अपूर्वा: वाह जी! आपकी आंटी तो बहुत अच्छी है। तुरंत दूध दे दिया।
मैं: और क्या! मैं तो जब कभी खाना बनाने का मूड नहीं होता तो खाना भी आंटी के यहीं पर खा लेता हूं।
अपूर्वा: इम्प्रैस होते हुए, वाह जी। आजकल ऐसे मकान मालिक मुश्किल से ही मिलते हैं।
मैंने चाय बनाई और दो प्यालियों में डालकर एक अपूर्वा को दी और दूसरी खुद ले ली। एक कटोरी में मां के बनाये हुए लड्डू डाल कर अपूर्वा को खाने के लिए।
अपूर्वा: ये क्या है?
मैं: लड्डू।
अपूर्वा: मैं नहीं खाती, बहुत ज्यादा घी होता है इनमें।
मैं: अरे खा ले खा ले शरमा मत। मम्मी ने बनाये हुए हैं, बहुत स्वादिष्ट हैं।
और एक लड्डू मैंने उठा लिया और अपूर्वा ने भी एक लड्उू ले लिया।
चाय पीकर अपूर्वा कहने लगी, अब मैं चलती हूं नहीं तो देर हो जायेगी, और मम्मी की डांट खानी पड़ेगी।
मैं: ओके, चलो मैं तुम्हें छोड़ देता हूं।
अपूर्वा: हां! और फिर मैं तुम्हें छोड़ने आ जाउंगी, फिर तुम मुझे छोड़ने चलना। ऐसे ही सुबह हो जायेगी और फिर साथ में ही ऑफिस के लिए निकल पडेंगे।
उसकी बात सुनकर मैं मुस्कराने लगा।
अपूर्वा: ठीक है, अब चलती हूं। ओह माई गोड साढे छः हो गए। आज तो जरूरी मम्मी की डांट खानी पड़ेगी।
मैं अपूर्वा को नीचे तक छोड़ने के लिए आया। अपूर्वा ने अपनी स्कूटी निकाली और बायें बोलकर चली गई। आंटी अभी भी बाहर ही खड़ी हुई थी। पड़ोस वाली आंटी चली गई थी।
आंटी: कौन थी ये बेटा?
मैं: आंटी वो अपूर्वा है, मेरे साथ ही काम करती है, कम्पनी में, वो आज जब ऑफिस से निकले तो मेरी बाईक में पंक्चर हो गया, तो मुझे छोड़ने के लिए आई थी।
आंटीः बेटा! अच्छी लड़की है, नहीं तो आजकल कौन किसकी परवाह करता है, और वो भी लड़की। लगता है वो तुझे पसंद करती है।
मैं: अरे नहीं आंटी ऐसी कोई बात नहीं है, बस हम अच्छे दोस्त हैं तो, इसीलिए।
आंटी: अच्छे दोस्त। हां वो तो पता चल रहा था जिस तरह से वो बैठी थी तेरे पीछे।
आंटी की बात सुनकर मैं शरमा गया और अपना चेहरा नीचे कर लिया।
तभी सोनल अपनी स्कूटी को फरफराती हुई आ गई और गेट के पास आकर हॉर्न देने लगी।
आंटी: कितनी बार कहा है तुझसे, आराम से चला लिया कर। कभी कुछ हो गया ना।
सोनल: मॉम, दरवाजा तो खोलो। आते ही शुरू हो गये।
आंटी: हां खोलती हूं। कुछ कहो भी नहीं इनको तो। एक तो इतनी तेज स्कूटी चलाती है।
सोनल: हाय, समीर कैसे हो?
मैं: झक्कास, आज इतनी जल्दी कैसे आना हो गया?
सोनल: बस, ऐसे ही सोचा आज समीर जी से थोड़े गप्पे लड़ा लूंगी तो जल्दी आ गई।
मैं: अच्छा जी! ते चलो जल्दी से उपर आ जाओ।
आंटी: अब इस फटफटी को अंदर भी करेगी या बाहर ही फर फर करती रहेगी।
सोनल: करती हूं ना! बिगड़ती क्यो हों।
और सोनल ने अपनी स्कूटी अंदर खड़ी कर दी।
बाहर गली में सब्जी वाला आया था, तो मैं जाकर उससे सब्जी लेने लग गया।
सब्जी लेकर मैं उपर आ गया, सोनल पहले से ही उपर पहुंची हुई थी और मुंडेर के पास खड़ी होकर पड़ोस वाले घर में छत पर खड़ी अपनी सहेली से बात कर रही थी।
मैं भी सब्जी अंदर रसोई में रखकर बाहर आ गया।
मैं: क्या बात हो रही, लड़कियों में।
सोनल: आपके लिए नहीं है, हमारी आपस की बात है।
मैं: ओह! गर्ल्स टू गर्ल्स। लगता है बॉयफ्रेंड के बारे में बातें हो रही हैं।
सोनल: बकवास नहीं। मैं बॉयफ्रेंड वगैरह के चक्कर में नहीं पड़ती।
मैं: ओके बाबा! तभी मेरा फोन बज उठा, जो अंदर रूम में रखा था।
मैंने अंदर आकर फोन उठाकर देखा तो नया लेंडलाइन का नम्बर था।
मैंने उठाकर हैल्लो कहा तो दूसरी तरफ से किसी लड़की की आवाज आई - हैल्लो।
मैं: हैल्लो जी! कौन बोल रहे हैं आप।
फोन वाली लड़की: वाह जी! क्या बात है, आप तो लगता है भूल गये हमें।
मैं: जी नहीं ऐसी बात नहीं है, आवाज जानी पहचानी तो लग रही है, पर ये नम्बर सेव नहीं है तो इसलिए पता नहीं चल रहा कि कौन हो आप।
फोन वाली लड़की (मेरे मजे लेते हुए): लगता है कोई और मिल गई जो मुझे भूल गये।
मैं (भी मजे लेते हुए): अब वो तो जी ये पता चले कि कौन बोल रहे हैं आप तभी कुछ डिसीजन हो कि कोई और मिल गई या वो कोई और आप ही हो।
फोन वाली लड़की: मैं तो बता नहीं रही कि कौन हो, पहचान सकते हो तो पहचान लो।
मैं: जी वो मैं अनजान लड़कियों से ज्यादा बातचीत नहीं करता तो इसलिए फोन रख रहा हूं।
तभी मुझे फोन में से पीछे से किसी लेडीज की आवाज सुनाई दी - अपूर्वा बेटी, तेरे पापा बुला रहे हैं।
मैं: आप बड़ी जल्दी पहुंच गये घर पर।
अपूर्वा: हां, मम्मी बोल पड़ी नही ंतो खूब मजे लेती आपके।
मैं: मेरे मजे लेना इतना आसान नहीं है।
अपूर्वा: हां, वो तो पता चल जाता, अगर मम्मी ना बोलती तो।
मैं: अच्छा ये नम्बर किसका है।
अपूर्वा: घर का नम्बर है।
मैं ठीक ही सेव कर लेता हूं, नही ंतो अबकी बार तो कोई और मिल गई का ताना मारा है, अगली बार पता नही क्या ताना मारा जायेगा। वैसे आपको बता दूं कि मुझे अभी कोई और नहीं मिली है। आपका चांस है, मार लो बाजी।
अपूर्वा: बकवास मत करो। वो तो मैं मजे लेने के लिए कह रही थी।
क्रमशः.....................
मैं: और क्या! मैं तो जब कभी खाना बनाने का मूड नहीं होता तो खाना भी आंटी के यहीं पर खा लेता हूं।
अपूर्वा: इम्प्रैस होते हुए, वाह जी। आजकल ऐसे मकान मालिक मुश्किल से ही मिलते हैं।
मैंने चाय बनाई और दो प्यालियों में डालकर एक अपूर्वा को दी और दूसरी खुद ले ली। एक कटोरी में मां के बनाये हुए लड्डू डाल कर अपूर्वा को खाने के लिए।
अपूर्वा: ये क्या है?
मैं: लड्डू।
अपूर्वा: मैं नहीं खाती, बहुत ज्यादा घी होता है इनमें।
मैं: अरे खा ले खा ले शरमा मत। मम्मी ने बनाये हुए हैं, बहुत स्वादिष्ट हैं।
और एक लड्डू मैंने उठा लिया और अपूर्वा ने भी एक लड्उू ले लिया।
चाय पीकर अपूर्वा कहने लगी, अब मैं चलती हूं नहीं तो देर हो जायेगी, और मम्मी की डांट खानी पड़ेगी।
मैं: ओके, चलो मैं तुम्हें छोड़ देता हूं।
अपूर्वा: हां! और फिर मैं तुम्हें छोड़ने आ जाउंगी, फिर तुम मुझे छोड़ने चलना। ऐसे ही सुबह हो जायेगी और फिर साथ में ही ऑफिस के लिए निकल पडेंगे।
उसकी बात सुनकर मैं मुस्कराने लगा।
अपूर्वा: ठीक है, अब चलती हूं। ओह माई गोड साढे छः हो गए। आज तो जरूरी मम्मी की डांट खानी पड़ेगी।
मैं अपूर्वा को नीचे तक छोड़ने के लिए आया। अपूर्वा ने अपनी स्कूटी निकाली और बायें बोलकर चली गई। आंटी अभी भी बाहर ही खड़ी हुई थी। पड़ोस वाली आंटी चली गई थी।
आंटी: कौन थी ये बेटा?
मैं: आंटी वो अपूर्वा है, मेरे साथ ही काम करती है, कम्पनी में, वो आज जब ऑफिस से निकले तो मेरी बाईक में पंक्चर हो गया, तो मुझे छोड़ने के लिए आई थी।
आंटीः बेटा! अच्छी लड़की है, नहीं तो आजकल कौन किसकी परवाह करता है, और वो भी लड़की। लगता है वो तुझे पसंद करती है।
मैं: अरे नहीं आंटी ऐसी कोई बात नहीं है, बस हम अच्छे दोस्त हैं तो, इसीलिए।
आंटी: अच्छे दोस्त। हां वो तो पता चल रहा था जिस तरह से वो बैठी थी तेरे पीछे।
आंटी की बात सुनकर मैं शरमा गया और अपना चेहरा नीचे कर लिया।
तभी सोनल अपनी स्कूटी को फरफराती हुई आ गई और गेट के पास आकर हॉर्न देने लगी।
आंटी: कितनी बार कहा है तुझसे, आराम से चला लिया कर। कभी कुछ हो गया ना।
सोनल: मॉम, दरवाजा तो खोलो। आते ही शुरू हो गये।
आंटी: हां खोलती हूं। कुछ कहो भी नहीं इनको तो। एक तो इतनी तेज स्कूटी चलाती है।
सोनल: हाय, समीर कैसे हो?
मैं: झक्कास, आज इतनी जल्दी कैसे आना हो गया?
सोनल: बस, ऐसे ही सोचा आज समीर जी से थोड़े गप्पे लड़ा लूंगी तो जल्दी आ गई।
मैं: अच्छा जी! ते चलो जल्दी से उपर आ जाओ।
आंटी: अब इस फटफटी को अंदर भी करेगी या बाहर ही फर फर करती रहेगी।
सोनल: करती हूं ना! बिगड़ती क्यो हों।
और सोनल ने अपनी स्कूटी अंदर खड़ी कर दी।
बाहर गली में सब्जी वाला आया था, तो मैं जाकर उससे सब्जी लेने लग गया।
सब्जी लेकर मैं उपर आ गया, सोनल पहले से ही उपर पहुंची हुई थी और मुंडेर के पास खड़ी होकर पड़ोस वाले घर में छत पर खड़ी अपनी सहेली से बात कर रही थी।
मैं भी सब्जी अंदर रसोई में रखकर बाहर आ गया।
मैं: क्या बात हो रही, लड़कियों में।
सोनल: आपके लिए नहीं है, हमारी आपस की बात है।
मैं: ओह! गर्ल्स टू गर्ल्स। लगता है बॉयफ्रेंड के बारे में बातें हो रही हैं।
सोनल: बकवास नहीं। मैं बॉयफ्रेंड वगैरह के चक्कर में नहीं पड़ती।
मैं: ओके बाबा! तभी मेरा फोन बज उठा, जो अंदर रूम में रखा था।
मैंने अंदर आकर फोन उठाकर देखा तो नया लेंडलाइन का नम्बर था।
मैंने उठाकर हैल्लो कहा तो दूसरी तरफ से किसी लड़की की आवाज आई - हैल्लो।
मैं: हैल्लो जी! कौन बोल रहे हैं आप।
फोन वाली लड़की: वाह जी! क्या बात है, आप तो लगता है भूल गये हमें।
मैं: जी नहीं ऐसी बात नहीं है, आवाज जानी पहचानी तो लग रही है, पर ये नम्बर सेव नहीं है तो इसलिए पता नहीं चल रहा कि कौन हो आप।
फोन वाली लड़की (मेरे मजे लेते हुए): लगता है कोई और मिल गई जो मुझे भूल गये।
मैं (भी मजे लेते हुए): अब वो तो जी ये पता चले कि कौन बोल रहे हैं आप तभी कुछ डिसीजन हो कि कोई और मिल गई या वो कोई और आप ही हो।
फोन वाली लड़की: मैं तो बता नहीं रही कि कौन हो, पहचान सकते हो तो पहचान लो।
मैं: जी वो मैं अनजान लड़कियों से ज्यादा बातचीत नहीं करता तो इसलिए फोन रख रहा हूं।
तभी मुझे फोन में से पीछे से किसी लेडीज की आवाज सुनाई दी - अपूर्वा बेटी, तेरे पापा बुला रहे हैं।
मैं: आप बड़ी जल्दी पहुंच गये घर पर।
अपूर्वा: हां, मम्मी बोल पड़ी नही ंतो खूब मजे लेती आपके।
मैं: मेरे मजे लेना इतना आसान नहीं है।
अपूर्वा: हां, वो तो पता चल जाता, अगर मम्मी ना बोलती तो।
मैं: अच्छा ये नम्बर किसका है।
अपूर्वा: घर का नम्बर है।
मैं ठीक ही सेव कर लेता हूं, नही ंतो अबकी बार तो कोई और मिल गई का ताना मारा है, अगली बार पता नही क्या ताना मारा जायेगा। वैसे आपको बता दूं कि मुझे अभी कोई और नहीं मिली है। आपका चांस है, मार लो बाजी।
अपूर्वा: बकवास मत करो। वो तो मैं मजे लेने के लिए कह रही थी।
क्रमशः.....................