव बोल रहा था। वे जानते थे कि एक औरत को कैसे उत्तेजित किया जाता है। उनकी जीभ निप्पल के चारों तरफ घूम रही थी। कामिनी की योनि से पानी बह निकला। उसने अपनी टांगें अनजाने में राज की कमर पर लपेट लीं।

राज का सख्त लिंग अब कामिनी की साड़ी और पेटीकोट के ऊपर से उसकी योनि पर दबाव डाल रहा था। वह वहां एक सख्त रगड़ पैदा कर रहा था।

"साड़ी हटा," राज ने हुक्म दिया, अपना मुंह उसके स्तन से हटाते हुए। उनका मुंह लार से गीला था।

कामिनी ने कांपते हाथों से मना किया। "नहीं... प्लीज..."

राज ने खुद ही हाथ नीचे डाला और पेटीकोट की डोरी तोड़ दी। उन्होंने साड़ी को खींचकर कामिनी की टांगों से अलग कर दिया और फर्श पर फेंक दिया।

अब कामिनी पूरी तरह नंगी थी, सिर्फ गले में मंगलसूत्र था। राज ने उसे देखा। ऊपर से नीचे तक।

"सोना... खरा सोना..." राज ने उसकी जांघों को फैलाया। "और यह खजाना उस शराबी के लिए बेकार पड़ा था।"

कामिनी की योनि गुलाबी, साफ और गीली थी। वह कांप रही थी। राज ने अपनी उंगलियों पर कटोरी से बचा हुआ तेल लगाया।

"आज सिर्फ शुरुआत है," राज ने कहा, कामिनी की आंखों में देखते हुए। "आज मैं तुझे तोडूंगा नहीं। आज सिर्फ तैयार करूँगा। तेरी सील को थोड़ा ढीला करूँगा।"

उन्होंने अपनी दो उंगलियां कामिनी की कुंवारी योनि के मुहाने पर रखीं। कामिनी ने चादर भींच ली।

राज ने धीरे से, लेकिन मजबूती से एक उंगली अंदर डाली।

"आह! दर्द!" कामिनी सिसकी। वह बहुत तंग थी।

"सहो इसे," राज ने झुककर उसे चूमा। "दर्द ही मज़ा है।"

उन्होंने उंगली को अंदर-बाहर करना शुरू किया। तेल की वजह से फिसलन थी। कामिनी की सिसकियाँ अब आहों में बदलने लगी थीं। राज की उंगलियां उसके अंदर खेल रही थीं, उसे चौड़ा कर रही थीं, उसे आने वाले दिनों के लिए तैयार कर रही थीं।

राज ने अपना अंगूठा उसके 'दाने' पर रगड़ना शुरू किया। कामिनी का शरीर कांपने लगा। उसे एक ऐसा सुख मिल रहा था जो उसने कभी सोचा भी नहीं था। बिजली के झटके लग रहे थे।

"बाबूजी... मैं... मैं कुछ हो रहा है... मैं मर जाऊंगी..."

"होने दे," राज ने रफ़्तार तेज़ कर दी। "मर जा मेरी बांहों में।"

अचानक, कामिनी का शरीर अकड़ गया। उसने राज के कंधों पर दांत गड़ा दिए। एक ज़ोरदार झटके के साथ, उसने अपनी ज़िंदगी का पहला 'चरम सुख' महसूस किया। उसका पानी राज की उंगलियों पर बह निकला। उसकी योनि ने राज की उंगलियों को जकड़ लिया।

वह निढाल होकर गिर गई, हांफते हुए। पसीने से लथपथ।

राज उसके ऊपर झुके। उन्होंने अपनी उंगलियों पर लगा कामिनी का रस देखा और उसे चखा।

"मीठा है," राज ने मुस्कुराते हुए कहा। "बहुत मीठा।"

उन्होंने अपना लिंग उठाया, जो अभी भी पत्थर जैसा सख्त था। उन्होंने उसे कामिनी की गीली जांघों के बीच रगड़ा, उसकी योनि के होठों पर फेरा, लेकिन अंदर नहीं डाला।

"आज के लिए इतना ही," राज ने कहा, खुद पर काबू पाते हुए। "मैं नहीं चाहता कि तू कल लंगड़ा कर चले और सबको शक हो जाए। असली काम... हम अस्तबल में करेंगे। जब बारिश होगी। तब तेरी चीखें कोई नहीं सुनेगा।"

कामिनी अभी भी होश में नहीं थी। राज ने उसे उठाया।

"कपड़े पहन और भाग जा," राज ने कहा। "इससे पहले कि प्रताप जागे। और यह सब... हमारे बीच का राज़ है।"

कामिनी ने लड़खड़ाते हुए अपनी फटी हुई चोली और साड़ी उठाई और लपेटी। उसका शरीर अभी भी झनझना रहा था। जब वह दरवाजे तक पहुँची, तो उसने मुड़कर देखा।

राज बिस्तर पर बैठे थे, नंगे, तेल में चमकते हुए, अपने लिंग को सहलाते हुए जो अभी भी शांत नहीं हुआ था। वे किसी विजयी राजा जैसे लग रहे थे जिसने नया किला फतह किया हो।

"दरवाजा बंद करती जाना," राज ने कहा। "और कल... कल फिर तैयार रहना।"

कामिनी बाहर निकली। ठंडी हवा उसे छू रही थी, लेकिन उसके अंदर जो आग राज ने लगाई थी, वह अब बुझने वाली नहीं थी।

वह जानती थी कि वह अब उस नामर्द प्रताप की पत्नी नहीं, बल्कि बड़े ठाकुर की 'रखैल' बन चुकी है। और शर्मनाक बात यह थी कि उसे यह पद... पत्नी होने से ज्यादा पसंद आ रहा था। वह अपने कमरे में गई, प्रताप के बगल में लेटी, और राज के सपनों में खो गई।

◆◆◆
 
मर्यादा का चीरहरण

अगली सुबह जब कामिनी की आंख खुली, तो विला के रोशनदानों से धूप छनकर कमरे में आ रही थी। प्रताप के खर्राटे बंद हो चुके थे; वह शायद पहले ही उठकर जा चुका था—अपनी नामर्दी के गम को धुएं या चाय में उड़ाने।

कामिनी बिस्तर पर लेटी छत की पुरानी लकड़ियों को घूर रही थी। बीती रात की यादें किसी धुंधली फिल्म की तरह नहीं, बल्कि एक ज्वलंत सच्चाई की तरह उसकी आंखों के सामने घूम रही थीं। उसे अभी भी अपनी हथेलियों में सरसों के तेल की चिपचिपाहट महसूस हो रही थी, हालांकि उसने रात को ही हाथ धो लिए थे।

उसे अपनी जांघों के बीच राज की खुरदरी उंगलियों का वो स्पर्श याद आ रहा था, जिसने उसे पहली बार एक औरत होने का, एक जीवित मांस होने का अहसास कराया था।

"हे भगवान... मैंने क्या किया?" कामिनी ने अपना चेहरा तकिए में छिपा लिया।

तकिए से प्रताप के तेल की बास आ रही थी। "मैं अपने जेठ के कमरे में गई... मैंने उन्हें छुआ... उन्होंने मुझे... और मुझे अच्छा लगा।"

गिल्ट और हवस के बीच एक भयानक जंग चल रही थी। उसका संस्कारी मन उसे धिक्कार रहा था, कह रहा था कि वह कुलच्छनी है, पापिनी है। लेकिन उसका जवान शरीर... वह अभी भी उस स्पर्श के लिए तड़प रहा था। उसे राज के उस विशाल लिंग का दृश्य याद आ रहा था जो उसने तौलिये के गिरने पर देखा था। वह दृश्य उसकी आंखों में छप गया था।

नहा-धोकर जब वह भारी कदमों से नीचे हॉल में आई, तो वहां नाश्ते की मेज लग चुकी थी। ससुर जी अखबार पढ़ रहे थे, सास नौकरों को डांट रही थीं, प्रताप टोस्ट चबा रहा था और राज... राज अपनी कुर्सी पर एक राजा की तरह बैठे चाय पी रहे थे।

कामिनी ने लंबा घूंघट काढ़ रखा था। उसने झुककर सबके पैर छुए। जब वह राज के पास पहुंची, तो उसके पैर कांपने लगे। उसे लगा जैसे राज की नज़रें उसके कपड़ों को भेदकर उसके नंगे बदन को देख रही हैं।

"खुश रहो बहू," राज की भारी और गूंजती आवाज़ उसके कानों में पड़ी।

कामिनी ने कनखियों से देखा। राज आज फिर उसी रोबदार, गंभीर अवतार में थे। सफेद कड़क कुर्ता, माथे पर लाल तिलक और ताव दी हुई मूंछें। कोई कह नहीं सकता था कि रात को यही आदमी अपनी बहू के सामने नंगा लेटा था, उसे अपनी जांघों के बीच दबाए हुए था और उसे कामुकता का पाठ पढ़ा रहा था।

कामिनी रसोई में गई और चाय की केतली लेकर आई। जब उसने राज के कप में चाय डाली, तो उसका हाथ हिल गया। थोड़ी चाय तश्तरी में गिर गई।

राज ने कप उठाया। ऐसा करते हुए उनकी उंगलियां कामिनी की उंगलियों से टकरा गईं।

एक ज़बरदस्त करंट दौड़ा। कामिनी ने हाथ खींचना चाहा, लेकिन राज ने पल भर के लिए कप के बहाने उसकी उंगलियों को दबा दिया। उन्होंने अपनी खुरदरी उंगली कामिनी की हथेली के बीच में (जहां पसीना आता है) रगड़ दी। यह बहुत सूक्ष्म इशारा था, लेकिन कामिनी के लिए किसी बम धमाके जैसा था।

"चाय अच्छी है," राज ने कप होठों से लगाते हुए कहा। उनकी नज़रें घूंघट के पार कामिनी की आंखों में थीं। "लेकिन रात वाली 'सेवा' ज्यादा अच्छी थी। मेरी कमर का दर्द बिल्कुल गायब हो गया।"

कामिनी का चेहरा टमाटर जैसा लाल हो गया। उसका दिल गले में आ गया। शुक्र है कि घूंघट था। बाकी लोग अपनी बातों में व्यस्त थे, किसी ने राज का यह द्विअर्थी वाक्य नहीं समझा। लेकिन कामिनी समझ गई थी। वह उसे याद दिला रहे थे कि अब वह उनकी है।

प्रताप ने मुंह पोंछते हुए कहा, "भाईसाहब, आज मुझे शहर जाना है। कुछ काम है। और शायद दोस्तों के साथ रुकना पड़े। मैं कल सुबह तक लौटूंगा।"

राज के होठों पर एक बारीक, क्रूर मुस्कान आ गई। उन्होंने प्रताप को देखा, फिर कामिनी को।

"जाओ छोटे," राज ने कहा। "काम जरूरी है। घर की चिंता मत करो। मैं हूँ ना... विला और 'बहू' की देखभाल करने के लिए।"

'देखभाल' शब्द पर उन्होंने जो ज़ोर दिया, उससे कामिनी की रीढ़ में सिहरन दौड़ गई। प्रताप जा रहा था। आज रात विला में उसका पति नहीं होगा। आज रात वह पूरी तरह से असुरक्षित थी... या शायद पूरी तरह से स्वतंत्र।

प्रताप के जाने के बाद विला फिर शांत हो गई। दोपहर की धूप तीखी हो गई थी। सास अपनी सहेलियों के साथ पास के मंदिर में कीर्तन के लिए चली गईं। ससुर अपनी अफीम की पिनक में अपने कमरे में सो गए। नौकर बाहर बरामदे में सुस्ता रहे थे।

कामिनी अपने कमरे में थी, अलमारी में कपड़े तह कर रही थी। उसका दिमाग कहीं और था। उसे पता था कि राज उसे छोड़ेंगे नहीं।

तभी दरवाजा खुला। बिना खटखटाए।

राज अंदर आए।

उन्होंने पीछे मुड़कर दरवाजा बंद किया और इत्मीनान से कुंडी लगा दी।

कामिनी के हाथ से कपड़े गिर गए। वह पीछे हटी। "बाबूजी... आप? यहाँ? यह मेरा कमरा है। कोई देख लेगा।"

"यह विला मेरी है कामिनी," राज ने धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ते हुए कहा। उनकी चाल में एक शिकारी जैसी खामोशी थी। "हर कमरा, हर दीवार, हर ईंट... और इस विला में रहने वाला हर इंसान... मेरा है।"

वे कामिनी के पास आए और उसे दीवार से सटा दिया। कामिनी की पीठ ठंडी दीवार से लग गई और सामने राज का विशाल, कुर्ता पहने हुए सीना था। उसे उनकी गर्मी और वही मर्दाना गंध—तंबाकू और पसीने की—महसूस हुई।

"डर रही हो?" राज ने अपना हाथ बढ़ाया और उसके घूंघट को उठाकर पीछे कर दिया। अब उनका चेहरा आमने-सामने था।

"जी... यह गलत है," कामिनी ने नजरें झुका लीं, अपनी छाती पर पल्लू कसते हुए।

"क्या गलत है?" राज ने उसकी ठुड्डी पकड़कर उसका चेहरा जबरदस्ती ऊपर किया। "एक प्यासी औरत को पानी देना गलत है? या एक नामर्द के साथ पूरी जिंदगी घुट-घुट कर सड़ना सही है?"

"प्रताप मेरे पति हैं... मेरी इज़्ज़त हैं..."

"पति?" राज ने एक कड़वी, हिकारत भरी हंसी हंसी। उन्होंने कामिनी का बायां हाथ पकड़ा और उसकी चूड़ियों को खनकाया। "पति वो होता है जो अपनी पत्नी को संतुष्ट करे। जो उसकी सेज गीली करे और उसकी कोख भरे। प्रताप क्या है? एक शराबी। एक बोझ। उसने तुझे क्या दिया? सिर्फ आंसू और कुंठा?"

राज ने अपना शरीर कामिनी से सटा दिया। उन्होंने अपनी मज़बूत जांघ कामिनी की दोनों जांघों के बीच घुसा दी और दबाव बनाया। कामिनी की योनि पर एक सख्त रगड़ लगी।
 
"सच बता," राज ने उसकी आंखों में झांका। "क्या तू माँ नहीं बनना चाहती? क्या तुझे अपनी गोद में बच्चा नहीं चाहिए? इस विला को वारिस नहीं चाहिए?"

कामिनी की दुखती रग दब गई। हर औरत माँ बनना चाहती है। और प्रताप के साथ यह नामुमकिन था। उसकी आंखों में आंसू आ गए।

"मैं मजबूर हूँ बाबूजी," कामिनी सिसकी।

"तू मजबूर नहीं, तू प्यासी है," राज ने अपना चेहरा उसके गर्दन के पास ले जाकर सूंघा। "और तेरी खुशबू बता रही है कि तू मुझे चाहती है। कल रात जब तूने मेरे लिंग को छुआ था... तो तेरी सांसें कैसे चल रही थीं, मैं जानता हूँ।"

राज ने अपने दोनों हाथ कामिनी की कमर पर रखे और उसे अपनी तरफ जोर से खींचा। कामिनी का पेट राज के पेट से सट गया। उसे साफ महसूस हुआ कि राज का लिंग धोती के अंदर जाग चुका है। एक सख्त मूसल जैसा उभार उसे चुभ रहा था।

"आज रात," राज ने कहा। "आज रात प्रताप नहीं है। आज कोई बहाना नहीं चलेगा। आज कोई मालिश नहीं होगी।"

"लेकिन कहाँ?" कामिनी ने कांपते हुए पूछा। "कमरे में सास-ससुर सुन लेंगे। आवाज़ बाहर जाएगी।"

"कमरे में नहीं," राज की आंखों में एक जंगली, आदिम चमक थी। "आज विला के पीछे वाले हिस्से में। अस्तबल के पास जो पुरानी कोठरी है, वहां। वहां हमारी आवाज़ें कोई नहीं सुनेगा। वहां तू जितना चाहे चिल्ला सकती है। वहां हम जानवरों की तरह करेंगे।"

कामिनी कांप गई। अस्तबल? भूसा, धूल और घोड़ों की गंध? यह किसी रईस की सेज नहीं, एक जंगली मिलन का न्यौता था।

"तैयार रहना," राज ने अपना अंगूठा उसके होंठों पर रगड़ा, जैसे उसे सील कर रहे हों। "रात के 10 बजे। और सुन... साड़ी मत पहनना। घाघरा पहनना। और नीचे कुछ मत पहनना। मुझे खोलने में वक्त बर्बाद करना पसंद नहीं।"

राज के जाने के बाद कामिनी सुन्न खड़ी रही। अस्तबल। बिना कपड़ों के।

लेकिन जैसे-जैसे शाम ढलने लगी, उसका डर एक अजीब सी, बीमार उत्तेजना में बदलने लगा। उसे पता था कि आज रात उसका 'कौमार्य' भंग होने वाला है। वह चीज़ जो उसका पति रस्मों-रिवाजों के बाद भी नहीं ले पाया, आज उसका जेठ, एक लुटेरे की तरह छीन लेगा। और उसका शरीर... उसका शरीर इसके लिए तैयार हो रहा था।

रात के 10 बजे। विला सो चुकी थी। कुत्ते भौंक रहे थे।

कामिनी ने राज के आदेश का पालन किया। उसने साड़ी नहीं पहनी। उसने अपना सबसे पुराना, लाल रंग का घाघरा-चोली पहना। घाघरा भारी था, लेकिन उसके नीचे उसने पेटीकोट या पैंटी नहीं पहनी। नंगी जांघों पर घाघरे का खुरदरा कपड़ा रगड़ खा रहा था, जिससे उसे हर कदम पर अपनी नग्नता का अहसास हो रहा था। उसने एक बड़ी काली शॉल ओढ़ ली ताकि कोई देख न ले।

वह पिछले दरवाजे से, रसोई के रास्ते बाहर निकली। ठंडी हवा चल रही थी। अस्तबल की तरफ से घोड़ों के हिनहिनाने और टापों की आवाज़ आ रही थी। हवा में गोबर और सूखी घास की गंध थी।

वह पुरानी कोठरी के पास पहुंची। यह जगह अनाज और पुराने औजार रखने के लिए थी। वहां एक लालटेन जल रही थी, जिसकी मद्धम रोशनी दरवाजे की दरारों से बाहर आ रही थी। दरवाजा अधखुला था।

अंदर राज इंतज़ार कर रहे थे।
 
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