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Adultery ' गाँव का टेलर '

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स्थान: 'अप्सरा लेडीज बुटीक', राजगढ़

समय: शाम के 7:45 बजे (शुक्रवार)

माहौल: उमस, खामोशी और एक भारी विदाई

राजगढ़ के आसमान पर सांझ की लाली अब स्याह अंधेरे में बदल रही थी। शुक्रवार की यह शाम कस्बे के बाकी लोगों के लिए तो हफ्ता खत्म होने और छुट्टी के सुकून की आहट थी, लेकिन राज के लिए यह शाम किसी सजा के ऐलान जैसी थी।

यह वह समय था जब उसे अपनी 'दोहरी ज़िंदगी' के उस रंगीन पन्ने को बंद करके, उस बेरंग और नीरस पन्ने को खोलना होता था जिसे दुनिया 'परिवार' कहती थी।

नियम—जो उसने खुद बनाया था—के मुताबिक, हर शनिवार की सुबह 5 बजे वाली पहली बस पकड़कर उसे शहर जाना होता था। वहां उसकी पत्नी और दो बच्चे उसका इंतज़ार करते थे। एक जिम्मेदार पिता और पति की भूमिका निभाने के लिए।

लेकिन पिछले कुछ हफ्तों में, और खासकर इस हफ्ते डॉली और विद्या के साथ बिताए पलों के बाद, उसे शहर जाने का ख्याल भी ज़हर जैसा लग रहा था।

दुकान में सन्नाटा पसरा था। एसी की हमिंग उस खामोशी को और गहरा बना रही थी। राज ने अपने हेल्पर छोटू को एक घंटा पहले ही छुट्टी दे दी थी।

"जाओ छोटू, आज दुकान जल्दी बंद करेंगे। मुझे पैकिंग करनी है," उसने कहा था।

अब वह अकेला था। वह काउंटर के पीछे खड़ा एक छोटा सा लेदर का बैग पैक कर रहा था। बैग में दो जोड़ी कपड़े, शेविंग किट और हफ्ते भर की कमाई के पैसे थे। लेकिन उसके हाथ मशीनी अंदाज़ में चल रहे थे। उसका दिमाग कहीं और था।

उसकी नज़रें बार-बार दुकान की उस बड़ी, लकड़ी की कटिंग टेबल पर जा रही थीं। वही टेबल जिस पर दो रात पहले उसने डॉली को अपनी बांहों में भरा था। उस टेबल की लकड़ी में शायद अभी भी डॉली के पसीने की महक बसी हुई थी।

राज ने बैग की चेन बंद की और एक गहरी सांस ली। उसे एक अजीब सी घबराहट हो रही थी। एक डर था—क्या दो दिन की दूरी सब कुछ बदल देगी? क्या सोमवार को जब वह लौटेगा, तो डॉली का वह नशा उतर चुका होगा? क्या वह हवेली की चारदीवारी में वापस कैद हो जाएगी?

घड़ी में 8 बजने वाले थे। उसने दुकान की मुख्य लाइटें बंद कर दीं। अब सिर्फ एक पीला बल्ब जल रहा था, जो ट्रायल रूम के पास लगा था। परछाइयां लंबी हो गई थीं।

राज शटर गिराने के लिए रिमोट उठाने ही वाला था कि तभी...

बाहर सन्नाटे को चीरती हुई एक गाड़ी के टायरों की चरमराहट सुनाई दी। आवाज़ इतनी तेज़ थी जैसे किसी ने पूरी रफ्तार में ब्रेक लगाया हो। गाड़ी दुकान के ठीक सामने, लगभग शटर से टकराते-टकराते रुकी।

राज का दिल उछलकर गले में आ गया। इस वक्त कौन हो सकता है? पुलिस? या डॉली का पति?

उसने शटर के नीचे से झांकने की कोशिश की। गाड़ी की हेडलाइट्स बुझ गईं। गाड़ी का दरवाज़ा खुला और बंद हुआ—धड़ाम!

फिर सैंडल की तेज़ टक-टक की आवाज़ आई जो दुकान की तरफ बढ़ रही थी।

शटर के नीचे से उसे एक साड़ी का पल्लू और गोरे पैर दिखाई दिए। वह चाल... वह जानी-पहचानी लचक... राज पहचान गया।

उसने तुरंत शटर का बटन दबाया। शटर ऊपर उठा।

सामने डॉली खड़ी थी।

लेकिन आज डॉली का रूप वह नहीं था जो राज ने अब तक देखा था। वह हमेशा सजी-धजी, इत्र में नहाई हुई, शांत और संयमित रहती थी। उसकी हर अदा में एक रईसी नजाकत होती थी। लेकिन आज... आज वह बिखरी हुई थी। टूटी हुई थी।

उसने एक हल्के क्रीम रंग की, बहुत ही साधारण सूती साड़ी पहनी थी। बाल, जो हमेशा जूड़े में सजे रहते थे, आज खुले और बुरी तरह उलझे हुए थे। उसकी बड़ी-बड़ी आंखों में काजल फैला हुआ था, जैसे वह रास्ते भर रोती हुई आई हो या बहुत गुस्से में हो। उसके चेहरे पर पसीना था और छाती तेज़-तेज़ ऊपर-नीचे हो रही थी।

वह अंदर दाखिल हुई और उसने बिना कुछ कहे, राज के हाथ से रिमोट छीना और शटर को पूरा नीचे गिरा दिया।

धड़ाम!

शटर गिरने की आवाज़ दुकान में गूंज गई। उसने अंदर से कुंडी चढ़ाई और राज की तरफ पलटी।

उसकी आंखों में एक जंगलीपन था। एक ऐसी औरत का जंगलीपन जिसे लग रहा हो कि उसका सब कुछ लुटने वाला है।

"जा रहे हो?" डॉली ने पूछा। उसकी आवाज़ में एक कंपन था, एक गहरी शिकायत थी।

राज काउंटर के पीछे से निकला और उसके पास गया। "डॉली? तुम इस वक्त? और इस हालत में? क्या हुआ? सब ठीक तो है?"

"ठीक?" डॉली ने एक कड़वी हंसी हंसी। "कुछ भी ठीक नहीं है राज। तुम जा रहे हो। कल सुबह तुम उस बस में बैठोगे और चले जाओगे। और मैं? मैं क्या करूँ? दो दिन... पूरे 48 घंटे मैं उस हवेली में अकेले दीवारों को काटूँ? विक्रम अपनी दुनिया में मस्त है, और तुम अपनी दुनिया में चले जाओगे।"

राज ने उसे समझाने की कोशिश की। "कल शनिवार है, मालकिन। मुझे शहर जाना ही होता है। बच्चे हैं, पत्नी है... जिम्मेदारी है।"

"पत्नी!"

डॉली ने इस शब्द को ऐसे थूका जैसे वह कोई गाली हो। वह तेज़ कदमों से राज के पास आई और उसके कॉलर को अपनी मुट्ठी में जकड़ लिया।

"वहां पत्नी है। तो मैं कौन हूँ? सिर्फ एक ग्राहक? सिर्फ एक शरीर जिसे तुमने अपनी डायरी के पन्नों के लिए इस्तेमाल किया?"

उसने राज को झकझोर दिया।

"जब तुम वहां जाओगे... उस शहर वाली के पास... तो क्या उसे भी वैसे ही छुओगे जैसे मुझे छूते हो? क्या उसे भी वो लाल डायरी वाले डिज़ाइन पहनाओगे? क्या उसके कानों में भी वही बातें कहोगे जो मेरे कानों में कहते हो?"

राज चुप रहा। डॉली की जलन जायज थी। एक औरत जब अपना तन और मन किसी को सौंप देती है, तो वह उसे बांटना नहीं चाहती।

"डॉली..." राज ने उसके हाथों को अपने कॉलर से हटाया और अपनी हथेलियों में ले लिया। उसके हाथ ठंडे थे और कांप रहे थे। "मेरी तरफ देखो।"

डॉली ने अपनी भीगी हुई पलकें उठाईं।

"शहर में मैं राज नहीं हूँ," राज ने उसकी आंखों में झांकते हुए कहा। "वहां मैं सिर्फ एक मशीन हूँ जो पैसे कमाने जाती है। वहां कोई प्यार नहीं है, कोई नशा नहीं है।

मैं वहां सिर्फ एक पिता और एक पति का फर्ज निभाता हूँ, प्रेमी का नहीं। मेरा दिल, मेरी कला, मेरा असली वजूद... सब इसी दुकान में छूट जाता है। तुम्हारे पास।"

डॉली की आंखों से एक आंसू लुढ़क कर उसके गाल पर आ गया। राज ने झुककर अपनी जीभ से उस आंसू को चाट लिया।

"झूठ मत बोलो," डॉली फुसफुसाई, उसका गुस्सा अब पिघलकर बेबसी बन रहा था। "मर्द की फितरत मैं जानती हूँ। पास हो तो सब कुछ, दूर हो तो कुछ नहीं।"

उसने राज के सीने पर अपना सिर रख दिया और उसे कसकर पकड़ लिया।

"मुझे डर लगता है राज। मुझे लगता है कि तुम वहां जाकर बदल जाओगे। मुझे जलन होती है उस औरत से जिसका तुम पर नाम का हक़ है। मैं चाहती हूँ कि तुम सिर्फ मेरे रहो।"

उसने राज का हाथ पकड़ा और उसे अपनी साड़ी के पल्लू के नीचे, अपने पेट पर रख दिया। उसका पेट गर्म था और सांसों के साथ हिल रहा था।

"मैं खाली महसूस कर रही हूँ। यह सन्नाटा मुझे खा जाएगा। मुझे शोर चाहिए राज। मेरे अंदर तुम्हारा शोर चाहिए। इतना शोर कि अगले दो दिन तक मुझे किसी और आवाज़ की ज़रूरत न पड़े।"

राज ने महसूस किया कि डॉली का बदन बुखार की तरह तप रहा है। यह तपन विरह के डर की थी। उसे एहसास हुआ कि यह औरत उससे सिर्फ हवस की वजह से नहीं जुड़ी है, बल्कि वह उसमें अपना अस्तित्व ढूंढ रही है।

"शोर चाहिए?" राज ने उसकी आंखों में एक गहरी चमक के साथ पूछा। "तो आज शोर होगा। इतना कि हवेली की दीवारें भी सुन लेंगी।"

उसने डॉली को कमर से उठाया। डॉली ने अपनी टांगें उसकी कमर पर लपेट लीं।

राज उसे लेकर उस बड़ी कटिंग टेबल की तरफ बढ़ा।

"आज कोई तैयारी नहीं," राज ने कहा, डॉली को टेबल पर बैठाते हुए। टेबल की सख्त लकड़ी डॉली के नितंबों से टकराई। "आज कोई नाप नहीं। आज कोई डिज़ाइन नहीं। आज सिर्फ कब्ज़ा होगा। ऐसा कब्ज़ा जो तुम्हें याद दिलाता रहे कि तुम किसकी हो।"

डॉली ने अपनी टांगें फैला दीं। वह टेबल के किनारे पर बैठी थी, उसकी साड़ी घुटनों तक ऊपर चढ़ गई थी। उसकी गोरी, मांसल पिंडलियां कांप रही थीं।

"कब्ज़ा कर लो," उसने राज की शर्ट के बटन नोचते हुए कहा। "ऐसा निशान छोड़ जाओ कि मैं चाहकर भी तुम्हें भूल न सकूं।"

राज ने अपनी शर्ट उतार फेंकी। उसका सांवला, पसीने से भीगा शरीर दुकान की पीली रोशनी में चमक रहा था। उसने डॉली के दोनों पैरों को पकड़कर चौड़ा कर दिया और उनके बीच खड़ा हो गया।

माहौल में एक अजीब सा भारीपन था—जैसे बारिश से पहले का तूफान। यह मिलन प्यार का कम और एक-दूसरे को खोने के डर का ज्यादा था। हवा में ईर्ष्या, अधिकार और हवस की गंध मिल गई थी।

राज डॉली के दोनों पैरों के बीच खड़ा था, जैसे कोई योद्धा अपने जीते हुए किले के द्वार पर खड़ा हो। डॉली टेबल के किनारे पर बैठी थी, उसका चेहरा राज के पेट के बराबर था। उसने अपने दोनों हाथ राज की नंगी कमर पर रख दिए और अपनी उंगलियां उसकी पीठ में गड़ा दीं।

"उसे मत छूना," डॉली ने राज की बेल्ट के बक्कल पर हाथ रखते हुए, चेतावनी भरे स्वर में कहा। "जब तुम शहर जाओ... तो उसे मत छूना। अगर तुमने उसे छुआ, तो मुझे पता चल जाएगा। मेरा बदन जलने लगेगा।"
 
राज ने उसके बालों में अपनी उंगलियां फंसा दीं और उसका सिर पीछे की तरफ खींचा। डॉली का चेहरा ऊपर हो गया, उसकी गोरी गर्दन तन गई, जिस पर पसीने की लकीरें चमक रही थीं।

"वादे लफ्ज़ों से नहीं, निशान से किए जाते हैं," राज ने भारी आवाज़ में कहा।

उसने डॉली के ब्लाउज के हुक खोलने की ज़हमत नहीं उठाई। उसने ब्लाउज के चौड़े गले को ऊपर से पकड़ा और एक झटके में नीचे खींच दिया।

चर्र...

सिलाई की हल्की आवाज़ आई और ब्लाउज डॉली के स्तनों के नीचे सरक गया।

डॉली के भारी, गोरे स्तन ब्लाउज की कैद से बाहर छलक आए। वे तनाव, उत्तेजना और डर से सख्त हो चुके थे। उनके निप्पल डार्क ब्राउन थे और ऐसे अकड़े हुए थे जैसे किसी स्पर्श के लिए भीख मांग रहे हों।

"देख रहे हो इन्हें?" डॉली ने अपनी छाती को आगे करके राज के नंगे पेट से रगड़ दिया। उसके निप्पल राज की त्वचा को खरोंच रहे थे। "ये तुम्हारे लिए तड़प रहे हैं। इन्हें काटो। निशान बना दो। ताकि जब मैं नहाऊं, तो आईने में मुझे तुम्हारी याद आए।"

राज ने झुककर उसके बाएं स्तन को अपने मुंह में भर लिया। उसने उसे चूसा नहीं, बल्कि उसे अपने दांतों के बीच दबाया।

"आह्ह्ह!" डॉली की चीख निकल गई। उसने राज के सिर को और जोर से अपनी छाती में भींच लिया। "हाँ! और जोर से! दर्द दो मुझे!"

राज ने उसके निप्पल को अपनी जीभ से लपेटा, चूसा और फिर दांतों से हल्का सा काट लिया। एक गहरा लाल निशान वहां उभर आया।

उसने अपना मुंह हटाया और उस निशान को देखा।

"यह मेरी मुहर है," राज ने कहा, अपनी उंगली उस लाल निशान पर फेरते हुए। "सोमवार तक यह निशान रहेगा। जब भी तुम कपड़े बदलोगी, जब भी तुम आईने में देखोगी, तुम्हें पता चलेगा कि तुम किसकी अमानत हो।"

डॉली पागल हो रही थी। उस दर्द ने उसकी कामुकता को भड़का दिया था। उसने राज की पतलून की जिप खोली और उसे नीचे खींच दिया।

राज का लिंग... वह लोहे की तरह सख्त, काला और गुस्से में लाल था। वह डॉली की जलन और जिद को देखकर बारूद बन चुका था। वह तनकर डॉली के चेहरे के सामने खड़ा था।

डॉली ने उसे देखा। उसकी आंखों में एक अजीब सी भूख और मालिकाना हक था।

"यह मेरा है," उसने लिंग को अपनी मुट्ठी में पकड़ा। उसकी पकड़ इतनी सख्त थी कि राज की नसें तन गईं। उसने उसे अपने गाल से लगाया। उसकी गर्मी को महसूस किया। "सिर्फ मेरा। उस शहर वाली का इस पर कोई हक नहीं है। उसने इसे सालों से नहीं छुआ होगा, मैं जानती हूँ।"

उसने उसे चूमना शुरू किया। वह उसे चाट रही थी, सूंघ रही थी, जैसे कोई शेरनी अपने साथी को सूंघती है। वह उसकी नसों को अपनी जीभ से महसूस कर रही थी, उसके टोपे को अपने होठों में भरकर चूस रही थी।

"मुझे इसमें अपनी खुशबू भरनी है," डॉली ने बीच-बीच में रुककर कहा। "ताकि जब तुम वहां जाओ, तो तुम्हें सिर्फ मेरी महक आए। तुम्हें हर पल मेरी याद आए।"

राज का संयम टूटने लगा था। डॉली का मुंह बहुत गर्म और गीला था।

"अब बस," राज ने उसे कंधों से पकड़कर पीछे धकेला। "अब मुझे तुम्हें भरना है। मुझे तुम्हारी उस खालीपन को भरना है जिसकी शिकायत तुम कर रही थी।"

उसने डॉली को टेबल पर पीठ के बल लिटा दिया।

डॉली की साड़ी पूरी तरह खुल चुकी थी और टेबल के नीचे लटक रही थी। वह सिर्फ अपने ब्लाउज (जो अब बाजुओं में फंसा था) और पेटीकोट में थी।

राज ने पेटीकोट को ऊपर कमर तक खींच दिया। डॉली ने अपनी टांगें हवा में उठा लीं।

उसकी जांघें, उसका पेट और वह घना, काला त्रिकोण राज के सामने था।‘

राज ने वहां हाथ नहीं लगाया। उसने देखा कि डॉली की योनि पहले से ही गीली है। रस उसकी जांघों पर बह रहा था।

उसने डॉली के दोनों घुटनों को पकड़कर उसकी छाती तक दबा दिया। अब डॉली पूरी तरह खुल चुकी थी।

राज ने अपना लिंग डॉली के योनि के मुहाने पर रखा। उसका टोपा डॉली के गीले प्रवेश द्वार को रगड़ रहा था।

"मेरी आंखों में देखो," राज ने आदेश दिया।

डॉली ने अपनी नशीली, आंसुओं से भरी आंखें खोलीं।

"कौन हूँ मैं?" राज ने पूछा, धीरे-धीरे दबाव बनाते हुए।‘



"मेरे मालिक..." डॉली सिसकी। "मेरे दर्जी... मेरे मर्द... मेरे भगवान..."’

राज ने एक ही झटके में, बिना किसी चेतावनी के, अपने आप को पूरा का पूरा अंदर धकेल दिया।

धप्प!

"आह्ह्ह्ह्ह्ह!" डॉली का शरीर कमान की तरह मुड़ गया। उसकी एड़ियाँ टेबल पर पटक दी गईं। "राज! मार डाला! उफ्फ... चीर दिया..."

वह इतना गहरा था कि डॉली की सांस रुक गई। उसे लगा जैसे राज उसके पेट के अंदर तक पहुँच गया है।

"महसूस हुआ?" राज ने उसके ऊपर झुकते हुए पूछा, अपनी नाक उसकी नाक से रगड़ते हुए। "शहर वाली को यह कभी नहीं मिलेगा। यह गहराई, यह ताकत... सिर्फ तुम्हारे लिए है।"

राज ने पेलना शुरू किया।

यह मिलन धीमा या कोमल नहीं था। यह एक युद्ध था। ईर्ष्या, डर और हवस का युद्ध।

थप-थप-थप!

राज के धक्के टेबल को हिला रहे थे। टेबल पर रखी कैंची, चॉक और फीते नीचे गिर गए। आवाज़ गूंज रही थी।
 
डॉली अपनी टांगें राज की कमर पर कस रही थी। वह उसे बाहर नहीं जाने देना चाहती थी। वह अपनी एड़ियों से राज की पीठ को कुरेद रही थी।

"मत जाओ शहर!" डॉली चिल्लाई, हर धक्के के साथ उसका सिर हिल रहा था। "मत जाओ! यहीं रह जाओ! मैं तुम्हें सब दूँगी! पैसा, सोना, शरीर... सब ले लो! मुझे छोड़ कर मत जाओ!"

राज उसे चूम रहा था। वह उसके आंसुओं को पी रहा था जो उसकी आंखों के कोनों से बह रहे थे।

"मैं कहीं नहीं जा रहा डॉली," उसने एक गहरा धक्का मारा। "मेरा शरीर वहां जाएगा, लेकिन मेरी जान इसी कमरे में, इसी टेबल पर रहेगी।"

उसने डॉली की दोनों कलाइयों को एक हाथ से पकड़कर उसके सिर के ऊपर टेबल पर दबा दिया। दूसरे हाथ से उसने डॉली के गले को हल्का सा दबाया।

वह उसे देख रहा था। उसके बाल पसीने से चिपके थे, चेहरा लाल था, और आंखें पलटी हुई थीं। वह किसी देवी की तरह लग रही थी जो अपने भक्त से बलि मांग रही हो।

"तुम बहुत खूबसूरत हो," राज ने कहा, और अपनी रफ़्तार दोगुनी कर दी।‘

डॉली का शरीर झटके खा रहा था। उसके खुले हुए स्तन हवा में उछल रहे थे।‘’

"राज... उफ्फ... मेरी कोख... तुम उसे छू रहे हो... वहां चोट लग रही है..."

"छूना नहीं, उसे भरना है," राज गुर्राया। "ताकि दो दिन तक वहां कुछ और न आ सके।"

उसने डॉली की एक टांग अपने कंधे पर रख ली। अब वह उसे साइड से ठोक रहा था।

यह पोज़िशन बहुत दर्दनाक और बहुत सुखद थी। डॉली को लग रहा था कि वह फट जाएगी।

"चीखो," राज ने कहा। "इतना जोर से चीखो कि यह आवाज़ मेरे कानों में दो दिन तक गूंजती रहे। मुझे तुम्हारी आवाज़ अपने साथ ले जानी है।"

"आह्ह्ह्ह! राज! हाँ! हाँ! मेरे राजा! मुझे तोड़ दो! मुझे बर्बाद कर दो!"

दुकान के बंद शटर के पीछे यह शोर किसी तूफान से कम नहीं था। एसी की ठंडक भी उनके पसीने को सुखा नहीं पा रही थी। वे एक-दूसरे से फिसल रहे थे, टकरा रहे थे।

अगर कोई बाहर खड़ा होता, तो उसे लगता कि अंदर कोई जानवर किसी को नोच रहा है।

और एक तरह से, यह सच भी था। वे एक-दूसरे को नोच रहे थे, खा रहे थे, एक-दूसरे में समाने की कोशिश कर रहे थे।
 
राज अब अपनी शारीरिक क्षमता की अंतिम सीमा पर था। पसीना उसकी आंखों में जा रहा था, उसकी मांसपेशियां जल रही थीं, लेकिन वह रुका नहीं। डॉली की योनि उसे चूस रही थी। वह संकुचित हो रही थी, राज के लिंग को किसी मशीन की तरह निचोड़ रही थी।

"मैं आ रही हूँ राज! मैं बिखर रही हूँ!" डॉली का सिर दाएं-बाएं हिल रहा था। उसके बाल टेबल पर झाड़ू की तरह बिखर गए थे। "मुझे रोक लो! मुझे पकड़ लो!"

"रुको मत! मेरे साथ आओ! आज हम साथ जाएंगे!"

राज ने डॉली को टेबल के बिल्कुल किनारे पर खींच लिया। अब उसका आधा शरीर हवा में था, सिर्फ कंधे और सिर टेबल पर टिके थे। उसका पूरा निचला हिस्सा राज के सामने, हवा में था।

राज ने उसके पैरों को पकड़कर पूरा खोल दिया।

"यह..." राज ने हांफते हुए कहा, उसका लिंग डॉली के मुहाने पर धड़क रहा था, "यह विदाई का तोहफा है।"

उसने अपनी कमर को मशीन की तरह चलाना शुरू किया। छोटे, लेकिन बेहद तेज़ और गहरे स्ट्रोक।

एक... दो... तीन... चार...

हर धक्का एक हथौड़े की तरह था जो डॉली की चेतना पर वार कर रहा था।

डॉली का मुंह खुला रह गया। आवाज़ नहीं निकल रही थी, सिर्फ हवा निकल रही थी। उसे अपनी आंखों के सामने तारे नज़र आने लगे। दुनिया घूम रही थी।

यह चरम सुख की वह अवस्था थी जहाँ दर्द और मज़ा एक हो जाते हैं। जहाँ इंसान को पता नहीं चलता कि वह जी रहा है या मर रहा है।

"राज... छोड़ दो... अंदर..." डॉली ने अपनी उंगलियां राज की नंगी पीठ में गड़ा दीं। उसके नाखून राज की त्वचा को छील रहे थे। खून की हल्की बूंदें उभर आईं। "मेरे अंदर... मुझे खाली मत छोड़ना..."

"हाँ मेरी जान... ले लो... सब ले लो..."

राज का शरीर अचानक अकड़ गया। उसकी नसों में जैसे लावा बहने लगा। उसे लगा जैसे उसकी रीढ़ की हड्डी से कोई करंट निकला है।

उसने एक जानवर जैसी, लंबी, दर्दनाक और विजयी दहाड़ मारी।

"आह्ह्ह्ह्ह्ह्ह!"

उसने खुद को डॉली के अंदर जितना गहरा हो सके, धंसा दिया और रुक गया। उसने डॉली को टेबल से दबा दिया।

उसका वीर्य... गर्म, गाढ़ा और प्रचुर मात्रा में... डॉली के अंदर फूट पड़ा।

एक लहर... दूसरी लहर... तीसरी लहर...

वह लगातार छोड़ता रहा। ऐसा लग रहा था कि वह अपनी पूरी जीवन शक्ति, अपना पूरा प्यार और अपना पूरा दर्द डॉली के अंदर उंडेल रहा है। वह उसे गर्भवती कर देना चाहता था, उसे अपना बना लेना चाहता था।

डॉली ने उस गर्मी को महसूस किया। वह गर्मी उसकी योनि से होती हुई उसके पेट, छाती और दिमाग तक पहुँच गई। उसका अपना शरीर भी ऐंठ गया और उसने अपना पानी छोड़ दिया। दोनों के रस मिल गए।

"गर्म है..." वह सिसकी, उसकी आंखें बंद थीं। "तुमने मुझे जला दिया राज... तुमने मुझे भर दिया..."

दोनों एक ही स्थिति में जमे रहे। राज का वजन डॉली के ऊपर था, और डॉली टेबल के किनारे लटकी हुई थी। समय जैसे थम गया था।

मिनट बीतते गए। उनकी सांसें धीरे-धीरे सामान्य होने लगीं, लेकिन दिल अभी भी भाग रहे थे।

राज ने धीरे से अपने आप को बाहर निकाला।

प्लॉप!

वीर्य की कुछ गाढ़ी बूंदें बाहर टपक कर फर्श पर गिरीं, लेकिन ज्यादातर अंदर ही था।

डॉली ने तुरंत अपनी टांगें बंद कर लीं। वह उस 'खजाने' को बाहर नहीं आने देना चाहती थी। वह उसे अपने अंदर सुरक्षित रखना चाहती थी।

राज ने उसे उठाया और टेबल पर सही से लिटाया। डॉली का शरीर बेजान सा था।

राज ने अपनी फटी हुई शर्ट उठाई और उससे डॉली का पसीना और चेहरा पोंछा।

डॉली की आंखें अभी भी बंद थीं। उसके चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी। वह डर, वह जलन, वह गुस्सा अब गायब था। उसकी जगह एक गहरी, नशीली संतुष्टि ने ले ली थी। उसके होंठों पर एक हल्की मुस्कान थी।

"अब ठीक हो?" राज ने उसके गाल को सहलाते हुए पूछा।

डॉली ने धीरे से आंखें खोलीं। उसने राज का हाथ पकड़ा और उसकी हथेली को चूम लिया।

"अब ठीक हूँ," उसने कहा। उसकी आवाज़ में नशा था। "अब तुम जा सकते हो। मुझे अब डर नहीं है।"

"क्यों?" राज ने पूछा।

"क्योंकि," डॉली ने अपने पेट पर हाथ रखा, "तुम मेरे अंदर हो। शहर वाली को तुम सिर्फ अपना शरीर दोगे, लेकिन तुम्हारी 'आग', तुम्हारा 'अंश' मैंने रख लिया है। यह मुझे दो दिन तक गर्म रखेगा।"

राज मुस्कुराया। यह एक अजीब तरह का प्यार था, लेकिन सच्चा था।

उसने झुककर डॉली के माथे, आंखों और होंठों को चूमा।

"मैं सोमवार सुबह पहली बस से आऊंगा," राज ने वादा किया। "और तुम्हारे लिए कुछ लाऊंगा।"

"क्या?"

"एक नई डायरी," राज ने कहा। "लाल वाली भर गई है। अब हमें नई कहानियों के लिए नई डायरी चाहिए। और... एक लाल सिंदूर की डिब्बी भी।"

डॉली चौंक गई। "सिंदूर?"

"हाँ," राज ने कहा। "तुमने कहा था ना कि तुम मेरी हो। तो निशानी पूरी होनी चाहिए।"

डॉली की आंखों में फिर से आंसू आ गए, लेकिन ये खुशी के आंसू थे। उसने अपनी साड़ी ठीक की। उसने अपने बाल संवारे।

वह टेबल से उतरी। उसके पैर थोड़े लड़खड़ाए, उसे चलने में दिक्कत हो रही थी। राज ने उसे थाम लिया।

"मैं जा रही हूँ," डॉली ने कहा। "इससे पहले कि विक्रम को शक हो। और वैसे भी... मुझे इस दर्द के साथ चलने में मज़ा आ रहा है।"

वह दरवाज़े तक गई। वहां रुककर उसने राज को देखा।

"सोमवार को..." उसने मुड़कर कहा, "सोमवार को दुकान मत खोलना। सीधे हवेली के पीछे वाले बगीचे में आना। मैं वहां मिलूँगी। मुझे उस सिंदूर का इंतज़ार रहेगा।"

राज ने सिर हिलाया। "जैसी आपकी आज्ञा, मालकिन।"

डॉली चली गई। गाड़ी स्टार्ट हुई और दूर चली गई।

राज ने दुकान की लाइट बंद की। वह अंधेरे में खड़ा रहा। हवा में अभी भी डॉली के पसीने, वीर्य और इत्र की गंध थी। उसने एक गहरी सांस ली।

उसने अपना बैग उठाया।

शहर जाने का वक्त हो गया था। लेकिन वह जानता था कि उसका असली घर अब वह शहर नहीं, बल्कि यह दुकान और डॉली की वह हवेली थी। वह एक ऐसा दर्जी बन चुका था जो कपड़ों को नहीं, बल्कि रूहों को सिलता था—वासना के रेशमी धागों से।

◆◆◆
 
स्थान: राज का शहर वाला घर

समय: शनिवार की सुबह और दोपहर

माहौल: थकान, मानसिक द्वंद और एक नई फंतासी

शनिवार की सुबह 10 बजे जब राज अपने शहर के छोटे से फ्लैट पर पहुँचा, तो वह शारीरिक रूप से निचुड़ा हुआ था, लेकिन मानसिक रूप से कहीं और भटक रहा था। बस के 5 घंटे के सफर में उसने अपनी आंखें एक पल के लिए भी नहीं झपकाई थीं। बस की खिड़की से आती गर्म हवा उसे राजगढ़ की याद दिला रही थी।

उसकी पीठ पर डॉली के नाखूनों की खरोंचें अब कपड़ों से रगड़ खाकर जल रही थीं, लेकिन यह जलन उसे दर्द नहीं, बल्कि एक अजीब सा नशा दे रही थी। उसे लग रहा था कि राजगढ़ की वो हवेली और वो बुटीक अभी भी उसके साथ चल रहा है।

उसने अपने घर की घंटी बजाई।

दरवाजा खुला। सामने सविता खड़ी थी। उसकी पत्नी।

34 साल की सविता। दो बच्चों की माँ। सांवली, थोड़ी भरी हुई, लेकिन घरेलू। उसने एक पुरानी, धुली हुई कॉटन की मैक्सी पहन रखी थी। उसके बालों में तेल लगा था और चेहरे पर सुबह की रसोई की थकान थी। वह डॉली की तरह रईस नहीं थी, न ही विद्या की तरह मॉडर्न। वह बस... एक पत्नी थी।

"आ गए?" सविता ने उसके हाथ से बैग लिया। "बहुत देर कर दी आज। मैं कब से राह देख रही थी। चाय बनाऊं या सीधा नहाओगे?"

राज ने अंदर कदम रखा। घर में वही पुरानी गंध थी—सब्जी के छौंक की, अगरबत्ती की और बच्चों के पाउडर की। यह गंध उसे पहले सुकून देती थी, लेकिन आज... आज उसे इस गंध में डॉली के पसीने की 'कस्तूरी' गंध की कमी खल रही थी।

"बस लेट थी," राज ने झूठ बोला और सोफे पर गिर गया। उसने अपनी शर्ट के ऊपर के बटन खोल दिए।

बच्चे स्कूल गए हुए थे। घर खाली था। सन्नाटा था।

सविता पानी का गिलास लेकर आई। राज ने उसे देखा। सविता झुककर गिलास मेज पर रख रही थी। मैक्सी के ढीले गले से उसके वक्षस्थल की हल्की झलक मिली। वे ढीले थे, मातृत्व के बोझ से झुके हुए, लेकिन भारी थे।

डॉली के तने हुए, कड़े स्तनों के मुकाबले यह नज़ारा बहुत साधारण था। लेकिन राज के दिमाग में शैतान जाग चुका था। राजगढ़ की हवस ने उसे बदल दिया था। उसने सोचा, "क्या मैं इस साधारण शरीर में उस असाधारण सुख को पा सकता हूँ? क्या मैं अपनी बीवी को अपनी 'रंडी' बना सकता हूँ?"

दोपहर का खाना खाने के बाद, राज अपने बेडरूम में लेटा था। सविता सारे काम निपटाकर कमरे में आई। उसने दरवाजा बंद किया और पंखा तेज़ कर दिया।

"आज बहुत थके हुए लग रहे हो," सविता बिस्तर के किनारे बैठी और राज के पैर दबाने लगी। उसके हाथ खुरदरे थे, डॉली जैसे मखमली नहीं। "राजगढ़ में काम बहुत बढ़ गया है क्या?"

राज ने अपनी आंखें बंद कर लीं। सविता का स्पर्श घरेलू था—सेवा भाव वाला। इसमें वो आग नहीं थी जो डॉली के स्पर्श में थी।

"हाँ," राज ने गहरी सांस ली। "बहुत काम है। वहां की औरतें... बहुत डिमांडिंग हैं। उन्हें सब कुछ परफेक्ट चाहिए। उन्हें इंच-इंच का हिसाब चाहिए।"

"अच्छी बात है," सविता ने मुस्कुराते हुए कहा। "पैसे आएंगे तो हम भी थोड़ा ऐश करेंगे।"

राज ने अचानक अपनी आंखें खोलीं और सविता का हाथ पकड़ लिया। उसका स्पर्श सख्त था, एक मालिक जैसा।

"सविता," उसने भारी आवाज़ में कहा। "खड़ी हो जाओ।"

सविता चौंक गई। हाथ रोककर उसने राज को देखा। "क्या हुआ? कुछ चाहिए?"

"खड़ी हो जाओ। मुझे तुम्हें देखना है।"

सविता झिझकते हुए खड़ी हो गई। "क्या देखोगे? वही पुरानी तो हूँ। मोटी हो गई हूँ। दो बच्चों के बाद शरीर कहाँ वैसा रहता है।"

राज बिस्तर से उठा। उसकी आंखों में नींद नहीं, नशा था। उसने अपने बैग से वह लाल रेशमी कपड़ा निकाला जो वह दुकान से लाया था। यह वही कपड़ा था जिसका ब्लाउज उसने डॉली के लिए सिला था, और जिसका स्पर्श उसे डॉली की याद दिलाता था।

"यह देखो," राज ने कपड़ा सविता के कंधों पर डाल दिया। रेशम सविता की पुरानी, फीकी मैक्सी पर सरसराया। लाल रंग ने सविता के सांवले चेहरे पर एक चमक ला दी।

"यह क्या है?" सविता की आंखें चमक उठीं। उसने कपड़े को छूकर देखा। "इतना महंगा कपड़ा? यह तो किसी रानी का लगता है। हमारे लिए?"

"तुम्हारे लिए," राज ने झूठ बोला। "मैं चाहता हूँ कि तुम इसे अभी, इसी वक्त अपने ऊपर लपेटो। मुझे नाप लेना है।"

"नाप? अभी?" सविता ने घड़ी देखी। "पागल हो गए हो क्या राज? दोपहर के 2 बज रहे हैं। कोई आ जाएगा।"

"कोई नहीं आएगा। बच्चे 4 बजे आएंगे," राज उसके करीब गया। वह इतना करीब था कि सविता को उसकी गर्म सांसें महसूस हो रही थीं। उसकी आंखों में एक ऐसी चमक थी जिसे सविता पहचान नहीं पाई। यह 12 साल पुराने पति की नज़र नहीं, एक नए, भूखे शिकारी की नज़र थी।

"मैक्सी उतारो," राज ने आदेश दिया।

सविता का दिल धक-धक करने लगा। शादी के इतने सालों बाद भी राज ने कभी दिन के उजाले में, इतनी बेबाकी और अधिकार से उसे नंगा होने को नहीं कहा था।

"राज... पर्दा तो लगा दो..." उसने फुसफुसाया। "शर्म आ रही है।"

राज ने मुड़कर खिड़की का भारी पर्दा खींच दिया। कमरे में एक मद्धम, पीली और नशीली रोशनी रह गई।

"अब उतारो," राज ने कहा, अपनी बांहें मोड़ते हुए। "मुझे देखना है कि शहर का दर्जी अपनी बीवी को कैसे तराश सकता है। मुझे देखना है कि इस मैक्सी के नीचे क्या छिपा है।"

सविता ने कांपते हाथों से अपनी मैक्सी के बटन खोले। उसके हाथ कांप रहे थे, डर से नहीं, बल्कि एक अजीब सी उत्तेजना से। उसका पति उसे 'चाह' रहा था।

मैक्सी नीचे गिर गई और उसके पैरों के पास ढेर हो गई।

अंदर उसने एक पुराना, सफेद सूती पेटीकोट और एक फीके रंग की, ढीली ब्रा पहनी थी। उसका पेट थोड़ा बाहर निकला हुआ था, जिस पर स्ट्रेच मार्क्स थे। उसकी जांघें भारी थीं।

लेकिन राज को आज सविता नहीं दिख रही थी। उसने अपनी कल्पना का चश्मा पहन लिया था। उसे सविता के भारी शरीर में डॉली का भरा-पूरा बदन दिखाई दे रहा था। उसे सविता के सांवले रंग में डॉली की चमक दिख रही थी।

राज ने अपनी पतलून की जेब से इंची-टेप निकाला। पीला टेप उसके हाथों में किसी चाबुक की तरह लग रहा था।

वह सविता के पीछे खड़ा हो गया। उसने टेप को सविता के कंधों पर रखा।

"सांस लो," राज ने उसके कान के पास फुसफुसाया। "गहरी सांस।"
 
सविता ने सांस ली। उसका सीना ऊपर उठा।

राज ने टेप को उसकी छाती के इर्द-गिर्द कसा। उसने जानबूझकर टेप को इतना टाइट किया कि सविता का मांस ब्रा के ऊपर से उभर आया।

"उई... राज... चुभ रहा है," सविता सिसकी। "इतना टाइट?"

"चुप रहो," राज ने उसके बालों को सूंघा। उसे वहां नारियल तेल की महक आई, लेकिन उसने अपनी कल्पना में उसे मोगरे के इत्र में बदल दिया। "मुझे कसाव चाहिए सविता। ढीलापन नहीं। आज तुम मेरी बीवी नहीं, मेरी मॉडल हो। और मॉडल सवाल नहीं करतीं।"

राज ने सविता को अपनी बांहों में जकड़ लिया। उसका सीना सविता की नंगी पीठ से सट गया। राज को महसूस हुआ कि उसका लिंग, जो सुबह से शांत था, अब अपनी पूरी ताकत से जाग चुका है। एक लोहे की छड़ जैसा सख्त उभार सविता के नितंबों के बीच पेटीकोट के ऊपर से दबा रहा था। यह उत्तेजना सविता के लिए नहीं थी, यह उस 'खेल' के लिए थी जो वह अपने दिमाग में खेल रहा था।

"राज..." सविता ने उसके कठोर पौरुष को अपनी पीठ पर महसूस किया। उसका शरीर सिहर उठा। "तुम... तुम आज बहुत अलग लग रहे हो। इतना गुस्सा? इतना जोश? पहले तो तुम ऐसे नहीं थे।"

"गुस्सा नहीं," राज ने उसके कंधे पर एक काट लिया। दांतों के निशान बन गए। "भूख है। बहुत दिनों की भूख। राजगढ़ की प्यास मैं यहाँ बुझाऊँगा।"

उसने सविता को घुमाया। अब वे आमने-सामने थे।

राज ने सविता की पुरानी ब्रा के हुक पर हाथ रखा।

"इसे हटाओ," उसने कहा। "यह बीच में आ रही है। मुझे नंगे बदन का नाप चाहिए।"

सविता ने हैरान होकर उसे देखा। "पूरी नंगी?"

"पूरी नंगी," राज ने उसकी आंखों में देखा। "दर्जी से क्या छिपाना?"

सविता ने उसे रोकने की कोशिश नहीं की। वह अपने पति के इस नए, आक्रामक रूप से सम्मोहित हो रही थी। उसने हुक खोल दिए।

ब्रा हट गई। सविता के भारी, 36 इंच के स्तन आज़ाद हो गए। वे गुरुत्वाकर्षण की वजह से थोड़े लटके हुए थे, लेकिन उनका आकार विशाल था।

राज ने उन्हें देखा। उसने अपनी आंखों को थोड़ा सिकोड़ा ताकि उसे सविता के बजाय डॉली का अक्स दिखे।

"बहुत भारी हैं..." राज बड़बड़ाया, अपने दोनों हाथों से उन्हें तौलते हुए। "बिल्कुल वैसे ही... भरने लायक।"

उसने सविता को बिस्तर पर धक्का दे दिया।

सविता गिर पड़ी। गद्दे ने उछाल मारी। वह हैरान थी, लेकिन डरी हुई नहीं। उसके अंदर की औरत, जो सालों से सिर्फ एक मां और पत्नी बनकर रह गई थी, आज जाग रही थी। उसे लगा कि उसका पति आज उसे फिर से 'भोगना' चाहता है, उसे एक वस्तु की तरह इस्तेमाल करना चाहता है, और यह ख्याल उसे गीला कर रहा था।

राज ने एक पल भी बर्बाद नहीं किया। उसने अपने कपड़े उतार फेंके। शर्ट के बटन टूटकर फर्श पर गिरे। पतलून उसने लात मारकर दूर कर दी।

उसका शरीर, जो राजगढ़ की धूप और डॉली की मालिशों से गठीला हो गया था, पसीने से चमक रहा था। सविता ने नीचे से उसे देखा। उसे लगा जैसे राज बदल गया है। उसके कंधों में ज्यादा चौड़ाई आ गई थी, उसके एब्स सख्त हो गए थे।

और उसका लिंग...

सविता की नज़रें वहां टिक गईं।

राज का लिंग आज उसे पहले से कहीं ज्यादा बड़ा, मोटा और गुस्से में तना हुआ लग रहा था। यह वह साधारण पति नहीं था जो शनिवार को थका-हारा आता था और सो जाता था। यह एक 'अल्फा मेल' था जो शिकार करने आया था। उसका पौरुष नसों से भरा हुआ था और लाल हो रहा था।

"राज..." सविता ने अपनी टांगें सिकोड़ लीं, एक अनजाने डर और खुशी के साथ। "यह... यह तो बहुत बड़ा लग रहा है आज। तुम... तुमने कुछ खाया है क्या? यह तो मुझे..."

राज उसके ऊपर चढ़ गया। उसने कोई जवाब नहीं दिया। उसके दिमाग में डॉली का चेहरा था, डॉली की आवाज़ थी जो कह रही थी—"मुझे भर दो राज! मेरी कोख भर दो!"

उसने सविता के दोनों हाथों को कलाई से पकड़ा और उसके सिर के ऊपर तकिये में दबा दिया। उसने उसे पूरी तरह बेबस कर दिया।

"आज तुम हिलोगी नहीं," राज ने गुर्राते हुए कहा। "आज मैं तुम्हें अपनी तरह से लूंगा। जैसे मैं चाहता हूँ।"

उसने सविता की जांघों को अपने घुटनों से चौड़ा कर दिया।

सविता का पेटीकोट कमर तक ऊपर चढ़ा हुआ था। वह पूरी तरह खुली हुई थी। उसकी योनि, जो दो बच्चों के जन्म के बाद थोड़ी ढीली हो सकती थी, आज राज के इस रूप को देखकर सिकुड़ रही थी, तैयार हो रही थी।

राज ने वहां हाथ नहीं लगाया। कोई फोरप्ले नहीं। कोई प्यार भरी बातें नहीं। उसने सीधे अपना विशाल लिंग सविता के मुहाने पर रखा।

सविता सूखी नहीं थी, पति के इस नए अवतार ने उसे गीला कर दिया था। लेकिन राज का साइज आज उसके लिए भी एक चुनौती था।

"ले लो इसे," राज ने कहा और एक ही झटके में, पूरी ताकत के साथ अपनी कमर को आगे धकेल दिया।

धप्प!

"आह्ह्ह्ह! माँ!" सविता चीख पड़ी। उसका शरीर धनुष की तरह तन गया। उसकी एड़ियां बिस्तर पर रगड़ गईं। "राज! धीरे! जान निकल जाएगी! उफ्फ... फट गया..."

राज ने उसे पूरा भर दिया था। जड़ तक। उसका पेट सविता के पेट से दब गया।

"धीरे नहीं," राज ने उसके कान को अपने दांतों के बीच दबा लिया और काट लिया। "आज कोई रहम नहीं। आज मुझे अपनी प्यास बुझानी है। बहुत दिनों से सूखा हूँ।"

राज ने पेलना शुरू किया।

यह संभोग नहीं था, यह एक तूफान था।

थप-थप-थप!

राज के धक्के इतने तेज़ और गहरे थे कि पुराना डबल बेड चरमराहट के साथ हिलने लगा। दीवार से टकराने की आवाज़ आ रही थी।

सविता का सिर तकिये में धंस रहा था। उसका शरीर राज की हर चोट को झेल रहा था। उसके भारी स्तन हर धक्के के साथ बुरी तरह हिल रहे थे, उछल रहे थे।

"राज... उफ्फ... तुम जानवर हो गए हो..." सविता सिसक रही थी, लेकिन उसने अपनी टांगें राज की कमर पर कस लीं। उसे इस दर्द में एक अजीब सा सुख मिल रहा था। सालों बाद उसे महसूस हो रहा था कि उसका योनि मार्ग पूरी तरह, इंच-इंच भरा हुआ है।
 
राज अपनी कल्पना में खोया हुआ था।

जब वह सविता के भारी स्तनों को दबा रहा था, तो उसे लग रहा था कि वह डॉली के रेशमी ब्लाउज को फाड़ रहा है। उसके हाथ सविता के मांस को बुरी तरह मसल रहे थे।

"तेरा यह बदन..." राज ने सविता के स्तनों को भींचते हुए कहा, "सिर्फ मेरा है। बोल किसका है?"

"तुम्हारा... राज... सिर्फ तुम्हारा..." सविता हांफ रही थी। उसका पसीना राज के पसीने से मिल रहा था।

राज ने सविता को पलट दिया।

"घोड़ी बनो," उसने आदेश दिया। "घुटनों पर आ जाओ।"

सविता हैरान थी। राज ने कभी उसे ऐसे नहीं लिया था। लेकिन आज वह सम्मोहित थी। वह घुटनों और कोहनियों के बल हो गई। उसका भारी पिछवाड़ा हवा में था।

राज ने उसके नितंबों पर हाथ फेरा। वे भारी थे, डॉली की तरह। उसने कल्पना की कि यह डॉली है जो उसके सामने झुकी है।

"आह..." राज ने एक थप्पड़ मारा। चटाक!

सविता का शरीर हिल गया। "राज!" उसने पीछे मुड़कर देखा। उसकी आंखों में आंसू थे, लेकिन कामुकता तैर रही थी। "मारो... और मारो..."

राज ने पीछे से प्रवेश किया।

इस बार उसने कोई लिहाज नहीं किया। वह उसे जानवरों की तरह ठोकने लगा।

सविता का पेट बिस्तर से दब रहा था। उसके स्तन चादर से रगड़ खा रहे थे।

"हाय दैया... फट जाऊंगी मैं..." सविता बड़बड़ा रही थी। "आज क्या हो गया है तुम्हें... उफ्फ... इतना अंदर... मेरी बच्चेदानी तक लग रहा है..."

राज की रफ़्तार बढ़ती जा रही थी। वह अपनी पत्नी को नहीं, अपनी फैंटेसी को भोग रहा था। वह अपनी प्रेमिका की यादों को अपनी पत्नी के शरीर पर उतार रहा था।

"डॉली..." यह नाम उसके गले तक आकर रुक गया। उसने उसे बाहर नहीं आने दिया, बल्कि उसे एक गुर्राहट में बदल दिया।

"मेरी रंडी..." राज ने सविता के बालों को खींचते हुए कहा। "ले मेरा पानी... पी जा इसे..."

सविता यह सुनकर पागल हो गई। उसका सीधा-सादा पति आज उसे गालियां दे रहा था, उसे रंडी बुला रहा था। यह अपमानजनक था, लेकिन बिस्तर पर यह अपमान ही सबसे बड़ा नशा था।

"हाँ... मैं तुम्हारी रंडी हूँ राज... बजाओ मुझे... तोड़ दो मुझे... मुझे भर दो..."

राज अब अपनी सीमा पर था। उसे वह नज़ारा याद आया जब उसने डॉली को टेबल पर लिया था।

उसने सविता की कमर को लोहे की तरह जकड़ लिया।

"मैं आ रहा हूँ सविता! मैं आ रहा हूँ! संभालना इसे!"

"अंदर! राज... प्लीज बाहर मत निकालना... मुझे बच्चा चाहिए... मुझे तुम्हारा यह रूप चाहिए! मुझे पूरा भर दो!"

राज ने एक लंबी, दर्दनाक और जंगली दहाड़ मारी।

"आह्ह्ह्ह्ह्ह!"

उसने खुद को सविता के अंदर जितना गहरा हो सके, धंसा दिया। उसका शरीर अकड़ गया। नसें तन गईं।

उसने अपना वीर्य—जो पिछले 5 दिनों से जमा था, जो डॉली और विद्या की यादों से उबल रहा था—सविता के अंदर छोड़ दिया।

फव्वारे की तरह। गर्म। गाढ़ा। और अंतहीन।

सविता को लगा जैसे उसके अंदर पिघला हुआ सोना भर दिया गया हो। उसका अपना शरीर भी ऐंठ गया और उसने राज के लिंग को निचोड़ते हुए अपना पानी छोड़ दिया। दोनों के रस मिल गए।

दोनों एक-दूसरे के ऊपर गिर पड़े।

बिस्तर गीला हो चुका था। कमरा उनकी भारी सांसों और पसीने की गंध से भरा हुआ था।
 
बिस्तर गीला हो चुका था। कमरा उनकी भारी सांसों और पसीने की गंध से भरा हुआ था।

राज सविता की पीठ पर लेटा था, उसका चेहरा तकिये में गड़ा था। वह बुरी तरह हांफ रहा था। उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसने एक साथ दो औरतों को भोगा है—हकीकत में सविता को, और ख्यालों में डॉली को।

तूफान थम चुका था, लेकिन उसकी तबाही और खूबसूरती अभी भी कमरे में बिखरी हुई थी।

राज धीरे से सविता के ऊपर से हटा और बगल में लेट गया। उसका शरीर अभी भी कांप रहा था। पसीना चादर पर सोख रहा था।

सविता वैसे ही पड़ी रही, पेट के बल। उसकी टांगें फैली हुई थीं। वह हिल भी नहीं पा रही थी। उसका पूरा शरीर झनझना रहा था।

कुछ मिनटों की खामोशी के बाद, सविता ने धीरे से करवट ली। उसने अपनी साड़ी के पल्लू को उठाया और अपना पसीना पोंछा। फिर उसने राज की तरफ देखा।

उसका चेहरा खिला हुआ था। एक ऐसी चमक थी जो राज ने शादी के शुरुआती सालों के बाद कभी नहीं देखी थी। यह एक संतुष्ट औरत की चमक थी। उसके गाल लाल थे, होंठ सूजे हुए थे।

सविता खिसक कर राज के पास आई और अपना सिर उसके सीने पर रख दिया। उसने अपनी उंगलियां राज के छाती के बालों में फेरना शुरू किया।

"राज..." सविता ने बहुत धीमी, नशीली आवाज़ में कहा। "आज... आज तुमने मुझे मार ही डाला था। सच में।"

राज ने कोई जवाब नहीं दिया, बस उसके बालों को सहलाया। उसे एक अजीब सा अपराधबोध हो रहा था, लेकिन साथ ही एक जीत का अहसास भी। उसने अपनी पत्नी को खुश किया था, भले ही जरिया कोई और था।

"सच कहूँ," सविता ने अपना चेहरा ऊपर उठाया और राज की आंखों में देखा, "आज मुझे लगा ही नहीं कि तुम मेरे पुराने राज हो। आज तुम... 'नये' लग रहे थे। बहुत ताकतवर।"

"नया?" राज ने पूछा।

"हाँ," सविता ने अपना हाथ नीचे ले जाकर राज के शिथिल पड़े लिंग पर रख दिया। उसने उसे प्यार से सहलाया। "तुम्हारा यह... यह भी आज नया लग रहा था।

इतना बड़ा, इतना सख्त तो यह सुहागरात पर भी नहीं था। ऐसा लग रहा था जैसे किसी और का है। और तुमने जितनी देर तक किया... उफ्फ... मेरे पैर अभी भी कांप रहे हैं। तुमने मुझे पूरा खोल दिया।"

सविता ने राज को कसकर गले लगा लिया। उसने अपना पैर राज के पैरों में फंसा लिया।

"मेरी प्यास बुझ गई राज," उसने कहा। "सच में। मुझे नहीं पता था कि सुख ऐसा भी होता है। मुझे लगा था कि शादी के बाद बस बच्चे और जिम्मेदारी होती है। हम तो मशीन बन गए थे। लेकिन आज... आज तुमने मुझे बताया कि मैं अभी भी एक औरत हूँ। एक रसीली औरत।"

राज का दिल पसीज गया। उसने अनजाने में ही सही, लेकिन अपनी पत्नी को वह खुशी दे दी थी जिसकी वह हकदार थी। डॉली ने उसे जो आग दी थी, उस आग से उसने सविता के बुझे हुए दीये को जला दिया था।

"तुम्हें अच्छा लगा?" राज ने पूछा।

"अच्छा?" सविता ने उसकी छाती पर चुंबन लिया। "मुझे इसकी आदत पड़ गई है राज। मुझे ऐसा ही प्यार चाहिए। हर शनिवार। हर रविवार। मुझे वो सीधा-सादा प्यार नहीं चाहिए। मुझे यही जंगलीपन चाहिए। क्या तुम दोगे? क्या तुम हर हफ्ते मुझे ऐसे ही तोड़ोगे?"

राज मुस्कुराया। यह एक खतरनाक खेल था। वह अपनी पत्नी को अपनी प्रेमिका की तरह ट्रीट कर रहा था। लेकिन अगर इससे घर में खुशी आ रही थी, तो हर्ज क्या था?

"दूँगा," राज ने कहा। "हर हफ्ते। जब भी मैं राजगढ़ से आऊंगा... मैं तुम्हारे लिए एक 'नया राज' लाऊंगा। जो सिर्फ तुम्हारा होगा।"

सविता खुश हो गई। उसने राज के गले में बाहें डाल दीं। "और वो लाल कपड़ा?" उसने पूछा। "वो ब्लाउज? क्या तुम सिलोगे?"

"हाँ," राज ने कहा। "मैं खुद सिलूँगा। एकदम टाइट। जैसा मुझे पसंद है। अगली बार तुम वही पहनोगी। और मैं उसे फाड़ूँगा।"

शाम हो गई। बच्चे घर आ गए। घर का माहौल फिर से सामान्य हो गया। लेकिन बेडरूम की हवा बदल चुकी थी। सविता अब गुनगुना रही थी। वह रसोई में काम करते हुए भी बीच-बीच में रुककर मुस्कुरा रही थी और अपनी कमर को सहला रही थी जहाँ राज ने उसे पकड़ा था।

लेकिन राज... राज का मन फिर से अशांत होने लगा था।

उसने अपनी पत्नी को खुश तो कर दिया था, लेकिन उसकी अपनी प्यास अभी भी बाकी थी। सविता के शरीर ने उसे राहत तो दी थी, लेकिन डॉली की वह रईसी और विद्या की वह बेबाकी... वह उसे यहाँ नहीं मिल सकती थी। सविता एक आदत थी, डॉली एक नशा।

रात को जब सब सो गए, तो राज बालकनी में गया। उसने राजगढ़ की दिशा में देखा।

उसने अपना फोन निकाला और अपना सीक्रेट सिम कार्ड डाला।

एक मैसेज आया हुआ था। डॉली का।

"सांस नहीं आ रही। जल्दी आ जाओ। सिंदूर ले आना। पिछला दरवाज़ा खुला रहेगा।"

राज ने फोन बंद कर दिया।

उसका शरीर अभी भी सविता की गंध से भरा था, लेकिन उसका दिमाग सोमवार की सुबह का प्लान बना रहा था।

"बस एक दिन और," उसने खुद से कहा। "सोमवार को हवेली का पिछला दरवाज़ा खुलेगा। और तब... तब असली प्यास बुझेगी।"

उसने अपनी जेब में हाथ डाला और सिंदूर की उस छोटी डिब्बी को टटोला जो उसने बाज़ार से खरीदी थी। वह जानता था कि यह डिब्बी उसकी ज़िंदगी में आग लगाने वाली है। और वह उस आग में जलने के लिए तैयार था।

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हवेली का पिछला दरवाज़ा

सोमवार की सुबह। राजगढ़ का आसमान अभी पूरी तरह से नहीं जागा था। सूरज की किरणें बादलों के पीछे से झांकने की कोशिश कर रही थीं, जिससे फिज़ा में एक धुंधला सा, रहस्यमयी उजाला फैला हुआ था। हवा में रात की ठंडक और ओस की नमी थी।

लेकिन राज के लिए यह सुबह ताजी नहीं थी। वह बस के 3 घंटे के थका देने वाले सफर से चूर होकर आया था।

लाल रंग की राज्य परिवहन की बस जब राजगढ़ के बस अड्डे पर रुकी, तो उसके टायरों से उड़ी धूल ने राज के जूतों को गंदा कर दिया। वह बस से नीचे उतरा। उसके कपड़े—एक सादी चेक वाली शर्ट और काली पतलून—में सिलवटें पड़ी हुई थीं।

उसकी आंखों में नींद की कमी थी और चेहरे पर एक दिन की बढ़ी हुई दाढ़ी। उसके शरीर पर शहर की धूल, बस की रेक्सीन वाली सीटों की पुरानी गंध, और उसके अपने शरीर का 24 घंटे पुराना, बासी पसीना बसा हुआ था।

आम तौर पर, कोई भी प्रेमी अपनी प्रेमिका से मिलने जाने से पहले खुद को साफ करता, इत्र लगाता। लेकिन आज राज के पास एक अलग ही आदेश था। डॉली का आदेश।

"नहाकर मत आना। मुझे तुम्हारी यात्रा की थकान, तुम्हारा पसीना, तुम्हारी वो 'मर्द' वाली गंध चाहिए। मुझे कच्चा राज चाहिए।"

राज ने एक रिक्शा किया।

"बड़ी हवेली के पीछे वाले रास्ते पर छोड़ दो," उसने रिक्शे वाले से कहा। "माली के गेट के पास।"

रिक्शा चल पड़ा। ठंडी हवा राज के पसीने से भीगे बालों को छू रही थी। उसका दिल एक अजीब सी रफ़्तार से धड़क रहा था। यह धड़कन डर की नहीं थी, यह उस रोमांच की थी जो एक चोर को खजाना लूटने से पहले महसूस होता है।

वह उस हवेली में जा रहा था जहाँ उसका प्रवेश वर्जित था, उस औरत के पास जो समाज की नज़रों में एक देवी थी, लेकिन उसके लिए एक प्यासी भूमि।

हवेली का पिछला हिस्सा एक बड़े, पुराने बगीचे की तरफ खुलता था। यहाँ आम, जामुन और अमरुद के घने पेड़ थे, जिनकी छांव में दिन में भी अंधेरा रहता था। यह रास्ता नौकरों, मालियों और सफाई कर्मचारियों के लिए था। लेकिन आज, यह एक गुप्त प्रेमी का रास्ता था।

राज ने रिक्शे वाले को पैसे दिए और उसे भेज दिया। सन्नाटा छा गया। सिर्फ पक्षियों की चहचहाहट थी।

उसने लोहे का छोटा, जंग लगा गेट धीरे से धक्का दिया।‘’

चूँ...

गेट की आवाज़ सन्नाटे में गूंजी, लेकिन वह खुला था। जैसा डॉली ने वादा किया था।

राज अंदर दाखिल हुआ। उसके जूते सूखी पत्तियों पर पड़ रहे थे। वह पेड़ों की आड़ लेता हुआ, किसी छाया की तरह हवेली की पिछली दीवार की तरफ बढ़ा। उसका दिल गले में आ गया था। अगर कोई देख लेता? अगर विक्रम (पति) का जाना कैंसिल हो गया होता? अगर कोई नौकर जाग गया होता?

लेकिन हवस का नशा डर से कहीं बड़ा था।

वह पिछले दरवाजे तक पहुँचा। यह लकड़ी का पुराना, नक्काशीदार दरवाजा था जो सीधे हवेली के गलियारे में खुलता था।

दरवाजा हल्का सा, बस एक इंच खुला था।

राज ने अपनी हथेली उस पर रखी और उसे धकेला।

दरवाजा खुला। वह अंदर फिसल गया और दरवाजा वापस सटा दिया।

अंधेरा।

बाहर की रोशनी अंदर नहीं आ रही थी। गलियारे में घुप अंधेरा था और पुरानी हवेली की वो खास गंध थी—चंदन, पुराने कपड़े और नमी की गंध।

राज की आँखें अंधेरे में समायोजित होने लगीं।

तभी, उसे एक आहट सुनाई दी।‘

और फिर, एक साया दीवार से अलग हुआ।

डॉली।

राज उसे देखते ही सांस लेना भूल गया।

उसने उसे हमेशा भारी साड़ियों, जेवरों और मेकअप में देखा था। एक रईस मालकिन के रूप में। लेकिन आज... आज उसके सामने जो औरत खड़ी थी, वह डॉली नहीं, बल्कि उसकी 'रखैल' लग रही थी।

उसने एक बेहद पुराना, झीना और मलमल का सफेद कुर्ता पहना था। कुर्ता इतना पतला था कि अंधेरे में भी उसके नीचे की त्वचा की चमक दिख रही थी। उसके नीचे उसने कुछ नहीं पहना था—न ब्रा, न पेटीकोट। बस एक तंग, सफेद चूड़ीदार पायजामी थी जो उसकी जांघों और पिंडलियों पर दूसरी चमड़ी की तरह चिपकी थी।

कुर्ते का गला गहरा और ढीला था। उसके भारी स्तन उस कपड़े के अंदर आज़ाद थे। उनके काले घेरे और खड़े हुए निप्पल उस सफेद कपड़े को चीरकर बाहर झांक रहे थे। उसके बाल खुले थे, बिखरे हुए थे, और चेहरे पर कोई मेकअप नहीं था—सिर्फ एक ऐसी प्यास थी जो किसी जानवर की आँखों में होती है।

राज को देखते ही डॉली ने उसे अपनी तरफ खींचा और दरवाजा लॉक कर दिया।

"आ गए तुम..." उसकी आवाज़ में एक राहत थी, एक सिसकी थी।

उसने राज को बोलने का मौका नहीं दिया। वह उस पर टूट पड़ी।

उसने राज को दीवार से सटा दिया और अपना चेहरा उसकी गर्दन और कंधे के बीच गड़ा दिया।

राज का पसीना उसकी नाक से टकराया।

डॉली ने एक लंबी, गहरी, हिचकी लेती हुई साँस खींची।

"आह्ह्ह..." उसके मुँह से एक मदहोश कर देने वाली आवाज़ निकली। "बासी... एकदम बासी... खट्टा और नमकीन..."

उसने राज की गर्दन को चाटना शुरू किया। वहां बस के सफर की धूल और पसीने की परत जमी थी। आम तौर पर किसी रईस औरत को इससे उल्टी आ जाती, लेकिन डॉली इसे शहद की तरह चाट रही थी। अपनी जीभ से वह राज की त्वचा का मैल साफ कर रही थी।

"मुझे यही चाहिए था राज," वह उसके कान में फुसफुसाई, उसका गीला मुँह राज के कान की लौ को चूस रहा था। "तुम्हारे पसीने में शहर की थकान नहीं, एक 'मर्द' की मेहनत की खुशबू है। विक्रम तो महंगे साबुनों से नहाकर बिस्तर में आता है, प्लास्टिक जैसा लगता है। बेजान। लेकिन तुम... तुम मिट्टी जैसे महक रहे हो। असली।"
 
राज ने अपना बैग नीचे गिरा दिया। उसने अपने दोनों हाथ डॉली की पीठ पर रखे। मलमल का कपड़ा उसकी उंगलियों के नीचे पिघल रहा था। उसने उसे अपनी बांहों में इतना कसकर जकड़ लिया कि डॉली की पसलियां दुखने लगीं।

"मैं आ गया डॉली," राज ने उसकी बालों में अपना मुँह छिपाते हुए कहा। "तुम्हारी प्यास बुझाने। जैसा तुमने कहा था, बिना नहाए। अपनी सारी गंदगी, सारी खुशबू लेकर। मैं सिर्फ तुम्हारे लिए हूँ।"

डॉली ने उसे धक्का दिया और उसके सामने घुटनों के बल नीचे बैठ गई। गलियारे का फर्श ठंडा था, लेकिन डॉली को इसकी परवाह नहीं थी।

"आज तुम कुछ नहीं करोगे," डॉली ने नीचे से ऊपर राज की आँखों में देखते हुए कहा। उसकी आँखों में एक शैतानी, मालकिन वाली चमक थी। "आज मैं खेलूंगी। आज तुम मेरे खिलौने हो। मुझे देखना है कि शहर से तुम मेरे लिए क्या बचाकर लाए हो।"

उसने राज की बेल्ट पर हाथ रखा। खट! बेल्ट खुल गई।

फिर उसने बटन खोला और जिप नीचे की। ज़िप्प!

उसने राज की पतलून और अंडरवियर को एक साथ पकड़कर नीचे खींच दिया।

राज का लिंग... जो पूरे 5 घंटे के सफर में डॉली की यादों में तना हुआ था, जिसे कपड़ों की रगड़ ने और भी संवेदनशील बना दिया था, अब आज़ाद होकर डॉली के चेहरे के सामने झूल रहा था।

वह 8 इंच का, काला, मोटा और नीली नसों से भरा हुआ मूसल था। उस पर भी सफर की उमस और राज की अपनी तीखी गंध थी।

डॉली ने उसे देखा। उसकी आँखें फैल गईं। अंधेरे में भी वह चमक रहा था।

"बाप रे..." उसने उसे अपनी मुट्ठी में पकड़ा। "यह तो सूज गया है राज। यह तो फटने को तैयार है। कितना गुस्सा है इसमें।"

उसने उसे सूंघा। उसने अपने गाल उससे रगड़े। वह उसकी गर्मी को अपने ठंडे गालों पर महसूस कर रही थी।

"मेरा नाश्ता..." उसने मुस्कुराते हुए कहा।

उसने अपना मुँह पूरा खोला और राज के लिंग के टोपे को अपने अंदर ले लिया।

डॉली आज बहुत आक्रामक थी। वह उसे प्यार से नहीं चूस रही थी, वह उसे खा रही थी। वह अपनी जीभ को राज के लिंग की नसों पर फिरा रही थी, उसके निचले हिस्से को चाट रही थी।

"स्लप... गप... स्लप..."

गलियारे के सन्नाटे में गीली, चूसने की आवाज़ें गूंजने लगीं।

राज ने दीवार का सहारा लिया। उसका सिर पीछे दीवार से टिक गया। डॉली का मुँह बहुत गर्म और गीला था। उसका थूक राज के लिंग को चिकना कर रहा था। वह उसे जड़ तक अपने गले में उतार रही थी। उसे राज के गले में अटकने का अहसास पसंद आ रहा था।

"आह... डॉली..." राज ने उसके सिर पर हाथ रखा और उसकी उंगलियां उसके खुले बालों में उलझ गईं। "तुम तो... तुम तो जान ले लोगी... इतना अंदर..."

डॉली रुकी नहीं। उसने अपने एक हाथ से राज के अंडकोषों को सहलाना शुरू किया, उन्हें तौला, और दूसरे हाथ से उसकी जांघों को दबाया। वह राज को पूरी तरह निचोड़ लेना चाहती थी।

करीब 15 मिनट तक वह उसे चूसती रही। राज की टांगें कांपने लगी थीं।

"बस..." राज ने उसकी बालों को खींचकर उसे रोका। "अगर और किया तो मैं यहीं छूट जाऊंगा। और मुझे यह खजाना यहाँ नहीं, तुम्हारी तिजोरी में भरना है। तुम्हारी कोख में।"

डॉली ने मुँह हटाया। एक पॉप की आवाज़ आई। उसके होंठों पर राज की प्री-कम की चमकदार बूंदें लगी थीं। उसने उन्हें अपनी जीभ से चाट लिया, जैसे कोई मलाई चाट रहा हो।

"नमकीन..." उसने खड़े होते हुए कहा। "चलो। ऊपर चलो। मेरे बेडरूम में। आज वो बिस्तर तुम्हारा गवाह बनेगा।"

वे सीढ़ियां चढ़कर ऊपर गए। हवेली सुनसान थी। बेडरूम का भारी दरवाजा खुला और बंद हुआ।

बेडरूम में एसी की ठंडक थी। किंग-साइज बेड पर दूधिया सफेद चादर बिछी थी, जो अब गंदी होने वाली थी।

डॉली ने राज को बिस्तर के पास खड़ा किया।

"कपड़े उतारो," उसने आदेश दिया। "पूरे। मुझे तुम्हारा नंगा बदन देखना है।"

राज ने अपनी शर्ट उतार दी। पतलून और अंडरवियर को लात मारकर दूर कर दिया। वह पूरी तरह नंगा था। उसका सांवला, गठीला शरीर, जिस पर पसीने की परत थी, डॉली के सामने था।

डॉली ने भी अपना कुर्ता ऊपर खींचा और उतार फेंका।

अब वह सिर्फ अपनी सफेद चूड़ीदार पायजामी में थी। ऊपर से पूरी तरह नंगी।

उसके भारी, 36 इंच के गोरे स्तन आज़ाद हो गए। वे गुरुत्वाकर्षण के कारण थोड़े लटके हुए थे, लेकिन उनका वजन और आकार किसी भी मर्द को पागल करने के लिए काफी था। उनके निप्पल काले, बड़े और अंगूर जैसे थे।

राज की नज़रें उन पर जम गईं। उसने अपनी कल्पना में इन्हें हज़ार बार देखा था।

"ये..." राज ने आगे बढ़कर उन्हें अपने हाथों में भर लिया। वे हाथ में नहीं आ रहे थे। "ये मेरे हैं।"

डॉली ने राज को बिस्तर पर धकेल दिया।

"लेट जाओ," उसने कहा।
 
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