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Adultery ' गाँव का टेलर '

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राज लेट गया। डॉली उसके ऊपर चढ़ गई। उसने अपनी पायजामी नहीं उतारी। वह चाहती थी कि कपड़े की रगड़ राज को तड़पाए।

उसने अपने भारी स्तनों को राज के मुँह पर लटका दिया।

"इन्हें पियो," उसने कहा। "और नीचे... नीचे मैं अपना काम करूँगी।"

डॉली ने राज के लिंग को अपनी जांघों के बीच फंसा लिया। उसकी चूड़ीदार पायजामी का कपड़ा रेशमी था। राज का लिंग उसकी रानों के बीच रगड़ खा रहा था।

ऊपर राज डॉली के स्तनों को चूस रहा था, उन्हें काट रहा था, और नीचे डॉली उसे अपनी जांघों से मसल रही थी।

"राज... तुम बहुत बड़े हो..." डॉली हाँफ रही थी। "आज मैं तुम्हें पूरा खोलूँगी। आगे से भी, और पीछे से भी।"

कुछ देर बाद, डॉली उठी। उसने अपनी पायजामी उतार दी। अब वह पूरी तरह नंगी थी। उसका भरा-पूरा, मलाईदार बदन राज के सांवले शरीर के ऊपर चमक रहा था।

राज ने उसे पलट दिया। वह बिस्तर पर बैठ गया और डॉली को अपने सामने बैठा लिया।

"रुको," राज ने कहा। "पहले रस्म पूरी करनी है। जो वादा किया था।"

उसने अपनी पतलून की जेब से (जो फर्श पर पड़ी थी) वह सिंदूर की डिब्बी निकाली।

डॉली की आँखें चमक उठीं। "तुम लाए..."

"हाँ," राज ने डिब्बी खोली। लाल रंग एसी की रोशनी में चमक रहा था। "लेकिन मांग में नहीं। मांग दुनिया के लिए है।"

"तो कहाँ?" डॉली ने पूछा।

राज ने अपनी उंगली सिंदूर में डुबोई।

उसने डॉली के दोनों स्तनों के बीच, उस गहरी घाटी में एक लंबी, लाल लकीर खींच दी। लाल रंग गोरी त्वचा पर खून जैसा लग रहा था। फिर उसने डॉली की नाभि के चारों ओर सिंदूर से एक गोला बनाया। और अंत में... उसने डॉली की जांघों को फैलाया और उसकी योनि के ऊपर के बालों पर थोड़ा सा सिंदूर छिड़क दिया।

"यह मेरा इलाका है," राज ने कहा, अपनी सिंदूर वाली उंगली को चूमते हुए। "यह दिल, यह नाभि और यह कोख... यह मेरी जागीर है।"

डॉली काँप उठी। यह अधिकार, यह मालिकाना हक उसे पागल कर रहा था। उसे लगा जैसे राज ने उसे खरीद लिया हो।

"मुझे ले लो राज," उसने कहा, राज के चरणों में गिरकर। "घोड़ी बनाओ मुझे। मुझे जानवर की तरह लो। मुझे बताओ कि मैं किसकी हूँ।"

डॉली बिस्तर पर घुटनों और हाथों के बल हो गई।

उसका विशाल, गोरा पिछवाड़ा हवा में था। वह इतना चौड़ा और भारी था कि राज को लगा वह किसी पहाड़ के सामने खड़ा है। उसकी योनि पीछे से साफ दिख रही थी, गुलाबी और गीली।

राज उसके पीछे खड़ा हो गया। उसने डॉली के नितंबों पर अपनी सिंदूर वाली उंगली से एक 'R' लिख दिया।

"राज की अमानत," उसने कहा और एक ज़ोरदार थप्पड़ मारा।

चटाक!

आवाज़ कमरे में गूंज गई। डॉली का पूरा मांसल शरीर हिल गया।

"आह! और मारो! लाल कर दो!" डॉली चिल्लाई।

राज ने अपने लिंग को डॉली के पीछे से सेट किया।

"डालो..." डॉली ने पीछे मुड़कर अपनी नशीली आँखों से देखा। "पूरा जड़ तक। रहम मत करना।"

राज ने डॉली की कमर को कसकर पकड़ा और एक ही झटके में प्रवेश किया।

धप्प!

"आह्ह्ह्ह्ह!" डॉली का सिर गद्दे में धंस गया। उसने तकिए को दांतों से पकड़ लिया। "माँ! कलेजा हिला दिया! उफ्फ... कितना भरा हुआ है..."

राज ने उसे पेलना शुरू किया।

थप-थप-थप!

उसके जांघ डॉली के भारी नितंबों से टकरा रहे थे। हर टक्कर पर एक गूंज हो रही थी। राज ने डॉली की कमर को पकड़ रखा था और उसे पीछे खींच रहा था ताकि वह और गहराई तक जा सके। डॉली के स्तन हवा में झूल रहे थे और हिल रहे थे।

"जोर से राज! और जोर से!" डॉली चिल्ला रही थी। "मुझे बताओ कि तुम शहर से क्या सीखकर आए हो! मुझे तोड़ दो!"

राज ने रफ़्तार बढ़ा दी। वह उसे बुरी तरह ठोक रहा था।

"तेरा यह मटका..." राज ने उसके नितंबों को मसलते हुए कहा, "आज मैं इसे भर दूँगा।"

अचानक, डॉली ने कहा, "राज... रुको।"

राज रुक गया। वह हांफ रहा था। "क्या हुआ?"

डॉली ने अपनी उंगली पीछे की तरफ की। अपने गुदा द्वार की तरफ।

"वहां..." उसने फुसफुसाया। "पिछला दरवाज़ा।"

राज हैरान रह गया। "पक्का? दर्द होगा डॉली। मेरा साइज़..."

"मुझे दर्द चाहिए," डॉली ने जिद की। "मुझे पूरा खुलना है। आज कोई छेद मत छोड़ना। मुझे अपनी रखैल बना लो।"

राज ने साइड टेबल से बॉडी लोशन उठाया और डॉली के नितंबों के बीच डाल दिया। उसने अपनी उंगली से वहां रास्ता बनाया। डॉली ने दांत भींच लिए।

"डालो..." उसने कहा।

राज ने अपना लिंग सेट किया। और दबाव बनाया।

रास्ता बहुत तंग था। डॉली का शरीर अकड़ गया।

"आह... उफ्फ..." डॉली सिसकी।

राज ने एक झटका मारा। टोपा अंदर गया।

"आह्ह्ह्ह्ह्ह!" डॉली चीख पड़ी। "फट गया! राज! बहुत मोटा है! निकालो!"

"रिलैक्स..." राज ने उसे नहीं निकाला, बल्कि उसके नितंबों को फैलाया। "साँस लो। ढीला छोड़ो।"

उसने धीरे-धीरे धक्के मारने शुरू किए।

कुछ ही पलों में, वह पूरा अंदर था। डॉली का शरीर कमान की तरह तन गया था। उसे लगा जैसे उसके पेट में कोई लोहे की रॉड डाल दी गई हो।

"हिलाओ..." डॉली ने कहा, दर्द और मजे के बीच झूलते हुए। "रुकना मत।"

राज ने गुदा मैथुन शुरू किया।

यह बहुत टाइट था। डॉली की मांसपेशियां राज के लिंग को किसी रबर बैंड की तरह निचोड़ रही थीं। राज को जन्नत का अहसास हो रहा था।

"ओह गॉड... डॉली..." राज गुर्राया। "तेरी पिछली गुफा तो कमाल है..."

"मारो! रगड़ो इसे!" डॉली ने अपने हाथ गद्दे में गड़ा दिए। "मेरी आंतों तक आ जाओ!"
 
राज ने अब अपनी पूरी ताकत लगा दी। वह उसे जानवरों की तरह रगड़ रहा था। पसीना दोनों के शरीरों से बह रहा था। डॉली के बाल बिखर गए थे। सिंदूर पसीने के साथ बहकर उसके स्तनों पर लकीरें बना रहा था।

यह नज़ारा किसी आदिम युद्ध जैसा था।

"मैं तेरी रंडी हूँ राज! तेरी और सिर्फ तेरी!" डॉली चिल्ला रही थी। "भर दे मुझे! गंदा कर दे!"

राज ने डॉली के पीछे से निकाला। एक पॉप की आवाज़ आई।

डॉली हांफते हुए बिस्तर पर गिर पड़ी। वह पसीने में नहा चुकी थी।

"अभी नहीं," राज ने उसे उठाया। "अभी मुझे तुम्हारा चेहरा देखना है। आईने में। मुझे देखना है कि जब मैं तुम्हें भरता हूँ तो तुम कैसी लगती हो।"

उसने डॉली को बिस्तर से नीचे उतारा। उसे लेकर वह ड्रेसिंग टेबल के बड़े आईने के सामने गया।

"खड़ी हो जाओ," उसने कहा।

डॉली के पैर कांप रहे थे, लेकिन वह खड़ी हो गई।

"टांगें फैलाओ।"

डॉली ने आईने के सामने टांगें फैला दीं। राज उसके पीछे था। आईने में वह देख सकती थी कि राज का विशाल पौरुष उसके नितंबों के बीच से झांक रहा था।

"टांगें उठाओ," राज ने कहा।

डॉली ने अपनी एक टांग ड्रेसिंग टेबल के स्टूल पर रख दी। अब वह पूरी तरह खुली हुई थी। उसका सबसे निजी हिस्सा आईने में राज के सामने था।

राज ने फिर से (योनि में) प्रवेश किया। खड़े-खड़े।

यह पोज़िशन सबसे गहरी थी। राज का लिंग सीधा ऊपर की तरफ जा रहा था।

राज ने डॉली के स्तनों को पीछे से पकड़ लिया। वह उन्हें बुरी तरह मसल रहा था।

"देख," राज ने आईने में इशारा किया। "देख कैसे मैं तुझे ले रहा हूँ। देख तेरी ये जवानी कैसे हिल रही है।"

डॉली ने आईने में देखा। वह नज़ारा उसे और पागल कर गया। एक सांवला, पसीने से लथपथ मर्द उसकी गोरी, मखमली पीठ पर झुका हुआ उसे बेरहमी से प्यार कर रहा था। उसके स्तन राज की उंगलियों में दब रहे थे, उनका आकार बदल रहा था।

"मैं आ रही हूँ राज! मैं नहीं रुक सकती!" डॉली का सिर पीछे राज के कंधे पर टिक गया। "मुझे पकड़ लो!"

"तो ले ले! सब ले ले!"

राज ने अपनी रफ़्तार बढ़ा दी। वह उसे आईने के सामने ठोक रहा था। डॉली की योनि राज के लिंग को बुरी तरह चूसने लगी।

"आह्ह्ह्ह्ह!" डॉली एक लंबी, दर्दनाक चीख के साथ चरम पर पहुँच गई। उसका शरीर राज की बांहों में झूल गया।

लेकिन राज अभी बाकी था।

उसने डॉली को घुमाया। अब वे आमने-सामने थे।

राज ने डॉली को गोद में उठा लिया। डॉली ने अपनी टांगें राज की कमर पर लपेट लीं।

राज उसे लेकर कमरे के बीच में आया।

वह खड़ा था, और डॉली उस पर लटकी हुई थी। वह उसे हवा में पेल रहा था।

"अब..." राज ने कहा, उसकी साँसें उखड़ रही थीं। "अब मैं तुम्हें अपनी निशानी दूंगा।"

उसने खड़े-खड़े, डॉली को दीवार से सटा दिया।

उसने अपने घुटने थोड़े मोड़े, डॉली को कसकर भींचा और एक आखिरी, गहरा, जानलेवा धक्का मारा।

"आह्ह्ह्ह्ह्ह!"’

राज ने एक जानवर जैसी दहाड़ मारी। उसका शरीर अकड़ गया।

उसने अपना सारा, ढेर सारा गर्म, गाढ़ा वीर्य डॉली के अंदर, बहुत गहराई में, उसकी बच्चेदानी के मुहाने पर उड़ेल दिया।

एक... दो... तीन... चार...

फव्वारे की तरह।

डॉली ने उस गर्मी को अपने पेट में महसूस किया। वह गर्मी उसकी रगों में दौड़ गई। गुरुत्वाकर्षण की वजह से वीर्य सीधा अंदर जा रहा था, बाहर नहीं आ रहा था।

"गर्म है... बहुत गर्म है..." वह बुदबुदाई, राज के पसीने से भीगे कंधे को चूमते हुए।

राज उसे लेकर बिस्तर पर गिर पड़ा।

दोनों एक-दूसरे में उलझे हुए थे। पसीना, सिंदूर और वीर्य—सब एक हो गया था।

बिस्तर पर सिंदूर के लाल धब्बे लग गए थे, जो उनके मिलन की गवाही दे रहे थे।

काफी देर तक वे वैसे ही पड़े रहे। जिस्म से जिस्म सटा हुआ।

राज ने धीरे से बाहर निकाला। डॉली ने तुरंत अपनी टांगें बंद कर लीं।

"बाहर मत आने दो," उसने कहा। "इसे अंदर रहने दो। यह मेरी ताकत है।"

राज उठा। उसने अपने बैग से एक और चीज़ निकाली।

काले रंग की चमड़े की डायरी।

"यह क्या है?" डॉली ने पूछा, चादर से अपना बदन ढकते हुए।

"लाल डायरी भर गई," राज ने कहा। "शहर से यह नई लाया हूँ। काली डायरी। इसमें हम वो सब लिखेंगे जो हम आगे करने वाले हैं।"

राज ने डायरी खोली और पहले पन्ने पर एक शब्द लिखा।

'विद्या'

डॉली ने वह नाम पढ़ा। वह चौंकी नहीं, बल्कि मुस्कुराई।

"विद्या?" उसने पूछा। "मेरी ननद? उसे भी अपनी डायरी में जगह दोगे?"

"उसने जगह बना ली है," राज ने डॉली की आँखों में देखते हुए सच कह दिया। "वह दुकान पर आई थी। उसने भी... नाप दिया है। बहुत गहरा नाप।"

डॉली उठकर बैठ गई। चादर उसके शरीर से गिर गई।

"तुमने उसे छुआ?" डॉली ने पूछा। उसकी आवाज़ में गुस्सा नहीं, बल्कि जिज्ञासा थी।
 
राज ने डायरी खोली और पहले पन्ने पर एक शब्द लिखा।

'विद्या'

डॉली ने वह नाम पढ़ा। वह चौंकी नहीं, बल्कि मुस्कुराई।

"विद्या?" उसने पूछा। "मेरी ननद? उसे भी अपनी डायरी में जगह दोगे?"

"उसने जगह बना ली है," राज ने डॉली की आँखों में देखते हुए सच कह दिया। "वह दुकान पर आई थी। उसने भी... नाप दिया है। बहुत गहरा नाप।"

डॉली उठकर बैठ गई। चादर उसके शरीर से गिर गई।

"तुमने उसे छुआ?" डॉली ने पूछा। उसकी आवाज़ में गुस्सा नहीं, बल्कि जिज्ञासा थी।

"हाँ," राज ने कहा। "और उसने मुझे छुआ। वह आग है डॉली। तुम पानी हो, वह आग है।"

डॉली कुछ पल चुप रही। फिर उसके चेहरे पर एक अजीब सी, रहस्यमयी मुस्कान आई।‘

"मुझे पता था," उसने कहा। "उसकी आँखों में देख सकती थी मैं। वह मुझे कल रात ही बता रही थी कि 'शर्मा जी' बहुत टैलेंटेड हैं।"

उसने राज का हाथ पकड़ा।

"तो अब क्या?" उसने पूछा। "क्या तुम मुझे छोड़ दोगे उसके लिए?"

"कभी नहीं," राज ने उसे खींचकर अपने पास लिया। "मैंने कहा ना, यह सिंदूर तुम्हारे लिए है। लेकिन... मुझे तुम दोनों चाहिए। एक साथ।"

डॉली हंसी। एक बेपरवाह, कामुक हंसी।‘

"बड़ा लालची दर्जी है तू," उसने राज की नाक खींची। "ठीक है। अगर तू हम दोनों को संभाल सकता है... तो मुझे मंज़ूर है। मुझे भी देखना है कि वह शहर की लड़की तेरे नीचे कैसे तड़पती है।"

उसने राज के कान में फुसफुसाया, "अगले हफ्ते... हवेली में कोई नहीं होगा। मैं विद्या को बुलाऊंगी। हम तीनों... इसी बिस्तर पर... इस काली डायरी का पहला पन्ना भरेंगे।"

राज का शरीर फिर से जाग उठा। दो रानियों का सपना सच होने वाला था।‘

"मंज़ूर है," राज ने कहा।

उसने अपने कपड़े पहने। डॉली ने उसे पिछले दरवाजे तक छोड़ा।

जाते-जाते डॉली ने उसे रोका।

"राज," उसने अपने सीने पर लगी सिंदूर की लकीर दिखाई जो अब पसीने से थोड़ी फैल गई थी। "मैं इसे नहीं मिटाऊंगी। मैं आज पूरा दिन इसे ऐसे ही रखूँगी। अपने कपड़ों के नीचे। यह मुझे याद दिलाता रहेगा कि आज सुबह क्या हुआ था।"

राज ने मुस्कुराकर उसे आखिरी बार देखा और बगीचे के रास्ते बाहर निकल गया।

सुबह की धूप अब तेज़ हो रही थी। राज सड़क पर आया। वह थका हुआ था, लेकिन उसकी आत्मा तृप्त थी। उसने जेब में रखी काली डायरी को थपथपाया।

कहानी अब एक नए मोड़ पर थी। लाल डायरी बंद हो चुकी थी, और काली डायरी का खेल—जिसमें दो रानियां और एक बादशाह होगा—शुरू होने वाला था।

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: नौकरानी का इम्तिहान

स्थान: 'अप्सरा लेडीज बुटीक', राजगढ़

समय: मंगलवार की दोपहर 1:00 बजे

माहौल: साजिश, पसीना और एक नई चुनौती’

सोमवार की सुबह हवेली के उस पिछले दरवाजे पर हुए राज और डॉली के मिलन ने दोनों की रूह को तृप्त कर दिया था। उस सिंदूर की रस्म और बेडरूम के आईने के सामने हुए मिलन ने उनके रिश्ते को एक नया आयाम दे दिया था।

मंगलवार की दोपहर। राजगढ़ का बाज़ार लू के थपेड़ों से झुलस रहा था। सड़कें वीरान थीं। कुत्ते भी छांव ढूंढ रहे थे। राज अपनी दुकान के काउंटर पर बैठा, अपनी उस काली डायरी में कुछ लिख रहा था। एसी की ठंडक उसे बाहरी दुनिया से बचा रही थी, लेकिन उसके अंदर की आग अभी शांत नहीं हुई थी।

तभी उसका फोन बजा। स्क्रीन पर डॉली का नाम फ्लैश हुआ।‘’

राज ने तुरंत फोन उठाया।

"जी मालकिन?"

"अकेले हो?" डॉली की आवाज़ में एक अजीब सी खनक और रहस्य था।

"हाँ। इस धूप में कौन आएगा?"

"एक ग्राहक आ रहा है," डॉली ने कहा। "और यह ग्राहक बहुत खास है।"

"कौन?"

"तुम्हें याद है मैंने कहा था कि हवेली में कोई और भी है जो हमारे राज़ जानती है?" डॉली ने पूछा।

"हाँ," राज सतर्क हो गया। "तुम्हारी नौकरानी?"

"हाँ, रिंकी," डॉली ने कहा। "वह बहुत चालाक है, राज। उसने कल सुबह तुम्हें पिछले दरवाजे से निकलते हुए देख लिया था। उसने मेरे सीने पर सिंदूर का निशान भी देख लिया था जब मैं नहाने जा रही थी। और..." डॉली हंसी, एक गहरी, आश्वस्त हंसी, "...उसने बिस्तर की चादर पर वो धब्बे भी देख लिए जो हमने छोड़े थे।"

राज का दिल धक से रह गया। "तो? क्या उसने विक्रम को बता दिया? क्या ब्लैकमेल कर रही है?"

"अरे नहीं, बुद्धू," डॉली ने कहा। "वह वफादार है। लेकिन... वफादारी की कीमत होती है। और रिंकी की कीमत पैसा नहीं है। रिंकी भी प्यासी है राज। उसका पति शराबी है, उसे मारता है, लेकिन उसे 'छूता' नहीं है। उसका खेत बरसों से बंजर पड़ा है। जब उसने मुझे उस हाल में देखा... चमकते हुए, संतुष्ट, मेरे चेहरे का ग्लो... तो उसकी भी भूख जाग गई।"

"तो?" राज ने पसीना पोंछा।

"तो मैंने उसे तुम्हारे पास भेजा है," डॉली ने आदेश दिया। "अभी। वह दुकान आ रही है। मेरा ब्लाउज ठीक कराने के बहाने। लेकिन उसे ब्लाउज ठीक नहीं कराना। उसे 'वो' चाहिए जो तुमने मुझे दिया। उसे भी नाप चाहिए। उसे भी अपनी गुफा भरनी है।"

राज चुप रहा। यह मामला पेचीदा होता जा रहा था।

"सुनो," डॉली की आवाज़ सख्त हो गई, एक असली मालकिन वाली आवाज़। "यह उसका इम्तिहान है। और तुम्हारा भी। मैं देखना चाहती हूँ कि तुम एक अनपढ़, गंवार और जंगली औरत को कैसे संभालते हो। अगर तुमने उसे खुश कर दिया... उसे इतना तोड़ दिया कि वह किसी और मर्द के बारे में सोच भी न सके... तो वो हमारी सबसे बड़ी राज़दार बन जाएगी। और अगर नहीं..."

"अगर नहीं?"

"तो खेल खत्म। राज, उसे ऐसा निचोड़ना कि वह कल सुबह चल न पाए। मुझे उसकी चाल में लंगड़ाहट चाहिए। मुझे देखना है कि मेरा दर्जी कितना काबिल है।"

फोन कट गया।

राज ने फोन रखा। उसके हाथों में पसीना आ गया था। एक नई चुनौती। एक देसी औरत। डॉली मखमली थी, रईस थी, उसे संभालना एक कला थी। लेकिन रिंकी... रिंकी तो कच्चा मांस होगी।

तभी दुकान के कांच के दरवाज़े पर एक भारी हाथ की थाप पड़ी।

राज ने देखा।

रिंकी अंदर दाखिल हुई।

रिंकी। 35 साल की। रंग गहरा साँवला, धूप में तपा हुआ, जैसे पक्की हुई ईंट हो। उसका शरीर डॉली की तरह जिम में तराशा हुआ या डायटिंग से दुबला नहीं था। यह मेहनत, मजदूरी और चक्की पीसने से बना हुआ ठोस, मांसल और भरा-पूरा शरीर था।

उसने एक भड़कीली, जामुनी रंग की सस्ती सिंथेटिक साड़ी पहनी थी। साड़ी के पल्लू पर बड़े-बड़े फूल बने थे। साड़ी सस्ती थी, लेकिन जिस तरह से उसने उसे अपनी कमर पर कसकर बांधा था, वह किसी भी मर्द की नीयत खराब करने के लिए काफी था।

उसका ब्लाउज... वह तो एक अलग ही कहानी कह रहा था। वह हरे रंग का था, और इतना तंग था कि उसकी पीठ का मांस हुक के आसपास से गुब्बारों की तरह उभर रहा था। सिलाई जगह-जगह से खिंची हुई थी।

उसके स्तन... वे विशाल थे। डॉली के 36 के मुकाबले ये कम से कम 40 के रहे होंगे। वे लटके हुए थे, लेकिन उनमें एक देसी वजन और भारीपन था। जब वह चल रही थी, तो वे ब्लाउज के अंदर किसी तूफ़ान की तरह हिल रहे थे, टकरा रहे थे।

और उसका पिछवाड़ा... वह तो तबाही था। चौड़ा, फैला हुआ और इतना मांसल कि साड़ी का कपड़ा वहां तन गया था। 42 इंच का घेरा, जो किसी भी सोफे को भरने के लिए काफी था।

रिंकी के हाथ में एक कपड़े का थैला था। वह चलते हुए काउंटर तक आई। उसके शरीर से महंगे परफ्यूम की नहीं, बल्कि सस्ते चमेली के तेल, टेलकम पाउडर और ताज़े पसीने की एक तेज़, तीखी गंध आ रही थी। यह गंध एसी की ठंडक में भी अपनी जगह बना रही थी, नथुनों में घुस रही थी।

"नमस्ते शर्मा जी," रिंकी ने थैला काउंटर पर पटका। उसकी आवाज़ में लज्जा नहीं, एक ललकार थी। उसकी बड़ी-बड़ी काली आंखें, जिनमें मोटा काजल लगा था, राज को ऊपर से नीचे तक ऐसे टटोल रही थीं जैसे कोई कसाई बकरे को तोलता है।

"मेमसाब ने भेजा है। कहती हैं ब्लाउज ढीला है। पर मुझे तो लगता है शर्मा जी... ढीला ब्लाउज नहीं, मेमसाब का पुर्जा-पुर्जा ढीला कर दिया है तुमने।"

राज काउंटर से उठा। उसने रिंकी की आंखों में देखा। वहां डर नहीं, भूख थी।

उसने शटर का रिमोट उठाया।‘

चर्र-चर्र-चर्र...

शटर आधा गिर गया। फिर पूरा। दुकान दिन के उजाले से कट गई। अंदर सिर्फ पीली रोशनी रह गई।

"ढीला करना मेरा काम है रिंकी," राज ने उसके करीब जाकर कहा। "और कसना भी।"

रिंकी हंसी। एक बहुत ही कामुक, देसी हंसी। उसने अपना पल्लू कमर में खोंस लिया, जिससे उसकी भारी छाती और आगे आ गई।

"सुना है तुम शहर से बहुत बड़े कारीगर बनकर आए हो," रिंकी ने काउंटर पर झुकते हुए कहा। झुकते ही उसके ब्लाउज की गहरी दरार राज के सामने आ गई। वहां, स्तनों के बीच पसीने की बूंदें चमक रही थीं। "मेमसाब तो कल से हवा में उड़ रही हैं। उनकी चाल बदल गई है। उनके सीने पर वो लाल निशान..." उसने अपनी जीभ होठों पर फेरी, "...मैंने देख लिया था जब वो कुल्ला कर रही थीं। मच्छर का तो नहीं था वो।"

राज ने उसकी कलाई पकड़ ली। रिंकी की कलाई मोटी और मज़बूत थी। उसने उसे अपनी तरफ खींचा।‘

"तो तुम क्या चाहती हो? शोर मचाना?"’



"शोर तो मुझे मचाना है मास्टर," रिंकी ने राज का हाथ पकड़ा और उसे अपनी छाती पर रख दिया। ब्लाउज के ऊपर से। राज को उसके स्तनों की गजब की गर्मी और नरमी महसूस हुई। "लेकिन बिस्तर पर। मुझे देखना है कि जिस मशीन ने मेमसाब को पागल कर दिया, उसमें कितना दम है। क्या वह इस 'देसी इंजन' को चला पाएगा? या फुस्स हो जाएगा?"

यह एक खुली चुनौती थी। क्लास बनाम मास। रेशम बनाम खादी।
 
राज को नशा चढ़ गया। डॉली के साथ उसे संभलकर रहना पड़ता था, लेकिन रिंकी... रिंकी कच्ची मिट्टी थी जिसे रौंदने का, मसलने का मज़ा ही कुछ और था।

"आ जाओ," राज ने ट्रायल रूम की तरफ इशारा किया। "इम्तिहान शुरू करते हैं।"

रिंकी ट्रायल रूम की तरफ नहीं गई। उसने वहीं दुकान के बीचो-बीच अपनी चप्पलें उतार दीं।

"ट्रायल रूम नहीं," उसने नाक सिकोड़ी। "वो कोठरी मेमसाब के लिए ठीक है। वो नाजुक हैं। मुझे खुली जगह चाहिए। मुझे ज़मीन पसंद है। अगर गिरूँ, पडूँ, तो आवाज़ आनी चाहिए।"’’

उसने दुकान के फर्श पर बिछी कालीन की तरफ देखा।

"यहीं। इस ज़मीन पर। ताकि मेरी चीखें दीवारों में समा जाएं।"

राज ने अपनी शर्ट के बटन तोड़े और उसे उतार फेंका। उसका शरीर तनाव में था। एब्स चमक रहे थे।

रिंकी ने उसे देखा। उसकी सांसें भारी हो गईं।

"बदन तो गठीला है," उसने राज की छाती के बालों को खींचा, जोर से। "लोहा है। लेकिन क्या नीचे भी दम है? मेरे पति का तो पी-पीकर सुकड़ गया है। बरसों से सूखा पड़ा है मेरा खेत। क्या तुम हल चला पाओगे? या सिर्फ ऊपर से ही दिखावा है?"

राज ने बिना कुछ बोले रिंकी की साड़ी का पल्लू खींचा।

"हल ऐसा चलेगा रिंकी," राज ने उसकी आंखों में झांका, "कि ज़मीन फट जाएगी। और आज... आज बारिश होगी। तेरे अंदर।"

राज ने रिंकी की साड़ी के फेंटे को पकड़ा और एक ही झटके में उसे खोल दिया। 6 मीटर का सस्ता जामुनी कपड़ा गोल-गोल घूमता हुआ फर्श पर लहरा गया।

रिंकी ने कोई शर्म नहीं दिखाई। वह हिली तक नहीं। वह चाहती थी कि राज उसे देखे।

अब वह सिर्फ अपने तंग, हरे रंग के ब्लाउज और एक पुराने, लाल रंग के सूती पेटीकोट में खड़ी थी।

उसका ब्लाउज पसीने से भीगा हुआ था, खासकर बगलों और छाती के नीचे का हिस्सा गहरे रंग का हो गया था।

राज ने उसे देखा। यह शरीर 'परफेक्ट' नहीं था। पेट पर चर्बी की दो-तीन तहें थीं, बांहें मोटी और मांसल थीं। लेकिन इसमें जो कामुकता थी, वह किसी मॉडल में नहीं मिल सकती थी। यह एक असली, जीती-जागती, मांसल औरत थी जिसका हर अंग भरा हुआ था।

"ब्लाउज उतारो," राज ने हुक्म दिया। उसकी आवाज़ दुकान में गूंजी।

"खुद उतार लो," रिंकी ने अपनी कमर पर हाथ रखकर चुनौती दी। "अगर दम है तो। मेरे हुक जंग खाए हुए हैं, आसानी से नहीं खुलेंगे।"

राज आगे बढ़ा। उसने रिंकी को घुमाया।

उसने ब्लाउज के हुक को खोलने की कोशिश नहीं की। उसने दोनों हाथों से ब्लाउज के पीछे के हिस्से को पकड़ा और पूरी ताकत से विपरीत दिशा में खींचा।

चट-चट-चट!

हुक टूटने की आवाज़ें किसी पटाखे जैसी थीं। कपड़ा फट गया।

ब्लाउज रिंकी के शरीर से अलग हो गया।

अंदर रिंकी ने कोई ब्रा नहीं पहनी थी।

उसके विशाल स्तन आज़ाद हो गए।

वे भारीपन की वजह से लटके हुए थे, और उनका आकार किसी बड़े पपीते या मटके जैसा था। वे गोरे नहीं, सांवले थे। और उनके निप्पल... वे कोयले जैसे काले और अंगूर के बराबर बड़े थे। वे पसीने से गीले और चिकने थे।‘



"बाप रे..." राज के मुंह से निकल गया। उसने आज तक इतने बड़े और भारी स्तन नहीं देखे थे। डॉली के स्तन सुंदर थे, लेकिन रिंकी के स्तन 'खतरनाक' थे।

"क्या हुआ?" रिंकी ने राज की हैरानी देखी। वह घूमी। उसने अपने स्तनों को दोनों हाथों से नीचे से उठाया और राज के चेहरे के सामने तौल दिया। "डर गए? यह शहर की नाजुक कली नहीं है मास्टर। यह देसी माल है। इसे संभालने के लिए बड़े हाथ चाहिए। और बड़ा जिगरा भी।"

राज ने अपना चेहरा उन दोनों मांसल पहाड़ों के बीच गड़ा दिया। उसने उन्हें सूंघा। वहां पसीने, सरसों के तेल और मसालों की मिली-जुली गंध थी। यह गंध किसी महंगे इत्र से ज्यादा उत्तेजक थी। यह गंध उसे जानवर बना रही थी।

उसने उन्हें चाटना शुरू किया।

स्लप...

उसकी जीभ रिंकी के पसीने को पी रही थी।

"आह! मास्टर!" रिंकी ने राज का सिर पकड़कर अपनी छाती में भींच लिया। उसने राज के बालों को बुरी तरह नोचा। "खा जा इन्हें! चबा जा! निचोड़ दे मेरा दूध!"

राज ने उसके निप्पल को अपने मुंह में भरा। पूरा निप्पल मुंह में नहीं आ रहा था। उसने उसे दांतों से काटा। जोर से।

"हाए मैया!" रिंकी चिल्लाई। "जोर से! और जोर से! खून निकाल दे!"

वह अपने पेटीकोट का नाड़ा खोलने लगी। उसके हाथ कांप रहे थे।

पेटीकोट नीचे गिर गया।

रिंकी पूरी तरह नंगी थी।

उसका शरीर... वह मांस का एक पहाड़ था। उसकी जांघें इतनी मोटी थीं कि खड़े होने पर आपस में रगड़ खा रही थीं। और उनके बीच... बालों का एक घना, काला और जंगली जंगल था, जो उसकी नाभि तक फैला हुआ था।

उसका पिछवाड़ा... वह तो देखने लायक था। 42 इंच का विशाल घेरा। जब वह हिलती, तो उसमें लहरें उठती थीं।
 
राज ने उसे देखा। उसका लिंग पतलून के अंदर तड़प रहा था, दर्द कर रहा था। उसने अपनी पतलून और अंडरवियर को एक साथ उतार फेंका।‘

उसका 8 इंच का काला, नसों वाला लिंग बाहर आया। वह तनकर खड़ा हो गया, कांप रहा था।

रिंकी की आंखें फटी रह गईं। उसका मुंह खुला का खुला रह गया।

"हे भगवान..." वह अनायास ही घुटनों के बल बैठ गई। उसने उसे छुआ। उंगली लगाते ही लिंग उछल पड़ा। "यह तो... यह तो लोहे का रॉड है। सच में... इतना बड़ा? मेमसाब सच कह रही थीं..."

उसने उसे अपनी मुट्ठी में लिया। उसकी मुट्ठी पूरी बंद नहीं हो पा रही थी।

"यह मेरे अंदर जाएगा?" उसने डर और खुशी के मिले-जुले भाव से पूछा।

"जाएगा," राज ने कहा, उसके बालों को पकड़ते हुए। "रास्ता बनाएगा। और अगर रास्ता नहीं होगा, तो तोड़कर जाएगा।"

रिंकी ने उसे अपने मुंह में ले लिया।

डॉली का मुख-मैथुन सधा हुआ और तकनीकी था, लेकिन रिंकी का... रिंकी का जंगली था। वह उसे चूस नहीं रही थी, वह उसे गटकने की कोशिश कर रही थी। उसका मुंह बहुत गर्म, खुरदरा और गीला था। वह 'गप-गप' की आवाज़ के साथ उसे चूस रही थी। उसकी जीभ राज के लिंग के नीचे की नसों को चाट रही थी।

"स्लप... गप..."

आवाज़ें दुकान में गूंज रही थीं।

राज को लगा उसकी रूह खिंच रही है। रिंकी के गले की पकड़ बहुत मज़बूत थी।

"बस..." राज ने उसे हटाया। "अगर और किया तो यहीं काम हो जाएगा। अब लेटने की बारी है।"

उसने रिंकी को कालीन पर लिटा दिया।

रिंकी का भारी शरीर ज़मीन पर फैल गया। उसके स्तन दाएं-बाएं लुढ़क गए। उसका पेट सांसों के साथ ऊपर-नीचे हो रहा था।‘

राज उसके पैरों के बीच आया। उसने रिंकी की दोनों भारी, खंभे जैसी टांगों को उठाकर अपने कंधों पर रख लिया।

नज़ारा डरावना और उत्तेजक था। रिंकी की योनि का मुहाना खुला हुआ था, गहरा गुलाबी, मांसल और बहुत गीला। वहां से रस बहकर कालीन पर गिर रहा था।

"तैयार है?" राज ने पूछा, अपना लिंग सेट करते हुए।

"फाड़ दे," रिंकी ने अपनी एड़ियां राज की पीठ पर गड़ा दीं। "सोचना मत। बस डाल दे। एक बार में।"

राज ने अपने लिंग को मुहाने पर रखा और एक ज़ोरदार, बेरहम धक्का मारा।

धप्प!

राज का मोटा लिंग रिंकी की मांसल गुफा में धंसता चला गया।‘’

"आह्ह्ह्ह्ह!" रिंकी की आवाज़ से दुकान के कांच हिल गए। "माँ री! मर गई! उफ्फ... पूरा भर गया..."

राज को लगा जैसे उसने किसी दलदल में पैर रख दिया हो। अंदर की पकड़ जबरदस्त थी। मांस उसे चारों तरफ से भींच रहा था, चूस रहा था।

वह पूरा जड़ तक गया। रिंकी का पेट हिल गया। उसे अपनी नाभि के नीचे राज का टोपा महसूस हुआ।

"बहुत बड़ा है..." रिंकी हांफ रही थी, उसकी आंखें पलट गई थीं। "मेरी कोख हिला दी... हाय..."

राज ने पेलना शुरू किया।

थप-थप-थप!

यह संभोग नहीं था, यह कुश्ती थी।

राज के धक्के इतने तेज़ थे कि रिंकी का भारी शरीर कालीन पर आगे खिसक रहा था। रगड़ से कालीन पर जलन हो रही थी। उसके स्तन उसके चेहरे पर थप्पड़ मार रहे थे।

"जोर से! ए मास्टर! दिखा अपनी ताकत!" रिंकी उसे उकसा रही थी। वह अपनी एड़ियाँ राज की पीठ पर मार रही थी, उसे और गहरा जाने के लिए मजबूर कर रही थी।

"ले साली..." राज गुर्राया। "ले और ले... यही चाहिए था ना तुझे..."

वह उसे बुरी तरह ठोक रहा था। पसीना दोनों के शरीरों से बहकर कालीन को गीला कर रहा था। पसीने की गंध अब पूरे कमरे में भर गई थी।

राज ने रिंकी के दोनों हाथों को कलाई से पकड़कर ज़मीन पर सिर के ऊपर दबा दिया। वह उसके ऊपर पूरी तरह हावी था।

"बोल किसकी है तू?" राज ने पूछा, हर धक्के के साथ।

"तेरी... मालिक... तेरी रंडी हूँ..." रिंकी चिल्लाई। "मेमसाब की नहीं, तेरी हूँ!"

"डॉली मालकिन है, और तू नौकरानी। लेकिन आज... आज तू मेरी रानी है। मेरी देसी रानी।"

राज ने उसे पलट दिया।

"घूम जा," उसने कहा। "मुझे तेरा पिछवाड़ा देखना है। वो मटका।"

रिंकी घुटनों और हाथों के बल हो गई।

उसका विशाल पिछवाड़ा हवा में था। वह किसी बड़े ढोल जैसा लग रहा था। चिकना, काला और बहुत बड़ा।

राज ने पास रखी तेल की शीशी उठाई और पूरी उस पर उड़ेल दी। तेल उसके नितंबों और जांघों के बीच बहने लगा।
 
राज ने एक ज़ोरदार थप्पड़ मारा।

चटाक!

आवाज़ बम जैसी थी। रिंकी का पूरा शरीर लहरों की तरह हिल गया।

"आह! मजा आ गया!" रिंकी चिल्लाई। "और मार! लाल कर दे!"

राज ने उसे लाल कर दिया। उसके हाथों के निशान छप गए।

फिर उसने पीछे से प्रवेश किया।

इस बार आवाज़ और भी तेज़ थी।

स्लप... स्लप...

रिंकी का पेट ज़मीन से दब रहा था। राज उसे पीछे से बालों से पकड़कर खींच रहा था और नीचे से धक्के मार रहा था। उसके जांघ रिंकी के भारी नितंबों से टकरा रहे थे।

"ओह्ह्ह... राज... तू तो जानवर है..." रिंकी सिसक रही थी। "मेरे पति ने कभी ऐसा नहीं किया... तूने मुझे तोड़ दिया... मेरी हड्डी-पसली एक कर दी..."

राज अब रुकने वाला नहीं था। रिंकी की 'देसी' गर्मी ने उसे पागल कर दिया था। वह डॉली की तरह नाज़ुक नहीं थी, वह हर चोट सह सकती थी। उसे जितना दर्द मिल रहा था, वह उतनी ही जोर से राज को अपने अंदर खींच रही थी।

"राज..." रिंकी ने पीछे मुड़कर देखा। उसका चेहरा पसीने और बालों से सना था। "पीछे..."

"क्या?" राज ने धक्का मारते हुए पूछा।

"पीछे डाल," रिंकी ने अपनी उंगली अपने गुदा की तरफ की। "वहां भी खुजली है। आज उसे भी मिटा दे।"

राज हैरान था। "वहां? फट जाएगी रिंकी।"

"फटने दे," रिंकी ने कहा। "आज मुझे पूरा खुलना है। तेल लगा है, डाल दे।"

राज ने अपना लिंग निकाला। एक पॉप की आवाज़ आई।

उसने तेल लिया और रिंकी के गुदा द्वार पर मला। उसने अपनी उंगली से रास्ता बनाया। रिंकी ने दांत भींच लिए।

"डाल..." उसने कहा।

राज ने अपना लिंग सेट किया और दबाव बनाया।

रास्ता बहुत तंग था।‘’

"आह... उफ्फ..." रिंकी सिसकी।

राज ने एक झटका मारा। टोपा अंदर गया।

"हाय मैया!" रिंकी चिल्लाई। "जान निकल गई!"

लेकिन उसने राज को हटने नहीं दिया। "रुकना मत... हिला..."

राज ने गुदा मैथुन शुरू किया। रिंकी की मांसपेशियां उसे बुरी तरह जकड़ रही थीं।

"ओह गॉड... रिंकी..." राज गुर्राया।‘

"मार! रगड़ इसे!" रिंकी ने अपने हाथ ज़मीन में गड़ा दिए। "मेरी आंतों तक आ जा!"

राज ने उसे खड़ा कर दिया।

"खड़ी हो जा," उसने कहा। "दीवार के सहारे। अब आखिरी राउंड।"

रिंकी लड़खड़ाते हुए खड़ी हुई। उसके पैरों में जान नहीं थी। राज ने उसे दीवार से सटा दिया। कांच के दरवाज़े पर उसने पर्दा गिरा रखा था।

उसने रिंकी की एक भारी टांग उठाकर अपनी कमर पर लपेट ली।

अब वे एक टांग पर खड़े होकर कर रहे थे। राज का लिंग वापस उसकी योनि में था।

राज ने उसे दीवार पर दे मारा।

धड़ाम!

दीवार हिल गई।‘’

"आह! मेरी पीठ!" रिंकी चिल्लाई, लेकिन उसने अपनी योनि को राज के लिंग पर और जोर से कस लिया। वह उसे चूस रही थी।

"मुझे चाहिए... मुझे अपना पानी दे दे..." रिंकी भीख मांग रही थी। "मुझे भर दे राज! मुझे गाभिन कर दे! मेरे अंदर बाढ़ ला दे!"

राज अपनी सीमा पर था। उसकी टांगें कांप रही थीं, लेकिन उसका पौरुष अभी भी पत्थर जैसा था।

"ले रिंकी... यह तेरा इनाम है... यह तेरी वफादारी का इनाम है..."

राज ने उसे दीवार से पूरी ताकत से दबाया। उसने अपने घुटने मोड़े और एक आखिरी, गहरा, जानलेवा धक्का मारा जो रिंकी की आत्मा तक पहुँच गया।

"आह्ह्ह्ह्ह्ह!"

राज ने एक लंबी दहाड़ मारी।‘

उसने अपना सारा, ढेर सारा गर्म, गाढ़ा और सफेद वीर्य रिंकी के अंदर, बहुत गहराई में छोड़ दिया।

एक धार... दो धार... तीन धार...

फव्वारे की तरह।

रिंकी की आंखें पलट गईं। उसे लगा जैसे उसके पेट में गर्म लावा भर दिया गया हो।

"गर्म है... बहुत गर्म है..." वह बुदबुदाई। "भर गया... मटका भर गया..."

राज ने उसे छोड़ा नहीं। वह उसे तब तक दीवार से सटाए रहा जब तक कि उसकी आखिरी बूंद नहीं निकल गई। रिंकी का शरीर उसके ऊपर झूल गया।

फिर वे दोनों वहीं, कालीन पर ढेर हो गए।

रिंकी राज के ऊपर पड़ी थी। उसका भारी वजन राज को दबा रहा था, लेकिन राज को यह बोझ अच्छा लग रहा था।‘

दोनों के शरीर पसीने, तेल और वीर्य से लथपथ थे। दुकान में एक अजीब सी गंध थी—हवस की गंध।

काफी देर तक सन्नाटा रहा। सिर्फ एसी की आवाज़ थी।
 
दोनों के शरीर पसीने, तेल और वीर्य से लथपथ थे। दुकान में एक अजीब सी गंध थी—हवस की गंध।

काफी देर तक सन्नाटा रहा। सिर्फ एसी की आवाज़ थी।

रिंकी ने अपना सिर उठाया। उसके बाल बिखरे थे, होंठ सूजे हुए थे, और माथे का सिंदूर फैलकर नाक तक आ गया था।

उसने राज को देखा और एक संतुष्ट मुस्कान दी।

"मान गई मास्टर," उसने राज के गाल को चूमा। "तूने तो मेरी चाल ही बदल दी। अब मैं कल कैसे चलूंगी? लंगड़ाकर चलना पड़ेगा।"

राज हंसा। वह भी हांफ रहा था।

"यही तो इम्तिहान था," राज ने कहा। "तुम पास हो गई। अब तुम हमारी टीम में हो।"

रिंकी उठी। उसके पैरों के बीच से राज का प्रसाद बहकर उसकी मोटी जांघों पर आ रहा था। उसने उसे पोंछा नहीं।

"इसे रहने दूंगी," उसने कहा, अपनी जांघों को सहलाते हुए। "यह मेरी ट्रॉफी है। इसे घर लेकर जाऊंगी।"

उसने अपने कपड़े पहने। ब्लाउज के हुक टूटे हुए थे, तो उसने साड़ी के पल्लू से खुद को कसकर लपेट लिया।

वह जाने के लिए मुड़ी।‘

फिर रुकी और राज को देखा।‘

"शनिवार को..." उसने कहा। "शनिवार को जब मेमसाब मुझे बुलाएंगी... तो मैं तैयार रहूँगी। लेकिन याद रखना..." उसने राज के शिथिल लिंग की तरफ इशारा किया, "...उस दिन मुझे इससे कम नहीं चाहिए। मुझे और भी ज्यादा चाहिए। और उस दिन... उस दिन मैं मेमसाब को भी नहीं छोड़ूँगी।"

राज ने फर्श पर लेटे-लेटे ही हाथ हिलाया।

"तुम्हें इतना मिलेगा कि तुम संभाल नहीं पाओगी।"’’

रिंकी चली गई। उसकी चाल में सचमुच लंगड़ाहट थी। वह मटक नहीं रही थी, वह संभलकर चल रही थी। उसके चेहरे पर एक अलग ही चमक थी।

राज ने शटर उठाया। बाहर धूप अभी भी तेज़ थी, लेकिन अंदर का मौसम बदल चुका था।

उसने दुकान के फर्श को देखा। वहां उनके मिलन के निशान थे।

उसने मुस्कुराते हुए सोचा—"अब टीम पूरी हो गई है। डॉली, विद्या और रिंकी। तीन रानियां और एक दर्जी। और शनिवार की रात... कयामत की रात होगी।"’

उसने अपनी डायरी उठाई और उसमें रिंकी का नाम भी जोड़ दिया। अब यह कहानी सिर्फ कपड़ों की नहीं, बल्कि नंगे जिस्मों की दास्तान बन चुकी थी।

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शनिवार की रात। राजगढ़ की वह विशाल हवेली बाहर से शांत और अंधेरे में डूबी थी, लेकिन उसकी मोटी दीवारों के पीछे एक अलग ही दुनिया जगमगा रही थी। विक्रम (डॉली का पति) और परिवार के अन्य पुरुष सदस्य एक शादी समारोह में दूसरे शहर गए हुए थे।

हवेली आज मर्दों से खाली थी, लेकिन औरतों की हवस से भरी हुई थी। आज की रात वफादारी का नहीं, बल्कि शरीर की भूख का जश्न मनाने की रात थी।

राज ने पिछली बार की तरह चोर दरवाजे का इस्तेमाल नहीं किया। आज वह चोर नहीं, 'दावत' का मुख्य मेहमान था। वह मुख्य द्वार से नहीं, बल्कि साइड के उस वीआईपी रास्ते से आया जहाँ से सिर्फ खास मेहमान आते थे। उसने काले रंग का पठानी सूट पहना था, और उस पर एक महंगा इत्र लगाया था—वही इत्र जो डॉली ने उसे गिफ्ट किया था।

दरवाजा रिंकी ने खोला।

रिंकी ने आज एक नई, भड़कीली लाल रंग की साड़ी पहनी थी। उसकी आंखों में काजल गहरा था और होठों पर एक शरारती मुस्कान।

"आइए सरकार," रिंकी ने झुककर सलाम किया, लेकिन उसकी आंखों में मज़ाक था। "ऊपर जाओ। दोनों शेरनियां पिंजरे में बेताब हैं। आज तो तुम्हारी लॉटरी है मास्टर। हड्डी-पसली बचाकर रखना।"

उसने जाते-जाते राज के पीछे, उसके नितंबों पर एक हल्का सा थप्पड़ मारा। "और अगर कुछ बच जाए... तो नीचे आ जाना। मैं भी जाग रही हूँ।"

राज सीढ़ियां चढ़कर ऊपर गया। उसके जूतों की आवाज़ संगमरमर की सीढ़ियों पर गूंज रही थी, बिल्कुल उसके दिल की धड़कनों की तरह। एक तरफ डॉली का अनुभव, भारी बदन और रईसी; दूसरी तरफ विद्या की कच्ची जवानी, कसावट और बेबाकी। और आज... आज वे दोनों एक ही बिस्तर पर थीं।

उसने बेडरूम का भारी, नक्काशीदार सागौन का दरवाजा धक्का दिया।

दरवाजा खुलते ही एसी की ठंडी हवा और महंगे रूह-गुलाब (Rose) और मोगरे के इत्र की मिली-जुली खुशबू ने उसका स्वागत किया। कमरे में बिजली की रोशनी नहीं थी। चारों तरफ दर्जनों मोटी मोमबत्तियां जल रही थीं, जिनकी लपटें एसी की हवा में थरथरा रही थीं। दीवारों पर परछाइयां नाच रही थीं।

और बीच में... वह किंग-साइज बिस्तर था जो आज रणभूमि बनने वाला था।

बिस्तर पर दो रानियां बैठी थीं।

डॉली और विद्या।

डॉली ने आज सोने के रंग की एक बेहद झीनी, टिश्यू सिल्क की साड़ी पहनी थी। साड़ी इतनी पारदर्शी और महीन थी कि उसके बदन का हर तिल, हर मस्सा, नाभि का गहरा भंवर और जांघों का मांसल उभार साफ दिख रहा था।

उसने ब्लाउज नहीं पहना था। साड़ी का पल्लू उसने अपनी गर्दन के चारों ओर एक ढीले हार की तरह लपेट रखा था, जिससे उसके भारी, 36 इंच के स्तन आधे खुले और आधे ढके हुए थे। वे ऐसे लग रहे थे जैसे सोने की थाल में दो बड़े, रसीले फल रखे हों। उसके बाल एक ढीले, कामुक जूड़े में बंधे थे और मांग में राज का दिया हुआ वह गाढ़ा लाल सिंदूर चमक रहा था।

और उसके ठीक बगल में विद्या थी।

विद्या का अंदाज बिल्कुल अलग था, आधुनिक और तीखा। उसने काले रंग का एक साटन का रोब पहना हुआ था। रोब बहुत छोटा था, मुश्किल से उसकी जांघों के ऊपरी हिस्से तक। वह पालथी मारकर बैठी थी, जिससे उसकी गोरी, चिकनी और कसरत से तराशी हुई जांघें पूरी तरह नंगी चमक रही थीं। रोब के अंदर उसने कुछ नहीं पहना था।

उसका वी-शेप गला उसकी नाभि तक खुला था, जहाँ से उसके छोटे, सख्त और तने हुए स्तन झांक रहे थे।

राज को देखते ही दोनों मुस्कुराईं। डॉली की मुस्कान में एक अनुभवी मालकिन का अधिकार था, और विद्या की मुस्कान में एक बिगड़ैल लड़की की शरारत।

"आ गए हमारे सुल्तान," डॉली ने अपने दोनों हाथ फैलाए। उसके हाथों में कांच की चूड़ियां खनकीं। "हम कब से इंतज़ार कर रही थीं। हमारे जिस्म की बर्फ पिघल रही है।"

"और मेरा सब्र टूट रहा है," विद्या ने अपनी जीभ से अपने ऊपरी होंठ को चाटा। "तुम बहुत लेट हो शर्मा जी। इसकी सजा मिलेगी।"

राज ने दरवाजा लॉक किया। कुंडी की 'खट' आवाज़ ने कमरे को दुनिया से काट दिया।

उसने अपनी पठानी सूट का कुर्ता वहीं दरवाजे पर ही उतार फेंका। उसका सांवला, चौड़ा सीना, जिस पर बालों की लकीर थी, और बांहों की फड़कती हुई नसें मोमबत्ती की रोशनी में तांबे की तरह चमक रही थीं।

"बर्फ पिघलने दो," राज ने भारी कदमों से बिस्तर की तरफ बढ़ते हुए कहा। "आज मैं इतनी आग लगाऊँगा कि पानी भी जल जाएगा। और सजा... सजा तो मुझे मंजूर है।"

वह बिस्तर के पास पहुँचा।

विद्या तुरंत घुटनों के बल खड़ी हो गई। बिस्तर गद्देदार था, इसलिए उसका संतुलन बना रहा। उसका काला रोब खुल गया और उसका नंगा, गोरा बदन राज के सामने आ गया।

"दिखाओ," विद्या ने राज की पतलून के नाड़े पर हाथ रखा। "मुझे देखना है कि क्या भाभी ने सच कहा था। क्या तुम सच में हम दोनों को एक साथ संभाल पाओगे? या फुस्स हो जाओगे?"

राज ने विद्या के बालों को मुट्ठी में पकड़कर उसका चेहरा ऊपर किया।

"संभालूँगा नहीं विद्या," राज ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा। "तुम दोनों को तोड़ दूँगा। आज रात कोई रहम नहीं होगा।"

उसने अपनी पतलून नीचे गिरा दी।

उसका 8 इंच का, काला, मोटा और नसों से तना हुआ लिंग एक झटके के साथ बाहर आया। वह पूरी ताकत से खड़ा था, विद्या के चेहरे के ठीक सामने।

विद्या की आंखें फैल गईं।

"वोह..." विद्या ने उसे अपनी उंगली से छुआ। वह गर्म था और धड़क रहा था। "यह तो... यह तो सच में राक्षस है। भाभी... आपने सही कहा था।"

डॉली, जो पीछे बैठी थी, खिसक कर आगे आई। उसने अपना चेहरा राज के लिंग के दूसरी तरफ कर लिया।

अब राज का पौरुष उन दोनों के चेहरों के बीच में था। एक तरफ डॉली का परिपक्व चेहरा, दूसरी तरफ विद्या का युवा चेहरा।

डॉली ने उसे सूंघा। "मेरी खुशबू..." उसने कहा, अपनी नाक को लिंग की नसों पर रगड़ते हुए। "इस पर अभी भी मेरे मंडे वाली गंध है।"

"आज इस पर हम दोनों की गंध होगी," विद्या ने कहा और अपनी जीभ निकालकर लिंग के टोपे को चाट लिया।

"टेस्टी..." विद्या ने डॉली को देखकर आंख मारी। "नमकीन है।"

यह राज के लिए एक सपना था। दो खूबसूरत औरतें—एक भाभी, एक ननद—उसके लिंग की पूजा कर रही थीं।

डॉली ने पहल की। "यह मेरा है," उसने कहा और राज के लिंग को जड़ से पकड़कर अपने मुंह में भर लिया। उसका मुंह गर्म, बड़ा और अनुभवी था। वह जानती थी कि गले का इस्तेमाल कैसे करना है। वह उसे गहराई तक ले गई।

विद्या ने देखा कि डॉली कैसे कर रही है। उसे जलन हुई।

"हटो भाभी," विद्या ने डॉली को धक्का दिया। "आधा मेरा है। मुझे भी चाहिए।"

डॉली ने मुंह हटाया, एक 'पॉप' की आवाज़ के साथ।

अब विद्या ने उसे मुंह में लिया। उसका तरीका अलग था। उसका मुंह छोटा था, लेकिन उसकी जीभ बहुत तेज़ थी। वह टोपे पर अपनी जीभ को गोल-गोल घुमा रही थी और साथ ही हाथ से उसे हिला रही थी।

"आह्ह्ह..." राज ने दोनों के सिरों को पकड़ लिया। उसकी उंगलियां उनके बालों में धंस गईं।
 
कभी डॉली, कभी विद्या। वे बारी-बारी से उसे चूस रही थीं। ऐसा लग रहा था जैसे कोई प्रतियोगिता चल रही हो कि कौन राज को ज्यादा मज़ा दे सकती है।

डॉली उसके अंडकोषों को अपने मखमली हाथों से सहला रही थी, और विद्या उसके लिंग के तने को चाट रही थी।

"राज... तुम बहुत सख्त हो..." डॉली ने बीच में कहा, अपनी साड़ी का पल्लू पूरी तरह गिराते हुए। अब उसके भारी स्तन पूरी तरह नंगे थे। "मेरा सब्र टूट रहा है। मुझे यह अंदर चाहिए।"

डॉली नंगी हो गई। उसने अपनी साड़ी और पेटीकोट एक लात मारकर उतार दिए। उसका भारी, गोरा और मांसल बदन बिस्तर पर बिखर गया। जांघें चौड़ी हो गईं।

"मुझे ले लो," डॉली ने अपनी टांगें फैला दीं। उसकी योनि से रस बह रहा था। "विद्या बाद में... पहले मैं... मैं बड़ी हूँ... मेरा हक़ पहले है।"

विद्या ने अपना काला रोब उतार फेंका। उसका कसा हुआ, एथलेटिक शरीर, सपाट पेट और छोटी-छोटी खूबसूरत छातियां सामने आ गईं।

"नहीं," विद्या ने राज की पीठ पर छलांग लगा दी। उसने राज को पीछे से जकड़ लिया। "पहले मैं... मैं मेहमान हूँ। और मैं जवान हूँ।"

राज ने दोनों को देखा। एक तरफ मांसल, भरी-पूरी डॉली जो किसी रसीले आम जैसी थी। दूसरी तरफ छरहरी, तीखी विद्या जो कच्ची कैरी जैसी थी।

"लड़ो मत," राज ने कहा। "मेरे पास दोनों के लिए इंतज़ाम है। और आज रात बहुत लंबी है।"

उसने विद्या को बिस्तर पर लिटाया और डॉली को उसके ऊपर।

वे 69 की पोज़िशन में नहीं, बल्कि एक-दूसरे के ऊपर में लेट गईं।

राज ने उन दोनों को एक साथ अपनी बांहों में समेटा।

"आज मैं सैंडविच खाऊँगा," उसने कहा। "मलाई और मक्खन का सैंडविच।"

बिस्तर पर जिस्मों का एक पहाड़ बन गया था। राज ने विद्या को नीचे लिटाया था और डॉली को उसके ऊपर।

डॉली का भारी शरीर विद्या को दबा रहा था। विद्या को डॉली के भारी स्तनों के नीचे दबने में और उनके मांसल बदन की रगड़ में मज़ा आ रहा था।

"भाभी... आप बहुत भारी हो..." विद्या हंसी, डॉली के लटकते हुए निप्पल को अपने मुंह में लेते हुए। "दूध है क्या इसमें?"

"चुप कर," डॉली ने विद्या की योनि को अपनी उंगलियों से टटोला। "तू तो बह रही है। पूरी बाढ़ आई है तेरे अंदर।"

राज ने उन दोनों के बीच जगह बनाई। वह घुटनों के बल बैठा था।

"टांगें खोलो," उसने आदेश दिया।

विद्या ने अपनी पतली, सुडौल टांगें राज के कंधों पर रख दीं। डॉली ने अपनी भारी जांघें चौड़ी कर लीं और साइड में हो गई।

राज विद्या के सामने था।

"पहले छोटी रानी," राज ने कहा। "इसका रास्ता तंग है, इसे खोलना पड़ेगा।"

उसने अपने लिंग को विद्या की तंग, गुलाबी और बाल रहित (Clean shaved) योनि पर सेट किया।

"तैयार?"

"फाड़ दो..." विद्या ने डॉली का हाथ कसकर पकड़ लिया। "भाभी... हाथ पकड़ो..."

राज ने एक ज़ोरदार धक्का मारा।

धप्प!

राज का मोटा लिंग विद्या की तंग गुफा में समा गया।

"आह्ह्ह्ह्ह!" विद्या चिल्लाई। उसका शरीर धनुष की तरह तन गया। उसकी एड़ियां राज की पीठ में गड़ गईं। "भाभी! मर गई! बहुत मोटा है!"

डॉली ने विद्या के होंठों को चूम लिया। उसने अपनी जीभ विद्या के मुंह में डाल दी ताकि उसकी चीख दब जाए।

"सह ले..." डॉली ने विद्या के स्तनों को दबाते हुए कहा। "मज़ा अब आएगा। इसे महसूस कर।"

राज ने पेलना शुरू किया।

थप-थप-थप!

विद्या का शरीर बिस्तर पर उछल रहा था। राज उसे बेरहमी से ठोक रहा था। विद्या की योनि बहुत टाइट थी, जो राज को पागल कर रही थी।

"और जोर से राज!" विद्या डॉली को चूमते हुए बोल रही थी। "मुझे भाभी से ज्यादा मज़ा दो! बताओ कि मेरी जवानी ज्यादा गर्म है!"

राज ने विद्या के छोटे स्तनों को मरोड़ा।

"तेरी ये जवानी..." राज गुर्राया, "आज मैं इसे निचोड़ लूँगा। तेरी गर्मी निकाल दूंगा।"

करीब 10 मिनट तक राज ने विद्या को रोंदा। विद्या की हालत खराब हो गई। वह हांफ रही थी, उसकी आंखों से पानी निकल रहा था, लेकिन चेहरे पर परमानंद था।

राज ने बाहर निकाला। एक पॉप की आवाज़ आई।

विद्या निढाल होकर बिस्तर पर पसर गई। "उफ्फ... मेरी कमर..."

"अब मेरी बारी," डॉली ने कहा। वह एक शेरनी की तरह उठी और राज को धक्का देकर पीठ के बल लिटा दिया।

वह राज के ऊपर चढ़ गई।

"तुमने उसे तो बहुत मज़ा दिया," डॉली ने राज के गीले लिंग को (जो विद्या के रस से सना था) पकड़कर अपनी योनि पर रखा। "अब असली औरत को संभालो। अब वजन उठाओ।"

डॉली ने धीरे-धीरे खुद को नीचे किया।

"ओह्ह्ह्ह..." डॉली ने अपनी गर्दन पीछे फेंक दी। "भरा हुआ... पूरा भरा हुआ... विद्या तो बच्ची है, असली गहराई तो यहाँ है।"

वह राज के ऊपर सवारी करने लगी।

उसका भारी शरीर ऊपर-नीचे हो रहा था। उसके विशाल, 36 इंच के स्तन हवा में उछल रहे थे और राज के चेहरे पर थप्पड़ मार रहे थे। थप-थप!

"पियो इन्हें," डॉली ने अपना भारी स्तन राज के मुंह में ठूंस दिया। "मेरा दूध पियो। मुझे खाली कर दो।"

राज उसके स्तनों को चूस रहा था, काट रहा था, और नीचे से अपनी कमर को ऊपर उछाल रहा था।

विद्या, जो बगल में लेटी थी, यह देख रही थी। उसे रहा नहीं गया।

वह उठी और राज के चेहरे के पास आई।

"मेरा भी..." विद्या ने कहा और अपने छोटे, सख्त स्तनों को राज के दूसरे गाल पर रगड़ने लगी।

राज अब दोनों के स्तनों के बीच घिर गया था। एक तरफ डॉली का भारी, नरम मांस, दूसरी तरफ विद्या का सख्त, युवा मांस। वह जन्नत में था।

वह कभी डॉली को चूसता, कभी विद्या को।

"आह! राज!" डॉली ऊपर पागलों की तरह उछल रही थी। "तुम बहुत गहरे हो! मेरी बच्चेदानी को छू रहे हो! मुझे घोड़ी बना लो!"

राज ने डॉली की कमर को पकड़ लिया और उसे और जोर से अपनी तरफ खींचा।

पच-पच-पच...
 
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