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Adultery मस्त पड़ोसन (पड़ोसन को दुल्हन बनाया )

बातों बातों में मेरी बीबी ने मुझे इशारा किया की मैं चाहूँ तो डॉली जी को फाँसने की की कोशिश कर सकता हूँ। उसका रास्ता भी उसने बता दिया की मैं इस समय दरम्यान डॉली को ड्राइविंग सिखाने के बहाने अपना मकसद साध सकता था। मुझे मेरी बीबी पर गर्व हुआ। जो उस दिन तक मुझे किसी और औरत को ताड़ने के लिए टोकती रहती थी, वह मुझे गैर औरत को फाँसने का रास्ता दिखा रही थी। ज्योति की बात सुन कर मुझे भी जोश आया।

मैंने कहा, “मेरी बात छोडो, सुनो मैं एक बड़ी ही जरुरी बात कह रहा हूँ। सेठी साहब तुम्हारे घर आ रहे हैं। यह देखना की उनका सही तरीके से स्वागत हो और जयपुर से तुम्हारे गाँव का रास्ता बड़ी मुश्किल से आधे से पौने घंटे का है तो उनको जयपुर में जा कर होटल में रुकने के बजाये अगर अपने घर में रखोगे तो वह सुबह निकल कर जयपुर जा कर शाम को काम निपटा कर आपके गाँव वापस आराम से आ सकते हैं। तुम्हारा घर काफी बड़ा है और कई कमरे वैसे ही खाली पड़े हैं..

एक बात और, सेठी साहब की आवभगत का जिम्मा तुम खुद उठाना ताकि सेठी साहब को कोई दिक्कत ना हो। और हाँ अगर सेठी साहब रुक जाते हैं तो उनको ऊपर वाली मंजिल के जो दो अलग कमरे हैं उनमें से एक कमरा देना जिसमें मैं ठहरा था। तुम और मुन्नू उसके साथवाले दूसरे कमरे में रुकना जिससे तुम रातमें भी अगर सेठी साहब को किसी चीज़ की जरुरत पड़े तो बिना किसी की नजर में आये सेठी साहब के कमरे में जा सकती हो। ड्राइवर को घर के आँगन में जो सर्वेंट का कमरा है उसमें रखना।”

मेरी बीबी ने मेरी और टेढ़ी नजर से देखा। वह शायद समझ गयी थी की मैं चाहता था की इस ट्रिप में वह सेठी साहब से चुदे। मुझे डर लगा की कहीं ज्योति मेरी बात सुन कर भड़क ना जाए। पर ज्योति चुप रही। शायद मेरा सुझाव ज्योति को अच्छा लगा। ज्योति ने अपने भाई का फ़ोन मिलाया और सेठी साहब के साथ आने के बारे में बताया और जो भी बात मैंने कही थी सब भाई को कही। ज्योति ने भाई को ऊपर के दोनों कमरे भी तैयार करवाने को कहा..

भाई यह सुन कर बड़े खुश हुए। सेठी साहब ने मुश्किल वक्त में जो बड़ी मदद की थी उसके बारे में ज्योति ने भाई को सब कुछ बता दिया था। भाई ने ज्योति और मुझे भरोसा दिलाया की वह सेठी साहब की आवभगत में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे और उनको रोकने की पूरी कोशिश करेंगे और ऊपर वाले कमरे को अच्छी तरह सजा कर रखेंगे।

उस रात को ज्योति ने मुझे मुझसे ऐसी चुदाई करवाई की मैं क्या कहूं? वह बार बार मेरे ऊपर चढ़ कर मुझे चोद रही थी। सबसे पहले तो ज्योति ने मेरा लण्ड इतनी शिद्द्त से चूसा की मैं अगर सही समय पर ज्योति के मुंह से मेरा लण्ड निकाल नहीं लेता तो मैं उसके मुंह में ही झड़ जाता।

फिर वह बार बार झुक कर मेरा लण्ड चूमती और बार बार यह कहना नहीं चुकती की वह मुझसे बहुत ज्यादा प्यार करती है और वह मुझे पूरी जिंदगी साथ देगी। जब मं उसको चोद रहा था तो वह बार बार अपने करारे स्तनोँ को मुझसे मसल ने के लिए कहती और उस रात करीब पूरी चुदाई के दरम्यान वह मेरे होंठों को चूमती ही रही।

मैं उसका आवेग और उसकी उत्तेजना समझ सकता था। मैंने उसे सेठी साहब का स्वागत करने का जो रास्ता दिखाया था उसके द्वारा मैंने उसे अपरोक्ष रूप से रात को बिना किसी की नजर में आये सेठी साहब के कमरे में जाने के लिए कह दिया था, क्यूंकि उनके घर के ऊपर के दोनों कमरे आपस में बाथरूम के द्वारा जुड़े हुए थे।

दोनों कमरों के बीच में एक बाथरूम था। मैंने अपनी तरफ से बीबी को इशारा कर दिया की अगर सेठी साहब उनके वहाँ रुक गए तो रात को बिना किसी को पता लगे वह दोनों एक दूसरे के कमरे में बाथरूम के रास्ते जा सकते थे।

दूसरे दिन जल्दी सुबह ही ज्योति सेठी साहब के साथ कार में निकलने के लिए तैयार हो गयी थी पर सेठी साहब ने आकर माफ़ी मांगते हुए कहा की उन्हें कुछ अर्जेंट काम से ऑफिस जाना पडेगा और उसके बाद दोपहर को ही वह निकल पाएंगे।

करीब दो बजे सेठी साहब ऑफिस से आये और ढाई बजे कार में ज्योति के मायके जाने के लिए निकल सके। मुन्ना ने जिद पकड़ी की वह आगे की सीट पर ही बैठेगा। इसके कारण आगे की सीट पर मुन्ना और ड्राइवर और पीछे ज्योति और सेठी साहब बैठे। दिल्ली से ज्योति के मायके का रास्ता करीब ६ घंटे का था।

पढ़ते रखिये.. कहानी आगे जारी रहेगी!
 
आगे की कहानी ज्योति की जुबानी

मुन्ना ने मुझसे पहले से ही यह शर्त रखी थी की वह आगे की ड्राइवर के बाजू वाली सीट पर बैठेगा और ड्राइवर अंकल से कार चलाने के बारे में बात करेगा और समझेगा की कार कैसे चलाते हैं। तो पुरे रास्ते मुन्ना ड्राइवर से कार चलाने से लेकर कार पानी में क्यों तैर नहीं सकती और क्या कार हवा में उड़ सकती है? ऐसे कई अजीबोगरीब सवाल करता रहा और ड्राइवर भैया उसे बड़े ही धैर्य से सारे प्रश्नों के उत्तर देने में लगे रहे।

मुझ में एक कमी है की जब जब भी मैं कार मैं थोड़ा सा भी लंबा सफर करती हूँ तो मुझे अक्सर नींद आ जाती है। इस बार मैंने तय किया की मैं कोशिश करुँगी की कार के सफर दरम्यान ना सोऊँ। मैं सेठी साहब के अनुभव और उनके विचारों की परिपक्वता की बड़ी ही प्रशंशक थी।

मेरी इच्छा थी की सेठी साहब के जीवन के अनुभवों से मैं कुछ सिख लूँ। सो सफर में समय भी पास हो और नींद भी ना आये इस लिए मैंने सेठी साहब से पूछा, “सेठी साहब आप अपने जीवन का कोई ऐसा अनुभव या वाक्या बताइये जो आपके लिए बड़ा ही यादगार एवं रोमांचक रहा हो।”

मेरी बात सुनकर कुछ देर सोचते रहे फिर मेरी और देख कर बड़े ही शांत और गंभीर स्वर में बोले, “तुम तो जानती ही हो की मैं माँ दुर्गा को बहुत मानता हूँ। माँ ने मेरे जीवन में अद्भुत चमत्कार किये हैं। मैं उनमें से एक चमत्कार के बारे में बताता हूँ जिसे मैं कभी भूल नहीं सकता।”

यह कह कर उन्होंने मुझे अपने जीवन के एक अद्भुत रोमांचक अनुभव के बारे में बताया जिसे सुनकर मेरे भी रोंगटे खड़े हो गए। सेठी साहब उन दिनों पहाड़ों में एक हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर प्रोजेक्ट की कंपनी में काम कर रहे थे। उनको एक पहाड़ी पर ही सर्किट हाउस में एक कमरा मिला था जिसमें वह रहते थे।

वह हर रोज सुबह काम पर जाने के पहले स्नान के बाद माँ की पूजा, ध्यान और आरती करना नहीं भूलते थे। एक दिन जब वह सुबह उठ कर पूजा ध्यान कर रहे थे तब अचानक उनके कानों में उन्हें एक लड़की की हलकी मधुर सी आवाज सुनाई पड़ी, “सावधान रहना।”

सेठी साहब ने चारों तरफ देखा की किसने बोला, पर कोई भी आसपास नहीं था। अपने दिमाग का भ्रम होगा यह सोच कर सेठी साहब पूजा आरती बगैरह कर काम पर निकल गए। पर यह आवाज उनके कानों में गूंजती रही। उनदिनों सेठी साहब के पास एक जीप थी। उस जीप में वह रोज लंच के समय वापस सर्किट हाउस पर आकर दोपहर का खाना खाकर फिर काम पर निकल जाते थे। सर्किट हाउस एक पहाड़ी पर था और जीप से काफी चढ़ाई और घुमाव वाला रास्ता पार कर उस सर्किट हाउस पर पहुंचा जा सकता था।

रोज की तरह उस दिन भी सेठी साहब दोपहर का लंच करने सर्किट हाउस अपने कुछ साथीऒं के साथ जीप को पहाड़ी पर चढ़ाई और घुमाव वाले रास्ते से चलाते हुए पहुंचे। अपने साथिओं को सर्किट हाउस के आंगन में उतार कर जब वह जीप को पार्क करने के लिए पहाड़ी के किनारे जाने के लिए जीप को रिवर्स कर रहे थे तब अचानक उनके कानों में फिर वही आवाज सुनाई दी “सावधान रहना”।

आवाज सुनते ही सेठी साहब ने जब ब्रेक लगाई तो जीप नीचे खाई की और लुढ़क कर गिर रही थी। जीप के पीछे जो सीमेंट की दीवार को एक छोटा सा खम्भा रोके रखा था वह टूट कर गिर गया था। उसी समय सेठी साहब ने माँ को याद किया और एक धमाके के साथ जीप नीचे गिरने से रुक गयी। सेठी साहब ने नीचे उतर कर देखा तो जीप एक टूटे पेड़ के मूल के सहारे रुकी ना होती तो सेठी साहब के साथ नीचे कम से कम एक हजार फ़ीट से भी गहरी खाई में गिर जाती और जीप के साथ सेठी साहब का पता भी नहीं चलता।

सेठी साहब ने कहा, “मैं समझ गया की माँ ही मुझे वह आवाज देकर सावधान कर रही थी। और उस दिन माँ ने ही मुझे बचा लिया।” यह बात कहते कहते सेठी साहब की आंखौं में पानी भर आया। मैं भी कहानी सुनकर काफी भावुक हो गयी थी। मैंने पहले तो माँ की एक फोटो जो कार के डैशबोर्ड पर रखी थी उस को हाथ जोड़े और फिर सेठी साहब की और देख सेठी साहब का हाथ थामा।

अनायास ही उस संवेदनशील घडी में मैंने उनका हाथ मेरे हाथ में लिया और मेरी जाँघ पर साड़ी के ऊपर रखा। मेरी आँखों में भी आंसूं आ गए। मेरी भावुक स्थिति और मेरी आँखों में आंसूं देख सेठी साहब अपने आप पर नियंत्रण नहीं रख पाए। थोड़ा सा सीट से खिसक कर, ताकि ड्राइवर हमें उसके सामने लगे आयने में देख ना सके, उन्होंने मेरा सर बाँहों में ले कर मुझे गले लगा लिया। मैं अपना सर उनकी चौड़ी छाती पर रख कर अपने आपको बड़ा महफूज़ महसूस कर रही थी। सेठी साहब भी उस भावुक अवस्था में बिना बोले मेरे बालों को सहलाते रहे।

उस बात के बाद हम में से कोई कुछ भी बोल नहीं पाए। कार के चलते चलते मैं कब गहरी नींद सो गयी पता ही नहीं चला। जब करीब तीन चार घंटे बाद आधे रास्ते में नाश्ते और चाय के लिए ड्राइवर ने कार रोकी तब मैंने पाया की मेरा सर सेठी साहब की जाँघों पर टिका कर मैं पीछे की सीट पर लम्बी हो कर सो रही थी।

सेठी साहब बेचारे मुझे आराम से सोने देने के लिए खिड़की की और खिसक कर थोड़ी सी जगह में मेरा सर अपनी जाँघों पर लिए हुए बैठे थे। सेठी साहब कभी मेरा सर तो कभी मेरी बाँहों को सेहला कर बड़े दुलार से चुपचाप बैठे हुए मुझे देख रहे थे। नींद में सोते हुए मुझे पता नहीं मेरा पल्लू कब खिसक गया होगा और मेरे ब्लाउज और ब्रा के भी बाहर फैले हुए मेरे बड़े बड़े मम्मे सेठी साहब को इतने करीब से नजर आ रहे होंगे।

सेठी साहब के मेरी बाँहें हिला हिला कर मुझे जगाने पर मैं हड़बड़ा कर उठ खड़ी हुई और अपने पल्लू को ठीक करते हुए चाय नाश्ते के लिए नीचे उतरी। चाय नाश्ता ख़त्म होने के बाद मुन्ना और ड्राइवर बातें करते वापस कार की और जा रहे थे तब मेरी चाय ख़तम नहीं हुई थी। सेठी साहब हमारे बिल का भुगतान कर मेरी चाय ख़तम होने का इंतजार का रहे थे!

तब मौक़ा देख कर मैंने सेठी साहब से कहा, “सेठी साहब, जब तक हम मेरे मायके पहुंचेंगे तब तक तो रात हो जायेगी। भाई ने आपके और ड्राइवर के खाने और रहने का पूरा इंतजाम कर दिया है। हमारा घर काफी बड़ा है। ड्राइवर के लिए आँगन में एक बाथ रूम अटैच्ड कमरा है और हमारे लिए ऊपर की मंजिल पर दो कमरे खाली हैं और हर तरह से रहने के लिए तैयार हैं।आप प्लीज अपने होटल को फ़ोन कर दीजिये की आप नहीं आएंगे और वह आपकी बुकिंग कैंसिल कर दे। अगर आप हमारे साथ रुकेंगे तो हमें बड़ी ही ख़ुशी होगी।”

मेरे काफी आग्रह के बाद सेठी साहब ने मेरी बात मान कर फ़ोन कर के अपनी होटल के रूम की बुकिंग सिर्फ उस दिन के लिए कैंसिल की। जब सेठी साहब ने अपनी बुकिंग कैंसिल की तब मैंने सेठी साहब का हाथ अपने हाथ में लेकर दबाया और अपनी आँखों से और आभार युक्त मुस्कान से उनको “शुक्रिया” कहा।

दुबारा जब हमारा सफर शुरू हुआ तो जागने की मेरी लाख कोशिश करने पर भी मुझे नींद की झपकियां आतीं रहीं। मैं हमेशा यह देखती रही की मेरी वजह से सेठी साहब को कष्ट ना हो। पर पता नहीं कब मैं फिर से गहरी नींद सो गयी और लुढ़क कर सेठी साहब के ऊपर जा गिरी।

सेठी साहब ने कार के बिलकुल एक कोने में खिसक कर मुझे पीछे की सीट पर लम्बी हो कर लेटने दिया और पहले की तरह ही मेरा सर फिर अपनी जाँघों के ऊपर ले लिया। इस बार एक बार मैं जग गयी तो मैंने पाया की मेरा सर सेठी साहब की जाँघों के ऊपर था। सेठी साहब का एक हाथ मेरी एक बाँह को सेहला रहा था। मैंने थोड़ा ऊपर की और खिसक कर सेठी साहब की गोद में अपना सिर रख दिया।
 
शाम का समय हो चूका था, कुछ कुछ अन्धेरा सा छा रहा था। उस वक्त मेरा मन बड़ा ही चंचल हो रहा था। एक और इतने हैंडसम और तगड़े सेठी साहब जो मेरे लिए इतना सब कुछ कर रहे थे, और एक मैं थी जो उनके लिए कुछ भी नहीं कर रही थी।

लास्ट टाइम जब वह मेरी मालिश कर रहे थे तब अगर मैं उन्हें थोड़ा सा भी सपोर्ट करती तो वह मेरे स्तनों को मसल कर खुश होते। मेरा क्या जाता? मेरे पति तो यह सुन कर बड़े खुश होते। मेरे पति ने तो बल्कि मुझे लगभग स्पष्ट शब्दों में ही इशारा कर दिया था की मैं सेठी साहब से चुदवा लूँ तो वह बहुत खुश होंगे। पर उस टाइम मैंने कुछ किया नहीं और उतना बढ़िया माहौल बेकार चला गया।

मेरा बड़ा मन हुआ की अभी कार में जाते जाते मैं सेठी साहब को ऐसे इशारे दूँ की वह समझ जाएँ की अगर वह मेरे साथ आगे बढ़ेंगे तो मुझे कोई आपत्ति नहीं और उन्हें चाहिए की वह हिचकिचाएं नहीं। अगर वह समझ गए तो शायद सेठी साहब पुरे तीन दिन हमारे घर में ही रुकने के लिए राजी हो जाएँगे और जयपुर होटल में रुकने की जिद नहीं करेंगे। पर मुझे सावधानी रखनी होगी की ड्राइवर जो आगे बैठा गाडी चला रहा था उसको कोई शक नहीं होना चाहिए।

मैंने सेठी साहब को कोई ना देखे ऐसे धीरे से उनकी जांघ के ऊपर हलकी सी चूँटी भर के उन्हें इशारा किया की मैं शरारत के मूड़ में थी। मेरे चूँटी भरने से सेठी साहब अपनी सीट पर कुछ इधरउधर तो खिसके पर शुक्र था की वह कुछ बोले नहीं। सेठी साहब समझ गए की मैं जाग रही थी।

वैसे ही कार चलती रही और मैं पहले ही की तरह सेठी साहब की गोद में मेरा सर रख कर पीछे की सीट पर लम्बी हो कर सो रही थी। पर इस टाइम मैंने चुन्नी से अपने सर और छाती अच्छी तरह से ढक लिए। मैंने चुन्नी के नीचे अपना एक हाथ अपने सर पर और दूसरे हाथ को सेठी साहब की जाँघ के नीचे जाँघ और सीट के बीच में रखा हुआ था।

जब सेठी साहब ने भी कार के चलते अपना एक हाथ आदतन मेरी बाँह पर चुन्नी के ऊपर रखा तो मैंने धीरे से चुन्नी को हटा कर सेठी साहब का हाथ चुन्नी के नीचे मेरे हाथ में लिया। चुन्नी से ढके हुए ही मैंने अपना हाथ मेरी छाती पर मेरी कमर तक सीधा कर लिया। उस समय मेरी बाँह मेरी छाती पर थी।

सेठी साहब ने भी चुन्नी से ढके हुए अपने हाथ को मेरी बाँह पर रखा और वह मेरी बाँह को अपने हाथ से हलके से प्यार से सहलाने लगे। अँधेरे में और चुन्नी के नीचे ढके हुए होने के कारण सेठी साहब का हाथ कहाँ है कोई देख नहीं सकता था। सेठी साहब समझ गए थे की मैं उस वक्त जाग रही थी।

मैंने धीरे से जानबूझ कर मेरी बाँह हटा दी और सेठी साहब का हाथ सरक कर मेरी छाती पर फिसल ने दिया। फिर मैंने हलके से अपने हाथ से सेठी साहब के हाथ को थामे रखा जिससे सेठी साहब अपना हाथ मेरी छाती को छूने के डर के मारे वापस ना खिंच लें।

मैंने मेरी छाती पर टिके हुए हमारे हाथ मेरे पल्लू से अच्छी तरह ढक दिए ताकि अगर ड्राइवर या मुन्नू पीछे देखें तो उन्हें हमारे हाथ नजर ना आये। सेठी साहब का हाथ मेरे स्तनोँ पर ब्रा को को छूने से जैसे मेरे रगों में खून तेजी से बहने लगा।

कुछ देर बाद जब मुझे तसल्ली हो गयी की सेठी साहब उनका हाथ मेरी छाती से नहीं हटाएंगे तब धीरे से मैंने अपना हाथ वहाँ से खिसका लिया। मैंने सेठी साहब का हाथ मेरी छाती के ऊपर ही रहने दिया। मैंने महसूस किया की मेरी इस हरकत से सेठी साहब में भी कुछ हिम्मत आयी और वह धीरे से अपनी उँगलियों को मेरे ब्लाउज के ऊपर से मेरे स्तनोँ के ऊपर फिराने लगे।

मैं चाहती थी की उस अँधेरे का फायदा उठा कर सेठी साहब मेरे ब्लाउज और ब्रा को खोल कर मेरे नंगे स्तनोँ को खूब मसलें और सहलाएं और जो उनकी अधूरी इच्छा थी वह उसे पूरी करें।

कुछ देर मेरे स्तनोँ को ब्लाउज के ऊपर से सहलाने के बाद भी जब सेठी साहब ने कुछ किया नहीं तो मुझे वाकई में गुस्सा आ गया। यह कैसा आदमी है? इतनी लिफ्ट देने के बाद भी कुछ करता नहीं। गुस्से में मैंने सेठी साहब की जॉंघ पर एक तगड़ी चूँटी भरी। इस बार सेठी साहब काफी तगड़ा दर्द हुआ होगा, क्यूंकि उनके मुंह से हलकी सी सिसकारी निकल गयी।
 
सेठी साहब शायद मेरा इशारा समझ गए होंगे, क्यूंकि सेठी साहब ने मेरी चूँटी के जवाब में मेरे एक स्तन पर निप्पल पिचका कर इतनी जोर से चूँटी भरी की मेरे मुंह से भी सिसकारी निकल गयी। इतनी सख्त चूँटी भर कर सेठी साहब क्या सन्देश देना चाहते थे? शायद सेठी साहब इशारा कर रहे थे की जो भी करना है वह बाद में करेंगे, उस वक्त नहीं क्यूंकि कार में मुन्ना और ड्राइवर हैं। पर साथ साथ में यह सन्देश भी दे ही दिया की वह भी अब मेरे साथ सेक्स का खेल खेलने के लिए तैयार थे।

उस वक्त मुझे सेठी साहब पर इतना प्यार उमड़ रहा था की मैं इंतजार के मुड़ में नहीं थी। मैं चाहती थी की सेठी साहब के साथ मेरी सेक्स की दास्तान उसी समय कार में ही शुरू हो, ताकि जब रात को हम आजुबाजु के कमरे में रुकें तो सेठी साहब के दिमाग में मेरी नियत के बारे में कोई असमंजस ना हो।

मैं सेठी साहब का हाथ मेरे हाथ में ले कर मेरे गालों पर धीरे से रगड़ने लगी। फिर उनके हाथ की हथेली को मेरे होँठों पर रख मैं उन्हें प्यार से चूमती रही। मेरी चूमने का जोश मेरी मानसिक स्थिति का अंदेशा देता होगा।

जब मैंने महसूस किया की शायद ड्राइवर ना देखे इस डर के मारे सेठी साहब फिर भी आगे बढ़ने से कतरा रहे थे तब मैंने अपने हाथ सेठी साहब की गर्दन के आसपास लपेट कर अपने आपको हलके से थोड़ा ऊपर उठाया और सेठी साहब का मुंह नीचे कर मेरे होँठ पर सेठी साहब के होँठ चेप दिए।

तब कहीं जाकर सेठी साहब का धैर्य का बाँध टूटा। फिर तो सेठी साहब मेरे होँठों को ऐसे जकड कर मुझे इतने प्यार से चुम्बन करने लगे की मेरा दिनाग घूमने लगा। कार के अंदर अन्धेरा छाया हुआ था, इसलिए ड्राइवर हमारी करतूतें देख नहीं सकता था।

सेठी साहब बार बार अपनी जीभ मेरे मुंह में देकर उसे चूसने के लिए दे रहे थे और मैं भी पुरे जोश से सेठी साहब की जीभ चूस कर उनकी लार को निगल रही थी।

सेठी साहब हलके से मेरे कान में अपने होँठ लगाकर बोले, “ज्योति , मैं तुम्हें बेतहाशा चाहता हूँ। मैं तुम्हें अपनी बनाना चाहता हूँ। क्या तुम मुझे……?” सेठी साहब ने वाक्य वैसे ही आधा लटकता हुआ छोड़ दिया। मैं समझ नहीं पायी की सेठी साहब आगे क्या कहना चाहते थे।

क्या वह कहना चाहते थे की “तुम भी मुझे अपनाओगी?” वैसे मैं जानती थी की सेठी साहब की आदत थी की जो कुछ भी कहना चाहते थे उसे वह घुमा फिरा कर नहीं सीधा कह देते थे। तो फिर क्या वह एकदम सीधी चुदाई की ही बात करना चाहते थे और पूछना चाहते थे की “क्या तुम मुझे चोदने दोगी?”

मैं उस वक्त चिल्ला चिल्ला कर कहना चाहती थी की “सेठी साहब मैं तुम्हारी हूँ, मेरा यह बदन तुम्हारा है और मैं तुमसे खूब सख्त तरीके से चुदने के लिए सिर्फ तैयार ही नहीं, बल्कि बेसब्र हूँ।” उस समय मेरी चूत पूरी तरीके से गीली हो चुकी थी। मेरा बस चलता तो उसी वक्त मैं नंगी हो कर सेठी साहब को कार में ही मुझे चोदने के लिए मजबूर कर देती।

सेठी साहब का मुंह मरे छोटे होँठों को पुरे तरीके से अपने कब्जे में रखे हुए था। वह कभी मेरे होँठ चाटते तो कभी अपने होँठों के अंदर मेरे होँठों को चूस कर जैसे मेरे होँठों को खा ही जाएंगे इतनी शिद्दत और जोश से चूस, चुम और काट रहे थे। वह कुछ ही पलों का चुम्बन मेरे जीवन का सबसे यादगार चुम्बन था। हमारी कार उस समय मेरे मायके के गाँव से करीब एक घंटे की दुरी पर थी।

सेठी साहब ने जैसे वह मेरा दिमाग पढ़ रहे हों, एक हाथ मेरी पीठ पीछे रख कर अपनी उँगलियों से एक के बाद एक मेरे ब्लाउज के बटन खोल दिए। मैंने भी मेरी पीठ ऊपर कर उनको मेरे ब्लाउज के पट और मेरे ब्रा के हुक खोलने दिया। मेरे अल्लड़ स्तन अब ब्रा और ब्लाउज के बंधन से मुक्त हो चुके थे।

थोड़ा भी समय ना गंवाते हुए सेठी साहब मेरी और थोड़ा घूम कर, दोनों हाथों से मेरे गोरे भरे हुए मांसल स्तनोँ को सहलाने और मसलने लगे। मेरा पूरा बदन और ख़ास कर मेरा मन, मेरा दिमाग उस समय उत्तेजना की अद्भुत सुनामी में झूम रहा था। मेरे स्तनोँ की निप्पलेँ सख्त हो गयीं थीं और सेठी साहब की उंगलियों से पिचकवाने के लिए बेताब थीं।

अनायास ही मेरा एक हाथ मैंने सेठी साहब की जाँघों के बीच रख दिया और पतलून के ऊपर से ही मैंने सेठी साहब के लण्ड को सहलाने की कोशिश की। उस समय मुझे एहसास हुआ की सेठी साहब का लण्ड उनके पतलून में लोहे के छड़ की तरह सख्त हो चुका था।

मेरे लिए उस समय इतनी संकड़ी जगह में सेठी साहब के लण्ड को देख पाना या ठीक से महसूस करना भी नामुमकिन था। पर जो कुछ भी मुझे महसूस हुआ उससे मुझे लगा, बापरे! वाकई में जो मैंने अपने पति से सूना था शायद वह सच ही लग रहा था।

पढ़ते रखिये.. कहानी आगे जारी रहेगी!
 
मेरे सेठी साहब के लण्ड को सिर्फ पतलून के ऊपर से छूते ही मुझे महसूस हुआ जैसे सेठी साहब के लण्ड में से उसका वीर्य रिसने लगा, क्यूंकि चन्द पलों में ही उसके ज़िप का हिस्सा चिकनाहट से भर गया। शायद वह वीर्य नहीं पर उनके लण्ड का पूर्व रस था जो उत्तेजित होते हुए ही किसी भी मर्द के लण्ड के छिद्र से रिसने लगता है और जो मर्द की उत्तेजना को दर्शाता है।

मैंने सेठी साहब के लण्ड के ऊपर हाथ फिराते हुए सेठी साहब की और देखा। हालांकि उनका ध्यान उनके लण्ड के ऊपर ही होगा पर उनकी आँखें सीधा देख रहीं थीं। उस समय मुझे सेठी साहब के ऊपर बेतहाशा प्यार आ रहा था।

सेठी साहब के गाढ़ चुम्बन करने से और बड़ी गर्मजोशी से मेरे स्तनोँ को मसलने के कारण मैं इतनी ज्यादा गरम हो चुकी थी की मेरी चूत में से मेरा स्त्री रस थमने का नाम नहीं ले रहा था। मेरी चूत और मेरी गाँड़ तक गीली हो रहीं थीं। मैंने सेठी साहब के पतलून के ऊपर से ही सेठी साहब के लण्ड को सहलाना शुरू किया।

अब मैं सेठी साहब से चुदवाने के लिए पागल हो रही थी। मैंने मेरे पति और डॉली जी से सेठी साहब की तगड़ी और आक्रमक चुदाई के बारे में सूना था। मेरे पति ने तो सेठी साहब के लण्ड का भी काफी विस्तार से वर्णन किया था। मेरे लिए अब वह लण्ड को अपनी चूत में डलवा कर चुदवाना जैसे मेरे जीवन का एक ध्येय सा बन गया था।

मैंने सेठी साहब के पतलून की ज़िप खोल कर उनके लण्ड को अंदर से सहलाने की कोशिश की। पर सेठी साहब के बैठने के कारण ज़िप तो खुल गयी पर निक्कर से लण्ड निकालना नामुमकिन था। मैं सेठी साहब का लण्ड चूमने और चूसने के लिए बेताब थी। सेठी साहब ने मेरी बेसब्री को महसूस किया।

उन्हें भी शायद अपना लण्ड चूसवाने की इच्छा होगी, पर क्या करें उस समय, जगह और हालात में वह सब संभव नहीं था। मैंने सेठी साहब के लण्ड के फूल जाने से जो बड़ा सा गुब्बारा जैसा तम्बू बना था उस पर अपनी उंगलियां फिरा कर ही अपने आप को तसल्ली दी। उस वक्त सेठी साहब मेरे सर पर हाथ फिरा कर शायद मुझे यह तसल्ली देने की कोशिश कर रहे थे की जब समय आएगा तो वह अपने आप ही मुझसे अपने लण्ड का सामना करा देंगे।

अब ज्यादा समय नहीं बचा था। कार को घर पहुंचने में आधे घंटे का समय रह गया था। कुछ देर तक मैंने सेठी साहब की जाँघों के बीच उनकी ज़िप को चूमा। सेठी साहब इस अनुभव से काफी बेबाक से आगे की सड़क को देख रहे थे। शायद उनके मन में जगह और समय ना होने का अफ़सोस रहा होगा क्यूंकि उन्होंने कुछ देर के बाद हलके से मेरे मुंह को हटाया और हलके से मेरे कानों में बोले, “रुको, अभी पूरी रात बाकी है। कार जल्द ही घर पहुँचने वाली है।”

मैंने फटाफट ड्राइवर ना देख पाए ऐसे लगभग सेठी साहब की गोद में बैठ कर सेठी साहब का सर अपने हाथों में पकड़ा और अपनी और खिंच कर सेठी साहब कुछ बोल या समझ पाएं उसके पहले यह बोलते हुए की “सेठी साहब आई लव यू वैरी मच” उनको होठोँ पर एक जोश भरा चुम्बन किया। मेरे इस जोशखरोश भरे चुम्बन से स्तब्ध हो कर सेठी साहब मेरी और देखते ही रह गए।

कार हमारे गॉंव में पहुँच चुकी थी। मैंने ड्राइवर को घर जाने का रास्ता दिखाते हुए मार्गदर्शन किया। घर पहुंचने पर मेरे मायके वालों ने जब हमारी कार के हॉर्न की आवाज सुनी तो घर के दरवाजे में पुरे घर के सभी सदस्य बनठन कर हाजिर हो गए। मेरी भाभी के हाथों में एक थाल था जसमें आरती जल रही थी। सेठी साहब के दरवाजे के करीब पहुँचते ही भाभी ने सेठी साहब की आरती उतारी और कपाल पर तिलक किया और गले में फूलों की माला पहनाई। सेठी साहबने उनकी इस तरह की आवभगत की कल्पना भी नहीं की होगी।

सेठी साहब का सामान उनके ऊपर की मंजिल में एक कमरे में रख दिया गया और मेरा सामान उसके बाजू वाले के कमरे में रख दिया गया। सेठी साहब के सामने मेरे पिताजी ने हाथ जोड़ कर आग्रह किया की वह चाहते थे की सेठी साहब हमारे यहां पुरे तीन दिन रुकें जब तक उनका जयपुर में काम है। काफी जद्दोजहद के बाद आखिर में सेठी साहब को मानना ही पड़ा।

फ्रेश होने के लिए जब मैं सेठी साहब को उनके कमरे में ले गयी तो मैंने देखा की उनके कमरे में व्हिस्की की एक बोतल और कुछ गिलास रखे हुए थे। एक आइस बॉक्स में बर्फ के टुकड़े भी रखे हुए थे। मेरे भाई को शायद मेरे पति ने बता दिया था की सेठी साहब ड्रिंक करते हैं। सेठी साहब ने मेरी और आश्चर्य से देखा। मैंने कंधे हिलाकर उनको जताया की मुझे इसके बारे में कोई जानकारी नहीं थी। मैंने सेठी साहब से अनुग्रह किया की अगर वह चाहें तो डिनर से पहले एकाध ड्रिंक ले कर नीचे भोजन के लिए आ सकते हैं। हम सब उनका नीचे इंतजार करेंगे।

सेठी साहब ने मुस्कुराते हुए कहा कहा, “मुझे ड्रिंक करने की कोई जल्दी नहीं है। अगर तुम मेरा साथ दोगी तो डिनर के बाद हम साथ में ड्रिंक करेंगे।”

मैंने कहा, “सेठी साहब, यह मेरा मायका है। यह कोई दिल्ली नहीं, जो हम हमारी मन मर्जी का करें। हमें कुछ नियमों का पालन करना पड़ता है।यह शहर नहीं, एक छोटा सा गाँव है। यहां तो मेरी साड़ी का पल्लू अगर थोड़ा सा भी हट गया या मेरी साड़ी कमर से कितनी नीचे है यह भी देख कर टिपण्णी की जाती है, ड्रिंक करना तो दूर की बात है। “

मेरी बात सुन कर सेठी साहब को जैसे भारी सदमा पहुंचा हो ऐसे उनका चेहरा फीका पड़ गया। शायद उन्होंने उम्मीद रखी होगी की मैं अपने मायके में उनके साथ अकेले में कुछ समय बिता पाउंगी। अपने आप को सम्हालते हुए मेरे सामने खिसियानी नजर कर बोले, “ओह…. मैं समझ सकता हूँ। आई ऍम सॉरी। आपकी बात सही है। चलिए डिनर के लिए चलते हैं। मुझे ड्रिंक का कोई क्रेज नहीं। ड्रिंक तो दिल्ली जा कर भी कर लेंगे।” यह कह कर सेठी साहब उठ खड़े हुए और चल दिए।

सेठी साहब का उतरा हुआ चेहरा देख मुझे बहुत बुरा लगा। कार मैं प्यार भरी हरकतें कर सेठी साहब के मन में लालसा तो मैंने ही जगाई थी ना? अब गाँव आ कर मैं पलट गयी ऐसा शायद उनको लगा होगा।

डिनर के दरम्यान सेठी साहब मेरे भाई, भाभी और पापा से बड़ी विनम्रता पूर्वक बातें करते रहे पर मैं जानती थी की उनकी बातों में जान नहीं थी। मेरे पापा बार बार उनको हमारे घर में पुरे तीन दिन रुकने के लिए कहते रहे पर सेठी साहब का मन जैसे उठ गया हो, वह उस बात को टाल कर साफ़ हाँ कहने से बचते रहे। कार में जब मैंने सेठी साहब से मेरे मायके में तीन दिन पुरे रुकने के लिए कहा था तब वह रुकने के लिए काफी उत्सुक लग रहे थे, पर हमारी बात के बाद उनमें वह उत्साह गायब था।

डिनर के बाद सेठी साहब उठ खड़े हुए और मेरे पापा और भाई, भाभी से हाथ जोड़ कर औपचारिकता पूर्वक बात करते हुए बोले की वह थक गए हैं और उन्हें अगले दिन काफी काम है सो वह रात को जल्दी सोना चाहेंगे। यह कह कर वह सीढ़ी चढ़ कर ऊपर की मंजिल जहां उन्हें रुकना था, चले गए। मैं ड्राइवर को देखने बाहर आँगन वाले कमरे की और गयी की मैं खुद देखूं उसके रुकने और खाने की सही व्यवस्था हुई या नहीं। मुन्ना पुरे समय भाई की बेटी के साथ बातें करने, टीवी देखने और खेलने में लगा रहा।

गाँव में सब जल्दी सो जाते थे। जब मैं फारिग हुई तब करीब १० बज चुके थे। मैं ड्राइवर से मिल कर वापस आयी तो सब अपने अपने कमरे में जा चुके थे। सिर्फ माँ डाइनिंग टेबल पर बैठी मेरा इंतजार कर रही थी। मुन्ना ड्राइंग रूम में सोफे पर सो गया था। माँ और पापा के कमरे में जा कर मैंने सब की कुशलता बगैरह के बारे में बात की।

कुछ समय बात कर मैं मुन्ने को ले कर ऊपर की मंजिल पर अपने कमरे में जाने लगी तो माँ ने हिदायत दी की ऊपर जाते समय मैं सीढ़ी का दरवाजा पीछे से बंद कर दूँ। ऊपर की मंजिल पहुंचते ही मैंने देखा की सेठी साहब बाहर झरोखे में खड़े हुए हमारे घर के पीछे खेतों में जैसे कुछ देख रहे हों। हम औरतें हमारे मर्दों को काफी अच्छी तरह जानती हैं। जब वह रूठ जाते हैं तो हम औरतों की तरह वह अपनी फीलिंग्स छिपा नहीं सकते। मैं समझ गयी थी की सेठी साहब मुझसे कुछ हद तक रूठे हुए थे।
 
मुन्ने को अपने कमरे में पलंग पर अच्छी तरह सुला कर मैं वापस झरोखे में आयी। मेरे मायके में सब नीचे की मंजिल के कमरों में ही रहते थे। ऊपर की मंजिल में दो कमरे मेहमान के लिए खाली रखे हुए थे। अक्सर ऊपर की मंजिल जाने के दरवाजे पर रातको ताला लगा हुआ होता था ताकि रात को ऊपर से झरोखे पर चढ़ कर कोई चोर नीचे ना आ सके। गॉंव में चोरियों का डर होता है। मैंने ऊपर आते हुए सीढ़ी के दोनों दरवाजे, एक नीचे वाला और एक ऊपर वाला, को मेरे पीछे बंद कर दिया था। ऊपर की मंजिल पर उस समय मैं, मुन्ना और सेठी साहब के अलावा और कोई नहीं था।

उस समय सेठी साहब के मन में क्या चल रहा होगा यह मैं अच्छी तरह जानती थी। उनका दिल मैंने मेरी रूखी बातों से आहत कर दिया था। मुझे उनके चेहरे पर फिरसे वही शरारत और शौखियाँ लानी थी। मेरे आने की जब सेठी साहब ने आहट सुनी तो पीछे मुड़े और मुझे देख कर हलके से मुरझाये हुए शायद औपचारिकता दिखाने के लिए मुस्काये। पर उनकी फीकी सी मुस्कान में उनके मन के भाव स्पष्ट दिख रहे थे।

मैंने झरोखे की बत्ती को बुझा दिया और सेठी साहब के पास जा कर पूछा, “क्या बात है? आप तो थक गए थे न? अब यहां बालकनी में ऐसे मुंह फुला कर क्यों खड़े हो?”

सेठी साहब ने मेरी और नहीं देखा और मुझसे थोड़ी दूर हट कर रिसियानी शकल बना कर खड़े हो गए। मेरी बात का उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। मैं सेठी साहब के पास जा कर उनसे कस कर लिपट गयी और फिर उनके कानों में धीमी आवाज में फुसफुसाती हुई बोली, “मोरे सैय्याँ मोसे रूठ गए, अब उनको मैं मनाऊं कैसे?”

सेठी साहब ने मेरी पीठ पर प्यार से हाथ फिराया और कुछ दुखी मन से झुंझलाते हुए बोल पड़े, “क्यों अब क्यों मुझसे लिपट रही हो? तुम्हारे नियम पालन का क्या हुआ? अभी भी तो हम गांव में ही हैं।“

मैं सेठी साहब का कटाक्ष समझती थी। झरोखे में अन्धेरा था। मैंने सेठी साहब के सिर को खिंच कर नीचे की और झुकाया और उनके होँठों को मेरे होँठ पर चिपकाते हुए कहा, “ओय होय! मेरे सैय्यांजी रूठ गए रे! सेठी साहब अब हम गाँव में नहीं अँधेरे में हैं। अँधेरे में गाँव में भी सब कुछ होता है।”

मेरी बात सुन कर सेठी साहब का मुरझाया हुआ चेहरा अचानक खिल उठा। सेठी साहब ने नीचे झुक कर मेरी दोनों घुटनों के नीचे बाँहें डालकर मुझे अपनी बाँहों में उठा कर मेरे होँठों को जोर से चूमते हुए कहा, “अच्छा? अँधेरे में गाँव में और क्या क्या होता है? बताओ तो?” फिर वह बोले, “तुम नहीं, अब मैं बताता हूँ की गाँव में अँधेरे में क्या क्या होता है।”

मैं उस वक्त कुछ भी बोलने की हालत में नहीं थी। मैं सेठी साहब की गर्दन के इर्दगिर्द अपनी बाँहों की माला बनाकर उनकी बाँहों में बड़े सकून के साथ ऊपर उठे हुए उनके होँठों में अपने होँठों को चुसवाते हुए सेठी साहब के मुँह को बड़े प्यार से चूसती रही। सेठी साहब ने अपनी फौलादी बाँहों में मुझे ऐसे ऊपर हवा में उठा रखा था जैसे मैं कोई औरत नहीं कोई हलकी सी फूल की लड़ी थी।

सेठी साहब के होंठ और मुंह मेरी जीभ को ऐसे चूस रहे थे जैसे वह मेरे बदन से सारा पानी निकाल देंगे। मैं भी सेठी साहब की जीभ को अपने मुंह में लेकर उनकी लार बड़े ही प्यार से पिने लगी। आसमान के तारों के हलके से प्रकाश में मैं सेठी साहब के चेहरे को देख रही थी। उनकी आँखें जैसे नशे में डूबी हुई हों इस तरह वह कभी आँखें मूँद कर तो कभी मेरी आँखों में आँखें डालकर बेतहाशा जोशखरोश से मेरे होँठ चुम रहे थे।

एक बार जब सेठी साहब ने जोश में आकर मेरे होँठ काटे तो मेरे मुंह से ना चाहते हुए भी हलकी सी सिसकारी निकल गयी। मैंने सेठी साहब के मुंह से मुंह हटा कर कहा, “सेठी साहब प्लीज हमारी आपसी करतूतों का कोई निशान दिखे ऐसा अभी मत करना। वरना मेरी बदनामी हो जायेगी। आप नहीं चाहोगे ना की मैं बदनाम होऊं?”

मेरी बात सुनकर सेठी साहब ने मुझे अपनी बाँहों में उठा कर सीने से चिपकाए हुए अपने कमरे की और जाते हुए बोले, “बिलकुल नहीं। अब हम जो करेंगे अँधेरे में ही करेंगे और मैं अब सब कुछ करूंगा पर वादा करता हूँ की कोई खुला दिखे ऐसा निशान नहीं छोडूंगा जिससे तुम्हारी बदनामी हो। बोलो मंजूर है?”

मैंने सेठी साहब के गालों को चूमते हुए कहा, “मैंने तो आपको पहले ही सैय्यां कह कर अपनी मंजूरी दे दी है। जबसे आपने मुन्ने की स्कूल में मेरे हस्बैंड बनने की इच्छा जताई थी तब से मैंने तो आपको मेरा दूसरा पति माने उपपति मान लिया था। राज मेरे पति हैं और मेरा बदन उनके भोग मतलब आनंद के लिए है वैसे ही अब आपको मैंने अपना उपपति मान लिया है और मेरा यह बदन आप के भी भोग और आनंद के लिए प्रस्तुत है..
 
मैं अब पूरी रात के लिए आपकी पत्नी हूँ, आपकी प्रियतमा हूँ, दासी हूँ, रखैल हूँ, आपकी रंडी हूँ जो आप मुझे मानें। आप मुझसे जो चाहे करें और करवाएं। मुझे सब मंज़ूर है, मैं तैयार हूँ। आप के प्यार और बलिदान ने मुझे जित लिया है। आज मुझे मौक़ा मिला है की मैं आपने आपको आपके हवाले कर आपसे उत्कट प्यार का आदान प्रदान करूँ।”

मुझे कमरे में ले जा कर पलंग पर लिटाते हुए सेठी साहब बोले, “ज्योति मुझे तुम्हारी तरह इतने भारीभरकम शब्द नहीं आते। मैं तो सिर्फ इतना ही कहूंगा की मैं तुम्हारे पति बनने का सौभाग्य……”

मैंने सेठी साहब की बात को बीच में ही काटते हुए कहा, “सेठी साहब, मैं जानती हूँ की आप और डॉली जी दोनों साफ़ साफ़ देसी भाषा में बोलना पसंद करते हैं। ख़ास कर सेक्स के सम्बंधित बातें। अब हमारे बीच ऐसे सम्बन्ध नहीं रहे की आपको मुझसे नापतोल कर बोलने की जरुरत है। आप बेशक आपकी मनपसंद और देसी भाषा में मुझसे जो कहना है वह बेबाक कह सकते हो। यह एक पल के लिए भी मत सोचना की मैं क्या सोचूंगी।”

सेठी साहब ने मेरे होँठ चूमते हुए कहा, “मेरी ज्योति रानी इतने कम समय में काफी सयानी हो गयी है। ठीक है मेरी रानी, अब मैं तुमसे देसी भाषा में ही बात करूँगा। ज्योति , तुम मेरी दासी, रखैल या रंडी नहीं, मेरी प्रियतमा हो, मेरे दिल की रानी हो। जैसे तुमने मुझे उपपति का ओहदा दिया है, मैं भी तुम्हें मेरी उपपत्नी के रूप में स्वीकार करता हूँ। मैंने डॉली से शादी करते समय वादा किया था की मैं किसी भी और स्त्री की भले ही चुदाई करूँ, पर मैं उसे पत्नी का दर्जा नहीं दूंगा..

पर जैसे की डॉली ने तुम्हें बताया है, हम मतलब, मैं और डॉली , किस्मत के एक अजीब खेल में फंसे हैं। इसी समय माँ ने मतलब दुर्गा माँ ने तुम्हें और राज भाईसाहब को हमारे लिए देवदूत के रूप में भेजा है ऐसा मेरा मानना है। हमारे बीच जो सम्बन्ध उजागर हो रहे हैं शायद माँ उसके द्वारा हमारी समस्याओं को अपने तरीके से सुलझाना चाहती है अगर तुम और राज साहब राजी हों तो…….।”

पढ़ते रखिये.. कहानी आगे जारी रहेगी!
 
सेठी साहब शायद मेरा इशारा समझ गए होंगे, क्यूंकि सेठी साहब ने मेरी चूँटी के जवाब में मेरे एक स्तन पर निप्पल पिचका कर इतनी जोर से चूँटी भरी की मेरे मुंह से भी सिसकारी निकल गयी। इतनी सख्त चूँटी भर कर सेठी साहब क्या सन्देश देना चाहते थे? शायद सेठी साहब इशारा कर रहे थे की जो भी करना है वह बाद में करेंगे, उस वक्त नहीं क्यूंकि कार में मुन्ना और ड्राइवर हैं। पर साथ साथ में यह सन्देश भी दे ही दिया की वह भी अब मेरे साथ सेक्स का खेल खेलने के लिए तैयार थे।

उस वक्त मुझे सेठी साहब पर इतना प्यार उमड़ रहा था की मैं इंतजार के मुड़ में नहीं थी। मैं चाहती थी की सेठी साहब के साथ मेरी सेक्स की दास्तान उसी समय कार में ही शुरू हो, ताकि जब रात को हम आजुबाजु के कमरे में रुकें तो सेठी साहब के दिमाग में मेरी नियत के बारे में कोई असमंजस ना हो।

मैं सेठी साहब का हाथ मेरे हाथ में ले कर मेरे गालों पर धीरे से रगड़ने लगी। फिर उनके हाथ की हथेली को मेरे होँठों पर रख मैं उन्हें प्यार से चूमती रही। मेरी चूमने का जोश मेरी मानसिक स्थिति का अंदेशा देता होगा।

जब मैंने महसूस किया की शायद ड्राइवर ना देखे इस डर के मारे सेठी साहब फिर भी आगे बढ़ने से कतरा रहे थे तब मैंने अपने हाथ सेठी साहब की गर्दन के आसपास लपेट कर अपने आपको हलके से थोड़ा ऊपर उठाया और सेठी साहब का मुंह नीचे कर मेरे होँठ पर सेठी साहब के होँठ चेप दिए।

तब कहीं जाकर सेठी साहब का धैर्य का बाँध टूटा। फिर तो सेठी साहब मेरे होँठों को ऐसे जकड कर मुझे इतने प्यार से चुम्बन करने लगे की मेरा दिनाग घूमने लगा। कार के अंदर अन्धेरा छाया हुआ था, इसलिए ड्राइवर हमारी करतूतें देख नहीं सकता था।

सेठी साहब बार बार अपनी जीभ मेरे मुंह में देकर उसे चूसने के लिए दे रहे थे और मैं भी पुरे जोश से सेठी साहब की जीभ चूस कर उनकी लार को निगल रही थी।

सेठी साहब हलके से मेरे कान में अपने होँठ लगाकर बोले, “ज्योति , मैं तुम्हें बेतहाशा चाहता हूँ। मैं तुम्हें अपनी बनाना चाहता हूँ। क्या तुम मुझे……?” सेठी साहब ने वाक्य वैसे ही आधा लटकता हुआ छोड़ दिया। मैं समझ नहीं पायी की सेठी साहब आगे क्या कहना चाहते थे।

क्या वह कहना चाहते थे की “तुम भी मुझे अपनाओगी?” वैसे मैं जानती थी की सेठी साहब की आदत थी की जो कुछ भी कहना चाहते थे उसे वह घुमा फिरा कर नहीं सीधा कह देते थे। तो फिर क्या वह एकदम सीधी चुदाई की ही बात करना चाहते थे और पूछना चाहते थे की “क्या तुम मुझे चोदने दोगी?”

मैं उस वक्त चिल्ला चिल्ला कर कहना चाहती थी की “सेठी साहब मैं तुम्हारी हूँ, मेरा यह बदन तुम्हारा है और मैं तुमसे खूब सख्त तरीके से चुदने के लिए सिर्फ तैयार ही नहीं, बल्कि बेसब्र हूँ।” उस समय मेरी चूत पूरी तरीके से गीली हो चुकी थी। मेरा बस चलता तो उसी वक्त मैं नंगी हो कर सेठी साहब को कार में ही मुझे चोदने के लिए मजबूर कर देती।

सेठी साहब का मुंह मरे छोटे होँठों को पुरे तरीके से अपने कब्जे में रखे हुए था। वह कभी मेरे होँठ चाटते तो कभी अपने होँठों के अंदर मेरे होँठों को चूस कर जैसे मेरे होँठों को खा ही जाएंगे इतनी शिद्दत और जोश से चूस, चुम और काट रहे थे। वह कुछ ही पलों का चुम्बन मेरे जीवन का सबसे यादगार चुम्बन था। हमारी कार उस समय मेरे मायके के गाँव से करीब एक घंटे की दुरी पर थी।

सेठी साहब ने जैसे वह मेरा दिमाग पढ़ रहे हों, एक हाथ मेरी पीठ पीछे रख कर अपनी उँगलियों से एक के बाद एक मेरे ब्लाउज के बटन खोल दिए। मैंने भी मेरी पीठ ऊपर कर उनको मेरे ब्लाउज के पट और मेरे ब्रा के हुक खोलने दिया। मेरे अल्लड़ स्तन अब ब्रा और ब्लाउज के बंधन से मुक्त हो चुके थे।

थोड़ा भी समय ना गंवाते हुए सेठी साहब मेरी और थोड़ा घूम कर, दोनों हाथों से मेरे गोरे भरे हुए मांसल स्तनोँ को सहलाने और मसलने लगे। मेरा पूरा बदन और ख़ास कर मेरा मन, मेरा दिमाग उस समय उत्तेजना की अद्भुत सुनामी में झूम रहा था। मेरे स्तनोँ की निप्पलेँ सख्त हो गयीं थीं और सेठी साहब की उंगलियों से पिचकवाने के लिए बेताब थीं।

अनायास ही मेरा एक हाथ मैंने सेठी साहब की जाँघों के बीच रख दिया और पतलून के ऊपर से ही मैंने सेठी साहब के लण्ड को सहलाने की कोशिश की। उस समय मुझे एहसास हुआ की सेठी साहब का लण्ड उनके पतलून में लोहे के छड़ की तरह सख्त हो चुका था।

मेरे लिए उस समय इतनी संकड़ी जगह में सेठी साहब के लण्ड को देख पाना या ठीक से महसूस करना भी नामुमकिन था। पर जो कुछ भी मुझे महसूस हुआ उससे मुझे लगा, बापरे! वाकई में जो मैंने अपने पति से सूना था शायद वह सच ही लग रहा था।

पढ़ते रखिये.. कहानी आगे जारी रहेगी!

मेरे सेठी साहब के लण्ड को सिर्फ पतलून के ऊपर से छूते ही मुझे महसूस हुआ जैसे सेठी साहब के लण्ड में से उसका वीर्य रिसने लगा, क्यूंकि चन्द पलों में ही उसके ज़िप का हिस्सा चिकनाहट से भर गया। शायद वह वीर्य नहीं पर उनके लण्ड का पूर्व रस था जो उत्तेजित होते हुए ही किसी भी मर्द के लण्ड के छिद्र से रिसने लगता है और जो मर्द की उत्तेजना को दर्शाता है।

मैंने सेठी साहब के लण्ड के ऊपर हाथ फिराते हुए सेठी साहब की और देखा। हालांकि उनका ध्यान उनके लण्ड के ऊपर ही होगा पर उनकी आँखें सीधा देख रहीं थीं। उस समय मुझे सेठी साहब के ऊपर बेतहाशा प्यार आ रहा था।

सेठी साहब के गाढ़ चुम्बन करने से और बड़ी गर्मजोशी से मेरे स्तनोँ को मसलने के कारण मैं इतनी ज्यादा गरम हो चुकी थी की मेरी चूत में से मेरा स्त्री रस थमने का नाम नहीं ले रहा था। मेरी चूत और मेरी गाँड़ तक गीली हो रहीं थीं। मैंने सेठी साहब के पतलून के ऊपर से ही सेठी साहब के लण्ड को सहलाना शुरू किया।

अब मैं सेठी साहब से चुदवाने के लिए पागल हो रही थी। मैंने मेरे पति और डॉली जी से सेठी साहब की तगड़ी और आक्रमक चुदाई के बारे में सूना था। मेरे पति ने तो सेठी साहब के लण्ड का भी काफी विस्तार से वर्णन किया था। मेरे लिए अब वह लण्ड को अपनी चूत में डलवा कर चुदवाना जैसे मेरे जीवन का एक ध्येय सा बन गया था।

मैंने सेठी साहब के पतलून की ज़िप खोल कर उनके लण्ड को अंदर से सहलाने की कोशिश की। पर सेठी साहब के बैठने के कारण ज़िप तो खुल गयी पर निक्कर से लण्ड निकालना नामुमकिन था। मैं सेठी साहब का लण्ड चूमने और चूसने के लिए बेताब थी। सेठी साहब ने मेरी बेसब्री को महसूस किया।

उन्हें भी शायद अपना लण्ड चूसवाने की इच्छा होगी, पर क्या करें उस समय, जगह और हालात में वह सब संभव नहीं था। मैंने सेठी साहब के लण्ड के फूल जाने से जो बड़ा सा गुब्बारा जैसा तम्बू बना था उस पर अपनी उंगलियां फिरा कर ही अपने आप को तसल्ली दी। उस वक्त सेठी साहब मेरे सर पर हाथ फिरा कर शायद मुझे यह तसल्ली देने की कोशिश कर रहे थे की जब समय आएगा तो वह अपने आप ही मुझसे अपने लण्ड का सामना करा देंगे।

अब ज्यादा समय नहीं बचा था। कार को घर पहुंचने में आधे घंटे का समय रह गया था। कुछ देर तक मैंने सेठी साहब की जाँघों के बीच उनकी ज़िप को चूमा। सेठी साहब इस अनुभव से काफी बेबाक से आगे की सड़क को देख रहे थे। शायद उनके मन में जगह और समय ना होने का अफ़सोस रहा होगा क्यूंकि उन्होंने कुछ देर के बाद हलके से मेरे मुंह को हटाया और हलके से मेरे कानों में बोले, “रुको, अभी पूरी रात बाकी है। कार जल्द ही घर पहुँचने वाली है।”

मैंने फटाफट ड्राइवर ना देख पाए ऐसे लगभग सेठी साहब की गोद में बैठ कर सेठी साहब का सर अपने हाथों में पकड़ा और अपनी और खिंच कर सेठी साहब कुछ बोल या समझ पाएं उसके पहले यह बोलते हुए की “सेठी साहब आई लव यू वैरी मच” उनको होठोँ पर एक जोश भरा चुम्बन किया। मेरे इस जोशखरोश भरे चुम्बन से स्तब्ध हो कर सेठी साहब मेरी और देखते ही रह गए।

कार हमारे गॉंव में पहुँच चुकी थी। मैंने ड्राइवर को घर जाने का रास्ता दिखाते हुए मार्गदर्शन किया। घर पहुंचने पर मेरे मायके वालों ने जब हमारी कार के हॉर्न की आवाज सुनी तो घर के दरवाजे में पुरे घर के सभी सदस्य बनठन कर हाजिर हो गए। मेरी भाभी के हाथों में एक थाल था जसमें आरती जल रही थी। सेठी साहब के दरवाजे के करीब पहुँचते ही भाभी ने सेठी साहब की आरती उतारी और कपाल पर तिलक किया और गले में फूलों की माला पहनाई। सेठी साहबने उनकी इस तरह की आवभगत की कल्पना भी नहीं की होगी।

सेठी साहब का सामान उनके ऊपर की मंजिल में एक कमरे में रख दिया गया और मेरा सामान उसके बाजू वाले के कमरे में रख दिया गया। सेठी साहब के सामने मेरे पिताजी ने हाथ जोड़ कर आग्रह किया की वह चाहते थे की सेठी साहब हमारे यहां पुरे तीन दिन रुकें जब तक उनका जयपुर में काम है। काफी जद्दोजहद के बाद आखिर में सेठी साहब को मानना ही पड़ा।

फ्रेश होने के लिए जब मैं सेठी साहब को उनके कमरे में ले गयी तो मैंने देखा की उनके कमरे में व्हिस्की की एक बोतल और कुछ गिलास रखे हुए थे। एक आइस बॉक्स में बर्फ के टुकड़े भी रखे हुए थे। मेरे भाई को शायद मेरे पति ने बता दिया था की सेठी साहब ड्रिंक करते हैं। सेठी साहब ने मेरी और आश्चर्य से देखा। मैंने कंधे हिलाकर उनको जताया की मुझे इसके बारे में कोई जानकारी नहीं थी। मैंने सेठी साहब से अनुग्रह किया की अगर वह चाहें तो डिनर से पहले एकाध ड्रिंक ले कर नीचे भोजन के लिए आ सकते हैं। हम सब उनका नीचे इंतजार करेंगे।

सेठी साहब ने मुस्कुराते हुए कहा कहा, “मुझे ड्रिंक करने की कोई जल्दी नहीं है। अगर तुम मेरा साथ दोगी तो डिनर के बाद हम साथ में ड्रिंक करेंगे।”

मैंने कहा, “सेठी साहब, यह मेरा मायका है। यह कोई दिल्ली नहीं, जो हम हमारी मन मर्जी का करें। हमें कुछ नियमों का पालन करना पड़ता है।यह शहर नहीं, एक छोटा सा गाँव है। यहां तो मेरी साड़ी का पल्लू अगर थोड़ा सा भी हट गया या मेरी साड़ी कमर से कितनी नीचे है यह भी देख कर टिपण्णी की जाती है, ड्रिंक करना तो दूर की बात है। “

मेरी बात सुन कर सेठी साहब को जैसे भारी सदमा पहुंचा हो ऐसे उनका चेहरा फीका पड़ गया। शायद उन्होंने उम्मीद रखी होगी की मैं अपने मायके में उनके साथ अकेले में कुछ समय बिता पाउंगी। अपने आप को सम्हालते हुए मेरे सामने खिसियानी नजर कर बोले, “ओह…. मैं समझ सकता हूँ। आई ऍम सॉरी। आपकी बात सही है। चलिए डिनर के लिए चलते हैं। मुझे ड्रिंक का कोई क्रेज नहीं। ड्रिंक तो दिल्ली जा कर भी कर लेंगे।” यह कह कर सेठी साहब उठ खड़े हुए और चल दिए।
 
सेठी साहब का उतरा हुआ चेहरा देख मुझे बहुत बुरा लगा। कार मैं प्यार भरी हरकतें कर सेठी साहब के मन में लालसा तो मैंने ही जगाई थी ना? अब गाँव आ कर मैं पलट गयी ऐसा शायद उनको लगा होगा।

डिनर के दरम्यान सेठी साहब मेरे भाई, भाभी और पापा से बड़ी विनम्रता पूर्वक बातें करते रहे पर मैं जानती थी की उनकी बातों में जान नहीं थी। मेरे पापा बार बार उनको हमारे घर में पुरे तीन दिन रुकने के लिए कहते रहे पर सेठी साहब का मन जैसे उठ गया हो, वह उस बात को टाल कर साफ़ हाँ कहने से बचते रहे। कार में जब मैंने सेठी साहब से मेरे मायके में तीन दिन पुरे रुकने के लिए कहा था तब वह रुकने के लिए काफी उत्सुक लग रहे थे, पर हमारी बात के बाद उनमें वह उत्साह गायब था।

डिनर के बाद सेठी साहब उठ खड़े हुए और मेरे पापा और भाई, भाभी से हाथ जोड़ कर औपचारिकता पूर्वक बात करते हुए बोले की वह थक गए हैं और उन्हें अगले दिन काफी काम है सो वह रात को जल्दी सोना चाहेंगे। यह कह कर वह सीढ़ी चढ़ कर ऊपर की मंजिल जहां उन्हें रुकना था, चले गए। मैं ड्राइवर को देखने बाहर आँगन वाले कमरे की और गयी की मैं खुद देखूं उसके रुकने और खाने की सही व्यवस्था हुई या नहीं। मुन्ना पुरे समय भाई की बेटी के साथ बातें करने, टीवी देखने और खेलने में लगा रहा।

गाँव में सब जल्दी सो जाते थे। जब मैं फारिग हुई तब करीब १० बज चुके थे। मैं ड्राइवर से मिल कर वापस आयी तो सब अपने अपने कमरे में जा चुके थे। सिर्फ माँ डाइनिंग टेबल पर बैठी मेरा इंतजार कर रही थी। मुन्ना ड्राइंग रूम में सोफे पर सो गया था। माँ और पापा के कमरे में जा कर मैंने सब की कुशलता बगैरह के बारे में बात की।

कुछ समय बात कर मैं मुन्ने को ले कर ऊपर की मंजिल पर अपने कमरे में जाने लगी तो माँ ने हिदायत दी की ऊपर जाते समय मैं सीढ़ी का दरवाजा पीछे से बंद कर दूँ। ऊपर की मंजिल पहुंचते ही मैंने देखा की सेठी साहब बाहर झरोखे में खड़े हुए हमारे घर के पीछे खेतों में जैसे कुछ देख रहे हों। हम औरतें हमारे मर्दों को काफी अच्छी तरह जानती हैं। जब वह रूठ जाते हैं तो हम औरतों की तरह वह अपनी फीलिंग्स छिपा नहीं सकते। मैं समझ गयी थी की सेठी साहब मुझसे कुछ हद तक रूठे हुए थे।

मुन्ने को अपने कमरे में पलंग पर अच्छी तरह सुला कर मैं वापस झरोखे में आयी। मेरे मायके में सब नीचे की मंजिल के कमरों में ही रहते थे। ऊपर की मंजिल में दो कमरे मेहमान के लिए खाली रखे हुए थे। अक्सर ऊपर की मंजिल जाने के दरवाजे पर रातको ताला लगा हुआ होता था ताकि रात को ऊपर से झरोखे पर चढ़ कर कोई चोर नीचे ना आ सके। गॉंव में चोरियों का डर होता है। मैंने ऊपर आते हुए सीढ़ी के दोनों दरवाजे, एक नीचे वाला और एक ऊपर वाला, को मेरे पीछे बंद कर दिया था। ऊपर की मंजिल पर उस समय मैं, मुन्ना और सेठी साहब के अलावा और कोई नहीं था।

उस समय सेठी साहब के मन में क्या चल रहा होगा यह मैं अच्छी तरह जानती थी। उनका दिल मैंने मेरी रूखी बातों से आहत कर दिया था। मुझे उनके चेहरे पर फिरसे वही शरारत और शौखियाँ लानी थी। मेरे आने की जब सेठी साहब ने आहट सुनी तो पीछे मुड़े और मुझे देख कर हलके से मुरझाये हुए शायद औपचारिकता दिखाने के लिए मुस्काये। पर उनकी फीकी सी मुस्कान में उनके मन के भाव स्पष्ट दिख रहे थे।

मैंने झरोखे की बत्ती को बुझा दिया और सेठी साहब के पास जा कर पूछा, “क्या बात है? आप तो थक गए थे न? अब यहां बालकनी में ऐसे मुंह फुला कर क्यों खड़े हो?”

सेठी साहब ने मेरी और नहीं देखा और मुझसे थोड़ी दूर हट कर रिसियानी शकल बना कर खड़े हो गए। मेरी बात का उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। मैं सेठी साहब के पास जा कर उनसे कस कर लिपट गयी और फिर उनके कानों में धीमी आवाज में फुसफुसाती हुई बोली, “मोरे सैय्याँ मोसे रूठ गए, अब उनको मैं मनाऊं कैसे?”

सेठी साहब ने मेरी पीठ पर प्यार से हाथ फिराया और कुछ दुखी मन से झुंझलाते हुए बोल पड़े, “क्यों अब क्यों मुझसे लिपट रही हो? तुम्हारे नियम पालन का क्या हुआ? अभी भी तो हम गांव में ही हैं।“

मैं सेठी साहब का कटाक्ष समझती थी। झरोखे में अन्धेरा था। मैंने सेठी साहब के सिर को खिंच कर नीचे की और झुकाया और उनके होँठों को मेरे होँठ पर चिपकाते हुए कहा, “ओय होय! मेरे सैय्यांजी रूठ गए रे! सेठी साहब अब हम गाँव में नहीं अँधेरे में हैं। अँधेरे में गाँव में भी सब कुछ होता है।”

मेरी बात सुन कर सेठी साहब का मुरझाया हुआ चेहरा अचानक खिल उठा। सेठी साहब ने नीचे झुक कर मेरी दोनों घुटनों के नीचे बाँहें डालकर मुझे अपनी बाँहों में उठा कर मेरे होँठों को जोर से चूमते हुए कहा, “अच्छा? अँधेरे में गाँव में और क्या क्या होता है? बताओ तो?” फिर वह बोले, “तुम नहीं, अब मैं बताता हूँ की गाँव में अँधेरे में क्या क्या होता है।”

मैं उस वक्त कुछ भी बोलने की हालत में नहीं थी। मैं सेठी साहब की गर्दन के इर्दगिर्द अपनी बाँहों की माला बनाकर उनकी बाँहों में बड़े सकून के साथ ऊपर उठे हुए उनके होँठों में अपने होँठों को चुसवाते हुए सेठी साहब के मुँह को बड़े प्यार से चूसती रही। सेठी साहब ने अपनी फौलादी बाँहों में मुझे ऐसे ऊपर हवा में उठा रखा था जैसे मैं कोई औरत नहीं कोई हलकी सी फूल की लड़ी थी।

सेठी साहब के होंठ और मुंह मेरी जीभ को ऐसे चूस रहे थे जैसे वह मेरे बदन से सारा पानी निकाल देंगे। मैं भी सेठी साहब की जीभ को अपने मुंह में लेकर उनकी लार बड़े ही प्यार से पिने लगी। आसमान के तारों के हलके से प्रकाश में मैं सेठी साहब के चेहरे को देख रही थी। उनकी आँखें जैसे नशे में डूबी हुई हों इस तरह वह कभी आँखें मूँद कर तो कभी मेरी आँखों में आँखें डालकर बेतहाशा जोशखरोश से मेरे होँठ चुम रहे थे।

एक बार जब सेठी साहब ने जोश में आकर मेरे होँठ काटे तो मेरे मुंह से ना चाहते हुए भी हलकी सी सिसकारी निकल गयी। मैंने सेठी साहब के मुंह से मुंह हटा कर कहा, “सेठी साहब प्लीज हमारी आपसी करतूतों का कोई निशान दिखे ऐसा अभी मत करना। वरना मेरी बदनामी हो जायेगी। आप नहीं चाहोगे ना की मैं बदनाम होऊं?”

मेरी बात सुनकर सेठी साहब ने मुझे अपनी बाँहों में उठा कर सीने से चिपकाए हुए अपने कमरे की और जाते हुए बोले, “बिलकुल नहीं। अब हम जो करेंगे अँधेरे में ही करेंगे और मैं अब सब कुछ करूंगा पर वादा करता हूँ की कोई खुला दिखे ऐसा निशान नहीं छोडूंगा जिससे तुम्हारी बदनामी हो। बोलो मंजूर है?”

मैंने सेठी साहब के गालों को चूमते हुए कहा, “मैंने तो आपको पहले ही सैय्यां कह कर अपनी मंजूरी दे दी है। जबसे आपने मुन्ने की स्कूल में मेरे हस्बैंड बनने की इच्छा जताई थी तब से मैंने तो आपको मेरा दूसरा पति माने उपपति मान लिया था। राज मेरे पति हैं और मेरा बदन उनके भोग मतलब आनंद के लिए है वैसे ही अब आपको मैंने अपना उपपति मान लिया है और मेरा यह बदन आप के भी भोग और आनंद के लिए प्रस्तुत है..

मैं अब पूरी रात के लिए आपकी पत्नी हूँ, आपकी प्रियतमा हूँ, दासी हूँ, रखैल हूँ, आपकी रंडी हूँ जो आप मुझे मानें। आप मुझसे जो चाहे करें और करवाएं। मुझे सब मंज़ूर है, मैं तैयार हूँ। आप के प्यार और बलिदान ने मुझे जित लिया है। आज मुझे मौक़ा मिला है की मैं आपने आपको आपके हवाले कर आपसे उत्कट प्यार का आदान प्रदान करूँ।”

मुझे कमरे में ले जा कर पलंग पर लिटाते हुए सेठी साहब बोले, “ज्योति मुझे तुम्हारी तरह इतने भारीभरकम शब्द नहीं आते। मैं तो सिर्फ इतना ही कहूंगा की मैं तुम्हारे पति बनने का सौभाग्य……”

मैंने सेठी साहब की बात को बीच में ही काटते हुए कहा, “सेठी साहब, मैं जानती हूँ की आप और डॉली जी दोनों साफ़ साफ़ देसी भाषा में बोलना पसंद करते हैं। ख़ास कर सेक्स के सम्बंधित बातें। अब हमारे बीच ऐसे सम्बन्ध नहीं रहे की आपको मुझसे नापतोल कर बोलने की जरुरत है। आप बेशक आपकी मनपसंद और देसी भाषा में मुझसे जो कहना है वह बेबाक कह सकते हो। यह एक पल के लिए भी मत सोचना की मैं क्या सोचूंगी।”

सेठी साहब ने मेरे होँठ चूमते हुए कहा, “मेरी ज्योति रानी इतने कम समय में काफी सयानी हो गयी है। ठीक है मेरी रानी, अब मैं तुमसे देसी भाषा में ही बात करूँगा। ज्योति , तुम मेरी दासी, रखैल या रंडी नहीं, मेरी प्रियतमा हो, मेरे दिल की रानी हो। जैसे तुमने मुझे उपपति का ओहदा दिया है, मैं भी तुम्हें मेरी उपपत्नी के रूप में स्वीकार करता हूँ। मैंने डॉली से शादी करते समय वादा किया था की मैं किसी भी और स्त्री की भले ही चुदाई करूँ, पर मैं उसे पत्नी का दर्जा नहीं दूंगा..

पर जैसे की डॉली ने तुम्हें बताया है, हम मतलब, मैं और डॉली , किस्मत के एक अजीब खेल में फंसे हैं। इसी समय माँ ने मतलब दुर्गा माँ ने तुम्हें और राज भाईसाहब को हमारे लिए देवदूत के रूप में भेजा है ऐसा मेरा मानना है। हमारे बीच जो सम्बन्ध उजागर हो रहे हैं शायद माँ उसके द्वारा हमारी समस्याओं को अपने तरीके से सुलझाना चाहती है अगर तुम और राज साहब राजी हों तो…….।”

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कहानी ज्योति की जुबानी

मैंने जिंदगी में एक बात सीखी है। अगर आपको फूल चाहिए तो आप को कांटो को भी स्वीकारना पड़ेगा। आप सिर्फ फूल की अपेक्षा नहीं रख सकते। ऐसी अपेक्षा रखने से जिंदगी में निराशा ही प्राप्त होगी, क्यूंकि फूल तो हरेक को चाहिए।

जो कांटें ले कर उसकी कीमत चुकाएगा उसे फूल मिलेंगे। जिंदगी में मुफ्त में कुछ नहीं मिलता। जिंदगी में अगर कुछ चाहिए तो कुछ भोग देना ही पड़ेगा। अगर शादी करनी है तो पत्नी का ध्यान रखना पड़ेगा, उसकी बात माननी पड़ेगी, बच्चे चाहियें तो उनका बोझ उठाना ही पड़ेगा, अगर शादी के बाहर चुदाई करनी है तो चुदवाने वाली के नखरे भी सहन करने पड़ेंगे, बदनामी हो तो उसे भी झेलनी पड़ेगी बगैरह बगैरह।

मुझे सेठी साहब का लण्ड चाहिए था। मेरे पति ने मुझमें वह आग लगा दी थी। पर मुझे अगर सेठी साहब का लण्ड चाहिए तो मुझे मेरे पति को डॉली जी की चूत दिलवानी पड़ेगी, और उन्हें क्या चाहिए उसका ध्यान भी रखना पड़ेगा।

मैं समझ गयी थी की सेठी साहब क्या कहना चाहते थे। पर उस समय मेरी चूत में ऐसी आग लगी थी की मुझे और कुछ सोचने की ताकत या इच्छा ही नहीं थी। पता नहीं क्यों, पर मुझे सेठी साहब से कुछ भी कहने में बड़ी शर्म आ रही थी।

वैसे तो मेरे और सेठी साहब के बीच बात करने में कोई बंदिश थी नहीं। पर उस समय, क्यूंकि मैं सेठी साहब से चुदवाने के लिए तड़प रह थी, तो मैं बात करने में शर्माती रहती थी। पता नहीं क्यों मेरा मुंह खुल ही नहीं रहा था।

मैंने सेठी साहब का हाथ पकड़ा और अपने स्तनोँ को उनके हाथों पर रगड़ते हुए सेठी साहब से लिपट गयी। मुझे सेठी साहब से आलिंगन कर पता नहीं कैसा अद्भुत सकून मिलता था। मुझे ऐसा लगता था जैसे मेरी बरसों की प्यास यही मर्द बुझा सकेगा।

पर चूँकि मैं यह भी जानती थी की अक्सर चुदासी औरत के साफ़ साफ़ नहीं बोलने से कई बार उसके मन की बात मर्द समझ नहीं पाते हैं, मैंने सेठी साहब से कहा, “सेठी साहब, आपके मुंह से साफ़ साफ़ शब्द सुन कर मुझे बहुत अच्छा लग रहा है। इसका मतलब है अब आप मुझे अपनी मानने लगे हो।

वाकई में मैं यह चाहती थी हम दोनों को अकेले में बिना कोई रोकटोक कुछ रातें मिलें जिन्हें हम एन्जॉय कर सकें। यह वक्त मेरे लिए बड़ा ही कीमती है। हमारे पास सिर्फ तीन रातें हैं और उसमें हमें नींद भी लेनी है। इन्हें हम औपचारिक बातों में गँवा कर बर्बाद ना करें। मेरे पुरे बदन में इस वक्त जबरदस्त आग लगी हुई है।

मैंने कहा ना की आप मुझसे जो कुछ भी करना और करवाना मतलब जैसे भी मुझे एन्जॉय करना चाहें वह मैं बिना कोई सवाल करे, बिना झिझक के करुँगी। कुछ भी मतलब कुछ भी। इसमें कोई भी किन्तु परन्तु नहीं होगा। यह मैं मज़बूरी में नहीं कह रही। यही मेरी इच्छा है। इन तीन रातों में हम सिर्फ एक दूसरे की बदन की भूख मिटायेंगे और अगर बातें भी करेंगे तो प्यार की ही बातें करेंगे, और कोई बात नहीं करेंगे। मुझे इन तीन रातों में आप से वह सब कुछ पाना है जो मैंने आज तक नहीं पाया।”

मेरे मुंह से ऐसी सीधी साफ़ साफ़ बात इतने सलीके सुन कर सेठी साहब मेरी और कुछ देर आश्चर्य से ताकते ही रहे। शायद किसी औरत ने उन्हें पहली बार इतने साफ़ शब्दों में कहा होगा की वह उनसे चुदवाने के लिए कितनी बेताब है। कहते तो मैंने कह दिया पर सेठी साहब की पैनी नजर देख कर मेरे गाल शर्म से लाल हो उठे।

डॉली जी ने मुझे बताया था की सेठी साहब का प्यार काफी रफ़ माने आक्रमक सेक्स होता है और वह रफ़ सेक्स बहुत पसंद करते हैं। रफ़ सेक्स में स्तनोँ को खूब चूसना, निप्पल्स को चूसना और काटना, नंगे कूल्हे पर चपेट मारना, लण्ड और चूत खूब चूसना और अगर मौक़ा मिले तो गाँड़ में लण्ड डालकर चोदना मतलब गाँड़ मारना बगैरह होता है।

इसके मुकाबले मेरी मेरे पति से चुदाई काफी साधारण सी होती थी। अक्सर तो वह मेरे ऊपर चढ़कर मुझे चोदते थे, काई बार मुझे घोड़ी बनाकर भी चोदते थे। उन्होंने कई बार मेरी गाँड़ मारने का प्रस्ताव रखा था, पर मैंने उसे सिरे से खारिज कर दिया था। उसके बाद मेरे पति ने भी ज्यादा जोर नहीं दिया इस बात पर।

अब सेठी साहब मेरी कैसी चुदाई करेंगे, यह सोच कर मैं परेशान हो रही थी। कहीं वह मेरी गाँड़ मारने पर आमादा हो गए तो मैं उन्हें मना नहीं कर पाउंगी। मैंने उन्हें वचन जो दिया है की मैं वह जो कहेंगे, जैसे कहेंगे, करुँगी।

मुझे लण्ड चूसना भी ज्यादा पसंद नहीं है। मेरे पति का लण्ड जब भी मैंने चूसा है तो वह कोई बड़ा अच्छा अनुभव नहीं रहा। डॉली जी ने तो साफ़ साफ़ कहा था की सेठी साहब को लण्ड चुसवाना बहुत पसंद है। अगर सेठी साहब मुझसे लण्ड चूसवाएंगे तो मुझे कहीं उलटी ना आ जाए। ऐसा अगर हुआ तो कहीं सेठी साहब बुरा ना मान जाए। यह सब विचार मेरे दिमाग में घूम रहे थे।

मैं पलंग पर लम्बी हो कर लेट गयी तो सेठी साहब मेरे ऊपर चढ़ने के बजाय खड़े हो कर पलंग पर सीधी लेटी हुई मुझे बड़ी ही बारीकी से निहारने लगे। मैंने उनकी लोलुप निगाहें जो मेरे पुरे बदन का मुआइना कर रहीं थीं, देख कर कुछ शर्माते हुए पूछा, “क्या देख रहे हैं आप? मुझे पहले कभी देखा नहीं क्या आपने?”

सेठी साहब ने मुस्कुराते हुए कहा, “मैं कितना भाग्यशाली हूँ की तुम्हारे जैसी बेतहाशा आसमान से उतरी हुई हूर सी खूबसूरत औरत इस वक्त मेरे सामने लम्बी हो कर एक संगेमरमर की तराशी हुई अद्भुत खूबसूरत मूरत की तरह लेटी हुई मेरे जैसे एक साधारण आदमी को अपना सर्वस्व समर्पण करने के लिए इंतजार कर रही है?”

सेठी साहब के बात सुनकर मेरे गाल शर्म से लाल हो गए।

मैंने सेठी साहब से कहा, “सेठी साहब मेरी झूठी तारीफ़ मत करो। मुझे चने के पेड़ पर मत चढ़ाओ। मैं कोई सुन्दर नहीं हूँ। सुंदरता आपकी नज़रों में है। जिसे प्यार करते हैं, वह जैसी भी हो, सुन्दर लगती है। बल्कि मैं कहती हूँ की मैं बड़ी भाग्यशाली हूँ की आपकी नज़रों ने मुझे सुंदर माना और आपके भोग के लिए योग्य माना। अब मुझे ज्यादा इंतजार मत कराइये और आप मुझे जैसे चाहें एन्जॉय कीजिये और मेरे बदन का और मेरे प्यार का भरपूर आनंद लीजिये। आपके आनंद लेने से मेरे पुरे बदन में आनंद की लहरें दौड़तीं रहेंगी। वैसे मुझ में ऐसा क्या सुन्दर लगा आपको?”

हर औरत अपनी सुंदरता के बखान सुनना चाहती है। मैं कोई अपवाद नहीं। ना ना करते हुए भी आखिर में मैं सेठी साहब के मुंह से अपनी सुंदरता की तारीफ़ सुनंने की लालसा रोक नहीं पायी।

सेठी साहब ने मेरे अंग अंग को अपनी नज़रों से तराशते हुए कहा, “मैं किस किस की तारीफ़ करूं? तुम्हारी इतनी मधुर वाणी, तुम्हारा गुलाबी बदन, तुम्हारा चाँद सा चेहरा, तुम्हारी कमल की डंडी सी लम्बी भुजाये, तुम्हारे केले के वृक्ष के तने जैसी जाँघें, लम्बी खूबसूरत गर्दन, धनुष्य से तेज तर्रार होँठ, तुम्हारे पके हुए फल की तरह भरे हुए पर अति सुकोमल स्तन मंडल, पतली कमर और उसके नीचे गिटार के आकार सामान तुम्हारी जाँघों का मिलन स्थान।”

मैंने मंद मंद मुस्काते हुए पूछा, “मेरी जाँघों का मिलन स्थान? अभी आपने देखा कहाँ है?”

सेठी साहब ने शरारत भरी मुस्कान देते हुए कहा, “तुम्हें क्या पता? मैंने तुम्हें इन आँखों से एक दो बार नहीं कई बार नंगी देखा है। कितनी बार तुम्हें मैंने सपनों में नंगी किया है। जब से मैंने तुम्हें पहली बार देखा तबसे मैं जब भी तुम्हें देखता हूँ तो तुम्हें अपनी नज़रों से तुम्हारे कपडे उतार पूरी नंगी कर देता हूँ। तुम्हारा हरेक अंग को मैंने जागते हुए और सपनों में देखा है।”

सेठी साहब की बात सुन मेरे रोंगटे खड़े हो गए। सेठी साहब की नज़रों का अंदाज देख कर पहले दिन से ही मैं समझ गयी थी की सेठी साहब मुझे अपनी नज़रों से नंगी कर जरूर देखते होंगे। औरतों में भगवान ने जन्मजात ही यह क्षमता दी है।

मैंने शरारत भरी मुस्कान देते हुए कहा, “अब आपको सपना देखने की या अपनी नज़रों से मुझे नंगी करने की जरुरत नहीं है। मै आपके सामने हाजिर हूँ। आप मुझे खुद अपने हाथों से नंगी कर मेरी जाँघों का मिलन स्थान देख सकते हो।”

सेठी साहब ने बिना कुछ बोले झुक कर मेरी गर्दन की आसपास अपनी बाँहें डालकर मेरा सर मुझे बिस्तर से थोड़ा ऊपर उठाया और अपने होँठों से फिर से मुझे चूमने लग गए। उनके साथ चुम्बन में मैं ऐसी खो गयी की मुझे पता ही नहीं चला की कब वह मरे ऊपर आ गए और मेरी पीठ के पीछे से मेरे ब्लाउज के बटन और मेरी ब्रा का हुक खोल दिया।

मैं बता नहीं सकती की सेठी साहब के छूते ही पता नहीं क्यों मेरी जाँघों के बीच में से मेरा स्त्री रस बहना शुरू हो जाता था। मैं पागल सी बेचैन हो जाती थी। मेरे पति के साथ चुदाई करवाते हुए मुश्किल से मैं एकाद बार झड़ती होउंगी। पर सेठी साहब के छूते ही मुझे लगता था जैसे मैं झड़ जाउंगी।
 
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