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Adultery ' गाँव का टेलर '

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साड़ी डॉली के पैरों में गिर गई। पेटीकोट का नाड़ा राज ने अपने दांतों से खींच लिया।

डॉली अब सिर्फ उस लाल, तंग ब्लाउज में थी। नीचे वह पूरी तरह नंगी थी।

उसका शरीर... वह किसी प्राचीन देवी की मूर्ति जैसा था। भरी हुई जांघें, चौड़ी कमर, और वो विशाल, गोलाकार नितंब जो 32 साल की जवानी का भार संभाले हुए थे।

राज ने उसे देखा। उसकी आंखें फटी रह गईं।

"माई गॉड..." राज घुटनों के बल बैठ गया। उसका चेहरा डॉली के उस घने, काले त्रिकोण के सामने था।

उसने अपने दोनों हाथों से डॉली के नितंबों को पकड़ा। वे मक्खन जैसे मुलायम थे। उसने अपना चेहरा डॉली के पेट और जांघों के बीच गड़ा दिया।

"आह्ह्ह्ह! राज!" डॉली ने राज के बालों को नोच लिया। "चाटो मुझे! पी जाओ मुझे!"

राज ने उसे चूमना शुरू किया। उसकी जीभ डॉली के अंदरूनी हिस्से को खोज रही थी। डॉली का शरीर आईने से टकरा रहा था।

"यह ब्लाउज..." डॉली हांफ रही थी, "यह मेरा दम घोट रहा है... लेकिन इसे उतारना मत... मुझे यह कसाव चाहिए..."

राज खड़ा हो गया। उसकी आंखों में खून उतर आया था। उसने डॉली को घुमा दिया।

"उधर देख," राज ने डॉली का चेहरा आईने की तरफ किया। "देख खुद को। देख अपनी इस भरी जवानी को।"

डॉली ने आईने में देखा। वह अर्धनग्न अवस्था में, लाल ब्लाउज पहने, एक सांवले मर्द की गिरफ्त में थी।

राज ने एक ज़ोरदार थप्पड़ उसके दाहिने नितंब पर मारा।

चटाक!

आवाज़ उस छोटे से कमरे में बम की तरह फटी। डॉली का पूरा पिछवाड़ा हिल गया। लहरें उठीं।

"आह! माँ!" डॉली चिल्लाई, लेकिन दर्द से नहीं, मजे से। "और मारो! लाल कर दो इसे! यह तुम्हारी जागीर है!"

राज ने दूसरा थप्पड़ मारा। फिर तीसरा। डॉली का गोरा मांस लाल पड़ गया।

"आज मैं इस मटके को भर दूंगा," राज ने कहा।

उसने अपनी पैंट की जिप खोली। उसने अपना अंडरवियर नीचे किया।

उसका लिंग... वह किसी हथियार की तरह बाहर आया। 8 इंच लंबा, काला, मोटा और नसों से भरा हुआ। वह हवा में झूल नहीं रहा था, वह तनकर डॉली की कमर की तरफ इशारा कर रहा था।

डॉली ने आईने में उस दानव को देखा।

"हे भगवान..." उसकी सांस अटक गई। "इतना मोटा? राज... यह तो... यह तो मुझे फाड़ देगा। यह गाँव के मर्दों जैसा नहीं है।"

"शहर का माल है डॉली," राज ने उसे कमर से पकड़ा। "फिटिंग एकदम टाइट आएगी।"

उसने डॉली को थोड़ा आगे झुकने को कहा। डॉली ने अपने हाथ आईने पर टिका दिए और अपनी कमर को पीछे की तरफ बाहर निकाल दिया। उसका विशाल पिछवाड़ा राज के लिए तैयार था।

राज ने अपने लिंग के टोपे को डॉली की योनि के मुहाने पर रखा। वहां पहले से ही बाढ़ आई हुई थी। रस उसकी जांघों पर बह रहा था।

"तैयार हो?" राज ने पूछा, अपना पसीना डॉली की पीठ पर टपकाते हुए।

"सोचो मत... बस डाल दो... एक बार में... मेरी जान ले लो..."’

राज ने डॉली की कमर को अपनी लोहे जैसी पकड़ में लिया और एक ही झटके में, पूरी ताकत से अपनी कमर आगे कर दी।

धप्प!

राज का मोटा लिंग डॉली की तंग गुफा को चीरता हुआ, दीवारों को फैलाता हुआ अंदर घुस गया।

"आह्ह्ह्ह्ह्ह!" डॉली की चीख निकल गई। उसकी गर्दन पीछे लटक गई। "मर गई! उफ्फ! कितना भरा हुआ है!"

राज रुका नहीं। उसने उसे एडजस्ट होने का मौका नहीं दिया। वह उसे पेलने लगा।

खड़े-खड़े।

यह कोई कोमल प्रेम नहीं था। यह हवस का तांडव था।

थप-थप-थप-थप!

राज की जांघें डॉली के भारी नितंबों से टकरा रही थीं। हर टक्कर पर एक गीली और भारी आवाज़ आ रही थी। आईने हिल रहे थे।

"जोर से!" डॉली चिल्ला रही थी, आईने पर अपनी हथेलियां पटकते हुए। "और जोर से! मुझे महसूस कराओ कि मैं एक मर्द के नीचे हूँ! मेरे पति ने कभी ऐसे नहीं किया!"

राज एक मशीन बन गया था। वह डॉली के बालों को खींच रहा था, उसकी पीठ को चूम रहा था, काट रहा था। उसका एक हाथ आगे गया और उसने डॉली के ब्लाउज को पकड़ लिया। ब्लाउज के कप उसके स्तनों को थामे हुए थे। राज ने अपना हाथ ब्लाउज के अंदर डाला और उसके निप्पल को पकड़कर मरोड़ दिया।

"आह! राज! निप्पल... निप्पल को काट ले!"

राज ने उसके कान में फुसफुसाया, "तेरी ये भारी गांड़... इसे तो मैं आज लाल करके छोड़ूँगा।"

डॉली का शरीर अकड़ने लगा। "हाँ! ऐसे ही! मुझे चोदो राज! मुझे अपनी रंडी बना लो! इस ट्रायल रूम की रंडी!"

ट्रायल रूम पसीने और कामुक गंध से भर गया था। राज के धक्के अब और गहरे और तेज़ हो गए थे। वह डॉली को दीवार से सटा रहा था। डॉली का चेहरा आईने से दब गया था। उसकी सांसों से आईना धुंधला हो रहा था।

राज ने देखा कि डॉली के पैर कांप रहे हैं। वह खड़ी नहीं रह पा रही थी।

"मैं आ रही हूँ राज! मैं नहीं रुक सकती!" डॉली चिल्लाई। उसकी योनि राज के लिंग को चूसने लगी। "भर दे मुझे! अपनी निशानी छोड़ दे!"

राज भी अब बर्दाश्त की सीमा पार कर चुका था। उस जकड़न ने उसे तोड़ दिया।

"डॉली... मेरी जान... आह्ह्ह!"

राज ने एक जानवर जैसी दहाड़ मारी। उसने डॉली को दीवार से पूरी ताकत से दबाया, खुद को जड़ तक अंदर धंसाया और अपना सारा, ढेर सारा गर्म, गाढ़ा वीर्य डॉली के अंदर, बहुत गहराई में छोड़ दिया।

एक धार... दो धार... तीन धार...

वह खाली होता गया। डॉली ने उस गर्म लावा को अपने अंदर महसूस किया। वह गर्मी उसके पेट में फैल गई, उसकी रूह तक पहुँच गई।

"ओह्ह्ह्ह..." डॉली निढाल होकर राज के ऊपर गिर पड़ी।

राज ने उसे संभाल लिया। वे दोनों वहीं, एक-दूसरे के पसीने में लथपथ, ट्रायल रूम के फर्श पर बैठ गए। डॉली की टांगें अभी भी फैली हुई थीं, और राज अभी भी उसके अंदर था, भले ही अब वह शांत हो रहा था।

काफी देर तक सन्नाटा रहा। सिर्फ एसी की हमिंग और उनकी भारी सांसें थीं।

राज ने डॉली के माथे को चूमा। डॉली ने अपनी आंखें खोलीं। उनमें एक नशा था, एक तृप्ति थी।

"फिटिंग कैसी थी?" राज ने मुस्कुराते हुए पूछा।

डॉली ने उसके गाल पर एक हल्का थप्पड़ मारा और फिर उसे चूम लिया।

"एकदम परफेक्ट," उसने कहा। "इंच-इंच भर दिया तुमने। अब मैं यह ब्लाउज जब भी पहनूँगी... मुझे यह दर्द और यह मज़ा याद आएगा।"

उसने राज के सीने पर अपना सिर रख दिया।

"कल..." डॉली ने कहा, "कल मैं फिर आऊँगी। एक नया कपड़ा लेकर। पारदर्शी। उसके लिए नाप... और भी गहराई से लेना होगा।"

राज हंसा। "दुकान खुली है। दर्जी तैयार है।"

◆◆◆
 
स्थान: 'अप्सरा लेडीज बुटीक', राजगढ़

समय: रात के 9:00 बजे (दो दिन बाद)

माहौल: मूसलाधार बारिश और बंद कमरे की आग

राजगढ़ में आज आसमान टूटकर बरस रहा था। जून की तपती गर्मी के बाद मानसून की यह पहली मूसलाधार बारिश थी। बादलों की गड़गड़ाहट ऐसी थी मानो आसमान फट जाएगा। बिजली की कड़कड़ाहट ने पूरे कस्बे की बत्ती गुल कर दी थी।

राजगढ़ का बाज़ार, जो शाम को गुलज़ार रहता था, आज घुप अंधेरे और पानी के शोर में डूबा हुआ था। सड़कें नदियों में तब्दील हो चुकी थीं।

लेकिन बाज़ार के कोने वाली दुकान, "अप्सरा लेडीज बुटीक" के शटर के नीचे से एक मद्धम पीली रोशनी छनकर बाहर आ रही थी। दुकान का शटर आधा गिरा हुआ था—इतना कि कोई बाहर से अंदर न झांक सके, लेकिन अगर कोई आना चाहे तो झुककर आ सके। दुकान के अंदर इनवर्टर की धीमी रोशनी जल रही थी, जिसने माहौल को रहस्यमयी और बेहद निजी बना दिया था।

राज अपनी दुकान की विशाल लकड़ी की कटिंग टेबल पर बैठा था। बाहर गिरती बारिश की बूंदें कांच के दरवाज़े पर अपना जल-तरंग बजा रही थीं। एसी बंद था, लेकिन बारिश की ठंडक ने दुकान के तापमान को गिरा दिया था। फिर भी, राज के अंदर एक अजीब सी गर्मी थी।

उसके सामने टेबल पर एक लाल रंग की चमड़े की डायरी रखी थी। यह डायरी राज की सबसे कीमती और गुप्त संपत्ति थी। शहर में रहते हुए उसने इसमें अपनी दबी हुई कामुक फंतासियों को स्केच का रूप दिया था।

इसमें उन कपड़ों के डिज़ाइन थे जो राजगढ़ की संस्कृति में 'अश्लील' माने जा सकते थे, लेकिन किसी भी औरत के लिए 'ख्वाब' थे। पारदर्शी नाइटी, क्रोशिया की बिकनी, जालीदार गाउन, और ऐसे ब्लाउज जो शरीर को ढकते कम और दिखाते ज्यादा थे।‘



उसने आज तक यह डायरी किसी को नहीं दिखाई थी। लेकिन आज... आज वह इस डायरी को अपनी उस 'खास' ग्राहक को दिखाने वाला था जिसने उसकी रातों की नींद उड़ा दी थी।

डॉली।‘

उस ट्रायल रूम वाली घटना को दो दिन बीत चुके थे। उन 48 घंटों में राज ने एक भी पल ऐसा नहीं गुजारा जब उसने डॉली के उस लाल ब्लाउज वाले रूप को याद न किया हो। उसे याद था कि कैसे डॉली ने कहा था—"अगली बार एक पारदर्शी कपड़ा लाऊंगी।"

घड़ी में 9 बज चुके थे। बारिश थमने का नाम नहीं ले रही थी। राज को डर लगने लगा। क्या इतनी बारिश में वह आएगी? क्या हवेली से निकलना मुमकिन होगा? उसने डायरी के पन्ने पलटे। एक पन्ने पर उसने एक स्केच बनाया था—बारिश में भीगी हुई एक औरत, जिसके कपड़े शरीर से चिपके हुए थे।

तभी... बादलों की गरज के बीच एक भारी गाड़ी के इंजन की आवाज़ आई। गाड़ी दुकान के ठीक बाहर आकर रुकी। हेडलाइट की रोशनी शटर के नीचे से अंदर आई और राज के चेहरे पर पड़ी।

राज का दिल पसलियों से टकराने लगा। उसने डायरी बंद की और टेबल से उतर गया।

दुकान का कांच का दरवाज़ा खुला।

बारिश की बौछारों के साथ ठंडी हवा का एक तेज़ झोंका अंदर आया। और उस झोंके के साथ दाखिल हुई—डॉली।

राज की सांसें हलक में अटक गईं। उसने जो सोचा था, डॉली उससे कहीं ज्यादा कयामत लग रही थी।

उसने आज गाड़ी से दुकान तक का सफर बिना छाते के तय किया था। वह पूरी तरह, सिर से पैर तक भीगी हुई थी।

उसने एक सफेद रंग की शिफॉन साड़ी पहनी थी।‘’

सूखी अवस्था में यह साड़ी शायद शालीन रही होगी, लेकिन भीगने के बाद... यह साड़ी कांच जैसी पारदर्शी हो गई थी। पानी ने कपड़े और त्वचा का भेद मिटा दिया था। शिफॉन का कपड़ा डॉली के भारी बदन पर दूसरी चमड़ी की तरह चिपक गया था।

सफेद साड़ी के नीचे उसका स्किन-कलर का तंग ब्लाउज और पेटीकोट साफ दिख रहा था। लेकिन पानी ने उन्हें भी पारदर्शी बना दिया था।

डॉली कांप रही थी। ठंड से कम, और उत्तेजना से ज्यादा। उसके लंबे, काले बाल खुले थे और उनसे पानी की धारें टपककर उसके सीने पर गिर रही थीं। उसके चेहरे से मेकअप धुल चुका था, लेकिन उसकी प्राकृतिक सुंदरता बारिश में धुलकर और निखर आई थी। उसके होंठ ठंड से नीले नहीं, बल्कि रक्तिम लाल हो रहे थे।

उसने अंदर आते ही दरवाज़ा लॉक किया और कुंडी चढ़ा दी।

"तुमने कहा था कि आज दुकान जल्दी बंद कर दोगे," डॉली ने मुड़कर राज को देखा। उसकी आवाज़ बारिश के शोर में भी साफ और अधिकार पूर्ण थी।

राज अपनी जगह से हिला नहीं। वह बस उस दृश्य को अपनी आंखों में कैद कर रहा था। डॉली किसी जलपरी जैसी लग रही थी जो अभी-अभी अपनी प्यास बुझाने पानी से बाहर आई हो।

उसके ब्लाउज के अंदर उसके स्तनों के गहरे काले घेरे गीले कपड़े से झांक रहे थे। ठंड की वजह से उसके निप्पल पत्थर की तरह सख्त होकर ब्लाउज को चीरने की कोशिश कर रहे थे।

"दुकान बंद है, मालकिन," राज ने भारी आवाज़ में कहा। "दुनिया के लिए बंद है। लेकिन मेरे लिए... आज ही खुली है।"

वह डॉली के पास गया। डॉली के कपड़ों से पानी टपककर फर्श पर एक छोटा सा तालाब बना रहा था।

"मैं भीग गई," डॉली ने अपनी साड़ी के पल्लू को निचोड़ते हुए कहा। पानी की एक धार राज के जूतों पर गिरी। "कपड़ा लाई हूँ। जैसा तुमने कहा था।"

उसने अपने गीले ब्लाउज के अंदर हाथ डाला। राज की नज़रें वहीं जम गईं। डॉली ने अपने स्तनों के बीच से, अपनी दरार की गर्मी से निकालकर एक छोटा सा पॉलीथिन का पैकेट राज के हाथ में थमा दिया।

पैकेट गीला नहीं था, लेकिन डॉली के शरीर की गर्मी से गर्म हो चुका था।

"इसे बाद में देखेंगे," राज ने पैकेट को टेबल पर फेंक दिया। उसकी प्राथमिकता अब कपड़ा नहीं, बल्कि कपड़े के अंदर का जिस्म था।

"आपको ठंड लग जाएगी," राज ने कहा। "पोछना होगा।"

उसने दुकान के रैक से एक बड़ा, सफेद तौलिया उठाया। वह डॉली के करीब गया। इतनी करीब कि डॉली की तेज़ सांसें उसके चेहरे पर लग रही थीं।

उसने तौलिया डॉली के सिर पर रखा और धीरे-धीरे उसके बालों को पोंछने लगा।

डॉली ने अपनी आंखें बंद कर लीं। राज के हाथों की रगड़ उसे सुकून दे रही थी। बालों को पोंछते हुए राज का हाथ नीचे फिसला। गर्दन पर... फिर कंधों पर।

डॉली की गीली साड़ी उसके कंधों से चिपकी थी। राज ने तौलिये से उसके कंधों को रगड़ना शुरू किया। घर्षण से गर्मी पैदा हुई।

"राज..." डॉली ने उसकी कलाई पकड़ ली। उसकी उंगलियां ठंडी थीं। "आज नाप नहीं लोगे?"

राज ने तौलिया छोड़ दिया। तौलिया डॉली के कंधों पर लटक गया।

"आज नाप नहीं डॉली," राज ने उसकी आंखों में देखा, जिनमें अब सिर्फ हवस थी। "आज नक्शा बनाया जाएगा। इंच-इंच का।"

वह उसे खींचकर कटिंग टेबल के पास ले गया। उसने वह लाल डायरी उठाई।

"देखो," राज ने कहा। "यह मैं शहर से लाया हूँ। यह मेरी रातों की नींद है। इसमें वो डिज़ाइन हैं जो मैं तुम्हारे बदन पर देखना चाहता हूँ।"

डॉली ने डायरी के पन्ने पलटे। उसकी आंखें फैल गईं।
 
पन्नों पर बेहद कामुक अधोवस्त्र और जालीदार नाइटगाउन के चित्र थे। कुछ स्केच में औरतें सिर्फ डोरियों में लिपटी थीं, कुछ में पारदर्शी रोब पहने थीं। हर स्केच एक कहानी कह रहा था—दबी हुई इच्छाओं की कहानी।

"यह..." डॉली ने एक पन्ने पर उंगली रखी, जिसमें एक महिला ने सिर्फ एक पारदर्शी चोगा पहन रखा था और उसके स्तन साफ दिख रहे थे। "क्या मैं ऐसी लगूँगी?"

राज उसके पीछे खड़ा हो गया। उसने अपना सीना डॉली की गीली पीठ से सटा दिया।

"इससे भी बेहतर," उसने डॉली के गीले कान के पास फुसफुसाया। "क्योंकि कागज की मूरत में वो गर्मी नहीं होती जो तुम्हारे अंदर है। तुम्हारे ये उभार... ये किसी पेंटिंग से ज्यादा जानलेवा हैं।"

डॉली ने डायरी बंद कर दी। उसने राज के हाथों को अपने पेट पर रखा।

"मुझे अभी देखना है," डॉली ने कहा, पीछे झुकते हुए। "मुझे देखना है कि तुम मुझे कैसे देखना चाहते हो। मुझे इन गीले कपड़ों से नफरत हो रही है राज। ये मुझे जकड़ रहे हैं।"

उसने राज का हाथ अपने भीगे हुए ब्लाउज के पल्लू पर रखा।

"उतारो इसे। मुझे नंगा कर दो। मुझे अपनी डायरी का पन्ना बना लो।"

यह आदेश सुनते ही राज का धैर्य टूट गया।

उसने डॉली को घुमाया।

"तो हो जाओ आज़ाद," राज ने कहा।

उसने डॉली की गीली साड़ी का पल्लू खींचा। गीला शिफॉन शरीर से अलग होने में समय ले रहा था, जैसे वह डॉली की त्वचा से चिपक गया हो। राज को ताकत लगानी पड़ी।

उसने साड़ी की प्लीट्स खोलीं। साड़ी का एक लंबा घेरा खुला और डॉली के पैरों में गिर गया।

अब डॉली सिर्फ अपने ब्लाउज और पेटीकोट में थी। दोनों पूरी तरह भीगे हुए और पारदर्शी।‘’

पेटीकोट उसकी जांघों से चिपका हुआ था, जिससे उसकी टांगों का आकार और बीच का वो त्रिकोण साफ उभर रहा था।

राज घुटनों के बल बैठ गया। उसने डॉली के पेटीकोट का नाड़ा पकड़ा। गीला होने की वजह से गांठ टाइट हो गई थी।

"जल्दी..." डॉली ने राज के बालों में उंगलियां फंसाते हुए कहा। "सब्र नहीं हो रहा।"

राज ने गांठ को दांतों से खींचा। नाड़ा खुल गया।

पेटीकोट नीचे सरक गया। डॉली ने अपने पैर उठाए और उसे लात मारकर दूर कर दिया।

अब वह सिर्फ ब्लाउज और अपनी पैंटी में थी। पैंटी भी गीली थी।‘

राज की नज़रें डॉली की भरी हुई, गोरी और पानी से चमकती हुई जांघों पर थीं। बारिश की एक बूंद उसकी जांघ पर रेंग रही थी।

राज ने अपनी जीभ निकाली और उस बूंद को चाट लिया।

"नमकीन और मीठा..." उसने ऊपर देखते हुए कहा।

डॉली के घुटने मुड़ गए। उसने राज का सिर पकड़कर अपनी जांघों के बीच दबा दिया।

"राज... मुझे खा जाओ..." वह सिसकी। "मेरी प्यास बुझा दो।"’

राज ने उसके दोनों नितंबों को अपने हाथों में भर लिया। वे ठंडे थे, लेकिन अंदर आग धधक रही थी। उसने अपना मुंह डॉली की गीली पैंटी के ऊपर, उसकी योनि पर लगा दिया।

वहां का तापमान अलग ही था। पैंटी का कपड़ा गर्म हो चुका था।

"स्लप..."

राज ने कपड़े के ऊपर से ही उसे चाटना शुरू किया। डॉली ने अपनी पीठ पीछे टेबल की तरफ झुका दी और टेबल के किनारे को कसकर पकड़ लिया।‘’

"आह! राज! उफ्फ... कपड़ा हटाओ... मुझे तुम्हारी जीभ चाहिए... सीधी..."

राज ने उसकी पैंटी को दोनों तरफ से पकड़कर नीचे खींचा।

डॉली का रसीला, साफ-सुथरा और फूला हुआ यौवन राज के चेहरे के सामने था।

राज ने कोई देर नहीं की। उसने अपनी जीभ को डॉली की गहराइयों में उतार दिया।

डॉली की चीख निकल गई। "राज!"

राज एक कलाकार की तरह उसे चाट रहा था। कभी धीमे, कभी तेज़। वह अपनी जीभ को उसके 'दाने' पर गोल-गोल घुमा रहा था, और अपनी नाक को उसके बालों में रगड़ रहा था। डॉली का शरीर कांप रहा था। वह हवा में झूल रही थी।

"और अंदर... राज... पूरा अंदर..."

राज ने अपनी दो उंगलियां उसके अंदर डाल दीं। रास्ता बहुत चिकना और गीला था। उसने उंगलियों को अंदर-बाहर करते हुए अपनी जीभ से बाहर का हिस्सा चूसना जारी रखा।

दुकान में सिर्फ डॉली की आहें और बारिश का शोर था।
 
काफी देर तक उसे अपने मुंह से प्यार करने के बाद, राज खड़ा हुआ। उसका चेहरा डॉली के रस से भीगा हुआ था।

डॉली की सांसें उखड़ी हुई थीं। उसने राज को देखा। उसकी आंखों में एक जंगलीपन था।

"अब तुम..." उसने राज की शर्ट के कॉलर को पकड़ा और जोर से खींचा। बटन टूटकर बिखर गए। "मुझे तुम्हारा स्वाद चाहिए। मुझे वो मूसल चाहिए।"

उसने राज के कपड़े उतरवा दिए।

राज का विशाल, काला और नसों से तना हुआ लिंग बाहर आया। वह पूरी ताकत से खड़ा था।

डॉली ने उसे देखा। उसकी आंखों में हवस की चमक थी।

"यह मेरे लिए है," उसने कहा और घुटनों के बल बैठकर उसे अपने मुंह में भर लिया।

उसने उसे इतनी गहराई तक लिया कि राज की आंखें पलट गईं। वह उसे गटक रही थी। वह अपनी जीभ से उसकी नसों को महसूस कर रही थी।

"आह... डॉली..." राज ने उसके सिर को पकड़ लिया।

यह सिर्फ शुरुआत थी। असली खेल—जिसमें शरीर का कोना-कोना एक-दूसरे को नापेगा—अब शुरू होने वाला था।

डॉली ने राज के लिंग को अपने मुंह से आज़ाद किया। वह खड़ा था, और उसका पौरुष लाल होकर धड़क रहा था। डॉली की लालिमा और लार उस पर चमक रही थी।

"मुझे मेज़ पर ले लो," डॉली ने उठते हुए कहा। उसने लकड़ी की उस बड़ी, मज़बूत कटिंग टेबल की तरफ इशारा किया, जिस पर दिन भर राज कपड़े काटता था। "मैं चाहती हूँ कि जहाँ तुम कैंची चलाते हो, वहां आज मुझे काटो। मुझे तराशो। मुझे नया रूप दो।"

राज ने डॉली को कमर से उठाया और उसे टेबल पर लिटा दिया। टेबल की लकड़ी सख्त और ठंडी थी, लेकिन डॉली का बदन मक्खन जैसा मुलायम और गर्म।

राज उसके ऊपर चढ़ गया। दोनों नंगे थे, सिर्फ डॉली का गीला ब्लाउज अभी भी उसके गले में अटका था। त्वचा से त्वचा का संपर्क बिजली पैदा कर रहा था। राज का बालों वाला सीना डॉली के कोमल स्तनों को दबा रहा था।

राज ने डॉली के गीले ब्लाउज को अभी तक नहीं उतारा था। वह चाहता था कि वह कपड़ा थोड़ा बाधा बने, जिसे हटाने का मज़ा आए। ब्लाउज भीगकर पारदर्शी हो चुका था।

"यह ब्लाउज..." राज ने उसके स्तनों को ब्लाउज के ऊपर से मसला, "आज यह फटेगा।"

उसने हुक खोलने की ज़हमत नहीं उठाई। उसने ब्लाउज के दोनों कप्स को पकड़ा और एक झटके में खींच दिया।

चर्रर्र...

हुक टूट गए और कपड़ा फट गया। डॉली के भारी, गोरे स्तन आज़ाद होकर दाएं-बाएं फैल गए। वे सांसों के साथ उछल रहे थे।

"खा जाओ इन्हें," डॉली ने अपने स्तन उठाकर राज के मुंह पर लगा दिए।

राज ने उन पर अपना चेहरा रख दिया। वह उन्हें चूम रहा था, काट रहा था। उसने एक निप्पल को अपने दांतों के बीच दबाया और हल्का सा खींच लिया।

"आह! राज! जोर से! दर्द दो मुझे!"

डॉली ने अपनी टांगें राज की कमर के गिर्द लपेट लीं और अपनी एड़ियाँ उसकी पीठ पर रगड़ने लगीं। "मुझसे अब सब्र नहीं होता। डालो। मुझे यह पूरा चाहिए। अभी।"

राज ने अपने आप को डॉली के पैरों के बीच सेट किया। उसने अपने लिंग के टोपे को डॉली के मुहाने पर रगड़ा। डॉली का रस वहां पहले से बह रहा था।

"देखना," राज ने उसकी आंखों में झांका, "आज मैं तुम्हें हर तरह से नापूंगा। आज कोई इंची-टेप नहीं होगा, सिर्फ यह होगा।"

उसने एक ही बार में, बिना रुके, पूरा का पूरा अंदर धकेल दिया।

धप्प!

"आह्ह्ह्ह्ह!" डॉली की चीख निकल गई। उसकी पीठ टेबल से ऊपर उठ गई। उसे लगा जैसे वह दो हिस्सों में बंट गई है। "माँ! फाड़ दिया! उफ्फ... कितना मोटा है..."

राज रुका नहीं। उसने उसे एडजस्ट होने का वक्त नहीं दिया। वह उसे पेलने लगा।

थप-थप-थप!

कटिंग टेबल चरमरा रही थी। राज के धक्के बहुत गहरे थे। वह डॉली की कोख तक पहुँच रहा था। हर धक्के के साथ डॉली का शरीर टेबल पर आगे-पीछे हो रहा था।

"हाँ! ऐसे ही! जानवर बन जाओ!" डॉली उसके पसीने से भीगे कंधों को नोच रही थी। उसके नाखून राज की पीठ पर लकीरें बना रहे थे। "मुझे बताओ कि शहर का दर्जी कैसे ठोकता है! मुझे बताओ कि मैं सिर्फ एक पत्नी नहीं, एक औरत हूँ!"

राज ने डॉली के दोनों हाथों को कलाई से पकड़ा और उसके सिर के ऊपर टेबल पर दबा दिया। वह उसे पूरी तरह काबू में कर चुका था। वह उसके ऊपर झुका, उसके होंठों को चूसने लगा और नीचे से उसे हथौड़े की तरह मार रहा था।

डॉली का पूरा शरीर हिल रहा था। उसके स्तन लहरों की तरह उछल रहे थे। पसीना दोनों के बीच गोंद का काम कर रहा था।

"राज... मैं मर जाऊंगी... यह बहुत बड़ा है..." डॉली सिसक रही थी।

"मरने नहीं दूँगा," राज ने उसके कान को काटते हुए कहा। "अभी तो बहुत बाकी है। अभी तो मैंने शुरू किया है।"

कुछ देर बाद, राज रुका। वह हांफ रहा था।

"उठो," उसने आदेश दिया।

डॉली उठी। उसके बाल बिखरे हुए थे, होंठ सूज गए थे।

"बैठो," राज ने टेबल के किनारे की तरफ इशारा किया।‘’

डॉली टेबल के किनारे पर बैठ गई। उसके पैर हवा में लटक रहे थे।

"मेरे ऊपर चढ़ जाओ," डॉली ने अपनी बाहें फैलाईं। "मैं तुम्हें लेना चाहती हूँ।"

राज उसके पैरों के बीच खड़ा हो गया। डॉली ने उसे अपनी बांहों में भरा और अपने ऊपर खींच लिया।

राज ने फिर प्रवेश किया। इस बार डॉली बैठी थी और राज खड़ा था। यह पोज़िशन बहुत गहरी थी। राज डॉली की हर नस को, उसके अंदर की हर दीवार को महसूस कर सकता था।
 
डॉली ने अपनी टांगें राज की पीठ पर क्रॉस कर लीं और वहां लॉक कर दीं। वह राज पर झूल गई।

राज ने उसे गोद में उठा लिया। अब वह हवा में थी, सिर्फ राज के लिंग के सहारे टिकी हुई।

राज उसे गोद में लिए-लिए पेलने लगा।

"ओह गॉड... राज..." डॉली का सिर पीछे लटक गया। "तुम मुझे पागल कर दोगे। तुम बहुत ताकतवर हो।"

राज ने उसे वापस टेबल पर पटका।

"घूम जाओ," उसने आदेश दिया। "मुझे वो डायरी वाला पोज़ चाहिए।"

डॉली समझ गई। वह घुटनों और कोहनियों के बल हो गई। उसका विशाल, गोरा पिछवाड़ा राज के सामने था। टेबल की ऊंचाई एकदम सही थी।

राज ने उसके नितंबों पर हाथ फेरा। वे कांप रहे थे।

"यह..." राज ने एक ज़ोरदार थप्पड़ मारा। चटाक!

"आह! और मारो!" डॉली चिल्लाई। "लाल कर दो!"

राज ने दूसरा थप्पड़ मारा। डॉली का गोरा नितंब लाल हो गया। राज ने उस पर अपनी छाप छोड़ दी थी।

राज ने पीछे से प्रवेश किया।

"स्लप!"

इस बार घर्षण और आवाज़ दोनों तेज़ थी। डॉली का पेट टेबल से दब रहा था। उसके स्तन टेबल की लकड़ी से रगड़ खा रहे थे, जिससे उसे एक अलग ही मज़ा आ रहा था।

"मारो मुझे राज! अपनी इस रंडी को सजा दो!" डॉली चिल्ला रही थी। "मुझे बताओ कि मैं तुम्हारी हूँ!"

राज ने उसके बालों को मुट्ठी में पकड़ा और उसका सिर ऊपर खींचा। टेबल के सामने दीवार पर एक धुंधला आईना लगा था।

"देख," राज ने कहा। "देख कैसे मैं तुझे ले रहा हूँ।"

डॉली ने आईने में देखा। एक सांवला, पसीने से लथपथ मर्द उसकी गोरी पीठ पर झुका हुआ उसे बेरहमी से प्यार कर रहा था। यह नज़ारा—अपनी ही बेबसी और मज़ा—उसे और उत्तेजित कर गया।

"मैं आ रही हूँ राज! मैं नहीं रुक सकती! मैं फट रही हूँ!"

"तो ले ले! सब ले ले! आज कुछ मत बचा!"

राज ने अपनी रफ़्तार बढ़ा दी। टेबल हिल रही थी जैसे भूकंप आया हो।‘

डॉली का शरीर अकड़ने लगा। उसकी योनि राज के लिंग को बुरी तरह निचोड़ने लगी।

"आह्ह्ह्ह्ह!" डॉली एक लंबी, दर्दनाक और सुखद चीख के साथ चरम पर पहुँच गई। उसका शरीर ढीला पड़ गया और वह टेबल पर ढेर हो गई।

लेकिन राज अभी बाकी था। उसे अभी अपनी मंज़िल पानी थी।

उसने डॉली को सीधा किया।

"अभी नहीं," उसने हांफते हुए कहा। "अभी मुझे अपनी प्यास बुझानी है।"

उसने डॉली को टेबल के किनारे पर पीठ के बल लिटाया। उसकी टांगें अपने कंधों पर रख लीं। अब वह उसे बहुत गहराई से देख सकता था। डॉली की योनि खुली हुई थी, लाल और सूजी हुई।

राज ने अंतिम स्प्रिंट शुरू की।

वह मशीन की तरह चल रहा था। पसीना डॉली के पेट और स्तनों पर टपक रहा था।

"हाँ! राज! भर दो मुझे! अपनी निशानी छोड़ दो! मुझे गाभिन कर दो!"

"ले डॉली... ले मेरी जान..."

राज ने एक ज़ोरदार, आखिरी धक्का मारा और खुद को डॉली के अंदर लॉक कर दिया।

उसका शरीर एक धनुष की तरह तन गया। उसने एक जानवर जैसी दहाड़ मारी और अपना सारा, ढेर सारा गर्म, गाढ़ा वीर्य डॉली के अंदर, बहुत गहराई में, उसकी बच्चेदानी के मुहाने पर उड़ेल दिया।

एक... दो... तीन...

फव्वारे की तरह।

डॉली ने उस गर्मी को अपने पेट में महसूस किया। वह गर्मी उसकी रगों में दौड़ गई।

"गर्म है... बहुत गर्म है..." वह बुदबुदाई, राज को कसकर भींचते हुए।

दोनों एक-दूसरे के ऊपर गिर पड़े। टेबल पर सिर्फ उनकी भारी सांसें और बाहर बारिश का शोर था।

काफी देर तक वे वैसे ही रहे। जिस्म से जिस्म सटा हुआ।

राज ने धीरे से बाहर निकाला। एक प्लॉप की आवाज़ आई।

डॉली ने उसे खींचा और अपने पसीने से भीगे सीने से लगा लिया।

"आज तुमने मेरा नक्शा बदल दिया शर्मा जी," डॉली ने नशीली हंसी के साथ कहा। उसकी उंगलियां राज की पीठ पर लकीरें बना रही थीं।

राज ने उसके माथे को चूमा। "अभी तो सिर्फ शुरुआत है डॉली। वो लाल डायरी में बहुत पन्ने हैं। हर पन्ने को हकीकत बनाना है। हर स्केच को तुम्हारे बदन पर उतारना है।"

डॉली ने राज को कसकर पकड़ लिया। उसे पता था कि अब वह इस दुकान, इस टेबल और इस मर्द की गुलाम हो चुकी थी। और उसे यह गुलामी मंज़ूर थी। बाहर बारिश थम रही थी, लेकिन उनके अंदर की आग अभी भी सुलग रही थी।

◆◆◆
 
अध्याय 4: ननद का नाप

स्थान: 'अप्सरा लेडीज बुटीक', राजगढ़

समय: सुबह के 11:30 बजे (तीन दिन बाद)

माहौल: उमस भरी गर्मी और एक नई चुनौती

मानसून की वह तूफानी रात, जिसमें डॉली और राज एक हुए थे, अब राजगढ़ की यादों में दर्ज हो चुकी थी। तीन दिन बीत चुके थे। बारिश थम चुकी थी, लेकिन अपने पीछे एक भारी, चिपचिपी उमस छोड़ गई थी।

यह वह मौसम था जब कपड़े बदन से दूसरी चमड़ी की तरह चिपक जाते हैं, जब पसीना इत्र से ज्यादा महकता है, और जब हवा में एक अजीब सी बेचैनी तैरती रहती है।

राज अपनी दुकान की सफाई करवा रहा था। वह काउंटर पर बैठा पिछले कुछ दिनों के आर्डर और पैसों का हिसाब लगा रहा था। उसकी दुकान का एसी पूरी ताकत से चल रहा था, लेकिन राज के अंदर का तापमान कम नहीं हो रहा था। उसका दिमाग हिसाब-किताब में कम और डॉली के उस मखमली, भरे-पूरे बदन में ज्यादा उलझा हुआ था।

डॉली के साथ बिताई वह रात उसके पौरुष के लिए एक विजय-स्तंभ थी। उसने न सिर्फ एक रईस महिला को भोगा था, बल्कि उसे अपनी उंगलियों का गुलाम बना लिया था। उसे याद आ रहा था कि कैसे कटिंग टेबल पर डॉली ने अपनी रईसी भूलकर एक प्यासी औरत की तरह व्यवहार किया था।

दुकान में सन्नाटा था। तभी, बाहर सड़क पर एक तेज़, रफ और लगातार बजते हॉर्न की आवाज़ ने उस सन्नाटे को चीर दिया।

पूँ-पूँ-पूँ!

राज ने कलम रोक दी और चौंककर कांच के दरवाज़े से बाहर देखा।

एक चमकदार लाल रंग की स्कूटी दुकान के ठीक सामने आकर रुकी थी। स्कूटी पर एक लड़की बैठी थी। उसने अपने सिर से हेलमेट उतारा और एक फिल्मी अदा के साथ अपने बालों को झटका। उसके काले, रेशमी और स्ट्रेट बाल हवा में लहराए और उसके कंधों पर बिखर गए। उसने अपनी स्कूटी को स्टैंड पर लगाया और एक आत्मविश्वास के साथ दुकान की सीढ़ियां चढ़ी।

कांच का दरवाज़ा खुला।

एक झोंका अंदर आया—महंगे डिओडरेंट, च्युइंग गम की मिठास और एक ताज़ा, कसैली जवानी की गंध।

वह लड़की दुकान के अंदर दाखिल हुई।

राज की नज़रें उस पर जम गईं। यह डॉली नहीं थी। डॉली अगर भरी-पूरी, पकी हुई और रसदार फसल थी, तो यह लड़की एक कच्ची, तनी हुई और नशीली कली थी।

यह डॉली की ननद (पति की चचेरी छोटी बहन) थी। शहर के एक महंगे कॉलेज में पढ़ने वाली, गर्मियों की छुट्टियों में गाँव आई हुई मॉडर्न और बेबाक लड़की।

उसका शरीर किसी एथलीट की तरह गठीला, कसा हुआ और ऊर्जा से भरा था।

राजगढ़ की औरतों के विपरीत, उसने साड़ी या सूट नहीं पहना था। उसने गाँव के लिहाज को ताक पर रखकर एक स्किन-टाइठ आसमानी रंग की जींस और सफेद रंग का एक टॉप पहना था।

टॉप इतना छोटा था कि उसकी सपाट, गोरी कमर और नाभि का गहरा, गोल गड्ढा साफ दिखाई दे रहा था। उसके कानों में बड़े सिल्वर हुप्स थे और होठों पर चमकीला पिंक लिप-ग्लॉस। उसकी चाल में एक ऐसा लोच था जैसे कोई बिल्ली अपने शिकार की तरफ बढ़ रही हो।

विद्या ने दुकान में कदम रखा और अपनी आंखों पर लगा बड़ा काला चश्मा उतारकर अपने बालों में फंसा लिया। उसने दुकान का जायजा ऐसे लिया जैसे वह किसी महल की रानी हो और यह दुकान उसकी प्रजा का कोई छोटा सा घर। उसकी नज़रें कपड़ों के थान, डमियों और अंत में राज पर जाकर टिकीं।

"एक्सक्यूज़ मी," विद्या की आवाज़ में एक शहरी खनक, अंग्रेजी लहजा और थोड़ा अहंकार था। "राज कौन है यहाँ?"

राज काउंटर से खड़ा हुआ। उसने अपनी शर्ट ठीक की। "जी, मैं ही राज हूँ। कहिए, क्या सेवा कर सकता हूँ?"

विद्या काउंटर के पास आई। वह चलने में अपनी कमर को जानबूझकर मटका रही थी। वह काउंटर पर एक हाथ रखकर खड़ी हो गई। इस मुद्रा में उसका सीना आगे की तरफ तन गया। उसका टॉप टाइट था, और उसके अंदर कैद उसके छोटे लेकिन बेहद सुडौल और सख्त स्तन साफ पता चल रहे थे।

वे डॉली की तरह भारी और लटके हुए नहीं थे, बल्कि सेब की तरह गोल, सख्त और गुरुत्वाकर्षण को चुनौती देते हुए तने हुए थे।

"तो तुम हो वो..." विद्या ने राज को ऊपर से नीचे तक स्कैन किया। उसकी बेबाक नज़रें राज के चौड़े कंधों, उसकी बांहों की नसों और उसकी छाती के बालों पर अटकीं जो शर्ट के खुले बटन से झांक रहे थे। उसके होठों पर एक शरारती, लगभग अश्लील मुस्कान आ गई।

"भाभी... मतलब डॉली भाभी तुम्हारी बहुत तारीफ करती हैं। कल रात डिनर पर कह रही थीं कि 'सिटी बुटीक' वाले शर्मा जी के हाथों में जादू है। ऐसा जादू कि इंसान अपनी सुध-बुध खो दे।"

राज समझ गया कि यह डॉली की रिश्तेदार है और शायद डॉली ने इशारों में कुछ कहा है।

"भाभी जी का बड़प्पन है मैम," राज ने विनम्रता से कहा, हालांकि उसकी नज़रें विद्या की उस नंगी कमर पर फिसल रही थीं। "मैं तो बस नाप लेता हूँ और कपड़े सिलता हूँ। कोशिश करता हूँ कि फिटिंग अच्छी आए।"

"सिर्फ कपड़े सिलते हो या कुछ और भी?" विद्या ने च्युइंग गम चबाते हुए, बहुत धीमे और द्विअर्थी लहजे में पूछा। उसने एक बड़ा सा गुब्बारा फुलाया और उसे पट की आवाज़ के साथ फोड़ दिया। उसकी आंखों में एक चमक थी जो कह रही थी कि वह सब जानती है, या कम से कम उसे शक ज़रूर है और वह उस शक का मज़ा लेना चाहती है।

राज के चेहरे पर कोई शिकन नहीं आई।

उसने अपनी पेशेवर मुस्कान ओढ़ ली, जो उसने शहर में सीखी थी। "ग्राहक की तसल्ली ही मेरा काम है, मैम। अगर फिटिंग दिल को छू जाए, तो उसे आप जादू कह सकती हैं। बताइए, आपके लिए क्या बना सकता हूँ?"

विद्या ने अपने कीमती बैग से एक मुड़ा हुआ पन्ना (मैगजीन का कटआउट) निकाला और काउंटर पर राज की तरफ सरका दिया।

"अगले हफ्ते मेरी कजिन की शादी है। मुझे यह चाहिए।"

राज ने तस्वीर देखी। वह एक बेहद बोल्ड, बैकलेस चोली और लहंगे का डिज़ाइन था। चोली का डिज़ाइन ऐसा था कि वह सिर्फ डोरियों के सहारे टिकी थी। आगे से गला इतना गहरा था कि सब कुछ दिखने की कगार पर था, और पीछे से तो कपड़ा था ही नहीं।

"यह..." राज ने तस्वीर देखी और फिर विद्या के युवा, कसैले बदन को। "यह डिज़ाइन काफी बोल्ड है मैम। राजगढ़ में... मतलब गाँव के हिसाब से..."

"गाँव की चिंता तुम मत करो," विद्या ने उसे बीच में ही टोक दिया। उसकी आवाज़ में गर्मी थी। "मुझे पहनना है, गाँव वालों को नहीं। और वैसे भी..." वह काउंटर पर थोड़ा और झुक गई। इस हरकत से उसके टॉप का गला थोड़ा ढीला हो गया और राज को उसके क्लीवेज की एक झलक मिल गई।

वहां की त्वचा दूध जैसी सफेद, बेदाग और चिकनी थी। "...वैसे भी, मैं शहर की लड़की हूँ शर्मा जी। मुझे ढका-छुपा रहना पसंद नहीं। मुझे हवा चाहिए। मेरे बदन को खुलकर सांस लेना पसंद है।"

राज के गले में सूखापन आ गया। यह लड़की खतरनाक थी। यह डॉली की तरह दबी हुई, प्यासी औरत नहीं थी; यह एक खुली हुई आग थी जो खुद जलने और जलाने आई थी।

"बन जाएगा," राज ने कहा, अपनी आवाज़ को स्थिर रखते हुए। "लेकिन इसके लिए नाप बहुत सटीक चाहिए। यह कपड़ा खिंचता नहीं है, और डिज़ाइन ऐसा है कि अगर फिटिंग एक सूत भी ढीली हुई, तो कपड़ा बदन पर टिकेगा नहीं। फिटिंग एकदम शरीर से चिपकी होनी चाहिए, जैसे..."

"जैसे दूसरी चमड़ी?" विद्या ने उसकी बात पूरी की और एक आंख मारी। "सुना है तुम 'दूसरी चमड़ी' बनाने में एक्सपर्ट हो। तो ले लो नाप।" उसने अपनी बाहें फैला दीं। "किसने रोका है? अभी ले लो।"
 
दुकान में उस समय दो और ग्राहक भी थीं—गाँव की साधारण औरतें जो कोने में खड़े होकर कपड़े देख रही थीं। राज थोड़ा हिचकिचाया। वह विद्या का खेल समझ रहा था। वह उसे पब्लिक में उकसा रही थी।

"मैम, अभी दुकान में भीड़ है। और इस डिज़ाइन के लिए नाप तसल्ली से लेना होगा। ट्रायल रूम भी छोटा पड़ सकता है। अगर आप..."

"अगर मैं क्या?" विद्या ने अपनी एक भौंह उठाई। "तुम्हें शर्म आ रही है क्या? दर्जी होकर शर्म? या फिर..." उसने अपनी आवाज़ धीमी की, "या फिर तुम्हें डर है कि भीड़ में तुम्हारा हाथ फिसल गया तो तमाशा हो जाएगा?"

फिर उसने उन औरतों की तरफ देखा और जानबूझकर ज़ोर से बोली, "अरे, शर्मा जी को लगता है कि मेरा नाप लेना बहुत मुश्किल काम है।"

राज को उसकी यह अदा पसंद आई। यह लड़की उसे चुनौती दे रही थी। और राज चुनौतियों से पीछे हटने वाला मर्द नहीं था।

"डर नहीं लगता मैम," राज ने उसकी आंखों में देखा, और अपनी नज़रें उसकी नंगी नाभि पर टिका दीं। "बस मैं नहीं चाहता कि मेरा काम कोई और देखे। मेरे काम में 'प्राइवेसी' बहुत ज़रूरी है। जब मैं नाप लेता हूँ, तो मुझे और कपड़े के बीच कोई तीसरा नहीं चाहिए होता।"

विद्या ने अपने रसीले होंठों को दांतों तले दबाया। उसे राज का आत्मविश्वास और उसकी घूरने की शैली पसंद आई। उसे लगा था कि वह इस गाँव के दर्जी को शर्मिंदा कर देगी, लेकिन यह दर्जी तो खिलाड़ी निकला।

"ठीक है," उसने कहा, काउंटर से अपनी तस्वीर वापस लेते हुए। "तो फिर कब आऊं? जब दुकान खाली हो? जब शटर गिरा हो?"

"दोपहर को," राज ने कहा। "1:30 बजे। लंच टाइम में मैं दुकान का शटर आधा गिरा देता हूँ। स्टाफ खाना खाने जाता है। तब कोई नहीं आता। तब हम तसल्ली से... बहुत गहराई से नाप ले सकेंगे।"

"1:30 बजे," विद्या ने अपनी कलाई पर बंधी घड़ी देखी। "अभी एक घंटा बाकी है।"

वह काउंटर से हटी।

"ठीक है, मैं घूमकर आती हूँ। लेकिन शर्मा जी..." वह दरवाज़े तक जाकर रुकी और पीछे मुड़ी। उसने अपनी जीभ से अपने ऊपरी होंठ को गीला किया। धूप में उसकी आकृति बेहद कामुक लग रही थी। जींस में उसकी टांगें लंबी और सुडौल दिख रही थीं।

"तैयार रहना। मैं भाभी की तरह सीधी-सादी, घरेलू औरत नहीं हूँ। मेरे नखरे बहुत हैं। और मुझे वही पसंद आता है जो मेरे नखरे उठा सके... और मुझे उठा सके।"

वह चली गई। उसकी टाइट जींस में उसका गोल, कसा हुआ पिछवाड़ा जिस तरह से मटक रहा था, उसे देखकर राज की सांसें अटक गईं। यह पिछवाड़ा डॉली के भारी नितंबों जैसा नहीं था, यह एक छोटे, सख्त और एथलेटिक फुटबॉल जैसा था जिसे मुट्ठी में भरने का, उस पर थप्पड़ मारने का मज़ा ही कुछ और होगा।

राज ने काउंटर पर मुक्का मारा। एक घंटा। यह एक घंटा काटना मुश्किल होने वाला था। डॉली एक गहरा दरिया थी जिसमें डूबने का सुकून था, लेकिन विद्या... विद्या वो नंगी बिजली का तार थी जिसे छूने पर झटका लगना तय था।

और राज को आज वही हाई-वोल्टेज झटका चाहिए था। उसने अपने हेल्पर को 50 रुपये दिए और कहा, "जाओ, आज लंच के बाद 3 बजे आना। मुझे कुछ ज़रूरी डिज़ाइन बनाने हैं।"

दुकान खाली हो गई। राज ने घड़ी देखी। 11:45।

सिर्फ 45 मिनट। उसने ट्रायल रूम की सफाई की। उसने एसी का तापमान और कम कर दिया। आज उसे पता था कि ट्रायल रूम में गर्मी बहुत बढ़ने वाली है।

दोपहर की धूप बाज़ार पर हावी हो चुकी थी। सड़कें सुनसान थीं। राज ने दुकान का शटर आधा गिरा दिया था, जिसका मतलब था 'परेशान न करें'। एसी अपनी पूरी ताकत से चल रहा था, लेकिन दुकान के अंदर का माहौल किसी बारूद के ढेर जैसा था, जिसे बस एक चिंगारी की ज़रूरत थी।

ठीक 1:40 पर शटर के नीचे से किसी के झुककर आने की आहट हुई।

विद्या वापस आ चुकी थी।
 
शटर के नीचे से झुकते वक्त उसकी टाइट जींस उसके नितंबों पर तन गई थी, और उसका क्रॉप-टॉप थोड़ा ऊपर हो गया था। राज ने उस नज़ारे को जी भर के देखा।

अंदर आते ही विद्या ने सबसे पहले पीछे मुड़कर दुकान की कुंडी लगा दी। खट!

"अब कोई डिस्टर्ब नहीं करेगा," उसने पलटकर राज से कहा, अपने बालों को ठीक करते हुए। "सिर्फ तुम, मैं और तुम्हारा वो... इंची-टेप।"

राज काउंटर से बाहर आया। उसने विद्या को देखा। एसी की ठंडक में विद्या के निप्पल उसके पतले, सफेद क्रॉप-टॉप के अंदर अकड़ गए थे और कपड़े पर दो छोटे, सख्त बिंदुओं की तरह उभर आए थे। राज की नज़रें वहीं अटक गईं। विद्या ने यह नोटिस किया। उसने खुद को ढका नहीं, बल्कि अपने कंधों को पीछे खींचकर अपना सीना और तान दिया।

"घूरना बंद करो और काम शुरू करो," विद्या ने कहा, लेकिन उसकी आवाज़ में गुस्सा नहीं, आमंत्रण था। "कहाँ चलना है? ट्रायल रूम?"

"हाँ," राज ने इशारा किया। "वही सही जगह है।"

वे ट्रायल रूम में गए। राज ने वहां की पीली रोशनी जला दी। चारों तरफ आईने थे। विद्या आईने के सामने खड़ी हो गई। उसने अपने होंठों पर फिर से लिप-ग्लॉस लगाया। वह आईने में राज को देख रही थी जो उसके पीछे खड़ा था।

"सुना है तुम भाभी को बहुत अच्छी फिटिंग देते हो," विद्या ने अचानक कहा, राज की आंखों में आईने के जरिए देखते हुए। "कल रात मैं उनके कमरे में गई थी। वो लाल ब्लाउज पहनकर आईने के सामने खड़ी थीं। वो... वो बहुत खुश लग रही थीं। कुछ ज्यादा ही खुश। और उनकी गर्दन पर..." विद्या हंसी, एक बहुत ही मतलबी हंसी, "...एक लाल निशान था। मच्छर का तो नहीं लग रहा था।"

राज के दिल की धड़कन बढ़ गई। यह लड़की बहुत तेज़ थी।

"मच्छर आजकल बहुत हैं," राज ने सधे हुए स्वर में कहा, लेकिन उसकी आंखों में एक चमक आ गई। "लेकिन मेरा काम सिर्फ फिटिंग देना है।"

"वही तो," विद्या ने घूमकर राज का सामना किया। "मुझे भी वही 'फिटिंग' चाहिए। वो निशान वाली फिटिंग।"

उसने अपने दोनों हाथ अपनी कमर पर रखे।

"तो? कैसे लोगे नाप?"

राज ने अपना इंची-टेप उठाया। "नाप लेने के लिए..." राज ने कहा, उसका गला थोड़ा भारी हो रहा था, "आपको थोड़ा सहयोग करना होगा। यह टॉप... यह नाप में बाधा बनेगा।"

विद्या ने राज की आंखों में देखा। "क्या उतारना है? यह टॉप?"

इससे पहले कि राज कुछ कहता, विद्या ने अपने दोनों हाथ क्रॉस करके अपने टॉप का निचला हिस्सा पकड़ा और उसे एक झटके में ऊपर खींच दिया।

राज की सांसें थम गईं।

विद्या ने टॉप उतारा नहीं, बस उसे अपनी गर्दन तक उठा लिया, जहाँ वह एक हार की तरह अटक गया।

उसके नीचे उसने एक नियॉन पिंक रंग की स्पोर्ट्स ब्रा पहनी थी।

नज़ारा बेहद कामुक और आधुनिक था। डॉली के भारी, ढके हुए बदन के विपरीत, यह नज़ारा एकदम अलग था। विद्या का पेट एकदम सपाट और गोरा था, जिस पर हल्की-हल्की एब्स की लकीरें थीं। उसकी पसलियों की हल्की झलक दिख रही थी।

और उस टाइट स्पोर्ट्स ब्रा में कैद उसके तने हुए, गोल और सख्त स्तन एक-दूसरे से सटे हुए थे। ब्रा इतनी टाइट थी कि उसके स्तनों को दबाकर बीच में एक गहरी दरार बना रही थी। उसकी त्वचा पर पसीने की एक हल्की परत चमक रही थी।

"लो," विद्या ने अपने हाथ ऊपर उठाए रखे, जिससे उसका सीना और तन गया और उसकी बगलें राज के सामने आ गईं जो एकदम साफ और चिकनी थीं। "अब ले लो नाप। या कुछ और भी देखना है?"

राज ने एक कदम आगे बढ़ाया। अब वह विद्या के बिल्कुल करीब था। विद्या के शरीर से एक महंगी परफ्यूम और फ्रेश, युवा पसीने की गंध आ रही थी। यह गंध कच्ची जवानी की गंध थी, जो नशीली थी।

राज ने टेप को उसकी बांहों के नीचे से निकाला। जब वह टेप लेकर आगे आया, तो उसके हाथ और कलाई विद्या की नंगी कमर और पसलियों से रगड़ खा गए। विद्या की त्वचा बहुत चिकनी, रेशमी और गर्म थी।

"सांस रोको," राज ने उसके कान के पास कहा।

विद्या ने राज की आंखों में देखते हुए गहरी सांस ली। उसका सीना फूल गया और राज के हाथों से बस इंच भर दूर रह गया। राज ने टेप को उसके स्तनों के सबसे उभरे हुए हिस्से पर कसा। स्पोर्ट्स ब्रा के कपड़े के नीचे उसके निप्पल की कठोरता राज को टेप के जरिए महसूस हो रही थी।

"बत्तीस..." राज बड़बड़ाया। "परफेक्ट। एकदम ठोस।"

उसने टेप को ढीला नहीं किया। वह विद्या के स्तनों के कसाव को महसूस कर रहा था।

"टाइट चाहिए ना?" राज ने पूछा।

"इतना टाइट..." विद्या ने अपनी कमर को थोड़ा आगे धकेला, जिससे उसका नंगा पेट राज के कपड़ों से टच हो गया। राज को उस स्पर्श से करंट लग गया। "...इतना टाइट कि मुझे पता चले कि किसी मर्द ने इसे बनाया है। मुझे ढीले कपड़े पसंद नहीं। मुझे जकड़न पसंद है।"

यह इशारा काफी था। राज ने अपना संयम खो दिया।

उसने टेप छोड़ दिया। टेप विद्या के कंधों पर लटक गया।

राज ने अपने दोनों हाथ विद्या की नंगी, पतली कमर पर रख दिए। उसने अपने अंगूठे उसकी जींस के बेल्ट लूप में फंसा दिए और अपनी उंगलियां उसकी पीठ की त्वचा में गड़ा दीं।

"तुम्हारी कमर..." राज ने भारी आवाज़ में कहा, "बहुत पतली है। इसे तो मैं अपनी एक बांह में लपेट सकता हूँ। और तोड़ भी सकता हूँ।"

विद्या ने हंसी के साथ अपनी गर्दन पीछे झुका दी, जैसे वह उस स्पर्श का आनंद ले रही हो। "तो लपेट कर दिखाओ ना। सिर्फ बातें करोगे शर्मा जी? या कुछ करोगे भी?"

राज ने उसे अपनी तरफ खींचा। विद्या का टाइट, गठीला शरीर राज से टकराया।

राज का एक हाथ उसकी नंगी पीठ पर ऊपर की तरफ रेंगा। उसकी उंगलियां स्पोर्ट्स ब्रा के स्ट्रैप के नीचे घुस गईं। उसने स्ट्रैप को खींचा और छोड़ दिया।

चटाक!

इलास्टिक ने विद्या की गोरी त्वचा पर हल्की चोट की।

"आह!" विद्या ने मजे से सिसकी ली। "बदमाश... दर्जी हो या जल्लाद?"

"तुम्हें बदमाशी ही पसंद है," राज ने कहा। उसने अपना चेहरा विद्या की गर्दन और कंधे के बीच के हिस्से में गड़ा दिया। वह वहां चूमने लगा, सूंघने लगा।

विद्या ने राज के बालों को पकड़ लिया और मुट्ठी में भींच लिया। "हाँ... मुझे जंगलीपन पसंद है। भाभी की तरह मुझे धीमा, उबाऊ प्यार नहीं चाहिए। मुझे करंट चाहिए। मुझे वो चाहिए जो मुझे हिला दे।"

राज ने उसे अचानक घुमा दिया। अब विद्या का चेहरा आईने की तरफ था और राज उसके पीछे।

विद्या ने आईने में देखा। वह लगभग अर्धनग्न थी, और राज उसके पीछे खड़ा उसे काबू कर रहा था।

राज ने विद्या की जींस का बटन देखा। जींस बहुत टाइट थी, जो उसकी जांघों और कूल्हों पर दूसरी चमड़ी की तरह कसी हुई थी।

"यह जींस..." राज ने उसके कान को अपने दांतों से काटते हुए कहा, "नाप में अड़चन डाल रही है। लहंगे के लिए कमर का नाप नीचे से लेना होगा। बहुत नीचे से।"

"तो खोल दो," विद्या ने आईने में राज की आंखों में चुनौती दी। "मेरे हाथ ऊपर हैं। मैं नहीं खोलूँगी। तुम्हें ही खोलना होगा। इंतज़ार किसका है?"

राज ने अपना हाथ आगे बढ़ाया और विद्या की जींस के बटन पर रखा।

खट... बटन खुला।

फिर उसने जिप के हैंडल को पकड़ा और धीरे-धीरे नीचे सरकाया।

ज़िप्प...

धातु की आवाज़ सन्नाटे में गूंज गई। जिप खुलने से जींस का वी-शेप खुल गया और विद्या का सफेद, चिकना पेट और नीचे का हिस्सा दिखने लगा।
 
राज ने अपने हाथ जींस के अंदर डाले। जींस इतनी टाइट थी कि उसे हाथ डालने के लिए मेहनत करनी पड़ी। वहां विद्या ने एक छोटी सी पैंटी पहनी थी। राज के हाथ उसके कूल्हों की नंगी, गर्म त्वचा को छू रहे थे।

विद्या का पिछवाड़ा सख्त, गोल और करत से तराशा हुआ था। राज ने उसे अपनी मुट्ठी में भर लिया और ज़ोर से दबाया।

"उफ्फ! राज!" विद्या चिल्लाई। "धीरे नहीं... और जोर से... मसलो इसे... यह प्लास्टिक का नहीं है..."

राज ने उसे बुरी तरह भींच लिया। विद्या ने अपने पैर चौड़े कर लिए ताकि राज को जगह मिल सके।

"तुमने सही कहा था," राज ने उसकी गर्दन को पीछे से काटते हुए कहा, "तुम्हारे नखरे बहुत हैं। लेकिन मुझे नखरे तोड़ने आते हैं।"

राज ने जींस को घुटनों तक नीचे खींच दिया। विद्या ने अपने पैरों से जींस को उतार फेंका।

अब वह सिर्फ अपनी पिंक स्पोर्ट्स ब्रा और उस छोटी सी सफेद पैंटी में खड़ी थी। उसका युवा, एथलेटिक शरीर आईने में चमक रहा था। उसकी जांघें गठीली थीं, जिनमें एक भी इंच अतिरिक्त चर्बी नहीं थी।

राज की सांवली बाहें उसके गोरे पेट पर कसी हुई थीं।

विद्या ने अपना पिछवाड़ा पीछे की तरफ राज के क्रॉच पर रगड़ना शुरू किया। उसे राज के सख्त लिंग का अहसास हो रहा था जो पैंट के कपड़े के बावजूद लोहे जैसा लग रहा था और उसे पीछे से पोक कर रहा था।

"ओह..." विद्या ने अपनी आंखें बंद कर लीं और सिर पीछे राज के कंधे पर टिका दिया। "यह तो... यह तो बहुत बड़ा लग रहा है। क्या भाभी को यह मिलता है?"

"यह सिर्फ उसके लिए है जो इसे संभाल सके," राज ने उसके पेट पर चुंबन लिया।

"मैं संभाल लूँगी," विद्या ने पलटकर राज की आंखों में देखा। उसकी आंखों में वासना की आग थी। "मुझे कम मत समझना। मैं शहर की लड़की हूँ। मुझे बड़े खिलौनों से खेलना आता है। निकालो इसे। मुझे देखना है।"

राज ने उसे ट्रायल रूम की दीवार से सटा दिया।

"तो खेल शुरू करें?" राज ने पूछा।

"करो," विद्या ने कहा। "लेकिन याद रखना, अगर मुझे मज़ा नहीं आया, तो मैं पूरे गाँव में शोर मचा दूँगी कि शहर का दर्जी फुस्सी बम है।"

राज हंसा। एक क्रूर हंसी। "शोर तो तुम मचाओगी विद्या... लेकिन मजे से। और वो शोर सिर्फ इस कमरे में गूंजेगा।"

राज ने विद्या को दीवार से सटा रखा था। एसी की ठंडक और जिस्मों की गर्मी मिलकर एक नशीला माहौल बना रहे थे। विद्या की स्पोर्ट्स ब्रा अभी भी उसके शरीर पर थी, लेकिन राज के हाथ अब उसके अंदर घुसपैठ कर चुके थे।

राज ने ब्रा के नीचे से हाथ डालकर विद्या के छोटे, सख्त स्तनों को पकड़ लिया। वे हथेली में पूरे समा रहे थे, लेकिन उनका कसाव किसी कच्चे आम जैसा था।

"आह्ह्ह..." विद्या ने अपनी पीठ अकड़ा ली। "तुम्हारे हाथ... बहुत खुरदरे हैं... मुझे खुरदरापन पसंद है।"

राज ने उसके निप्पल को अपनी उंगलियों के बीच मरोड़ दिया।

"चीखना मत," राज ने उसके होंठों पर अपना अंगूठा रखा। "बाहर सड़क पर आवाज़ जा सकती है।"

"जाए तो जाने दो," विद्या ने उसका अंगूठा अपने मुंह में ले लिया और उसे चूसने लगी। उसकी आंखों में एक जंगली चमक थी। "उन्हें पता चलने दो कि अंदर क्या हो रहा है।"

राज ने अपनी शर्ट उतार फेंकी। उसका पसीने से चमकता सीना विद्या के सामने था। विद्या ने अपने हाथों से उसकी छाती को टटोला। उसके नाखूनों ने राज की छाती पर खरोंच मारी।

"फिट हो..." उसने राज के एब्स पर उंगली फेरी। "गाँव के अंकल जैसे नहीं हो। इसीलिए भाभी तुम पर लट्टू हैं।"

उसने राज की बेल्ट पर हाथ रखा। "इसे खोलो।"

राज ने उसकी मदद नहीं की। वह देखना चाहता था कि यह 'शहर की लड़की' कितनी आगे जा सकती है।

विद्या ने बेल्ट खींची, बटन खोला और जिप नीचे की। उसने अपना हाथ अंदर डाला और राज के अंडरवियर के ऊपर से उसके लिंग को पकड़ लिया।

"बाप रे..." विद्या की आंखें फैल गईं। उसकी मुट्ठी में वह पूरा नहीं आ रहा था। "यह तो सच में... यह तो बहुत मोटा है। यह तो किसी घोड़े जैसा है।"

उसने अंडरवियर को नीचे खींच दिया। राज का विशाल, काला और नसों से भरा हुआ लिंग आज़ाद होकर उसके सामने तन गया। वह विद्या के चेहरे के सामने झूल रहा था।

विद्या घुटनों के बल बैठ गई। वह उसे एक नई, रोमांचक चीज़ की तरह देख रही थी।

"इसे चखना है मुझे," विद्या ने कहा। "देखूं तो सही कि भाभी किस चीज़ की दीवानी हैं।"

उसने बिना किसी हिचकिचाहट के उसे अपने मुंह में ले लिया।

उसका मुंह छोटा था, और राज का साइज़ बड़ा।

"गगग..." विद्या के गले से आवाज़ आई। वह उसे ले नहीं पा रही थी, लेकिन कोशिश पूरी कर रही थी। वह उसे लॉलीपॉप की तरह चाट रही थी, उसके टोपे को अपनी जीभ से गुदगुदा रही थी।

राज ने उसका सिर पकड़ लिया। वह उसकी पोनीटेल को खींच रहा था। उसे विद्या का यह समर्पण पसंद आ रहा था।

"और अंदर... विद्या... गले तक लो..." राज ने हुक्म दिया।

विद्या ने अपनी आंखें ऊपर कीं। वह चुनौती स्वीकार कर रही थी। उसने एक गहरी सांस ली और उसे गले तक उतारने की कोशिश की। उसकी आंखों से पानी आ गया, उसका मेकअप खराब हो गया, लेकिन उसने छोड़ा नहीं।

राज को लगा जैसे वह फट जाएगा। इस लड़की का उत्साह खतरनाक था।

कुछ मिनटों बाद, राज ने उसे उठाया।

"खड़ी हो जाओ," उसने कहा। "अब मुझे तुम्हें नापना है। अंदर से। इंच-इंच।"
 
विद्या खड़ी हो गई। उसकी सांसें तेज़ थीं। उसने अपनी पैंटी को लात मारकर उतार दिया। अब वह नीचे से पूरी तरह नंगी थी। उसका 'त्रिकोण' छोटा और साफ सुथरा था, जिस पर वैक्स किया हुआ था। उसकी योनि की दरार गुलाबी और नम थी।

"मुझे गोद में उठाओ," विद्या ने आदेश दिया। "मैं ज़मीन पर पैर नहीं रखना चाहती। मुझे हवा में करो।"

राज ने उसे अपनी मज़बूत बांहों में उठा लिया। विद्या हल्की थी, किसी गुड़िया की तरह। उसने अपनी टांगें राज की कमर पर लपेट लीं और अपनी बाहें उसकी गर्दन में डाल दीं। उसका नंगा निचला हिस्सा राज के सख्त लिंग पर रगड़ खा रहा था।

"दीवार से लगाओ मुझे," विद्या ने राज के कान में कहा, उसकी कान की लौ को काटते हुए।

राज ने उसकी पीठ को आईने वाली दीवार से सटा दिया। कांच की ठंडक ने विद्या को सिहरने पर मजबूर कर दिया।

राज ने अपने लिंग के टोपे को विद्या के गीले मुहाने पर सेट किया।

"तैयार?" राज ने पूछा।

"फाड़ दो," विद्या ने उसके कंधे पर दांत गड़ा दिए। "रुको मत। बस डाल दो।"

राज ने एक ज़ोरदार धक्का मारा।

धप्प!

विद्या की योनि बहुत तंग थी। एक कुंवारी कली की तरह। रास्ता संकरा था।

"आह्ह्ह्ह्ह!" विद्या ज़ोर से चिल्लाई। उसका चेहरा दर्द से लाल हो गया। "माँ! बहुत बड़ा है! राज... यह नहीं जा रहा... यह मुझे चीर देगा..."

"जाएगा," राज ने कहा। "सांस छोड़ो। ढीला छोड़ो खुद को।"

उसने थोड़ा पीछे खींचा, विद्या के नितंबों को फैलाया और फिर एक और धक्का मारा।

इस बार वह बाधाओं को तोड़ता हुआ आधा अंदर चला गया।

विद्या की आंखों से आंसू निकल आए, लेकिन चेहरे पर मुस्कान थी। दर्द और मज़ा एक साथ।

"पूरा... पूरा डालो..." वह सिसकी। "रुकना मत।"

राज ने तीसरा और आखिरी धक्का मारा।

वह जड़ तक समा गया।

विद्या का शरीर दीवार पर चढ़ गया। उसने राज को इतनी जोर से भींचा कि राज की सांस रुक गई। उसका योनि मार्ग राज के लिंग को किसी दस्ताने की तरह जकड़ चुका था।

"अब तुम मेरी हो," राज ने कहा और उसे पेलना शुरू किया।

हवा में लटके हुए।

थप-थप-थप!

राज के धक्के बहुत ताकतवर थे। वह विद्या को दीवार पर ठोक रहा था। विद्या का सिर दीवार से टकरा रहा था। उसके छोटे स्तन स्पोर्ट्स ब्रा में उछल रहे थे।

"हाँ! राज! हाँ!" विद्या उसके गालों को चूम रही थी, चाट रही थी। "मुझे तुम्हारी रंडी बनना है! भाभी से ज्यादा मज़ा दो मुझे! बताओ कि मैं उनसे बेहतर हूँ!"

यह मुकाबला था। विद्या डॉली से बेहतर साबित होना चाहती थी, और राज उसे उसकी औकात और जवानी का अहसास दिला रहा था।

राज ने उसकी स्पोर्ट्स ब्रा को ऊपर खींच दिया। उसके स्तन बाहर आ गए। राज ने झुककर उसके निप्पल को मुंह में भर लिया। वह उसे चूस रहा था और नीचे से धक्के मार रहा था।

विद्या पागल हो गई। "काट लो! निशान बना दो! मुझे कॉलेज में सबको दिखाना है! मुझे चाहिए कि यह दर्द रहे!"

राज की टांगें अब कांपने लगी थीं, लेकिन वह रुका नहीं। विद्या का कसाव जबरदस्त था। वह राज के लिंग को निचोड़ रही थी।

"मैं आ रही हूँ राज! मैं आ रही हूँ! जल्दी करो!" विद्या चिल्लाई। उसका शरीर अकड़ गया। उसने राज की कमर पर अपनी टांगों की पकड़ और मज़बूत कर ली। उसकी योनि में स्पंदन शुरू हो गए।

उस कसाव ने राज का बांध तोड़ दिया।

"विद्या... मेरी जान... आह्ह्ह!"

राज ने उसे दीवार से पूरी ताकत से दबाया, खुद को अंदर गहरा धंसाया और अपने वीर्य की गर्म, तेज़ धारें उसके अंदर, उसकी कोख की गहराई में छोड़ दीं।

एक... दो... तीन... चार...

विद्या ने उस गर्मी को महसूस किया। वह हांफ रही थी, उसकी आंखें पलट गई थीं।

"गर्म है..." वह बड़बड़ाई। "बहुत सारा है... तुमने मुझे भर दिया..."

राज ने उसे धीरे से नीचे उतारा। विद्या के पैर ज़मीन पर टिक नहीं रहे थे। वह लड़खड़ा गई। राज ने उसे थाम लिया।

दोनों वहीं फर्श पर, आईनों के बीच बैठ गए। पसीने में लथपथ।

विद्या ने अपनी जांघों के बीच देखा। वहां से राज का और उसका मिला-जुला रस बह रहा था और फर्श पर गिर रहा था।

उसने अपनी उंगली से उसे छुआ और अपने मुंह में ले लिया।

"तुम्हारा स्वाद..." उसने राज को देखकर एक कामुक मुस्कान दी। "अजीब है, पर नशीला है। अब मुझे पता चला कि भाभी यहाँ क्यों आती हैं। तुम सच में जादूगर हो।"

राज ने अपनी सांसें दुरुस्त कीं। "नाप ले लिया गया है," उसने हंसते हुए कहा। "ड्रेस बहुत अच्छी बनेगी।"

विद्या ने अपने कपड़े उठाए। उसने राज के गाल पर एक थप्पड़ मारा, लेकिन प्यार से।

"ड्रेस तो बहाना था बुद्धू," उसने अपनी जींस पहनते हुए कहा। "मुझे तो बस यह चेक करना था कि शहर के दर्जी की 'सुई' कितनी बड़ी है। और तुम पास हो गए।"

वह तैयार हो गई। उसने अपना चश्मा लगाया। उसके चाल-ढाल में अब वो पहले वाला नखरा वापस आ गया था, लेकिन आंखों में एक संतुष्टि थी।

"अगली बार..." वह दरवाज़े पर रुकी। "अगली बार मैं अपनी सहेली को लाऊंगी। हम दोनों को साथ में नापना। डिस्काउंट दोगे ना?"

राज हंस पड़ा। "खास ग्राहकों के लिए सब फ्री है।"

विद्या ने एक फ्लाइंग किस दी और बाहर निकल गई। स्कूटी की आवाज़ आई और वह चली गई।

राज ने शटर उठाया। बाहर धूप थी, लेकिन उसके अंदर एक नया तूफ़ान आ चुका था। अब उसके पास दो रानियां थीं—एक भरी-पूरी, रसीली डॉली, और एक तीखी मिर्ची विद्या। और दोनों की प्यास उसे ही बुझानी थी।

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