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स्थान: 'अप्सरा लेडीज बुटीक', राजगढ़
समय: शाम के 7:45 बजे (शुक्रवार)
माहौल: उमस, खामोशी और एक भारी विदाई
राजगढ़ के आसमान पर सांझ की लाली अब स्याह अंधेरे में बदल रही थी। शुक्रवार की यह शाम कस्बे के बाकी लोगों के लिए तो हफ्ता खत्म होने और छुट्टी के सुकून की आहट थी, लेकिन राज के लिए यह शाम किसी सजा के ऐलान जैसी थी।
यह वह समय था जब उसे अपनी 'दोहरी ज़िंदगी' के उस रंगीन पन्ने को बंद करके, उस बेरंग और नीरस पन्ने को खोलना होता था जिसे दुनिया 'परिवार' कहती थी।
नियम—जो उसने खुद बनाया था—के मुताबिक, हर शनिवार की सुबह 5 बजे वाली पहली बस पकड़कर उसे शहर जाना होता था। वहां उसकी पत्नी और दो बच्चे उसका इंतज़ार करते थे। एक जिम्मेदार पिता और पति की भूमिका निभाने के लिए।
लेकिन पिछले कुछ हफ्तों में, और खासकर इस हफ्ते डॉली और विद्या के साथ बिताए पलों के बाद, उसे शहर जाने का ख्याल भी ज़हर जैसा लग रहा था।
दुकान में सन्नाटा पसरा था। एसी की हमिंग उस खामोशी को और गहरा बना रही थी। राज ने अपने हेल्पर छोटू को एक घंटा पहले ही छुट्टी दे दी थी।
"जाओ छोटू, आज दुकान जल्दी बंद करेंगे। मुझे पैकिंग करनी है," उसने कहा था।
अब वह अकेला था। वह काउंटर के पीछे खड़ा एक छोटा सा लेदर का बैग पैक कर रहा था। बैग में दो जोड़ी कपड़े, शेविंग किट और हफ्ते भर की कमाई के पैसे थे। लेकिन उसके हाथ मशीनी अंदाज़ में चल रहे थे। उसका दिमाग कहीं और था।
उसकी नज़रें बार-बार दुकान की उस बड़ी, लकड़ी की कटिंग टेबल पर जा रही थीं। वही टेबल जिस पर दो रात पहले उसने डॉली को अपनी बांहों में भरा था। उस टेबल की लकड़ी में शायद अभी भी डॉली के पसीने की महक बसी हुई थी।
राज ने बैग की चेन बंद की और एक गहरी सांस ली। उसे एक अजीब सी घबराहट हो रही थी। एक डर था—क्या दो दिन की दूरी सब कुछ बदल देगी? क्या सोमवार को जब वह लौटेगा, तो डॉली का वह नशा उतर चुका होगा? क्या वह हवेली की चारदीवारी में वापस कैद हो जाएगी?
घड़ी में 8 बजने वाले थे। उसने दुकान की मुख्य लाइटें बंद कर दीं। अब सिर्फ एक पीला बल्ब जल रहा था, जो ट्रायल रूम के पास लगा था। परछाइयां लंबी हो गई थीं।
राज शटर गिराने के लिए रिमोट उठाने ही वाला था कि तभी...
बाहर सन्नाटे को चीरती हुई एक गाड़ी के टायरों की चरमराहट सुनाई दी। आवाज़ इतनी तेज़ थी जैसे किसी ने पूरी रफ्तार में ब्रेक लगाया हो। गाड़ी दुकान के ठीक सामने, लगभग शटर से टकराते-टकराते रुकी।
राज का दिल उछलकर गले में आ गया। इस वक्त कौन हो सकता है? पुलिस? या डॉली का पति?
उसने शटर के नीचे से झांकने की कोशिश की। गाड़ी की हेडलाइट्स बुझ गईं। गाड़ी का दरवाज़ा खुला और बंद हुआ—धड़ाम!
फिर सैंडल की तेज़ टक-टक की आवाज़ आई जो दुकान की तरफ बढ़ रही थी।
शटर के नीचे से उसे एक साड़ी का पल्लू और गोरे पैर दिखाई दिए। वह चाल... वह जानी-पहचानी लचक... राज पहचान गया।
उसने तुरंत शटर का बटन दबाया। शटर ऊपर उठा।
सामने डॉली खड़ी थी।
लेकिन आज डॉली का रूप वह नहीं था जो राज ने अब तक देखा था। वह हमेशा सजी-धजी, इत्र में नहाई हुई, शांत और संयमित रहती थी। उसकी हर अदा में एक रईसी नजाकत होती थी। लेकिन आज... आज वह बिखरी हुई थी। टूटी हुई थी।
उसने एक हल्के क्रीम रंग की, बहुत ही साधारण सूती साड़ी पहनी थी। बाल, जो हमेशा जूड़े में सजे रहते थे, आज खुले और बुरी तरह उलझे हुए थे। उसकी बड़ी-बड़ी आंखों में काजल फैला हुआ था, जैसे वह रास्ते भर रोती हुई आई हो या बहुत गुस्से में हो। उसके चेहरे पर पसीना था और छाती तेज़-तेज़ ऊपर-नीचे हो रही थी।
वह अंदर दाखिल हुई और उसने बिना कुछ कहे, राज के हाथ से रिमोट छीना और शटर को पूरा नीचे गिरा दिया।
धड़ाम!
शटर गिरने की आवाज़ दुकान में गूंज गई। उसने अंदर से कुंडी चढ़ाई और राज की तरफ पलटी।
उसकी आंखों में एक जंगलीपन था। एक ऐसी औरत का जंगलीपन जिसे लग रहा हो कि उसका सब कुछ लुटने वाला है।
"जा रहे हो?" डॉली ने पूछा। उसकी आवाज़ में एक कंपन था, एक गहरी शिकायत थी।
राज काउंटर के पीछे से निकला और उसके पास गया। "डॉली? तुम इस वक्त? और इस हालत में? क्या हुआ? सब ठीक तो है?"
"ठीक?" डॉली ने एक कड़वी हंसी हंसी। "कुछ भी ठीक नहीं है राज। तुम जा रहे हो। कल सुबह तुम उस बस में बैठोगे और चले जाओगे। और मैं? मैं क्या करूँ? दो दिन... पूरे 48 घंटे मैं उस हवेली में अकेले दीवारों को काटूँ? विक्रम अपनी दुनिया में मस्त है, और तुम अपनी दुनिया में चले जाओगे।"
राज ने उसे समझाने की कोशिश की। "कल शनिवार है, मालकिन। मुझे शहर जाना ही होता है। बच्चे हैं, पत्नी है... जिम्मेदारी है।"
"पत्नी!"
डॉली ने इस शब्द को ऐसे थूका जैसे वह कोई गाली हो। वह तेज़ कदमों से राज के पास आई और उसके कॉलर को अपनी मुट्ठी में जकड़ लिया।
"वहां पत्नी है। तो मैं कौन हूँ? सिर्फ एक ग्राहक? सिर्फ एक शरीर जिसे तुमने अपनी डायरी के पन्नों के लिए इस्तेमाल किया?"
उसने राज को झकझोर दिया।
"जब तुम वहां जाओगे... उस शहर वाली के पास... तो क्या उसे भी वैसे ही छुओगे जैसे मुझे छूते हो? क्या उसे भी वो लाल डायरी वाले डिज़ाइन पहनाओगे? क्या उसके कानों में भी वही बातें कहोगे जो मेरे कानों में कहते हो?"
राज चुप रहा। डॉली की जलन जायज थी। एक औरत जब अपना तन और मन किसी को सौंप देती है, तो वह उसे बांटना नहीं चाहती।
"डॉली..." राज ने उसके हाथों को अपने कॉलर से हटाया और अपनी हथेलियों में ले लिया। उसके हाथ ठंडे थे और कांप रहे थे। "मेरी तरफ देखो।"
डॉली ने अपनी भीगी हुई पलकें उठाईं।
"शहर में मैं राज नहीं हूँ," राज ने उसकी आंखों में झांकते हुए कहा। "वहां मैं सिर्फ एक मशीन हूँ जो पैसे कमाने जाती है। वहां कोई प्यार नहीं है, कोई नशा नहीं है।
मैं वहां सिर्फ एक पिता और एक पति का फर्ज निभाता हूँ, प्रेमी का नहीं। मेरा दिल, मेरी कला, मेरा असली वजूद... सब इसी दुकान में छूट जाता है। तुम्हारे पास।"
डॉली की आंखों से एक आंसू लुढ़क कर उसके गाल पर आ गया। राज ने झुककर अपनी जीभ से उस आंसू को चाट लिया।
"झूठ मत बोलो," डॉली फुसफुसाई, उसका गुस्सा अब पिघलकर बेबसी बन रहा था। "मर्द की फितरत मैं जानती हूँ। पास हो तो सब कुछ, दूर हो तो कुछ नहीं।"
उसने राज के सीने पर अपना सिर रख दिया और उसे कसकर पकड़ लिया।
"मुझे डर लगता है राज। मुझे लगता है कि तुम वहां जाकर बदल जाओगे। मुझे जलन होती है उस औरत से जिसका तुम पर नाम का हक़ है। मैं चाहती हूँ कि तुम सिर्फ मेरे रहो।"
उसने राज का हाथ पकड़ा और उसे अपनी साड़ी के पल्लू के नीचे, अपने पेट पर रख दिया। उसका पेट गर्म था और सांसों के साथ हिल रहा था।
"मैं खाली महसूस कर रही हूँ। यह सन्नाटा मुझे खा जाएगा। मुझे शोर चाहिए राज। मेरे अंदर तुम्हारा शोर चाहिए। इतना शोर कि अगले दो दिन तक मुझे किसी और आवाज़ की ज़रूरत न पड़े।"
राज ने महसूस किया कि डॉली का बदन बुखार की तरह तप रहा है। यह तपन विरह के डर की थी। उसे एहसास हुआ कि यह औरत उससे सिर्फ हवस की वजह से नहीं जुड़ी है, बल्कि वह उसमें अपना अस्तित्व ढूंढ रही है।
"शोर चाहिए?" राज ने उसकी आंखों में एक गहरी चमक के साथ पूछा। "तो आज शोर होगा। इतना कि हवेली की दीवारें भी सुन लेंगी।"
उसने डॉली को कमर से उठाया। डॉली ने अपनी टांगें उसकी कमर पर लपेट लीं।
राज उसे लेकर उस बड़ी कटिंग टेबल की तरफ बढ़ा।
"आज कोई तैयारी नहीं," राज ने कहा, डॉली को टेबल पर बैठाते हुए। टेबल की सख्त लकड़ी डॉली के नितंबों से टकराई। "आज कोई नाप नहीं। आज कोई डिज़ाइन नहीं। आज सिर्फ कब्ज़ा होगा। ऐसा कब्ज़ा जो तुम्हें याद दिलाता रहे कि तुम किसकी हो।"
डॉली ने अपनी टांगें फैला दीं। वह टेबल के किनारे पर बैठी थी, उसकी साड़ी घुटनों तक ऊपर चढ़ गई थी। उसकी गोरी, मांसल पिंडलियां कांप रही थीं।
"कब्ज़ा कर लो," उसने राज की शर्ट के बटन नोचते हुए कहा। "ऐसा निशान छोड़ जाओ कि मैं चाहकर भी तुम्हें भूल न सकूं।"
राज ने अपनी शर्ट उतार फेंकी। उसका सांवला, पसीने से भीगा शरीर दुकान की पीली रोशनी में चमक रहा था। उसने डॉली के दोनों पैरों को पकड़कर चौड़ा कर दिया और उनके बीच खड़ा हो गया।
माहौल में एक अजीब सा भारीपन था—जैसे बारिश से पहले का तूफान। यह मिलन प्यार का कम और एक-दूसरे को खोने के डर का ज्यादा था। हवा में ईर्ष्या, अधिकार और हवस की गंध मिल गई थी।
राज डॉली के दोनों पैरों के बीच खड़ा था, जैसे कोई योद्धा अपने जीते हुए किले के द्वार पर खड़ा हो। डॉली टेबल के किनारे पर बैठी थी, उसका चेहरा राज के पेट के बराबर था। उसने अपने दोनों हाथ राज की नंगी कमर पर रख दिए और अपनी उंगलियां उसकी पीठ में गड़ा दीं।
"उसे मत छूना," डॉली ने राज की बेल्ट के बक्कल पर हाथ रखते हुए, चेतावनी भरे स्वर में कहा। "जब तुम शहर जाओ... तो उसे मत छूना। अगर तुमने उसे छुआ, तो मुझे पता चल जाएगा। मेरा बदन जलने लगेगा।"
समय: शाम के 7:45 बजे (शुक्रवार)
माहौल: उमस, खामोशी और एक भारी विदाई
राजगढ़ के आसमान पर सांझ की लाली अब स्याह अंधेरे में बदल रही थी। शुक्रवार की यह शाम कस्बे के बाकी लोगों के लिए तो हफ्ता खत्म होने और छुट्टी के सुकून की आहट थी, लेकिन राज के लिए यह शाम किसी सजा के ऐलान जैसी थी।
यह वह समय था जब उसे अपनी 'दोहरी ज़िंदगी' के उस रंगीन पन्ने को बंद करके, उस बेरंग और नीरस पन्ने को खोलना होता था जिसे दुनिया 'परिवार' कहती थी।
नियम—जो उसने खुद बनाया था—के मुताबिक, हर शनिवार की सुबह 5 बजे वाली पहली बस पकड़कर उसे शहर जाना होता था। वहां उसकी पत्नी और दो बच्चे उसका इंतज़ार करते थे। एक जिम्मेदार पिता और पति की भूमिका निभाने के लिए।
लेकिन पिछले कुछ हफ्तों में, और खासकर इस हफ्ते डॉली और विद्या के साथ बिताए पलों के बाद, उसे शहर जाने का ख्याल भी ज़हर जैसा लग रहा था।
दुकान में सन्नाटा पसरा था। एसी की हमिंग उस खामोशी को और गहरा बना रही थी। राज ने अपने हेल्पर छोटू को एक घंटा पहले ही छुट्टी दे दी थी।
"जाओ छोटू, आज दुकान जल्दी बंद करेंगे। मुझे पैकिंग करनी है," उसने कहा था।
अब वह अकेला था। वह काउंटर के पीछे खड़ा एक छोटा सा लेदर का बैग पैक कर रहा था। बैग में दो जोड़ी कपड़े, शेविंग किट और हफ्ते भर की कमाई के पैसे थे। लेकिन उसके हाथ मशीनी अंदाज़ में चल रहे थे। उसका दिमाग कहीं और था।
उसकी नज़रें बार-बार दुकान की उस बड़ी, लकड़ी की कटिंग टेबल पर जा रही थीं। वही टेबल जिस पर दो रात पहले उसने डॉली को अपनी बांहों में भरा था। उस टेबल की लकड़ी में शायद अभी भी डॉली के पसीने की महक बसी हुई थी।
राज ने बैग की चेन बंद की और एक गहरी सांस ली। उसे एक अजीब सी घबराहट हो रही थी। एक डर था—क्या दो दिन की दूरी सब कुछ बदल देगी? क्या सोमवार को जब वह लौटेगा, तो डॉली का वह नशा उतर चुका होगा? क्या वह हवेली की चारदीवारी में वापस कैद हो जाएगी?
घड़ी में 8 बजने वाले थे। उसने दुकान की मुख्य लाइटें बंद कर दीं। अब सिर्फ एक पीला बल्ब जल रहा था, जो ट्रायल रूम के पास लगा था। परछाइयां लंबी हो गई थीं।
राज शटर गिराने के लिए रिमोट उठाने ही वाला था कि तभी...
बाहर सन्नाटे को चीरती हुई एक गाड़ी के टायरों की चरमराहट सुनाई दी। आवाज़ इतनी तेज़ थी जैसे किसी ने पूरी रफ्तार में ब्रेक लगाया हो। गाड़ी दुकान के ठीक सामने, लगभग शटर से टकराते-टकराते रुकी।
राज का दिल उछलकर गले में आ गया। इस वक्त कौन हो सकता है? पुलिस? या डॉली का पति?
उसने शटर के नीचे से झांकने की कोशिश की। गाड़ी की हेडलाइट्स बुझ गईं। गाड़ी का दरवाज़ा खुला और बंद हुआ—धड़ाम!
फिर सैंडल की तेज़ टक-टक की आवाज़ आई जो दुकान की तरफ बढ़ रही थी।
शटर के नीचे से उसे एक साड़ी का पल्लू और गोरे पैर दिखाई दिए। वह चाल... वह जानी-पहचानी लचक... राज पहचान गया।
उसने तुरंत शटर का बटन दबाया। शटर ऊपर उठा।
सामने डॉली खड़ी थी।
लेकिन आज डॉली का रूप वह नहीं था जो राज ने अब तक देखा था। वह हमेशा सजी-धजी, इत्र में नहाई हुई, शांत और संयमित रहती थी। उसकी हर अदा में एक रईसी नजाकत होती थी। लेकिन आज... आज वह बिखरी हुई थी। टूटी हुई थी।
उसने एक हल्के क्रीम रंग की, बहुत ही साधारण सूती साड़ी पहनी थी। बाल, जो हमेशा जूड़े में सजे रहते थे, आज खुले और बुरी तरह उलझे हुए थे। उसकी बड़ी-बड़ी आंखों में काजल फैला हुआ था, जैसे वह रास्ते भर रोती हुई आई हो या बहुत गुस्से में हो। उसके चेहरे पर पसीना था और छाती तेज़-तेज़ ऊपर-नीचे हो रही थी।
वह अंदर दाखिल हुई और उसने बिना कुछ कहे, राज के हाथ से रिमोट छीना और शटर को पूरा नीचे गिरा दिया।
धड़ाम!
शटर गिरने की आवाज़ दुकान में गूंज गई। उसने अंदर से कुंडी चढ़ाई और राज की तरफ पलटी।
उसकी आंखों में एक जंगलीपन था। एक ऐसी औरत का जंगलीपन जिसे लग रहा हो कि उसका सब कुछ लुटने वाला है।
"जा रहे हो?" डॉली ने पूछा। उसकी आवाज़ में एक कंपन था, एक गहरी शिकायत थी।
राज काउंटर के पीछे से निकला और उसके पास गया। "डॉली? तुम इस वक्त? और इस हालत में? क्या हुआ? सब ठीक तो है?"
"ठीक?" डॉली ने एक कड़वी हंसी हंसी। "कुछ भी ठीक नहीं है राज। तुम जा रहे हो। कल सुबह तुम उस बस में बैठोगे और चले जाओगे। और मैं? मैं क्या करूँ? दो दिन... पूरे 48 घंटे मैं उस हवेली में अकेले दीवारों को काटूँ? विक्रम अपनी दुनिया में मस्त है, और तुम अपनी दुनिया में चले जाओगे।"
राज ने उसे समझाने की कोशिश की। "कल शनिवार है, मालकिन। मुझे शहर जाना ही होता है। बच्चे हैं, पत्नी है... जिम्मेदारी है।"
"पत्नी!"
डॉली ने इस शब्द को ऐसे थूका जैसे वह कोई गाली हो। वह तेज़ कदमों से राज के पास आई और उसके कॉलर को अपनी मुट्ठी में जकड़ लिया।
"वहां पत्नी है। तो मैं कौन हूँ? सिर्फ एक ग्राहक? सिर्फ एक शरीर जिसे तुमने अपनी डायरी के पन्नों के लिए इस्तेमाल किया?"
उसने राज को झकझोर दिया।
"जब तुम वहां जाओगे... उस शहर वाली के पास... तो क्या उसे भी वैसे ही छुओगे जैसे मुझे छूते हो? क्या उसे भी वो लाल डायरी वाले डिज़ाइन पहनाओगे? क्या उसके कानों में भी वही बातें कहोगे जो मेरे कानों में कहते हो?"
राज चुप रहा। डॉली की जलन जायज थी। एक औरत जब अपना तन और मन किसी को सौंप देती है, तो वह उसे बांटना नहीं चाहती।
"डॉली..." राज ने उसके हाथों को अपने कॉलर से हटाया और अपनी हथेलियों में ले लिया। उसके हाथ ठंडे थे और कांप रहे थे। "मेरी तरफ देखो।"
डॉली ने अपनी भीगी हुई पलकें उठाईं।
"शहर में मैं राज नहीं हूँ," राज ने उसकी आंखों में झांकते हुए कहा। "वहां मैं सिर्फ एक मशीन हूँ जो पैसे कमाने जाती है। वहां कोई प्यार नहीं है, कोई नशा नहीं है।
मैं वहां सिर्फ एक पिता और एक पति का फर्ज निभाता हूँ, प्रेमी का नहीं। मेरा दिल, मेरी कला, मेरा असली वजूद... सब इसी दुकान में छूट जाता है। तुम्हारे पास।"
डॉली की आंखों से एक आंसू लुढ़क कर उसके गाल पर आ गया। राज ने झुककर अपनी जीभ से उस आंसू को चाट लिया।
"झूठ मत बोलो," डॉली फुसफुसाई, उसका गुस्सा अब पिघलकर बेबसी बन रहा था। "मर्द की फितरत मैं जानती हूँ। पास हो तो सब कुछ, दूर हो तो कुछ नहीं।"
उसने राज के सीने पर अपना सिर रख दिया और उसे कसकर पकड़ लिया।
"मुझे डर लगता है राज। मुझे लगता है कि तुम वहां जाकर बदल जाओगे। मुझे जलन होती है उस औरत से जिसका तुम पर नाम का हक़ है। मैं चाहती हूँ कि तुम सिर्फ मेरे रहो।"
उसने राज का हाथ पकड़ा और उसे अपनी साड़ी के पल्लू के नीचे, अपने पेट पर रख दिया। उसका पेट गर्म था और सांसों के साथ हिल रहा था।
"मैं खाली महसूस कर रही हूँ। यह सन्नाटा मुझे खा जाएगा। मुझे शोर चाहिए राज। मेरे अंदर तुम्हारा शोर चाहिए। इतना शोर कि अगले दो दिन तक मुझे किसी और आवाज़ की ज़रूरत न पड़े।"
राज ने महसूस किया कि डॉली का बदन बुखार की तरह तप रहा है। यह तपन विरह के डर की थी। उसे एहसास हुआ कि यह औरत उससे सिर्फ हवस की वजह से नहीं जुड़ी है, बल्कि वह उसमें अपना अस्तित्व ढूंढ रही है।
"शोर चाहिए?" राज ने उसकी आंखों में एक गहरी चमक के साथ पूछा। "तो आज शोर होगा। इतना कि हवेली की दीवारें भी सुन लेंगी।"
उसने डॉली को कमर से उठाया। डॉली ने अपनी टांगें उसकी कमर पर लपेट लीं।
राज उसे लेकर उस बड़ी कटिंग टेबल की तरफ बढ़ा।
"आज कोई तैयारी नहीं," राज ने कहा, डॉली को टेबल पर बैठाते हुए। टेबल की सख्त लकड़ी डॉली के नितंबों से टकराई। "आज कोई नाप नहीं। आज कोई डिज़ाइन नहीं। आज सिर्फ कब्ज़ा होगा। ऐसा कब्ज़ा जो तुम्हें याद दिलाता रहे कि तुम किसकी हो।"
डॉली ने अपनी टांगें फैला दीं। वह टेबल के किनारे पर बैठी थी, उसकी साड़ी घुटनों तक ऊपर चढ़ गई थी। उसकी गोरी, मांसल पिंडलियां कांप रही थीं।
"कब्ज़ा कर लो," उसने राज की शर्ट के बटन नोचते हुए कहा। "ऐसा निशान छोड़ जाओ कि मैं चाहकर भी तुम्हें भूल न सकूं।"
राज ने अपनी शर्ट उतार फेंकी। उसका सांवला, पसीने से भीगा शरीर दुकान की पीली रोशनी में चमक रहा था। उसने डॉली के दोनों पैरों को पकड़कर चौड़ा कर दिया और उनके बीच खड़ा हो गया।
माहौल में एक अजीब सा भारीपन था—जैसे बारिश से पहले का तूफान। यह मिलन प्यार का कम और एक-दूसरे को खोने के डर का ज्यादा था। हवा में ईर्ष्या, अधिकार और हवस की गंध मिल गई थी।
राज डॉली के दोनों पैरों के बीच खड़ा था, जैसे कोई योद्धा अपने जीते हुए किले के द्वार पर खड़ा हो। डॉली टेबल के किनारे पर बैठी थी, उसका चेहरा राज के पेट के बराबर था। उसने अपने दोनों हाथ राज की नंगी कमर पर रख दिए और अपनी उंगलियां उसकी पीठ में गड़ा दीं।
"उसे मत छूना," डॉली ने राज की बेल्ट के बक्कल पर हाथ रखते हुए, चेतावनी भरे स्वर में कहा। "जब तुम शहर जाओ... तो उसे मत छूना। अगर तुमने उसे छुआ, तो मुझे पता चल जाएगा। मेरा बदन जलने लगेगा।"