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Adultery लेखक-प्रेम गुरु की सेक्सी कहानियाँ

कामिनी का शरीर थोड़ा सा अकड़ने लगा- आआअ … ईईईईई … मैं मल जाउंगी सल … आह!

“कामिनी मेरी जान … तुम बहुत खूबसूरत हो … मुझे तो अपने भाग्य पर विश्वास ही नहीं हो रहा है कि मेरी प्रियतमा आज मेरी बांहों में है.”

“ईईईईई …”

“कामिनी क्या तुम हमारे इस प्रथम मिलन के लिए तैयार हो?”

“मेले साजन … अब तुछ मत पूछो, जो तलना है जल्दी करो … आह …” कह कर कामिनी ने अपनी बांहें मेरे गले में डाल दी और मुझे जोर से भींच सा लिया।

“कामिनी एक मिनट रुको मैं निरोध लगा लेता हूँ.” मैंने बेड के ड्रावर से निरोध निकाला और अपने लंड पर लगाने लगा।

कामिनी ने मेरा हाथ पकड़ लिया और बोली- मेरे साजन इसे लहने दो … मैं अपने इस प्रथम मिलन के अहसास और आनन्द को बिना तिसी अड़चन और अवरोध के महसूस तरना चाहती हूँ।

कह कर कामिनी ने शर्मा कर अपने हाथ अपनी आँखों पर रख लिए।

मैंने हाथ में पकड़ा निरोध फेंक दिया और कामिनी के ऊपर आ गया- कामिनी, अगर कुछ गड़बड़ हो गई तो?

“तोई बात नहीं … मैं पिल्स ले लूंगी.”

अब कामिनी ने तकिये के पास रखा सफ़ेद रंग का तौलिया अपनी कमर और नितम्बों के नीचे बिछा लिया। अब मैंने फिर से कामिनी के ऊपर आ गया और एक हाथ उसके सिर के नीचे लगाकर उसके सिर को थोड़ा ऊपर उठाया और इसके अधरों को अपने मुंह में लेकर चूमने लगा।

मेरा खड़ा लंड उसकी सु-सु पर रगड़ खाने लगा। अब मैंने एक हाथ बढ़ाकर अपने लंड का सुपारे को उसकी फांकों पर फिराया। एक गुनगुना सा अहसास पाते ही लंड जोर-जोर से ठुमके लगाने लगा। मैंने अपने लंड को उसकी फांकों के बीच में फिराना चालू किया तो कामिनी की मीठी सीत्कार निकालने लगी; उसकी जांघें अब स्वतः ही खुलने लगी थी।

“कामिनी मेरी जान … क्या तुम अपने इस मिलन के लिए तैयार हो?”

“मेरे साजन अब तुछ मत पूछो … आह …”

मैंने पास रखी क्रीम की डिब्बी से थोड़ी सी क्रीम अपने सुपारे पर लगाईं और थोड़ी सी क्रीम अँगुलियों पर लगाकर कामिनी की सु-सु की फांकों और चीरे पर लगा दी। अब मैंने उसकी सु-सु का छेद टटोला और उसकी फांकों को अंगूठे और अँगुलियों से थोड़ा सा चौड़ा किया धीरे से अपना सुपारा उसके छेद पर टिका दिया।

कामिनी का ही नहीं मेरा दिल भी जोर जोर से धड़कने लगा था।

जब लंड छेद पर अच्छी तरह सेट हो गया तो मैंने अपना दूसरे हाथ से उसके नितम्बों के नीचे से उसकी कमर को पकड़ लिया और धीरे से एक धक्का लगाया। अब मेरा सुपारा उस स्वर्ग के दरवाजे के अन्दर दाखिल होने लगा।

“आह … धीरे … प्लीज … आह …” ऐसे लगा जैसे कामिनी की आवाज डूब सी रही है। उसका सारा शरीर कांपने सा लगा था।

अब पता नहीं यह किसी डर के कारण था या रोमांच के उच्चतम शिखर पर पहुँचने के कारण था।

कामिनी कुछ कसमसाने सी लगी थी। मैंने कामिनी की कमर को जोर से पकड़ लिया। मैं जानता था उसके कौमार्य की झिल्ली अब टूटने वाली है तो कामिनी को थोड़ा दर्द तो जरूर होगा और वह कहीं इधर-उधर होकर मेरा काम ना खराब कर दे, मैंने उसे और जोर से अपनी बांहों में भींच लिया।

“कामिनी मेरी जान, आज तुम मेरी पूर्ण समर्पिता बनने वाली हो … प्रेम के इस पायदान पर तुम्हें थोड़ा कष्ट तो जरूर होगा पर मेरे लिए प्लीज … अपने इस प्रेम के लिए थोड़ा सा कष्ट सह लेना.”

“आह … मेरे साजन … मेरे प्रेम … ईईईईइ … ” कामिनी इस समय रोमांच और उत्तेजना के उच्चतम स्तर पर पहुँच चुकी थी।

मैंने उसके होंठों को पूरा अपने मुंह में भर लिया और फिर एक और धक्के के साथ मेरा लंड किसी कुशल अनुभवी शिकारी की तरह सरसराता हुआ उसकी सु-सु की गहराई में उतरने लगा।

कामिनी की दर्द के मारे चीख सी निकलने लगी पर मैंने उसके होंठों को मुंह में दबा रखा था तो केवल गूं-गूं की आवाज ही निकल रही थी।

कामिनी को थोड़ा दर्द तो जरूर हो रहा होगा वह कसमसाने सी लगी थी पर मेरी गिरफ्त से निकल पाना अब उसके लिए कहाँ संभव था। मेरे लंड के एक और धक्के ने कौमार्य की सारी हदें पार करते हुए (फाड़ते हुए) अपनी मंजिल ए मक़सूद को पा लिया। कामिनी दर्द के मारे छटपटाने सी लगी थी।

कामिनी ने किसी तरह अपना मुंह थोड़ा घुमाया तो उसके होंठ मेरे मुंह से बाहर निकल गए और कामिनी की एक हल्की सी चीख निकल गई- आआआ आआईईईई ईईईइ …

“बस मेरी जान … जो होना था हो गया … चिंता मत करो … यह दर्द अब मीठे अहसास में बदलने वाला है।” मैंने अब भी कामिनी को अपनी बांहों में जोर से जकड़ रखा था।

कामिनी अपने नितम्बों और कमर को हिलाने की कोशिश करने लगी थी पर मेरी गिरफ्त से अब वह निकल नहीं सकती थी। यह मन का नहीं तन का विरोध था। भंवरे ने अपना डंक उसकी कोमल पंखुड़ियों पर मार दिया था और शिकारी ने अपना लक्ष्य भेदन कर दिया था।

अब तो बस एक कोमल सा अहसास कामिनी के पूरे शरीर में भरने लगा था। कलि अब खिलकर फूल बन गई थी और भंवरे को अपनी पंखुड़ियों में कैद किये अपना यौवन मधु पिलाने को आतुर हो रही थी।
 
उसके सु-सु की पंखुड़ियां ऐसे फ़ैल गई जैसे किसी तितली ने अपने पंख फैला दिए हों। उसकी सारी देह में कोई मीठा सा जहर भरने लगा था और एक मीठी कसक और जलन के साथ वह प्रकृति के इस अनूठे आनन्द को भोगने जा रही थी।

उसका सारा शरीर झनझना उठा था। आज वह एक पूर्ण समर्पिता बन चुकी थी।

मुझे लगा कुछ गर्म-गर्म सा स्त्राव मेरे लंड के चारों ओर बहने लगा है। उसके गालों पर कुछ बूँद आसुओं की ढलक आई थी।

आप सभी तो बहुत बड़े अनुभवी हैं इन सब बातों को जानते हैं कि यह कौमार्य की झिल्ली फटने से निकलने वाला खून था। कामिनी ने अपना अक्षत कौमार्य मुझे सौम्प दिया था।

दर्द के अहसास को दबाये कामिनी मेरी चौड़ी छाती के नीचे दबी मेरी बगलों से आती मरदाना गंध में जैसे डूब सी गई थी। आप तो जाने होंगे पुरुष की बगलों से आती पौरुष गंध स्त्री को कामातुर बना देती है और यही हाल पुरुष का भी होता है अपनी प्रियतमा की बगलों से आती कौमार्य की तीखी गंध उसे मतवाला सा बना देती है और सम्भोग के लिए प्रेरित करती है।

“कामिनी मेरी प्रियतमा तुम्हारा बहुत बहुत धन्यवाद …” कह कर मैंने उसके गालों पर आई शबनम जैसी आंसुओं की बूंदों को चूम लिया। कामिनी के शरीर में एक मीठी सनसनाहट सी दौड़ गई।

“ओह … मैं मल जाऊँगी … बाहल निकालो … प्लीज” कामिनी की आवाज थोड़ी मंद सी थी। मुझे लगा उसका दर्द अब असहनीय नहीं रहा है और मेरा पप्पू अपनी मंजिल पाकर अन्दर अच्छे से समायोजित हो गया है।

“कामिनी बस … अब दर्द ख़त्म हो जाएगा और तुम्हें हमारा यह मिलन वो सुखद अहसास देगा जिसे तुम अपने जीवन पर्यंत याद रखोगी। कामिनी मेरी स्मृतियों में भी तुम्हारा यह समर्पण ताउम्र समाया रहेगा। तुम्हारा बहुत बहुत धन्यवाद मेरी प्रियतमा।”

मैंने हौले-हौले उसके सिर पर हाथ फिरना चालू कर दिया। कामिनी का दर्द अब कुछ कम होने लगा था। अब मैंने कामिनी के उरोज की फुनगी (कंगूरा) को अपने मुंह में भर लिया और पहले तो उसे चूसा और बाद में उसे दांतों के बीच लेकर दबा दिया।

कामिनी की तो एक मीठी किलकारी ही निकल गयी।

मैं उसे लगातार चूमे जा रहा था। कभी एक उरोज को मुंह में भर लेता और दूसरे को हौले से मसलता और फिर दूसरे को मुंह में लेकर चूसने लग जाता।

कामिनी ने एक हाथ मेरी पीठ पर रख लिया और दूसरे हाथ की अंगुलियाँ मेरे सिर पर फिराने लगी थी।

“कामिनी अब दर्द तो नहीं हो रहा ना?”

कामिनी अब क्या बोलती? ऐसी स्थिति में शब्द मौन हो जाते हैं और कई बार व्यक्ति चाहकर भी कुछ बोल नहीं पाता। जुबान साथ नहीं देती पर आँखें, धड़कता दिल और कांपते होंठ सब कुछ तो बयान कर देते हैं।

कामिनी ने अचानक मेरा सिर अपने दोनों हाथों में पकड़ा और जोर से मेरे होंठों को अपने मुंह में लेकर अपने दांतों से काट लिया। यह उसके स्वीकृति और समर्पण की मौन अभिव्यक्ति थी।

अब मैंने अपने कूल्हे थोड़े से ऊपर किये और अपने लंड को थोड़ा सा बाहर निकला तो कामिनी ने मेरी कमर पकड़ कर अपनी ओर खींच लिया। उसने इशारों में मुझे हिलने से मना किया। एक हल्के धक्के के साथ लंड फिर से अन्दर समा गया।

कामिनी की एक मीठी आह … सी निकल गई।

थोड़ी देर मैं इसी प्रकार बिना कोई बेजा हरकत किये अपने लंड को अन्दर डाले रहा। लंड तो अन्दर ठुमके पर ठुमके लगा रहा था। अब तो कामिनी की सु-सु भी उस अनजान घुसपैठिये से परिचित हो गई लगती थी तभी तो उसने भी संकोचन चालू कर दिया था।

इस नैसर्गिक आनन्द को शब्दों में कहाँ बयान करना कहाँ संभव है। यह प्रकृति का वह आनन्द है जिसे प्राणीमात्र ही नहीं देवता भी भोगने के लिए तरसते हैं। इस दुनिया में प्रेम मिलन से आनन्ददायी कोई दूसरी क्रिया तो हो ही नहीं सकती।

कामिनी अब कुछ संयत हो चुकी थी। मैंने उसके गालों और होंठों को फिर से चूमना चालू कर दिया था। जैसे ही मैंने उसके होंठों को मुंह में भरने की कोशिश की तो कामिनी ने अपना मुंह थोड़ा सा घुमा लिया तो उसका कान मेरे होंठों के पास आ गया। कानों में पहनी बालियाँ जैसे मुझे ललचा रही थी। मैंने उसके कान की लोब को बाली सहित अपने मुंह में भर लिया और उसे चुभलाने लगा। बीच-बीच में उसे अपने दांतों से काटने भी लगा।
 
अब तो कामिनी रोमांच के उच्चतम शिखर पर पहुँच गई थी। उसने अपने नितम्ब भी उचकाने शुरू कर दिए थे। उसके हिलते नितम्ब और कांपते होंठ यह इशारा कर रहे थे कि अब इसी तरह चुप मत रहो।

मैंने अब हौले-हौले अपने पप्पू को अन्दर बाहर करना शुरू कर दिया था। कामिनी पहले तो थोड़ा कसमसाई पर बाद में वह भी सहयोग करने लगी। उसका दर्द अब ख़त्म तो नहीं हुआ था पर लगता है असहनीय नहीं रहा तभी तो वह भी अपने नितम्ब उचकाकर मेरा साथ देने लगी थी। उसकी अब मीठी सीत्कारें निकालने लगी थी। अब उसने मेरे धक्कों के साथ अपने नितम्बों को लयबद्ध तरीके से हिलाना चालू कर दिया था और अपनी जाँघों को थोड़ा और खोलकर अपने पैर ऊपर उठा लिए थे।

ऐसा करने से मेरा पप्पू तो और भी खूंखार हो गया और अन्दर तक पैंठ जमाने लगा था। कामिनी की सु-सु की कसावट और मखमली अहसास से सराबोर हुआ मेरा पप्पू तो आज मस्त होकर हिलौरें ही मारने लगा था। अब तो पूरे कमरे में सु-सु और पप्पू के मिलन का मधुर संगीत गूंजने लगा था।

मुझे हैरानी हो रही थी कामिनी का यह प्रथम मिलन था पर ऐसा कतयी नहीं लग रहा था कि बिलकुल अनाड़ी या नवसिखिया है। मुझे लगता है उसने यू-ट्यूब पर इन सब चीजों को जरूर देखा होगा। यह भी संभव है मधुर ने इसे अपने मधुर मिलन की सारी बातों को रस ले लेकर बताया हो? कुछ भी हुआ हो पर मेरे लिए तो यह अतिरिक्त बोनस की तरह था।

कामिनी अब पूर्ण सहयोग करने लगी थी। अब तो उसने अपनी सु-सु का संकोचन भी शुरू कर दिया था।

“कामिनी तुम्हें अच्छा लग रहा है ना?”

“हट … !!”

“प्लीज बताओ ना?” कहते हुए मैंने एक धक्का जोर से लगा दिया।

“आईईई ईइच्च्च … ”

“आपने तो मुझे बिल्तुल बेशल्म बना दिया.”

“अरे मेरी जान इसमें शर्म की क्या बात है यह तो भगवान् का एक पवित्र और और नैसर्गिक कार्य है हम तो बस एक माध्यम हैं. इस मिलन की वेला में लाज और शर्म का पर्दा हटा रहने दो, बस उस आनन्द को महसूस करो.”

हमें अब तक कोई 20 मिनट तो जरूर हो गए थे। मैंने अपने धक्कों की गति अब बढ़ा दी थी। कामिनी अब मीठी सीत्कारें करने लगी थी मुझे लगता था जिस प्रकार कामिनी अपनी सु-सु का संकोचन कर रही थी और मेरे लंड को अन्दर उमेठ रही थी, उसका ओर्गास्म होने वाला है।

मेरी उत्तेजना का आलम यह था कि मैं जिस प्रकार धक्के लगा रहा था जैसे मैं कामिनी मेरे लिए कतई नई नहीं है। साधारणतया प्रथम मिलन के समय अपनी प्रियतमा का बहुत ख़याल रखा जाता है पर पता नहीं क्यों मेरा अंतर्मन बिना किसी रहम के और जोर-जोर से धक्के लगाने को मुझे उकसा सा रहा था।

कामिनी आआह … उईईइ … करने लगी थी।

अचानक कामिनी की साँसें बहुत तेज हो गई और उसने मुझे कसकर अपनी बांहों में कस लिया। उसने अपनी जांघें भींच लीं और मेरे लंड को अपनी सु-सु में ऐसे कस लिया जैसे कोई बिल्ली किसी चूहे की गर्दन पकड़ लेती है।

ईईईईईईईई … कामिनी की किलकारी भरी चीख पूरे कमरे में गूँज गई। कामिनी का शरीर इतनी जोर से अकड़ने लगा और उसने अपनी बांहें मेरी पीठ पर कस ली। और उसके साथ ही चट-चट की आवाज के साथ उसकी कलाइयों में पहनी चूड़ियाँ चटक गई। और फिर वह किसी कटी पतंग की तरह हिचकोले खाती लम्बी-लम्बी साँसें लेती ढीली पड़ती चली गई।

मैंने सिर पर हाथ फिराना चालू कर दिया और उसके गालों और माथे पर चुम्बन लेने लगा। लगता है कामिनी ने अपने जीवन का प्रथम लैंगिक ओर्गास्म पा लिया था।

थोड़ी देर बाद में कामिनी संयत सी हो गई थी। इस समर्पण के बाद अब वह आँखें बंद किये सुनहरे सपनो में खोई इस मिलन के आनन्द को महसूस कर रही थी। जैसे-जैसे मैं उसके गालों, होंठों गले और उरोजों को चूमता उसका सारा शरीर तरंगित सा हो जाता।

अब मैंने धीरे-धीरे धक्के लगाने शुरू कर दिए थे। अब तो कामिनी भी बिना झिझके मेरे धक्कों का प्रत्युत्तर अपने नितम्बों को उचका कर देने लगी थी। इस समय वह आनन्द के उस झूले पर सवार थी जिसकी हर पींग साथ वह आनन्द की नई ऊंचाइयां छू रही थी। उसका गदराया बदन मेरे नीचे दबा बिछा पड़ा था। मेरी हर छुवन, घर्षण और धक्का उसे हर बार रोमांच से भर रहा था।

मैंने अब थोड़ा ऊपर होकर अपने लंड को उसके सु-सु के योनि मुकुट (मदन मणि) से रगड़ना चालू कर दिया था। मेरे ऐसा रगदने से कामिनी की मदन मणि फूल कर मूंगफली के दाने जितनी बड़ी हो गई थी।

अब तो कामिनी का सारा बदन ही थिरकने लगा था। उसने अपने दोनों पैर उठाकर मेरी कमर पर कस लिए थे और आह … ऊंह … की आवाजों के साथ जैसे आसमान में उड़ने लगी थी जैसे कह रही हो ‘मेरे साजन मुझे बादलों के उस पार ले चलो जहां हमा दोनों के अलावा दूसरा कोई नहीं हो।’

मैंने अब उसके उठे हुए नितम्बों पर हाथ फिराना चालू कर दिया और धक्कों की गति कुछ बढ़ा दी थी। साथ ही उसके अमृत कलशों को मसलने लगा था। कभी उसके शिखरों (चूचुक) को मसलते कभी उन्हें मुंह में लेकर चूमते हुए कभी कभी दांतों से दबा रहा था।

अब मुझे भी लगने लगा था कि प्रेम की अंतिम आहुति डालने का समय आ गया है। मेरा पूरा शरीर तरंगित सा होने लगा था और लिंग में भारीपन सा आने लगा था। मेरी आँखों में जैसे सतरंगी सितारे से जगमगाने लगे थे।

मेरे हर धक्के साथ कामिनी के पैरों में पहनी पायल तो किसी कोयलिया की तरह रुनझुन ही करने लगी थी। लयबद्ध धक्कों के साथ पायल झंकार सुनकर मैं उसे जोर-जोर से चूमने और धक्के लगाने लगा था।

मेरे ऐसा करने से कामिनी का रोमांच और स्पंदन अब अपने चरम पर पहुँच गया था। मुझे लगा उसकी साँसें एक बार फिर से तेज होने लगी हैं और फिर से पूरी देह अकड़ने लगी है। मुझे लगा एक बार फिर से कामिनी को ओर्गाश्म होने वाला है। मैं चाहता था इस बार हम दोनों एक साथ स्खलित होकर इस आनद को भोगें।

मैंने कामिनी के होंठों को अपने मुंह में कस लिया और जोर जोर से धक्के लगाने लगा। मेरी साँसें भी तेज हो गई थी और पूरे बदन में पसीना सा आने लगा था।
 
“कामिनी मेरी जान … मेरा भी अब निकलने वाला है … मेरी प्रियतमा … आज मैं तुम्हें अपनी पूर्ण समर्पिता बनाकर धन्य हो जाऊँगा … आह … मेरी सिमरन … मेरी कामिनी …”

“हाँ मेले साजन … मेले प्रेम … मैं तो कब की आपके इस प्रेम की प्यासी थी … आह … मेले शलील में उबाल सा आ रहा है मेरे … सा … जा … न्नन्न … आह … ईईईईई …”

प्रेम रस में डूबी कामिनी की मीठी सीत्कार निकले लगी थी और फिर से उसने मेरी कमर को कस कर पकड़ लिया।

और फिर मेरे लंड ने पता नहीं कितनी फुहारें उसकी सु-सु में निकाल दी।

अब मैं उसे हर धक्के के साथ जोर-जोर से चूमे जा रहा था और कामिनी भी आँखें बंद किये तरंगित हुई इस आनन्द को भोग रही थी। सच है इस प्रेम मिलन से बड़ा कोई सुख और आनन्द तो हो ही नहीं सकता। मैं ही नहीं शायद कामिनी भी यही चाह रही होगी कि हम दोनों इस असीम आनन्द को आयुपर्यंत इसी प्रकार भोगते ही चले जाएँ।

“मेरी प्रियतमा … मेरी सिमरन … मेरी कामिनी … आह … मैं तुम्हें बहुत प्रेम करता हूँ!”

“मेरी जान आह … या …” कहते हुए कामिनी ने मुझे अपनी बांहों में भींच लिया। वह कितनी देर प्रकृति से लड़ती, उसका भी एक बार फिर से रति रस छूट गया। और उसी के साथ ही बरसों की तपती प्यासी धरती को जैसे बारिस की पहली फुहार मिल जाए, कोई सरिता किसी सागर से मिल जाए, किसी चातक को पूनम का चाँद मिल जाए या फिर किसी पपिहरे को पी मिल जाए मेरा वीर्य और कामिनी का कमरज एक साथ निकल गया।

कामिनी ने अपनी सु-सु का संकोचन करना शुरू कर दिया था जैसे इस अमृत की हर बूँद को ही सोख लेगी। अचानक उसकी सारी देह हल्की हो उठी और उसके पैर धड़ाम से नीचे गिर पड़े।

मैंने 2-3 अंतिम धक्के लगाए और फिर कामिनी को कस कर अपनी बांहों में भर कर उसके ऊपर ऊपर लेट गया।

कामिनी की आंखें अब भी बंद थी। मेरी बांहों में लिपटी पूर्ण तृप्ति के साथ जोर-जोर से साँसें ले रही थी।

3-4 मिनट इसी प्रकार मैं उसके ऊपर लेटा रहा। अब मेरा लंड सिकुड़ कर बाहर निकलने लगा।

“उईईईईइ … मेला सु-सु निकल रहा है … प्लीज …”

मुझे हंसी सी आ गई।

लगता है कामिनी जिसे सु-सु (पेशाब) समझ रही थी वह मेरे वीर्य, उसके कामरज और कौमार्य झिल्ली के फटने से निकला रक्त का मिश्रण बाहर निकालने लगा होगा।

मैं कामिनी के ऊपर से हट गया। अब कामिनी उठकर बैठ गई और अपनी सु-सु को देखने लगी। उसमें से तो प्रेम रस बह निकला था और कामिनी की जाँघों और महारानी के छेद तक फ़ैल गया था।

अब कामिनी की नज़र उस सफ़ेद तौलिये पर गई जिसे उसने अपने नितम्बों के नीचे लगा लिया था। वह तो 5-6 इंच के व्यास में पूरा गीला हो गया था और वीर्य और उसकी योनि से निकले रक्त से सराबोर हो गया था।

कामिनी ने हैरानी से उस तौलिये को देखा और फिर अपनी सु-सु की फांकों को देखा। फांकें तो अब सूजकर और भी मोटी-मोटी लगने लगी थी।

मैं टकटकी लगाए उसकी सु-सु को ही देखे जा रहा था जिसमें अब भी प्रेम रस निकल रहा था।

मुझे अपनी ओर निहारते हुए देख कर कामिनी ने झट से वह तौलिया उठाया और अपनी जाँघों और सु-सु पर डाल लिया।

मैंने एक बार फिर से उसे अपनी बांहों में भर लेना चाहा तो कामिनी ने मुझे हल्का सा धक्का दिया और वह तौलिया और अपनी नाइटी उठाकर बाथरूम में भाग गई।

अथ श्री योनि भेदन सोपान इति!!!

मैं कुछ कर पाता इससे पहले कामिनी बाथरूम में भाग गई।

या खुदा … उसके बालों का जूड़ा खुल गया था और उसके सिर के बाल कमर तक फ़ैल गए थे। मैं बिस्तर पर बैठा हिचकोले खाते और बिजलियाँ गिराते उसके नितम्बों को ही देखता रह गया।

बिस्तर पर गुलाब और मोगरे की नाज़ुक पत्तियाँ बिखरी पड़ी थी जिनमें बहुत सी पत्तियाँ मेरे और कामिनी के बदन मसली और कुचली हुई थी। आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि कामिनी की क्या हालत हुई होगी!

पुरुष हमेशा ही कठोरता पसंद करता है और प्रकृति ने भी उससे जुड़ी हर चीज को कठोर बनाया है अब चाहे वह उसका शरीर हो, हृदय हो कामांग हों या भावनाएं।

इसके विपरीत स्त्री की हर चीज प्रकृति ने नाजुक और कोमल बनाई हैं अब चाहे वह उनके शरीर का कोई अंग हो, हृदय हो या भावनाएं हों सभी में एक नाजुकता और कोमलपन का अहसास भरा होता है।
 
पुरुष और स्त्री के प्रेम में भी यही विरोधाभास झलकता है। पुरुष छद्म प्रेम या बलपूर्वक स्त्री को पा लेना चाहता है। वह एकाधिकारी बनाना पसंद करता है वह सोचता है कि वह एक समय में बहुत सी स्त्रियों से प्रेम (दिखावा) कर सकता है पर नारी मन हमेशा ही अपने प्रियतम के लिए समर्पित रहता है।

थोड़ी देर बाद कामिनी बाथरूम से वापस आ गई। शायद वह शुद्धि स्नान (नहा) करके आई थी।

हे भगवान् अगर मुझे पहले पता होता तो मैं भी कामिनी के साथ शुद्धि स्नान कर लेता। शॉवर के नीचे ठन्डे पानी में कामिनी के साथ लिपट कर नहाने में बारिश में भीगने जैसा आनन्द कितना अद्भुत होता मैं तो सोच कर ही रोमांच से भर गया।

उसने हाफ बाजू का कुर्ता और पाजामा पहन लिया था। उसने वह नाइटी और हमारे प्रेमरस में भीगा तौलिया समेट कर अपने हाथों में पकड़ रखा था। जिस अंदाज़ में वह अपनी टांगें चौड़ी करके चल रही थी मुझे लगता है उसे अब भी थोड़ा दर्द महसूस हो रहा होगा।

मेरा मन एक बार फिर से उसे बांहों में भर कर दबोच लेने को करने लगा था। मैं तो आज सारी रात कामिनी को अपनी बांहों में भर कर प्रेम करना चाहता था। यह पुरुष मन एक बार में संतुष्ट होना ही नहीं चाहता? पता नहीं प्रकृति ने इसे इतना रहस्यमयी क्यों बनाया है?

कामिनी ने वो समेटा हुआ तौलिया और नाइटी एक तरफ रख दी और बेड पर बैठ गई। मैंने भी अब तक बनियान और एंडरवीअर पहन लिया था।

“कामिनी मेरी प्रियतमा!” कह कर मैंने उसे अपनी बांहों में भर लेना चाहा।

“अब क्या है?”

“कामिनी आओ एक बार उस आनन्द को फिर से भोग लें प्लीज … ”

“आप तो अपना मज़ा देखते हो पता है मुझे तित्ता दर्द हुआ? तित्ता खून सारा निकला? मालूम? मेले से तो चला भी नहीं जा लहा?”

“कामिनी आई एम् वैरी सॉरी?” कह कर मैंने उसे अपनी बांहों में भर लिया।

“हटो परे … मुझे तो ऐसा लग रहा है जैसे चाक़ू से चीर दिया हो.” कामिनी ने आँखें तरेरते हुए कहा।

“कामिनी ज्यादा दर्द हो रहा हो तो लाओ मैं कोल्ड क्रीम लगा देता हूँ.”

“हट … ” कामिनी एक बार फिर शर्मा गई।

इस बार उसके शर्माने में उलाहने के बजाय रूपगर्विता होने का भाव ज्यादा था।

“कामिनी तुम्हारा बहुत-बहुत धन्यवाद इस समर्पण के लिए!”

“दीदी आपको कितना भोला समझती ही और आपने …?”

“मैंने क्या किया?”

“अच्छा जी मेला सब कुछ तो ले लिया ओल बोलते हो मैंने क्या किया?”

“कामिनी क्या तुम नाराज़ हो?” मैंने उदास स्वर में पूछा.

तो कामिनी जोर-जोर से हँसने लग गई- मेले नालाज़ होने से आपको क्या फलक पड़ता है?

“ऐसा मत कहो जान … अब हम दोनों दो नहीं एक हैं तुम्हारा हर दुःख दर्द अब मेरा भी है … आई लव यू … ”

कह कर मैंने एक बार फिर से कामिनी को अपने आगोश में ले लिया।

कामिनी मेरे सीने से लग गई। मैंने उसके सिर और पीठ पर हाथ फिराना चालू कर दिया। मेरा मन तो एक बार फिर से हल्का होने को करने लगा था। मेरा लंड फिर से कुनमुनाने लगा था।

“कामिनी तुम बहुत खूबसूरत हो … एक बार में तो मन ही नहीं भरा … प्लीज …”

“नहीं मेरे प्रियतम … आज ओल नहीं … मैं तहाँ भागी जा लही हूँ … सब तुछ तो आपतो सौम्प दिया है। मैं आज ती लात आपते साथ इन भोगे हुए सुनहली पलों ती याद ते लोमांच में बिताना चाहती हूँ। मैं यह महसूस तरना चाहती हूँ ति यह सब सपना नहीं हतीतत है। अब आप भी सो जाओ … 1 बजने वाला है।”

“और हाँ … यह चादल भी बदल देती हूँ. और आप भी नहा लो आपते भी चेहले और सीने पल मेले प्रेम की तुछ निशानियाँ रह गई हैं जिन्हें दीदी ने देख लिया तो मुझे ओल आपको जान से माल डालेगी.” कह कर कामिनी जोर जोर से हँसने लगी।

अब मैं क्या बोलता? कामिनी ने बेडशीट बदली और अपने कपड़े और तौलिया उठाकर सोने के लिए स्टडी रूम में चली गई।

दोस्त आप सभी सोच रहे होंगे वाह … प्रेम माथुर तुम्हारे तो मजे हो गए। एक कुंवारी अक्षत यौवना ने सहर्ष अपना कौमार्य तुम्हें इतना आसानी से सौम्प दिया।

हाँ मित्रो … आपका सोचना अपनी जगह सही है पर एक बात बार-बार मेरे दिमाग में दस्तक दिए जा रही है.

चलो कामिनी के साथ मेरे प्रेम सम्बन्ध बन गए। लेकिन अगर मधुर को इसकी ज़रा भी भनक लग गई तो क्या होगा?

कई बार मुझे संदेह होता है कहीं मधुर जानबूझ कर तो हम दोनों को ऐसा करने के लिए उत्साहित तो नहीं कर रही और बार-बार इस प्रकार की स्थिति और मौक़ा तो पैदा नहीं कर रही जिससे हम दोनों की नजदीकियां बढ़ जायें?
 
कहीं वह कामिनी के माध्यम से तो बच्चा नहीं चाह रही … हे भगवान् … मेरा दिल इस आशंका से जोर-जोर से धड़कने लगा।

मान लो कामिनी प्रेग्नेंट हो जाती है सब को पता चल जाएगा … ओह तब क्या होगा?

कामिनी तो अभी मासूम है उसने अभी दुनिया नहीं देखी है। वह अभी सुनहरे सपनों के घोड़े पर सवार है और इस समय मेरे या मधुर के एक इशारे किसी भी हद तक जाने के लिए सहर्ष तैयार है। यह सब किस्से कहानियों में तो बहुत आसान लगता है पर वास्तविक जीवन में इसका कानूनी पहलू भी होता है और उसे सोच कर तो मैं जैसे काँप सा उठाता हूँ।

उम्र के इस पड़ाव पर मैं किसी पेचीदगी में नहीं फंसना चाहता। मैं कोशिश करुंगा कि कामिनी किसी भी तरह प्रेग्नेंट ना होने पाए। हे लिंग देव! पता नहीं भविष्य के गर्भ में क्या लिखा है? तू ही जाने?

इन्हीं विचारों में कब मेरी आँख लग गई पता नहीं।

कई बार मुझे संदेह होता है कहीं मधुर जानबूझ कर तो हम दोनों को ऐसा करने के लिए उत्साहित तो नहीं कर रही और बार-बार इस प्रकार की स्थिति और मौक़ा तो पैदा नहीं कर रही जिससे हम दोनों की नजदीकियां बढ़ जायें?

कहीं वह कामिनी के माध्यम से तो बच्चा नहीं चाह रही … हे भगवान् … मेरा दिल इस आशंका से जोर-जोर से धड़कने लगा।

मान लो कामिनी प्रेग्नेंट हो जाती है सब को पता चल जाएगा … ओह तब क्या होगा?

कामिनी तो अभी मासूम है उसने अभी दुनिया नहीं देखी है। वह अभी सुनहरे सपनों के घोड़े पर सवार है और इस समय मेरे या मधुर के एक इशारे किसी भी हद तक जाने के लिए सहर्ष तैयार है। यह सब किस्से कहानियों में तो बहुत आसान लगता है पर वास्तविक जीवन में इसका कानूनी पहलू भी होता है और उसे सोच कर तो मैं जैसे काँप सा उठाता हूँ।

उम्र के इस पड़ाव पर मैं किसी पेचीदगी में नहीं फंसना चाहता। मैं कोशिश करुंगा कि कामिनी किसी भी तरह प्रेग्नेंट ना होने पाए। हे लिंग देव! पता नहीं भविष्य के गर्भ में क्या लिखा है? तू ही जाने?

इन्हीं विचारों में कब मेरी आँख लग गई पता नहीं।

कामिनी का शुद्धि स्नान

अगले दिन लिंग देव का वार यानि सावन का अंतिम सोमवार था। मुझे इतनी गहरी नींद आई थी कि मधुर कब गुप्ताजी के घर से आई पता ही नहीं चला।

कोई 7 बजे मधुर ने मुझे चाय के साथ जगाया। शायद आज मधुर ने स्कूल से छुट्टी ले ली थी। मधुर ने फरमान जारी किया कि आज लिंग देव के दर्शन करने चलेंगे।

फिर हम तीनों कार से लिंग देव के दर्शन करने गए। आपको तो मिक्की के साथ मेरे लिंग देव के दर्शन करने वाली बातें जरूर याद होंगी। मैं तो चाहता था कि मोटर बाइक पर ही जाया जाए पर तीन व्यक्तियों के लिए बाइक पर जाना असुविधाजनक था तो हम लोग कार से ही लिंग देव के दर्शन करने गए।

मैंने और मधुर जब शिव लिंग पर जल और दूध चढ़ाने लगे तो पता नहीं मधुर ने कामिनी को भी साथ में अभिषेक करने के लिए कहा।

मेरे और कामिनी के लिए यह अप्रक्याशित था।

मधुर आँखें बंद किये कुछ मन्नत सी मांग रही थी तो मैंने कामिनी की ओर देखा। वह मंद-मंद मुस्कुरा रही थी तो मैंने उसका हाथ जोर से भींचते हुए उसकी ओर आँख मार दी।

कामिनी ने शरमाकर अपनी नज़रें घुमा ली।

आपको बताता चलूँ कि अगस्त महीने में मधुर का जन्मदिन आता है। एक लम्बे इंतज़ार के बाद सावन भी अब बस ख़त्म होने वाला है और मधुर के व्रत भी इसके साथ शायद ख़त्म हो जाए।

कुछ भी कहो इस बार सावन बहुत बरसों के बाद (याद करें सावन जो आग लगाए) मेरे जीवन में बहुत सी खुशियाँ लेकर आया है।

मेरा मन भी आज छुट्टी मार लेने को करने लगा था पर पर उस आगजनी वाली घटना के कारण ऑफिस जाने की मजबूरी थी। आज सावन का अंतिम सोमवार था तो कामिनी तो मुझे पुट्ठे पर हाथ भी नहीं धरने देगी और मधुर तो जैसे सन्यासिन बनी पता नहीं किस भक्ति और तपस्या में लगी है।

चलो आज मुट्ठ मार कर ही काम चला लेंगे।

मैंने आपको ऑफिस में आये उस नए नताशा नामक मुजसम्मे के बारे में बताया था ना? आज वह पूरी पटाका नहीं एटम बम बनकर आई थी। काली जीन पैंट और लाल टॉप के कमर तक झूलते लम्बे घने काले बाल और गहरी लाल रंग की लिपस्टिक … हाथों में मेहंदी और लम्बे नाखूनों पर लिपस्टिक से मिलती जुलती नेल पोलिश … उफ्फ … पूरी छमिया ही लग रही थी।

साली की क्या मस्त गांड है … हे लिंग देव! अगर एक बार इसके नंगे नितम्बों पर हाथ फिराने का मौक़ा मिल जाए तो यह जिन्दगी जन्नत बन जाए।

उसने बताया कि आज उसका जन्मदिन है। शाम को ऑफिस में उसकी तरफ से मीटिंग हॉल में एक छोटी सी पार्टी का आयोजन किया गया।

नताशा ने बताया कि वह मेरे लिए विशेष रूप से अपने हाथों से मिठाई बनाकर लाई है।

मैंने अपने सोमवार के व्रत के बारे में बताया तो नताशा को थोड़ी निराशा सी हुई।

सभी ने उसे हैप्पी बर्थडे विश किया और उसने भी सभी से हाथ मिलाया।

वाह … क्या नाज़ुक हथेली और लम्बी अंगुलियाँ थी। मेरा मन तो उसके हाथों को चूमने को ही करने लगा था। मैंने अपने आप को कितनी मुश्किल से रोका होगा आप अंदाज़ा लगा सकते हैं। काश वह इन हाथों से मेरे पप्पू को पकड़ कर हिलाए तो मैं अपना बहुत कुछ इस पर कुर्बान ही कर दूं।

नाश्ते के बाद जब वह हम सभी के लिए कपों में चाय डाल रही थी तो उसके ढीले और खुले बटनों वाले टॉप के नीचे काली ब्रा में कैद दो कंधारी अनारों की गोलाइयां देखकर तो मेरा पप्पू अटेंशन की मुद्रा में ही आ गया था। मैं तो टकटकी ललचाई आँखों से बस उन बस दो अमृत कलसों की गोलाइयों में डूबा ही रह गया।
 
हे भगवान् उसने काली ब्रा पहनी है तो जरूर पैंटी भी काली ही पहनी होगी। याल्लाह … काली पैंटी में उसकी बुर (सॉरी यार अब तो बुर नहीं चूत बन चुकी है) कितनी प्यारी लगती होगी? मुझे लगता है उसने तरीके से अपनी झांटों को ट्रिम किया होगा।

आइलाआआआ …

जब पार्टी ख़त्म हो गयी तो वह मेरे केबिन में आ गई और बड़ी आत्मीयता के साथ बोली- सर आपने तो मेरी हाथ की बनी मिठाई खाई ही नहीं? आप थोड़ी मिठाई घर ले जाएँ और मैडम को भी जरूर खिलाएं फिर मुझे बताना कि मिठाई कैसी बनी है?

“भई मेरा सोमवार का व्रत है तो मजबूरी है पर हाँ … आपने अपने हाथ से बनाई है तो बहुत स्वादिष्ट ही होगी.” अपनी तारीफ़ सुनकर नताशा लजा सी गई।

“सर आज हमने अपने घर पर भी एक छोटी सी पार्टी का आयोजन किया है और मैं चाहती हूँ आप उसमें जरूर शामिल हों.”

“ओह … थैंक यू डिअर … पर मैंने बताया ना आज मेरा भी व्रत है और वैसे भी यह तो आप लोगों की घरेलू पार्टी है तो मैं क्या करूंगा?”

“क्या आप हमें अपना नहीं समझते?” नताशा ने मेरी आँखों में आँखें डालते हुए जिस प्रकार पूछा था मेरा दिल जोर-जोर से धड़कने लगा था।

मेरा मन तो इस निमंत्रण को तहे दिल से स्वीकार कर लेने को करने लगा था पर मैं थोड़ा असमंजस में था।

“नताशा आपको जन्म दिन की एक बार फिर से बधाई! मैं फिर कभी जब आपके यहाँ नई ख़ुशखबरी आएगी तब जरूर शामिल होऊँगा।”

मेरी इस नई खुशखबरी की बात पर नताशा तो शरमाकर लाजवंती ही बन गई थी। उसने अपनी पलकें नीची किये हुए मुस्कुराकर जिस प्रकार धन्यवाद किया। आप मेरी हालत और मेरे पप्पू की हालत अच्छी तरह समझ सकते हैं।

“सर! आप बंगलुरु ट्रेनिंग पर कब जा रहे हैं?” उसने अपनी मुंडी नीचे झुकाए हुए पूछा।

“ओह … हाँ वो सेप्टेम्बर (सितम्बर) मिड में जाने का प्रोग्राम है। क्यों?”

“सर, बंगलुरु में मेरी एक कजिन रहती है।”

“अच्छा.”

“वो मुझे भी बंगलुरु आने का बोल रही है।””

“गुड …”

“उनके हब्बी आईटी कंपनी में काम करते हैं और उनके दो बेटियाँ ही हैं। एक इंजीनियरिंग कर रही है और छोटी वाली 12वीं में पढ़ रही है।”

“हम्म …” आप मेरी हालत का अंदाज़ा लगा सकते हैं। याल्लाह … नताशा की तरह ये दोनों भी कितनी खूबसूरत होंगी मेरा दिल तो जोर जोर से धड़कने लगा था।

“सर मैं भी सोच रही थी 4-5 दिन कजिन से भी मिल आऊँ और इस बहाने बंगलुरु भी घूमने का मौक़ा मिल जाएगा. आप छुट्टी तो दे देंगे ना प्लीज …”

“ओह … हाँ … मैं देखूंगा उस समय स्टाफ की क्या पोजीशन रहती है।”

“थैंक यू वैरी मच सर!” कहते हुए नताशा ने एक बार फिर हाथ मिलाया।

प्रिय पाठको! आपकी इस सम्बन्ध में क्या राय है? क्या मुझे नताशा को छुट्टी दे देनी चाहिए? वह तो मेरे साथ ही जाने का प्रोग्राम बना रही है और उसने मुझे घर आने का भी निमंत्रण दिया है आपको क्या लगता है? नताशा ने वैसे ही यह औपचारिकतावश मुझे निमंत्रण दिया था या कोई और बात हो सकती है?

हे लिंग देव आपकी जय हो …

सोमवार किसी तरह बीत गया। आज मंगलवार का दिन है और मधुर 2-3 दिन के बाद आज स्कूल चली गई है।

कामिनी ने आज लाल रंग की टी-शर्ट और सफ़ेद निक्कर पहन रखा है। उसने अपने बालों का जूड़ा बना रखा है। वह मेरे सामने बैठी है और हम चाय की चुस्कियां लगा रहे हैं। बाहर रिमझिम बारिश हो रही है।

शादी के शुरू-शुरू के दिनों में मैं और मधुर कई बार बाथरूम में शॉवर की फुहारों के नीचे नहाया करते थे और फिर बहुत सी मिन्नतों और नाज-नखरों के बाद मधुर बाथरूम में ही घोड़ी बन कर पीछे से सम्भोग के लिए राज़ी हो जाया करती थी।

उन पलों को याद करके मेरा लंड तो फनफाने ही लगा था। काश … इस बारिश की फुहार में कामिनी के साथ नहाने का मौक़ा मिल जाए तो खुदा कसम मज़ा ही आ जाए।

अचानक मेरे दिमाग में एक जबरदस्त आईडिया आया कि क्यों ना आज बाथरूम में कामिनी के साथ नहाकर उन पलों का एक बार फिर से ताज़ा कर लिया जाए।

मैं तो इस विचार से झूम ही उठा।

“अरे कामिनी?”

“हओ?”

“वो तुमने पिल्स ले ली थी ना?”

“किच्च …”

“कामिनी इसमें लापरवाही नहीं करनी चाहिए यार?”

“मुझे पता है.”

“क्या पता है?” कामिनी मंद-मंद मुस्कुराती जा रही थी और मेरी झुंझलाहट बढ़ती जा रही थी।

“उसकी जलुलत नहीं है.”

“क … कैसे … क … क्या मतलब?”

“वो 4-5 दिन बाद मेले पिलियड आने वाले हैं।”

“ओह … थैंक गोड!” मैंने राहत की सांस ली।

कामिनी ने मेरी ओर ऐसे देखा जैसे मैं सचमुच का ही लड्डू हूँ। (बकौल मधुर)

“ऐ कामिनी! आज तुम इतनी दूर क्यों बैठी हो? कोई नाराज़गी है क्या?”

“किच्च?”

“तो पास आओ ना? प्लीज” कहकर मैंने कामिनी का हाथ पकड़कर अपने पास सोफे पर खींच लिया।

कामिनी हड़बड़ाहट में मेरी गोद में गिर गई, मैंने उसके गालों पर एक चुम्बन ले लिया।

“हट! आप फिल शरारत तरने लगे?” उसने तिरछी नज़रों से मुझे देखा।

“कामिनी उस दिन तुमने वादा किया था … प्लीज?”

“तौन सा वादा?”

“कामिनी आओ उन पलों का एक बार फिर से आनन्द ले लें … प्लीज!”

“हट!” कामिनी ने शरमाकर अपनी आँखों पर हाथ रख लिए।
 
“देखो आज मौसम कितना सुहाना हो रहा है बाहर रिमझिम फुहारें पड़ रही हैं। मेरा मन तो इस बारिश में नहाने को कर रहा है.”

“तो नहा लो.”

“यार अकेले में मज़ा नहीं आता? अगर तुम साथ में नहाओ तो यह जिन्दगी जन्नत बन जाए.”

“हट! किसी ने देख लिया तो हम दोनो को लैला मजनू ती तलह पत्थरों से मालेंगे.”

“तो क्या हुआ तुम्हारे लिए तो मैं पत्थर तो क्या जहर भी खा लूँगा?”

“हट!”

“ऐ कामिनी प्लीज बाहर तो हम नहीं नहा सकते पर बाथरूम में शॉवर के नीचे ठंडी फुहारों में तो नहा सकते हैं ना?”

“किच्च! मुझे शल्म आती है.”

“अरे यार … एक तो पता नहीं तुम यह शर्म कब छोड़ोगी?”

“आप शरारत तो नहीं कलोगे ना?”

“किच्च … बिलकुल नहीं.” मैंने मुस्कुराते हुए कहा।

पता नहीं … भेनचोद ये लड़कियां जवान होते ही इतने नखरे और जानलेवा अदाएं कहाँ से सीख लेती हैं?

कामिनी ने शरमाकर अपनी आँखों पर हाथ रख लिए। कामिनी की मौन स्वीकृति पाकर मैंने उसे एक बार फिर कसकर अपनी बांहों में भींचते हुए चूम लिया। लंड महाराज तो पजामा फाड़कर ही बाहर आने लेगे थे।

मैंने उसे अपनी गोद में उठा लिया और फिर उसे लेकर बाथरूम में आ गया।

कामिनी को गोद से नीचे उतार कर मैंने झट से अपना कुर्ता पाजामा निकाल फैंका और शॉवर चला कर अपनी मुंडी उसके नीचे लगा दी.

कामिनी मुझे देखती जा रही थी। मैंने एक चुल्लू में पानी लिया और कामिनी के चहरे पर फेंक दिया।

“ऐ कामिनी आओ ना … इस फुहार के नीचे!” मैंने कामिनी का हाथ पकड़कर फव्वारे के नीचे खींच लिया।

“अले लुको … मेले तपड़े भीग जायेंगे?”

“ऐसी की तैसी तुम्हारे कपड़ों की।” कह कर मैंने कामिनी की टी-शर्ट निकाल दी।

उसने ब्रा तो पहनी ही नहीं थी। दोनों अमृत कलश आजाद होकर जैसे राहत की सांस लेने लगे थे। और कंगूरे तो भाले की नोक की तरह तीखे हो गए थे।

“कामिनी यह निक्कर भी उतार दो ना!”

“हट! आप तो मुझे पूरा बेशल्म बनाकल ही छोड़ेंगे?” कह कर कामिनी ने अपने दोनों हाथों से अपने उरोजों को ढक सा लिया।

“कामिनी प्लीज … मान जाओ ना?” प्लीज मेरे खातिर … ”

अब मैंने उसके इलास्टिक वाले निक्कर को नीचे से पकड़ कर खींच लिया। कामिनी ने ज्यादा ना नुकर नहीं की अलबत्ता उसने अपनी सु-सु को एक हाथ से ढक जरूर लिया।

अब मैंने उसका हाथ पकड़कर फिर से शॉवर के नीचे कर लिया। और फिर साबुन लेकर पहले तो अपने सिर और बदन पर लगाया और फिर अपने खड़े लंड पर साबुन लगाकर उसे धो लिया।

कामिनी यह सब देख रही थी। उत्तेजना के मारे उसकी साँसें तेज होने लगी थी और उसके उरोज साँसों के साथ ऊपर नीचे होने लगे थे। उसकी आँखों में एक खुमार सा आने लगा था और होंठ कांपने से लगे थे।

मेरा लंड तो ठुमके पर ठुमके लगाने लगा था। कामिनी टकटकी लगाए मेरे लंड को ही देखती जा रही थी।

अब मैं कामिनी के चहरे और गले पर साबुन लगाने लगा। जब मैंने उसकी कांख (बगलों) पर साबुन लगाया तो कामिनी कसमसाने सी लगी।

“आह … मुझे गुदगुदी हो लही है … मैं अपने आप लगा लूंगी.” कामिनी अब भी थोड़ा शर्मा रही थी।

मैंने अब उसके उरोजों और पेट पर साबुन लगाते हुए उसकी सु-सु पर भी साबुन लगा दिया और फिर उसके चीरे में अंगुली फिरा दी।

“ईईईईईईई …” कामिनी की तो एक मीठी किलकारी सी निकल गई। उसने मेरा हाथ पकड़ने की नाकाम सी कोशिश की पर ज्यादा विरोध अब उसके बस में कहाँ था।

कामिनी ने 5-6 दिन पहले अपनी सु-सु को चकाचक बनाया था तो अब उसपर हल्के हल्के रोयें झलकने लगे थे। मैंने उसकी पीठ और नितम्बों पर साबुन लगाते हुए उसके नितम्बों की खाई में भी साबुन लगा दिया।

कामिनी तो बस आह … ऊंह … करती ही रह गई।

अब मैंने उसे अपनी बांहों में भरते हुए शॉवर के नीचे कर लिया। ठंडा पानी हमारे बदन पर गिरने लगा और साबुन उतरती गई। मैं धीरे-धीरे कामिनी के पूरे शरीर हाथ से मलने लगा। कामिनी रोमांच में डूबने लगी, उसके होंठ कांपने लगे थे और उसकी साँसे बहुत तेज़ होने लग गई थी।

“कामिनी एक काम करोगी?”

“हम्म …” कामिनी पता नहीं किन सपनों और आनन्द में खोई थी।

“तुम अपना एक पैर इस प्लास्टिक वाली स्टूल पर रख लो” कामिनी ने बिना ना नुकुर के अपना एक पैर उस प्लास्टिक की स्टूल पर रख लिया तो उसकी सु-सु के मोटे मोटे पपोटों के बीच गुलाबी छेद और उनके बीच लाल रंग की पंखुड़ियां (लीबिया-इनर लिप्स) नज़र आने लग गए।

अचानक मैं नीचे बैठ गया और उसके नितम्बों को हाथ से पकड़ कर अपने मुंह की ओर धकलते हुए उसकी सु-सु पर पहले तो 2-3 चुम्बन लिए और फिर उस पर अपनी जीभ फिराने लगा।

“ईईईईईईई … क्या तल रहो हो … ओह … छी … ओह … लुको … आआईईइ …”

मैंने उसके की सु-सु को पूरा मुंह में भर लिया और चूसने लगा। उत्तेजना के मारे कामिनी का पूरा शरीर कांपने और झटके से खाने लगा था।

उसने अपने आप को छुड़ाने का हल्का सा विरोध तो जरूर किया पर उसके आह … ऊंह … और हिलते नितम्बों से लग रहा था उसका विरोध फजूल है उसे भी अब मज़ा आने लगा था।

उसने कसकर मेरा सिर अपने हाथों में पकड़ लिया और जोर जोर से सीत्कार करने लगी- मेरे साजन … आह … मैं मल जाउंगी … ईईईईईईइ …

उसके मदनमणि (योनि मुकुट) तो फूल कर अंगूर के छोटे दाने जितनी हो चली थी। मैंने उसे अपने मुंह में लिया और चुभलाने लगा। एक दो बार हल्के दांत भी उस पर गड़ा दिए।

“ईईईईईईइ … आह … मेला सु-सु निकल जाएगा … ओह … प्लीज ओल मत कलो … आह … ”

अब कामिनी का विरोध ख़त्म हो गया था और उसने मेरे सिर को अपनी सु–सु की ओर जोर से दबा दिया था।

मैंने अब दो काम एक साथ किये। एक हाथ की अंगुली उसके नितम्बों की खाई में लगाते हुए उसकी महारानी (गांड) के छेद को टटोला और हल्के से अपनी अंगुली का एक पोर उस छेद पर थोड़ा सा अन्दर करते हुए फिराया और फिर उसकी सु-सु को पूरा मुंह में लेकर जोर के चुस्की लगाई।
 
अब बेचारी कामिनी कितनी देर मेरे काम बाणों से अपने आप को बचा पाती। कामिनी ने जोर कि किलकारी मारी और उसके साथ ही उसका रतिरज बहकर मेरे मुंह में समाने लगा। कामिनी का शरीर झटके से खाने लगा।

मैंने अब उसकी सु-सु को मुंह से बाहर निकाला और फिर उस पर चुम्बनों की झड़ी लगा दी। कामिनी तो बेचारी रोमांच में डूबी और ओर्ग्श्म महसूस करती आह … ऊंह करती ही रह गई।

अब मैं खड़ा हो गया और फिर से कामिनी को अपनी बांहों में भर लिया। कामिनी ने भी मेरे होंठों पर चुम्बन लेने शुरू कर दिए। एक बार तो उसने मेरे होंठों को इतना जोर से काटा कि मुझे लगा इनमें खून ही निकल जाएगा।

मेरा खड़ा लंड उसकी सु-सु पर टक्कर मार रहा था। अचानक कामिनी नीचे बैठ गई और मेरे लंड को मुंह में लेकर चूसने लगी। मैं आज अपना वीर्य उसे पिलाने के मूड में कतयी नहीं था। पर थोड़ी देर उसे इसी तरह चूसने देना जरूरी था। अब तो मेरा पप्पू लोहे की सलाख जैसे कठोर हो गया था।

“कामिनी मेरी जान … आओ एक और अनूठे आनन्द को भोगते हैं.”

कामिनी ने नज़रें ऊपर उठाकर मेरी ओर देखा।

मैंने उसे खड़े होने का इशारा किया। कामिनी ने मेरा लंड अपने मुंह से बाहर निकाल दिया और खड़ी हो गई। मैंने उसे थोड़ा घुमाया और उसे पीछे से अपनी बांहों में भर लिया। मेरा लंड अब उसके नितम्बों पर दस्तक देने लगा था।

कामिनी को मैंने थोड़ा सा झुकने के लिए कहा और उसके हाथ सामने लगे नल को पकड़ लेने को कहा। अब कामिनी के नितम्ब खुलकर मेरे सामने आ गए थे। उसकी कमर और सिर समानांतर रूप में हो गए थे और नितम्ब कुछ ऊपर हो गए थे।

या … खुदा जैसे भरतपुर राजघराने का पूरा खजाना ही मेरी आँखों के सामने नुमाया हो चला था।

मैंने एक करारा चुम्बन उसके नितम्बों पर लिया और फिर थोड़ा सा झुककर पहले तो उसकी जाँघों को खोला और फिर सु-सु के पपोटों को चौड़ा करते हुए एक चुम्बन उस लाल गुलाबी रति द्वार पर ले लिया। कामिनी ने एक बार फिर से रोमांच में डूबी किलकारी मारी।

अब मैंने अपना खड़ा लंड उसके नितम्बों के बीच लगा दिया। कामिनी के शरीर में एक सिहरन सी दौड़ने लगी। मैंने हाथ बढ़ाकर सोप स्टैंड पर रखी क्रीम की शीशी लेकर जल्दी से थोड़ी क्रीम अपने पप्पू पर लगाई और फिर ढेर साड़ी क्रीम उसकी सु-सु के छेद पर भी लगा दी।

कामिनी आह … ऊंह करती जा रही थी। बीच-बीच में उसका शरीर हिचकोले से खाते जा रहा था यह सब उसके तन और मन दोनों की स्वीकृति दर्शा रहा था।

अब मैंने धीरे से अपना लंड उसकी सु-सु की फांकों के बीच लगा दिया। अब तक कामिनी अपने आप को इस संगम के लिए तैयार कर चुकी थी। उसने अपनी जांघें थोड़ी सी और खोल दी और मेरे पप्पू का काम आसान कर दिया।

मैंने मेरा लंड जब ठीक से सेट हो गया तो मैंने कामिनी की कमर जोर से पकड़ ली और एक धक्का लगा दिया।

मेरा लंड बिना किसी रुकावट के एक ही झटके में अन्दर प्रवेश कर गया।

कामिनी के एक चीख पूरे बाथरूम में गूँज उठी- उईईईईईईई … मा … आ … ओह धीरे … आह!

“बस मेरी जान तुम्हारा पप्पू पास हो गया है … अब चिंता की कोई बात नहीं है।”

कामिनी ने एक हाथ अपने नितम्बों की तरफ करके मेरे लंड और अपनी सु-सु को टटोलने की कोशिश की। उसे तो जैसे विश्वास ही नहीं हो रहा होगा कि इतना लंबा और मोटा लंड इतनी आसानी से पूरा अन्दर चला जायेगा।
 
मैं कामिनी की हालत समझ सकता था। उसे आज भी थोड़ा दर्द तो जरूर हो रहा होगा पर अब वह असहनीय नहीं होगा। बस 2-4 मिनट की बात है जैसे ही लंड अपने ठिकाने में सेट हो जाएगा यह दर्द छू मंतर हो जाएगा और फिर तो कामिनी खुद अपने नितम्ब हिला हिला कर चुदवायेगी।

मैंने थोड़ा नीचे होकर पहले तो उसकी पीठ पर एक चुम्बन लिया और फिर एक हाथ से उसके एक उरोज को पकड़ कर होले-होले मसलना चालू कर दिया। अब तो कामिनी का पूरा शरीर रोमांच में गोते लगाने लगा।

मैंने उसकी गर्दन पर चुम्बन लेते हुए उसके बगलों को भी चूमना शुरू कर दिया। कामिनी के शरीर में तो अब झुरझुरी सी दौड़ने लगी थी। मेरे लंड ने सु-सु के अन्दर एक ठुमका सा लगाया तो कामिनी की सु-सु ने भी संकोचन कर उसका जवाब दिया।

मुझे लगता है अब सु-सु और लंड की गहरी दोस्ती हो गयी है।

अब मैंने अपने नितम्बों को थोड़ा सा हिलाना शुरू कर दिया। लंड थोड़ा सा बाहर आया और फिर से अन्दर चला गया। कामिनी की मीठी सीत्कार निकल गई। अब यह सु-सु रवां हो चुकी … अब तो कामिनी ने भी अपने नितम्ब हिलाने शुरू कर दिए थे।

मैंने धीरे-धीरे धक्के लगाने शुरू कर दिए। जैसे ही मेरी जांघें उसके नितम्बों से टकराती तो फच्च की आवाज आती और फवारे से गिरता पानी उछलने लगता।

बीच बीच में मैं उसकी पीठ और कमर पर चुम्बन भी लेता जा रहा था।

अब कामिनी को भी आनन्द आने लगा था। अब उसने अपने नितम्बों को ढीला छोड़ दिया था और मेरे धक्कों के साथ सुर ताल मिलाने की कोशिश करने लगी थी।

मैंने उसके नितम्बों पर एक थपकी सी लगाईं तो कामिनी की किलकारी निकल गई- आआईईई ईईईईइ …

और फिर उसने मेरे धक्कों के प्रत्युत्तर में अपने नितम्ब और जोर-जोर से उछालने शुरू कर दिए।

“कामिनी मेरी जान, तुम बहुत खूबसूरत हो … आह … मेरी जान मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा मेरी जान मेरे लंड से चुद रही है?”

“हट! बेशल्म … आह … उईईईई माँ … ”

आप सभी तो बहुत गुणी और अनुभवी हैं पर एक बात आपको बता देता हूँ कई बार मिठाई के साथ अगर बीच में नमकीन खा लिया जाए तो आनन्द दुगना नहीं चार गुणा हो जाता है। कुछ लड़कियों और शादीशुदा औरतों को चुदाई के दौरान थोड़ा गंदा बोलना और नितम्बों पर थप्पड़ खाना और अपने प्रेमी या पति द्वारा दांतों से काटना बहुत अच्छा लगता है।

शायद कामिनी को भी उसके नितम्बों पर लगाया गया मेरा हल्का थप्पड़ (थपकी) बहुत अच्छा लगा था। मुझे लगता है उसने इन्टरनेट पर पोर्न में जरूर ऐसा देखा होगा! यह भी संभव है उसकी किसी सहेली ने उसे अपनी सुहागरात या अपने किसी प्रेमी के साथ किये सम्भोग के बारे में जरूर बताया होगा फिर किसी घर के सदस्य को उसने चुदाई करते जरूर देखा होगा।

ओह … मैं भी क्या फजूल बातें ले बैठा।

मैंने अब कामिनी के दोनों नितम्बों पर बारी-बारी से थप्पड़ लगाने शुरू कर दिए। उसके नितम्बों का रंग अब लाल नज़र आने लगा था। कामिनी ने इसके लिए मना नहीं किया वह तो रोमांच में डूबी अपने नितम्बों को और जोर-जोर से आगे पीछे करने लगी थी।

अब तो धक्कों के उसके गांड का गुलाबी छेद भी नज़र आने लगा था। मैंने एक हाथ में थोड़ी से क्रीम ली और अपने अंगूठे पर लगाकर उसली गांड के छेद पर लगा कर अंगूठे को थोड़ा सा छेद पर दबा दिया।

कामिनी थोड़ा कसमसाई पर रोमांच और उत्तेजना में उसने कोई विरोध नहीं किया। अब तो गांड का छेद खुलने और बंद होने लगा था। मैं बीच-बीच में उसके उरोजों की घुंडियों घुंडियों को भी मसलता जा रहा था।

अब मैंने अपना एक हाथ नीचे करके उसकी सु-सु को टटोला। उसके चीरे पर अंगुली फिराई और फिर उसकी मदनमणि को चिमटी में पकड़ कर मसलने लगा।

“उईईईई ईईईई माआअ … आह … लुको … आह … ईईईईईई …”

कामिनी अपनी चरम उत्तेजना पर पहुँच गई थी। कामिनी का शरीर थोड़ा सा अकड़ा और वह झटके से खाने लगी और अपने नितम्बों को जोर-जोर से आगे पीछे करने लगी।

मैंने उसकी कमर को कसकर पकड़ लिया और 4-5 धक्के जो जोर से लगा दिये। मुझे लगा मेरे लंड के चारों ओर एक चिकनाई सी लिपट गई है और अब लंड आराम से अन्दर बाहर होने लगा है। शायद कामिनी की बुर ने रतिरस छोड़ दिया था।

कामिनी ने लम्बे लम्बे सांस लिए और फिर थोड़ा सीधी हो गई।

मैंने उसे पीठ की तरफ से अपने शरीर से चिपका लिया। मेर लंड अभी भी कामिनी की सु-सु में फंसा था। कामिनी ने अपने हाथ ऊपर करके मेरे गले में डाल लिए। मैंने एक हाथ से उसकी कमर को पकड़े रखा और दूसरे हाथ से उसकी सु-सु को मसलने लगा।

और साथ ही उसकी कांख पर पहले तो अपने होंठ लगाए और फिर जीभ से उसे चाटने लगा। कौमार्य की एक तीखी गंध मेरे नथुनों में समा गई।

स्त्री का यह भाग बहुत संवेदनशील होता है। अगर गर्दन और कांख को चूमा जाए तो गुदगुदी के साथ-साथ अत्यधिक रोमांच पैदा होता है और स्त्री कामविह्वल हो जाती है।

कामिनी की भी यही हालत थी, उसने मेरे लंड को अपनी सु-सु में जोर से भींच लिया; कामिनी की मीठी सीत्कार निकल गई “ईईई ईईईईई … ”

मैंने उसके कानों की लोब को मुंह में लेकर चुभलाना शुरू कर दिया। कामिनी की सु-सु ने एक बार फिर से संकोचन किया। उसकी साँसें एक बार फिर से तेज़ हो गयी थी उसका शरीर एक बार फिर से थोड़ा अकड़ा। मुझे लगा उसने एक बार फिर से ओर्गस्म प्राप्त कर लिया है।

कामिनी की पीठ मेरे सीने से चिपकी हुई थी। अचानक कामिनी पलट गई और मेरा लंड उसकी सु-सु से निकल गया। उसने अपना मुंह मेरी ओर करके मेरे सिर को अपने हाथों में पकड़कर चूमना शुरू कर दिया।

मुझे तो एक पल के लिए कुछ समझ ही नहीं आया। इस अप्रक्याशित घटना से मेरा संतुलन थोड़ा बिगड़ गया और मैं गीले फर्श पर फिसल कर नीचे गिर गया। कामिनी का नंगा बदन मेरे ऊपर आ गया। कामिनी ने मुझे अब भी नहीं छोड़ा और वह मेरे गालों, होंठों और गले पर बेतहाशा चुम्बन लिए ही जा रही थी। अब उसने अपने दोनों पैर मेरी कमर के दोनों और कर लिए और अपनी सु-सु को मेरे लंड पर जैसे घिसने लगी।
 
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